सनातन धर्मालोक १-२ — पृष्ठ 11–20
सनातन धर्मालोक १-२ · पृष्ठ 11–20
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२ G श्री सनातनधर्मालोक ( १-२ ) * श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज की सम्मति ' श्रीहरिः । श्रोपण्डित, दीनानाथडी शास्त्री समय - समयपर संस्कृत, हिन्दी के विभिन्न पत्र ष्ठ धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक विषयोंपर नद्ध तर्कपूर्ण, शास्त्रीय लेख लिखते रहते हैं । शास्त्रों सुन्दर एवं, है । धार्मिक नियमोंके सम्बन्ध में होने वाली विभिन्न ऋद शंकाका भी बड़ा सुन्दर समाधान करते रहते है । TI विपक्षियों में अनेकों लेखकों द्वारा नवीन - नवीन ग्रन्थों दर्थ का प्रकाशन होता ही रहता है । आस्तिक पक्ष इस या ओरसे उदासीन - सा रहता है । स्थायी साहित्यका चा, प्रचार पर बड़ा प्रभाव पड़ता है । शास्त्रीजीने विस्तृत अनेकों ही ग्रन्थोंका निर्माण किया है । उनका प्रकाशन न ग्रन्थमालाके रूपमें होने जारहा है, जो अत्यावश्यक है । प्रास्तिक वैभवसम्पन्न प्राचार्यों, महन्तों, धनवानों को इस प्रोर शीघ्र ही सहायता पहुँचानेका उपक्रम करना चाहिए । - [ श्री ] करपात्र स्वामी " । न अब सज्जनगरण उक्त महाग्रन्थकी त्री इसके बीस उद्योत हैं, साढ़े तीन सौके हैं । पि विषय - सूची प्रथम उद्योत— ( क ) समर्पण । विषयसूची देखें | लगभग किरण ( ख ) मुखबन्ध । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. * ' आलोक ' - परिचय ३ ( ग ) निवेदन । ( घ ) विषयानुक्रमणिका । १ वैदिक मङ्गल । २ मङ्गलके अवसर में विघ्नशोधन | ३ सना-तनधर्मकी प्राचीनता एवं महत्ता । ४ संक्षिप्त सना-तनधर्म । ५ अन्य मतोंके ग्रन्थोंमें सनातनधर्मके सिद्धान्त ६ शास्त्रार्थ- परिपाटी के चलानेकी आवश्यकता । ७ सनातनधर्मियोंको सावधानताकी आवश्यकता! ८ सनातनधर्मका प्रभाव आजकल पूर्वकी भांति क्यों नहीं? ε वेदाध्ययन - अध्यापन एवं प्रचारणकी आव-श्यकता । १० क्या वेदमें केवल यौगिकता है? ११ वेदार्थ - विधानके साधन । १२ वेदके विषय में आजके विद्वानोंका भारी भ्रम । १३ पतंजलि और ' शन्नो ' देवी ' मन्त्र । १४ ' छन्द ' विषयक - भ्रान्तिनिवारण । १५ संक्षिप्त वेद - वेदांगादि - परिचय । १६ वेदस्वरूप-निरूपण ( ११३१ संहिताओं का वेदत्व ) । १७ ब्राह्मण-भागका भी वेदत्व । १८ ब्राह्मणभागकी वेदता और वेद में इतिहास । १ वेदमन्त्रार्थ हत्याका दिग्दर्शन । २० वेदमें द्विजमात्रका अधिकार । २१ वेददोहन-रहस्य । २२ पण्डितोंके प्रति प्रार्थना । २३ आधुनिक जागतिक दुरवस्था । २४ ' अन्यैः सह विवादे तु वयं पंचोत्तरं शतम् ' । २५ सनातनधर्म - विषयिणी मीमांसा । An eGangotri २६- क्या Initiative सनातनधर्म में परिवर्तन हो सकता है? २७
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४ * श्री सनातनधर्मालोक ( १-२ ) * तर्क और प्रमाण में मान्यतर कौन है? द्वितीय उद्योत - २८ वेदादिमें ब्राह्मणकी श्रेष्ठता । २६ वर्ण - व्यवस्था जन्म से ही है । ३० गुणकर्म से वर्ग-व्यवस्था में हानि । ३१ कर्मसे वर्णव्यवस्था का प्रति-वाद । ३२ वर्णव्यवस्थाविषयमें अन्यमतनिरास । ३३ वर्णविमर्श । ३४ वर्णव्यवस्थागत भ्रान्तिनिरास । ३५ क्या गुणकर्मानुसार वर्णव्यवस्था चल सकती है? ३६ मृतकश्राद्धसिद्धि | ३७ मृतकश्राद्धगतभ्रान्तिनिरा-करण ३८ वैवस्वतथम और यमदूतोंकी वैदिकता । ३६ परलोककी सिद्धि । ४० स्वर्ग, नरक आदि लोकविशेषों की सिद्धि और यज्ञका उद्देश्य स्वर्गादिको प्राप्ति । ४१ स्वर्गमैं गन्धर्व और अप्सराम्रोंको सत्ता । तृतीय उद्योत - ४२ मूर्तिपूजनमें पूर्वपक्षी और उत्तरपक्षीका संवाद । ४३ मूर्तिपूजा - मीमांसा ( परापूजा-स्तोत्र पर विचार ) ४४ मूर्तिपूजन- विमर्श । ४५ स्वामी दयानन्दजी और शिवरात्रिका मूषक । ४६ पशुबलि -विवेचन | ४७ परमात्माकी साकारताकी सिद्धि । • ४८ परमात्माका अवतारनिरूपण । ४६ द्वैतवाद एवं अद्वैतवाद में सामंजस्य । ५० विविध वाद । चतुर्थ उद्योत - ५१ गणपतिपूजनकी सिद्धि । ५२ ग्रहोंका प्रभाव और उनका पूजन I । ५३ क्या CC - 0. Ankur Joshi Collection * ' आलोक ' - परिचय * ५ नक्षत्रादि विचार कल्पित है? ५४ फलित ज्योतिष पर विचार । ५५ राहु द्वारा सूर्यग्रहण । ५६ पृथिवी की स्थिरता और सूर्य की गति । ५७ सूर्यग्रहण और देवपूजादिविषय में वेदादिशास्त्रों का मत । ५८ ग्रहण-विज्ञान और उसका अशौचविज्ञान । ५६ ' सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ' । ६० सूर्य आत्मा । पंचम उद्योत - ६१ स्त्रियोंको सन्ध्या, उपनयन, वेदादिके अधिकार एवं अनधिकार पर विचार । ६२ स्त्रियोंका वेदादि अधिकारविषय निरास | ६३ प्राचीन साहित्य में स्त्रियों का स्थान । ६४ स्त्रियोंका वेदानधिकार विमर्श | ६५ स्त्रियों के वेदानधिकारविषय में प्राक्षेप-परिहार । ६६ स्त्रियोंके वेद - उपनयनविषयमें नवीन-प्रमाणों की समीक्षा । ६७ नारियों के उपनयनाधिकार पर विचार | ६८ नारियोंके उपनयनाधिकार पर आक्षेप परिहार । ६६ स्त्रियोंके उपनयन - वेदादिविषय में भ्रांति - निवारण । ७० स्त्री - शूद्रों के वेदादिके अनधि कार विषयमें पूर्वपक्ष एवं उत्तरपक्ष । ७१ पूर्वका परिशिष्ट । ७२ ' ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी । ' f षष्ठ उद्योत - – ७३ स्त्रियोंकी आवरण ( पर्दा ) - ६ प्रथामें वेदादि शास्त्रों का मत । ७४ स्त्रियोंके ६ प्राचीनतानुसरणसे ही शान्ति । ७५ स्वयंवर में क्षत्रियों ६ द Gujarat. An eGangotri Initiative
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६ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) *. से भिन्न वर्णोंका अधिकार नहीं । ७६ पुराण- इतिहास में स्वयंवर के सम्बन्धमें सम्मति है वा विमति? T ७७ बाल्यविवाहपर विचार । ७८ युवति - विवाह के दुष्परिणामको कथा । ७६ श्रीसीता रामके विवाहक अवस्था । सप्तम उद्योत - ८० विवाहवयोविचार । ८१ कन्या-न विवाहपर विमर्श । ८२-८३ कन्या विवाह वयपर विवे-I चना । ( १ ) ( २ ) । ८४-८५-८६-८७ कन्याविवाह -. वयोविवेक ( क ) ( ख ) ( ग ) ( घ ) । ८८ कन्याविवाह-वयोनिर्णय । अष्टम उद्योत - ८ ९ विधवाविवाहकी युक्तता वा र अयुक्ततापर विमर्श । ० पति एक और स्त्रियां बहुत । ६१ विधवाविवाहकी हानियां । ६२ विवाहविच्छेद की य हानियां | ६३ कन्यात्रोंके दायाद्य करने में हानियां T- ६४ विधवाविवाहविषयक - युक्तिविवेक । ९ ५ नियोग और और मैथुन ( एक दृष्टि कोण ) ६६ विधवा-विवाह, नियोगादिविषयक प्रमाणोंकी समीक्षा । ६७ नियोग और मैथुनं ( दूसरा दृष्टिकोण ) ६८ स्वामी दयानन्दजीके नियोगका समीक्षण । यों ६६ श्रीपराशर और मत्स्यगन्धाका समागम । १०० दमयन्ती आदियोंके पुनर्विवाहपर विचार । १०१ CC - 0. Ankur Joshi * ' आलोक ' - परिचय ७ द्रौपदीके पञ्चपतित्वपर विचार । १०२ द्रौपदी - पंच-पतित्वविषयक ग्राक्षे पोंका परिहार, १०३ द्रौपदीके पञ्चपतित्वकी प्रवृत्ति, १०४ पंचकन्याचरित्र ' समीक्षा | नवम उद्योत - १०५ त्रिकालमें सन्ध्याकी वैदि-कता, १०६ गायत्रीमन्त्रकी महत्ताका रहस्य, १०७ चन्दनादि का अनुलेपन, १०८ देवपूजा प्राचीन है । १०६ सनातनधर्ममें यज्ञका स्थान तथा प्रयोजन, ११० क्या विद्वान् मनुष्यही देव हैं? १११ देवताओंकी मनुष्योंसे भिन्नता में वेदादिप्रमाणोंका उपन्यास, ११२ क्या वेदमें देवताओंके नाम परमात्माका अर्थ रखते हैं? ११३ देवतावादके विषयमें श्रीसातवलेकरके Collection Gujarat मतकी आलोचना, ११४ मरुतोंके देवत्वका विचार, ११५ देवताओंकी श्रमानुषिकशक्ति और देवस्वरूप-निरूपण, ११६ इन्द्र देवराज और स्वर्गलोकके शासक, ११७ देवताओंके भेद और दिशाएं, ११५ देवताओं की उत्पत्ति, ११ ९ देवताओंके पौराणिक नाम वेदमें, १२० देवताओंकी पत्नियां, १२१ देवासुर - युद्ध, १२२ आसुरी माया, १२३ मायावियों के साथ माया करनेमें वैदिकता, १२४ भूतप्र ेतपिशाच आदियोंकी वेद एवं आयुर्वेदमें सत्ता । . An eGangotri Initiative
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= * श्री सनातनधर्मालोक ( १-२ ) * दशम उद्योत - १२५ ' नमस्ते ' का युक्तायुक्तत्व-विचार, १२६ नमस्ते अथवा हठवाद, १२७ ' नमस्ते-विधान ' का प्रतिविधान, १२८ क्या नमस्ते एक पद है? ( नमस्ते - प्रदीपकी समीक्षा ), १२६ ' नमस्ते व्याख्या ' का निरीक्षण, १३० ' नमस्ते प्रचार ' समीक्षा, १३१ हिन्दुशब्दको प्राचीनता एवं वैदिकता, १३२ हिन्दुओंका आदिनिवासस्थान भारतवर्ष, १३३ क्या एतेरय महिदास शूद्र थे? १३४ क्या ऐलूषकवष शूद्र थे? १३५ क्या पौराणिक सूत प्रतिलोम - सङ्कर थे? १३६ क्या कक्षीवान् और जानश्रुति शूद्र थे? १३७ क्या शबरी शूद्रा थी? १३८ क्या वाल्मीकि चाण्डाल थे? १३६ क्या प्रह्लाद ऐतिहासिक व्यक्ति न था? १४० ' पोप ' शब्दकी समीक्षा, १४१ ऋषित्वविचार, १४२ मुक्तिमें अपुनरावृत्तिकी सिद्धि, १४३ पाप और उसके फलका दूर होना, १४४ वेद हमारे शत्रुओंका शत्रु, १४५ आत्मा कर्म में भी परतन्त्र, १४६ कर्म-रहस्य, १४७ मानवीय साम्यवाद? १४८ चातुर्वर्ण्य की अनादि - सिद्धता, १४६ शूद्रादि अनार्य, १५० अस्पृश्योद्धार - मीमांसा, १५१ वरशापप्रदानमें उपपत्ति । एकादश उद्योत - १५२ हिदुत्रोंकी संख्या में ह्रास. क्यों? १५३ क्षण तक जलना अच्छा; देर तक ' धुआं * ' आलोक ' - परिचय * अच्छा नहीं; १५४ आज समर्धता में भी अशान्तिका साम्राज्य क्यों? १.५५ स्वराज्यशब्दकी परिभाषा, १५६ क्या हम अस्पृश्योंके विरोधी हैं? १५७ जनता की अन्ध परम्परा, १५८ भारतदुर्गके भङ्गका प्रसंग, १५६ धर्मदुर्गत्रारणार्थः हमारे पूर्वजोंकी दूरदर्शिता, १६० साम्यवादविषयक - संवाद, १६१ चांडाल - आदियों की अस्पृश्यता में प्रमाण और उपपत्तियां.१६२ अन्त्यजोंके देवमन्दिरमें प्रवेश और अस्पृश्यतापर विचार, १६३ स्पृश्य एवं अस्पृश्यका संवाद १६४ अस्पृश्योद्धारका आदर्श, १६५ अस्पृश्योद्धार के प्रकार का विचार, १६६ साम्यवादके प्रमाणोंकी परीक्षा, १६७ साम्यवाद और अन्त्यजोंके देवमन्दिर प्रवेश की प्रत्यालोचना, १६८ अन्त्यजोंके देवमन्दिर प्रवेशपर विचार, १६६ ' भारतीय धर्मशास्त्र ' की समीक्षा, १७० अस्पृश्यता- विज्ञान । द्वादश उद्योत - १७१ रामायणविषयक प्रक्षेप का परिहार । १७२ क्या रामायण महाभारत से अर्वा-चीन है? १७३ क्या उत्तरकाण्ड रामायणका अङ्ग नहीं है? १७४ क्या आदिम चार सर्ग रामायण के अङ्ग नहीं हैं? १७५ उत्तरकाण्डके रामायणके अङ्गत्व में उपपत्तियां । १७६ मूलरामायण और उत्तरकाण्ड व CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१० * श्री सनातनधर्मालोक ( १-२ ) 1 कं विरोधका परिहार । १७७ आद्य चार सर्ग और T उत्तरकाण्ड में विरोधका परिहार । १७८ पहिलेके चार सर्गके विषय में विरोधपरिहार । १७६ अरण्यकाण्ड और उत्तराकांडका विरोध परिहार । १८० उत्तरकांड-i विषयक प्रक्षेपों का परिहार । १८१ आदिम छः R काण्डों के आक्षेपोंका परिहार । १८२ क्या रामायण र बुद्धकाल में हुई? १८३ वाल्मीकिरामायणका रामाव-४ तारसे पूर्वनिर्माण कैसे? १८४ सीताकी उत्पत्ति पर र विमर्श १८५ क्या हनुमानादि मनुष्य थे? १८६ पशु-T, पक्षियोंके भाषणकी सिद्धि । की त्रयोदश उद्योत - १८७ क्या महाभारतके एक लाख श्लोक नहीं और कर्ता एक नहीं? १८८ पुराणों र IT, का कर्ता एक है । १८६ व्यास एक हैं या दो? १६० पौराणिक वस्तुओं की गवेषणा । १६१ कल्प और नेप सृष्टि- संवत्सर । १ ९ २ कलियुग के अन्तकी समीक्षा - १६३ पुराणोंका लाभ और पुराणोंको विषयसूची । ङ्ग १ ९ ४ पुराणोंका संक्षिप्त परिचय | १६५ प्रत्येक के पुराण में भिन्न - भिन्न देवताके बड़े होने का समाधान - त्व १ ९ ६ पुराणों में प्रतिशयोक्ति वेदानुकूल । १६७ पुराण में परस्पर विरोध और पुनरुक्तिका समाधान । ण्ड १ ९ ८ देवतावाद के विषय में वेद और पुराणोंकी एक-वाक्यता । १ ९ ६ पौराणिक इतिहासोंकी वेदमें भी CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat Gujarat.. * ' आलोक ' - परिचय *?? सत्ता । २०० पुराणनाम वेदादि साहित्य में । २०१ पुराण और ब्राह्मणका भद । चतुर्दश उद्योत – २०२ वैदिकता और पौरारिण-कताका रहस्य । २०३ पौराणिक अश्लीलतापर विचार । २०४ वेदोंमें भी पुराणसदृशता । २०५ पुराणोंका महत्त्व और उनमें विविध भाषाएं और विविध भाव । २०६ पौराणिक चरित्रोंका पर्यालोचन २०७ शिवलिङ्गपूजन विषयक विमर्श । २०८ पौराणिक-समन्वय । २०६ ‘ पुराणपरिचय ' का परिचय | २१० पुराणविषयक विविध प्राक्षेपों का परिहार । २११ पर्वतों के पंख और उनका काटना वैदिक । २१२ पुरा-गोक्त दीर्घायुष्य में वेद की साक्षी । २१३ पौराणिक दीर्घायुष्यता की परीक्षा । २१४ अमरताकी सिद्धि । २१५ अकालमृत्युका सम्भव । २१६ मृतकका जीवित होना । २१७ सिर काटनेपर भी जीवित रहना । २१८ गौत्रोंका वैदिक, पौराणिक और व्यावहारिक महत्त्व २१ ९ स्वप्नफलकी समूलकता । २२० व्रत आदिकी शास्त्रीयता और वैज्ञानिक महत्ता । २२१ शकुन एवं अपशकुनकी, समूलकता । २२२ कुश का उपयोग शास्त्रीयं । २२३ तोर्थोंकी वैदिकता और उनकी पवित्रता । २२४ भगवान् नन्दनन्दन और उनके चरित्र An eGangotri Initiative
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१२ श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * की आलोचना | २२५ श्रीराधाविषयक आक्षेपका परिहार । २२६ क्या भागवतके श्रीकृष्ण अन्य हैं और महाभारतके अन्य? २२७ ' कर्मण्यकर्म यः पश्येद् अकर्मरिण च कर्म यः । २२८. श्रीरामववतार ।: २२६ यज्ञमें पश्वालम्भक वैदिकता । २३० मद्य और उसकी व्यवस्था । २३१ द्यूत और उसकी व्यवस्था । पंचदश उद्योत -२३२ असम्भव शब्द कूपमण्डूकों के कोष में २३३ प्रकृतिके नियम सामान्यशास्त्र । २३४ स्त्रीका पुरुष बन जाना और पुरुषका स्त्री बन जाना । २३५ अगस्त्य ऋषिके समुद्रपान में उपपत्ति । २३६ नेत्र आदि के द्वारा जलाने में उप-पत्ति । २३७ स्थूल - मैथुन के बिना भी सन्तान । २३८ विष्णुकर्णमलोद्भूतत्व आदि पर विचार । २३ सृष्टिकी विलक्षण उत्पत्तियाँ । २४० बहुत सन्तानके सम्भवकी मीमांसा । २४१ रक्तबीज के रक्तसे असुरों की उत्पत्ति । २४२ नारद आदिका श्राकाशमें जाना और उससे उतरना । २४३ श्राकाशमें आकाश गंगा आदिकी स्थिति । २४४ एकसे अधिक मुखोंका सम्भव । २४५ हनुमानका सूर्यको पकड़ना । २४६ समुद्रमें पत्थरोंका तैरना । २४७ क्या कुम्भकर्णको निद्रा असम्भव है? २४८ बूढे को जवानी देना । २४६ आलोक परिचय १३ मरे हुएका संजीवन । २५० पुरुषोंका दीर्घ आकार २५१ दीर्घजीवनमें उपपत्ति । २५२ अन्तर्धान सिद्धि में प्रमाण एवं उपपत्ति । २५३ सूर्यका ढक देना और अस्त्रका वापिस आना, २५४ - २५५, बिना देखे भी युद्ध प्रादिका वृत्तज्ञान और भविष्यत्को ज्ञान, २५६ युद्ध में गीता सुना सकनी सम्भव है, २५७ शिवडमरूसे Y चौदह सूत्र, २५८: आग्नेय, वायव्य, सम्मोहन आदि अस्त्र । २५ गोवर्धनपर्वतके उठाने पर विचार, २६० सम्भव । २६१ देवताओं श्रादिकी बहु-समुद्रमन्थनका शरीर तथा दूसरोंके शरीर बना लेने में शक्ति, २६२ प्रह्लाद आदिका चरित्र सम्भव । षोडश उद्योत — २६३ वादियोंकी नीति- रीतिका दिग्दर्शन, २६४ ' संस्कारविधि ' में सनातनधर्म [ प्रस्ता-वना, १ गर्भाधानसमीक्षा, २ पुंसवन - समीक्षा, ३ सीमन्तोन्नयन - स ०, ४ जातकर्म - स ०, ५ नामकरणस ०, ६ निष्क्रमण - स ०, ७ अन्नप्राशन- स ० ८ चूड़ाकर्म-स ०, ६ कर्णवेध - स ०, १० उपनयन- स ०, ११ वेदा-रम्भ - स ०, १२ समावर्तन- स ०, ६ कर्णवेध स ०, १० उपनयन - स ०, ११ वेदारम्भ - स ०, १२ समावर्तन स ०, व १३ विवाह - स ० १४ गृहाश्रम स ०, १५ वानप्रस्थाश्रम- II स ०, १६ संन्यास - स ० १७ अन्त्येष्टि - स ० ] । २६५ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१४ G श्री सनातनधर्मालोक ( १-२ ) * में सत्यार्थप्रकाशके कई अशोंकी आलोचना, २६६ स्वामी दयानन्दजी और आर्यसमाज । २६७ आर्यसमाजियों से उल्लंघित स्वामी दयानन्दजी के सिद्धान्त, २६८ शुद्धि - विमर्श, २६६ असवर्णाविवाहकी सदोषता, २७० समुद्र - यात्रा - प्रायश्चित्त विचार । सप्तदश उद्योत —२ः १ सङ्कलित सनातनधर्मके 0 नियमोंका वेदशास्त्रादिमें मूल [ १ अपनी संहिता ( शाखा ) का अध्ययन, २ शंखलाभ, ३ सुवधारण का माहात्म्य, ४ सरस्वती देवी का वर्णन, ५ बालकके ऊर्ध्वदन्तोंका दुष्फल, ६ दिग्बलि, ७ दिग्रक्षाकवच, का ८ युगनाम, T-११, यज्ञका ३ माहात्म्य, १३ बाद पुरुषकी यजमान - वर्धन, ऋतु और मास १० ब्राह्मणों को दान, दक्षिणास सम्बन्ध, १२ दक्षिरणादान-युद्ध में मरने पर स्वर्गः १४ मरनेके दशा, १५ धनान्नदानकी प्रशंसा १६ १७ अभिचारादिका वर्णन और मन्त्र-ET- शक्ति, १८ स्त्रियोंके भूषण १६ श्रद्धाका महत्त्व । र २० दीक्षा ग्रहण, २१ तान्त्रिक - शब्द, २२ इन्द्रजाल-वर्णन, २३ शयनकी दिशा, २४ नामग्रहणका माहा-म. त्म्य, २५ चर्म - स्थिति, २६ पुत्र में पक्षपात २७ सात ६५ वस्तुए ं, २८ ग्राकाशयान - जल - नौका मूल, २६ सुदर्शन-चक्रका मूल, ३० सगोत्रविवाहका निषेध । CC - 0. Ankur Joshi + Collection Gujarat. * आलोक - परिचय १५ ३१ प्राततायीका वध, ३२ मनुका पिता होना, ३३ रात्रिकी स्तुति, ३४ त्रुटिकी प्रार्थना, ३५ खरवाहन, ३६ सत्यासत्यका विवेक, ३७ श्राचमन फल, ३८ प्रेतका पिपीलिका से उपहत होनेपर दोष ३६ अङ्गस्पर्श, ४० वेदमें विविध जातियां, ४१ ग्रनुस्तरणी का मूल, ४२ मन्देह दैत्य, ४३ इन्द्रका वज्र, ४४ ग्रायु-र्वेद, ४५ मृतकको सुवर्ण पहाना और स्नान कराना ४६ मलमासका मूल ४७ मूषकवाहन, ४८ सूर्यके घोड़े, ४६. जाया- ग्रर्धाङ्ग, ५० पत्नीके वस्त्रको पहिरने का निषेध । ५१ पातिव्रत्य, ५२ पाणिग्रहण में स्त्रीके अंगूठे आदिका ग्रहण, ५३ अन्नदोष, ५४ नोंकार-जपकी महिमा, ५ अश्वके प्रतिग्रहका निषेध, ५६ भोजन- नियम, ५७ वंदकी शाखाएं, ५८ प्रकीर्ण सना-तनधर्म की बातों का मूल ] २७२ सनातनधर्मके सिद्धान्तोंकी वैज्ञानिकता [ १ सवर्ण विवाह - विधि, २ असवता में तथा निकट-सम्बन्ध में विवाहका निषेध, ३ जपपाठ, ४ ग्रहण में भोजनादिका निषेध, ५ उत्तर में सिर करके सोनेका निषेध, ६ घरमें तुलसीका पूजन, ७ पीपलका पूजन, ८ शङ्खध्वनि, ६ काष्ठ - पादुका पहनना, १० कुशोंका An प्रासन eGangotri, hitiative ११ रेशमी आसन, मृग और व्याघ्रके चर्म
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१६ * श्री सनातनधर्मालोक ( १-२ ) ० १२ कमण्डलु, १३ रातमें निद्राके समय सिरकी ओर जल रखना, १४ वस्त्रसे विना छाने गायका दूध न पीना, १५ पृथ्वीमें लात मारना पापजनक, १६ शिशु-ओंके गलेमें रक्षा आदिका पहिराना, १७ कुनोंपर घृत का दीपक जलाना, १८ भोजनसे पूर्वं ग्रास रखना, अग्नि में डालना और काकबलि ] २७३ सनातनधर्मके मन्तव्यों की रहस्यपूर्णता [ १ ब्राह्ममुहूर्त में उठना, २ प्रातः भूमिका वन्दन, उस पर उठते ही पांव न रखना, ३ हस्तदर्शन, ४ प्रातः ब्राह्मणका दर्शन अशुभ क्यों?. ५ मलत्यागकर मिट्टी से हस्तशुद्धि, ६ दन्तधावन ७ तैलनियम, स्नान, ε काठके खडाऊ पहिनना, १० रेशमी आसन, कुशासन, मृग वा व्याघ्रके चर्मका प्रासन, ११- मूर्ति-पूजा, १२ तिलक, १३ भस्मधारण, १४ मार्जन, १५ अभिषेक, १६ शिखा - बन्धन; १७ सन्ध्योपासना, १८ प्राणायाम, १६ सूर्योपस्थान, २० जप, २१ जपपाठः, २२ मालाकी मणियां १०८ क्यों? २३ मन्त्र और सिद्धियाँ, २४ जपन १०८ वार क्यों? २५ परि-क्रमा, २६ तुलसी- पूजन, २७ तुलसी पत्रके चबाने का निषेध २८ देवमन्दिर - गमन, २६ पंचगव्य, गोमय, गोमूत्र, ३० गोमूत्रमें गंगानिवास, ३१ गोवर में लक्ष्मीका आलोक परिचय # १७. निवास ३२ श्रावणी, ३३ विजय दशमी, ३४ दीपा. वली, ३५ होली, ३६ अपने नामके छिपानेका रहस्य, ३७ उपवास, ३८ दृष्टिदोष, ३६ भोजनकी शुद्धि, ४० बाजारके अन्नको खानेका निषेध, ४१ घृतपक्वकी शुद्धता, ४२ स्पृश्यास्पृश्यता, ४३ व्रतोपवास, ४४ तीर्थं ४५ परलोक ] २७४ आचारोंमें वैज्ञानिक चमत्कार [ १ ब्राह्म- f मुहूर्त्त में शय्यात्याग, २ प्रातः मलमूत्र त्याग, ३ मलमूत्र- ब त्यागके नियम ४ गण्डूष ( कुल्ला ) करना, ५ मुह धोना, ६ प्रातः स्नानका फल, ७ सन्ध्याके लिए f प्रातः पुष्प चुनना ८ स्नानके बाद चन्दन लगाना, f ६ पूर्व दिशा की ओर मुख करके भो न करना, १० व भोजनके समय मौन, ११ भोजनके समय अथवा अन्य समय रेशमी वस्त्र पहननेकी महिमा, १२ भोजन के समय नैवेद्य १३ भोजनकी विशुद्धि, १४ शूद्रादिकं २ भोजनका निषेध १५ समान वर्ण वालोंकी पक्तिमें श भोजन, १६ पंक्ति के भोजन समाप्त हो जानेपर इकट्टा अ उठना, १७ भोजन में दृष्टिदोष, १८ सिर बन्द करके क्य वा जूता पहिर कर भोजन करनेका निषेध, १६ भोजन ३० के बाद नियम, २० गायका दूध । २१ काली गायकी हा विशेषता २२ विशेष - विशेष तिथियोंमें उपवास । २३ वि ता CC - 0. Ankur Joshi Collectijarat. An eGangotri Initiative
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१५ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) ** शयनके समय विशेष दिशाका विचार ] २७५ शङ्खध्वनिका विज्ञान । २७६ चरणामृतका वैज्ञानिक महत्त्व | २७७ आयुर्वेदिक दृष्टिसे भी गंगा जलकी महत्ता । २७८ वृक्षोंमें चेतनता । २७ ९ तुलसी-गुण- गौरव । २८० सोलह संस्कारोंका रहस्य । २८१ - शिखाको रहस्य । २८२ उपनयन रहस्य । २८३ लांग न- बांधना । २८४ मेखला कौपीन आदिओंका रहस्य । ह २८५ मृगचर्मासनका रहस्य, २८६ वैवाहिक रीति-ए विशेष रहस्य, २८७ श्रीकृष्ण जन्माष्टमीव्रत पूर्ण वैज्ञा-निक २८८ विजयदशमीका महत्त्व । २८६ दीपावली ० विज्ञान । २६० होलिका - विज्ञान । २६१ एकादशी व्रत न्य विज्ञान । २ ९ २ प्रोङ्कार - महत्त्व, २ ९ ३ मौन - महत्त्व । अष्टादश उद्योत - २६४ विविध प्रश्नों के उत्तर, २६५ श्रीसम्पूर्णानन्दजी के प्रक्षेपोंका परिहार । २६६ में शनैश्चरमन्त्रविषयक विचार, २ ९ ७ क्या गणपति अवैदिक देव हैं? २६८ श्रीसत्यनारायण व्रतकथा के क्या धर्मके नाम से अधर्म है? २६६ देवचरित्रचर्चा । जन ३०० श्रीसम्पूर्णानन्दजीके अवशिष्ट प्रक्षेपोंका परि-की हार, ३०१ वार- क्रम- रहस्य, ३०२ आर्य - समाजिक २३ विवाहका रहस्यभेद, ३०३ महाब्राह्मणोंकी अव्यवहार्य-ताकी विवेचना, ३०४ उपनिषद् के विषय में डुइसन CC - 0. Ankur Joshi Collection, Gujarat. * आलोक - परिचय १६ साहिबको भ्रांति, ३०५ दर्शनों में सनातनधर्म, ३०६ भगवद्गीता में सनातनधर्म, ३०७ भगवद्गीता में वेद-खंडनका रहस्य, ३०८ क्या गीतामें केवल कर्मकाण्ड है? ३०६-३१० गीताप्रोक्त यज्ञविषय में विमर्श ( १ ) ( २ ) । एकोनविंश उद्योत –३११ आयुर्वेदमें प्रातुर-कवच, ३१२ प्रायुर्वेद में सनातनधर्म ( सुश्रुत - सूत्र-स्थानमें ) ३१३ प्रा ० सना ० ( सुश्रुत निदानस्थान में ) ३१४ आयु ० सना ० ( सुश्रुत शारीर - स्थान में ). ३१५ आयु ० में सनातनधर्म ( सुश्रुत - चिकित्सा - स्थान में ) ३१६ आयु ० में सना ० ( सुश्रुत कल्पस्थान में ) ३१७ आयुर्वेदमें सनातन धर्म ( सुश्रुतसंहिता उत्तर तन्त्रमें ), " ३१८ श्री आयुर्वेद ( चरक - सूत्रस्थान ) में सनातन धर्म, ३१६ आयु ० ( चरक - निदानस्थान में ), ३२० आयु ० में सनातन धर्मं ( चरक विमानस्थान में ), ३२१ आयु ० में सना ० ( चरक - शारीरस्थानमैं ) ३२२ आयु ० में सना • ( चरक - इन्द्रियस्थानमें ) ३२३ श्रायु ० स ० ध ० में ( चरक - चिकित्सास्थानमें ), ३२४ आयु ० में स ० ध ० . ( चरक कल्पस्थान में ), ३२५ श्रायुर्वेद में सनातनधर्मं ( चरक संहिता - सिद्धिस्थानमें ) । An eGango वि उद्योत – ३२६ वैज्ञानिकसंसारके अद्भुत
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* २० * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * आविष्कार । ३२७ प्राचीनता श्रेष्ठ है वा अर्वाची-नता? ३२८ संन्यास आश्रमकी प्राचीनता वा शास्त्री-यता । ३२६ ' देवृकामा ' विषयक विमर्श । ३३० मुसलमानोंसे छुआ हुआ अन्न अभोज्य ही है । ३३१ हिंदुकोबिल की संक्षिप्त आलोचना । ३३२ हिंदुकोड-विधान और निरुक्त, ३३३ हिंदुकोड - विधान और • स्मृतियां, ३३४ भारतीय नारी - विषयक प्राक्षपों पर विचार, ३३५ हमें सनातनधर्मकी भक्ति क्यों करनी चाहिए? ३३६ सनातनधर्म प्रचारकोंका स्मरण, ३३८ सनातनधर्मका वर्तमान साहित्य और उसकी आलोचना, ३३६ सनातनधर्मी पत्र - पत्रिकाओं का परिचय, ३४० उपसंहार । परिशिष्ट उद्योत - ३४१ प्रणेताके विषय में समा- ' चारपत्रोंमें मुद्रित सम्मतियाँ, ३४२ प्रोताके परि-चायक विद्वानोंके पत्र, ३४३ साक्षात्कार वा सन्देश · द्वारा प्रणेताके प्रोत्साहकोंकी नामावली । ३४४ हमारे शास्त्रार्थं । ३४५ प्राप्त पत्र- पुस्तकादिका विवरण । ३४६ किन - किन नगरोंसे पत्र आदि आये? ३४७ • मुद्रण- यन्त्र जिसमें हमारे निबन्ध मुद्रित हुए । ३४८ प्रणेतृ - परिचय ( १ ) ( ले. श्रीयशोदानन्दनशास्त्री जयतल ) । ३४६ प्रणेतृपरिचय ( २ ) ( ले. श्री महावीर * प्रालोक ' परिचय २१ प्रसादजोशी ) ३५० प्रणेतृ परिचय ( ४ ) ले. ' संस्कृतम् ' सम्पादकः ) । ३५१ प्रोतृ - परिचय ' ( ४ ) ( ले. श्री नागार्जुन ) । ३५२ ' श्री सनातनधर्मालोक ' के संरक्षक तथा सहायकों का परिचय । ३५३ समाप्ति - मङ्गल । पाठक महानुभावोंने वर्तमान शताब्दी के नव - उप-हार एवं सनातनधर्मंके महाभारत - इस ' श्रीसनातन-धर्मालोक ' महाग्रन्थको विषयसूची, देख ली । उन्होंने अनुभव किया होगा कि सनातन धर्मका कोई भी विषय । . इसमें छूट नहीं पाया । ' पुराण विषयक विविध प्राक्षे पों का परिहार ' ( २१० ) और विविध प्रश्नों के उत्तर ' ( २ ९ ४ ) इन निबन्धों में सनातन धर्म पर होनेवाली सो-सौ से अधिक शंकाका प्रमारणोपपत्तिसहित समाधान किया गया है । कई उद्योतोंमें विविध विषय भी आ - गए हैं । जो विषय हमारे ध्यानमें न आया हो, उसे ; सुझा देने पर उसको भी इस महाग्रंथ में अन्तर्निविष्ट : कर लिया जाएगा । ऐसे महाग्रन्थकी आवश्यकतासे कौन नकार कर सकता है? हमने संवत् १६८० सन् ( १ ९ २४ ) से • अबतक निरन्तर ३० साल पत्र - पत्रिकाओंके द्वारा सनातन धर्मकी जो सेवा की है, उसका श्रेय इसी महा ग्रन्थको है । इसीसे उद्धृत हमारे लेखोंको चोटीके CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative