सनातन धर्मालोक १-२
1-2 Shri Sanatana Dharma Lok Parichay By Devnath Sharma Shastri 1959 New Delhi - Sanatan Dharmalok Karyalay · 180 पृष्ठ · 18 खण्ड
विषय सूची
- nkur Joshi Collection Gujarat An eGangotri Initiative. CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative CC - 0. Ankur Joshi Collection… 1–10
- २ G श्री सनातनधर्मालोक ( १-२ ) * श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज की सम्मति ' श्रीहरिः । श्रोपण्डित, दीनानाथडी शास्त्री समय - समयपर संस्कृत, हिन्दी के विभिन्न… 11–20
- १ २२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * नेताओं, वक्ताओं तथा अनुसंधाताओंने अपने पुस्तकों में बिना हमारा नाम लिए ही अपने उपयोगों में लाकर हमारे परिश्रमकी सफलताको… 21–30
- ४२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) यह भी इसमें विचारणीय है कि अभिवादनार्थक ' नमः ' पद है वा ' ते ' भी? यदि ' नमः ' ही है तो उस ' नमः ' का प्रयोग तो… 31–40
- ६२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * २०-२१ । ) ( क ) इससे पूर्व स्वामीजी ने लिखा था- " जहां पर हमने विशेष्य प्रथमान्त हो; वहां पर " नमस्ते " " नमः ते " के… 41–50
- तान ८२ G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * क - पर किन्तु ' नमस्ते ' पद है । पाणिनि - सूत्र में ' नमस्ते स्वस्ति ' ऐसा पाठ ही नहीं, तब चतुर्थी कैसे हुई? यदि किसी… 51–60
- १०२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) *, सिद्ध होता हैं । तब फिर बहुवचन में ' सब सभासदोंको ' नमस्ते ' नमस्ते - प्राचीनता ( पृ ० ३२ ) के अनुसार लिखते हुए स्वा ०… 61–70
- * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * १२२ वपय प्रसिद्ध हैं ही । ' शतपथब्राह्मणं ' में भी " तच्छ्रेयोरूप मत्य-सृजत् तत् क्षत्रं यान्येतानि देवत्रा क्षत्राणि… 71–80
- * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * १४२ रुद्रके श्रादरार्थ है । इस प्रकार आगे भी जान लेना चाहिए । तब इससे वादीकी अर्थ - सिद्धि कैसे हो सकती है? वेदमें… 81–90
- १६२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * यह प्रमाण श्रीसन्तरामके ' नमस्ते प्रचार ' से लिया गया है । इस मन्त्रका सम्यक् विवेचन हमने ' नमस्ते और हठवाद ' में किया… 91–100
- १८२ G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * ' व ' होता है । तुम्हारे ' लिए यह वहुवचन है, तब वादीने ' तुम्हारे लिए ' यह ' बहुवचनका अर्थ कैसे किया? वादीसे R दिए गये… 101–110
- ०१ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * २०२ सोचें कि इनसे प्रतिपक्षियोंका क्या सिद्ध हुआ? यहाँ पाठक क तो क्षत्रिय ( छोटे ) द्वारा ब्राह्मणों ( बड़े ) को नमस्कार… 111–120
- २२२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * को यहां नमस्कार है, यहांके कुत्तोंको नहीं । रुद्रके कुत्त े भी हुआ करते हैं, जिनका ' रुद्रस्य ऐलवकारेभ्यः [ प्रमथेभ्यः ]… 121–130
- २४२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) कुमारकी – जो उससे श्रायुमें छोटा था, और विशारद श्रेणी में पढ़ा करता था - शिकायत की, कि यह मुझसे श्रायु में तथा श्रेणी में… 131–140
- २६२ * श्रीसनातनधर्मालोकः ( १-२ ) * अर्थ से सम्बन्ध नहीं हटा दें, तो अधिकांश में ' हठवाद ' का अन्त हो जावे… 141–150
- २८२ श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) वाला दोनोंसे छोटा हो । तब इससे वादीका पक्ष सिद्ध न हुआ । इस मत के आदि प्रवर्तक स्वा. द. जीने कनिष्ठुके श्रागे नमस्कार… 151–160
- ३०२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * नहीं करते? शुकदेव बाह्यलौकिक व्यवहारमें नहीं थे, अतः वहां ' ते ' का प्रयोग है… 161–170
- २ ३२२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) I * ' जय हो ' कहकर श्राशीर्वाद देता है, और फिर इसम ' ते ' ( तुभ्यं ) भी नहीं; प्रतएव इसमें ' नमस्ते ' वाले दोष भी नहीं… 171–180