सनातन धर्मालोक १-२ — पृष्ठ 171–180

सनातन धर्मालोक १-२ · पृष्ठ 171–180

पृष्ठ 171

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२ ३२२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) I * ' जय हो ' कहकर श्राशीर्वाद देता है, और फिर इसम ' ते ' ( तुभ्यं ) भी नहीं; प्रतएव इसमें ' नमस्ते ' वाले दोष भी नहीं । फलतः इन निबन्धोंसे ' श्रालोक ' पाठकोंने समझ लिया I होगा कि - ' नमस्ते ' का प्रचार किसी भी दशामें ठीक नहीं । I छोटा बड़ेको ' ते ' ( तुभ्यं ) कहे, तो यह एक असभ्यता है, न उसके साथ कहा जाता हुआ युक्त भी ' नमः ' शब्द व्यर्थ हो जाता है । बड़ा छोटेको ' ते ' कहे - यह तो युक्त है; पर बड़ा छोटेको ' नमः ' कहे; तो यह अनुचित है । समानों को भी ' नमः ' का प्रयोग नहीं हो सकता; क्योंकि उसमें परस्पर - प्रालिङ्गन कुशल प्रश्नादि होता है - नमः ( झुकना ) नहीं; श्रतएव इस सशोधन कई प्रूफकी अशुद्धियाँ रह गई हैं; उनमें विशेष— अशुद्धियोंका शोधन पृष्ठ - पङ्क्तिके अनुसार लिखा जा रहा है: -पृ. २२ पृ. १४ ' मान्य- संरक्षक के लिए ' । ३६-२ ' निपातानुक्रमणिका ' | ६०-२१ ' विशेष्य ' । ६०-१३ ' अथवा ' | ११७ - ε में ' पर ' ११८ - १ में ' हि ' नहीं चाहिए । १२१-१८ ' वर्णस्य ' । १२३-२ ' स्थलोंमें ' । ' नमस्कार्यः ' । १३५-६ ' वादि - प्रतिवादिमान्य - मनुस्मृति ' ' विवक्मि ' । १४४-१६ ' परिवर्तनीय । १५०-१५ ' भी ' । ‘ क्रमशः ' । १७७-१२ ‘ भगवन् ' । १७६ १४ - ' एक वचनान्त ” ८ ' ऐसी ' । २००-१३ ' ब्राह्मणाना " । पं. १ ९ - ' ब्राह्मणाः ' ' वर्णज्यैष्ठ्घ- ' । पृ. २०३-५ ' वन्द्य ' । पं. ६ " श्रीकामैः ' । प्रयोक्ता । २११ - ४ ' तक्षा ' । २३३ - १५ ' जावे ' । २१७ श्रन्त्यजोंको नमस्कार ' । २४६ -२० सृष्टिके कालका ' १२४-१६ । १४२-२२ १६१-१७ । पृ. १८३-। २०२-२० २०४-१६ - ५,११,१३ ' । २६६-१५ ' वे ' । २८७ - ९ ' कुत्ता ' । २६६-४ ' आय ' । ३१४-६ ' व्यवहार ' । ३१५-२० गुणोपेता ' । सामान्य अशुद्धियां नहीं लिखी गईं । CC - 0. Ankur Joshi Collection * ' नमस्ते ' युक्त वा अयुक्त? # ३२३ का प्रयोग प्रयुक्त ही है, विद्वानोंको इसकाप्रचार हटवाना चाहिए । यह ग्रन्थ किसीका दिल दुखानेके लिए नहीं है, किन्तु वस्तुस्थितिके ज्ञापनार्थ, तथा इससे जो शास्त्रानुसार अशुद्धियां वा प्रयुक्तताएं, वा असभ्यतायें फैली हैं, वे दूर हो जायें- इसलिए यह प्रयत्न है । इस ग्रन्यसे यदि सन्देह वा अज्ञानके झूले में भूल रहे हुए व्यक्तियों का लाभ हो जाय; तो हमारा प्रयत्न सफल हो जावे । तथास्तु । यह इति पूज्य श्रीपं ० शीतललालशमं श्रीमौरीदेवी - तनुजनुषा, मुलतानस्थ-स.ध. संस्कृत - कालेजभूतपूर्वाध्यक्षेण, देहलीस्थ - संस्कृत महाविद्यालयाच्य-क्षेण विद्यावागीश, विद्याभूषण - श्री दीनानाथ शर्मशास्त्रि - सारस्वत-विद्यानिधिना प्रणोतस्य ' श्रीसनातनधर्मालोक ' - संस्कृत - महाग्रन्थस्य हिन्दीग्रन्यमालायां प्रथम द्वितीय- सुमनोविकासः सम्पूर्णः । * इसके आगेके चार पुष्प मंगाकर अपना सेट पूरा कर लीजिए । at. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 172

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३२४ श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थमालाका परिचय इस ग्रंथमालाको १००० ) देने वाले इसके संरक्षक माने जाते हैं, उनका चित्र छपता है, प्रत्येक प्रकाशन में उनका नाम छपता है । ५०० ) प्रदाता इसके सम्मान्य - सहायक, २५० ) दाता मान्य - सहायक और १०० ) देने वाले साधारण सहायक माने जाते हैं । इसके प्रकाशित पुष्पोंका परिचय दिया जा रहा है । पाठकगण इसका जनता में प्रचार करें । स्थायी प्राहकों को सुविधा । जो महोदय स्थायि - ग्राहकता का शुल्क ५ ) पांच रुपये पूर्व जमा करायेंगे, उन्हें सब पुष्प पौने मूल्य में दिये जाएंगे । अब कागज का भाव बहुत चढ़ गया है, और फिर मिलता भी कठिनता से है; अतएव हमें सब पुष्पोंका मूल्य बढ़ाना पड़ गया है । अब पिछला मूल्य न मानकर इसमें दिया हुआ मूल्य ही ठीक समझा जावेगा । प्रथम - द्वितीय पुष्प- ( परिवर्धित -द्वितीयावृत्ति ) आजकल ' नमस्ते ' शब्दका प्रचार संस्कृतानभिज्ञ जनता में वहुत हो गया है; और इसके प्रचारक इसका वैदिक होने का दावा करते हैं । बहुत से विद्वानोंका इधर ध्यान गया, और उन्होंने हमें प्रेरणा को कि-' आलोक ' ग्रंथमालाक किसी पुष्प में इस पर भी विचार दिया जाय । हमने प्रथम - द्वितीय पुष्प में इस पर थोड़ा सा विचार दिया भी था; पर बहुत महोदयोंने कहा कि इस पर विस्तीर्ण विचार दिया जाय । इधर उन दो पुष्पोंकी प्रथमावृत्ति समाप्त भी हो गई थी । तव प्रथम दो - पुष्पोंको इकट्ठा करके हमने इसमें ' नमस्ते ' विषय पर विस्तीर्ण विचार दिया है । ' नमस्ते ' विषयक - ट्रैक्ट हमें जितने मिल सके, उन पर आलोचना भी कर दी है । यह दो पुष्प सुन्दर कागज तथा सुवाच्य टाइप में छपवाये गए हैं । आरम्भ में ' श्रीसनातनधर्मालोक ' महाप्रन्थकी संपूर्ण विषय - सूची ग्रन्थमालाको परिचय ३२५ तथा उसपर विद्वानोंके भाव भी दिये गये हैं । साढ़े तीन सौ पृष्ठोंकी सजिल्द इस पुस्तकका मूल्य चार रुपये है, पाठक शीघ्र मंगावें । मूल्य ४ ) तृतीय पुष्प - -- इसमें स्त्री - शूद्रों के वेदाधिकार पर विचार करते हुए ' यथेमां वाचं कल्याणीं ' मन्त्र के वर्तमान प्रचलित अर्थ की आलोचना करके उसका वास्तविक अर्थ, हारीतकी ब्रह्म-वादिनी, ' गोभिलसूत्र ' के ' यज्ञोपवीतिनी ' पदका रहस्य, ' दुहिता मे पण्डिता जायेत ', ' वेद ' पत्न्यै प्रदाय वाचयेत् ', ' ब्रह्मचर्येण कन्या, पञ्चजना मम होत्र ' जुषध्वम् ' आदि बहुतसे प्रमाणों के वास्तविक अर्थ बताकर, ऐतरेय महिदास, कवष - ऐलूष, कक्षीवान्, गौतम-जावाल, सूत, वाल्मीकि, शबरी आदि शूद्र थें वा अशूद्र- इस पर विचार किया गया है । इसकी प्रथमावृत्ति समाप्तप्राय है । इसे अभी - अभी मंगा लें, द्वितीयावृत्ति छपना प्रारम्भ होने पर इसका मूल्य बढ जायगा । शीघ्र मिल भी नहीं सकेगी । अ सजिल्द मूल्य ३ || ) द्व व चतुर्थं पुष्प — इसमें हिन्दु - शब्दको वैदिकता, वेद - विषय में प भारी भूल, महाभाष्यकारके मत में वेदका परिमाण कितना है, वर्ण - व्यवस्था गुण - कर्म से है, वा जन्मसे, डॉ ० भगवान्दासके मतपर विचार, मृतकश्राद्ध तथा ब्राह्मण भोजन वैदिक है वा मूर्तिपूजा एवं अवतारवादका रहस्य, क्या विद्वान् मनुष्य फि ही देव हैं, नवग्रहों प्रचलित मन्त्रोंका ग्रहों से सम्बन्ध कैसे है, ग्रहण और उसका सूतक - इत्यादि अनेकों विषयों पर बड़ा सुन्दर विचार किया गया है । पाठक इसे शीघ्र मंगावें । ५०० पृष्ठ अधिक पृष्ठकी सजिल्द सुन्दर पुस्तकका मूल्य ६ ) है । पंचम पुष्प - यह बहुत ही सुन्दर- कागज तथा सुन्दर - टाइप में वि पर CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 173

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३२६ * श्रीसनातनधर्मालोंक ( १-२ ) * ६०० से अधिक पृष्ठों में छपा है । इसमें हिन्दुधर्मके मुख्य - विषय चोटी- जनेऊ, १६ संस्कार, सन्ध्याके सभी अङ्गों पर विचार, मालाकी मणियोंकी १०८ संख्या क्यों?, यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व-क्या है - इत्यादि अनेकों विषयों पर विचार करके प्रातः से रात्रि-शयन तक के आचारों की वैज्ञानिकता बताई गई है । इसके बाद दीपमाला, होली आदि वर्षके प्रसिद्ध पर्वोंके वैज्ञानिक - रहग्य बताकर, श्रीगणेशका वैदिक देवत्व तथा श्रीमहीधर के ' गणानां त्वा ' मन्त्र के भाष्य पर – जिसपर प्रतिपक्षियोंकी ओर से घोर - शोर मचाया जाता है - विचार करके, ओङ्कारका महत्त्व बताया गया है । इसमें १२५ विषयों पर सुन्दर विचार दिये गए हैं । इस सुन्दर एवं सजिल्द पुस्तकका मूल्य– १० ) षष्ठ पुष्प - यह सुन्दर पुस्तक ८०० से अधिक पृष्ठों में अभी-अभी छपी है । इसमें हिन्दुधर्मके विविध विषय युक्ति - प्रमाण-द्वारा साधित किये गये हैं? इसमें सनातन धर्मका स्वरूप बताकर वेदका स्वरूप दिखलाते हुए ब्राह्मणभाग के अवेदत्व पर किये जाने वाले तर्कों पर युक्ति - प्रमाण द्वारा विचार करके, वेदाधिकारिविचार, देव मन्दिरों में अन्त्यज - प्रवेश पर वैदिक - दृष्टि ' दिखलाकर ' ढोल गंवार शूद्र पशु नारी ' मानसकी इस प्रसिद्ध चौपाईके विविध अर्थ तथा उनकी आलोचना की गई है । फिर ' क्या प्राचीन भारत में गोवध होता था, इस विषय पर दिये जाते हुए वेद - पुराणों के प्रमाणोंपर १६ विषयों में विचार किया गया है | इसके बाद ' क्या पुराणों में वेद- विरुद्ध अश है? ' इस पर विचारते हुए वृन्दाका पतिव्रतभङ्ग, चन्द्रमाका गुरुपत्नीगमन, अगस्त्य ऋषिका समुद्रपान, स्त्रीसे पुरुष, पुरुषसे स्त्री ' आदि बहुत से विषयों पर विचार कर श्रीकृष्णके बाल्यचरित्र एवं राधा - कृष्णके परस्पर - सम्बन्ध तथा कुब्जा आदिके विषय में पूर्ण - मीमांसा की CC - 0. Ankur Joshi * ग्रन्थमालाका परिचय # ३२७ गई है, और पुराणोंकी शङ्कित कथाओं घटनाएं दी गई हैं । इसके बाद सैद्धान्तिक पर प्रत्यक्ष अखबारी के विषय में ' ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् चर्चा में वर्ण व्यवस्था-तर्कों पर विचार करते हुए ' ब्राह्मणादि के अर्थ पर किये जाते हुए । विचार करके पुस्तक समाप्त क्या वर्ण नहीं हैं ' इस पर तथा जिज्ञासुओं कर दी गई है । यह पुस्तक विद्वानों के लिए अत्यन्त उपकारक सिद्ध होगी । इसको वादी - प्रतिवादी दोनों को ही शीघ्र मंगाना चाहिए । सजिल्द मूल्य ६ ), ५० पैसा । यौगिक अग्रिम हैं पुष्पमें वेद - स्वरूपपर विचार तथा क्या वेद के शब्द ; - वेदार्थविधानकं साधन वेदमन्त्रार्थहत्या-विषयोंपर विचार करके, वर्ण - व्यवस्था - विषय में दिये जाते हुए इन प्रमाणों पर विचार तथा अन्य भी अनेक उपयोगी विषय, नियोग और मैथुन, पराशर मत्स्यगन्धा समागम, विधवा विवाह विषयपर विचार, सीताकी विवाहाबस्था, द्रौपदीका एक पति वा पांच ' आदि विविध विषयों पर विचार होगा । सहायक शीघ्र अपनी सहायता भिजवावें, तथा ग्राहक शीघ्र इन पुष्पोंका प्रचार करें, जिससे अग्रिम पुष्प शीघ्र विकसित हो सकें । -0-Collection jarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 174

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पृष्ठ 175

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पृष्ठ 176

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पृष्ठ 177

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पृष्ठ 178

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पृष्ठ 179

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