सनातन धर्मालोक १-२ — पृष्ठ 161–170

सनातन धर्मालोक १-२ · पृष्ठ 161–170

पृष्ठ 161

सनातन धर्मालोक १-२, पृष्ठ 161 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३०२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * नहीं करते? शुकदेव बाह्यलौकिक व्यवहारमें नहीं थे, अतः वहां ' ते ' का प्रयोग है । पं. ११ ' नमस्ते पङ्कजाङ्घये ' यहां श्रीकृष्णको नमस्ते नहीं कहा गया । यहां पर ' ते ' का अर्थ ' तव ' है । तब यह अर्थ हुआ कि - ' तेरे चरणोंको नमः हो । ' श्रीकृष्ण परमात्मा के श्रवतार हैं । इसी प्रकार पं. १३ ' नमो नमस्तेस्तु सहस्रकृत्वः ' मैं भी समझें; और फिर इत्यादि स्थलों में ' नमस्ते ' के उत्तरमें ' नमस्ते ' नहीं कहा गया, प्रतः वादियोंका पक्ष कट गया । यहां पर वादीने ' सहस्रकृत्वा ' यह आकारान्त अशुद्ध लिखा है, यह उनकी संस्कृतज्ञताका नमूना है । उक्त पदमें ' कृत्वसुच् ' प्रत्यय है ' क्वा ' नहीं । पृ. २४ पं. १ काकेभ्यो नमः श्वभ्यो नमः ' यह श्राद्धादि -के समय की जाती हुई एक खास विधि है । वादीके अनुसार तो यहां अन्न अर्थ हो सकता है । ' नमः ' का यथायोग्य सत्कार किसी भी कोष में नहीं लिखा । यहां पर भी ' नमस्ते ' शब्द नहीं । आगे वादीने पं. ६ में बौद्ध - सिक्खों में ' नमस्ते ' दिखलाया है । उनका उत्तर देने को हम बाध्य नहीं । तथापि वादीने जो उद्धरण दिये हैं, उनमें ' नमः ' है ' नमस्ते ' नहीं । तब उसका नमस्ते कट गया । 7 पृ. २५ पं. १ आगे ' स्त्रीको नमस्ते ' शीर्षक लिखकर वादीने विषयान्तर घुसेड़ दिया है । यद्यपि उसके उत्तर की आवश्यकता नहीं थी, फिर भी कुछ लिखते हैं-CC - 0. Ankur Joshi Collection jarat. * नमस्ते प्रचार - समीक्षा * ३०३ पृ. २५ पं. २ ' कई लोग कहा करते हैं - स्त्रीका यादर करना धर्म - विरुद्ध है, इसकी ताड़ना ही उचित है, जैसा कि-तुलसीदास कहते हैं- ' ढोल गंवार मूढ प्ररु नारी । ये सब ताड़न के अधिकारी ' ॥ समीक्षा - वादी यहां पर गो. तुलसीदासका भाव नहीं समझते । इसका भाव यह है कि - स्त्रीको अपने वशमें रखना चाहिए । यदि उन्हें सिर पर चढ़ाया जायगा, तो प्रागे बहुत हानि होने की सम्भावना होती है, जैसा कि सुधारकोंकी कृपा से वैसा परिणाम प्राज घर - घर दीख रहा है । तुलसीदासजी वा कोई भी शास्त्र पूजनीय माता वा भगिनी प्रादिको ताड़ना के लिए नहीं कहता । ताड़ना सभी अपनी नारीके लिए लिखते हैं । स्वा. द. जीने स. प्र. २ सनु. में चाणक्यके प्रमाणसे शिष्यको ताड़न बतलाया है, तब क्या वादी चाणक्य तथा ' दयानन्दको निन्दनीय मानेंगे? वस्तुतः ताड़नाका फल मीठा होता है, ताड़ना केवल लाठीसे नहीं होती, किन्तु प्रांखोंके इशारे से वा वारणीके द्वारा भी हो जाती है । यदि यह ताड़ना न हो, तो प्रजा - राजाके, पत्नी - पतिके, शिष्य - गुरुके, भृत्य-स्वामीके अधीन कभी रह भी न सकें, तब सांसारिक व्यवहार भी नष्ट हो जावे । इस विषयमें ' आलोक ' छठे - पुष्पमें ध्वां निबन्ध देखें | पृ. २६ पं. २ मॅ - प्रथर्व २।१।२ में गन्धर्वपत्नी अप्सरानों तकको नमस्कार करनी लिखी है । समीक्षा - वादीको मालूम हो कि गन्धर्वयोनि एक An e देवयोति है । ati उच्च- योनिको स्त्रियों वा श्रपनेसे अवस्था आदि

पृष्ठ 162

सनातन धर्मालोक १-२, पृष्ठ 162 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३०४ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * में बड़ी स्त्रियोंको नमस्कार हम भी मना नहीं करते । परन्तु अपनी स्त्रीको नमस्कार नहीं हो सकता । सनातनधर्मी अपनी माता - भगिनीको नमस्कार करते ही हैं - इससे वादीकी कुछ भी अभीष्ट सिद्धि नहीं । आगे वादी पं. ८ में ' यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ' यह मनुका प्रमाण लिखते हैं । पर वहां उनकी पूजा यह नहीं लिखी कि उनको ' नमस्ते ' किया करो । प्रत्युत यह लिखा है - " तस्मादेताः सदा पूज्या भूषरणाच्छादनाशनैः । भूतिकामैर्नरैनित्यं सत्कारेषुत्सवेषुच " ( ३५६ ) अर्थात् इनको • उत्सवादि में गहने तथा वस्त्र पहिरने तथा विशिष्ट खानेको देना-यही अपनी स्त्रियोंका आदर है । इसीलिए- ' प्रजनार्थं महाभागाः पूजार्हा गृहदीप्तयः । स्त्रियः श्रियश्च गेहेषु ' ( ६।२६ ) यहाँ पर ' पूजार्हाः ' का अर्थ श्रीकुल्लूकभट्टने - ' वस्त्रालङ्कारादिदानेन संमानार्हाः, यह किया है । स्वा. द.ने भी इसके प्रर्थमें लिखा है- ' मनुष्योंको योग्य है कि - सत्कार और उत्सवोंके समयोंमें भूवरण, वस्त्र और भोजनादिसे स्त्रियोंका नित्यप्रति सत्कार करें । यह बात सदा ध्यानमें रखनी चाहिए कि- ' पूजा ' शब्द का अर्थ सत्कार है ' ( स. प्र. पृ. ५८ ) इस प्रकारका सत्कार श्रेष्ठ स्वामी प्रपने भृत्योंका किया करते हैं । इससे वादीकी कोई बात सिद्ध नहीं होती । इस पद्यमें मनुजीने स्त्रियोंको ' नमस्ते ' करना कहीं नहीं लिखा । इससे इसके प्रागे ' दिन-रात में जब - जब ( स्त्री - पुरुष ) प्रथम मिलें; वा पृथक् हों, तव तव प्रीतिपूर्वक नमस्ते एक - दूसरेसे करें ' यह कहते हुए ऑ CC - 0. Ankur Joshi * नमस्ते प्रचार - समीक्षा ३०५ . स्वा. द. जीका भी खण्डन हो गया, क्योंकि उक्त पद्यमें का संकेत भी नहीं है, न ही स. प्र. में वैसा कोई प्रकरण है इस । अतः यह स्वा. द. का पाठ मालूम नहीं होता; किन्तु इसकी प्रक्षिप्तताका ही अनुमान है । अन्य बड़ी त्रुटि यह है कि-' नमस्ते'को यहां एक - पदकी भांति व्यवहृत किया गया है; परन्तु यह दो पद हैं - यह हम पहले सिद्ध कर ही चुके हैं । जिस मनुजीका प्रमाण वादीने बड़े गौरवसे दिया है, वही मनु स्त्रियोंके लिए क्या कहते हैं सुनिये - ' न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ' ( १।३ ) । इनका ताड़न जो तुलसोदासजीने संकेतित किया है, उसका कारण मनुजी लिखते हैं- ' नेता रूपं परीक्षन्ते नासां वयसि संस्थितिः । सुरूपं वा विरूपं वा पुमानित्येव भुञ्जते, ( ६१४ ) पश्चिल्याच्चलचित्ताच्च नैः-स्नेह्याच्च स्वभावतः । रक्षिता यत्नतोऽपीह भर्तृष्वेता विकुर्वते ( ११ ) एवं स्वभावं ज्ञात्वाऽऽसां प्रजापतिनिसर्गजम् । परमं यत्नमातिष्ठेत पुरुषो रक्षणं प्रति ' ( १६ ) चारणक्यने भी कहा -है- ' विश्वासो नैव कर्तव्यः स्त्रीषु राजकुलेषु च ' । इनमें कोई भी प्रमारण वादीने ऐसा नहीं दिया जिसमें अपनी पत्नीको नमस्ते कहा गया हो । पू. २८ पं. १७ में जो लिखा है कि - ' रामने गौतम - नारी अहल्याको तथा श्रत्रिकी स्त्री अनुसूयाको नमस्कार किया है ' तो उच्चयोनि वाली तथा उच्चवर्ण वाली एवं माता भगिनी-सं ० ६० २० Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 163

सनातन धर्मालोक १-२, पृष्ठ 163 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३०६ * श्री सनातनधर्मालोक ( १-२ ) * आदि बड़ी स्त्रियोंको सनातनधर्म भी नमस्कार मानता ही है । अपनी स्त्रीको नहीं । फिर आगे जो लिखा है कि अनसूयाको सब लोग ही नमस्कार करते थे, पर यह कहीं नहीं लिखा कि उसके पति तथा उसके श्वशुर आदि भी उसे नमस्कार करते थे । जब ऐसा नहीं, तो वादीका सिद्धान्त सिद्ध न हुआ । विषयान्तर होनेसे अग्रिम प्रमारण व्यर्थ हैं, इसलिए उनपर विचार करना भी व्यर्थ है । पू. ३१ पं. १ ' क्या नमस्ते अनावर करता है '? समीक्षा - — इसमें ' नमः ' शब्द तो अनादरवाचक नहीं, हां ' ते ' अवश्य बड़ेके लिए अनादर - सूचक है । बड़ा छोटेको ' ते ' कहे, तो कोई अनादर नहीं । परन्तु छोटा यदि बड़े को ' ते ' कहे, तो मानुषिक व्यवहार में अवश्य श्रनादर है । पृ. ३१ वादी लिखता है - ' पुराने संस्कृत - ग्रन्थों में माननीय-गुरुजनोंको एक वचनसे ही संबोधन किया है ' । इस पर हमारा प्रश्न यह है कि - स्वाद. जीने स. प्र. तथा संस्कारविधि तथा अपनी अन्य - पुस्तकोंके अन्तमें अपने गुरुको बहुवचन क्यों दिया है, एकवचन क्यों नहीं दिया? यदि कहा जावे, प्राचीन-प्रणाली में एकवचन दिया जाता था, क्योंकि उस वक्त बाह्य लोकव्यवहार उन्नत नहीं था, परन्तु अब तो बड़ेको बहुवचन दिया जाता है, तो हमारा उत्तर भी वही समझ लें । बल्कि वेद में भी एक को बहुवचन देखा गया है, देखिये- ' यूयं हि सोम! पितरो मम स्थन ' ( ऋ. १६६५ ) यहां पर एक भी सोम-को बहुवचन दिया गया है, शेष - प्रमाण पूर्व - निबन्धों में देखें । CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्ते प्रचार - समीक्षा ३०७ श्राप लोग किसी बड़ेको ' त्वं त्वया ' श्रादिसे प्राहूत नहीं करते । वादी ही अपनी हिन्दी - पुस्तकों में छोटे - यात्रके द्वारा बड़ेको ' आप ' ही कहलवाते हैं; ' तू - तू ने ' नहीं; तो स्पष्ट हो सिद्ध हुआ कि छोटा बड़ेको ' तू ' आदि से कहे, तो उसका अनादर होता है । तभी तो स्वा. द.ने ऋ. भा. भू. में श्री पाणिनि तथा भट्टमोक्षमूलर प्रादियोंको संस्कृतमें बहुवचन दिया है, हिन्दी में तो सभी जगह ऐसा किया ही है । पृ. ३१ पं. १३ ' सूत! जानासि भद्रं ते ' यहां पर ऋषियों-ने सूतको जो ' ते ' कहा है, इसका कारण आप लोगोंके अनुसार सूतका उनकी अपेक्षा छोटी जातिवाला होना है । तभी तो उन्होंने उसे ' भद्रं ते ' यह आशीः दी है । अग्रिम - प्रमारणों-पर यह जानें कि -दशरथने विश्वामित्रको ऋषि होनेसे, परशु-रामने रामको देवावतार होनेसे ' त्वं ' कहा है; उसका कारण गत निबन्धों में कह चुके हैं । ' त्वं राम इति नाम्ना मे चरसि क्षत्रियाधम ' यहां तो निर्भर्त्सना वा तिरस्कारमें ही ' त्वं ' प्रयुक्त हुआ है । इसमें हमारे पक्षकी पुष्टि है । पं. १८ रामने जटायुको जो ' त्वं ' कहा — उसका कारण जटायु पक्षी था, तथा योग्यतादि तथा योनिमें छोटा था । छोटेको तो ' त्वं, ते ' यादि कहा ही जाता है, हां उसे ' नमः ' नहीं कह सकते । बाकी रहा देवता तथा मुनियोंको ' ते ' आदि कहना, उसके लिए गत- निबन्धमें उत्तर देखें । श्रागे पू. ३२ पं. ४ में वादीने ' स्वा. द. अपने पत्रों में नमस्ते लिखते थे ' इस विषय में कई प्रमाण दिये हैं, पर वे व्यर्थ Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 164

सनातन धर्मालोक १-२, पृष्ठ 164 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३०८ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) हैं, क्योंकि - पृ. ३४ पं. ८ में उन्होंने स्वयं ही लिखा है- हां! पत्रोंमें प्रायः ' नानन्दित रहो ' - और कभी - कभी नमस्ते भी लिखा करते थे । ' तो ' नमस्ते ' के कभी कभी लिखनेसे स्पष्ट सिद्ध हुआ कि वे इसे हरएक जगह लिखना ठीक न समझते I, ' प्रायः ' वाली बात व्यवहारिक होती है, ' कभी - कभी ' वाली बात व्यवाहारिक तथा सैद्धान्तिक नहीं होती । आशीर्वाद देने-के समय वे जब कि ' आनन्दित रहो ' लिखते थे, तब वादीका सब जगह ' नमस्ते ' मानना वा प्रयुक्त करना गलत सिद्ध हो गया । अपने नौकरोंको पू. ३५ पं. १० के अनुसार जब ' प्रानन्दित रहो ' लिखते थे, तब नीचको उनके अनुसार भी नमस्कार निषिद्ध सिद्ध हुनो । बाकी जो पू. ३४-३५ में इस विषयको साक्षियां दी हैं, वे प्रायः आर्यसमाजियों की हैं, अतएव वे व्यर्थ हैं । अथ च स्वामी यदि किसीको ' नमस्ते ' कह लिख भी दें, तो वह ' साध्य - पक्ष ' ही होगा, सिद्ध नहीं । परस्पर यदि वे ' नमस्ते ' करते थे, तो यह सम्भव है कि वे अपने साम्प्रदायिक ट्रेडमार्कको चलाना चाहते हों, पर इसमें वास्तविकता तथा शास्त्रीयता नहीं । पू. ३३ में जो टिप्परगी वादीने स्वामीजीको ' नमस्ते ' की दी है, उससे ' नमस्ते ' वन्दन अभिवादनके लिए ही सूचित होता है, आशीर्वादके लिए नहीं । हमारा बड़े अभिवादनमें ' नमः ' शब्दसे कोई विरोध नहीं, हां ' ते ' से अवश्य है । बाकी प्रमारण साध्य होनेसे उत्तररणीय नहीं । पृ. ३६ आगे वादी बतलाते हैं कि - सव सम्प्रदायों में * नमस्त प्रचार - समीक्षा ३० ९ श्रापसमें बोलनेका एक ही शब्द है, जैसे- राम - राम, राधेश्याम,. जयश्रीकृष्ण, जयहरि, वन्दे - मातरम् आदि । ' इस पर हमारा उत्तर यह है कि — यह शब्द इष्टदेव स्मररणवाचक हैं, प्रणाम-श्राशीर्वादवाचक नहीं । जैसेकि - वादीकी पुस्तकके अन्त ' रौनकरामने लिखा है- ' राम - राम अरु जयहिन्द, इष्टस्मृतिजान ' तब वादीका यह लिखना व्यर्थ है, क्योंकि सारा झगड़ा तो बात पर है । इसके अतिरिक्त परस्पर ' नमस्ते ' व्यवहार " जो - जो वेदमें करने छोड़नेको शिक्षा की है, हम उसका यथा-वत् करना छोड़ना मानते हैं ' ( स. प्र. ३ पृ. ४२ ) के अनुसार वेद- प्रोक्त विधि न होनेसे अमान्य सिद्ध हुआ । ' बड़े - छोटेसे यथायोग्य व्यवहार करनेका उपदेश करें ' ( स. प्र. ३ पृ. २३ ) इसके अनुसार भी सर्वत्र ' नमस्ते ' का खण्डन हो गया, क्योंकि छोटे - बड़ेको ' नमस्ते ' कहना समान व्यवहार है, यथायोग्य-व्यवहार नहीं । छोटा बड़ेको नमस्कार ही करता है, श्राशी-र्वाद नहीं देता । बड़ा छोटेको आशीर्वाद ही देता है, नमस्कार नहीं करता | ' नमः ' शब्द अभिवादन में प्रणामार्थक ही प्रयुक्त होता है, छोटा बड़ेको ' नमः ' कह सकता है, वह छोटा बड़े कां ' ते ' नहीं कह सकता । बड़ा छोटेको ' ते ' तो कह सकता है, परन्तु प्रणामवाचक होनेसे नम ' नहीं कह सकता । इसलिए ' नमस्ते ' दोनों हालतों में ठीक नहीं । हां, जो परस्परका वाक्य प्ररणामाशीर्वादार्थक न हो, किन्तु उसका लक्ष्य इष्टदेव स्मरण वा परस्पर कुशलादि पूछना हो, तो वहां. समान वाक्य हो सकता है; पर नमस्कार-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 165

सनातन धर्मालोक १-२, पृष्ठ 165 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३१० * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * श्राशीर्वाद - विवक्षा में समान वाक्य नहीं हो सकता, क्योंकि ' नमः ' का अर्थ ' नमस्कार ' है, आशीर्वाद ' ' नहीं । वादी के इस उत्तरसे प्रतीत होता है कि वह ' नमस्ते'को भी साम्प्रदायिक शब्द सिद्ध करना चाहता है । यदि ऐसी बात है, तब हमारी बात ठीक हो गई कि - ' नमस्ते ' श्रार्यसमाजका ' लिङ्ग ' है; फिर हमें उसमें झगड़ने की जरूरत नहीं; क्योंकि-दूसरेके साम्प्रदायिक व्यवहारसे - चाहे वह शुद्ध हो वा अशुद्ध, हमारा क्या मतलब? न हमारी बात फिर उन्होंने सुननी ही है । हमारा विवाद तो इसी बात पर है कि वे इसे साम्प्रदायिक - शब्द नहीं मानते, किन्तु वैदिक- शिष्टाचार मानते हैं । परन्तु वैसा वस्तुतः न होनेसे उसमें हमारा विरोध ठीक है । पृ. ३७ में जो वादी ' नमस्ते'को वेदोक्त होनेसे ईश्वरीय-वाक्य कहते हैं, तो ' नमः, नमोस्तु, वन्दे ' श्रादि भी वेदोक्त होनेसे ईश्वरीय - वाक्य हैं, इस विषयमें हमारा पूर्व निबन्ध पढ़ें तब फिर ' नमस्ते ' शब्द में पक्षपात क्यों, जिसमें शतशः दोष हैं? जो वादीने ब्राह्मणों में परस्पर ' नमस्कार ' ' प्रणाम ' आदि बतलाया है, यह भी अवस्था वा योग्यतामें बड़ेके लिए हो कहा जाता है । योग्यता वा अवस्थामें छोटेके लिए इसका प्रयोग नहीं किया जाता । ' दंडवत् ' आदिका भाव भी झुकना ही है; जैसेकि पहले वादीने वाल्मीकिका पद्य उद्धृत किया है । बाकी बात रही ' नमस्ते ' के अधिक प्रचारकी । अधिक प्रचार तो मद्य - मांस, धर्मविरुद्ध प्राचरणों तथा झूठे मुकदमों का भी हो गया है, तो अधिक प्रचारसे इनका भी क्या युक्तत्व CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्ते प्रचार - समीक्षा * ३११ मान लेंगे? यदि नहीं, तब अधिक प्रचारका कारण वादीने व्यर्थ ही रखा है । इस प्रचारमें जो अन्ध - परम्परा हो रही है, 1 वह वादीको भी मालूम होगी । बहुत पुरुषों को भी ' नमस्ते ' कह दिया जाता है । जहां अभिमुख करनेकी आवश्यकता न हो, वहां भी ' ते ' शब्द घुसेड़ दिया जाता है । हमारा विरोध इसी ' ते ' में है । यदि ' ते ' हटा दिया जावे, और ' नमः ' का ही केवल प्रयोग किया जावे, वह भी बड़े प्ररणाममें, तो सनातन धर्मका इसमें विरोध नहीं होगा, क्योंकि-वह बड़ोंको नमस्कारकी प्रज्ञा देता ही है । शेष श्राशीर्वादार्थ में ' नमस्ते ' के प्रयोगका वह सदा विरोध करेगा । क्योंकि-आशीर्वादार्थमें इसका प्रयोग शास्त्रीय नहीं । और किसी प्रामा-रिक पुस्तकमें यह लिखा हुआ भी नहीं कि प्ररणामाशीर्वाद-में ' नमस्ते ' का ही प्रयोग किया जावे । इस कारण ' नमस्ते-प्रचार ' केवल दुराग्रहको बतलाता है, सत्यताको नहीं । जो कि - ' नमस्ते - प्रदीप ' ( १३ पृष्ठमें ) स्वा. रामेश्वरानन्द-जीने लिखा है- " हाथ जोड़कर नमस्ते करनेका विधान ' इस शीर्षकको सिद्ध करनेके लिए ' नमस्ते रुद्र! मन्यव उतोत इषवे नमः । बाहुभ्यानुत ते नमः ' ( यजुः १६।१ ) यह मन्त्र दिया है, और उसका अर्थ यह दिया है- ' ख! - हे दुष्टोंको रुलाने वाले राजन्! बाहुभ्यां दोनों हाथोंसे ( ते ) तेरे लिए ( नमस्ते ) यह सत्कार - वाचक शब्द हो ' । यहां कितना दुःसाहस किया गया है । यहां तो अर्थ है- हे रुद्र! - परमेश्वर, ते-' तेरे मन्यवे - क्रोधको नमस्कार हो, उत - प्रौर इषवे - वारणको Garat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 166

सनातन धर्मालोक १-२, पृष्ठ 166 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३१२ G श्रीसनातनधर्मालांक ( १-२ ) *. नमस्कार हो! उत - और ते बाहुभ्यां तेरे भुजानोंको नमः नमस्कार हो । यहां ' नमः ' के योग में ( बाहुभ्यां ) को चतुर्थी है; पर यहां ' बाहुभ्यां ' का पंचमी वा तृतीयाका अर्थ करना तो साहस है, क्योंकि यहां अपादान वा करण नहीं है । रुद्रसे यहां महादेवका बोध है, यह राजाका नाम नहीं । यहां पर ' ते नमस्ते ' नहीं है, किन्तु ' ते ' का सम्बन्ध ' बाहुभ्यां ' से है, इसमें सम्बन्ध में षष्ठी है, ' नमस्ते ' में भी ' ते ' का अर्थ ' तव ' है, उसका सम्बन्ध ' मन्यवे ' से है, ' ते- तव मन्यवे नमः ' । दूसरे ' ' का अर्थ भी षष्ठीका ' तव ' है, उसका सम्बन्ध बाहुसे है- ' ते तव बाहुभ्यां नमः ' | उसमें ' ते नमस्ते ' स्थित ' ते ' का चतुर्थीका अर्थ करना श्रीरामे. जीका दुःसाहस है वा श्रज्ञान; क्योंकि - ' नमः ' के योगमें चतुर्थी ' नमः स्वस्ति ' से सिद्ध है; पर ' नमस्ते के योग में चतुर्थी वेदाङ्गके किसी सूत्र से सिद्ध नहीं । क्योंकि न तो ' नमस्ते ' एकपद कहीं है, और न कहीं उसके योग में किसी विभक्तिका विधान है । पहले ' नमः ' के योग में चतुर्थी ' मन्यवे ' को है, दूसरे ' नमः ' के योग में चतुर्थी ' इषवे ' को है, तीसरे ' नमः ' के योग में चतुर्थी ' बाहुभ्याम् को है । दोनों स्थानके ' ते ' शब्द सम्बन्ध षष्ठी वाचक है; पहले ' ते ' का सम्बन्धी रुद्रका ' मन्यु ' है, दूसरेका ' बाहु ' । इसी प्रकार ' उभाभ्यामुत ते नमो बाहुभ्यां तव धन्वने ' ( यजुः १६।१४ ) यहां भी ' ते - तव बाहुभ्यां नमः ' यहां भी ' बाहुन्यां ' में ' नमः ' के योग में चतुर्थी है, पञ्चमी नहीं. तब उसका ' तेरे लिए दोनों हाथोंसे नमस्ते ' यह सत्कार - वाचक G ' नमस्ते ' युक्त वा अयुक्त? * ३१३ शब्द हो ' ( पृ. १४ ) वह स्वा. रामेश्वरानन्दजीका अर्थ निराकृत हो गया है । इस पुष्प में - स्वा. रामेश्वरानन्दजीके ' नमस्ते - प्रदीप ' स्वा. देवानन्दजीकें ' नमस्ते - विधान ', श्री शेरसिंहजी की ' नमस्ते, की प्राचीनता ', श्रीसुखदेव विद्यावाचस्पतिजीको ' नमस्तेकी. व्याख्या ' श्री सन्तरामजीका ' नमस्ते प्रचार ', श्रीराजेन्द्रजीको ' भारतीय - संस्कृति ' एवं दूसरोंके भी ' नमस्ते ' विषयक विचारों पर आलोचना श्रा गई है । इसमें प्राय: ' नमस्ते ' विषयक सभी तर्कों पर विचार आ गया है । यदि कोई अन्य नये विचार - वाले ट्रैक्ट पाठकोंको उपलब्ध हों, पाठक उन्हें हमारे पांस भेज दें, हम उनका प्रत्युत्तर अन्य पुष्पों में प्रकाशित करेंगे, क्योंकि - इसका मूल कीट खात है; अतः उसके कटते कोई देरी नहीं लगेगी । अब उपसंहारात्मक एक निबन्ध र देकर हम पुस्तकको समाप्त करेंगे । ( १३ ) ' नमस्ते ' का प्रचार युक्त वा अयुक्त? ( १ ) इस विश्व में ब्रह्मासे बनाई सृष्टि एक - दूसरे से विल-क्षरण दीखती है, उसमें उच्चता निम्नता दीखनेसे न वह समान हो सकती है, न उसमें समान व्यवहार ही हो सकता है । समान - योनि, समान जाति, समान व्यक्ति में भी कुछ न कुछ भेद दीखता ही है, इस भेदको बदला नहीं जा सकता । छोटी - प्रायु में लड़केको ' रामा ' बुलाया जाता है, मध्यम-शामें ' राम ' तथा यौवनमें ' श्रीरामचन्द्र ' नामसे, उसके बाद CC - 0. Ankur Joshi Collectio sujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 167

सनातन धर्मालोक १-२, पृष्ठ 167 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३१४ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * विद्यावयोवृद्ध होनेपर ' श्रीमान् रामचन्द्रजी महोदय, कहा जाता है । बचपन में उसे अपराधमें ताड़ना और दूसरे समय में श्राशीर्वाद, यौवन में अपराध में तर्जना, अन्य समयमें कुछ सत्कार बड़े हो जानेपर अपराधमें संकेतमात्र, और दूसरे समयमें तो नमस्कार प्राप्त होती है । इस व्यहार - भेदको प्रकृति भी एक हाथकी पांचों अंगुलियों में असमानता रखकर उदाहृत करती है । दूसरे हाथकी क समान भी अंगुलियों में परस्पर स्थूलता - कृशताका कुछ अन्तर रहता ही है । इस प्रकारकी सार्वत्रिकता तथा प्राकृतिकताको अनुभूत करके भी यदि वादी लोग सभी से तुल्य व्यवहार करने की चेष्टा करें; यह प्रकृतिविरुद्धता होगी, मट्टीसे घी ई निकालना होगा । र ( २ ) ब्रह्माजीने उद्भिज्ज, स्वेदज, अण्डज तथा जरायुजों को बनाकर भी सन्तुष्ट न होकर मनुष्य जाति बनाई । पशु-जाति में प्रवान्तर जातियोंको भिन्न - भिन्न बनाकर भी मनुष्य-जाति में ब्राह्मणादि - प्रवान्तर - जातियोंका श्रापसमें विशेष प्रकार-का भेद नहीं बनाया । यही मनुष्यजन्मका महत्त्व है; ज्ञान-प्रधानता होनेसे इस जाति में श्राकृति - समानता में भी व्यवहार-भिन्नता हुआ ही करती है । मनुष्यजातिमें अन्त्यज श्रादिकी ग्रपेक्षा शूद्र जाति शस्य है, उससे भी वैश्य जाति प्रशस्य है । उनसे भी क्षत्रिय जाति प्रशंसनीय है, और ब्राह्मण जाति सभी जातियोंसे श्रेष्ठ है । ब्राह्मणों में भी पढ़े - लिखे अच्छे हैं; उनमें भी कर्मकाण्डी बड़े है । उनमें भी वेदोंके विद्वान् CC - 0. Ankur Joshi Collection * ' नमस्ते ' युक्त वा प्रयुक्त? • ३१५ बड़े हैं । उनमें भी कर्म - कर्ता बड़े हैं । सबसे बड़े ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण ही हैं । यही मनु जीने कहा है - ' भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः प्राणिनां बुद्धिजीविनः । वुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठाः नरेषु ब्राह्मणाः स्मृताः । ब्राह्मणेषु च विद्वांसो विद्वत्सु कृतबुद्धयः । कृतबुद्धिषु कर्तारः कर्तृषु ब्रह्मवेदिनः ' ( ११६६ - ७ ) ( ३ ) ऐसी भिन्नता होनेसे व्यवहारभेद भी अनिवार्य ही है । छोटी जातिवाले ऊंची जातिमें उत्पन्नको प्रायु, विद्या श्रादिसे अधिक होनेपर भी नमस्कार करें, और उच्च वा बड़े छोटोंको आशीर्वाद दें- इस शास्त्रीय व्यवहारभेदवश शूद्र-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यको और अपनेसे बड़े शूद्रको नमस्कार करता है । और वे ब्राह्मणादि उसको प्राशीष देनेके अधिकारी हैं । इस प्रकार वैश्य ब्राह्मण - क्षत्रियको तथा अपने से बड़े वैश्यको वन्दना करता है, और वे उसे प्राशीः देते हैं । इसी तरह क्षत्रिय अपनेसे छोटी श्रायुवाले भी ब्राह्मणको तथा अपनेसे बड़े क्षत्रियको नमस्कार करता है; और वे उसे श्राशीः देते हैं । वीरमित्रोदयके ' उपनयनसंस्कार - प्रकाश ' ( पृ. ४६३ ) में शातातपका यह प्रमाण लिखा है- ' अभिवाद्यो नम-स्कार्यः शिरसा वन्द्य एव च । ब्राह्मणः क्षत्रियाद्यैश्च श्रीकामः सादरं सदा । नाभिवाद्यास्तु विप्रेण क्षत्रियाद्याः कथञ्चन । ' ज्ञानकर्मगुणोपेत्ता यद्यप्येते बहुश्रुताः । ब्राह्मणः सर्ववर्णानां स्वस्ति कुर्यादिति श्रुतिः । सवर्णैस्तु सवर्णानां [ उत्कृष्टानां ] कार्यमेवाभिवादनम् ' । यहां पर कहा गया है - ब्राह्मण क्षत्रि-यादिको ' स्वस्ति ' कहे, नमस्कार न कहे; क्योंकि- ' वैशेष्यात् Carat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 168

सनातन धर्मालोक १-२, पृष्ठ 168 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३१६ # श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * प्रकृतिभैष्ठयाद् नियमस्य च धारणात् । संस्कारस्य विशेषाञ्च वर्णानां ब्राह्मणः प्रभुः ' ( मनु. १०१३ ) यहां ब्राह्मणको सब वर्णोंसे श्रेष्ठ बताया गया है । ' ब्राह्मणं दशवर्षं तु शतवर्षं तु भूमिपम् । पितापुत्रौ विजानीयाद् ब्राह्मणस्तु तयोः पिता! ( २।१३५ ) यहां क्षत्रियसे श्रायु आदिमें छोटे भी ब्राह्मणको बड़ा बताया गया है । ( ४ ) ब्राह्मणोंमें परस्पर- बड़प्पन विद्यासे, क्षत्रियों में बलसे, वैश्यों में धनसे, शूद्रों में श्रायुसे बड़प्पन होता है । ( मनु. २ । १५५ ) यह मुख्य बड़प्पन होता है, गौरणतासें प्रयुका बड़प्पन भी होता है । बड़े को नमस्कार किया जावे, तथा छोटेको श्राशीष दी जावे - यह शास्त्रसम्मत नियम है । ' मातुलांच पितृव्यांश्च श्वशुरान् ऋत्विजो गुरून् । प्रसावहमिति ब्रूयात् प्रत्युत्थाय यवीयसः ' ( २।१३० ) इस मनुके पद्य में बताया गया है कि - ' मामा, चाचा, ससुर, ऋत्विक् तथा गुरु छोटी श्रायुके भी हों; फिर भी उनके सामने खड़ा हो जावे, और उन्हें नमस्कार करे ' । इससे सिद्ध होता है कि इनसे भिन्न छोटों प्रागे न तो खड़ा होवे, और न उन्हें नमस्कार करे । पर कई दुराग्रही अर्वाचीन वादी इस नियमको हटवाना चाहते हैं । वे कहते हैं, ' छोटा - बड़ा सब एक - दूसरेको ' नमस्ते ' कहें । यदि इन महाशयोंका यह वचन सभी व्यवहारोंमें सफल हो जावे; तो यदि गुरु शिष्यको ताड़ना करे; तो शिष्यका भी गुरुको ताड़ना करना कर्तव्य हो जायगा । यदि पिता कारणवश पुत्रको डांटे; तो पुत्रका भी पिताको डांटना प्र G ' नमस्ते ' युक्त वा प्रयुक्त? # ३१७ कर्तव्य हो जायगा । यदि पति स्त्रीको निर्भर्त्सना दे, तो स्त्रीका भी पतिको निर्भत्सत करना आवश्यक हो जावेगा । फिर तो सर्वत्र ' व्यवहारकी समानतावश राजा प्रजाका शासक- शिष्य सम्बन्ध भी हट जावेगा । तब तो सभी सम्बन्ध हट जावेंगे; पर ऐसा व्यवहार शास्त्र विरुद्ध तथा लोक-विरुद्ध हैं । ( ५ ) इस प्रकार के प्रचारकों में स्वा. द. मतानुयायियों को विशेष गणना है, जो पिता - पुत्र, गुरु - शिष्य श्रादि सभीको परस्पर ' नमस्ते ' करनेका आदेश देते हैं; पर यह ठीक नहीं । ' नमस्ते ' में ' नमस् ' सकारान्त अव्यय है, ' ते ' युष्मद् शब्दकी चतुर्थी विभक्ति एकवचन ' तुभ्यं ' का आदेश ( पा. ८।१।२२ ) है । इस प्रकार यह दो पद हैं । पर वे लोग इसे एक समझते हैं; और वैसे ही व्यवहृत करते हैं, तभी कहते हैं-' मेरी आपको नमस्ते हो, मेरी उसे नमस्ते हो, प्राश्रम विद्यार्थियों को मेरी नमस्ते हो, मान्याः श्रीगुरवः! नमस्ते ' इस प्रकार वे व्यवहृत करते हैं । ' ते ' के ' तुभ्यं ' स्थानी होने पर भी ' नमस्ते'को एक पद समझकर ' प्रापको ' पृथक् कहने लग जाते हैं, ' तस्मै ( उसे ) ' में ' ते ' की आवश्यकता न होने पर भी ' तस्मै नमस्ते ' लिखने लग जाते हैं; और ' ते ' के एकवचन " होने पर भी एक पदको भ्रान्तिसे बहुवचनमें भी ' नमस्ते : भवद्भयः ' कहने लग जाते हैं, यह सब शास्त्र - विरुद्ध है । जान - बूझकर वैसे प्रयुक्त करने वालोंका यह हठ है । यदि अंज्ञान या भ्रमसे ऐसा व्यवहार होता है; तो इस दोषापादक CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 169

सनातन धर्मालोक १-२, पृष्ठ 169 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३१८ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * प्रयोगका व्यवहार ही बहिष्कार्य है । जो इसे रूढ- शब्द मानते हैं, यह संस्कृत - व्याकरणके विरुद्ध है, यह हम गत-निबन्धों में स्पष्ट कर चुके हैं । ( ६ ) बड़े के लिए युष्मद् के एकवचनका प्रयोग प्राजकल कोई भी किसी भी भाषा में प्रयुक्त नहीं करता । ' नमस्ते'-वादी भी जब गुरु वा पिता आदिको पत्र लिखते हैं; तो ' नमस्ते ' के अतिरिक्त वे कहीं भी युष्मदके एकवचनका प्रयोग नहीं करते; इस कारण उनके मतमें भी युष्मद्का एकवचन अनादरावह है; तब ' नमस्ते ' में भी ' ते ' अनादर - सूचक ही सिद्ध हुआ; अतः इसका प्रयोग युक्त नहीं । कई अज्ञानी ' नमस्ते ' के ' ते'को ' तद् ' शब्दके प्रथमाका बहुवचन बताते हैं; पर यह तो सर्वथा ही प्रसङ्गत है; ' नमः ' के योग में प्रथमा कैसी; और ' तद् ' शब्दकी वहां क्या सङ्गति? इससे स्पष्ट है कि- वे ' नमस्ते ' को अपना ट्रेडमार्क रखना चाहते है । श्रादरके -लिए युष्मद्का एकवचन नहीं, किन्तु ' श्रीमत् ' शब्द वा ' भवत्'-शब्द श्राविका ही प्रयोग होता है । मनुस्मृतिमें कहा है-' श्रवाच्यो दीक्षितो नास्ना यवीयानपि यो भवेत् । भो भवत्पूर्वकं त्वेनमभिभाषेत धर्मवित् । ( २।१२८ ) यहां यह कहा है कि-यज्ञमें दीक्षा लिया हुआ व्यक्ति यदि अपने से छोटी प्रयुका भी हो; तथापि उसे नामसे न बुलावे, किन्तु प्रादरवाचक ' भवत् ' शब्दसे बुलावे क्योंकि - यज्ञ - दीक्षितको बड़ा माना जाता है । उसी मनुस्मृति में ' त्वङ्कारञ्च गरीयसः ' ( ११।२०४ ) बड़के लिए ' त्वं ' आदि युष्मद्रके एक वचनका प्रयोग निषिद्ध किया CC - 0. Ankur Joshi Collection arat. G ' नमस्ते ' युक्त वा अयुक्त? G ३१गया है । तब ' नमस्ते ' का प्रयोग भी विधि - शास्त्रसे विरुद्ध है । इस विषय में स्पष्टता पूर्व - निवन्धों में की ही जा चुकी है । ( ७ ) कहा जाता है कि यदि ' नमस्ते ' दोनों श्रोर ठोक नहीं, तो ' जय - रामजीको प्रादि दोनों चोर कैसे ठीक हैं? ' इसपर भी गत - निबन्धोंमें प्रकाश डाला जा चुका है कि यह प्ररणामाशीर्वाद - वाचक शब्द नहीं; किन्तु इष्टदेववाचक हैं । ऐसे शब्द वा कुशलप्रश्नवाचक शब्द, जैसेकि - गुड मार्निंग सर, सला-मालिकुम प्रादि - शब्द दोनों श्रोरसे कहे जा सकते हैं । जो कि कहा जाता है कि- जय ' श्रीकृष्ण ' आदिसे शैव प्रसन्न नहीं होंगे, ' जयशिव ' श्रादिसे वैष्णव प्रसन्न नहीं होंगे, इसलिए ' नमस्ते ' शब्दका प्रचालन ही ठीक है यह भी ठीक नहीं । ' नमस्ते ' - शब्दसे सनातनधर्मो भी प्रसन्न नहीं होते, वैयाकरण भी प्रसन्न नहीं होते, युष्मद्रके एकवचनसे अपनी अप्रतिष्ठा मानने वाले भी प्रसन्न नहीं होते, ईसाई - मुसलमान आदि भी प्रसन्न नहीं होते । सबका प्रसन्न करना तो असम्भव होता है | चाहे आप प्रसन्न होवें, या न होवें. मुसलमान ' सलाम ' शब्द ही कहेंगे । इस प्रकार जो अपने ' जयश्रीकृष्ण ' प्रादि शब्द पर दृढ है; तो दूसरा यदि उस शब्दको न भी बोले, फिर भी उन्हें कोई क्रोध नहीं होगा । सभी जानेंगे कि यह अपने मतमें दृढ है । ' नमस्ते ' यदि साम्प्रदायिक - शब्द माना जावे; तब तो उसकी शुद्धि - प्रशुद्धिका विचार छोड़ा जा सकता हैं; यदि यह शिष्टाचार माना जावे जैसे कि - प्रार्यसमाजी श्रादि मानते हैं, तो उसमें बड़ी त्रुटियाँ आती हैं, जिनका हम An eGangotri Initiative

पृष्ठ 170

सनातन धर्मालोक १-२, पृष्ठ 170 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३२० * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * गत १२ निबन्धोंमें विवरण कर चुके हैं । ईसाई - मुसलमानोंकी देखा - देखी यदि वादियोंका दोनों और समान शब्द रखनेका प्राग्रह हो और ' जयराम जी ' की श्रादि शब्द उन्हें साम्प्रदायिक प्रतीत होते हों तो वे ' नमस् ' शब्दके मोहको छोड़कर — क्योंकि वह प्ररणामवाचक होनेसे दोनों प्रोर नहीं जुड़ सकता - कोई कुशलसूचक एक शब्द बनावें, इस में हमारा भी कोई विरोध नहीं होगा । पर अभिवादन- प्रत्यभिवादन में भिन्न - भिन्न शब्द अपेक्षित होनेसे वहां अभिवादनवाचक शब्द ' नमः ' का, तथा छोटेके लिए प्रयुज्यमान ' ते'का दोनों स्थल प्रयोग प्रयुक्त है । ( ८ ) कई व्यक्ति ब्राह्मणों में परस्पर प्रयुक्त किये जाते हुए ' जय ' शब्द पर भी प्राक्षेप करते हैं; उसी दृष्टान्तसे ' नमस्ते ' को भी ठीक बताते हैं, पर यदि श्राजके ब्राह्मरण कोई भूल करें; तो क्या दूसरे भी अवश्य ही भूल करें यह भी क्या श्रावश्यक नियम हैं? वस्तुतः ' जय ' शब्द दो प्रकारका होता है, एक का अर्थ है सर्वोत्कृष्ट । इस अर्थमें वक्ता अपने-आपको सम्बोध्यमानसे छोटा बनाकर अपनेको नम्र करता है । अपना नत्रीभाव होना ही तो नमस्कार होता है । इसी कारण ' भारती कवेर्जयति ' काव्यप्रकाशके मङ्गलाचरण के इस पदके ' जयति ' पदकी वृत्तिमें भट्ट - मम्मटने कहा है- ' जयती-त्यर्थेन च नमस्कार प्राक्षिप्यते इति तां प्रति प्रस्मि प्ररणत इति लभ्यते ' यहां पर ' जय ' शब्दको ' नमस्कार ' वाचक माना है । यहां श्रीनागेशभट्टने ' उद्योत ' में लिखा है- ' जयत्यर्थ * ' नमस्ते ' युक्त वा प्रयुक्त? # ३२१ उत्कर्षः । स च विशेषानुपादानात् सर्वप्रतियोगिको लभ्यते इति भारत्यां ( तथाविधे अन्यस्मिन् अभिवाद्ये, सर्वोत्कृष्टत्वज्ञाने तुल्यवित्तिवेद्यत्वन्यायेन शिष्टे ) प्रकारान्तरे भारत्यपेक्षया सर्वस्य अपकृष्टत्वज्ञाने सर्वान्तःपातिनि स्वस्मिन्नपि आराध्या ( श्रभिवाद्या - ) ऽपेक्षया प्रपकृष्टत्वज्ञानं व्यञ्जनया वृत्तमेव - इति भावः ' । प्रदीप में श्रीगोविन्दठवकुरने भी लिखा है - ' स्तुतिनिबन्धे तु अर्थाद् नतिरपि निबद्धेव; यतो जयत्यर्थेन वक्तुर्विषयस्य च वैशिष्ट्याद नमस्कार श्राक्षिप्यते, तेन तां . प्रति श्रस्मि प्ररणतः - इति लभ्यते । विषय स्वच्छ हो गया । इसका निष्कर्ष यह है कि जिसे ' जय ' कहा जाता है, उसे सबसे बड़ा बनाया जाता है; क्योंकि-जयका अर्थ सर्वोत्कर्ष होता है; उसमें अपने आपको पट्ट करना पड़ता है; तब अपने प्रापको व्यञ्जनासे झुकानेसे नमस्कार प्रतिफलित हो जाता है । दूसरा ' जय ' शब्द श्राशी-र्वाद अर्थवाला लोकमें प्रसिद्ध है ही । इसलिए धातुपाठ में ' जिजये, जि श्रभिभवे ' यह दो अर्थ लिखे गये हैं । यदि केवल श्राशीर्वाद अर्थ ही ' जय ' का माना जाय, नमस्कार नहीं; तब ' जय जगदीश हरे! ' इस श्रार्यसमाज से भी सम्मत भारती में ' जय ' शब्दका श्राशीर्वाद प्रर्थ हो जावेगा । तब क्या वादी परमात्माको ' जय ' शब्दसे आशीर्वाद देते हैं? यदि नहीं; तब ' जय ' का नमस्कार अर्थ भी सिद्ध हो गया । तब छोटा बड़ेको ' जय ' शब्दसे नमस्कार करता है, और बड़ा छोटेको स ० घ ० २१ CC - 0. Ankur Joshi Collection gujarat. An eGangotri Initiative