सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 1–10
सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 1–10
पृष्ठ 1
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इस पृष्ठ पर कोई पाठ नहीं मिला — ऊपर मूल चित्र देखें।
पृष्ठ 2
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 3
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 4
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 5
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 6
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 7
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
‘ श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थमालाका चतुर्थ सुमन ( संरक्षक - श्रीमान् पं ० मुरारीलालजी मेहता, कलकत्ता) सनातनधर्मका विश्वकोष-श्रीसनातनधर्मालोकः ( सनातनधर्मके मुख्य - विषयोंका निरूपण ) प्रणेता-पं ० दीनानाथशर्मा शास्त्री सारस्वत, विद्यावागीश, विद्याभूषण, विद्यानिधि संख्य [ भूतपूर्व प्रिन्सिपल स ० ध ० सं ० कालेज, मुलतान प्रिन्सिपल सं ० हिं [ ० महाविद्यालय, रामदल, दरीवाकलां, ] देहली आनन्द कुटार माताशाल प्रकाशक श्रीनारायण शर्मा शास्त्री ० श्रीसनातनधर्मालोक - ग्रन्थमाला कार्यालय C / o रामदल, दरीबाकलाँ, देहली । ( अथवा ) फ़र्स्ट बी ० १६, लाजपतनगर, नई देहली । श्रीव्यास पूर्णिमा सं ० २०११ ] [ मूल्य ४ ) ६० CC - D. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 8
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीनारायण शर्मा शास्त्री श्रीसनातनधर्मालोक प्रकाशक- - प्रन्थमाला कार्यालय, C / o रामदल, दरीबाकलां, देहली । सेवा में: --- ( समर्पण सनातनधर्म - संरक्षक ) उप तुम स्वी किन प्रक एवं का संस प्रेरि हम प्रथम - संस्करण मूल्य सवा चार रुपये मुद्रक-त्यागी फाइन आर्ट प्रेस कटरा खुशहाल राय, देहली । 1 महनीय सनातनधर्म! भगवान् पुराण- पुरुषने सृष्टिकी श्रादिमें ही तुम्हारी सृष्टि की थी । वेद तुम्हारी ही वन्दना करते हैं, स्मृतियाँ तुम्हें ही स्मरण करती हैं, श्रौत, गृह्य एवं धर्म - सूत्र तुम्हारा ही सेवन करते हैं । तुम्हारी ही छत्रच्छायाके आश्रय में हम जीवन प्राप्त कर रहे हैं, तुम्हारे ही हम अपनी सत्ताको रखे हुए हैं । तुम पुराने होते हुए भी सदा नवीन हो । आज इस तुम्हारे ही देशसे, तुम्हारा ही समूलोन्मूलन करने के लिए, तुम्हारे ही देशके निवासी, कतिपय सुधारकाभास - सम्प्रदायोंकी दुश्चेष्टाएँ दीख रही हैं । उन्हीं दुर्दान्तों CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 9
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ ख ] उपशमन द्वारा तुम्हारी सेवा करनेके लिए इस लेखमयी पूजन सामग्रीको तुम्हारे चरणों में समर्पित करता हुआा प्रार्थना करता हूँ कि- - इसे स्वीकार करो, और अपने घनी दानी वा स्वभक्त सुपुत्रोंको प्रेरित करो कि वे इस दशसहस्र पृष्ठके ' श्रीसनातनधर्मालोक ' महाग्रन्थको पूर्ण प्रकाशित करने में हमारे सहायक बनें, तथा सनातनधर्मकी सभाओं एवं उनके संस्कृत - हिन्दी विद्यालय - महाविद्यालयों एवं स्कूलोंके अधि-कारियोंको प्रेरित करो कि वे इस ग्रन्थमालाके पुष्पोंको अपनी संस्थाओं में पाठ्य - पुस्तक रूपमें निर्धारित करें; और समर्थ विद्वानोंको प्रेरित करो कि वे तुम्हारी इस ग्रन्थमालाके प्रचार और प्रसारमें हमारे दक्षिण- हस्त बन सकें 1 प्रार्थक, समर्पक एवं तुम्हारा तुच्छ - सेवक-दीनानाथशर्मा सारस्वतः C / o रामदल, दरीयाकलां, देहली । > -' श्रीसनातनधर्म.लोक'- प्रन्थमाला के सर्व प्रथम संरक्षक Aahi 50-255 ही तुम्हें कर हैं, राने द्वारा पय श्रीमान् पं ० मुरारीलालजी मेहता महोदय ( ७० विवेकानन्द रोड, कलकत्ता ) • 100 125413 CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative Mahil
पृष्ठ 10
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सम चा CC - 0. Ankur Joshi Collection ft: $ 8 प्रारम्भिक शब्द ‘ वन्दे वन्दारुमन्दारमिन्दुभूषणनन्दनम् अमन्दानन्दसन्दोहबन्धुरं सिन्धुराननम् । अन हि वि । है ' मैंन कर श्रीमनुजीने अपनी स्मृति में कहा है कि धर्मकी रक्षा की भा जावे, तो वह भी रक्षकको रक्षा करता है, धर्मको मारा जावे, तो वह भी मारने वालेको मारता है: - ' धर्म एव धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ' ( १५ ) यह बात सर्वथा सत्य है । ( क अग्नि जब अपने सनातनधर्मं, तापको छोड़ देती है, तब उसका स्वरूप भी नष्ट हो जाता है, वह भस्म हो जाती है । इसी प्रकार कोई भी अय कान ' जाति यदि अपने सनातन - धर्मको छोड़ देती है, तो उसका स्वरूप भी यह नष्ट हो जाता है । यह स्वाभाविक है । जबसे हिन्दु जातिने अपने पर सनातन - धर्मको छोड़ना प्रारम्भ कर दिया है, तबसे उसके स्वरूपमें भी विकृति यांनी प्रारम्भ हो गई है । विद्य 2 - अपने उस सनातन धर्मका ज्ञान उसके साहित्यसे हुथा करता है, प्रत पर हिन्दु जाति अपनी संस्कृत भाषाको भुला देनेके कारण अपने उस उस साहित्यसे भी दूर हो चुकी है । तब उसे अपने सनातन धर्मका ज्ञान कर भी कैसे हो? जब ज्ञान नहीं, तब उसका थाचरण भी कैसे हो? जब प्रती . आचरण नहीं, तो धर्मका संरक्षण भी नहीं । तब उसी अपने धर्म के इधर नाशमें सहायक होनेसे जो कि हिन्दुजातिका भी स्वरूप नष्ट हो रहा है- गया 1 यह अत्यन्त स्वाभाविक है । उसमें प्रोत्साहन देने वाले कई थर्वाचीन Gujarat. An eGangotri Initiative