सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 11–20

सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 11–20

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[ घ ] सम्प्रदाय वा समाज भी हैं, जो कि उसके धार्मिक सिद्धान्तों पर उपहास वा श्राक्षेप करके उससे अपना वह धर्म छुड़वाना चाहते " अपनी संस्कृत भाषाका ज्ञान न रखनेसे वा ज्ञान होने पर भी ' अनवकाशवश प्राचीन साहित्यके श्रवगाहनका अवसर न होनेसे, वही हिन्दुजाति दूसरोंके दुष्प्रचारस्वरूप स्वयं भी अपने धर्मकी सत्यता-fare शकित हो उठी है पर बहुतों को अपने धर्मकी जिज्ञासा हृदयसे है । यह देखकर मैंने अपने धर्म बन्धुओं के स्वधर्मज्ञानार्थ- जैसा कि मैंने स्वयं समझा - प्राचीन अर्वाचीन सनातनधर्म- साहित्यार्णवको मथ कर ‘ श्रीसनातनधर्मालोक ' नामक दशसहस्र पृष्ठका महाप्रन्थ संस्कृत-भाषा में तैयार किया, और उतना ही हिन्दीभाषा में भी । संस्कृत में इसे अपनी की हुई टीकासे स्वयं प्रकाशित करनेका अभिमत सनातन-धर्मके महारथी श्री पं ० कालूरामजी शास्त्री युक्ति- विशारद श्रमरोधा ( कानपुर ) ने प्रकट किया, और संस्कृतमें स्वयं प्रकाशित करनेके लिए अयोध्या ' संस्कृत कार्यालय ' के उत्साही कार्यकर्त्ता श्री पं ० कमला-कान्तजी त्रिपाठीने मांगा; पर दोनों ही महोदयोंका देहान्त - वृत्त सुनकर यह प्रकाशनकी श्राशा भी लुप्त होगई । तब इस ग्रन्थका अन्य विद्वानों पर क्या प्रभाव पड़ता है - इस बातकी परीक्षार्थ मैंने इसी महाग्रन्थके कई नियन्ध संस्कृत तथा हिन्दीके पत्र - पत्रिकाओं में प्रकाशित कराये । विद्वानोंके स्वयम् आये ' हु पत्रोंसे विदित हुआ कि उन्हें वे मेरे निबन्ध अतिशय रुचिकर प्रतीत हुए हैं । इससे मेरा उत्साह बढ़ा । बहुतने उस महाग्रन्थको मुद्रण - द्वारा राष्ट्रभाषा हिन्दी में स्वयं प्रकाशन करने का परामर्श दिया । पर इतने महाग्रन्थका प्रकाशन असम्भव प्रतीत हुआ क्योंकि श्रीलक्ष्मीदेवीकी कृपापात्रता तो अपने पर थी नहीं । इधर से देश - भङ्ग हो जानेसे अपना स्थान ' मुलतान ' पाकिस्तान में श्रा गया । उसे छोड़कर खण्डित हुए हिन्दुस्थानमें आना पड़ा । उस समय [ = ] तो अपनी जीवननिर्वाह समस्या भी प्रतिशयित - जटिल हो उठी । पर परमात्माकी असीम कृपासे कुछ निर्वाहकी प्राप्ति हो गई- --अध्यापनका कार्य मिल गया, यद्यपि यह भी स्थायी नहीं है । • श्रय ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के प्रकाशनका विचार उठा, पर इतने महाग्रन्थका प्रकाशन जब सम्भव न दिखाई पड़ा, तब उसे ग्रन्थमालाके । रूपमें प्रकाशित करनेका विचार किया । पर प्रकाशनार्थ रुपया कहांसे श्रावे? इस पर मैं विचार कर ही रहा था कि - जायल ( मारवाड़ ) के श्रीवेङ्कटेश्वर संस्कृत महाविद्यालयके मुख्याध्यापक श्रीमान् पं ० रामेश्वरजी -शास्त्री तथा सहायक श्री पं ० देवकृष्णजी शास्त्री सारस्वतने इस विषय में सबसे पूर्व प्रोत्साहन दिया, और रसीदवुकोंके प्रकाशनकी सम्मति दी, और स्वयं रुपया संग्रह करनेका वचन भी दिया, यादमें १०१ ) भेजा भी । फिर प्रथम- पुष्प निकालनेका व्ययभार ' श्रीस्वाध्याय ' के श्रद्धेय सम्पादक श्री पं ० हरदेवजी त्रिवेदी - महोदयने स्वयं लिया । सबसे पूर्व १०० ) की आर्थिक सहायता श्रीमान् पं ० रेवाशङ्करमेघजी शास्त्री पुरोहित महोदय मुख्याध्यापक डी ० एल ० संस्कृत पाठशाला बम्बईसे प्राप्त हुई और बहुत प्रोत्साहन भी उनसे प्राप्त हुआ । बल्कि इनकी सहायताका वचन तो हमें मुलतानमें ही प्राप्त हुआ कि- । ' आप अपना ग्रन्थ प्रकाशित करना प्रारम्भ करें और मैं सहायता करूंगा । " इस बार भी इन्होंने १०० ) भेज दिया है । फिर श्री पं ० ब्रह्मदत्तजी शर्मा सहायकाध्यापक राजकीय संस्कृत पाठशाला कादेवासे भी १०१ ) प्राप्त हुए; और इस बार भी । बल्कि इन्होंने तो कहा है कि - ' मैं यावज्जीवन ' श्रीसनातनधर्मालोक ' की सहायता करता रहूँगा । ' फिर पूज्यपाद श्रीमज्जगद्गुरुश्रीशङ्कराचार्य श्रीद्वारका - शारदापीठाधीश ' श्रीस्वाध्याय ' पत्र मंगाने योग्य है । मूल्य ४१ ) मंगानेका पता -· श्रीस्वाध्यायसदन, सोलन ( शिमला ) । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 12

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श्री १०८ श्री श्री श्री अभिनवसचिदानन्दतीर्थ - स्वामीजी महाराजने १०१ ) भेजकर हमें प्रोत्साहित किया और अन्य पीठाधीशोंके धागे एक आदर्श उपस्थित किया कि - ' श्रीसनातनधर्मका सभीको तन, मन, धनसे सेवन करना चाहिये ' इस बार भी श्रीचरणोंने २० ) भेजे हैं । फिर सनातनधर्मके सुमधुर भ्याख्याता हमारे श्री पं ० हरिप्रसादजी शास्त्री पाराशर संस्कृत - मुख्य शिक्षक स ० ध ० हाईस्कूलने जिन्होंने पठानकोट में अपने व्याख्यानोंके प्रभावसे जनता द्वारा विशाल सनातनधर्म - भवन बनवा दिया - १०० ) भेजकर हमारे शिष्यमण्डलके आगे यह आदर्श रखा कि सभीको इस महाग्रन्थके प्रकाशनार्थ सहायता करनी चाहिये । इन्हीं महोदयोंकी आर्थिक सहायतासे ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थमालाके द्वितीय तथा तृतीय पुष्प प्रकाशित हुए । तृतीय- पुष्पकी सहायकसूची में जितने नाम लिखे थे, उनमें कई महोदयोंने अपनी पूरी सहायता नहीं भेजी; तब तृतीय पुष्प पर कुछ ऋण हो गया, जो अब तृतीय- पुष्पको कुछ प्रतियोंके बिक जाने तथा कुछ सहायता प्राप्त हो जानेसे उत्तर चुका है । सनातनधर्मके सुप्रसिद्ध - सेवक भक्त रामशरणदासजीसे २१ ) प्राप्त हुए, हमारे अपने श्री पं ० देवेन्द्रकिशोरजी शास्त्री श्रायुर्वेदाचार्य गाजियाबाद से २५ ) तथा श्रीपं ० श्यामसुन्दरजी शास्त्री श्री ० टी ० संस्कृत टीचर डी ० बी ० मिडल स्कूल सिवानीसे भी २५ ) मिल चुके हैं; शेष इनसे मिलने वाले हैं । अवशिष्ट सहायकोंके रुपये शीघ्र श्राजाने चाहियें - यह उन्हें प्रेरणा है । श्री पं ० भवानीशङ्करजी शास्त्री संस्कृत-शिक्षक महारानी - गर्ल्स हाईस्कूल जयपुर से तथा श्री स्वामी पुरुषोत्तम-दासजी वैष्णव यज्ञशालाकी बावड़ी जयपुरसे भी पच्चीस - पच्चीस रुपये अयाचित सहायता प्राप्त हो चुकी है । फिर श्रीमान् सेठ छोटेलालजी कानौडिया - महोदय ( ५७ बढ़ता1 [ ] स्ट्रीट कलकत्ता ) ने १० ) सहायता भेजी । इससे पूर्व इन्हीं श्रीमान्ने मेरी एक हो चुकी हुई निजी भारी प्रार्थिक क्षति की भी पूर्ति की थी । प्रा इस वार श्रीमान् पं ० मुरारीलालजी मेहता महोदय ( ७० विवेका-नन्द रोड कलकत्ता ) १००० ) देकर इस ग्रन्थमाला के सर्वप्रथम संरक्षक खू बने हैं - इनका अनुकरण करके अन्य महोदयोंकी भी इस ग्रन्थमालाक संरक्षक बनकर इसके प्रकाशनमें सहायता करनी चाहिये । इन्हींकी सहायता से यह चतुर्थं पुष्प प्रकाशित हुआ है । अब तक इस ग्रन्थ- श्र मालामें सहायता प्रायः ब्राह्मण - महोदयोंने की है । वैश्य - महोदयोंको श्रा भी जिनका यह सबसे प्रथम कर्तव्य है- इधर ध्यान देना चाहिये, पर क्योंकि वे हिन्दुधर्मके प्रचार कार्यालयके कोषाध्यक्ष हैं । इस रख ग्रन्थमालाके संरक्षक भी उन्हीं श्रीमानोंको बनना चाहिये - जिससे यह है । ग्रन्थमाला शीघ्र निकल सके । कोई महोदय हमारे निर्वाहकी समस्या पड़ा हल कर दें, तथा इस ग्रन्थमालाका व्यय भी अपने पर ले लें, तो उक्त महाग्रन्थ शीघ्र पूर्ण हो सकता है । इस ग्रन्थमाला के हृदयतः सहायक श्री १००८ स्वामी करपात्रीजी दो - त महाराज हैं । उन्होंके मण्डलके धर्मनीति एवं राजनीतिके प्रवीण- रह विद्वान् श्री पं ० गङ्गाशजी मिश्र ( सम्पादक दैनिक ' सन्मार्ग ' काशी ) श्रीरा तथा सनातनधर्मके मर्मज्ञ - विद्वान् श्रीमान पं ० दुर्गादत्तजी त्रिपाठी प्रायः ( प्रकाशक दैनिक ' सन्मार्ग ' काशी ) महोदयोंने इस ग्रन्थमाला के.. निबन प्रचार कार्य में बहुत ही सहयोग दिया है । इनमें श्री त्रिपाठि महो गये ह दया तो हमें इस देश में थानेसे ही सर्वविध सहयोग, सहानुभूति तथा होगा सुझाव आदि प्राप्त होता रहा है । अस्तु । कथाव विद्या तीन पुष्प प्रकाशित हो चुके हैं — इनमें प्रथम तथा द्वितीय पुष्प तो लघुका हैं । प्रथममें ' नमस्ते ' के एकपदत्व पर विचार तथा द्वितीय CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 13

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[ - ] ' नमस्ते ' के निपातत्व पर विचार तथा ' श्रीसनातनधर्मालोक ' महाग्रन्थ-मेरी की सम्पूर्ण विषय - सूची दी गई है । तृतीय- पुष्पसे श्राकारें भी पुस्तकको प्रारम्भ किया गया है, यह पुष्प है भी महत्वपूर्ण, पृष्ठ - संख्या भी पर्याप्त है, और बारीक दाइप होनेसे उसमें सामग्री भी पर्याप्त है । इसमें वेका- स्त्री - शूद्धोंके वेदाधिकार पर दिये जाने वाले वेदादिशास्त्रोंके प्रमाणों पर रक्षक खूब बिचार किया गया है । उसमें प्रसिद्ध मन्त्र ' यथेमां वाचं कल्याणीम् ’ ला के अर्थ पर तो बहुत विस्तारसे विचार किया गया है— प्रतिवादियोंकी हीं की सूमों पर भी आलोचना की गई है । ऐतरेय महिदास, कवष - ऐलूष, ग्रन्थ- औशिज - कक्षीवान्, सत्यकाम जाबाल, श्रीवाल्मीकि, शबरी, वलिष्ठ न्योंको आदिको जो शूद्र, दासीपुत्र, वेश्यापुत्र श्रादि बताया जाता है, उस हिये, पर भी सम्यक् विचार प्रदर्शित किया गया है । अनुसन्धानात्मक दृष्टिकोण इस रखने वालोंके लिए तो यह तृतीय पुष्प श्रवश्य ही द्रष्टव्य तथा उपादेय. यह है । सहायता उसमें पूर्ण प्राप्त न होनेसे कागज साधारण लगाना यस्या पड़ा । उक्त चतुर्थ पुष्प तो पाठकों के समक्ष उपस्थित है ही । इसमें श्रीमेहताजी की सहायता प्राप्त हो जानेसे कागज़ मध्यम लगाया गया है । श्रादिम त्रीजी दो - तीन फार्मोंमें संस्कृतज्ञ - कम्पोज़ीटर नहीं मिल सके; अतः कुछ त्रुटियां सण- रह गई, और कुछ देरी भी बहुत हुई; आगे श्रीरघुवरदयाल तथा शी ) श्रीरामदेव नामक योग्य कम्पोजीटर प्राप्त हो गये, छपाई शीघ्र हुई, बाठी प्रायः शुद्ध भी हुई । इस पुष्पमें सनातनधर्मके मुख्य विषयों पर बीस लाके. निबन्धोंमें विचार किया गया है, अवान्तर विषय भी इसमें बहुत था हो गये हैं । आशा है — यह पुष्प भी पाठकोंको अतिशय लाभप्रद प्रमाणित तथा होगा । इसे वे क्रमसे और ध्यानसे पढ़ें । ये पुष्प प्रत्येक उपदेशक तथा कथावाचकको अपने पास अवश्य रखने चाहियें । पुस्तकालय तथा विद्यालयों में भी इसका संग्रह जनता तथा अध्यापकों एवं छात्रोंके तो यसें CC - 0. Ankur Joshi [ म ] लाभार्थ नितराम् श्रावश्यक है । अव अग्रिम पुष्पके लिए संरक्षक, सहायक, प्रेरक एवं प्रचारकोंकी आवश्यकता है । जितनी शीघ्र सहायता प्राप्त होगी, उतना ही शीघ्र: ग्रन्थमालाका प्रकाशन होगा | प्रेरक महोदय ध्यान दें । अमूल्य कोई भी न ले हमें इस ग्रन्थमाला में जो भी साहाय्य वा मूल्य प्राप्त होता है; वह सब श्रागेके पुष्पोंके प्रकाशनार्थ जमा कर लिया जाता है, उसे अपने काममें नहीं लगाया जाता; अतः कोई भी महोदय इन ग्रन्थोंको बिना मूल्य न लें । यदि अधिक सहायता कोई महोदय न कर सकें; तो ग्रन्थका मूल्य अवश्य दें, और इन ग्रन्थोंके प्रचार में अवश्य सहायक बनें | संरक्षकका एक - हज़ार रुपया नियत है, और सहायकों का न्यून से न्यून १०० ) रुपया है, यह सबको स्मरण रखना चाहिये । संरक्षक-महोदयका चित्र भी प्रकाशित होगा और सब प्रकाशनों पर नाम भी । स्थायी ग्राहकोंके लिए यह सुविधा रखी गई है कि वे २ ) जमा करा दे, फिर उन्हें सभी पुप्प पौने मूल्य पर दिये जायेंगे । उन्हें सब प्रकाशित पुष्प लेने पड़ेंगे । इस पुष्पमें जिन महाशयोंके सनातनधर्म - विरुद्ध मतको थालोचित किया है, उसमें कोई ईर्ष्या - द्वेष कारण नहीं, किन्तु शास्त्रका वास्तविक अभिप्राय प्रदर्शन ही वहाँ मुख्य लक्ष्य है । फिर भी यदि किसी महो-दयका मनः क्षोभ हुआ हो, तो वे हमारे हृदयको जानते हुए हमें क्षमा करेंगे । विचारमें जो त्रुटि रह गई हो, विद्वान हमें उसकी सूचना दें, इन शब्दोंके साथ यह भूमिका समाप्त है । श्रीव्यासपूर्णिमा निवेदक: --गुरुवार दीनानाथशर्मा शास्त्री सारस्वतः विद्यावागीशः, सं ० २०११ C / o रामदल, दरीबाकलां, देहली Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 14

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[ ५ ] श्री १०८ श्री श्री श्री अभिनवसचिदानन्दतीर्थ - स्वामीजी महाराजने १०१ ) भेजकर हमें प्रोत्साहित किया और अन्य पीठाधीशोंके आगे एक आदर्श उपस्थित किया कि - ' श्रीसनातनधर्मका सभीको तन, मन, धनसे सेवन करना चाहिये ' इस बार भी श्रीचरणोंने २० ) भेजे हैं । फिर सनातनधर्म के सुमधुर - + याख्याता हमारे श्री पं ० हरिप्रसादजी शास्त्री पाराशर संस्कृत - मुख्य शिक्षक स ० ध ० हाईस्कूलने जिन्होंने पठानकोट में अपने व्याख्यानोंके प्रभावसे जनता द्वारा विशाल सनातनधर्म - भवन बनवा दिया - १०० ) भेजकर हमारे शिष्यमण्डलके धागे यह आदर्श रखा कि सभीको इस महाग्रन्थके प्रकाशनार्थ सहायता करनी चाहिये । इन्हीं महोदयोंकी आर्थिक सहायतासे ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थमालाके द्वितीय तथा तृतीय पुष्प प्रकाशित हुए । तृतीय- पुष्पकी सहायकसूची में जितने नाम लिखे थे, उनमें कई महोदयोंने अपनी पूरी सहायता नहीं भेजी, तब तृतीय पुष्प पर कुछ ऋण हो गया, जो अब तृतीय- पुष्पकी कुछ प्रतियोंके बिक जाने तथा कुछ सहायता प्राप्त हो जानेसे उतर चुका है । सनातन धर्म के सुप्रसिद्ध - सेवक भक्त रामशरणदासजीसे २१ ) प्राप्त हुए, हमारे अपने श्री पं ० देवेन्द्रकिशोरजी शास्त्री श्रायुर्वेदाचार्य गाजियाबाद से २५ ) तथा श्रीपं ० श्यामसुन्दरज़ी शास्त्री श्री ० टी ० संस्कृत टीचर डी ० बी ० मिडल स्कूल सिवानीसे भी २५ ) मिल चुके हैं; शेष इनसे मिलने वाले हैं । श्रवशिष्ट सहायकोंके रुपये शीघ्र श्राजाने चाहियें - यह उन्हें प्रेरणा है । श्री पं ० भवानीशङ्करजी शास्त्री संस्कृत-शिक्षक महारानी - गर्ल्स हाईस्कूल जयपुरसे तथा श्री स्वामी पुरुषोत्तम-दासजी वैष्णव यज्ञशालाकी बावड़ी जयपुरसे भी पच्चीस - पच्चीस रुपये अयाचित सहायता प्राप्त हो चुकी है । फिर श्रीमान् सेठ छोटेलालजी कानौडिया - महोदय ( १७ बढ़तल्ला1 [ ] " नम स्ट्रीट कलकत्ता ) ने ५० ) सहायता भेजी । इससे पूर्व इन्हीं श्रीमान्ने मेरी की एक हो चुकी हुई निजी भारी प्रार्थिक क्षतिकी भी पूर्ति की थी । प्रारम इस वार श्रीमान् पं ० मुरारीलालजी मेहता महोदय ( ७० विवेका- स्त्री-नन्द रोड कलकत्ता ) १००० ) देकर इस ग्रन्थमाला के सर्वप्रथम संरक्षक खूब बने हैं - इनका अनुकरण करके अन्य महोदयको भी इस ग्रन्थमालाके के श्र संरक्षक बनकर इसके प्रकाशनमें सहायता करनी चाहिये । इन्हींकी सहायतासे यह चतुर्थ पुष्प प्रकाशित हुआ है । अब तक इस ग्रन्थ- औशि माला में सहायता प्रायः ब्राह्मण - महोदयोंने की है । वैश्य - महोदयोंको यादि 1 भी जिनका यह सबसे प्रथम कर्तव्य है- इधर ध्यान देना चाहिये, पर भी क्योंकि वे हिन्दुधर्म प्रचार कार्यालयके कोषाध्यक्ष हैं । इस रखने ग्रन्थमाला के संरक्षक भी उन्हीं श्रीमानोंको बनना चाहिये - जिससे यह है । ग्रन्थमाला शीघ्र निकल सके । कोई महोदय हमारे निर्वाहकी समस्या पड़ा, हल कर दें, तथा इस ग्रन्थमालाका व्यय भी थंपने पर ले लें, तो उक्त महाग्रन्थ शीघ्र पूर्ण हो सकता है । की इस ग्रन्थमाला के हृदयतः सहायक श्री १००८ स्वामी करपात्रीजी दो - ती महाराज हैं । उन्हींके मण्डलके धर्मनीति एवं राजनीतिके प्रवीण- रह गई श्रीराम विद्वान् श्री पं ० गङ्गाशङ्करजी मिश्र ( सम्पादक दैनिक ' सन्मार्ग ' काशी ) तथा सनातनधर्मके मर्मज्ञ विद्वान् श्रीमान् पं ० दुर्गादत्ताजी त्रिपाठी प्रायः ( प्रकाशक दैनिक ' सन्मार्ग ' काशी ) महोदयोंने इस ग्रन्थमाला निबन्ध प्रचार कार्य में बहुत ही सहयोग दिया है । इनमें श्री त्रिपाठि -महो- गये हैं दया तो हमें इस देश में श्रानेसे ही सर्वविध सहयोग, सहानुभूति तथा होगा । सुझाव श्रादि प्राप्त होता रहा है । अस्तु । कथावा विद्याल तीन पुष्प प्रकाशित हो चुके हैं — इनमें प्रथम तथा द्वितीय पुष्प तो लघुका है । प्रथममें ' नमस्ते ' के एकपदत्व पर विचार तथा द्वितीय CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 15

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[ * ] ' नमस्ते ' के निपातत्व पर विचार तथा ' श्रीसनातनधर्मालोक ' महाग्रन्थ-मेरी की सम्पूर्ण विषय - सूची दी गई है । तृतीय- पुष्पसे श्राकार भी पुस्तकको प्रारम्भ किया गया है, यह पुष्प है भी महत्त्वपूर्ण, पृष्ठ संख्या भी पर्याप्त है; और बारीक टाइप होनेसे उसमें सामग्री भी पर्याप्त है । इसमें वैका- स्त्री - शूद्धों के वेदाधिकार पर दिये जाने वाले वेदादिशास्त्रोंके प्रमाणों पर रक्षक खूब विचार किया गया है । उसमें प्रसिद्ध मन्त्र ' यथेमां वाचं कल्याणीम् ’ " लाके के अर्थ पर तो बहुत विस्तारसे विचार किया गया है - प्रतिवादियों की सूमों पर भी आलोचना की गई है । ऐतरेय - महिदास, कवष - ऐलूष, अन्थ- औशिज - कक्षीवान्, सत्यकाम जाबाल, श्रीवाल्मीकि, शबरी, वसिष्ठ योंको यादिको जो शूद्र, दासीपुत्र, वेश्यापुत्र आदि बताया जाता है, उस हिये, पर भी सम्यक् विचार प्रदर्शित किया गया है । अनुसन्धानात्मक दृष्टिकोण इस रखने वालोंके लिए तो यह तृतीय- पुप्प अवश्य ही द्रष्टव्य तथा उपादेय. यह है । सहायता उसमें पूर्ण प्राप्त न होनेसे कागज साधारण लगाना मस्या पड़ा । उक्त चतुर्थ पुष्प तो पाठकों के समक्ष उपस्थित है ही । इसमें श्रीमेहताजी की सहायता प्राप्त हो जानेसे कागज़ मध्यम लगाया गया है । श्रादिम त्रीजी दो - तीन फार्मों में संस्कृतज्ञ - कम्पोज़ीटर नहीं मिल सके; अतः कुछ त्रुटियां रह गई, और कुछ देरी भी बहुत हुई; आगे श्रीरघुबरदयाल तथा रा-शी ) श्रीरामदेव नामक योग्य कम्पोजीटर प्राप्त हो गये, छपाई शीघ्र हुई, ठी प्रायः शुद्ध भी हुई । इस पुष्पमें सनातनधर्मके मुख्य विषयों पर बीस लाके. निबन्धोंने विचार किया गया है, श्रवान्तर विषय भी इसमें बहुत था - गये हैं । आशा है - यह पुष्प भी पाठकोंको अतिशय लाभप्रद प्रमाणित तथा होगा । इसे वे क्रमसे और ध्यानसे पढ़ें । ये पुष्प प्रत्येक उपदेशक तथा कथावाचकको अपने पास अवश्य रखने चाहियें । पुस्तकालय तथा विद्यालयों में भी इसका संग्रह जनता तथा अध्यापकों एवं छात्रोंके तो [ म ] लाभार्थ नितराम् आवश्यक है । अब अग्रिम पुष्पके लिए संरक्षक, सहायक; प्रेरक एवं प्रचारकोंकी श्रावश्यकता है । जितनी शीघ्र सहायता प्राप्त होगी, उतना ही शीघ्र: प्रन्थमालाका प्रकाशन होगा | प्रेरक महोदय ध्यान दें । अमूल्य कोई भी न ले हमें इस ग्रन्थमालामें जो भी साहाय्य वा मूल्य प्राप्त होता है; वह सब आगे के पुष्पोंके प्रकाशनार्थ जमा कर लिया जाता है, उसे अपने काममें नहीं लगाया जाता; अतः कोई भी महोदय इन ग्रन्थको बिना मूल्य न लें । यदि अधिक सहायता कोई महोदय न कर सकें; तो ग्रन्थका मूल्य अवश्य दें, और इन ग्रन्थोंके प्रचारमें अवश्य सहायक बनें । संरक्षकका एक हज़ार रुपया नियत है, और सहायकों का न्यूनसे न्यून १०० ) रुपया है, यह सवको स्मरण रखना चाहिये । संरक्षक-महोदयका चित्र भी प्रकाशित होगा और सब प्रकाशनों पर नाम भी । स्थायी ग्राहकों के लिए यह सुविधा रखी गई है कि वे २ ) जमा करा दे, फिर उन्हें सभी पुष्प पौने मूल्य पर दिये जायेंगे । उन्हें सब प्रकाशित पुष्प लेने पड़ेंगे । इस पुष्पमें जिन महाशयोंके सनातनधर्म - विरुद्ध मतको आलोचित किया है, उसमें कोई ईर्ष्या - द्वेष कारण नहीं, किन्तु शास्त्रका वास्तविक अभिप्राय प्रदर्शन ही वहाँ मुख्य लक्ष्य है । फिर भी यदि किसी महो-दयका मनः क्षोभ हुआ हो, तो वे हमारे हृदयको जानते हुए हमें क्षमा करेंगे । विचार में जो त्रुटि रह गई हो, विद्वान् हमें उसकी सूचना दें, इन शब्दोंके साथ यह भूमिका समाप्त है । 1 पूर्णिमा निवेदक: --गुरुवार दीनानाथ शर्मा शास्त्री सारस्वतः विद्यावागीशः, सं ० २०११ C / o रामदल, दरीबाकलां, देहली CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 16

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' श्रीसनातनधर्मालोक ( ३ ) ' के सम्बन्ध में विद्वानोंके कुछ भाव ( १ ) सनातनधर्मके बिखरे हुए एक - एक विषयको श्रृङ्खलावद्ध एक पुस्तक में संगृहीत कर उसे विस्तृत व्याख्या के साथ धार्मिक जनताके समक्ष रखनेके ध्येयसे विद्वद्वर्य पं दीनानाथजी शर्मा शास्त्रीने ' श्रीसना-तनधर्मालोक ' ग्रन्थमालाका प्रकाशन प्रारम्भ किया है । इस मालाका तृतीय पुष्प उक्त पुस्तक है । पण्डितजीने इस ग्रन्थ में स्त्री - शूद्रोंके वेदाधिकारानधिकार विषय पर शास्त्रीय एवं लौकिक दृष्टिले साङ्गोपाङ्ग विवेचन किया है । साथ ही महिदास, कवष, जाबाल, वसिष्ठ, व्यास, पाराशर, सूत, शबरी, वाल्मीकि श्रादि की जातीय उत्पत्तिके सम्बन्धमें सप्रमाण विश्लेषण किया है, ऐसे उत्तम ग्रन्थसे जनता अवश्य लाभ उठावेगी - ऐसी पूर्ण आशा है । एतदर्य वह उक्त ग्रन्थमाला के प्रत्येक पुष्पको खरीदकर धार्मिक सत्साहित्य के प्रकाशनार्थं ग्रन्थमालाको अर्थ-साहाय्य प्रदान करे । श्री शास्त्रीजी द्वारा लिखित उक्त ग्रन्थ अत्यन्त गवेषणापूर्ण, पठनीय, विचारणीय एवं संग्रहणीय है 1. - देवेन्द्र शर्मा शास्त्री, सम्पादक श्रीवेङ्कटेश्वर - समाचार, बम्बई { ) । ५८।४० ५-२-१४ [ 2 ] ] ( २ ) ' श्रीशारदापीठाधीश्वर ने श्रीकरपात्रीजी महाराज श्रादि सर्वत प्रका श्राचार्यों श्रने महात्माओं द्वारा मुक्तकंठथी प्रशंसित था एक ग्रन्थना अवलोकनथी धर्म - बायतनी समस्त शंका समाधान यह जशे । प्रमा एवा कर्ता सुप्रसिद्ध विद्वान् पं ० दीनानाथ शास्त्री सारस्वत छे । ' देश- डाल विभाजनथ्या ते थो. सुलतान वादना सनातन - धर्म संस्कृत - कालेजना अध्यक्ष हता । बिभाजनथ्या बाद देहलीना हिन्दी - संस्कृत - कालेजना अध्यक्ष यया छे । ते त्र श्रीदयानन्दजी मंत - खण्डन करवामां घणाघ होशियार विद्वान् के । ' श्रीस महान् ग्रन्थ छे । ग्रन्थमाली रूपमां श्रा महाग्रन्थ प्रकाश हुई । शुरू थई गया है । श्री पुस्तकें घणुज उपादेय हो वायी । दरेक जैसे व्यक्ति तथा पुस्तकालयों, विद्यालयों माटे, संग्राह्य छे । पुस्तक — श्रीमहाबलभट्ट वेदान्तशिरोमणि, सम्पादक ' नवभारती ' सनात ( गुजराती ) राजकोट ( सौराष्ट्र ) ( ६।५।२४ ) । पाठशा ( ३ ) परम पूज्यपाद, भारतकी महान विभूति श्री पं ० दीनानाथजी शास्त्री सनातनधर्मी जगत् के माने हुए अद्भुत रत्न हैं ।... मैं निःसंकोच ए कह सकता हूँ कि यह ३० करोड़ हिन्दुओं पर भगवान्की असीम स्थांना कृपा है कि जो आप जैसा अभूतपूर्व, महान धुरन्धर विद्वान् प्राप्त हुना माला है । ··· थापके खोजपूर्ण, शास्त्रीय लेखोंको पाकर नास्तिकोंको बोलती, तथा बन्द हो जाती है, और काशी तकके बड़े - बड़े विद्वान् तक आपकी प्रशंसा करते नहीं अघाते और श्रापकी धाक मानते हैं । हमारी प्रत्येक सनातनधर्मी मात्रसे प्रार्थना है कि वह शांस्त्रीजी महाराजके ग्रन्थोंको अवश्य ही पढ़े और तन, मन, धनसे सहायता कर महान् पुण्यके भागी बनें । -भक्त रामशरणदास, पिलखुआ, ७-१-५३ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 17

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[ = ] ( ४ ) ' श्रीपूज्य शास्त्रीजीके प्रमाण, तर्क और लेखशैली में तो किसी प्रकारकी न्यूनता ही नहीं रहती । क्यों न हो? आपकी विद्वत्ता ही ' श्रादि सर्वतोमुखी है । भाषा आपकी बड़ी गम्भीर और शिष्ट होती है । परन्तु न्धना प्रमाण और तर्ककी प्रबलता और निःशेषतासे विरोधीको श्राप पीस ' जशे । डालते हैं । आपके लेखोंसे बड़ी ज्ञानवृद्धि और आनन्द मिलता है । --- देश. ब्रिजना - विष्णुदत्त शर्मा वी ० ए ० बालचन्द पाड़ा, बूंदी ( राजपूताना ) निजना * णाव ( १ ) ' विद्वन्मार्तण्ड, शास्त्रार्थ महारथी श्री शास्त्रीजीसे प्रणीत ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ३ य पुष्प दत्तचित्त होकर पढ़ा, अति प्रसन्नता काश हुई । आपके लेख रत्नतुल्य, अकाट्य, सयुक्तिक रहते हैं ।: आप दरेक जैसे समर्थ विद्वानोंका मूल्य भविष्य में अवश्य होगा । आपके लेख और पुस्तकको खण्डन करनेकी शक्ति प्राधुनिकॉमें नहीं है । आपने सनातनधर्मकी बड़ी भारी सेवा की है । रतो ' — रेवाशङ्कर मेघजी शास्त्री, मुख्याध्यापक डी ० एल ० संस्कृत 1 पाठशाला; १२५ गुलालवाड़ी बम्बई ४ ( १४ ६.२३ ) थजी * कोच एतदादिक श्रयाचित सम्मतियां बहुत अधिक श्राई हुई हैं, पर सीम स्थानाभावसे हुश्रा माला स्वयं लती, तथा म पकी. त्येक नोको के प्रकाशित नहीं की जा सकीं । ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थ-खरीद कर तथा दूसरोंसे खरीदवाकर सनातनधर्मके प्रचारमें पुष्पों के विकास में सहयोग दें । निवेदकं --नारायण शर्मा सारस्वत शास्त्री ० ( प्रकाशक ) -५३ विषय - सूची विषय प्रारम्भिक शब्द १ संक्षिप्त सनातनधर्म २ सनातनधर्म के सिद्धान्तोंका संक्षेप ३ हिन्दु शब्दका महाभाष्य ४ वेदविषयमें भारी भूल ५ वेदस्वरूप - निरूपण ( श्रीपतञ्जलि एवं शनोदेवी ६ वेदादिशास्त्रों में जन्मना वर्ण - व्यवस्था ७ जन्मना वर्ण - व्यवस्था ( ब्राह्मणोस्य ८ जन्मना, वर्ण - व्यवस्था ( ब्राह्मणोस्य ६ गुणकर्मसे वर्ण व्यवस्था पर विचार १० वर्ण व्यवस्था विषयक कुछ भ्रमों का ११ मृतकश्राद्ध और ब्राह्मणभोजन १२ परलोक विद्या १३ मृतक श्राद्ध - विषयक कुछ मुखमासीत् मुखमासीत् परिहार १४ मूर्तिपूजा - रहस्य और परापूजा - स्तोत्र १५ वेदमें प्रतिमोपासना १६ श्रवतारवाद - रहस्य १७ मनुष्ययोनिसे देवयोनिकी भिन्नता १८ क्या विद्वान् मनुष्य ही देव हैं? १६ नवग्रहोंके वैदिक मन्त्र २० ग्रहण और उसका सूतक विशेष सूचना [ इन विषयोंमें सनातनधर्म के अवान्तर विषय हैं । स्थान न होनेसे उनका पृथक् निर्देश नहीं किया पृष्ठ १-१६ १७-१२ १३-१०४ १०२-१२० मन्त्र ) १२१-१६६ १६७-१७६ [ क ] ) १८०-२०२ [ ख ] ) २०३-२२७ २२८-२८३ २६४-३२३ ३३०-३४४ ३४५-३१६ ३१७-३७४ ३७५-३८० २८८-३१३ ३६४-४०४ ४०१-४२० ४२१-४३७ ४३८-४७७ ५१०-११ ४७८-२०६ भी बहुतसे आये जा सकता ] CC - 0. Ankur Joshi Collect Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 18

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' श्रीसनातनधर्मालोक ' प्रन्थमालाके पुष्पका परिचय प्रथम पुष्प - इसमें श्रीरामेश्वरानन्दजी द्वारा मांत्री हुई ' नमस्ते ' की एकपदता आलोचित की गई है, मूल्य ) । र - द्वितीय पुष्प - इसमें ' नमस्ते ' के निपात होनेकी ' बोकी गई है । फिर ' श्रीसनातनधर्मालोक ' महाग्रन्थकी सम्पूर्ण विषय सूची तथा उस पर प्रसिद्ध विद्वानोंकी सम्मतियां भी दी गई है । मूल्य " तृतीय पुष्प - इसमें स्त्री एवं शुद्धोके वेदाधिकार पर विचार किया गया है । ' अथेमां वाचं कल्याणोंम् ' का वास्तविक अर्थ बताकर ' हारीतकी ब्रह्मवादिनी एवं सद्योबधू, गोभिल सूत्रका ' यज्ञोपवीतिनी ' शब्द, शत-पथका ' दुहिता से पण्डिता जायेत ' पञ्चजना मम हीत्र जपश्वम्, बंद पल्म्यै प्रदाय वाचयेत्, ब्रह्मचर्येण कन्या RTE , यवनोंको वेद पढ़ाना S, वैदकी ऋषिकाएं इत्यादि बहुत विवेचना पर सर्वाङ्गीण दी गई है, जिसे पड़कर विद्वानोंका हृदय खिल्ल उठेगा । लौकिक दृष्टिकोण भी साथ रख दिया है । साथ ही ऐतरेय महिदास, ऐलूष कवष, कक्षीवान, पौराणिक सूत, शबरी, श्रीवाल्मीकि आदि शूद्र थे या श्रंशूद- इस पर भी स्पृष्ट विचार दिखाया गया है । अनुसन्धानके दृष्टिकोण रखने वाले सभी विद्वानों, उपदेशकों तथा शास्त्रार्थी पण्डितोंकी यह पुष्प अवश्य मंगाना चाहिये । पृष्ठसंख्या साढ़े तीनसौके लगभग इसके मंत्रमने पर - प्रथम तथा द्वितीय पुष्प अमूल्य भेजे जाते हैं । मूल्य ३ ) चतुर्थी - पुष्प - यह आपके समक्ष है । मूल्य भ मंगाने का पता ---• श्रीदीनानाथ शास्त्री सारस्वतः C / o रामदल, दरीया कक्षां देहली । CC - 0. Ankur Joshi Collection rat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 19

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PC BOOK ' श्रीसनातन धर्मा लोक ' - प्रणेता GORDO IR NUDEAN MOGIE me DO 5S CHem शास्त्री दीनानाथ श्री दीनानाथशर्मा शास्त्री सारस्वतः विद्यावागीशः, विद्याभूषणः, विद्यानिधिः, " प्रिन्सिपल सं ० हिं [ ० महाविद्यालय, रामदल, दरीबा कलां, देहली r Minashinion Gujarat श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) हिन्दु - धर्मके मूल सूत्र अथवा संक्षिप्त सनातन धर्म ' धरति विश्वम् इति धर्मः ' । जो जगत्‌को धारण करे. वह धर्म होता है । ' धृज् धारणे ' ( भ्व ० उ ० से ० ) धातुको ‘ श्रर्तिस्तुमुहुसृष्ट ’ ( १ । १४० ) इस उणादि सूत्रसे मन् प्रत्यय होकर ' धर्म ' शब्द बनता है । ' सना - सदा भवः सनातनः ' जो सदा रहे वह ' सनातन ' । ‘ सायं - चिरंःप्राह्णे -प्रगे - श्रव्ययेभ्यः ट्युट्युलौ तुट् च ' ( पा ० ४ | ३ | २३ ) इस सून्नने ' सना ' शब्दले ट्युल् प्रत्यय होकर अनुबन्धका लोप ' युवोरनाकौ ' ( पा ० ७ । १ । १ ) इस सूत्र से ' यु ' को ' अन ' प्रदेश और तुटुका श्रागम होकर ' सनातन ' शब्दकी सिद्धि होती है । ' सनातनश्चासौ धर्मश्च ' - इस क्रर्मधारय समासके विग्रहमें ' सनातन धर्म ' शब्द बनता है - जिसका अर्थ है सदा होने वाला धर्मं । अथवा सनातनका धर्म । ' सनातन ' परमात्मा को कहते हैं ॥ उसका धर्म । । जैसे कि ' सनातनमेनमाहुः ' ( अथर्व ० शौ ० सं ० १० । ८ । २३ ) ' यो दे॒वमुन्तराब्रन्तमुप्रासातै सनातनम् ' ( श्र ० १० | ८ | २२ ) ' स्वमव्ययः शाश्वतधर्म- गोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ' ( भगवद्गीता ११। १८ ) ' वन्तः सनातनो धर्मो रच्यते तनुभिस्तव ' ( श्रीमद्भाग-व्रत ३ | १६ | १८ ) ' सनातनस्य धर्मस्य मूलमेतत् सनातनम् ' ( महाभारत आश्वमेधिक ं ( ११ | ३४ ) इत्यादि इस विषय में बहुत प्रमाण हैं; जो भिन्न निबन्धमें बताये जायँगे । जो शक्ति पृथिवीमें . An eGangotri Initiative

पृष्ठ 20

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२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) व्यापक होकर उसके पृथिवीत्व की; जल में स्थित होकर उसके जलस्व की, तेज आदिमें स्थित होकर उसके तेजस्व श्रादिकी रक्षा करती है; जिसके कारण से सूर्य - चन्द्र आदि अपने स्थानमें ठहरे हैं; जो शक्ति जीवको निम्न कोटिसे उठा कर क्रमले उन्नत करती हुई उच्चतम कोटिमें ले जाती है, वह शक्ति धर्म है । ( १ ) सनातन धर्म - जो धर्म हिन्दु जातिमें अनादि से प्रवृत्त है; जिसके कारणसे वह जाति जीती है; श्रागे भी जो धर्म अनन्त काल तक रहेगा; वह सदाका धर्म सनातनधर्म है । इस पृथिवी में कई धर्माभास उत्पन्न होते हैं; परन्तु कृत्रिम होनेसे वे फिर विनष्ट हो जाया करते हैं; क्योंकि ' जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः ' ( गीता २ । २७ ) उत्पन्न हुएका नाश प्राकृतिक है । पारसीधर्म जरदुष्ट्र द्वारा ईरान में, बौद्ध धर्म गौतम बुद्ध द्वारा कपिलवस्तु में, जैन धर्म महावीर स्वामी द्वारा वैशाली में, ईसाई धर्म ईशु द्वारा यूरोप में, इस्लाम धर्म मुहम्मद द्वारा अरव देशमें, कबीर मत कबीर द्वारा काशी में, खालसा सम्प्रदाय गुरु नानक द्वारा ननकाना ( पंजाब ) में, ब्रह्मसमाज राजा राममोहनद्वारा कलकत्तामें, देवसमाज सत्यानन्द द्वारा उत्तर प्रदेशमें, आर्य समाज सम्प्रदाय स्वामी दयानन्द द्वारा टंकारा ग्राम में, इस प्रकार प्रार्थना समाज आदि बहुतसे सम्प्रदाय हैं - जिनका तिथि निश्चित है; श्रतएव यह सब श्रादिमान् हैं; पर सनातन धर्मका कोई पुरुष जन्मदाता नहीं । जिसका जन्म होता है; उसकी मृयु भी होती है । सनातन धर्मका किसी विशेष तिथिमें जन्म नहीं हुआ; इस कारण वह अनादि और अनन्त हैं । यह धर्म भगवान्की शक्ति है | जय भगवान् सनातन है तब यह धर्म भी सनातन एवं स्वाभाविक है । इसके हास करने पर हिन्दु जाति स्वयं क्षीण और श्रपने स्वरूपसे च्युत हो सकती है । उस सनातन धर्मका यद्यपि संक्षिप्त सनातनधर्म सर्वाशमें वर्णन नहीं हो सकता; तथापि उसे इस निबन्ध में सूत्र रूपसे वर्णित किया जाता है । उसीका भाष्य स्वरूप हमारा देश सहस्र पृष्ठका ' श्री सनातनधर्मालोक ' महाग्रंथ है । ( २ ) सनातनधर्मका साहित्य — सनातनधर्म के मुख्य ग्रन्थ वेद हैं । वेद संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषदोंका समुच्चय त करता है । फिर श्रायुर्वेद आदि उपवेद हैं । व्याकरण आदि वेद ह अ ंग होते हैं । वेदके सांख्य आदि उपांग हुआ करते हैं । इसीमें स धर्मशास्त्र, पुराण, इतिहास, दर्शन आदि अन्तभूत हो जाते हैं । स इस समस्त साहित्यसे सनातन धर्मकी व्याख्या हो जाती है । घ ( ३ ) वेद - वेद भगवान्का वाक्य है और अनादि है, इस कारण पौरुषेय है । ब्रह्माने अग्नि, वायु, सूर्य इन तीन देवताओं द्वारा ४ बेदको दुहा । कई सहस्र ऋषियोंने प्रलयके श्रवसान में समाधि 9 द्वारा भिन्न - भिन्न मन्त्र रूपले प्रकट किया । श्री वेदव्यासने उस एक ' सं वेदको यज्ञोपयुक्त चार भेदसे वेदका संकेत देख कर ही विभ छ किया । वेद के दो भाग हैं — एक मन्त्र - भाग, दूसरा ब्राह्मण भाग । मन्त्र भाग चार प्रकार का है — ऋक्, यजुः साम और तीनों का समुच्चय । ऋचाओं ( पद्यमय मन्त्रों ) का संग्रह ऋग्वेद है । प्रायः यजुनों ' गद्य मय मन्त्रों ) का संग्रह यजुर्वेद है । प्राय: सामों ( गीतिमय मन्त्रों ) का कौ संग्रह सामवेद है । पंद्य ), यजुः ( गद्य ), साम ( गीति ) तीन नीय ' प्रकारके मन्त्रोंका संग्रह ' अथर्ववेद है । वेद ' जैसे - वेद ऋग्वेदादिसे पृथक् ग्रन्थरूपसे कोई नहीं मिलता; बैं • मिल ही वेद आदि भी संहिता एवं ब्राह्मणोंसे पृथक नहीं मिलते, उसमें ऋग्वेदकी संहिताए २१ हैं, यजुर्वेद की १०१ हैं, सामवेद, १००० एक सहस्र हैं, और अथर्ववेद की संहिताएं हैं । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative