श्रीगणेशाय नमः।
सनातन धर्मालोक ४
4 Shri Sanatan Dharmalok By Devanath Sharma Shstri Saraswat 1954 New Delhi - Shri Narayana Sharma Shastri · 282 पृष्ठ · 29 खण्ड
In English
Shri Sanatan Dharmalok
This is the fourth volume of an encyclopedia titled Shri Sanatan Dharmalok, written by Devanath Sharma Shastri Saraswat. The work covers major topics of Sanatan Dharma and is presented in both Sanskrit and Hindi.
This book answers
- What are the main subjects of sanatan dharma?
- Who wrote the shri sanatan dharmalok encyclopedia?
- Is shri sanatan dharmalok available in hindi and sanskrit?
- What is the purpose of the shri sanatan dharmalok series?
विषय सूची
- CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative CC - 0. Ankur Joshi… 1–10
- [ घ ] सम्प्रदाय वा समाज भी हैं, जो कि उसके धार्मिक सिद्धान्तों पर उपहास वा श्राक्षेप करके उससे अपना वह धर्म छुड़वाना चाहते " अपनी संस्कृत भाषाका ज्ञान न… 11–20
- 8 श्रीसनातनधर्मालिकि: ( ४ ) यह हम पहले ही कह चुके हैं कि ऋग्वेदादि संहिता श्रादिसे ' अलग नहीं मिलते… 21–30
- २४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ )... सनातन धर्मके सिद्धांतोंका संप २१ श्रात्महत्या कर ली है, उसकी यदि प्रोत कृत्य श्रादिसे सद्गति न कराई जाए, तो अन्य जन्ममें… 31–40
- ४४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) यह ब्राह्मकल्प है, ब्रह्माक्रा एक दिन है । ब्रह्माकी श्रायु २१ वर्ष के बार इस प्रथम दिनमें श्राज २०१० विक्रम संवत् १०५४… 41–50
- I ६४ श्रीसनातन धर्मालोकः ( ४ ) से सिद्ध हुआ कि - ' सत्यां हि श्राकांक्षायाम् श्रसन्निधानमपि सम्बन्ध-वि कारणं भवति '… 51–60
- ८४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) प्र ० = समु ०, १४० पृ ० ), ' द्विज विद्वानोंका नाम श्रार्य और मूर्खो नाम शुद्ध और अनार्य नाम हुआ… 61–70
- श्रीसनातनधर्मालाकः जनगणना ( मदुमशुमारी ) के समय सभी इस जाति वालोंको ' हिन्दु ' यहाँ नाम लिखाना चाहिए | श्रार्यसमाजी तो ' हिन्दु ' शब्दको सनातन-धर्मियोंमें… 71–80
- १२४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) र किया ऋगादि क्रम क्यों नहीं? ना चाहि' सं ( ३ ) फिर प्रश्न यह है कि यहाँ पर ऋगादि क्रमसे मन्त्र ' क्यों नहीं याह दिये गये? इस… 81–90
- Pyy श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ' रेवती ) ६ ' श्राख्याविक ', पृष्ठ ३६१ में स्वामीजीने इसी सूत्र के ' ऋषि ' शब्दके लिए ' लिखा है- ' ऋषिवंद. '… 91–100
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) १६४ है । ' छन्द ' का एक शब्द ' निष्टक्य ' है, जिसे श्रीपाणिनिने छान्दस ३ । १ । १२३ सूत्रमें सिद्ध किया है… 101–110
- १८४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ). - इस सा मनुष्यकृत? ( उ ० ) मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष, जलजन्तु श्रादि जातियां परमेश्वरकृत हैं… 111–120
- २०४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ज्ञानहीन श्रीर लोभी होगा; तो वह न केवल अपना प्रत्युत सम्पूर्ण समाजका अनिष्ट करेगा । अब मुखको देखिये… 121–130
- २२४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) हम तो ब्राह्मण या क्षत्रिय बननेमें लगे थे- हमें शिल्प और वाणिज्यकी उसे दि क्या पंड़ी? सचमुच, कर्मसे वर्ण मानने पर उनका कोई भी… 131–140
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) २४४ निकाल ऐसा है, तो हमसे उद्धृत, मनुजीके उत्तरपक्षका पोषक श्लोक हायको दे प्रक्षिप्त जब वा परिवर्तित कैसे हो सकता है? उसके ( 5 )… 141–150
- २६४ श्रीसनातनधर्मालोक; ( ४ ) बहुश्रुतम् । श्राततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन् ' ( ८३५० ) इस दंत कुछ विरोध दिखलाकर ' न जातु ब्राह्मयां हन्यात्… 151–160
- २५० श्रीसनातनधर्मालोकः ( x ) इस जन्म में नहीं; अथवा निन्दार्थवादमात्र है । ' जातिपरिवृत्ति ' ) वह. ' जम्मपरिवर्तन ' है; इसका अर्थ स्वा. द. जीने अपनी '… 161–170
- ३०० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) खसे बाह मण्डूकीगर्भसम्भवः । बहवोम्येपि विप्रत्वं प्राप्ता: ये. पूर्वबद् द्विजाः ’ न सरध ( १४ ) यहां पर ' कथ्यमानाः, उच्यते '… 171–180
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ३२० ' ब्राह्मण्यं देवि! दुष्प्रापं निसर्गाद् ब्राह्मणः शुभे! क्षत्रियो वैश्य-शुद्धौ वा निसर्गादिति मे मतिः ' ( १४३… 181–190
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ३४० ३३८ जड नहीं है, किन्तु सर्वव्यापक और चेतन है, तब तो देव-म श्रय परमात्मा अधिष्ठाता भी वही है… 191–200
- श्रीसनातनधर्मालीकः ( ४ ) ३६० क्योंकि भस्म हुआ शरीर फिर नहीं लौटेगा ' । क्या प्रश्नकर्ता उनको यह युक्ति मानकर स्वकर्मीका भी त्याग कर देंगे? तब जो कि… 201–210
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ३८२ श्रीशङ्कराचार्यका ' परा पूजा ' स्तोत्र कह रहा है । पर इस चज्ञाना पद | स्वामी भी प्रसङ्ग तब श्रा उपस्थित होता है, जब हम इस… 211–220
- ४०१ ४०२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) 7 होता जानेपर सब स्थलों में एक साथ प्रकट हो जाया करता है, यही बात कर भी श्रवतारमें भी समझनी चाहिये… 221–230
- ४२२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) . परमेश्वरका कोई भी काम निष्प्रयोजन नहीं होता; तो क्या इतने असंख्य लोकोंमें मनुष्यादि सृष्टि न हो, तो सफल कभी हो सकता 1 है?… 231–240
- ४४१ श्रीसनातनधर्मालोकः ( 8 ) ४४२ द ये स्वयं । जे श्राचरहिं ते नर न घनेरे " इस गो ० तुल ० जीके कुशल कयनको बहुतेरे चरितार्थ नहीं किया? दयानन्द लगाया उणादि… 241–250
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ४६२ ४६१ करता है । उससे वह प्रार्थना करता है कि ' ॐ यां अग्निकी उपासना मेघां देवगणाः पितरश्चोपासते… 251–260
- ४८२ श्रीसनातनधर्मालोकः, ( ४ ) ' बिराहु ' का अर्थ है – ' विगतो राहुर्यस्मात् स विराहुः श्रर्क: - सूर्य, तस्य बाह्रोः - भुजात् ' अर्थात् सूर्य की राशिसे… 261–270
- ५०१ १०.२ श्री सनातनधर्मालोकः ( ४ ) नियत स्पृश्यास्पृश्यता सम्बन्ध शुरू हो जाता है । इस प्रकार अस्पृश्यता-विज्ञान समूलक सिद्ध हो गया |: चाहिये राके… 271–280
- CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative Collection 281–282