सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 231–240
सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 231–240
पृष्ठ 231
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४२२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) . परमेश्वरका कोई भी काम निष्प्रयोजन नहीं होता; तो क्या इतने असंख्य लोकोंमें मनुष्यादि सृष्टि न हो, तो सफल कभी हो सकता 1 है? इसलिए सर्वत्र मनुष्यादि हृष्टि है कुछ कुछ आकृतिमें भेद होना भी संभव हैं । वचन है जब अन्य लोकोंमें सृष्टि है; उनका कुछ श्राकृति - भेद भी स्वाभाविक सत्यार्थ. क्योंकि इस लोकके शरीरोंमें पृथिवीकी प्रधानता है, अस्य - लोकोंके E शरीरोंमें तेज, वायु, जल की प्रधानता है जैसा कि न्यायदर्शनके ३।१ । वाक्य ५६ सूत्रके वात्स्यायनभाष्यमें लिखा है " तन्त्र मानुषं शरीरं पार्थिवम्... श्राप्य - तैजसवायव्यानि लोकान्तर [ वरुण - सूर्य - वायुलोकेषु ] शरीराणि । यवाचक तस्वपि भूतसंयोगः पुरुषार्थतन्त्रः [ अर्थात् – एकभूतारब्धेन शरीरेण भोगी द - ग्रन्थ- ने संभवतीति तेष्वपि शरीरेषु भूतसंयोगः - भूतचतुष्टययोगः पुरुषार्थतन्त्रः-भोगाधीनो भवत्येव । जलादीनां प्राधान्यादेव जल्लीयत्वादि- व्यपदेशः ] स्याख्यानि [ घटादिः ] द्रव्यनिष्पत्तविपि [ भूतसंयोगो ] निःसंशयः [ श्रॆपॆच्यते ] * सप्रमा- श्री. नश्रवादि - संयोगमन्तरेण [ जलादिसंयोग विना ] केवलया मृदा [ घटादेः ] निष्पत्तिः [ ' उत्पत्तिः ] ” ' इति ] स्वादयानन्दजीसे मान्य प्रशस्तिपाद / माध्य " में भी इसी भांति कहा है! तब देवयोनि आदि मनुष्य से भिन्न कन्यकी सिद्ध हो गईं । पृथिवीलोकके, निवासी तो मनुष्य लोक देवता, चन्द्रलोकके निवासी पितर सिद्ध हुए । उनके हमसे उच्च श्र ेणी वाले होनेसे हॅमसेण्उनकी।श्रादान - प्रदान सेवन्ध ' तथा ' पूजा सम्बन्ध भी सिद्ध हो सकता है । FF ( GR ) -FIFE FE रावस्तु DE OF THE ESP DE भूगोल HIT स्वादयानन्दजीने प्रथम 5 " सत्यार्थप्रकाश में देवलोकादिको सुनाम माना है ।: कुछ उनके उद्धरण दिये जाते हैं --- ( प्रश्न ) स्वर्ग और नरक थिंबी प्रजाकें है । सा नहीं:?: ( उत्तर ) सब कुछ है, क्योंकि परमेश्वरसे रचे हुए असं ख्यात लोक हैं उनमेंसे जिन लोकोंमें सुख · अधिक हैं और दुःख थोड़ा; CC - 0. Ankur Joshi Collection ५ ) क्या विद्वान् मनुष्य ही देव हैं? ४२३ उनको स्वर्ग कहते हैं, जिन लोकोंमें दुःख अधिक है और सुख थोड़ा है उनको नरक कहते हैं । जिन लोकोंमें सुख और दुःख तुल्य हैं; उन ‘ मर्त्यलोक कहते हैं । इस प्रकार के स्वर्ग, अत्यं और नरकलोक बहुत हैं । ..इसी हेतुसे परमेश्वरने सब प्रकारके स्थान और पदार्थ रचे हैं कि पापी, पुण्यात्मा और मध्यस्थ जीवको यथावत् फल मिले ।..... फिर परमेश्वरके राज्यमें स्वर्ग नरक और मर्त्य - लोकादिकोंकी व्यवस्था कैसे न होगी? अर्थात् अवश्य होगी । ( पृष्ठ २६४ ) । नवम समुल्लास पृष्ठ २८४ में प्रथम सत्यार्थप्रकाशका निम्न उद्धरण भी द्रष्टव्य है " मनुष्य ही के शरीरमें पापपुण्य लगता है; अन्य शरीरमें " नहीं । जो यह मनुष्यादिका शरीर है, सब जीवोंके लिए है क्योंकि सबको प्राप्त होता है, वैसे ही सब कीट - पतंगादिकोंके शरीर भी हैं । जब मनुष्य शरीरमें जीव अधिक पाप करता है, और पुण्य थोड़ा, तब नर-कादिक लोक और पश्वादिकोंके शरीरको प्राप्त होता है । जब उसके पापपुण्य तुल्य होते हैं तब मनुष्यका शरीर प्राप्त होता है, और जब पुण्य अधिक करता है और पाप थोड़ा, तब देवलोक और देवादिकोंका शरीर उस जीवको मिलता है, उसमें जितना श्रधिकं पुण्य उसका फल जो सुख उसको भोगके जो पाप - पुण्य, रह जाते हैं, जब फिर मनुष्यका शरीर धारण करता है । ” यहां पर स्वामीजीने देवलोक, नरकलोक, मर्त्यलोक आदिका तथा देव - मनुष्यका भेद कहा है । * यह बात स्वामीजीके " प्रथम सत्यार्थप्रकाशमें होनेसे अमान्य है ' ऐसा भी नहीं; क्योंकि द्वितीयावृत्तिवाले " सत्यार्थप्रकाश " में भी इसकी पुष्टि मिलती हैं । पाठकगण देखें- " जैसे बिना किये कमौके सुख - दुःख मिलते हैं, तो थागे नरक ' स्वर्ग भी न होना चाहिये, क्योंकि जैसे परमे-श्वरने इस समय विना कर्मोंके सुख - दुःख दिया है, वैसे मरे पीछे भी Gujarat. An eGangotri Initiative.
पृष्ठ 232
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४२४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) जिसको चाहेगा उसको स्वर्गमें और जिसको चाहे नरकमें भेज देगा " ( नवम समु ० पृ ० १५६ ) यहां भी स्वर्ग - नरक मरे पीछे ( परलोकमें ) माने हैं । अन्य भी उनकां उद्धरण यह है- " जो साक्षी सत्य बोलता है, वह जन्मान्तर में उत्तम जन्म और लोकान्तरोंमें जन्मको प्राप्त होके सुख भोगता है ( स ० प्र ०६ समु ० १०३ पृष्ठ ) यहां स्वामीजीने लोकान्तर माने हैं । 40 न्यायाधीश श्रीगङ्गाप्रसादजी एम ० ए ० श्रार्यसमाजी - विचारों के विद्वान् हैं, उन्होंने ' वैदिकधर्म ' ( अप्रेल १६५० ) में लिखा था “ शतपथ - ब्राह्मणका “ विद्वांसो हि देवाः " एक प्रसिद्ध प्रमाण हैं, जिसके अनुसार विद्वान् मनुष्योंके लिये देवशब्दका प्रयोग माना जाता है । परन्तु जैसा स्वाध्यायशील सज्जनोंको अनुभव हुआ होगा, वेदमंन्त्रोंमें केवल मनुष्योंमें ही देवशब्दका प्रयोग सीमित रखकर और मनुष्येतर कोई देव-योनि न मानकर अर्थ करनेमें बहुधा कठिनाई पेड़ती है " यह बात न्या-याधीश महोदयकी ठीक है । ' विद्वांसो हि देवाः ' यह शतपथका प्रमाण श्राजकलके विद्वानों को देवयोनिके उड़ाने के लिए एक कीमिया मिल गया है, इससे वे विद्वान् - मनुष्यों को देवता कहकर देवयोनि से अपनी जान छुड़ा लेते हैं, यद्यपि ऐसे अर्थ में भी सब जगह उनकी जान नहीं छूटती । तथापि वैसा अर्थ " शतपथ " के अभिप्रायसे विरुद्ध है; यह हम निम्न पंक्तियों बताते हैं " श्रालोक " के स्वाध्यायशील पाठक में इधर अवहित होंगे । ( i ) इस विषय में पहले यह जानना चाहिये कि " शतपथ ब्राह्मण द्वष्टा देवता तथा मनुष्यों को भिन्न - भिन्न मानते हैं । यद्यपि इस विषय " केमें उसके बहुत उद्धरण दिये जा सकते हैं, कुछ गत निबन्धमें दिये भी हैं, पर यहां उतना स्थान नहीं है । श्रतः दिङ्मात्र उद्धरण दिये जाते हैं-CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या विद्वान् मनुष्य ही देव हैं? ४६५ ' प्रजापतिं वै भूतानि उपासीदन्, प्रजा वै भूतानि वि - ४२६ जीवाम- इति " यहां पर सब प्रजाओं का ब्रह्मकि पास । नो धेहि यया जाकर अपने जीवन- देव - स निर्वाहका उपाय पूछना कहा है । ततो देवा यज्ञोपवीतिनो जाए, जानु प्राच्य उपासीदन्, तान् श्रब्रवीद् यज्ञो वोऽन्नम् अमृतत्वं भूत्वा दविएं यौगिक ब. सूर्यो वी ज्योतिरिति ' " ( शत ० २४/२/१ ) यहां पर देवताओंका जीवन कहा है । ‘ अथैनं पितरः.. उपासीदन्, तान् श्रब्रवीद् - मासि मासि न्यायस वोऽशनं. स्त्रधा व:, मनोजवो वः ( २।४।२।२ ) पूर्व - कण्डिकामें देवताओं उनकी का अन्न यज्ञ कहा गया है, यहां पर पितरोंका प्रतिमास भोजन माना सम्भव है । ' अथ एनं मनुष्या.... उपासीदन् । तान् श्रब्रवीत् - सायं प्रातव फिर ऽशनम्, प्रजा वः, मृत्युर्वः " ( २४२३ ) यहां मनुष्योंका दो - बार भोजन ( देवोंक कहा है । । देवताओंको अमर कहा गया था, मनुष्योंकी यहां मृत्यु कहीं मनुष्य गई है । योनिर ‘ अथैनं पशव उपासीदन्, तेभ्यः स्वैषमेव चकार । यदैव यूयं कदा ज चलभाध्वँ, यदि काले, यदि श्रनाकाले अथैव अश्नाथ ” - ( २,४ | २ | ४ ) देवा यहां पर पशुओंका निर्वाह बताया है कि तुम्हें जब कभी मिल जायेगा, मनुष्य तुम उसे खा लिया करोगे । " थ एन शश्वदपि सुरा उपसेदुः वेश्यः वह तमश्च मायां च प्रददौ, अस्ति श्रव श्रासुरमाया । ता इमाः । उपजीवन्ति; यथैव श्राभ्यः प्रजापतिर्व्यदधात् ( २४/२/५ ) यहाँ पर सानू - ह 9 इवि सुरोको माया देना कहा है । फिर कहा गया है कि इन जीवोंके लिए जो - जो नियम बनाये गये, वे उनकी पूर्ण करते हैं, पर मनुष्योंके लिए क्योंकि कहा गया है कि — वे.थपने नियमोंको पूर्ण न करके उनका उल्लंघन भी नंदोर्ति कर जाते हैं “ नैव देवा श्रतिक्रामन्ति; न पितरः, न पशवः, ' मनुष्या एव काके एके श्रतिक्रामन्ति ( शत ० २।४।२।६ ) । श्रुतिम करनेसे शतपथकी इन क्रग्रिडकाओं में कितने स्पष्टरूपसे देव - मनुष्य आदिका आपसमें मेद दिखलाया है । यह लक्ष्य बात है कि मनुष्य सो Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 233
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ह ४२५ • ४२६ - श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) चेहि यपा देव - सदरा हो, कभी पशु - सदृश, वा कभी असुर - सदृश: हो जीवन-जाए, बा कहीं देव- शब्दका किसी. मनुष्यका विशेषण होनेसे दक्षि यौगिक अर्थ कर दिया जाए; पर इससे देवयोनिको मनुष्य - योनि-से स्वतन्त्र न मानना अशास्त्रीय ही है । यदि “ गोबलीवर्द ” सिमासि ज्यायसे मनुष्य जातिके ही विशेष देवता तथा श्रसुर मान लिये जांय, उनकी पृथक सत्ता न मानी जाय, तब उसी तरह मनुष्यमें पशुत्वके भी देवताओं सम्भव होनेसे मनुष्यका ही विशेष - भेद पशु मानना पड़ेगा, पंशुको भी न माना फिर स्वतन्त्र - योनि नहीं मानना पड़ेगा । यदि यह असह्य है, तब पूर्वपक्ष प्रात ( देवोंको मनुष्य विशेष मानना ) भी ठीक नहीं है । फलतः देवता तथा र भोजन मनुष्य भिन्न - भिन्न योनि हैं । तभी ' शतपथ ब्राह्मण ' में कहा है- ' ' देव-न्यु कही योनिरन्यो मनुष्ययोनिरन्यः ” ( ७ | ४ | २ | ४० ) । कदा:: जो कि स्वा ० दयानन्दजी तथा आजकलके विद्वान् " विद्वाँसो हि ४२/४ ) देवा " इस शतप्रथकी श्रुतिको उपस्थापित करके इससे विद्वान् जावेगा, मनुष्योंको देवता कहते हैं, यह या तो उनका छल है, या भ्रम है । यहां वह श्रर्थं विवक्षित नहीं । इसका पूर्वोत्तर पाठ उनके द्वारा जाने या अन-जास्तथैव साने प्रस्थित नहीं किया जाता । वह पाठ यह है- " उशिजो वन्हित-हां पर सान् - इति, विद्वाँसो हिन्देवाः, तस्माद् श्राह - उशिजो वन्हितमान् के लिए इति ” ( शतपथ ० ३।७।३।१० ) यहां पर ' हि ' शब्द हेतु अर्थ वाला है, के लिए क्योंकि उसका पूर्तिकर्त्ता " तस्मात् शब्द साथ दिया हुआ है, " यत्-घन भी तंदोर्नित्यः सम्बन्धः ” यह एक प्रसिद्धा न्याय है । सो जबकि उक्त करिड या एव लाके उपसंहारमें “ तस्मात् " ग्रह ' तद् ' शब्द है, । तब उसके साथ उक्त श्रुतिमें उससे पूर्व " यस्मात् " शब्द भीः श्रवश्य होना चाहिये । देखभाल करनेसे प्रतीत होता है कि वह शब्द यहां पर है । वह है " हि " शब्द । नादिका ' हि ' शब्द ' हितु " प्रथम प्रथमें प्रसिद्ध स्मारके अनुरोधसे " हि " भव्विं यहाँ " यतैः, यस्मात् ' इसे अथ इस ग्रंथ FERIE का Collection क्या विद्वान् मनुष्य ही देव है? ४२७ यस्मात ' में पंचमी है, तब " हि ” शब्दके हेतु - अर्थ वाला होनेसे पूर्वपक्षि-f याँले श्रभिमत देव् - विद्वत् शब्दको पर्यायवाचकता निरस्त हो गई । यहाँ यह अभिप्राय है कि उक्त ' शतपथ ' की श्रुति ' देवान् देवीविंशः ' आगुरुंशिजो बेन्हितमान् ' ( यजुः वा ० सं ० ६।७ ) इस मन्त्रके विवरण में है । उक्त यजुर्वेदके मन्त्रमें " देवान् " यह पदं " विशेष्य " है “ उशिजः ” यह पद " देव " शब्दकों विशेषण है । यहां पर ' उशिज् ' का अर्थ है ' बुद्धिमान् ' । निघण्टु ( ३।१५ ) में मेधावीके २४ नामोंमें १६ वां नाम ' उशिज ' है । यही अर्थ उवट - महीधरके भाष्य में भी है । स्वा ० दया-नन्दजीनें भी अपने ‘ निघण्टु वैदिक - कोप ' की शब्दानुक्रमणिकाके ३३ पृष्ठमे ' उशिजः मेघवि - नाम ' यह लिखा है । अव यह प्रश्न उपस्थित होता है कि उक्त ( ६७ ) यजुर्वेदकी कैस्डिकार्मे ' देवताओंका विशेषण उशिजः ( मेघाविनः ) क्यों है? इस विषयमें शतपथने उक्तकण्डिकाक विवरणमें कहा है ' विद्वा " सोहि देवा:, तस्माद् - ग्राह - उशिजी वन्हितमान् इति ' ( ३७ | ३ | १० ) श्रर्थात् हि चूंकि दिवाली विद्वांसः जाननेवाले [ जैसे कि निरुक्त ( कारण ) में प्रक्युनानि विद्वान् ' इस मन्त्रके ' ' विद्वान ' पदका ग्रंथ " प्रजानने " किया गया है ] होते हैं, सब कुछ जान जाते हैं ' तस्मात् = इसी कारण ऋषि - मन्त्र उन देवताओं को ' उशिजो चन्हितमान् इति नाह = ' उशिज: ' इस विशेषणसे युक्त करता है । का प्राम्टदेवताच्चांक सर्व ज्ञातृत्वमें निम्न प्रमाण द्रष्टव्य हैं जिनसे उनकी ' मी सूचित हो जीवों है— ' यन्मनुष्याणां परोक्षं तद् देवानां प्रत्यतम् ' ( ताण्ड्य महाब्राह्मण २२ | १० | ३ ) ' मनी देवा मनुष्यस्य श्राजा-dujarat. Anadigm ४६ " नं तिष्ठन्ति, न निमिषन्ति एते देवानां स्लर DHARA
पृष्ठ 234
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४२८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( 8 ) स्पश इद्द ये चरन्ति ' ( ऋ ) १०/१०१८ ) | जब इस प्रकार इन्द्र आदि देवता, परोक्ष भी जान जाते हैं कि - अमुक - पुरुष द्वारा हमें आहुति दी जा रही है, तब उन्हें ' उशिज: - बुद्धिमन्त ' कहना ठीक ही है । तभी तो देवता लोग उसी क्षण अर्थात् यज्ञमें देवताके ध्यान के समय - [ जैसे कि ' निरुक्त ' में कहा है- ' यस्यै देवतायै हविगृहीतं स्यात्, तां मनसा ध्यायेद् वषट्करिष्यन् ' ( ८।२२1११ ) ] यज्ञों में पहुँच जाते हैं । इसी कारण व्याकरण - महाभाष्य में भी कहा है- ' एक इन्द्रोऽनेकस्मिन् क्रतुशते आहूतो युगपत् सर्वत्र भवति ( १।२ ६४ ) । जब इस प्रकारकी बात है; तब देवता विद्वान् मनुष्यों से भिन्न सिद्ध हुए; क्योंकि — देवता तो परोक्षज्ञ होनेसे शतशः यज्ञोंमें बुलाये हुए युगपत् ( एकदम ) सब यज्ञोंमें प्राप्त हो जाते हैं, परन्तु विद्वान् - मनुष्य अल्पज्ञ एवं सीमित - गतिवाला होनेसे शतशः यज्ञोंमें बुलाया हुआ युगपत् ( एक - साथ ) सर्वत्र नहीं पहुँच सकता । इधर उक्त ' शतपथ ' -की कण्डिकामें ' विद्वांसः ' के साथ ' देवा ' शब्द है, ' मनुष्याः ' नहीं; तब उक्त श्रुतिमें विद्वान् मनुष्योंका ग्रहण हो ही कैसे सकता है? यहाँ पर ' मनुष्याः ' शब्दके. न कहनेसे विद्वान् पशुके ग्रहण में भी कोई बाधा नहीं पड़ती; तब क्या पूर्वपक्षिगण, विद्वान् ( समझदार ) पशुको भी देवता कहते हैं? यदि नहीं; तब विद्वान - मनुष्य भी ' देवयोनि ' नहीं माना जा सकता । धन्य त्रुटि वादियोंके पक्ष में यह श्रा पड़ती है कि उक्त यजुर्वेद के मन्त्रमें शतपथको उक्त कण्डिकाके वादिजनाभित्र त अर्थके अनुसार ' देव ' शब्दको विद्वान्का पर्यायवाचक मान लें, उसे योनिविशेष - वाचक् न मानें, तो ‘ उशिजः ’ यह विशेषण व्यर्थ जाता है, अथवा ' देवान् वह शब्द व्यर्थ होता है क्योंकि - जब उक्त ( ६७ ) मनुर्वेद के मन्त्रों CC - 0. Ankur Joshi Collection क्यां विद्वान् मनुष्य ही देव हैं? ४३० ' तुशिंज: ' यह विद्वानका ४६ वादियोंके ' वाचक है, वैसे ही ' देवा ' शब्दको अनुसार विद्वान् ' का वाचक मान लिया जाय विद्वान् एक शब्द व्यर्थ हो जाता है । अन्य इस पक्ष में यहं हानि, तुव इन दोष ठक्कको उक्त यो मन्त्र में ' देव ' शब्द भी विशेषण हो आती है कि- मन्त्रका शब्द भी विशेषण रहता है, विशेष्य उक्त जाता है, ' उशिज । विद्वान् नहीं रह जाता । इधर विद्वान् मनुष्योंके यजुर्वेदके, मन्त्रमें कोई भो लिया ज पास ' देवीविशः अर्थ भी नहीं घटता, क्योंकि देवी प्रजा भिन्न प्रागु ' यह विशेष्य मानुषी प्रजा भिन्न । जैसे कि ' देवीश्च विंशो हुआ करती है और १७८६ ) ' मानुषीणां विशां देवीनामुत ' ( अथर्व ० मानुपीश्च २०/११/२ ' ( यजु धन्यथा मृगैः सङ्गमनुव्रजन्ति, गावंश्च गोभिस्तुरगास्तुरङ्गः ) ' मृगा " तस्मात ' के अनुसार देवी प्रजाका देवताओंके पास ही जाना ठीक है । की भि निष्कर्ष यह है किं ' शतपथ ' के अनुसार देवता जन्मसे ही विद्वान् हुआ करते हैं, वे अविद्वान् नहीं हुआ करते । विद्वान् श्रविद्वान् दो होती प्रकारके मनुष्य होते हैं, परन्तु देवता विद्वान् तथा श्रविद्वान् इस तरह ११ दो प्रकारके नहीं होते, केवल विद्वान हो होते हैं । इस प्रकार ठक् उ ' ' शतपथ ' की श्रुतिमें ' देव ' शब्द ' ' विशेष्य ' है, ' विद्वान् ' यह उसका इस प्रक ‘ विशेषण ' हैं, उनकी श्रर्विद्वत्ताका व्यावर्तक है । जैसे भैंसा आदि पशु परस्पर-जन्मसे ही नदियोंमें तैरते हैं, पक्षी गण. जन्मसे ही बिना सिखलाये आकाशमें उड़ते हैं, वैसे देवयोनिकी प्राप्तिमें ही देवताओंको अणिमादि. पर्यायव गुरु - प्राइ सिद्धियाँ तथा विद्वत्ता, विना ही अध्ययन वा अभ्यासके प्राप्त हो जाते हैं, परन्तु मनुष्योंमें अध्ययन तथा अभ्यासके बाद होती हैं, देवताओंकी भांति जन्मसे नहीं । इसके अतिरिक्त उक्त शतपथकी कण्डिकामें है; ' विद्वांसः ' वहाँ पर विशेष्य नहीं है । ' विद्वांसः ' पद Gujarat. An eGangotri Initiative ही विद्वत्ता प्राप्त इस ' देव ' श ' ' देवा ' ही विशेष्य तो वहाँ विशेष्यभूत
पृष्ठ 235
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४३० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) देवोंका विधेय - विशेषण है, पर्यायवाचक नहीं । तब देवता तो स्वभावसे दको भी विद्वान ( ज्ञाता ) सिद्ध हुए, विद्वान् मनुष्यं देवता सिद्ध न क्योंकि इन दो उक्त करिडकामें ' विद्वांसः विशेष्य नहीं हैं । जिस यजुर्वेदके ( ६।७ ) - मन्त्रका शतपथोक्त उक्त विवरण है, वहाँ पर ( उस याजुष मन्त्रमें ). उशिज विद्वान् शब्दका कहीं गन्ध भी नहीं है, जिससे ' विद्वान ' ही विशेष्य मान कोई भी लिया जावे । वहाँ तो ' देव ' शब्द है, वही उक्त मन्त्र तथा उक्त ब्राह्मणमै गुः ' विशेष्य हैं, यह बात सूक्ष्म रूपसे जान लेनी चाहिये । इधर उक्त कण्डिका देव तथा विद्वान्की परस्पर - पर्यायवाचकता भी इष्ट नहीं है, अन्यथा वहाँ के हेत्वर्थक ‘ हिं ' शब्दका व्याकोप होता है, जिसका ' तस्मात् ' शब्द सहायक है । इससे ' शतपथ ' के मतमें देव एवं मनुष्य-की भिन्न - भिन्नता सिद्ध हो गई । ( क ) यदि ' शतपथ ' को देव एवं विद्वानको पर्यायवाचकता इष्ट • विद्वान होतो, तब फिर ' विद्वा सो से शतक्रतु देवाः, सन्नमृतन्वंत ( शतपथ ११ । ५ । ५।१२ ) यहाँ पर ‘ विद्वान् ' तथा ' देव ' शब्दकी पुत्तरुक्ति न होती । इस तरह ( ख ) उक्त यजुर्वेदके मन्त्रमें भी ' देवान् ' ( विदुषः ) उशिज्ञः विदुषः ) र उक्त इस प्रकार पुनरुक्ति न होती । ( ग ) ‘ यो देवस्य प्रियो विद्वान् ' ( बोधाय-उसका नौयगृह्यर्शेपसूत्र १।२२।१५ ) यहाँ पर ' देवस्य ' तथा ' विद्वान ' इनके दिपशु परस्परं - विभक्तिभेदसैं भी देव तथा विद्वान् मनुष्यकी भिन्नता स्पष्ट है । खलाये पर्यायर्याचकोंमें भला विभक्तिभेद कैसे हो सकता है? ( घ ) ' देव - द्विज-णिमादि गुरु - प्राज्ञ - पूजन ……..... तप उच्यते ' । ( भगवद्गीता १७ । ११ ), यहाँ पर हो जाते तो स्पष्ट हो ' देव ' शब्दसे विद्वान् वाचक ' प्राज्ञ p ' शब्द पृथक, रखा गया प्राप्त है । इसी कारण किसी भी निघण्टु वा कोष में पर्यायवाचकों विद्वानके ' देव ' शब्द नहीं पढ़ा गया | ' निरुक्त ' कार यास्कने भी कहीं ' ' देव ' का विशेष्य अर्थ ' विद्वान ' नहीं किया । " + Fa ष्यभूत CC - 0. Ankur Joshi क्या विद्वान् मनुष्य ही देव हैं? ४३१ ( ङ ) ' महाभारत ' आदिपर्वमें ' विश्व ' देवास्तथादित्या वसवोऽथा-श्विनावपि ' ( १।३१ ) इस प्रकार ' पहले देवताओं की उत्पत्ति कहकर‘उसके ’ बाद हो ‘ ततः प्रसुता विद्वांसः शिष्टा ब्रह्मर्षिसत्तमाः ' ( ११३५ ) यहाँ विद्वान् - ब्राह्मणोंकी उत्पत्ति ' कही गई है । इससे देवता विद्वान् मनुष्योंसे पृथक सिद्ध होते हैं । ( च ) ' देव ' शब्द यदि विद्वानका पर्यायवाचक होता, तो जैसे वैदिक - निघण्टु ( ३ ( १५ ) में विद्वानुके पर्यायवाचक ' कवि ( १० ) मनीषी ( ११ ) विपश्चित् ( १६ ) इत्यादि शब्द श्राये हैं, वैसे देव शब्द वा उसके पर्यायवाचक — “ ' अमृत ' ( निरु ० ८ २०११ ) आदि शब्द भी वहाँ होते । पर वहाँ न मिलनेसे पूर्वपक्षियोंका ' यह पक्ष विच्छिन्न होता है । 13 Collection Gujaren ( छ ) वादी लोग विद्वानको ही देवता तथा विद्वान्को ही ब्राह्मण मानते हैं । ऐसा होनेपर तो देवता तथा ब्राह्मणोंमें भेद न होना चाहिये । परन्तु ‘ सम्पूजयेद् देवान्, ब्राह्मणाश्च ( ) सन०- ७१२०१ ) देवरच ब्राह्मणाँश्च ’ ” ( शतर्पय ३।३४ २५ ) सम्पूज्य देवतामश्विनो गो, ब्राह्म-णाँश्च L ( चरकसंहिता कल्पस्थान Po ॥१२ ), यहापर देवता दे तथा ब्राह्मणाकी पृथक - पृथक पूजा कही है । यदि यहापर " " देवा " से " विद्वान् मनुष्य " लिये - जाय, तो ब्राह्मण ' ' अविद्वान हो जायेंगे " श्रन्यथा य " विद्वान् ' " के दो पर्यायवाचकों की पृथक - प्रहण व्यर्थ है । अविद्वान के भी ब्राह्मण हो जानेसे फिर वादि - सम्मत ' तुणकर्मणो वर्ण व्यवस्था खारडत हो जायगी । अथवा ' ब्राह्मण ' शब्दको विद्वाननयका: प पर्यायवाचकः माननेपर देव-शब्द विद्वान्का पर्यायवाचक न रहेगा, ' सेयमुभयतः पाशा: उज्जुः यह न्याय यहां उपस्थित हो जा 18 " DIA IS INSIG ... ( ज ) इस प्रकार देवतानां गुरोराज्ञः स्नातकाचार्ययोस्तथा नाकामेव:: कामतस्वायां बभ्रु णो द्वीक्षितस्य च ( सनु ०, ३१० ) P यहाँ परिगणित F His worst palm An eGangotri Initiative SIDHARA
पृष्ठ 236
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४३२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) आचार्य आदि सब विद्वान् दिखलाये गये हैं । यदि देवशब्दसे विद्वान्, मनुष्योंका बोध होता; तो प्राचार्य आदिका पृथक् कथन व्यर्थ था । तब ' देव ' शब्दका विद्वान् अर्थं निर्मूल हुआ । ( झ ) भगवद्गीतामें ' न मे विदुः सुरगणा प्रभवं न महर्षयः ' ( १०२ ) यहाँ ' सुर ' शब्द ' देव ' का पर्यायवाची है; ' विद्वान् - मनुष्य ' के श्रर्थ में कहीं ' सुर ' शब्द नहीं आया । यदि बलात् ऐसा अर्थ किया जावे; तो साथ कहे हुए ' महर्षि ' मूर्ख सिद्ध होंगे, अथवा उनका पृथक् - प्रहण व्यर्थ होगा । ( अ ) यदि देव और विद्वान् शब्द आपस में पर्यायवाचक होते, तो कोषों-में विद्वानों तथा देवांके वाचक शब्द पृथक - पृथक न होते, किन्तु एक ही स्थानमें होते । श्रमरकोषमें देवके पर्याय ' स्वर्ग वर्ग ' में हूँ और विद्वान्के पर्याय मनुष्यवर्गकै अवान्तरवर्ग ' ब्रह्मवर्ग ' में ही हैं । इस प्रकार कांपा में विद्वानुक वाचकोंमें ' देव ' शब्द कहीं नहीं पढ़ा गया, पर देवके वाचक शब्दांमें ' विबुध ' आदि कई विद्वानोंके नाम आते हैं- इससे स्पष्ट हुआ कि — देवयोनि वाले तो विद्वान् हुआ करते हैं, परन्तु विद्वान् - मनुष्य देवता नहीं हुआ करते । इस प्रकार समझ लेनेसे फिर ' विद्वाँ सो हि देवाः ' के अर्थ समझने में कोई भ्रम शेष नहीं रह जाता । ( टं ) यदि ' देव ' शब्द विद्वान्का पर्यायवाचक होता; तो पतञ्जलि, यास्क, पाणिनि आदि विद्वान् ' देव ' कहे जाते, मनुष्य नहीं । पर उन्हें कहीं भी देवता नहीं कहा गया । इस प्रकार ' विद्वा " सो हि देवा: ' इस प्रसिद्ध वादिसम्मत प्रभाणको समीक्षा हो गई 1 विष्णु देव हैं, उसके रामकृष्ण श्रादि मनुष्यावतार हैं? तब क्या वादियोंके अनुसार विष्णु भगवान् तो विद्वान होंगे, श्रीरामकृष्णादिं मनुष्य श्रविद्वान् होंगे? CC - 0. Ankur Joshi Collection ४३४ क्या विद्वान् मनुष्य ही देव हैं? ४३३ यह सुतरां यह वादियोंकी श्रयुक्त दुश्चेष्टा है । क्या वे ' शतपथ ' बता ' मनुष्य देव ' ( ४ | ३ | ४ ४ ) शब्दका ' मूर्ख विद्वान् ' श्रर्थं करेंगे प्रयुक्त जात ' देव ' शब्दका अर्थ ' विद्वान् मनुष्य ' ही है, तो क्या सृष्टिकर्ता? यदि S ने भी ' विद्वान् मनुष्य ' ही होगा, देव - विशेष नहीं? वस्तुतः ' देव ' महादेव ' ' इन्द्र जातिशब्द है, गुण - शब्द नहीं । श्रीदर्शनानन्दजीका प्रमाण ( २ ) इस प्रकार जब मूलवाक्यकी व्याख्या हो गई व्याख्याकारोंका भाव भी उससे भिन्न नहीं हो सकता हाँ, वा कैयट हों; वे भी ' देव ' शब्दको ' विद्वान् ' का मानते, किन्तु देवयोनिको पृथक् ही मानतें हैं । ' देवा: शब्द साथ कैय जात सिद्ध , तब कैयट श्रादि- मनु । महाभाष्यकार तह पर्यायवाचक नहीं का ' इस मूल पदका विवरण करते हुए कैयटने जो यह लिखा हैं कि - दिव्यदृशो देवाः ' तब याद ‘ दिव्यदृशः ' यह उसें ' देव ' पदकी व्याख्या या पर्यायवाचकता इष्ट होती, तो वह ' देवाः- दिव्यदृशः पण्डिता इत्यर्थः ' इस प्रकार लिखता, पर उसने ऐसा नहीं लिखा, किन्तु ' दिव्यदृशो देवा ( १ इति ' और ' दिव्यदृश: ' का विवरण ' पण्डिता इत्यर्थः ' ऐसा यह लिखा है । उसका श्राशय यह है कि देवता दिव्यदृष्टि वाले – दिव्य- यस नेत्र वाले, पण्डित - ( सद् - सद्विवेचनी बुद्धि: - पण्डा, तद्वन्तः ) श्रर्थात् सद् और असद्की विवेचना कर सकने वाली वुद्धिसे युक्त होते हैं; यजु इस कारण वे देवता लोग इस श्रर्थ - तत्वको नान लिया करते हैं । श्रा शतपथके वाक्यकी भांति यहां भी योजना है । यहां ' दिव्यदृशेः ' यह पर हेतु गर्भित- विशेषण है, ' देवा ' यह विशेष्य है । विशेषण- विशेष्य कभी पर्यायवाचक नहीं हुआ करते । ' द इच फलतः यहां कैय ± ने ‘ देवा एतज्ज्ञातुमर्हन्ति ' इसे मूलवाक्यकी सि-द्धिके लिए कि देवता इस अर्थतत्वको जाने जाते हैं, यहां पर ' दिव्यदृशः ' Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 237
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४३४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) यह उपपत्ति - गर्भित विशेषण दिया है, देवताका पर्यायवाचक नहीं बताया । श्रर्थात् - दिव्यदृष्टिवश इन्द्रादि देवता सब अर्थतत्वको जान " जाते हैं । जैसे कि महाभाष्य में इसका उदाहरण दिया है - ' एक इन्द्रो-ऽनेर्कास्मन् क्रतुशते श्राहूतो युगपत् सर्वत्र भवति ' ( १ | २ | ६४ ) यहां देव-इन्द्रके दिव्यदृष्टि वाले होनेसे ही सब यज्ञोंका एक - साथ ज्ञान तथा एक साथ सर्वत्र पहुँचना दिखलाया गया है । दिव्यहक्की ही. व्याख्या कैयटने ‘ पण्डिताः इत्यर्थः ' की है कि वह श्रर्थकी तह पर पहुँच जाते हैं । तब ' देवा ' ' एतज्ज्ञातुमर्हन्ति ' इस मूल- वाक्यको उपपत्ति सिद्ध हो गई । इस प्रकार कैपटको वादिगणकी भांति ' देव ' का विद्वान् मनुष्य ' यह अर्थ इष्ट नहीं, किन्तु ' देवयोनि वाले इन्द्रादि, अर्थको वह तक पहुंचने वाले होते हैं ' मह तात्पर्य इष्ट है । तब श्रीदर्शनानन्दजी का पक्ष इससे सिद्ध न हुआ । श्रीधर्मदेवजीका प्रमाण ( ३ ) इस प्रकार ' सत्यसंहिता वै देवाः, अनृतसंहिता वै मनुष्याः ' ( १।६ ) इस ऐतरेय ब्राह्मणके वाक्यकी व्याख्या भी हो गई । उसका यह श्राशय है कि - देवतां सत्य बोलने वाले होते हैं और मनुष्य भाषी | पर ' देव ' शब्द तथा ' सत्यसंहित ' शब्द यहां दिये हुए ' वैं ' शब्दसे पर्यायवाची नहीं हो जाते, नहीं तो ' आयुर्वे ' घृतम् ' ( कृष्ण-यजुर्वेद तै ० सं ० २ | शरा २ ) इस तैत्तिरीय संहिताके वाक्यमें ' वै ' शब्दसे श्रायु और घृत भी पर्यायवाचक हो जावें, पर ऐसा नहीं है । यहां पर ' देवा ' शब्द ' विशेष्य ' है ' सत्यसंहिताः " उसका विधेय - विशेषण महाराज सत्यहरिश्चन्द्र - जैसे सत्यवादी मनुष्य भी कहीं ' देवता ' नहीं माने गये । यदि सत्यवादी होनेसे वादी राजर्षि हरि-श्चन्द्रको ' देव ' मानें, तो वे श्रीयुधिष्ठिर को क्या मानेंगे? वे सत्यवादी CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या विद्व न् मनुष्य ही देव हैं? ४३५ थे और उन्होंने एक प्रसिद्ध असत्य भी बोला था । तो क्या वादी उन्हें देव मनुष्य का संकर मानेंगे? वास्तवमें असत्य बोलते हुए भी विष्णुश्रादि, देव हीं रहते हैं, सत्यवादी भी महाराज हरिश्चन्द्र श्रादि मनुष्य ही रहते हैं । क्या वादियोंके अनुसार ब्राह्मणके लिए प्रयुक्त ' मनुष्यदेव ' ( शत ० ४ | ३ | ४ ४ ) शब्द ' सत्य - असत्यत्रता ' इस श्रयं वाला होगा! यदि ऐसा नहीं, तब ब्राह्मण भी देवता सिद्ध न हुए, किन्तु मनुष्य ही । वहां पर देवत्व श्रारोपित है, ' मनुष्येषु देवा इव ' । फलन्रः देवयोनि वेदादिशास्त्रोंके अनुसार मनुष्ययोनिसे स्वतन्त्र ही है और मनुष्यसे उच्च ही है । जब देव मनुष्यसे उच्च सिद्ध हो गये, तो वे उपास्य भी हो गये, ' दिवि भवाः ' होनेसे दिव्य भी हो गये । मनुष्यसे उच्च वा दिव्य होनेसे ही देवता परमात्माके विशेष श्र बन जाते हैं । अङ्गीकी पूजा, बिना विशेष धङ्गके नहीं हुआ करती । श्रतएव दे - ता उपास्य रहेंगे ही । जब गुरु मनुष्य वा जीव होने पर भी उपास्य हैं, तो देवता क्यों उपास्य न हों? देवताओंकी उपास्यता वा दिव्यता केवल पुराणोंका मत नहीं है; जैसा कि बादी कहते हैं, किन्तु यह वेदका मत है । देवताओंकी उपासनासे सारा वेद सम्मृत है । वेद देवताओंके लिए स्वयं कहता है-" न मर्डिता विद्यते अन्य एभ्यो देवेषु मे श्रधि कामा श्रयसत ” ( ऋ o १०।६४।२ ) यहां पर वेदने देवताओंको सुखकारी माना है । अथर्व-वेदमें तो यहां तक कहा है- " यः श्रद्दधाति ' सन्ति देवा इति ' चूतुष्पदे द्विपदेऽस्य सृड ” ( शौ ०१२ / २८ ). इसका अर्थं धार्य-समाजी विद्वान् श्रीराजारामजी शास्त्रीने इस प्रकार किया है- ' जो विश्वास रखता है कि “ देवता हैं " इसके दोपाये और चौपाये के लिए jarat. An eGangotri दयावान mitiative हो ' । ' सर्वान् स देवान् तपसा पिपर्ति ' ( अथर्व ० ११/१२ )
पृष्ठ 238
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४३६ श्रीर्सनातनधर्मालोकः ( v ) ' यहाँ पर वेदने देवताओंकी तपस्या करनी सूचित की है । ' यजांम देवान् यदि शक्नवाम ' ( ऋ ० १।२७।१३ ) यहां पर वेदने सामर्थ्य होने पर देवताओंका पूजन माना है । ' एष ह वा अनद्धा - पुरुषो यो न देवान् वति ( अर्चति ), न पितृ न् ' ( शतपथ ० ६ | ३ | १ | २४, ऐत ० ब्रा ० द्वारा ) यहां पर देवपूजनं न करनेवाले पुरुषकी निन्दा की गई है । ' यज्ञे - यज्ञे स मयों देवान् सपर्यति ' ( ऋ ० १०।६३।२ ) यहां यज्ञमें देवपूजा बताई गई है और पूजकको ' दीर्घश्रुत्तम ' बताया गया है । ' देवान् वसिष्ठो अमृतान् ' ववन्दे ' ( ऋ ० १० / ६१।१२ ) यहां पर वेदने देवपूजनमें वसिष्ठका इतिहास भी दिखला दिया । यदि वादी उदारदृष्टि डालेंगे, तो उन्हें यज्ञं - होम भी देवपूजा दिखलाई पड़ेगी । इसी प्रकार वेंदमें पितृपूजा भी व्याप्त है । मृतककी आस्मा पितृलोकमें जाकर सूक्ष्म होनेसे अधिक शक्ति प्राप्त कर लेती है, अतः पितृपूजा भी श्रावश्यक हैं । आनन्दको मात्राले भी देवता - मनुष्योंमें भेद होता है जैसे कि शतपथमें ' अथ ये शतं मनुष्याणामानन्दः, स एकः पितृणां जितलोका-, नामानन्दः, ( १४।७।१।३३ ) यहां पर पितरोंका एक श्रानन्द मनुष्योंके सौ श्रानन्दोंके समान माना गया है । ' अथ ये शतं पितृणामानन्दः, स एकः कर्मदेवानामानन्दः ' ( ३४ ) यहां कर्मसे स्वर्ग में पहुँच कर देवता बने हुओंका एक श्रानन्द सौ पितरोंके आनंन्दुके समान माना गया है । 1 ‘ ये शतं कर्मदेवानामानन्दः, स एक श्राजानदेवानामानन्दः ' ( ३५ ) यहां जन्म - देवोंका एक श्रानन्द सौ कर्मदेवोंके श्रानन्दके समान माना CC - 0. Ankur Joshi Collection गया है ( ३६ ) ( ३७ ) ' ( ३८ ) ' क्या विद्वान् मनुष्य ही देव हैं? ४३७ । ' ये शतमाजानदेवानामानन्दाः स एको देवलोके ' अय ये शतं देवलोके श्रानन्दाः, स एको गन्धर्वलोक श्रानन्द ! ' | श्रानन्दः ये शतं गन्धर्वलोक आनन्दाः, स एकः प्रजापतिलो के आनन्दः | श्रथ ये शतं प्रजापतिलोके श्रानन्दाः, स एको ब्रह्मलोके श्रानन्दः । एष ब्रह्मलोकः सम्राट् ' ( शतः १४ | ७ | १ | ३३ ) इस प्रकार श्रानन्दुकी हिन्द मात्राके भेद्र होनेसे भी मनुष्य और देवता भिन्न - भिन्न सिद्ध होते हैं । ' ग्रहनक्षत्र श्राशा है कि श्रार्यसमाजके अनुयायीगण अपने वृद्ध तथा श्रृजुभवी वक्रानुवत्र विनश्यति महारथी श्रीगङ्गाप्रसादजी एम ० ए ० न्यायाधीशवे स्वाध्यायसे वाम वचनमें उठाकर स्वर्गलोक, पितृलोक आदि लोक - लोकान्ट तथा गन्धर्व आदि मनुष्यभिन्न योनियां मान लेंगे । इनके मान लेने पर फिर मूलको देवपूजा, पितृलोक, श्राद्ध, श्रादि भी अगत्या स्वयं मानने पड़ जायेंगे । २८ पद्य वीर्याणि इससे जहां वेदादि - शास्त्रोंके अर्थों में उन्हें कठिनता न पड़ेगी, वहां उन्हें कित्सित शास्त्रोंमें प्रक्षिप्तताका अकाण्ड - ताण्डव भी न करना पड़ेगा । इस पड़ती ह प्रकार देवताओंका अस्तित्व तथा देवपूजन जब वेद - सम्मत सिद्ध हो सिद्ध हुई गया, तोतदुपजीवकु सनातन - हिन्दुधर्मभी वैदिक सिद्ध होगया! भी है, मृत्युधू ( अथर्व ग्रहों वेदका उसके Gujarat. An eGangotri Initiative ग्रहों
पृष्ठ 239
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४३७ नवग्रहोंके वैदिक - मन्त्र ४३६ आनन्द ' श्रानन्दः धानन्दः ( १६ ) नवग्रहों के वैदिक मन्त्र. आनन्दः । हिन्दु धर्म में ग्रहों की पूजा श्रनादि काल से चली आ रही है । आनन्दको' ग्रहनक्षत्रचरितैर्वा जनपदा उपध्वस्यन्ते ' ( सूत्रस्थान ६ । २० ) ‘ यस्य होते हैं । वक्रानुवक्रंगा ग्रहा गर्हितस्थानगता पीडयन्ति जन्म [ विनश्यति ] ( सूत्र ० ३२।४ ) उपवेदरूप ' सुश्रुत संहिता ' के इस से लाम वचनमें ग्रहोंकी पीड़ा सूचित की गई है, तब उनकी शान्त्यर्थं , पिता, उनकी पूजा - प्रार्थना श्रादि स्वयम् अनिवार्य सिद्ध हुई । एतदादि मूलको लेकर श्रायुर्वेदको पुस्तक ' भैषज्यरत्नावली ' के आरम्भिक पर फिर २८ पद्यमें कहा है - ' ग्रहेषु प्रतिकूलेषु नानुकूलं हि भेषजम् | ते भेषजानां जायेंगे । बीर्षाणि हरन्ति बलवन्त्यपि । प्रतिकृत्य ग्रहान् श्रादौ पश्चात्कुर्याच्चि -हां उन्हें कित्सितम् ' इससे ग्रहोंकी प्रतिकूलतासे रोगीको दवाई भी प्रतिकूल पड़ती है — यह कहा गया है । तब उपवेद के मतमें भी ग्रहपूजा सिद्ध हो सिद्ध हुई । 7! केवल ग्रहपूजा - प्रार्थना उपवेद सम्मत ही नहीं; श्रपितु वेद- सम्मत भी है, तभी तो ' शं नो महाश्चान्द्रमसाः शमादित्यश्च राहुणा । शं मृत्युधूमकेतु: ( श्रथर्ववेदसं ० १६ | ६ | १० ) ' शं नो दिविचरा ग्रहाः ' ( अथर्व ० १६ || ७ ) इत्यादि वेदमन्त्रोंमें सूर्य - चन्द्रमा, राहु - केतु श्रादि ग्रहोंसे कल्याणकी प्रार्थना आई हैं । ग्रहोंके प्रभाव बताने वाला ज्यौतिष वेदका अङ्ग है, इससे स्पष्ट है कि वेदाङ्ग - ज्यौतिषसे प्रोक्त ग्रहपूजा भी उसके श्रृङ्गी वेदसे ही आई है । जब वेद ग्रहोंसे परिचित है; तब उन ग्रहोंके मन्त्र भी वेदमें होने चाहियें । ऋषियोंने ग्रहोंके मन्त्र वेदसे CC - 0. Ankur Joshi दुहे; जो कि ' कात्यायनी - शान्ति ' श्रादिमें प्रसिद्ध हैं, परन्तु श्राजके अर्वाचीन - मतानुयायी उन्हें माननेके लिए तैयार नहीं । वे उन पर उपहास वा श्राक्षेप करते हैं । हम उनके पूर्वपक्ष उपस्थित करके फिर उन पर अपने विचार रखेंगे । Collection Gujarat पूर्वपक्ष – ( १ ) देखो, ग्रहोंका चक्र कैसा चलाया है, जिसने विद्याद्दीन मनुष्योंको ग्रस लिया है । ' श्रकृष्णेन - सूर्यका मन्त्र १, इमं देवा– चन्द्रका २, अग्निमूर्धा - मङ्गलका ३, उद्बुध्यस्वाग्ने — बुधका ४, बृहस्पते श्रुति — बृहस्पतिका ×, शुक्रमन्धसः - शुक्रका ६, शन्नो देवी— शनिका ७, कयानश्चित्र – राहुका ८, केतु कृण्वन् – इसको केतुको कण्डिका कहते हैं... यह मन्त्र ग्रहोंके वाचक नहीं; श्रर्थं न जाननेसे भ्रम जाल में पड़े हैं ' ( स्वा ० द ० जी ' सत्यार्थप्रकाश ' ११ समु ० २१५ पृष्ठ में ) । पूर्व - ( २ ) ' वेदार्थ और वेदपाठमें कितना अन्तर है, उसके लिए केवल यह एक उदाहरण पर्याप्त होना चाहिये कि - आज घर - घर नवग्रहको पूजामें शनिके लिए ' शंनो देवीरभिष्टये ' मन्त्र पढ़ा जाता है, इसमें कहीं शनिका पता नहीं है । ' शंनो ' का अर्थ है- ' हमारा कल्याण ', परन्तु ‘ शनि ' से कुछ - कुछ स्वन मिलता है, इसलिए इसे शनिका मन्त्र मान लिया गया. है ( वा ० सम्पूर्णानन्दजी ' ब्राह्मण, सावधान ' निबन्ध पृ ० ४ में ) । पूर्व— ( ३ ) ' स्वा ० दयानन्दजीके प्रचार कार्यसे पूर्व भारतमें वेद-रूपी सूर्यको पुराणरूपी बादलोंने ढंक दिया था । नाम तो बेदाँका तथ भी लिया जाना था, मन्त्र भी वेद के ही बोले जाते थे, पर: उच्चारण-मात्र । ' शंनो देवी, उद्बुध्यस्वाग्ने, केतु कृण्वत्र केतवे ' इत्यादि मन्त्रोंमें . An eGangotri Initiative
पृष्ठ 240
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४४० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) शब्द - सादृश्यको लेकर शनि, बुध और केतुकी पूजामें वे मन्त्र प्रयुक्त होने लगे, ऐसी भारतकी दीन - हीन दशामें उत्पन्न होकर स्वामीजीने पाषण्डखण्डिनी पताका खड़ी की ' । श्री पं ० चूड़ामणिजी शास्त्री शाण्डिल्य ' मेरो स्वा ० द ० के प्रति भावना ' लेख ' सार्वदेशिक ' दिसम्बर १६४८ में ) । उत्तरपक्ष - इन सब आतेताओंने शनैश्वरके मन्त्रको विशेष - आक्षेप्य माना है । यह बात सभीने एकस्वरसे कही है कि शब्द - सादृश्यसे इन मन्त्रोंकी ग्रहपरक लगाया गया है; पर मेरा विचार है कि यह बात स्वा ० दयानन्दजी आदिमें तो घट सकती है; जिन्होंने ' तरुतारं ' ( ऋ ० * १।११।१० ) मन्त्रमें तारं ' देखकर ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में ' ताराख्यं यन्त्र ' अर्थ ' कर डाला । सनातनधर्मियों में ऐसी बात नहीं हैं, ' वे उसमें कोई - न - कोई मूल वा गुण देखकर तब हो वैसा अर्थ कहते हैं । स्वनमात्रको लेकर उस - उसका मन्त्र बता देना विद्वान्का काम नहीं होता; उक्त ग्रहमन्त्रोंको बताने वाले ऋषि - मुनि विद्वान् ही थे, उनकी बात असत्य वा श्रृंज्ञतामूलक नहीं हो सकती । वेद ' यं वै सूर्य स्वर्भानु-स्तमसाविध्यदासुरः ' ( ऋ ० २४० ६ ) इस मन्त्रमें सुरंवंशीय राहुसे सूर्यका ग्रहण होना मानते हैं । यहां ' स्वर्भानु ' से राहु इष्ट है, जैसे कि अमरकोषमें ' तमस्तु राहुः स्वर्भानुः ' ( १।३।२६ ) । यदि इस पर विश्वास न हो तो प्रतिवादिगण अपने नेता स्वा ० द ० जीके ' उणादि-- कोष ' को ३।३२ सूत्रको व्याख्यामें ' स्वर्भानू - राहुः ' यह शब्द देखें । जब ब्रैद्रको मी ‘ शम् आदित्यश्च राहुणा ' ( ' अथर्व १६। 11० ) में राहु-. ग्रह इष्ट है; तो ग्रहोंका चक्र कल्पित कैसे हुआ? स्वा ० दयानन्दजीने ‘ उणादिकोष ’ ( १।३ ) में ‘ राहु: -महविशेषः ” यह स्वीकार किया है । इस प्रकार वेदको ' धूमकेतु ' का भी जब पता है; तो केतु, शनि, CC - 0. Ankur Joshi Collection नवग्रहोंके वैदिक मन्त्र ४४१ बुध - धादिका पता न हो -- यह असम्भव बात है । स्वा ० दयानन्द ४४२ ' सत्यार्थप्रकाश ' प्रथम समुल्लास में इन नौ ग्रहांका 1 नाम मान गये स्वयं केवल उनका अर्थ उन्होंने परमात्मपरक लगा दिया । इस प्रकार रतो हैं । कुशल बहुत च दयानन्द कयनको श्रार्यसमाज ' आदि पदों का भी व्युत्पत्तिके बल से परमात्मा धर्य लगाया जा सकता है; तब क्या प्रतिवादी इनका अभाव मान लेंगे? ' उणादि- श्रादेश कोष ' ( १1७४ ) में स्वा॰दु ० जीने स्वयं ' केतुः ग्रहः, पताका वा धूमकेतु होते हैं कि रुत्पातः ' यह लिखा है, फिर स्वा ० दयानन्दजीसे भावित लोग हम पर पर उनका कैसी शङ्का करते हैं, और पुराणों पर उपालम्भ कैसे देते हैं! वेद समाज जब ग्रहोंसे परिचित हैं, तो उसमें उन ग्रहोंके मन्त्र भी अनिवार्य ही की भूमिका हैं । यदि ऊपरके मन्त्र श्रापको पसन्द नहीं, तो कोई और मन्त्र मानने जो विनियो ही पढ़ेंगे । श्रार्यसमाजके श्रीब्रह्ममुनिजीने अपने ' वैदिक ज्योतिष - शास्त्र ' कुछ प्रकाश . में शनि - बुध आदिके कई मन्त्र दिखलाये ही तो हैं! ही किये ज नहीं घटता जब प्रतिवादियों का भी सिद्धान्त है कि वेदमन्त्रोंके श्राध्यात्मिक, विनियोग ह लाधिभौतिक एवम् श्राधिदैविक अर्थ भी हुआ करते हैं, फिर वे किस किये जा स मुख़से कहते हैं कि ' शं नो देवी ' मन्त्रमें ' शनैश्चर ' महका अर्थ नहीं? | पुनरुक्ति हो सुदेवो असि वरुण! यस्य ते सप्त सिन्धवः ' ( ऋ ०८१६६।१२ ) यहां । ( न्याय ० २ पर ' सात नदियां ' यह स्पष्ट अर्थ होते हुए भी इस मन्त्रका व्याकरण- ऐसा न मा परक अर्थ लगाने वाले महाभाष्यकारको वे कुछ नहीं कहते । ' द्वादश प्रधयः चक्रमेकः ' ( ऋ ० १।१६४ । ४८ ) इस ' संवत्सरात्मा कालः ' देवता- तब उ वाले ( जिसे स्वा ० जीने अपने चेदभाष्य में स्वयं लिखा है, जिसका करनी पड़त ' निरुक्ककार ( ४ | २७ | १ ) ने भी संवत्सर अर्थ किया है ) मन्त्रका ' हवाई- ब्रह्मदत्तजी जहाज ' यह कल्पित चर्थ करनेवाले स्वा ० द ० जीकी भी आप लोग डॉट टीकाकार ‘ उपट ' नहीं करते, पर ‘ शं नो देवी ' का शनैश्चर अर्थ ' ' करने वाले संना- उति प्रतिि तनधर्मियोंको श्राप फटकारते हैं - यह कैसा न्याय है? स्वा ० द ० वशाद् अन नन्दजीने तथा उनके अनुयायी आप लोगोंने भी क्या यही " पर उपदेश- मस्ति .: धरवः साध Gujarat. An eGangotri Initiative