सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 221–230

सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 221–230

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४०१ ४०२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) 7 होता जानेपर सब स्थलों में एक साथ प्रकट हो जाया करता है, यही बात कर भी श्रवतारमें भी समझनी चाहिये । ' वेदान्तदर्शन ' का भाष्य करते हुए श्राचार्य श्रीशङ्करस्वामीने भी १।२।२३ सूत्रके भाष्यावसरमें करही कहा है - ' श्रुतिस्मृत्योश्च ‘ त्रैलोक्य शरीरस्य प्रजापतेर्जन्मादि निर्दिश्यमान-जोकि मुपलभामहे — ' हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे ' ( ऋ ० १० १२१।१ ) इति, समवर्तत - श्रजायत इत्यर्थः । स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते ' यहांपर श्राचार्यने वेदानुसार परमात्माका अवतारग्रहण माना है । कई लोग कहते हैं कि ' परमात्माके अवतारकी क्या श्रावश्यकता कर्मक है? क्या कंस - रावणादिमें व्यापक होता हुआ वह वहीं उसका मर्म है; पर काटकर उन्हें नष्ट नहीं कर सकता? ' इसपर जानना चाहिये कि जैसे वतन्त्रता गायक स्वास्थ्यार्थ माखनको आवश्यकता श्रा पढ़े; तो उसके लिए दिव्य ' गायके अपने सर्वशरीरमेव्यापक दूधका सूक्ष्म माखन उपयोगी नहीं होता । यमानो उसी गायका पृथक् साकार माखन अपेक्षित होता है; वैसे ही कंस बहुत से श्रादिके नाशार्थं परमात्मा के पृथक् प्रकट होनेकी श्रावश्यकता पड़तीही है; शेषकर तभी लोगोंको पापका फल स्पष्ट प्रतीत होता है; पाप न करने तथा पुण्य करने की शिक्षा मिलती है, भक्तोंका मनोरथ भी पूर्ण हो जाता है + अवतार ' केवल कंस- रावणादिको मारनेकेलिए उसका अवतार नहीं होता, श्रस्तु जैसाकि थाक्षेप किया जाता है । इसलिए श्रीमद्भागवत ' में कहा • गया है— मर्त्यवतारविह मर्त्य - शिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः कुतोन्यथा स्याद् रमतः स्व श्रात्मनि, सीता - कृतानि व्यसनानीश्वरस्य । ” ( ५ | ११ | ५ ) त अर्थात् परमात्माका मनुष्यावतार मनुष्योंकी शिक्षार्थ हुआ करता है; केवल राक्षसोंके मारनेके लिए नहीं । अन्यथा अपनी आत्मामें रमण बुलाया CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रवतारवाद - रहस्य ४०३ करने वाले भगवान्‌को सीताके वियोगसे भला दुःख क्यों हो! वह विलाप क्यों करे? यह मनुष्योंके शिक्षार्थ ही होता है । श्रग्निरूपमें अवतीर्ण होकर वही तपाता है, मेघ रूप में अवतीर्ण होकर वर्षा करता है, श्रनरूपमें अवतीर्ण होकर हमें पुष्ट करता है, मृत्यु - रूपमें अवतीर्ण होकर हमें मारता है । इस प्रकार वही परमात्मा धर्मको क्षीण होता हुआ देखकर जिस प्रकारसे धर्मकी रक्षा करना उचित समझता है; उसी प्रकारसे व्यक्त, श्रव्यक्त, देव, मनुष्य, पशु श्रादि शरोरोंको धारण कर धर्मकी रक्षा करता है, अपने स्वरूपमें भी तदवस्थ रहता है । जैसे श्राकाश घड़ेके अन्दर विद्यमान होकर घड़ेके श्राकारमें दिखाई देता है, घड़ेके लेजानेके साथ उसके श्रीकांशका भी जाना थाना दीखता है, वास्तवमें कूटस्थ श्राकाश-श्री ना नहीं रहा होता, घड़ेकी श्राकृति हट जानेपर वही घटाकाश अपने स्वरूपमें हो जाता है; घटरूप उपाधिके योगमें भी उस श्राकाशमें जैसे कोई विकार नहीं होता, वैसे परमात्मा के श्रववारके विषय में भी जान लेना चाहिये । जैसे गायके शरीरमें सर्वत्र व्यापक भी दूध उसके स्वनरूप केन्द्रके द्वारा प्रकट हो जाता है, वैसे ही सर्वव्यापक परमात्मा मूर्ति - रूप केन्द्रसे सूक्ष्म रूपसे प्रकट हो जाता है, अथवा विशिष्ट माता - पिताको वा विशिष्ट स्थल को द्वारीकृत करके भी श्रवतीर्ण. ( प्रकट ) हो जाता है । 1 परमात्माने वेद द्विजोंको दे दिया, द्विजोंने वेदोक धर्मका प्रचार भी भारतीय संसारमें कर दिया । परन्तु श्रव्य - काव्यका उतना प्रभाव जनतामें नहीं पड़ता, जितना दृश्वका । ' सत्यं वद ' ( तैत्तिरीय उपनिषद् १।११।१ ) इस प्रकार सत्य बोलनेकी श्राज्ञा वेदने दे दो, परन्तु श्रव्य - काव्यकी इस श्राज्ञाका साधारण जनतापर प्रभाव क्या Gujarat. An पड़ eGangotri सकता है Initiative ? जब यही बात दृश्य - काव्य ( अभिनय, नाटक ) द्वारा SIDLIADA

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४०४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) सत्य- हरिश्चन्द्र रूपमें दिखलायी जाय, तो उसका साधारण जनतापर खूब प्रभाव पड़ता है । तब जनता भी उसपर श्राचरण करनेके लिए उत्कण्ठित हो जाया करती है । परमात्माने भी यही किया । हमें केवल अपना श्रव्यकाव्य ( वेद ) ही नहीं सौंपा, अपितु उसका अभिनय करके भी हमें दिखलाया । वेद द्वारा परमात्माने हमें, ' अनुवतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमनाः ' ( शौ ० अथवं ० ३।३०।२।३ ) ' गोस्तु मात्रा न विद्यते ' ( वा ० यजु ० २३ | ४८ ) माता - पिताकी आज्ञाको पालन तथा गोम्पूजा आदि बतलाई । वही बातं परमात्माने राम - कृष्णादि - रूप में अवतीर्ण होकर हमें सिखलाई । यह मानव - शिक्षणही अवतारका उद्देश्य हुआ करता है — यह पहले · ' श्रीमद्भागवत ' के प्रमाणसे बताया ही जा चुका है । यही ' अवतारवाद का रहस्य ' है । CC - 0. Ankur Joshi Collection ४०६ सम्प्रत बतात मनुष्य ( १७ ) मनुष्ययोनि से देवयोनि की मित्रता योनि ब्राह्मण हिन्दुधर्मं सनातनधर्मके साहित्य - वेदादिशास्त्रोंमें मन्जुर मात्राये देव व्याप्त है; तब जो सनातनधर्मका प्रच्छन्न वा प्रकट विरोधी अर्वाचीन मनुष्य सम्प्रदाय उसपर प्रहार करना चाहता है; वह पहले इस पद - पुत्रा -भिन्न न तथा देव - पूजाको अवैदिक एवं पुराण - प्रोत कहकर उसे उड़ा देना चाहह्या तो हम है; पर जब वहीं बात वह स्वमान्य वेदमें भी पाता है; तब उसले वह देव अपनी जान छुड़ानेके लिए वह उन्हें मनुष्यभिन्न दिव्य 7: - योनि न मानकर इस नि मनुष्ययोनि ही सिद्धं करना चाहता है । उसमें हम पितृपूजा पर मे ( १ पछले लिख ही चुके हैं कि इस लोकले सरकर पितृलोक पहुँने हुए परदेवत पितर कहलाते हैं. उनकी पूजा श्राद्धादिसे करनी चाहिये इत्यादि । मयः तक अब श्रवशिष्ट देवपूजापर भी लिखना- श्रावश्यक है । रक्षाओं से और मन यह इस पूर्व कह चुके हैं कि -- देवता श्रङ्गीः परमात्मा विशेष । है । ( ग ) हैं । अङ्गीकी पूजा अङ्गके बिना हो ही नहीं सकती; और हम उन फोऽहं म देवताओंकी कृपासे ही जीवन प्राप्त कर रहे हैं, वह देवपूजा भी हिन्दु का भेद स धर्मका श्रावश्यक अङ्ग है । तभी भरावाचूने अपनी गीता में कहा है इन्द्रको द ‘ देवान् भावयतात्तेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रत्रः बनानेके दि परमवाप्स्यथ् ' ( ३।११. ) इइदात् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यश मित्र है श्र भाविताः । तैर्दुत्तान् श्रुप्रदायैभ्यो यो मुक्त स्वेत एव सः ४२३३११.३ | नहीं; श्रीर जैसे देवोंने हमें अपना काव्य बेद्र दिया है, अपनी नदी शहर ही है हमपर अनुग्रह करके अपनी वाणी देव ( संस्कृत ) भाषा भी ( २ ) य हमें दी है, यही कारण है कि संस्कृत - साहित्य में ' देवयोनिका पर्याप्त Gujara / An eGa न दाखता है । लेकिन श्राजके कई अर्वाचीन श्रार्यसमाज आरि

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४०६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) सम्प्रदाय देवयोनिकी सत्ताको छिपाते हुए उसे मनुष्ययोनि ATE | उनका यह अभिप्राय से श्रभिन्न मनुष्यही है कि - विद्वान् श्रथवा सत्यवक्ता देवता हुआ करते हैं, देवयोनि कोई मनुष्ययोनिसे योनि नहीं हैं । वे यहां प्रमाणस्वरूप स्वतन्त्र ता ब्राह्मणके वचनको ' विद्वाँसो हि देवाः ' इस शतपथ-देकर विद्वान् मनुष्यों को ही देवता तथा ' सत्यसंहिता वैं देवा श्रनृतं मनुष्याः ' इस ऐतरेय ब्राह्मणके वचनको मात्रा मनुष्यको ही देवता सिद्ध करनेकी देकर सत्यवक्ता अर्वाचीन भिन्न नहीं मानना चेष्टा करते हैं -- देवताओं को वे मनुष्य-तो हमारे चाहते । यदि उनकी यह धारणा सच्ची मानी जावे; ना चाहता प्राचीन साहित्यका अधिक श्रंश निकम्मा हो जाता हैं । वह देवमहिमा और देवता - उपासना व्यर्थ हो जाती इस निबन्धमें इसपर वेदादिशास्त्रोंका है, इस कारण मानकर अभिप्राय दिया जाता है । परी ( १ ) ( क ) ' विश्वे देवा अमर्त्याः ' ( यजुः वा ० सं पर देवताओंको मनुष्योंसे ० २१।१७ ) यहां इत्यादि । मर्त्यः तत्र ऊतिभि भिन्न बताया गया है । ( ख ) ' सुप्रावीरिन्द्र '! : ' ( अथर्व ० २०/२५ | १ ) ऐ इन्द्र! मनुष्य तेरी रहाओं से रक्षित होता है | यहाँपर इन्द्र श्रादि देवताओंको श्रौर मनुष्योंकी उपजीवक और इन्द्र- देवताको उपजीव्य विशेष | है | ( ग ) इसीलिए ही ' इन्द्र! श्रोजिष्ठ मनुष्योंसे भिन्न बतलाया इस वन छोऽहं मनुष्येषु! श्रोजिष्ठस्त्वं देवेषु असि, श्रोजि-भूयासम् ' ( यजु ० ८३६ ) यहां भी देवता और मनुष्यों-हिन्दु का भेद स्पष्ट है । यहां वक्ता अपनेको इन्द्रसे इन्द्रको देवताओं में बलवान् बताता अलग बताता है । वह है और अपनेको मनुष्योंमें बलवान् बनाने के लिए इन्द्रले प्रार्थना करता है । इससे स्पष्ट स्ते व मित्र है और मनुष्ययोनि है कि देवयोनि ३।१२.३ भिन्न, और इन्द्र कोई विशेषं देव है, मनुष्य, नहीं; और उससे वर भी मांगा जा सकता रहीं है । है । नापा भी ( २ ) यहाँ यह भी स्मर्तव्य है - जो वस्तु जिससे अभिन्नहोती है, श्रादि CC - 0. Ankur Joshi Collection मनुष्ययोनि से देवयोनिकी भिन्नता ४०७ अर्थात् बही होती है; वहां भिन्नता बताने वाले च ( और ) वा ( श्रथवा ) उत ( और ) आदि शब्द कभी नहीं हुआ करते । जैसे— ' स्वा ० दयानन्दजी श्रार्यसमाजियों और श्रार्यसमाजियोंके नेता थे ' । यह वाक्य नहीं बन सकता; क्योंकि — दोनों श्रार्यसमाजी शब्दोंका आपस में भेद न होनेसे उसमें भेद - प्रदर्शक ' और ' शब्द नहीं था सकता । ' वहां मनुष्य और मानुष इकट्ठे हुए ' यह वाक्य भी नहीं • बन सकता; क्योंकि — मनुष्य और मानुष शब्द श्रापसमें पर्याय-चाचक हैं, उनमें भेद कैसे हो सकता है? जब उनमें भेद नहीं; तो मेद - प्रदर्शक ' और ' शब्द भी वहां श्रा नहीं सकता; परन्तु वेद में देवता - मनुष्योंके बीच में ' और ' श्रर्य बताने वाले ' च, वा, उत ' श्रादि शब्द बहुधा श्रांते हैं उससे उनका भेद स्पष्ट हो जाता । उदाहरण-स्वरूप कई वेद - मन्त्र उपस्थापित किये जाते हैं । ' आलोक ' पाठक उन्हें सावधानतासे देखें--. ( क ) ‘ अमृतानाम् ( देवानाम् ) उत वा मर्त्यानाम् ' ( ऋ: १०१३३८ ) ( ख ) ‘ देवेषु उत मानुषेषु ' ( अथर्व ० ४।२८।५ ) ( ग ) ' देवानामुत यो मर्त्यानाम् ( ऋ ० ६।१५ / १३ ) ( घ ) ' यं देवा उत मर्त्यासः ' ( ऋ ० ८ | ४८ | १ ) ( ङ ): मानुषीणां विशां, दैवीनामुत ' ( अथर्व २० | ११ | २ ) ( च ) - ' देवानामुत मानुषाणाम् ' ( श्र ० ४ | ३० | ३ ) ( द्द ) ' यस्मिन् देवा इत्यादि मन्त्रोंमें ' अभिन्त में ' उत ' या वो वेद - आदि से स्वतन्त्र सत्ता ‘ देवो वा मानुषो प्रदर्शक ' वा शब्द श्रमृनत यस्मिन् मनुष्या उत ' ( अ ० १२।२।१७ ) उत ' शब्द देवता एवं मनुष्यों में भेद प्राहक है । शब्दका अन्तर नहीं हुआ करता, तब वादियोंको शास्त्र- छोड़ने पड़ेगे, अथवा देवयोनिको मनुष्ययोनि माननी पड़ेगी । ( ज ) तभी वाल्मीकि रामायण में वा त्वं ’ ( युद्धकाण्ड १२०/४३ ) यहां दोनोंका भेद-आया है. । Gujarat. An eGangotri Initiative SIDLEAD

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४० श्रीसनातनधर्मालांक: ( ४ ) ( ३ ) अब इस प्रकारके मन्त्र दिये जाते हैं; जिनमें देवता और मनुष्यों का भिन्न करने वाला ' च ' शब्द आता है । ( क ) ' यत्र देवाश्च मनुष्याश्च ' ( अथर्व ० १० ८ ३४ ) ( ख़ ) ' दैवीश्च विशो मानुषीश्च ' ( यजुः १७६६ ) ( ग ) ' तस्माद् ब्राह्मणा उभयीं वाचं वदन्ति, या देवानां या च मानुषाणाम् ' ( निरुक्त १३ | १ | १ ) ( घ ) देवाश्च मनुष्याश्च ' ( शतपथ २ | ३ | ४ | ४ ) ( ङ ) ' ये च देवा असुर! ' ये च मर्ताः ' ( ऋ ० २/१७/१० ) ( च ) ' देवस्य मर्त्यस्य च ' ( ऋ. २७१२ ) ( छ ) ' अन्तर्देवान् मर्त्यांश्च ' ( ऋ ००८ / २ / ४ ) ( ज ) तस्माद् ' ब्राह्मण उभे बाचौ वदति - दैवीं च मानुषीं च ' ( काठक सं ० १४/५ ) ( झ ) इसी प्रकार ' महाभारत ' में भी देव - मनुष्योंका भेदग्राहक ' च ', शब्द आया है - ' देवानां मानुषाणां च ' ( वनपर्व २०१।२१ ) -( ४ ) अब दूसरे शब्दोंके अन्तरसे भी देव - मनुष्योंकी पृथक्ता बताने वाले वेद - मन्त्र उपस्थित किये जाते हैं । पाठक देखें: - == ------( क ) पुनर्वै देवा श्रददुः, पुनर्मनुष्या श्रददु: ' ( श्र ० ५।१७ १० ) यहां देव मनुष्य दोनोंके मध्यमें दो बार दिया हुआ पुनः शब्द दोनोंका पृथक् दिखला रहा है । ( ख ) देवस्य वा मरुतो! मर्त्यस्य वा ईंजानस्य ' ( ०६/१८/२० ) यहांपर तथा ( ग ) यदि वाऽसि देवकृता यदि वा पुरुषः [ मनुष्यैः ] कृता ' ( श्र ० १११५/७ ) यहां पर भी ' वा ' शब्दसे दोनोंकी मित्रता स्पष्ट है । ( घ ) ' श्रग्निर्देवेषु राजति, श्रग्निर्मर्तेषु श्रावि-शन् ' ( ऋ ० ५२५४ ) इस मन्त्रमें देव और मनुष्योंके बीचमें दो बार कहा हुआ ' अग्नि ' शब्द दोनोंकी भिन्नता तात्पर्य - ग्राहक है । यदि यहाँ ' देव ' मनुष्यका नाम होता; तो धागे ' मतेंषु ' कहना व्यर्थ होता । ( ङ ) ' चक्षुर्देवानामुत मर्त्यानाम् इति उभयेषा हं एतद् दैव-मनुष्याणां चचुः ' ( शतपथ ६१२/३/२८ ) यहाँपर हांपुर ' ' उ उत ' शब्द त तथा ह ction मनुष्य योनि से देवयोनिकी भिन्नता ४१० ' उभय ' शब्द से दोनोंकी भिन्न - भिन्नता व्यक्त है । ( च ) ' इसी तरह सम्पच्या तुतुषुर्देवता अपि । विस्मयं परमं तस्य यज्ञस जग्मुः किस मानुष - योनयः ( शल्यपर्व ३८।१० ) इस महाभारतके पद्य में ' देवता अपि विस्मयं ' जिसका मानुषयोनयस्तु किमु ' ' इस प्रकार अर्थापत्ति द्वारा भिन्न भिन्न जग्मुः | यहां भी भी दोनोंना भेद सुस्पष्ट है । ( छ ) ' अव दैवैदेव - कृतमेनोऽवपद - क है; तब मर्त्यैर्मर्त्यकृतम् ' ( यजुः २०।१८ ) यहां भी भिन्नता स्पष्ट हैं । स्वा ० द ०३ ( ५ ) अब वेद ‘ न ' आदि शब्दोंसे देवता और मनुष्योंकी सिता नररूपेण दिखलाता है, पाठक उसपर भी ध्यान दें-( क ) ' नहि त्वा शूर! देवा न मर्तासो दिव्सन्त उत्तराचिँक २।२।२।३ ) – हे शूर इन्द्र! जब तुम न तुम्हें देवता रोक सकते हैं, न मनुष्य रोक सकते हैं । में व्यवधान करने वाला ' न ' शब्द दोनोंकी एकता काट श्रदेवः ' ' ' ' मर्त्यः ' ( ऋ ० १०/७० ( २६ ) । ७ ) यहांपर बनानेसे ( ग ) ‘ देवो न मर्त्यो ' ( ०१०।२२१४ ) यहां भेद सिंह ' ( सामवेदसं ( ६ ) देना चाहते प्रहख भी यहांपर बोले ( अथर्व ० रहा है । ( ख ) ' सर्वे ' कह मर्त्यको श्रदेव भिन्न यो सर्वेदा ' ( देवको श्रमल बतानेसे नज् दोनोंको भिन्न बता रहा है । ( घ ) ' नतु देवेष्वह स्थाठा नं भिन्न - भिन मनुष्येषु कर्हिचित् ( महाभारत उद्योगपर्व ३५२० ) विरोचन दैत्यके जीवित - म इस वाक्यमेँ दोनोँकी भिन्नता स्पष्ट है । ( ङ ) ' नहि देवी न मूल ( 5 ) ' देवा ( ऋसं ० १।१६।२ ) यहां दोनों में गृहीत ' न ' शब्द दोनोंकों मित्र मित्र हृदस्यैनस बता रहा है । ( च ) ‘ न ते वर्तास्ति राधस इन्द्र! देवी ने मत्यै: ( पेद्र, लिस २०/२७१४ ) हे इन्द्र, जिसे तू धन देना चाहता है, उसको निवारक न ( १२१६४ ) दे॒वता हो सकता है, न मनुष्य 1 । यहां भी हैं । ( ) मनुष्य - पि सिंत् तन्न त्वार्थौ अन्यो अस्तीन्द्र! ' देवो न मत्था व्यार्यान् ' ( ** ॥ २०।४ ). यहां इन्द्रको देव - मनुष्य से देव पूर्व, मनुष्यॉकी मैद सुस्पष्ट है ( ज ) ' न या अदेवतेने देव ( Gujan Gangotrip ) यहां श्रदेव और देवको अलग - अलग कहाँ है । ( क ) वय,

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ४१० ४ | इसी तरह ' नकिर्देवा वारयन्ते न मर्ताः ' ( ऋ ० ४।१७ १६ ) ( अ ) ' न वसुदेवा देवतां न मर्ताः शवसन्तमापुः ' ( ऋ ० १ । १००।१५ ) नुप - योनव ' जिसका देवता भी अन्त नहीं पा सके, मनुष्य भी अन्त नहीं पा सके ' वस्मयं जम्मू. यहाँ भी देव - मनुष्यका भेद प्रत्यक्ष है । ' मर्तः ' से मनुष्य मात्रका ग्रहण भिन्न नीवप कह है; तब ' श्रार्याभिविनय ' में इसका ' साधारण मनुष्य ' अर्थ करते हुए स्वा ० द ० जीका पक्ष निर्मूल सिद्ध हुआ । ( ८ ) ' महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति ' ( ७/८ ) मनुके इस पद्यसे भी देवता और नरोंका की सिला भेद सिद्ध हो रहा है । ( ६ ) अंब विज्ञ - पाठक बेदमें देवता और मनुष्यों का पृथक - पृथक् सामवेदसं ० प्रहण भी देखें – ( क देवाः, पितरो मनुष्या, गन्धर्वाप्सरसश्च ये ' ( अथर्व ० १०६६, ११७।२७ ) यहां पर ' उच्छिष्टाजज्ञिरे सर्वे ' यहां पर दोने ‘ सर्वे ' कहनेसे तथा पृथक - पृथक कहने से देव, पितर तथा मनुष्य भिन्न-भिन्न योनि सिद्ध होते हैं । ( ख ) ' यं देवाः, पितरो, मनुष्या उपजीवन्ति को चंदेव सर्वदा ' ( अ ० १०।६।३२ ) यहां पर भी देवता पितर तथा मनुष्य श्रमलं स्थावानं भिन्न - भिन्न कहनेसे भिन्न - भिन्न योनियां सिद्ध होती हैं, तब पितर चिन दैत्यके जीवित- मनुष्य, तथा देवता विद्वान - मनुष्योंसे भिन्न सिद्ध हो गये । न मलो ' ( 1 ) ' देवकृतस्यै नसोऽवयजनमसि, मनुष्यकृतस्यैनसोऽवयजनर्मास, पितृ-मित्र - मि हृतस्यैनसोवयजनमसि ( यजुः वा ० सं ० ८।१३ ) यहां भी तीनोंका ये ( श्रेय मेद्र विस्पष्ट है, । ( घ ) ' पितृ - देव - मनुष्याणां वेदश्चक्षुः सनातनम् ’ निर्वाक ( १२/६४ ) इस तथु । ' ऋषियज्ञ ' देवयज्ञ ', भूतयज्ञ ' च सर्वदा । नृयज्ञ ं, क ) ' सवः प्रियज्ञ च यथाशक्ति न हापयेत् ' ( ४।२१ ) इन मनुके, श्लोकोंमें भी ॥ मनुष्य- पितर देव ऋषि भिन्न - भिन्न योनि सिद्ध हो जाते हैं । यदि जैसे देव एवं देवता, ऋषि, पितर, नरः समानयोनि वाले हों तो पञ्च महायज्ञोंकी • पंच सुख्या नहीं घटती । ऋषिहृष्टि भी मानुषी सृष्टिसे भिन्न होती 17 तब इनके क व्यवहार भी एक जैसे नहीं, हो सकते । फिर जो कि 2.1 CC - 0. Ankur Joshi मनुष्य योनि से देवयोनिकी भिन्नता ४११ पुराणोंमें ऋषि तथा देवोंक्के श्राचरणको मानुषी दृष्टिकोणले जाँचा जाता है - यह शास्त्रानभिज्ञता है । ( ङ ) इसी कारण ' देवान्, मनुष्यान्नू, असुरान् उत ऋषीन् ' ( अथर्व ० ८ | १ | २४ ) ( च ) देवाँच, मनुष्याश्च, पशूंश्च, चयांसि च ' ( ' छान्दोग्य - उपनिषत् ' ७।२।१ ) ( छ ) ' देवा, मनुष्या, श्रसुराः, पितरः ' ( अ ० १०।१०।२६ ) ( ज ) ' तानि वा एतानि चत्वारि श्रम्भा सि, देवा, मनुष्याः, पितरोऽसुराः ' ( तैत्तिरीय ब्रा ० २ ( ३ ) इन स्थलों में देवता मनुष्यादिको भिन्न - भिन्न माना गया है । ( क ) इसी प्रकार ‘ देवत्वं साविका यान्ति, मनुष्यत्वं च राजसाः । तिर्यक वं तामसा नित्यमित्येषा त्रिविधा गतिः ' ( मनु ० १२।४० ) यहां पर दूसरे जन्म में देव, मनुष्य, पशु - पक्षी, ( ञ, ' नक्षत्राणि च दैत्याश्च प्रथमा सात्त्विकी गतिः ’ ( १२४८ ) यह दैत्य, ( ट ) ' यज्वान ऋषयो देवा द्वितीया सारि की गतिः ” ( मनु ० १२।४६ ) यहां ऋषि, ( ठ ) ' पितरश्चैव साध्याश्च ' ( १२।४६ ) यहां पितर जो किं भिन्न - योनि बताये गये हैं, यह सब पूर्वोक्त वेद - मन्त्रोंके अनुकूल है । ( ड ) स्वा ० द ० जीकी संस्कारविधि गृहाश्रमप्रकरण, पितृयज्ञ २२७ पृष्ठ में ' पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा-नमः ' पितरौको स्वधा - योग्यं और ' शालाकर्मविधि २३८ पृष्ठ में ' देवेभ्यः स्वाह्यभ्यः स्वाहा'यहां देवताओंको स्वाहा - योग्य बताकर देवता- पितरोंका भेद भी स्पष्ट कर दिया गया है । ( ७ ) अब ' आलोक ' के पाठकगण देवता और मनुष्योंके अन्य भेद भी देखें - ( क ) ' इन्द्राणीमासु नारिषु सुभगामहमश्रवम् । नह्यस्या अपरंचन जरसा मरते पतिः ( ऋ ० १० २६ | ११ ) यहां इन्द्रकी पत्नी इन्द्राणी के पति इन्द्रका बुढापैसे भी मरणाऽभाव सूचित करनेसे देव - मनुष्यों का भेद स्पष्ट है; क्यों कि मानुषियोंका पति तो बुढ़ापेसे Collection Gujarat. An eGangotri Initiative SIDLAE

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४१२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) मरही जाता है । देवताओं में तो ' देवा मृत्युमपाघ्नत ' ( ० ११ ॥ १६ ) एतदादि वेद - वचनोंके अनुसार धमरता हुधा करती है । इसलिए शतपथ ब्राह्मणमें कहा है— ' अमृता देवाः ' ( २ | १ | ३ | ४ ) पर मनुष्य अमर नहीं होते; तब देवताओं और मनुष्यों का भेद स्पष्ट हुआ । ( ख ) जो श्रीधर्मदेवजी सिद्धान्तालङ्कार आदि आर्यसमाजी विद्वान् मनुष्यों को मर्त्य होनेपर भी ' जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धाः कवीश्वराः । नास्ति येषां यशःकाये जरामरणजं भयम् ' इससे यश-द्वारा अमर बताकर मनुष्योंको देवताओंसे श्रभिन्न सिद्ध करनेका व्याज किया करते हैं, उनसे प्रष्टव्य है कि क्या यह आप लोगोंका वैदिक प्रमाण है? वस्तुतः यह कथन भी व्यर्थ है; क्योंकि श्रमर यश वाले कवियोंकेलिए भी ' श्रमर्त्य ' शब्द वा ' देव ' शब्द नहीं श्राता, किन्तु वे ' मनुष्य ' ही कहे जाते हैं । हां, मृत्युवश स्वर्ग जानेपर श्रमरता हुआ करती है । इसीलिए ' काठकगृह्यसूत्र ' में वर वधूको कहता है । ' मुनिपर्वते गिरौ हरितसंकाशे । संकल्परमणेऽमरौ उभौ समनसौ चरावः ' ( १२ ) इस मन्त्रके विवरणमें देवपालने लिखा है-' हे वधु! सुवर्णमये मेरौ संकल्पमात्रेण सर्वाभिलषित - सत्फलप्राप्ति-यंत्र, तत्र संकल्परमणे अमरण - धर्मको देवो भूत्वा उभावपि प्रसन्न-चित्तौ संचरिष्यावः पुरुषायुषे पूर्णे ' । तव मनुष्य और देवताके मृत्यु- अमरताके भेद होनेसे भी परस्पर भेद्र सिद्ध हुआ । जोकि श्रीब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु आदि श्रार्यसमाजी विद्वान् ' अग्ने! यज्ञपु मानुषः ' ( ऋ ० १ | ४४ | १० ) तथा १ | ८४ | २०, २ | १८ | १ आदि मन्त्रोंमें इन्द्र - अग्नि आदिको ' मनुष्य ' शब्दसे युक्त देखकर देव - मनुष्यों का श्रभेद बताना चाहते हैं यह भी ठीक नहीं । क्योंकि – उक्त स्थलों में ‘ मनुष्याणां हितः ' मनुष्येभ्यो हितः ' इत्यादि हो हैं । हित आदि अर्थमें यत् वा श्रण प्रत्यय है, श्रीखणाचार्यले उनके वैर्षा lection मनुष्ययोनिसे. देवयोनिकी भिन्नता ४१४ ही अर्थ किया है । ' तस्मै हितम् ' ग्रष्टा ४१३ ( १६७ ) ' हलो यमां यमि लोपः ' ( ० २/१/२ ) जिन्दसि क मनुष्य उन प्रयोगोंकी सिद्धि होती है है ॥ तब वादियों ६ के ४ ६४ ) इत्यादि सूत्रों ( ऋ यह व्याज निर्मूल तथा से देवता तथा मनुष्योंकी भिन्नता स्पष्ट है । ( ८ ) ' मनुष्यजातिः- होने दिया पशून उद्दिश्य श्रेयसी, देवान् ऋषींश्च अधिकृत्य न ' ( ४ | ३३ इन दर्शन - व्यासभाष्यके इस स्थलमें देवता और ) योग-भिन्न - भिन्न योनि मानी गईं हैं । ( 8 ) ' सर्वे मनुष्य दिवि एवं ऋषियोंकी ग्रहांप देवा दिविश्रितः ( अथर्व ० ११।७।२७ ) यहां देवताओंका निवास च लोकमें माना गया ( है, मनुष्य द्युलोकमें नहीं रहते । इसीलिए निरुक्तमें, ' घु, स्थानो देवाना देवगणः ’ ' ( १२।४१।१ ) यह कहा है 1 । इसी कारण शास्त्रोंमें देवताओं स्वर्गल को ‘ दिवौकस. ' कहा जाता है । ' दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः ' पृथिवी ( ० १०।१६०।३ ) इस मन्त्रमें द्युलोकको पृथिवी- लोकसे भिन्न माना में भी गया है; तब पृथिवी निवासी मनुष्य द्युलोकनिवासी देवताओंसे भिन्न श्रुति उ सिद्ध हुए । ( १० ) ' न.वै. देवा प्रश्नन्ति ' ( छान्दोग्य उपनिषद् ३।६।१ ) दोन यहां देवताओंका भोजन करना नहीं माना है; पर मनुष्य तो भोजन देवतार्थ करते हैं; तब भी इनका परस्पर - भेद सिद्ध हो गया । ( ११ ) ' न वै किया ज देवाः । स्वपन्ति ' ( शत ० ३।२।२।२२ ) यहांपुर देवताओंका शयन नहीं भिन्न ह बताया गया; पर मनुष्य तो सोते हैं; तब इनका भेद सुस्पष्ट है । यदि नं ( १२ ) द्वाघोयो हि देवायुष ँ हसीयो मनुध्यायुषम् ' ( शत ० ७ | ३ | १ | - होगया १० ) सूर्य आदि देवताओंकी ५ थायु सुदीर्घ देखी ही गई हैं; पर मानते मनुष्योंकी नहीं -- इस तरह भी उनका भेद स्पष्ट हुआ । ( १३ ) " विर का पड़न योनि वि इव वै देवा मनुष्येभ्यः ' ( ३।१।१ श ८ ) यहां देवताओं का मनुष्योंकी दृष्टिसे दिनके तिरोधान ( छिपना, बतलाया है, पर मनुष्य तिरोहित नहीं होते । नहीं हो ( १४ ) ' मनी ह वै देवा मनुष्यस्य श्राजानन्ति ' ( शत ० २ शशशश् ) पर उक्त यहांपर देवताओंका मनुष्योंके मनका वृत्त जान लेना कहा है; पर भान्ति Gujarat. An eGangotri Initiative

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४१४ ४१३ चन्दसि मनुष्य दूसरोंका मन ( ऋ ० ६।४८।१६ ) दिसू तथा देवोंले श्रभिन्न मूल होने नजातिः दिया गया है । ( १५ हे इन्द्र! देवताओंके श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) नहीं जान पाते । ' परो हि मर्तेरसि समो देवैः ' यहांपर पूषा देवता है । उसे मनुष्योंसे भिन्न बताकर देवता एवं मनुष्योंका भेद सुस्पष्ट कर ) ‘ एको देवत्रा दयसे हि मर्त्यान् ' [ अ ० | १२ | १ | ७ ) बीचमें तू ही एक मनुष्यों पर दया करता है-- ) योग- यहां पर भी विभक्ति - भेद ले स्पष्ट भेद है । ऋषियोंकी दिविश्रितः ( १६ ) ‘ देवा वै नाकसद: ' ( शत ० ८ ६।१११ ) ' द्यौवें सर्वेषां ना गया देवानामायतनम् ' ( शत ० १४ | ३ | २८ ) यहां देवताओंको ' द्य स्थानो देवताओं स्वर्गलोकमें रहने वाला कहा है; परन्तु विद्वान् मनुष्य भी पृथिवीलोक में ही नथो स्व में भी भेद सिद्ध मन्त्र माना श्रुति उद्धृत की गई सेमिन्न दोक्तानां शब्दानां ३।६।१ ) देवताओंके वर्ष बताये भोजन रहते हैं । तं देव और विद्वान् हुत्रा | ( १७ ) महाभाष्य पस्पाशाह्निक में एक है— ' बृहस्पतिरिन्द्राय दिव्यं वर्षसहस्र ं प्रतिप-शब्दपारायणं प्रोवाच नचान्तं जगाम ' यहाँपर गये हैं । यदि देवता शब्दका ' विद्वान् ' अर्थ ' नवे किया जावे; तो क्या विद्वान् - मनुष्य और मूर्ख मनुष्योंका वर्ष परिमाण यन नहीं भिन्न होता है? क्या मूर्खोका एक वर्ष विद्वानोंका एक दिन - रात है? स्पष्ट है । यदि नहीं; तब देवताओं - मनुष्योंका कालगणना - भेदसे भी भेद सिद्ध होगया और ' स्वामीदयानन्दजी श्रादिभी मनुष्योंकी हजारबर्षकी श्रायुंनहीं-हैं; पर मानते; यहां बृहस्पति और इन्द्रका एक दिव्य ' हजार वर्ष तक व्याकरण-- ) " विर का पढ़ना - पढ़ाना माना है । तब इन्द्र बृहस्पति यदि देवता मनुष्य - भिन्न दृष्टिसे योनि सिद्ध हुए । यदि यहां बादी वर्षका ग्रंथ दिन करें, तो हजार होते । दिनके ढाई साल होते हैं । इतने समय में यदि ' शब्दपारायण ' ' सनाप्त 1911 ) नहीं होता, तब इससे कोई आश्चर्य नहीं- क्योंकि यह बहुत समय नहीं । पर उक्त श्रं तिर्फ द्वारा आश्चये बताया गया है । इस कारण किसी भी भान्ति वादियोंकी इष्ट - सिद्धि नहीं । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. मनुष्ययोनिसे देवयोनिकी भिन्नता ४१५ ( १८ ) ' यावती देवतास्ताः सर्वा वेदविदि ब्राह्मणे बसन्ति, तस्माद् ब्राह्मणेभ्यो ' वेदविदृम्यो दिवे - दिवे नमस्कुर्यान्नालील कीर्तयेत् एता एव देवताः प्रोणाति ( तैत्तिरीयारण्यक २।१२ ( १ ) यदि देवता यहां मनुष्य माने जायें, तो क्या वे मनुष्य - ब्राह्मणमें घुस सकते हैं? इससे स्पष्ट है कि देवता मनुष्योंसे भिन्न हैं । ( ११ ) ' यो देवो मर्त्यो अति ' ( अथर्व ० २०११२७१ ७ ) यहांपर मनुष्यों से देवताकी बड़ी शक्ति दिखलाकर परस्पर - भेद दिखलाया गया है । यहांपर राजाको लुप्तोपमासं ' देवः ' कहा गया हैं कि — वह देवकी तरह है वा उसे रूपकसे ' देव ' कहा गया है । ( २० ) ‘ प्राची हि देवानां दिक्. उदीची हि मनुष्याणाम् ' ( शत ० १।७।१।१२ ) यहांपर दिशा - भेदसे भी दोनोंका भेद कहा गया है । प्रश्न-' देवो भूत्वा देवान् यप्येति ' ( १२ ) इस वृहदारण्यकोपनिषद्के वाक्यमें कहा है कि – मनुष्य देव बनकर देवताओंके पास पहुंचता है, तब मनुष्य भी देवता बन सकते हैं? ( उत्तर ) यहां ' देव ' का अर्थ ' देववत् ' देवकी भांति गुणशाली होकर यह है जैसेकि महाभाष्य में कहा गया हैं — ' अन्तरेणापि वतिमविदेशो मन्यते तद् यथा एष ब्रह्मदत्तः, श्रत्रह्मदत्तं ब्रह्मदत्त इत्याह तेन मन्यामहे ब्रह्मदत्तवद् श्रयं भवति ' ( २२ ) अब्रह्मदतको ब्रह्मदत्त कहने का तात्पर्य है ब्रह्मदत्तवत् ' । इस प्रकार, अदेव ' को ' देव ' कहनेसे भी ' देवकी तरह ’ यह तात्पर्य होता है, सचमुच ' देव ' वनकर नहीं । इस तरह से तो उसी उपनिषद्मं ‘ ब्रह्म व सन् ब्रह्माप्येति ( ४.४६ ) भी लिखा है । तो क्या आप ( द्वैतवादी ) के मुतमें ' परमात्मा ' बनकर मनुष्य परमात्माको प्राप्त होता है यह अर्थ है? ऐसा नहीं, किन्तु ब्रह्मकी तरह गुणवाला बनकर ' । इस प्रकार ' देव ' के विषय में भी जानना चाहिये । ( २१ ) ' अग्ने! वह हविरद्याय देवान् ( ऋ ० ७/११/१ ) इस मन्त्रमें अग्निकी तृति - द्वारा देवताओंकी तृप्ति बताई गई है; An eGangotri Initiative SAHADY

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४१६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) क्योंकि ' अग्निर्देवानां जठरम् ' ( तैत्तिरीय ब्रा ० २ | ७/१२ ) अग्नि देवताओंका पेट है । इस प्रकार ' ऋण ह वै जायते, योऽस्ति, सजाय -मान एव देवेभ्य ऋषिभ्यः पितृभ्यो मनुष्येभ्यः ( शत ० १।७।२।१ ) ' स येन देवेन ऋणं जायते तद् नएान् तदवदयते यद् यजते, श्रथ यदग्नौ जुहोति, ( शतं ० १।७।२।६ ) ' यद् अन्नहोमान् जुहोति; देवानेव तत् प्रीणति ' ( शत ० १३ । २ । १ । १ ) इस सन्दर्भ से अग्नि में होम से देवऋण की पूर्ति बताई गई है । यदि श्रार्यसमाजियोंके मतसे देवता इस संसारके विद्वान् मनुष्य ही माने जावें; तो क्या अग्नि होम करनेसे उनका ऋण उतर ' जावेगा? किसी श्रार्यसमाजी विद्वानसे कोई ऋण ले; तब वह श्रग्निमें होम कर दे; तब क्या उस विद्वान्का ऋण उतर जावेगा? और उस होमसे वह विद्वान् तृप्त भौ हो जाएगा? यदि ऐसा हो; तो श्रार्थप्रतिनिधि - सभा-को यह घोषणा कर देनी चाहिये, जिससे निर्धन पुरुष उनसे ऋण ले सकें, फिर वे हवन करके उस ऋणको उतार देंगे । इस प्रकार तत्सम्मत ' छटाकभर घीसे वैदिक हवन ' का प्रचार भी बढ़ जायगा । यदि उन्हें यह स्वीकार नहीं; तो स्पष्ट है कि देवता विद्वान् मनुष्य नहीं; किन्तु मन् प्यसे भिन्न योनि हैं । देवताओंका श्रग्निमें होम करनेका कारण यह है कि - ' न ऋते स्वद् श्रमृता मादयन्ते । ऋ ० ७ । ११ । १ ) श्रग्निं देवोंका मुख है । ' श्री अग्ने! वह हविरद्यायं देवान् इन्द्र॑ज्येष्ठास इह मादयन्ताम् । इमं यज्ञ दिवि देवेपुं घेहि ' ( ऋ ० ७ १११५ ) यहांपरं अग्निको तृप्तिके द्वारा देवताओंकी तृप्ति कही गयी है । इसीलिए शतपथ ब्राह्मणमें कहा गया है — ' अग्नौ हि सर्वाम्यो देवताभ्यो जुह्वति ' ( ३ | १ | ३ | १ ) ' देवा श्रग्निमुखा श्रन्नमदन्ति, यस्यै हि कस्यै च देवतायै जुह्वति, अग्नी एवं जुह्वति, श्रग्निमुखां हि तद्देवा श्रन्नमकुर्वत ' ( शत ० ७ १२।४ ) ' अग्निवे सर्वा देवता: ' ( ३ | ४ | १ | १६ ) निरुक्त १४।३२ ) । CC - 0. Ankur Joshi Collection मनुष्ययोनिसे देवयोनिकी भिन्नता ४१८ ( २२ ) ' देवा न श्रायुः प्रतिरन्तु जीवसे ' ( ऋ ० लोकः ” ' श्रम! माँ श्रभि नः सचध्वमायुर्धत प्रतरं जीवसे नः ' १/८२ ) देवशब्द ( ६ | ४१ | ३ ) यहां पर मनुष्यों द्वारा देवताओंसे श्रायु मांगी ( श्रथर्व ० नहीं? इससे दोनोंका भेद सुस्पष्ट है, नहीं तो कौन मनुष्य मनुष्यको गई है; देवानस दे सकता है? अपनी श्रायु तो कोई मनुष्य बढ़ा सकता नहीं श्रायु यहां उ । ऐसी बात केवल देवताथों में हो सकती है; क्योंकि - वेदमें कहा है- ' तयोर्दे ‘ यस्ते देवेषु महिमा ' ( श्र ० १६ | ३ | ३ ) ' एषां मरुतां महिमा सत्यो अस्ति. ( ऋ, १११६७ ७ ) ' अपारो वो [ मरुतां ) महिमा ' ( ऋ ० | ८० | ३१ ) भेद यहां देवताओंकी महिमा अपरिमित बताई गई है, अथवा श्रपवादरूपस पुरा वो मनुष्य भी किसी प्रकार मनुष्यकी श्रायु बढ़ा सके; पर उक्त मन्त्रों तान् तो मयों के द्वारा अमर्त्यो से प्रार्थना है, मत्यों से नहीं । श्रुतः देवताओं पंद का और मनुष्योंका भेद सुस्पष्ट है । शतपथमें देवताओंको श्रम कहा भी यह है; जैसे कि ' जेसा – ' ( २३ ) अश्विनोभा । ( अ ० १४ | अमृतत्वं वः ' ( २।४।२।१ ) और मनुष्योंको मर्त्यं कहा है; वह [ मृत्युर्व: । ( २४२२ ) । स्पष्ट भ ' इन्द्राग्नी यात्रा - पृथिवी, मातरिश्वा, मित्रावरुणा, भगो सकता बृहस्पतिर्मरुतो ब्रह्म सोम इमां नारीं प्रजया वर्धयन्तु ' १ | १४ ) यहां इन्द्र आदि देवताओं से विवाही जा रही नारी R में सन्तान वृद्धि दिखलाई है । यदि इन्द्र, मरुत् श्रादि देवता सभ्य मनुष्य माने जाएँ; तो क्या वर उनसे अपनी स्त्रीमें सन्तान उत्पन ( ख ) करवावेगा? कोई महानियोगी भी ऐसा नहीं कर सकता । इससे भी यहां पर देवता और मनुष्योंका योनिभेद सुस्पष्ट है । देवताओंसे तो ऐसी नुपे प्रार्थना की जा सकती है । है । ( ३ अथ यत ( २४ ) ' उभौ लोकौ जयेयं देव - लोकं च मनुष्य - लोक च ' ( शत ० १३ | २ | ४ | १ ' अयं वै लोको मनुष्यलोकः, तथा असौ [ लोकः ] दैव-Gujarat An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ४१८ ४१७ लोकः ( १ ) इस प्रकार लोकभेदसे भी देव - मनुष्यभेद है । यदि - 1२ ) देवशब्द विद्वान् - मनुष्यवाचक है तो क्या उनका लोक मनुष्यलोक नहीं? कोई पृथक् लोक है?. ( २५ ) ' प्रजापतिः ऊर्ध्वेभ्यः प्राणेम्यों गई है; देवानसृजत्, येऽवाञ्चः प्राणास्तेभ्यो मर्त्याः प्रजाः ' ( शत ०. १० | १ | ३ | १ ) श्रायु यहां उत्पत्तिमूलक प्राणके भेद से भी देव - मनुष्यका भेद है । ( २६ ) । ऐसी ज्ञा है- ' तयोर्देवमचिन्त्यं तु मानुषे विद्यते क्रिया ' ( मनु ० ७ | २०५ ) इस धर्मके अस्ति भेदसे भी दोनोंका भेद सुस्पष्ट है । ( २७ ) ' त्रेधा भागो निहितो यः ८७ । ३४ ) वो देवानां पितृणां मर्त्यानाम् । श्रंशान् जानीध्वं विभजामि वादरुपये पुरा तान्.: ( अथर्व ० १ १ १ १ ) इस मन्त्रमें देव - पितृ - मनुष्योंको ' धा ' मन्त्रम -देवताओं पंदसे तीन बताकर कैसे भिन्न - भिन्न सिद्ध कर दिया गया है! पितर कहा भी यहाँ ” मनुष्योंसे ' भिन्न बता दिये गये । ( २८ ) ' तेन इमं यज्ञ ं नो कहा है; वह [ अग्ने! ] स्वर्देवेषु गन्तवे ' ( ऋ ० ६।२।१७ ) यहां भी दोनोंका स्पष्ट भेद है, अग्निसे खाया हुआ यज्ञ भला मनुष्योंको कैसे मिल ' भगो सकता है? वर्धयन्तु ' ( २३ ) ( क ) ‘ एष ं ह वै ं देवान् अनुविद्वान् यद् श्रग्निः ' ( शत; ० रही नारी शरा ६ ) यहांपर विभक्ति - भेदसे देव - विद्वानोंका भेद सुस्पष्ट है । सभ्य ( ख ) ‘ अग्निर्हि यत्र, देवेभ्यो, मनुष्यान्- अभ्युपापर्तत ' ( शतः ) २ | २ | १ | १३ ) उत्पन्न ससे भी यहांपर विभक्ति - भेदसे देव - मनुष्यों का भेद स्पष्ट है । ( ग ' देवेभिर्मा-तो ऐसी नुपे जने ' " सामवेदस ० छन्दयाचिक ११२१ ) यहां भी विभक्ति - भेदसे भेद है । ( ३० ) ' स यद् श्रग्नौ जुहोति, तद् देवेषु जुहोति, तस्माद् देवाः सन्ति ( शत ० अथ यत् सदसि भक्षयन्ति, तन्मनुष्येभ्यो जुहोति तस्मान्मनुष्याः A ] देव-CC - 0. Ankur Joshi मनुष्ययोनिसे देवयोनिको भिन्नता ४१६ सन्ति । तत् पितृषु जुहोति तस्मात् पितरः सन्ति ( व ३६०३/२५ ) यहां भी देव पिवर तया मनुष्योंका भेद स्पष्ट है । ( ३१ ) ‘ इन्द्रस्तुजो ' ' नृवद् ’ ( थ ० ३० | ११ | ५ ) यहां देव ( यजुः ८६ ) इन्द्र को मनुष्यको तर यताकर देव - मनुष्योंका भेद स्पष्ट कर दिया है | साधम्यमुपमा भेदे: - ( काव्यप्रकाश 1१०. ) इस नियम ' उपमा, भिन्नतानें होती है 1 इस प्रकार देवता मनुष्योंसे भिन्न, उच्च यौनि सिद्ध हुए; उन देवों का पूजन: वेद सम्मत है । स्वा ० दयानन्दजीने भी नामकरण - संस्कार ' में तिथि तथा नक्षत्रोंके देवताओंके नाम हवन माना है, यह देवता किसी प्रकारसे विद्वान - मनुष्य नहीं बन सकते । समझदार आर्यसमाजी देवयोनि मानना आवश्यक समझते हैं; श्रीगङ्गाप्रसादजी एम ० ए ० कार्यनिवृत्त मुख्य न्यायाधीश ( टिहरी ) महाशयने ' वैदिकधर्म ' ( श्रप्रैल १६५० ) में ' क्या मनुष्यसे उच्च-श्रेणीकी देव श्रादि योनियोंका मानना श्रार्यसमाजके सिद्धान्त... विरुद्ध है? ' यह लेख प्रकाशित किया था- इसमें उन्होंने लोकान्तरों में मनुष्यों मित्र देव, पितर, गन्धर्व आदि योनियोंको माननेसे वेदमन्त्रोंके करने में कठिनाईका दूर हो जाना माना है । यहाँ के उनके शब्द हैं । ' वेदमन्त्रों में केवल मनुष्यों में हो देवशब्दका ' या सीमित रखकर और मनुष्येतर, कोईह देवयोनि न मानकर . करने में बहुधा कठिनाई पड़ती है ' । इस प्रकार उन्होंने ' सार्वदेशिक * ( सितम्बर अक्तूबर में पितृविषयक लेख लिखकर सिद्ध किया था. कि. मृत्युके पश्चात् जीवका जन्म एकदम नहीं हो, जात्य, कुछ समय PI तक BAR वह परलोक अथवा लोकान्तरों में रहकर फिर इसं मनुष्यलोक में आता है । इस लेख में उन्होंने प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द इन ज्ञान प्रमाणाका उपयोग किया था । यदि यह दोनों पितृविषय Collection Gujarat. An eGangotri Initiative SIRLIA

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४२० श्रीसेनतिनधमालोकः ( ४ ) ": " F और देवविषय मान लिये जायें, तो शास्त्रोंमें जो प्रक्षिप्तताके ड लगाये जाते हैं, वे बहुत - कुछ दूर हो जाएं । श्रथमें आजॅकल खींचातानी की जाती है वह भी दूर होजाय । फिर सनातनधर्म तथा श्रार्यसमाज में जो चौड़ी खाई दीखती है, उसका भी अन्त हो जाय । जो लोग ‘ विद्वाँसो हि देवा: ' इस शतपथके प्रमाणसे देवताओंको विद्वान - मनुष्य सिद्ध करना चाहते हैं; उसपर अग्रिम निबन्ध में विचार किया जाता है । सूचना – सुद्रकोंके प्रमादसे पृ ० ६२ में ' हिंदु ' शब्द-प्रदर्शक वेद - मन्त्रमें कुछ भूलें रह गई थीं; उसे यहाँ फिर शुद्ध रूपसे लिखा जाता है, पाठक वहाँ सुधार करें वह मन्त्र इस प्रकार पढ़ें-' हिं कृण्वती वसुपत्नी वसूनां वत्समिच्छन्ती मनसाभ्यागात् । दु हामिश्विभ्यां पो अघ्न्या इयं सा वर्धता महते सौभगाय ’ " इस प्रकार ५८. पृष्ठ में ' प्रह्लाद ' के स्थान ' प्रहलाद ' छप गया. है; वहां पर एक स्थान ' प्रहाद ' तथा दूसरे स्थान ' प्रह्लाद ' होना चाहिये । CC - 0. Ankur Joshi Collection ४२२ इतने [ १८ ] क्या विद्वान् मनुष्य ही देव हैं? है EF? भेद पूर्वपक्ष –१ ‘ विद्वाँ, सो हि देवा: ' यह शतपथ ब्राह्मणका वचन है, जो विद्वान् हैं उन्होंको ' देव ' कहते हैं । ( स्वा ० दयानन्दजी ' सत्यार्थ. प्रकाश ' ४ थ समुल्लास ६० पृष्ठमैं ) " २ – ‘ महाभाष्य ( २।४।६२ ) में ' देवा एतज्ज्ञातुमर्हन्ति ' यह वा लिखा है । वहां व्याख्या करते हुए श्रीकैयट ने लिखा है- “ दिव्यदृशो देवा इति, पण्डिता इत्यर्थः ” । तब ' देव ' शब्द ' विद्वान ' का पर्यायवाचक सिद्ध हुआ, भिन्न- योनि नहीं ( स्वा ० दर्शनानन्दजी, दर्शनानन्द - प्रन्य-संग्रह में ) ३ - ‘ सत्यसंहिता वै देवा अनृतं मनुयाः ( द्विवरेय ब्राह्मण ) णसे सत्यवक्ताकां नाम ही देव है, पृथक कोई योनिविशेष धर्मदेवजी सिद्धान्तालंकार --- ' सार्वदेशिक अगस्त १६,४६ में ) • उत्तरपक्ष — पहले पाठक - गण स्वा ० दयानन्दजी के निम्न देखें जिससे देव पितृ आदि योनि सिद्ध होती है । स्वा ॰ दयानन्दज़ीने कापते प्रसिद्ध झन्थः ' सत्यार्थप्रकाश समुल्लास के अन्त में यह माना है - ( प्रश्न ) सूर्य, चन्द्र और वारे भोगा इस प्रमा- स्थाल नहीं ( श्री. ।.... निष्प वक्तव्यकी सिद्ध चन्द्रल में अष्टम होनेस क्या वस्तु हैं? और उनमें मनुष्यादि सृष्टि है अथवा नहीं? ( उत्तर ) ये सब भूगोल birs लोका शोर इनमें मनुष्याद्रिः मंजा भी रहती है; क्योंकि इनका बसु नाम साता इसलिए है कि इन्हीं सब पदार्थ और प्रजा प्रसती है ।... जब पृथिवीके है । वार्ड समान सूर्य चन्द्र और नक्षत्र बसु है; पश्चात् उनमें इसी प्रकार प्रजाकें ख्यात Gujarat. An early 2