सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 251–260

सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 251–260

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ४६२ ४६१ करता है । उससे वह प्रार्थना करता है कि ' ॐ यां अग्निकी उपासना मेघां देवगणाः पितरश्चोपासते । तथा मामद्य मेधयाग्ने, मेधाविनं बुरु नाना ' ( यजुः ० ३२।१४ । इसी प्रकार ' यथा त्वमग्ने समिधा समिध्यसे, स्वाहा, मेधया, वर्चसा, समिन्धे ( पारस्करगृ ० २/४ ) यहां पर भी महमायुषा अग्निले मेधाकी प्रार्थना की जाती है । ' बुध! त्वं बुद्धिजननो बोधदः ' सर्वदा नृणाम् ' इस ' भविष्योत्तर ' के बचनमें भी बुधका बुद्धिदातृत्व प्रसिद्ध है । तो जब बुध एवं अग्निका बुद्धिदातृत्व समान माना गया है, तब अधि- ' तत्र संस्थानैकत्वं सम्भोगेकत्वं च ' ( ७ | १८ ) ' निरुक्त ' की इस परिभाषा रेति, ' के अनुसार समान कार्यवाले देवताओं को पृथक् - पृथक् न गिनकर. एक ३२ ) देवता वा एक नामले गिन लिया जाता है । तभी तो ३३ कोटि देव-नरूप ताओंका केवल तीन देवताओं में श्रन्तर्भाव कर देना यास्कका सङ्गत हो. जाता है । तत्र फिर ‘ उद्बुध्यस्वाग्ने ' इस श्रग्निके मन्त्रसे बुधको ले लेना शब्दमात्रसादृश्यहेतुक नहीं, किन्तु यहां पर अर्थसादृश्य भी है । आर्यसमानके वैदिक यन्त्रालयकी ऋग्वेदसं ० में ' उद्बुध्यस्व ' ( १० ) १०१।१ ) मन्त्रका ऋषि भी ' सौम्यो बुधः ' ( सोमका लड़का बुध ) गया माना गया है । मन्त्र वत चथच ' उद्बुध्यस्वाग्ने! ' का ' हे अग्ने! बुध्यस्व बुध इत्याख्याय-मानो भव ' यह अर्थ भी गर्भित है कि हे अग्नि! तुम बुध नामवाले कहे जानो । ‘ बुध ' शब्दको ‘ तत्करोति तदाचष्टे ' से. ' श्राचष्टे ' अर्थमें णिच् करने पर ' वुधयति ' बन जाता है । उसीका कर्मवाच्यमें लोट के मध्यमपुरुषमें यक् तथा णिलोप और श्रात्मनेपद... होकर जां ' बुध्यस्व ' - – ' बुध इत्याख्यायमानो भव ' इस प्रकार प्रयोग तथा अर्थ होता है । अर्थकी इस प्रकारकी शैली नैरुक्त - शैली कही जाती है, जहां पर एक ही शब्दको तीन प्राख्यातोंसे भी निकाला जाता है | तब फिर बुध ' उद्बुध्यस्वाग्ने ' इस मन्त्रके लिखने मात्र CC - 0. Ankur Joshi . , . Collection Gujarat. नवग्रहोंके वैदिक मन्त्र ४६३ पुराणों पर आक्षेप करना श्राप्तायोंको युक्त नहीं । पुराण तो वेदका भाष्य हैं । पुराणानुसारी वेदका श्रर्थ युक्त भी होता है, तभी तो ' महाभारत ' में भी कहा है- ' इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थमुपत्रहयेत् । बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ' ( १।१।२६७ ) इसीलिए मनुने ' धर्मेणाधिगतो यैस्तु... सपरिवृ हणः । ते शिष्टा ब्राह्मणा ज्ञेयाः श्रुति-प्रत्यक्षहेतवः ' ( १२।१०६ ) यहां ' सपरिवृ ंहण ' वेदके पढ़ने वालेको शिष्ट ब्राह्मण मांना है । यहां पर श्रीकुल्लूकने ' संपरिवॄहण ' का ' श्रृङ्गमीमांसा-धर्मशास्त्र - पुराणाद्य पत्र हितो वेदः ' यह अर्थ किया है । तब पुराण भो वेदार्थज्ञानार्थं प्रयोजनीय हैं । पर अब तो केवल पुराणने ही नहीं, स्मृति एवं गृह्यसूत्रोंने भी उक्त मन्त्रको जब बुधका मान रखा है, तब तो बहुसादी मिल जानेसे सन्देहका श्रवकाश ही नहीं रहता । • केतुका मन्त्र शेष रहा ' केतु ' ' को मन्त्र ' केतु ' ' कृण्वन्न केटवे ' ( यजुः २१।२७ ) — इस पर भी श्रद्धाबुद्धिसे विचार करने पर समाधा । प्राप् सकता है । आपके श्रद्धेय स्वामी दयानन्दजीने अपने ' ' उणादिकोष ' ( १।७४ ) में ' केतुः ' की सिद्धि करते हुए - ' केतुः प्रहः, पताका वा ' यह अर्थ किया हैं देखिये पृष्ठ १८ ) । उज्ज्वलदत्तकी ' दशपाद्यु णादिवृत्तिम भी लिखा है- ' केतुर्ध्वजः, ग्रहश्व ' ( १।१२६ ) । तब व्यासा इस मन्त्र में भी केतुका ' ग्रहविशेष ' अर्थ - जैसा कि स्वामीजीने लिखा है- स्वीकार कर लें । यदि वे स्वामीजी पर श्रद्धेय - बुद्धि रखते हैं, वो उन को उन्हींके अनुसार ' केतु ' एक ' ग्रह ' स्वीकार करना ही पड़ेगा । ' स्वामीजीने ' उणादिकोष ' को ' वेदाङ्गप्रकाश ' का भाग माना है । इससे उणादि भी वेदके श्रङ्ग सिद्ध हुए । जब ऐसा है, तब उयादिस्थ ' केतु ' शब्द वैदिक सिद्ध हुआ । ' उणादिकोष ' की भूमिका ( पृ ० १ ) में स्वामीजीने स्पष्ट लिखा है- ' इसमें सामान्यसे वैदिक - लौकिक दोनों An eGangotri Initiative..

पृष्ठ 252

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४६४ श्रीसनातनुधर्मालाकः ( ४ ) ही शब्द सिद्ध किये हैं ' । अब बोलिये कि यदि वेदमें ' केतु ं कृण्वन् ' यह मन्त्र केतुब्रहाभिघायक नहीं है, तो केतु ग्रहाभिघायक मन्त्र वेदमें कौनसा है? फिर उस पर विचार चल सकता है । यदि वे कहें कि वेद में केतुग्रहका निरूपण ही नहीं, तो फिर बतलाइये कि उनके श्रद्धेय श्रीस्वामीजीने ' वेदाङ्गप्रकाश ' में ग्रहाभिधायक ' केतु ' शब्दको अवैदिक क्यों नहीं माना? अथवा श्रादेप्ताओं की यदि स्वामीजी पर श्रद्धा है, यदि वे ' पाखण्डखण्डिनी पताकाको लिये हुए ' थे, यदि स्वामीजीने उनके शब्दोंमें ' वेदरूपी सूर्यको पुराणों रूपी बादलोंसे ' निकाल लिया, यदि उनके शब्दोंके अनुसार स्वामीजीने ' ईश्वरीय प्रेरणासे प्रकाश प्राप्त किया ', तो उन्हींसे वेदमें स्वीकृत किये ‘ केतुग्रह ’ को माननेमें आतेप्ता नकार क्यों करते हैं? जबकि वेदमें ' शमादित्यश्च राहुणा । शनो मृत्युधूमकेतुः शं रुद्रास्तिग्मतेजसः ' ( श्र ० १६।६।१० ) इस प्रकार राहु - केतु ग्रहका Ö निरूपण श्राया है, श्राचेताओंके श्रद्धेय श्री-स्वामीजीने भो ' इसनिजनि ” रहिम्यो लुण ( ११३ ) इस उणादिकोष’स्थ-सूत्रको टीकामें ' राहु -- ग्रहविशेषः ' ( पृ ० १ ), ' केतुः -ग्रहः ' ( पृ ० १८ यह मान लिया हैं, तब ' राहोश्छाया स्मृतः केतुः ' इत्यादि शास्त्रवचना-नुसार केतुग्रह भी वैदिक सिद्ध हो गया । जब तक उस केतुका धन्य यहां पर श्रीजयदेव विद्यालङ्कार ( आर्यसमाजी भाष्यकार ) ऐसा अर्थ करते हैं — ' जनोंके मृत्युंके कारण धूम्रकेतु ग्रह हमारे लिए शान्त रहें । तीक्ष्ण प्रकाशवाले, प्रजाको रुलानेवाले रुद्रनामक केतुग्रह अथवा रुद्र शांन्त रहें । ' श्रीक्षेमकरण ( श्रार्यसमाजी भाष्यकार ) यह अर्थ करते हैं—-सूर्य राहु — प्रहविशेष के साथ शान्तिदायक हों, मृत्युरूप धूम्रकेतु --- पुच्छल-तारा- हमे शान्तिदायकं ' हों । ' CC - 0. Ankur Joshi Collection नवग्रहोंके वैदिक - मन्त्र मन्त्र वेदसे सिद्ध न किया जाय तब तकः केतु, कृण्वन् केतु ग्रहका रहेगा । तभी हमने कहा था कि यदि श्रद्धा पर विचार किया जाय, तो उसका समाधान भी झास हो ४६६ ४६५ कृपव यही मन्त्र हो हुआ मन्त्रों है । सकता है । यह ठीक भी है, ' वेद स्वयं कहता है श्रद्धया सत्यमाभ्यते ' भए जात ( यजुः ११ | ३० ), ‘ श्रद्धावान् लभते ज्ञानम् ' ( गीता ४/४० ) F T पूजा ' वेदमें केतु तो क्या ' धूमकेतु ' का भी वर्णन " श्रांता है । " देखिये—- वाह ‘ शन्नो मृत्युधूमकेतुः ' ( अथर्व ० १६ ६ । १० ) । श्रथवा स्वामीजीके मतभ जाती नुसार थाप केतुका अर्थ उक्त वेदमन्त्र में ' पताका ' भ भी उससे केर्त ग्रहकी सिद्धि हो सकती है । " यदि कहें कि कैसे? तो कृपया यह, भी सुन लीजिये । श्राप प्रका जानते हैं कि कभी - कभी लिए अग्ि ( चिन्ह ) से भी लिङ्गीको बताया " जाया करता है । लिङ्गसे ही सन्यासी- ( εl ब्रह्मचारी आदि जाना जाता है । कभी किसी विशेष - वस्तु रखनेवालेकी उस नाम वस्तुसे भी बोध हो जाता हैं । जैसे कि कोई ठेलेवाला या रिक्शेवाला और ' धूम मजदूर हो, तो उसे बुलाया जाता है- ' घरे ठेले! थो रिक्शे! था! श्राप्ता यह जानते होंगे कि केतुग्रहका ' गुण्डा ' ( केतु ) प्रसिद्ध है, झण्डा ( केतु ) उसका लिङ्ग है । इसलिए उस मण्डे ( केतु ) को इस धारण करनेसे उस ग्रहका नाम भी ' केतु ' पड़ गया है । केतुग्रहकी श्राकृति भी झण्डेकी बनानी पड़ती है, देखिये ‘ जैमिनिगृह्यसूत्र ' में ' अथ सात ग्रहाऽऽकाराः —— केतोर्ध्वजमिति ( २६ ) । ' केतवे ध्वजमिति ' ( बोधायन- पजा. गृह्यशे ० सू ० १।१६।५ ) पञ्चाङ्गामें प्रकाशित के तुग्रहके साथ श्रातप्ता - मही- कहन दयाने ' पताका ' देखी ही होगी । उसी मण्डेको ' पताका ' अथवा ' ध्वज ' है; श्रथवा ‘ केतु ' भी कहा जाता है, तब उसी केतु ( झराडे ) के वर्णनसे वस्त O उस झण्डेको धारण करनेवाले केतुग्रहका भी ग्रहण हो जायगा, क्योंकि होत केतुग्रह तो स्वामीजीके मतानुसार भी ' वैदिक ' सिद्ध हो ही चुका!. " उसका वर्णन वेदमें जिस किसी रूपमें था ही सकता है, तब ' केतु ' Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 253

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४६६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ४६५ कृण्वन् ' इस मन्त्रसे केतु ग्रहका निरूपण करना भी हुआ । फण्डेकी पूजा कर देनेसे उस फण्डेवालेकी हो 1 जैसे कि इस राष्ट्रका सत्व रज - तम इन तीन मित्रों झण्डा है, उसका अभिवादन करनेसे इस राष्ट्रका है । जाता है, वैसे ही केतुग्रह केतु ( मण्डे ) की पूजा वेदबाह्य सिद्ध न पूजा मानी जाती गुणोंवाला विरङ्गा अभिवादन माना करनेसे केतु ग्रहकी यजुः निष्पन्न हो जाती है । जैसे कि निरुक्त ( ७ अध्याय ) में देवता के पूजा बाहन, थायुध श्रादिकी स्तुति से भी उसी देवताको स्तुति मानी य जाती है । तब अथवा – ' केतु कृण्वन् ' ( यजुः २६।३७ ) मन्त्रका देवता अग्नि है । बृहत्पराशरस्मृतिकार केतुको ' केतु ' कृण्वन्नग्निसूनोः ’ ( १/६६ ) अग्निसुनु - अग्निपुत्र कहते हैं । तब ' श्रात्मा वै पुत्र -नामासि’– इस कथनसे अग्निका मन्त्र भी उसके लिए ठीक ही है; और अग्निका केतु ( प्रज्ञापक ) उसका धुआँ होता है । तभी नको. ‘ धूमकेतु ' कहते हैं । धुआँ तमोरूप ( काला ) होता है । तभी श्रग्निपुत्र *** T. केतुको भी तमोमय वा ' धूमकेतु ' माना गया है । तब केतुका उक्त मन्त्र इस रीतिसे भी युक्त ही है । हकी ‘ केतु राहुकी छायामात्र है, अतएव ठीक उसके सामने अथ सातवीं राशिमें रहता है, अतः उसे पृथक ग्रह मानना और उसकी यन- पूजाके लिए एक ' मन्त्र ' खड़ा करना श्रमौलिक कल्पना है ' ऐसा कहना भी ठीक नहीं । जबकि उसकी राहुसे भिन्न दिशामें सत्ता मिलता 13 है; तो ६ राशिके व्यवधानसे उसकी सत्ता पृथक सिद्ध होगई । एक वस्तुएँ व्यवधान कभी नहीं हुआ करता । श्रतः ग्रहण भी कभी राहुसे होता हैं, कभी केतुसे; यह पञ्चाङ्गों में देखा जा सकता है । पूर्णिमावाले दिन चन्द्रमा सूर्यके ठीक सामने छः राशिके अन्तर पर होता है, उसी सूर्यसे I CC - 0. Ankur Joshi Collection जराहोंके वैदिक स ६६७ प्रकाशित होता है, उसका लुप्तता कोई प्रकाश नहीं; तो क्या सूर्य-चन्द्रमा एक ही मान लिये जाएँगे? स्वा ० द ० जीने भी राहु केतुको भिन्न माना है । यदि एक ही होता; दो भिन्न नामकी श्रावश्यकता भी क्या थी १ इतना है कि राहु सिर है, केतु शेष देह है; तब इन दोनों के. भिन्न - भिन्न हो जाने से इनके मन्त्र भी भिन्न - भिन्न होना स्वाभाविक है । इस प्रकार उक्त मन्त्रोंका उन - उन ग्रहोंसे सम्बन्ध सिद्ध हो जानेले श्रीपण्डित चुडामणिजी शास्त्रि- महाभागका - ' स्वामीजीके प्रचारकार्यसे पूर्व लगभग पाँच सहस्र वर्ष पूर्व वेदरूपी सूर्यको पुराणरूपी बादलोंने ढँक - सा दिया था " नाम तो तब भी वेदोंका, लिया जाता था, मन्त्र भी - वेदके ही बोले जाते थे, पर उच्चारणमात्र । ' शत्रो देवी: ' उद्बुध्यस्वाग्ने, “ क्रेतु ं कृय्वश्च केतवे ' इत्यादि मन्त्रोंमें शब्दसादृश्यको लेकर शनि, बुध और केतुकी पूजामें वे मन्त्र प्रयुक्त होने लगे ' - यह कथन पूर्णरूपसे समाहित हो गया । ' आलोक ' पाठकोंने केतु इन तीन मन्त्रों पर विशेष विवेचना दी । यदि रखे गये होते, तो शेष राहुका, इस प्रकार अन्य · इनमें कोई शब्द - सादृश्य शेष ग्रहोंके मन्त्र देख लिया कि आता लोगोंने शनि, बुध विशेष आक्षेप किया था, हमने भी उन पर शब्दसादृश्य को लेकर ही इन ग्रहोंके उक्त मन्त्र ' अग्निमूर्धा ' यह भौमका, ' कयानश्चित्र ' यह मन्त्र भी सदृशशब्द वाले रखे जाते, परन्तु नहीं । इन ग्रहोंके मन्त्रोंमें कहीं तो उन ग्रहोंका गुण देखकर उसे उस ग्रहका मन्त्र माना गया, जैसे—-शनि और बुध श्रादिके मन्त्र । कहीं उस ग्रहका लिङ्ग देखकर वह • मन्त्र रखा गया, जैसे- भौम थौर केतुका । कहीं उनके देवताका लक्ष्य Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 254

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४६८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३ ) करके रखा गया | जैसे स्वा ० दयानन्दजीने नामकरण संस्कारमें तिथियों तथा नक्षत्रोंके देवता लिखे हैं, वैसे ग्रहोंके भी ' देवता अधिदेवता हुधा करते हैं, कहीं उन्हें लक्ष्य कर उस ग्रहके नामसे मन्त्र विनियुक्त किये. गये हैं । अतः ऋषि - मुनियोंसे विनियुक्त बात पर उक्त आक्षेप करना अपने ही अल्पश्रुतत्वका परिचय देना है । शेष १ ' आकृष्णेन रजसा... हिरण्ययेन संविता रथेना देवो याति " ( यजुः ३२।४३ ) यह तो १ सूर्यका मन्त्र प्रसिद्ध ही है । ' सविता सूर्यः हिरण्ययेन रथेन आवर्तमानः- भ्रमणं कुर्वाणः, भुवनानि पश्यन् श्रायाति ' यह इस मन्त्रका धन्वय हैं । स्वा ० दयानन्दजीने भी ' सत्यार्थप्रकाश ' में इसे सूर्य और भूमिका आकर्षण मन्त्र माना है । जब इस मन्त्रको ' सविता देवता ' है और सविता सूर्यको कहते हैं, तब यह मन्त्र सूर्य-पूजाका ठीक ही हुआ । २ ' इमं देवा... विश! एष बोमी राजा सोमो-ऽस्माकं ब्राह्मणाना राजा ' ( यजुः ६४० ) इस मन्त्र में ब्राह्मण, क्षत्रिय - राजाका राज्याभिषेक T करता हुया प्रजाको कहता हैं कि. ' लोगोंका यही राजा है और हम ब्राह्मणोंका राजा सोम है । सोमका तुम भाव सोमरस तथा उसका श्रधिपति चन्द्रमा है । चन्द्रमाको ब्राह्मणका राजा होनेसे ही ' द्विजराज ' ( अमरकोष ११३ | १५ ) कहा जाता है, तो जब इस मन्त्रमें चन्द्रमाका वर्णन है, गृह्यसूत्रकारोंने इसे चन्द्रमाकी पूजामें विनियुक्त भी किया है, तब इसमें भी कोई अनुपपत्ति नहीं रहती । ३ ' अग्निमूर्धा दिवः ककुत् पतिः पृथिव्या अयम् । जिन्वति ' ( यजुः ३।१२ ) यह भौमका मन्त्र है । भौम पृथिवीका अंश माना जाता है; तभी तो वैज्ञानिक भौममें जानेकी सोचते हैं और कभी-कभी उसे भूमिके समीप प्राप्त हुआ कहते हैं, जैसेकि - श्राजकल | इस मन्त्रमें भी उसे ' पृथिव्या प्रयम् पतिः उसे पृथिवीके सम्बन्धवाला बताया CC - 0. Ankur Joshi Collection नवगू होंके वैदिक - मन्त्र ४६६ I गया है, भौमका भी अत्यन्त तेजोरूप और रकता होनेसे अग्नि की भांति चर्ण होता है; तब प्रत्यन्नका, भी, अनुग्रह होनेसे अग्निदेवताबाले मन्त्रमै करी उसका वर्णन संगत है । ' दिवः ककुत'- - श्राकाशका यह भूषण है, ' पति: ' भी भौम ठीक है । ज्यौतिषमें प्रसिद्ध है – ' चलत्यङ्गारके वृष्टिः ब्रह्मस यह वृष्टिकर्ता होनेसे ‘ अग्नेरापः इस कथनसे ' अपां पतिः ' ठीक ही कहा गया है,.तब इस मन्त्रका भौमक्की पुजा में विनियोग क्यों न हो? प्रकारके सम्बन्ध भी शास्त्रीय होते है । जैसे कि निरुक्त ( ३ । १११५ ) के अनुसार ‘ कुत्स ' ऋषिमें वधार्थक ' कृत् ' धातुकी चरितार्थता उसके इन्द्रके द्वारा शुष्ण असुरका वध करनेसे मानी गई है । मारा था इन्द्रने असुरविशेषको; पर उसके मारनेका सम्बन्ध उस असुरको न मारने वाले भी उस ( इन्द्र ) के सखा कुत्स ऋषिके साथ वेदने कर दिया । ' कुत्स ' वैदिक - निघण्टुका शब्द है । होने ४ ‘ उदुबुध्यस्वाग्ने,,! ( यजुः १५११४, इस बुधके मन्त्रके विषय में पहले कहा ही जा चुका है । बृहस्पते! श्रुति यदयों यः २६।३ ) इस मन्त्र में बृहस्पतिका स्पष्ट ही वर्णन है और नाम भी आया है, तब इस मन्त्रमें भी कोई असङ्गति नहीं पड़ती; वह वृहत - पति सूत्र ग्रहों बड़ा होनेसे माना जाता इसीलिए उसे देवगुरु कहते हैं । दूसरा - ' वाग हि बृहती, तस्या एष ' पतिः पतिः ' ( छान्दोग्योप ० १ | २ | ११ ) यहू ॥ चाणीका अधिष्ठाता भी हैं । ‘ कुकुट्यादीनामण्डादिषु ' ( वा ०, ६।३।३५ ) से पु बद्भाव हुआ है । ” इसलिए ज्योतिषम, बृहस्पतिको बिद्याका अधि-15 ' RES ष्ठाता ग्रह माना गया है, तब इस मन्त्रसे बृहस्पतिकै ग्रहणमें भी कोई अनुपपत्ति नहीं । ' ६ ' ऋतेन सत्यमिन्द्रिय विपान ' शुक्रम् ' ( यजे १६७५ ) ". II इन मन्त्रोंके ग्रहा देवताः ' कहे गये हैं । और ' शुक ' शुरूको कहते हैं, शुक्र ग्रहका ' भी शुक्ल वर्ण है, वह बहुत चमकीला होता है, यह प्रत्येक्ष है । तय इस मन्त्रम शुक्रका वर्णन मी असंगत नहीं । लिगसे भी लिड़का ज्ञान Gujarat. An eGangotrf nitiatives o

पृष्ठ 255

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४६६ £ ४७० श्रीसनातनधर्मालोकः 22 ( 1 ) / भांति FFIFE करो दिया जाता हैं । ७ शैनिके मन्त्रके विषय में पूर्ण - विवेचना पूर्व दो मन्त्र हो जा चुकी है । " वैदिक ज्योतिषशास्त्र ' में आर्यसमाजी विद्वान श्री ब्रह्ममुनिजी । लिखते है “ शनिको ' असिर्त ' भी कहते हैं —– ' असितः वृष्टिः शनिग्रहः ' इति हलायुधः । शनिके चारों और कुण्डल ( घेरा ) होनेसे कहा इसे संर्पका रूपर्क दिया गया है । अंसित कृष्ण सर्पको भी कहते हैं ---अर्तएव वेदमें इसका वर्णन असित नाम से श्राता है— “ श्रर्भु भो ' उ १३ ) अशर्वे हिरण्यंप्रति॑ि सूर्ये । व्यख्यजि॑ह्वयाऽसितः ' ( ऋ ० ११४६।१० ) जर्ब FELLENETELE सूर्य'उत्पन्न होते समय किरण फैलानेके लिए ददौप्यमान बना, तथ शनिग्रह जिह्वाके साथ प्रकट हुआ । इस मन्त्रमै शनिग्रहकी प्रकटता वाले सूर्यसे बतलाई है । अतएव शनिको ज्योतिषके ग्रन्यासे सौरि, सूर्य ' कुत्स ' कहा गया है । ऋ ० ४ । ५१ ॥ इस मन्त्रमें कहा गया है ।... मन्दगामी होनेसे इसका नाम शनैश्चर भी है । " षय में L ८'राहुर्के विषयमें दो मन्त्र प्रसिद्ध हैं, एक ' काण्डात काण्डात १६।३ ) प्ररीहन्ती ' ( यजुः ( श I ' ' ) दूसरों ' कर्यानंश्चित्रः ' ( यजुः २७ । ३३ इसमें ' काण्डात काण्डात् यह मन्त्र दुर्वीका है । क्योंकि इसका देवता यहीँ हैं । " उदुम्बरः शमी, दूर्वा, कुशाश्च समिधः क्रमात् ( याज्ञवल्क्य ० श्रचाराध्याय ३०१ ) इस पद्यके अनुसार राहुका होमन यह दूर्वा हैं । तब ' ' यह वतः स यज्ञो यज्ञाङ्ग ' वा तद् - देवता भवति ( ७।४।२ ) निरुक्तके इस कथनकै अनुसार - 1 जिसका श्रर्थ श्रीदुर्गाचार्य ने यह कोई ‘ यद्दैवतः स यज्ञः—— यदुदैवतप्रधानं हविः ' तब दूर्वाके भी राहुको । होने से यह मन्त्र भी राहु - दैवत सिद्ध हो गया, और ' कुयानश्चित्रः ' इस मन्त्रका शिष्टाचार - परम्पराले राहुमें विनियोग है, क्योंकि - शं नो व ग्रहाश्चान्द्रमसाः शमादित्यश्च सहुणा ' ( अथर्व ० १६।६।१० ) इस वेद-का ज्ञान मन्त्रमें राहुसे कल्याणकी प्रार्थना स्पष्ट है । ' क्यानः ' मन्त्रका देवता इन्द्र है और इ‘दको ‘ इन्द्रः सर्वा देवताः ' ( शतपथ ३।४।२।२ ) सर्वदेवात्मक माना CC - 0. Ankur Joshi Collection नवग्रहोंके वैदिक - मन्त्र ४७१ गया है ' | ' माहाभाग्याद् देवताया एक आत्मा बहुधा स्तुयते ' ( निरुत ७ । ४ । ६ ) इसके अनुसार उससे राहु भी गृहीत हो सकता है । केतु मन्त्रके विषयमें पूर्व कहा ही जा चुका है । राहुकी छाया केतु होता है; पर इतने मात्र से उसको अभिन्न भी नहीं माना जा सकता; क्योंकि -इनमें परस्पर छे राशिका अन्तर रहा करता है, यह पूर्व संकेतित किया ही जा चुका है । छायाका भाव है - तदनुसारी । इस प्रकार इन नवग्रह - मन्त्रों का महाँसे अर्थ सम्बन्ध भी सिद्ध हुश्रा । शब्द - सम्बन्ध हो तब भी कोई आक्षेपार्हता नहीं; क्योंकि -- वेद भी शब्द - प्रधान होते हैं । तभी वो विवाहादि संस्कार वेदके शब्दोंसे कराये जाते हैं, वेदके अनुवाद वा अर्थसे नहीं । वेदका एक - एक अक्षर वा शुब्द वा स्वर वा स्वन भी निरर्थक नहीं — पद्द अवस्य स्मरण रखने की बात है । तभी वो ' भूतं, अवद्, भविष्यच्च सर्वे वेदात् प्रसिध्यति ' ( १२।६७ ) यह मनुचीका बचन सार्थक है । विनियोग तो सूर्य - सम्बन्ध न होने प भी हो जाता है-यहू याज्ञिक कर्मकाण्ड - सम्प्रदाय में प्रसिद्ध है - इसमें वादी लोग अपनी ' संस्कारविधि ' भी देख सकते हैं । श्रार्यसमाजी विद्वान् श्रीराजा Pilion रामशास्त्रीने अपने अथर्ववेदभाष्यकी भूमिकामें लिखा है- ' श्रौतसूत्रों और गृह्यसूत्रोंमें मन्त्रोंके जो विनियोग बतलाए हैं, उनसे भी मन्त्रोंके श्रथों पर कुछ प्रकाश 510 पड़ता है, क्योंकि - विनियोग भी अर्थ बहुत । पर ऐसे विनियोग भी जहाँ मन्त्रका मुख्य अर्थ नहीं घटता ' ( ५० २२ ) इससे स्पष्ट है कि-मन्त्राधसे असम्बन्धित भी विनियोग हुआ करते हैं, नहीं तो एक मन्त्रके भिन्न भिर्भ विनियोग न होते ' । ‘ शनिराहुकेतरगरचो ’ ( ७/६ ) इस मैत्रायणीय- धरण्यकम भी शनि - राहु - केतु का वर्णन आया है । Gujarat. An eGangotri Initiative

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४७० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) जो कि श्रीमान् पं ० चूडामणिजी शास्त्री शाण्डिल्य - महोदय कहते कि- " यह पुराण- गृह्यसूत्रादि सभी ग्रन्थ पांच सहस्र वर्षके अन्दरके इनसे सृष्टिकी आदिमें स्थित वेदमन्त्रोंका ग्रहपूजापरक अर्थ नहीं किया जा सकता? इस पर सविनय निवेदन यह हैं कि ---यह आपका पाश्चात्य विद्वानों वाला दृष्टिकोण है । जिनका यह दृष्टिकोण है, वे वेदोंको भी सृष्टिकी श्रादिमें न मानकर उनको महाभारतके समयका ' माना करते हैं, ऋग्वेद के प्रथम और दिशम मण्डलको तो वे अत्यन्त - अर्वाचीन कहते हैं, परन्तु पौरस्त्य-दृष्टिकोण यह नहीं । पौरस्त्य अथवा ' भारतीय दृष्टिकोण हम न्याय-दर्शनके भाष्यकार वादिप्रतिवादिमान्य श्रीवात्स्यायनमुनिके अनुसार तथा श्रार्यसमाजी रिसर्च स्कॉलर श्रीभगवद्दत्तजीके अनुसार पहले दिखला चुके हैं कि वे ही ऋषि - मुनि वेदोंके द्रष्टा- प्रवक्ता थे, और वे ही धर्मशास्त्र-पुरोणादिके मी द्वष्टा - प्रदक्ता थे । वेदके छः अङ्ग सर्वसम्मत हैं, उनमें ' कल्प ' वेदका विनियोजक हस्तस्थोनीय अन है । पंडितजी गृह्यसूत्रोंको न मानकर वेदका हस्तच्छेदन कर रहे हैं । फिर वे ' संस्कारोंमें ' तत्त-न्मन्त्रोंका विनियोग कैसे मान सकेंगे? क्या वे जिन मन्त्रोंसे नामकरण, उपनयन; विवाहादि - संस्कार तथा सन्ध्या करते हैं, ' उनका वेदमें विनि योग दिखला सकते हैं? यदि नहीं तो क्या वे जिन मंत्रोंसे विवादि कराया करते हैं, वे अर्वाचीन है । " नामकरण संस्कारम वे ' ' जो ' तिथियों ' और नक्षत्रोंके देवताओंको हवि दिलाया करते हैं, क्या वेदमें उनका विनियोग दिखला सकते हैं? ‘ यदि नहीं; तो क्या यह.. अवैदिक है?? ‘ क्या क्या एक अर्व वर्षोंसे वेदकि शुरू होने पर श्राजसे पाँच सहस्र वर्ष पूर्व तक ' वेदकी परम्परा बताने वाला कोई ग्रन्थ नहीं बना? क्या पं ० जी अङ्गी - वेदके प्राकट्य के साथ ही वेदके कल्प - यादि घङ्गों तथा पुराण चादि उपानोंको CC - 0. Ankur Joshi Collection नवग्रहोंके वैदिक - मन्त्र ४७३ मानने के लिए तैयार नहीं १ अङ्ग - उपाङ्गभी श्रङ्गीके साथ 24 ४७४ ही बनते हैं श्री वेदसे लाखों वर्ष पछिका बताना वैदेशिक दृष्टिकोण, उन से भारतधर्म विरुद्ध है । फिर ग्रह भी कोई पाँच सहस्र वर्षोंसे हो । जावा यह भी सृष्टिकी थ । वेद इनसे परिचित न नहीं बने वेदको पदुम करना ए I फिर उसे ' सर्वज्ञानमयो हो - यह कहना व ( मनु ॰ २१७. कैसे कहा जा सकता है. हि सः ) | जैसे अथर्ववेदुकी नौ स्वहिताश्रोंमें छःसंहिताओंका ४ रोहि विनियोग ‘ नक्षत्रकल्पो वैतानस्तृतीयः संहिताद्विधिः । तुर्य आङ्गिरसः कल्पः ( श्राप्ति. पुण्य चारिकः ) शान्तिकल्पस्तु पञ्चमः ' ( वायुपुराण या ६ ६१।२४ ) आचार्य उपचूर्ण-प्रणीत कल्पसून्नके अधिकरण में उदुष्टत पाँच सूत्रोंमें किया गया है । ' ज्येष्ठा १४ इनमें ' नक्षत्रकल्प ' में नक्षत्रोंकी भिन्न - भिन्न शान्तियों तथा पूजाएँ कही गई हैं, दूसरे वैतानसूत्रमें दर्श - पूर्णमास - श्रग्न्याधान आदिका विधान अषाढ तीसरी संहिर्ता - विधि ( कौशिक - सूत्र ), से, शत्रूचाल -, भूत-बालगृहादिके हटानेवाले कर्म, दुःस्वप्न निवारण, पाप, दोन शान्ति, अपशकुन -शान्ति या, ग्राभिचारिक - कर्म और दूसरेके निवारण आदि वर्णित किये गये हैं । चौथे श्राङ्गिरस- कल्प में " कर्मोंका, स्वातन्त्र्यसे निरूपण तथा निवारणकी विधि कही गई है । ‘ शान्तिकल्प ' में विनायक ( गणेश ) पूजा, ग्रहपूजा, महयज्ञ अ यह सब श्रीसायरंपके अथर्ब्रवेद भाष्योपोद्घात में देखा जा सकता है । इसी प्रकार अथर्ववेदका ही एक गन्य ' नक्षत्रगृद्दोत्पातवदय ' यह सब वैदिक साहित्य है है,, इसमें इन्हीं गहों तथा नक्षत्रोंकी, शांतियाँ, तथा यांग बताये गये हैं । इनमें ग्रहांक, उमा उक्त मंत्र ही बताये गय " हैं । यज्ञ विना - मन्त्र के नहीं उन्हींको उपजीवित करके स्ववियामें भी वैसे वर्णित है । तब उनको अर्वाचीन बताकर अपना पीछा नहीं छुड़ाया जा सकता । बेद्धमें होता है, वीज; ' उनको स्पष्ट भी उन्हीं द्रद्रष्टा ऋषि--Gujarat. An eGangotri Initiative [ [ विस }

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४७४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) सुनियते किया । उनके ग्रन्थ न होते, वो वेदका अर्थ भी न जाना जाता । वेदमें जैसे ग्रहोंसे कल्याणको प्रार्थना आई है, वैसे नक्षत्रोंसे भी । जैसे कि - अथर्ववेद ( शौ ० ) संहितामें - सुहवमग्ने! ३ कृतिका ४ रोहिणी चास्तु, भद्र ं ५ मृगशिरः शम् ६ आर्द्रा । ७ पुनर्वसू सूनृता, विनियोग चारुं पुष्यो भानुराश्लेषा श्रयं मघां १० मे ( १६७/२ ) ( श्रभिः । पुण्ये ११ पूर्वा १२ फल्गुन्यौ चात्र १३ हस्तः, १४ चित्रा शिवा १५ स्वातिं सुखो मे अस्तु । राधे १६ विशाखे सुद्दवानुराधां १७, गया है । ज्येष्ठा १८ सुनक्षत्रमरिष्ट १६ मूलम् ' ( ३ ) अन्नं पूर्वा रासत मे २० अषाढा, ऊर्जं देवी २१ उत्तरा श्रावहुन्तु । अभिजिद् २२ मे रासत पुण्यंमेव २३ श्रवणः श्रविष्ठाः ( घनिष्ठा २४ ) · कुर्वतां सुपुष्टिम् ( ४ श्रा में महत् २५ शतभिषग् वरीय आ मैं २६- २०७ द्वयो प्रोष्ठपदा पूर्वा - उत्तरा भाद्रपदा ) सुशर्मे श्री २८ रेवतीच अश्वयुजो ( अश्विनौ ) भगं मै, श्रा में रयिं २ भरण्य आवहन्तु ' ( अथर्व १६।७।२ ) । तब गृह - नक्षत्रपूला कभी वेद - विरुद्ध अथवा अर्वाचीन नहीं सकती, किन्तु वेदानुकूल हैं; तब उनकी पूजाके मन्त्र भी वेदके हो हो सकते हैं — ऋषि - मुनियोंने उन्हें बेदसे दुहकर निकाला – उनकी हम इस निबन्धमें दिखला ही चुके हैं । सनार्तन धर्म जब वेद तथा वेदाङ्ग, उपवेदको मानता है, और बेदको ११३१ मानता है, उसी वैदिक साहित्यमै वर्णित गूहपूजा आदिको यदि हिन्दु मानने को तैयार नहीं; तो उसका हिन्दुधर्मके मुख्य - शून्य वेद पर तथा हिन्दुधर्म पर भी कोई अधिकार नहीं 1 वेदका विषय ' यज्ञ होता हैं, जैसे कि " यज्ञो मन्त्र - ब्राह्मणस्य ' [ वेदस्य ] ( न्यायदर्शन ४ | १ | ६२ ) ' चत्वारो वै वेदास्तैर्मृज्ञस्तामते ( गोपुस - Collection नवग्रहाके वैदिक मन्त्र ४७५ बा ० ( ४ ) ' वेदस्तिावद् यज्ञकैमप्रवृत्ताः ' ( सिद्धान्त - शिरोमणि गणिताध्याय मध्यमाधिकार, कालमानाध्याय है ) ' दुदोई यज्ञसिद्ध्यर्थ-मृग्यजुः - साम - लक्षणम् ' ( मनु || १३ ) ' एदमंगन्मं देवय॒जन॑म् ऋक् सोमाभ्यां॑ सन्तरन्तौ यजुर्भिः ( यजुः वा ॰ सं ० ४।१ ) ' वेदे मन्त्रा अवश्यं यज्ञगतेन पुरुर्षेण यथा॑यथं विपरिणमयितव्याः ' याज्ञे कर्मणि स वेदप्रोक्को नियमः ' ( महा ० पस्पशा ० ) इत्यादि इस विषयके बहुत प्रमाण हैं, वैदमें भी यज्ञ - विषय सुस्पष्ट हैं । ' यज्ञ ' यजधातुसे बनता है, यजधातुका अर्थ है देवपूजा, जैसे कि वेदम भौं कहा है — ' यज्ञे - यज्ञे स मर्त्यो देवान् सपर्यति ( पुजयति ) ( ऋग्वेद १० | १३ | २ ) सूर्य - चन्द्र आदिको वेद देवता मानता है, तब वेदमें देवपूजाका विषय होनेसे उसमें प्रहपूजा भी सिद्ध हो गई । प्रहपूजक वेदने प्रत्येक ग्रहाको पूजाके मन्त्र नरखे हा — यह कैसे सम्भव है? वृहत्पर । शरस्मृतिमे॑ कहा ' वेदमन्त्रविना कश्चिद् विधिर्नास्ति द्विजन्मनाम् ’ ' ( ६।६७ ) । गृह्यसूत्रामै ग्रह - यज्ञ भी प्राये हैं; श्राहुति देते समय उस - उस देवताका मनसे ध्यान करना पड़ता है, जैसा कि निरुके ( ३२ ( ११ ) और एतरयमा ० ( शेदार ) में कहा है और तत्तदेवताका मन्त्र भी अवश्य बोलना पड़ता है; वर्ष नवग्रह क्रिसी मंत्रके देवता भी सिद्ध होगये, उनकी पूजा भी उस मंत्र से सिद्ध हो गई, तब ग्रहपूजा वैदिक कालसें स्वतः सिद्ध हुई । केवल वेदका श्रीग्रह आप करें, तो तो आर्यावर्त आयावत, गुरुकुल श्रादि शब्द भी वेदमें न होनेसे श्रापको बोटने पड़ने, प्रापके , गुरुकु अनुसार बनसीर । पाँच सहस्त्र वर्षके ग्रन्थोंमें इनका वर्णन होनेसे इन्हें श्रवैदिक के मानना पड़ेगा, इनका प्रचार पुराण भी वेदकै साथ ही उत्पन्न हुए हैं । इसलिए वेदमें भी उनका " वर्णन श्राया है – ' पुराण ' यजुषा सह । उच्छिष्टाजज्ञिरे ' ( अथर्व ० Gujarat. An eGangotri Initiative

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४७६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ११।६ ( ७ ) २४ ) इत्यादि । केवल उन ( पुराणों ) की रचना पौरुषेय है, वैसे वे श्रनादि हैं । व्यासजीन उन्हें बनाया नहीं;. उ उनका प्रतिद्वापरमें वेद संहिताओंकी भान्ति सम्पादन करते हैं । ग्रहपूजा जो वैदिक परम्परासे था रही थी, पुराणोंने भी उसी परम्पराको संरक्षित करके हमें वैदिक कालके साक्षात् दर्शन करा दिये हैं । ‘ पुराण ' पुरा - नव होते हुए भी पुराने ही रहते हैं-क्योंकि वे धनादि हैं । जब यह प्रकट हुए तब भी ' पद्मपुराण ' आदि नामसे कहे जाते थे, ' पद्मनवीन ' आदि नामसे नहीं । यदि पुराण न होते, तो हम आज वेदोंकी महत्ता भी न जान पाते; और हमारा आज अस्तित्व भी न होता, हमें वैदेशिक जातियाँ निगल लेतीं । यह उन्हीं पुराणोंका ही प्रभाव है कि हमें कोई भी नवीन मत प्रस्तित्वसे च्युत न कर सका । ' तब समाधि - समधिगतवेदतत्त्वं वाले ऋषि - मुनियोंकी बातको • पाँच हजार वर्षको बताना थपने - आपको अंग्रेजी - दृष्टिकोणका... मानसिक दासमात्र सिद्ध करना है । वेदको एक अर्ब वर्षसे बताना और उनके अझाँकी पांच हजार वर्षसे उत्पत्ति मानना यह सदोष दृष्टिकोण है । वस्तुतः वेद भी एक अर्ब वर्षके नहीं, किन्तु अनादि है, इसी प्रकार उनके अङ्ग - उपाङ्ग भी अनादि हैं; उन्होंमें प्रोक्क अनादि ग्रहोंकी - पूजा भी धनादि- सिद्ध है । ग्रहपूजा न होनेसे सती विवाहका परिणाम अच्छा न हुआ; जैसे कि शिवमहापुराण पार्वती - खण्ड में पार्वतीने शिवजीको कहा था - ' दक्षकन्या खदाऽहं वै पित्रा दत्ता यंदा तव । यथोक्तविधिना, तत्र विवाहो न कृत-स्त्वया । न ग्रहां पूर्जितास्तेन दण जनकेन मे । ग्रहाणां विषयस्तेन सच्छिद्रोऽयं महानभूत् ' ( २६ / १२-१३ ) श्रादिकाव्य श्रीवाल्मीकिरामा-यणमें — ' नक्षत्राणि च सर्वाणि महाश्च सह दैवतै: ' [ पान्तु त्वां पुत्र! ] ' -CC - 0. Ankur * Joshi Collection नवग्रहोंके वैदिक मन्त्र 500 ( योध्याकाण्ड २५ | १४ ) में ग्रहोंखे रक्षाकी प्रार्थना की गई है पूजाका ही अङ्ग होता है । इससे ग्रहोंकी प्रतिकूलतामें । प्रार्थना दुष्फलकी सिद्धि भी होती है । वेदमें ग्राह्या ग्रहांः संसृज्यन्तेः स्त्रिया ' यन्त्रियते पतिः ' ( ०१२ २३६ यहां पर ग्रहोंके ग्राही ( विशेष गृहकी दशा ) से मिलने स्त्रीका विधवा होना बताया है । इससे ग्रहों का फल वैदिक सिद्ध होता पर है । उनकी शान्त करनेके लिए ही वेदने ' शं नो दिविचरा महाः ( १ ) यहां ग्रहोंकी पूजा - प्रार्थना बताई है । अन्य उपाय भी शास्त्रोंनें बताये गये हैं । जैसे कि – ' ये चास्य दारुणाः केचिद् ग्रहाः सूर्योदयो दिवि । ते श्राज चास्य सौम्या जायन्ते शिवाः शिवतराः सदा ( ३।२००६५ ) यहाँ उद्य गायत्रीजंपसे क्रूरग्रहोंका सौम्य हो जाना बताया है । उपवेद ( सुश्रुतसं शारीर ० १०।१०-११ ) में भी ग्रह - गृहीत बच्चे को स्तन न पीना, दांत-कटकटाना, निरन्तर “ रोना ” श्रादि " कहा है । " शातातपस्मृतिर् ६२७, छोड १।२० ) में भी जप - होमादिसे गहाँको सौम्यता बताई है । तव ' सत्यार्थ-प्रकाश ' ११ समुल्लास ' २१६ पृष्ठ में ग्रह - फला फल पर उपहास करते ग्रह हुए स्वा ० द ० जीका ' भीं वेदोपवेदादिसे अपूर्ण परिचय सिद्ध हुआ । इस यह सब वैदिक एवं शास्त्रीय सिद्धान्त है । आशा है पै ० जी भी वैदेशिक चच एवं त्रुटिपूर्ण दृष्टिकोण से देखने की अर्वाचीन एवं कृत्रिम दृष्टिको हटा ११ कर शुद्ध भारतीय हैष्टिको अपनायेंगे । तथ मा - * ० * - स्म Gujarat. An eGangotri Initiative

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( २० ) ग्रहण और उसका सूतक ग्रहपूजाके प्रकरणवश महण तथा उसके शौच विषय पर भी यहां निबन्ध दिया जाता है । सूर्यग्रहण एवं चन्द्रग्रहण असुर राहु-केतु द्वारा हुआ करते हैं — यह वेदादि सब शास्त्रोंका सिद्धान्त है । श्राजकल के अर्वाचीन विचार वाले व्यक्ति राहु - केतु ग्रहको माननेके लिए उद्यत नहीं होते । कारण यह है कि वे पाश्चात्योंके अनुगामी हैं । जो बात पाश्चात्य विद्वान् कह दें, वे उसे ' पत्थरको लूकीर ' मानने लग जाते हैं; पर इस स्वराज्यके अवसर यदि वे ब्रास्यमनोवृत्ति नहीं छोड़ना चाहते, तो यह स्वतन्त्र भारत के लिए परिवापका विषय है । वे लोग केवल चन्द्रकी छायासे सूर्यग्रहण तथा पृथिवीकी छाया चन्द्र-ग्रहण मानते हैं, उसमें राहु - केतुका सम्बन्ध सर्वथा नहीं मानते । वे इस विषय में ' छादयत्यर्कमिन्दुर्विधु भूमिभा: ' ( ४४ ) इस ग्रहलाघवके वचनको ' सिद्धान्त शिरोमणि ' के नामसे देकर ( - देखिये सत्यार्थप्रकाश ११ समु ० पृष्ठ २१७ ) अपने मतको पुष्ट करना चाहते हैं, और राहु-केतुको पुराणकल्पना - प्रसूत मानते हैं । पहले हम इस विषयमें शास्त्रीय तथा वैदिक प्रमाण उपस्थित करते हैं । जो लोग ग्रहणमें राहुका संयोग सर्वथा नहीं मानते, वे लोग अपने मान्य प्रसिद्ध ज्योतिष - ग्रन्थ ' सिद्धान्त शिरोमणि ' के निम्न वचनको . स्मरण रखें-दिग्देशकालावरणादिभेदान च्छादको राहुरिति ब्रुवन्ति । यन्मानिनः केचलगोलविद्यास्तत् संहिता - वेदपुराण बाह्यम् ' । ( गोलाध्याय ग्रहण- चालना ६ ) CC - 0. Ankur Joshi Collection ग्रहण और उसका सूतक e ' राहुः कुभामण्डलगः शशाङ्क, शशाङ्कगश्छादयतीन ( सूर्य ) विम्बम् । “ ‘ तममयः शम्भुवरप्रदानात्, सर्वागमानामविरुद्धमेतत् ( १० ) यहां पर राहु - ग्रह - द्वारा ग्रहण कहा गया है । पृथिवीकी छायामें स्थित होकर राहु चन्द्र - अहण करता है, चन्द्रमामें स्थित होकर राहु-सूर्य - प्रहण करता है । जो लोग राहुको श्राच्छादक नहीं मानते.... उनको श्रीभास्कराचार्यने ज्यौतिष - संहिता तथा वेद - पुराणसे अनभिज्ञ बढ़ाया है । न केवल वेदाङ्ग ( ज्यौतिष ) ही राहु - ग्रह द्वारा ग्रहण मानता है; प्रत्युत वेद भी ग्रहणों. कारण ' राहु ' को मानता है । देखिये-' स्वर्भानु वा श्रासुरः सूर्ये तमसा विन्मांध ( १/३/२/२ ) यह शतपथ-ब्राह्मणका वचन है । ऐसा ही गोपथ ब्राह्मण ( २/३/१६ ) ताण्ड्य ब्राह्मण ( ४ [ ६।१३ ) ग्राड्वायन - ब्राह्मण ( २४।३ ) में है । श्रय मन्त्रभागमें श्री पाठक देखें -' यं वै सूर्य स्वर्भानुस्तमसाऽविध्यदासुरः ' ( ऋग्वेद ११४० | ६ ) । यहां पर असुर ‘ स्वर्भानु ' के द्वारा सूर्यका ग्रहण माना गया है । ‘ स्वर्भानु ' राहुको कहते हैं, देखिये –'अमर - कोष ’ —– ' तमस्तु राहुः स्वर्भानुः ’ ( १।३।२६ ) कई. श्रार्यसमाजीगंण यदि हमारी बात न मानें; तो वै स्वामी दयानन्दजीको साक्षी भी देख लें । ' उणादिकोष ' ( ३।३२ ) सूत्रको भ्याख्यामें स्वामीजीने लिखा है— स्वर्भानुः राहुः ' ( पृष्ठ ११ ) । इसमें श्रार्यसमाजके विद्वान् श्रीमियरलजी घार्ष ( अब स्वामी ब्रह्म-सुनिजी ) की साक्षी भी देखें । ‘ वैदिक ज्योतिष - शास्त्र ' ( पृ ० १४०-१४ ) में वे लिखते है वेदमें सूर्य ग्रहणका वर्णन है । ' यत् त्वा -सूर्य! स्वर्भानुस्तमसाविध्यदासुरः ' हैं सूर्य! स्वर्भानु नामक मेघ - सदृश श्राच्छादकने तुझे अन्धकारसे ढक दिया ' मन्त्र में ' स्वर्भानु ' शब्द सूर्य-Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 260

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36 ४८० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) के छादक राहुके लिए छाया है । ज्योतिष प्रन्थोंमें भी: सूर्यग्रहण करने वाले राहुको ' स्वर्भानु ' कहा है – ' स्वर्भानोर्वेदतर्काष्ट ' ( सूर्य - सिद्धान्त १२।२६ ) ' ' वाल्मीकिरामायण ' ने भी सूर्य ग्रहण करने वाले छादक राहुको ' स्वर्भानु ' नाम दिया है - ' स्वर्भानुरिव भास्करम् ' ( १०२।३ ) । ” ) इस प्रकार महाभारत ( वनपर्व ११११३ ) में भी है । " स्वर्भानु ' का अर्थ है, ' स्वः - स्.ग्रॅ भानवः - किरणा यस्य नतु भूलोक अर्थात् जिसकी किरणें आकाशादिमें रहती हैं, भूलोक में नहीं । STE जहां पर स्वर्भानु शब्द से ' राहु ' तथा उसके द्वारा ग्रहण श्राधुनिकः विद्वत्सम्मत है, वहां पर बेदको भी सम्मत है; यह पूर्व बताया जा चुका है । " यत्र वेदको अन्य साक्षी भी देखिये - 117 -‘ शं नो ग्रहाश्चन्द्र॑म॒साः शमादित्यश्च राहुण " ( अथर्ववेद १६ | ' ' ) ' यहां पर राहुसे ग्रस्त सूर्यका कल्याणकारी होना प्रार्थित किया गया है । ‘ ऋग्वेद ' के उक्तं मन्त्र में ' स्वर्भानु तथा सूर्य ' शब्द श्राये थे; पर. ‘ अथर्ववेद ' के इस मन्त्रमें उनके पर्यायवाचक ‘ राहु ’ तथा ‘ आदित्य ' आये हैं । ‘ उणादिकोष ' के ‘ टसनिजनिरहिभ्यो ण ' ( १।२ ) इस सूत्रके श्रर्थमें स्वा ॰ दयानन्दजीने ' राहु ग्रहविशेष महाव: ' ( पृ ० ३ ) यह लिखकर राहुको ग्रहविशेष मान लिया है । सूर्यसिद्धान्तमें भी ' पाता राहुः स्वर्रहसा ' ( २ रा ६ ) राहुकी सिद्धि होती है । व्याख्या व्याख्याता रङ्गनाथने वहाँ लिखा है ——— पातस्थानाधिष्ठात्री देवता राहुजीवविशेषः, चन्द्रपतिस्तु दैत्यविशेषां राहुः, रहति - त्यजति ग्रहमिति राहुः श्रार्यसमाजके विद्वान् श्री ब्रह्ममुनिजीने उक्त मन्त्रका अर्थ इस प्रकार किया है — ‘ चन्द्रमाके ग्रहणं सुखदायक हो, राहुके साथ सूर्य भी सुखदायकं हो ।..सर्व - सूर्यग्रहणका नाम ' स्वर्भानु ' है; क्योंकि— सूर्यका सर्वग्रास होनेसे ' स्वः ' द्युलोक में ' भानु ' अर्थात् सूर्य जिस CC - 0. Ankur Joshi Collection ग्रहण और उसका सूतक ४८ ४८१ छादकसे [ छन्न ] होता है; वह सर्व सूर्यप्रहण ‘ स्वर्भानु ' कहलाता है, शेष ' विर सब प्रकार के सूर्यग्रहण ' राहु ' नामसे कहाते हैं । ' ( वैदिक ज्योतिष तस्य ( १४ ) आर्यसमाज अथर्ववेदभाष्यकार श्री क्षेमकरणदासजीने ० व्यग अर्थ यों किया है- ' सूर्य राहु - ग्रह विशेषके साथ शांन्तिदायक इसका न्यून ‘ पौर्णमासोमित्र निशां राहुग्रस्तनिशाकराम् ' ( वनपर्व ६८ । १४ ) यां हो । ' इस राहु द्वारा चन्द्रग्रहणका वर्णन थाया है । अग पद्य ‘ राहोश्छाया स्मृतः केतुः यत्र राशौ भवेदयम् । तस्मात्सप्तम के केतु राहुः स्याद् ' यन्त्र चांशके ' ( भुवनदीपक २१ श्लोक ) इस शास्त्र के प्रमाणसे ' राहु ' से ' केतु ' ग्रहका भी ग्रहण हो जाता है । स्वामी दयानन्दजीने अपने ‘ उणादिकोष ’ ( १।७४ सूत्रकी व्याख्या ) में लिखा है । —— केतु: - ला कर ग्रहः ' ( ६.१८ ) श्रथर्ववेदके उक्त मन्त्रका उत्तरार्ध यह है -......... पुस्त ‘ शं नो मृत्युधूमकेतुः शं रुद्रास्तिग्मतेजसः ' ( अ. १ || १० ) ” बि पृथि • इसका [ श्रार्यसमाजी भाष्यकार श्री जयदेवजीने या लिखा है--' जनोंके मृत्युके कारण धूमकेत - ग्रह हमारे लिये शान्त रहें । तीच्णप्रकाश वाले प्रजाके रुलाने वाले केतुग्रह · · शान्त रहें । ' इससे ' केतु ' ग्रह प्रच वेदोक्त सिद्ध होता है, तब उससे ग्रहण भी वैदिक सिद्ध हुआ । थन्य भी सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहणके विषय में बहुतसे प्रमाण मिलते हैं, पर श्रव प्रधान - ग्रन्थ वेदों के प्रसारण आजानेसे ' सर्वे पदा हस्तिपदे - निमग्नाः ' के अनुसार शेष पुस्तकोंके प्रमाण उपस्थित करना आवश्यक नहीं समझा गया । उप अम ' ग्रहलाघव ' के प्रमाणके विषय में: यह जानना चाहिये कि वादी लोग हैं, इसके पूर्व प्रकरणको छिपा देते हैं । ' छादयत्यर्कमिन्दुः ' ( ४।४ ) से भङ्ग पहले यह शालिनी छन्दका श्लोक चन्द्रग्रहणाधिकार में आया है - ' एवं अथ पर्वान्ते वि - राह्वर्क - बाह्वोरिन्द्रात्पांशाः सम्भवश्चेद् ग्रहस्य ( ४२ ) इसमें Gujarat. An eGangotri Initiative