सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 261–270
सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 261–270
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४८२ श्रीसनातनधर्मालोकः, ( ४ ) ' बिराहु ' का अर्थ है – ' विगतो राहुर्यस्मात् स विराहुः श्रर्क: - सूर्य, तस्य बाह्रोः - भुजात् ' अर्थात् सूर्य की राशिसे राहुकी राशि घटाओ, शेष sara र्क होता है, उसका भुज और उसके अंश बनायो । १४ श्रंशसे न्यून होने पर ग्रहणका सम्भव होता है । तत्र स्वा ० द ० जीसे प्रमाणित इस पुस्तकमें भी ग्रहण में राहुकी सत्ता सिद्ध हुई । ' शैला द्वौ खशरा गोः ' ( ७ ) इस पद्य में राहुका ७२११० ध्रुव बताया गया है । ११ पद्य मध्यम राहु श्रानयनकी रीति कही गई है । प्रकरणवश यहां पृथिवीकी स्थिरता भी शास्त्रीय दृष्टिकोणसे दिख-लाई जाती है | राहु - केतुको न मानने वाले ही भूभ्रमण मी माना करते हैं; पर यह बात शास्त्र- परम्परासे विरुद्ध है । ( १ ) प्राचीन पुस्तक ‘ सूर्य - सिद्धांत ' के ‘ मध्ये समन्तादण्डस्य भूगोलो व्योम्नि तिष्ठति । विभ्राणः परमां शक्तिं ब्रह्मणो धारणात्मिकाम् ' ( १२।३२ ) इस पद्यमें पृथिवीकी स्थिरता ही दिखलाई है, भ्रमण नहीं । श्रार्यभटीयको ( ४११. पद्यकी ) टीका में श्री उदयनारायण वर्माने इस पद्यका अर्थ करते हुए ' भ्रमण करता हुआ अवस्थित है ' यह अर्थ स्वकपोलकल्पनासे प्रक्षिप्त कर दिया है । इस कारण, रङ्गनाथकी टीकामें इस पुद्यकी अवतरणिकामें लिखा है— ' भूम्यवस्थानमाह ' । ( २ ) कई साहसी ' सव्यं भ्रमति देवानाम् श्रपसव्यं सुरद्विपाम् । उपरिष्टाद् भगोलोऽयं ' ( १२। ( १ ) इस सूर्य सिद्धान्तके पद्यसे, पृथिवीका भ्रमण सिद्ध करते हैं, पर यह अशुद्ध है, भगोलका अर्थ ' नक्षत्रगोल ' ' हैं, भूगोल नहीं । ' भूगोल ' यह पाठ भी सम्भव नहीं; श्रन्यथा छन्दो-भङ्गका प्रसंग श्राता है । रङ्गनाथने भी ' नक्षत्राधिष्ठित - मूर्तगोलः ' यही किया है । CC - 0. Ankur Joshi Collection · ग्रहण और उसका सूतक ४८३ ( ३ ) श्री भास्कराचार्य - रचित ' सिद्धान्त शिरोमणि ' के गोलाध्याय ( ४ ) भुवनकोश निरूपण में ' मरुच्चलो भूरचला स्वभावतः ( ५ ) ' भूमेः ' पिण्डः... नान्याधारः स्वशक्त यैव वियति नियतं तिष्ठति ' ( २ ) पृथ्वी स्थिरता ही मानी है— ' ष्ठा गतिनिवृत्तौ ' । ( ४ ) पृथिवीके नाम भी ' अचला, स्थिर । ' ( अमरकोष २1१1१ ) इसी कारण प्रसिद्ध हैं । ( ५ ) निघण्टुमें जो पृथिवीका नाम ' गौ ' है, वहां पर ' गच्छति इति गौः ' यह निर्वचन श्री यास्कने नहीं किया, किन्तु ' दूरं गता भवति ' किया है— ' नहि अस्या अन्त उपलभ्यते ' यह श्री दुर्गाचार्यने उसका तात्पर्य दिखलाया है । ' यच्चास्यां भूतानि गच्छन्ति ' ( निरुक्त रा १२ ) इस निर्वाचन से पृथिवी पर प्राणियोंके गमनसे उसे ' गौ ' बताया है, पचनेसे नहीं । इसी प्रकार वहीं ' गातेर्वा ' यह धातुभेद है, श्रर्थभेद नहीं, निर्वाचन पूर्ववत् है । नहीं तो जब ' गच्छतीति गौः ' यह सीधी व्युत्पत्ति इसकी हो सकती थी; तब पूर्वोक्त व्युत्पत्तियोंकी क्या श्रावश्यकता थी? बल्कि – ' गच्छतीति गौः ' यह व्युत्पत्ति श्रीयास्कने सूर्य अर्थ वाले ' गो ' शब्दमें रखी है, देखिये निरुक्त ( २ । १४ । ४ ) । तब पृथिवी अर्थ वाले ' गो ' शब्द में ' गम्यते, अथवा गम्यते श्रनया ' यही व्युत्पत्ति सिद्ध हुई । ( ६ ) वेदमें भी ' अस्थात् पृथिवी ' ( श्रथर्व ० ६।४४ । १ ) ध्रुवा [ निश्चला ] पृथिवी ' ' श्र ० ६ ८६।१ ) ' तस्थतुः [ द्यावापृथिव्यौ ] ऋ ०४ । ५६२ ) * द्यौश्च भूमिश्च तिष्ठतः ' ( श्र ० १० ८१२ ) इत्यादि बहुत मन्त्रों में पृथिवीकी स्थिरता बताई है । ' ( ७ ) जो कि स्वा ० द ० जीने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में ' यायं गौः पृश्निरक्रमोद् श्रसदन्मातरं पुरः । पितरं च प्रयन्त्स्व: ' इस मन्त्रसे पृथिवीका भ्रमण सिद्ध किया है; यह ठीक नहीं- ( क ) इस मन्त्रका देवता पृथिवी नहीं, तब उसका अर्थ यहां कैसे हो सकता है? अजमेरी वैदिक यन्त्रालयकी यजुर्वेद सं ० ( ३६ ) में इसका देवता ' अग्नि ' लिखा Gujarat. An eGangotri Initiative
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४८४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) है, और वहींकी ऋ ० सं ० ( १०११८६ | १ ) में इसका ' सूर्य ' देवता लिखा है । जिस मन्त्रमें जो देवता होता है, उसमें उसीकी स्तुति होती है, देखिये निरुक्त ( ७।१।४ ); तब यहां पृथिवीका वर्णन कैसे हो सकता है? ( ख ) पृथिवी वाचक ' गौ: ' स्त्रीलिङ्ग होता है, यहां ' अयं गौः ' पुलिङ्गमें घाया है; भूगोल अर्थ करने पर भी ' गो ' शब्द स्त्रीलिङ्ग ही रहा करता है, तब यहां के पु ंलिङ्ग ' गो ' शब्दका ' पृथिवी ' अर्थ कैसे हो सकता है? ( 7 ) ' गो ' शब्दका विशेषण उक्त मन्त्र में ' पृश्नि ' है, अतः यहां ' सूर्य " ही अर्थ है । निरुक्तमें भी कहा है- ' गौरादित्यो भवति गच्छ अन्तरिने ' ( २।१४।४ ) ' पृश्नि ' भी पृथिवीका नाम नहीं होता, किन्तु सूर्यका । जैसे कि ' पृश्निरादित्यो भवति, प्राश्नुवते एनं वर्णाः ” ( faco RIPR ) ( घ ) जो कि ऋ ० भा ० भू ० के १३६ पृष्ठमें स्वा ० द ० जीने ' पृश्निः ' इस ' गौः ' के विशेषण प्रथमान्तपदका ' पृश्निम् - श्रन्तरिक्षम् आक्रमणं कुर्वन् ' इस प्रकार द्वितीयान्तता कर दी है, यह उनका वेद पर अाक्रमण है । ( ङ ) फिर ' स्वः- सूर्ये पितरं पुरः- पूर्व? यहां पर ' सूर्यस्य परितो याति ' यह पद स्वामीजीने वेदमें स्वयं ' प्रक्षिप्त ' कर दिये हैं । ( च ) ' पूर्व ' का ' परितः ' ( चारों ओर, अर्थ कैसे हो सकता है? यह है स्वामीजीके वेदार्थका आदर्श । उक्त पाश्चात्य मतको वेद पर लादना एक वैदिकम्मन्यको शोभित नहीं होता । ( छ ) पृथिवी - अर्थ करने पर मातरं, पितरं, स्वः ' यह मन्त्रके पद असम्बद्ध हो जाते हैं । सूर्य होने पर तो वे सम्बद्ध रहते हैं, ' मातरं ' का अर्थ है यहां ' पृथिवीम् ' और ' पितर ' का अर्थ है ' लोक ' । जैसे कि - द्यौष्ट्वा पिता, पृथिवी माता ' ( अ ० १ | २८ | १ ) ‘ भूमिर्माता... द्यौः नः पिता ' ( अ ० ६।१२०।२ ) ' द्यौष्पितः! पृथिवि! मातः ' ( ऋ ० ६।२१।५ ) ' द्यौर्नः पिता... माता पृथिवी ' ( श्र ० ३ | ११ | १२ ) । CC - 0. Ankur Joshi Collection • ग्रहण थौर उसका सूतक ४८५ ४८६ श्रय उक्त मंत्रका अर्थ यह हुथा । ‘ गौः - गमनशीलः, पृश्निः - प्राष्टवर्षो व्याप्ततेजा अयं सूर्यः श्राक्रमीत् श्राक्रान्तवान् । श्राक्रम्य घूमता पूर्वस्यां दिशि परिदृश्यमानः, मातरं - सर्वभूतजातस्य जननीं पुरः पुरस्तात्, । पूर्वपक्ष क श्रसदत् - व्याप्नोत् । ततः पितरं - वृष्टिलक्षणस्य रेतसो निषेकेण भूमिम् । भर इस जगत उत्पादकं स्वः - स्वर्गलोकं, चकारादन्तरिक्षं सर्वस्य | श्रथर्ववेद च प्रयन्- गच्छन् । स अर्थात् [ सूर्य ] एव वृष्ट्युदकलक्षणस्य श्रमृतस्य दोहनाद् गौ: । ( अथवं ० । सारा वि ६।३१।१ ) ( ऋ ० १०।१८६।१ ) यह सायणाचार्यका कैसा सम्बद्ध समझें, है? इससे सूर्य का भ्रमण ही स्पष्ट सिद्ध हो रहा है । अन्य श्रर्थं । वाणीसे करने पर क्लिष्ट - कल्पना और वेदके गले पर छुरी फेरनी पड़ती है । .D ( ज ) जो कि - श्री ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासुने स्वा ० द ० के यजुर्भाव्य- वही बा विवरणकी योजनाके संक्षिप्त विवरण २-३ पृष्ठमें लिखा है- ' सम्भवतः मानने पर सन् १६२६ के दिसम्बर - मासकी बात है, जब मैं अपने आश्रम में बैठा श्रुतिसे वा यजुर्वेदभाष्यके ‘ श्रायं गौः ' ( यजुः ३ । ६ ).. मन्त्र पर विचार कर रहा था, प्रकार सि उसमें श्री स्त्रामीजी महाराजने ' गौ ' अर्थ किया- ' गौरिति पृथिवी होगा । नामसु पठितम् - गौरिति पृथिव्या नामधेय यद् दूरंगता भवति, यच्चास्यां हुए पहल भूतानि गच्छन्ति ( नि ० २।५ ) यहां गौ ' ' का अर्थ पृथिवी स्वामीजीने हुआ? निघण्टु तथा निरुक्तके उपयुक्त प्रमाणसे किया और ' पृथिवी घूमती है ' हैं, कुछ इस विषयका प्रतिपादन किया । मैंने स्वयं ही स्वामीजीके उपर्युक ( झ ) " अर्थ पर अपने मन में प्रबल पूर्वपक्ष उठाये कि - स्वामीजीका यह श्रर्य नीको . करना ठीक नहीं; क्योंकि उसी निरुक्त में ' आदित्योपि गौरुच्यते ' ( २६ ) तरसम्मत सूर्यको भी ' गौ ' कहा है, निरुक्त ' २/१४ में भी यास्क ऐसा ही मानते हैं — ‘ गच्छत्यन्तरिक्षे ’, तो फिर यहां इस मन्त्र में ' गौ ' का अर्थ पृथिवी या कैसे है? आदित्य क्यों नहीं? उधर जब ऋ ० सा ० अथर्व तै ० सं ० आदिमें अनेक स्थलों पर इस मन्त्रका सायणाचार्यका अर्थ देखा तो ( अ श्री है । इन सबमें ' गो ' का अर्थ ' सूर्य ' ही मिला और सूर्य पृथिवीके चारों श्रीर ' Gujarat. An eGangotri Initiative
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, ४८६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) -प्राष्टवर्णो घूमता है ' सब जगह ऐसा ही अर्थ पाया । अब इतने प्रबल - पुरस्तात पूर्वपक्षको उठाकर श्रात्मामें शान्ति कैसे हो सकती थी । निरन्तर सप्ताह 7 भूमिम्, भर इसी पर विचार करते - करते बड़ी ही व्याकुलता रही । अन्तमें सर्वस्व श्रथर्ववेदका ‘ वर्षेण भूमिः पृथिवी वृताऽऽवृता ' ( १२।१।१२ ) मन्त्र मिला छन् । स अर्थात् वर्ष भर में भूमि अपना चक्र काटकर पूरा ( श्रथचं सारा विषय स्पष्ट होकर शंका निर्मूल हो गई । समझें, समाधान आने पर जो अपूर्व आनन्द प्राप्त न्य अर्थ वाणी से नहीं हो सकता ' । श्रीब्रह्मदत्तजी के हृदय में जो पूर्वपक्ष नर्माण्य वही वास्तव में उत्तरपक्ष था, और वेदसम्मत सम्भवतः मानने पर स्वा ० दयानन्द के पक्ष में श्राघात पढ़ता, करती है. जिससे पाठक वृन्द! ' सत्य हुथा, उस्का वर्णन उदय हुआ था, था । पर वैसा श्रद्धामें ठेस पड़ती, नमें बैठा श्रुतिसे बलात्कार करना पड़े तो कोई बात नहीं; स्वामी की रहा था, प्रकार सिद्ध हो जावे । ' आलोक ' पाठकोंने यह अच्छी तरहसे भांपा पृथिवी. होगा । यास्क के मतसे ' गौ ' हा अर्थ ' चलने वाली ' जब नहीं है — यह स्थ पहले स्पष्ट कर चुके है, तब स्वामीजीका पक्ष उसकै चामने हुआ? वेदमै सूर्यके चल तथा पृथिवीके श्रचला होनेमें बहुत मन्त्र हैं, कुछ हम दिखला चुके हैं । घूमती है उपर्युक्त ( झ ) ' वर्षेण भूमिः पृथिवी वृतावृता ' इस मंत्र मिलने से जो श्रीजिज्ञासु-पह नीको अत्यन्त प्रसन्नता हुई, वह भी व्यर्थ है; क्योंकि इस मन्त्रका - ' ( RIE ) तत्सम्मत अर्थ निकलता ही नहीं, किन्तु यह अर्थ है - ' या भूमिः, मानते पृथिवी ॐ तै ० सं ० ' यह अर्थ वेदानुकूल है, जैसेकि ' यथेमे द्यावापृथिवी सद्यः पर्येति देखा तो सूर्य: ' ( अथर्व ६।६।३ ). यहां ' द्यावापृथिवी ' कर्म हैं, ' सूर्य ' पर्येति ' क्रियाका रों ओर श्री है । hemal by ' CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. ग्रहण और उसका सूतक ४५७ वर्षेण - वृष्ट्या, वृता - युक्ता, श्रावृत श्राच्छन्ना च भवति ' जो पृथिवी वृष्टिसे युक्त एवम् श्राच्छन्न है । ' वर्षा ' शब्द स्त्रीलिङ्ग और बहुवचनमें वर्षा-ऋतु वाचक होता है, वर्षे वर्षणमत्र अस्ति, अर्शघ्राद्यच् ( पा ० ११२।१२७ ) टापू; देखिये श्रमरकोष ( १।४।१६ ) । नपुंसकलिङ्ग वाला ' वर्ष ' शब्द वृष्टिका वाचक होता है, जैसे कि = ' वृष्टिर्वर्पम् ' ( श्रमर ० १ | ३ | ११ ) और जैसे निरुक्तके ' वर्पेण प्रच्छाद्य पृथिवीम् ' ( २ श्र ० २ पा ० ) इस वाक्य-में । इसकी सिद्धिं ' भयादीनामुपसंख्यानम् ( नपुंसके क्तादिनिवृत्यर्थम् ) ( ३।३।१६ ) इस वार्तिकसे होती है । वेदमें उसका प्रयोग सम्भवतः सर्वत्र होती भी वृष्टिवाचक ही हैं । तब उक्त मन्त्रमें वृष्टिका ही वर्णन सिद्ध हुआ । उक्त मन्त्र के पूर्वार्धनें ' यस्यां भूम्याम् अहोरात्र संहिते क्रमश श्रागच्छतः ' कहनेका श्राशय यह है कि भूमिलोकमें यही क्रम है, स्वर्गादिलो में नहीं | तब यह स्वामीमें अत्यन्त श्रद्धाका ही परिणाम है कि उन्होंने वर्षका श्रर्थं वहां ' साल ' कर दिया और पृथिवीकी गति यहाँ बलात् निकाल दी । निरुक्तादिमें कहीं ऐसा नहीं । ' वृता, आवृता ' का ' गच्छति - प्रत्यागच्छति ' यह उनका किया अर्थ सर्वत्र निर्मूल है । फलतः आर्षशास्त्रोंमें पृथिवीका ग्रहण कहीं भी नहीं । ग्रहनक्षत्र आदि पश्चिमसे पूर्व में अपनी गतिसे जा रहे हैं, परन्तु प्रवह - वायुंके कारण पूर्वसे पश्चिममें जाते हुए दीखते हैं, यह बात योगदर्शन व्यासभाष्य ( ३।२६ ) में सूर्य - सिद्धान्त ( १२/७३ ) तथा श्रार्यभटीय ( ४।१० ) सिद्धान्तशिरोमणि गोलाध्याय मध्यमगतिवासनामें निरूपित है । यदि पृथिवीका भ्रमण हमारे शास्त्रोंसे सिद्ध हो जाए तो हमें बढ़ी प्रसन्नता होगी; परन्तु हमें बहुत अन्वेषण करने पर भी नहीं मिला । श्रार्यभटीयके मूल में भी नहीं मिला । जो इतनी बड़ी पृथिवीका श्राकाशमें उड़ना मानेगा, वह पुराण-प्रोक्त पर्वतकि उड़नेमें आक्षेप कैसे कर सकता है? अब ग्रहणकालके अशौच पर लौकिक दृष्टिसे विचार किया जाता । जब सूर्य ग्रहण वा चन्द्रग्रहण होता है, तो उस समय दूरबीन An eGangotri Initiative
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४८८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) या अणुवीक्षण आदि यन्त्रोंसे देखा गया है कि कई सूक्ष्म तहां फैल जाते हैं । वे यांख, मुख, नासिका आदि द्वारा भीतर घुस जाते हैं.। इसीसे हम शुद्ध हो जाते हैं । ‘ मनुस्मृति ' में ‘ राहोश्च ं सूतके ' ( ४ | ११० ) इस पद्यमें सूतक ( अशौच ) माना गया है । उस समय यदि भोजन तो उन कीटाणुओं के बाहर - भीतर व्याप्त होनेसे उदराग्नि जाती है । इधर भोज्य वस्तुथोंमें भी कीटाणु स्थित होते कीटाणु जहां-हम लोगों के इसी कारण राहु - दर्शनका किया जाय, विकृत हो हैं । उनके खानेसे खाने वालेके शरीर, मन, बुद्धिकी हानि हुआ करती । इसी कारण शांस्त्रोंमें उस समय भोजनका निषेध किया गया है । जैसेकि -बृहद्विष्णु - स्मृति में कहा गया है ' चन्द्रार्कोपरागे नाश्नीयात् ( ६८/१ ) स्मृतिचन्द्रिकाके आह्निककाण्डमें भी कहा है— सूर्यग्रहे तु नाश्नीयांत् पूर्वं याम - चतुष्टयम् । चन्द्रग्रहे तु यामांस्त्रीन् बालवृद्धातुरैविना ' । उसमें प्रमाण यह है कि — बादलोंसे ढकी वर्षा ऋतु में सूर्यमण्डलके बादलोंसे ढके होनेसे उसमें भी कीटाणु फैल जाते हैं, जिन्हें सूर्य नष्ट किया करता था । तेज ' उष्ण - स्पर्श ' वाला हुआ करता है, उससे कीटाणु नष्ट हो जाते हैं; पर उस तेजमें श्रावरण पढ़नेसे ऊष्माकी कमीके कारण कीटाणुओं की व्यापकता अनिवार्य हो जाती है । इसी कारण वर्षाऋतुमें भी हमारी उदराग्निमें विकृति हो जानेके कारण परिपाकशक्तिकी न्यूनतावश भोजनादि करनेसे मलेरिया रोग फैल जाता है । इसीलिए ही हमारे संस्कृत - साहित्य में बादलोंसे ढके दिनका नाम ' दुर्दिन ' मिलता है । ' दुष्टं दिनम् ' यह इसका विग्रह है । ' दुष्टता यही हैं कि — मेघों द्वारा सूर्यके ढके होनेसे कीटाणु उत्पन्न होकर हमें हानि पहुँचाते हैं । ' इसी कारण उन दिनों हमारे शास्त्रकारोंने चातु-CC - 0. Ankur Joshi Collection ग्रहण और उसका सूतक ४ ४६० यतका आयोजन किया है । व्रतोपवासोंसे हमारे शरीरम गर्मीका बढ़ जाती है; जिससे भीतर पहुँचे हुए कीटाणु नष्ट हो जाते हैं ऊष्मा क । इसीलिए स्नान कई हमारी वृद्धा माताएँ जब तक सूर्य दर्शन नहीं कर लेतीं गर्मीका भोजन नहीं करतीं ।; तब तक नहाते य इसी प्रकार ग्रहण में भी सूर्यके तेजके ढक जानेसे सूक्ष्म फैलकर हमारे शरीरको काटते हैं; जिससे हमारे शारीरिक वा कीटाणु मान निरन्तर सिक रोगकी श्राशङ्का रहती है । इसलिए हमारे वैज्ञानिक शास्त्रकाराने सूर्य - म उस समय भोजन निषिद्ध कर दिया है । इसी कारण ही हमारी हैं जिस -धर्मनिष्ठ स्त्रियां रातको दीपककी साक्षीमें भोजन कर रहे होने पर • वायुसे दीपक बुझ जाने पर भोजनको तत्काल छोड़ देती हैं । उसमें क्रमशः भी यही रहस्य है कि दीपकका प्रकाश भी ' तेज ' है, वह भी उष्णस्पर्श- लने पर -वाला होनेसे कीटाणुओंको नष्ट करता है । दिया बुझ जाने पर उप्पस्पर्श को ऊप -तेज हट जाने पर कीटाणुओं की उत्पत्ति हो जानेसे वह अन्न भक्षण - योग्य होती ह नहीं रहता । इसीलिए ही जिस घर में न कभी अग्नि जली हो, न है, इस -सूर्यका प्रकाश आदि पहुंचता हो, न दीपक जलता हो, उस घरमें यो नः भूत - प्रेतोंका प्रवेश होनेसे रहना भी उचित नहीं समझा जाता । यह ' इनो स्थूल ग्रहणका फल है; वेधमें वे ही बातें सूक्ष्मतया होती हैं । इस जाता ग्रहणके बाद शास्त्रकारोंने स्नानकी भी श्राज्ञा दी है, क्योंकि इससे स्नान बाहर - भीतरको शुद्धि हो जाती है 1 । ' श्रद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति, ( मनुं ० शुद्धों की - * । १६० ) इसमें कारण यह है कि - स्नान करनेसे हमारे अन्दर गर्मी शुद्ध · का उद्वमन होता है, जिससे शरीर के बाहिर - भीतर पहुँचे हुए कीटाणु तक तो -नष्ट हो जाते हैं । इसलिए जो लोग सर्दीमें प्रातः - स्नान नहीं करते, पर बुद्ध उनको सर्दी बहुत लगती है, क्योंकि रात्रिमें उष्णताभाववश से उत्पन्न मानसि कीटाणु हमारे शरीरको काटकर सर्दी लगवाते हैं । स्नान करनेसे अन्दर - करना Gujarat. An eGangotri Initiative
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YEE ४६० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) में ऊपमा गर्मीका उद्गम हो जानेसे वे कीटाणु नष्ट हो जाते हैं । गर्मी में यद्यपि इसीलिए स्नान करनेसे बाहर शीतलता प्रतीत होती है परन्तु उस समय भी भीतर तब तक गर्मीका ही उपजन होता है, इसीलिए ही गर्मी में जो लोग अधिक नहाते हैं, उनको तापको व्याधि हो जाती है । यह भी सोचना चाहिए कि रातको हमें मूर्छारूप नींद क्यों आती कीटासु है? उसमें कारण यही है कि सूर्यके प्रदर्शनसे इस प्रकारके कीटाणु 7 मान- -- निरन्तर उत्पन्न होते जाते हैं, जिनसे हमारे शरीरकी दंशन - क्रिया होनेसे सूर्य - मूलक बुद्धिरूप - चेतनाके हासवश उस विषसे हम मूर्छित हो जाते हमारी हैं जिसकी परिभाषा ' निद्रा ' होती है । सूर्योदय निकट होने पर उन होने पर काकी शक्ति क्रमशः क्षीण होने लगती है, जिससे हमारी मूर्छा उसमें क्रमशः हट जाया करती है इसकी परिभाषा ' जागरण ' है । सूर्य निक-स्पर्श- लने पर बाहर के कीटाणु नष्ट होने पर भी शरीरान्तः - स्थित कीटाणुओं-स्पर्श को ऊष्मासे नष्ट करनेके लिए प्रातः स्नान करना पड़ता है । मूर्छा ए - योग्य होती है चेतना लुप्त होने पर । वुद्धिरूप चेतनाको देने वाला सूर्य होता हो, न है, इसलिए सूर्य के तेजसे- ' तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो घर में यो नः प्रचोदयात् ' ( यजुः ३।३५ ) - बुद्धिकी प्रार्थना की जाती है । " । यह ' इनो विश्वस्य भुवनस्य गोपाः स मा धीरः ( ऋ ० १/१६४ / २६ ) इस मन्त्र में सूर्यको ' धीर ' ( धियं राति ददाति ) बुद्धिप्रद माना जाता है | इस प्रकार ग्रहणके समय भी भोजन नहीं किया जाता और इस स्नान किया जाता है । परन्तु इस स्नानकी ऊष्मासे सूक्ष्म शरीरसे मनुं ० शुद्धोंकी ही अशुद्धि दूर होती हैं, सूक्ष्मशरीरकी अशुद्धिवाले अन्त्यजोंकी: गर्मी शुद्धि स्नानसे नहीं होती । सूर्यग्रहण रात्रिके परिमाणका बहुत समय कीटाणु तक तो नहीं होता, अतः वहां पर स्थूल - मूर्च्छा तो नहीं हो सकती, करते, पर बुद्धिप्रद सूर्य तथा हमारी बुद्धि में राहुका आवरण पढ़ जानेसे उत्पन्न मानसिक मूर्च्छा प्राशासित होती है । अतः उस समय व्रत - स्नानादि अन्दर करना पड़ता है । CC - 0. Ankur Joshi ग्रहण और उसका सूतक ५६१ इसमें हिन्दुओं का विज्ञान ज्ञान ही कारण है कि वे तब भोजन नहीं करते और स्नान करते हैं । इसका ज्वलन्त उदाहरण अन्य लीजिये । किसी का कोई पड़ौसी मर जाय, जब तक उसका शव घरमें पड़ा है, तब तक कोई भी हिन्दु भोजन नहीं पकाता तथा खाता, चाहे रात भी हो जाय । शवके निकल जाने पर गलीकी जलसे शुद्धिकी जाती है । इसमें क्या कारण है? इसमें कारण हैं हिन्दुओंको विज्ञानका ज्ञान । शवमें श्रात्मा न होनेसे भीतर ऊष्मा न होनेसे कीटाणु उस शवपर श्राक्रमण करते हैं । वहांसे इधर - उधर फैल जाते हैं, इसलिए मुर्दे पड़े रहने तक कोई भोजन नहीं करता । जैसे शवसे कीटाणुओंका फैलाव हो जाता है, वैसे ही ग्रहणके समय सूर्यके ढके होनेसे कीटाणुओंके जहां - तहां फैल जानेसे शास्त्रकारोंने भोजन करना भी निषिद्ध कर दिया है । उसके बाद श्रपनी शुद्धि भी श्रादिष्ट की है । Collection Gujarat. शव के गलीसे निकल जानेपर लोग जलसे गलीकी शुद्धि क्यों करते हैं इसमें भी रहस्य है । पृथ्वीके अन्दर भी ऊष्मा होती हैं । उसके ऊपर जल ढालनेसे पृथ्वीसे भापका उद्गम होता है, उस गर्मी से उस पर स्थित शवके कीटाणु नष्ट हो जाते हैं, इस प्रकार पृथ्वी की शुद्धि हो जाती है । इसी कारण ही रात्रिकी समाप्तिके बाद पाकशालाकी शुद्ध्यर्थं जलयुक्त मिट्टीसे लेप किया जाता है, जलयुक्त मिट्टी के लेपसे पृथ्वी से निकली हुई गर्मी फैल जाती है, जिससे पाकशालाकी भूमिपर ठहरे हुए रात्रि - मूलक कीटाणु नष्ट हो जाते हैं । इसलिए वह भूमि पाकयोग्य हो जाती है । नहीं तो वहां कीटाणुओंके प्रेमसे मक्खियां बहुत बैठती हैं | सनातनधर्मकी सन्ध्यामें जोकि गायत्री - मन्त्रसे अभि-मन्त्रित करके जलका वेष्टन किया जाता है और जोकि प्रत्येक वस्तु के स्पर्शके समय हाथ धोएं जाते हैं, जोकि सन्ध्यामें मार्जन तथा जलसे श्रङ्गस्पर्श वा इन्द्रियादि - स्पर्श किया जाता हैं । सन्ध्या श्रादिके प्रारम्भमें जोकि An eGangotri Initiative •
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४६२ श्रीसनातनधर्मालांक: ( ४ ) पादप्रक्षालन किया जाता है. उन सबका रहस्य वही है जो बतलाया जा चुका है कि वैसा करनेसे भीतरसे ऊष्माका उद्गम होता है । जिससे वहीँ ठहरे हुए कीटाणु नष्ट हो जाते हैं । हमारे मुलतानकी स्त्रियां जब अपने छोटे लड़के को अस्पृश्य ( अन्त्यज ) से छुटा हुआ देखती हैं, तो उसकी शुद्धिकी प्रयोजनीयता होने पर भी उससे शीतादि - जन्य-हानिका विचार कर अपने कानके सुवर्ण भूषणसे जलको छूकर उस लड़के पर डालती हैं, और उसे पवित्र समझ लेती हैं; वहां भी रहस्य यही है कि सुवर्ण थाकरज ( खान से उत्पन्न होने वाला ) होनेसे तेजका विषय है, उस तेजसे तथा कभी अपवित्र न होने वाले श्राकाशके अंश-भूत दाहिना कान जिसमें शास्त्रानुसार देवताओंका निवास माना जाता है - से स्पृष्ट जल, पवित्र होनेसे उस लड़के के अस्पृश्यसे प्राप्त कीटा-शुत्रोंको पूर्वरीतिले ऊष्मा द्वारा नष्ट कर देता है । फलतः ग्रहणके बाद शुद्ध्यर्थं स्नान करनेका यही रहस्य है । रात प्रतिदिन आती है । उसमें असुर - राहुका कोई सम्बन्ध नहीं इस प्रकार वर्षा ऋतु भी अपने समय पर प्राती है, अतः उसमें प्राकृ-तिकता नहीं । तब उसमें लम्बा समय होने से निरंतर भोजन - निषेध न भी किया जा सके, पर सूर्य आदिका ग्रहण तो सदा नहीं होता । इधर उसमें असुर - राहुका सम्बन्ध भी है, अतः वहां अप्राकृतिकतावंश कीटाणु बहुत प्रादुर्भूत हो जाते हैं, श्रतः उसमें भोजन सर्वथा निषिद्ध है । प्राकृतिक मैथुनमें उतनी हानि नहीं होती, जैसी अप्राकृतिक " ' मैथुनमें । यतः ग्रहणके थोड़ेसे समयमें भोजन छोड़नेसे कुछ कष्ट भी अनुभूत नहीं होता है । -यदि कहा जाय कि ' सुधारक लोग ग्रहणके समय भोजन कर लेते हैं, स्नान भी ग्रहणके बाद नहीं करते, उनको तो हानि. कुछ भी नहीं CC - 0. Ankur Joshi Collection ग्रहण और उसका सूतक ४६४ ५६३ होती, इस पर जानना चाहिए कि उस समयके कीटाणु उनके नहीं; वा मन पर भी अवश्य दुष्प्रभाव करते हैं । तभी तो उनमें शरीर यदि हठ, कुविचार - श्रादिका आधिक्य होता है । भोजनका सम्बन्ध श्रश्रद्धा, मनसे होता है । तभी तो कहा जाता है ' जैसा खावे अन वैसा होवे इसलिए ' छान्दोग्य उपनिषद् ' में कहा गया है- ' योऽणिष्ठः मन । स्थूल [ अवस् हो भागः ] तन्मनः ' ( ६ २११ ) ' अन्नमयं हि सोम्य! मन. ' ( ६५५४ जात ‘ अन्नस्य अश्यमानस्य योऽणिमा, स ऊर्ध्वं समुदीषति, तन्मनो भ ). वेद ( ६।६।२ ) ' यो मध्यमस्तन्मांसम् ' ( ६।२।१ ) । रूपर यहां पर अनके स्थूल भागसे मांस तथा सूक्ष्म भागसे मनका क्रम शक्ि निर्माण कहा गया है । तब सुधारक लोग ग्रहणादिमें भोजन कर लेनेसे मन तथा शरीरमें मालिन्य हो जानेसे छल, अश्रद्धा तथा पुनः असत्य - ग्रहणके स्वभाव वाले हो जाते हैं; तभी वेदादि - शास्त्रोंके सत्य लिए अर्थको छोड़कर छल - कल्पित असत् अर्थ करने लग जाते हैं । जात ' ना यदि कहा जावे कि - ' ग्रहणके समय स्नान न करने वाले प्रत्युत मूल खाते हुए सुधारकों से भिन्न पुरुषों की भी तो कुछ हानि नहीं देखी जाती; न तब उस समय स्नान और अनशन श्रादिष्ट करने वाले शास्त्रको ततो प्रमाण क्यों न माना जाए? इस पर यह जानना चाहिये किं-• श्रायुर्वेद में कई सब्जियों के खानेका निषेध किया है और कई व्यवस्थाओं-के पालने की आज्ञा है, जैसे कि — भोजन करके तेज़ चलना निषिद्ध है, आलु आदि खानेमें दोष बताया है; परन्तु श्राजकलके छात्र एवं श्रध्या- रेशम पक शीतकाल में प्रायः भोजन करके ही शीघ्रगति से विद्यालय के प्रति दौड़ते दीखते हैं, जिससे देर न हो जाये । इस प्रकार श्रायुर्वेदः निषिद्ध संक्र सब्जियोंको खाने वाले भी बहुतसे दीखते हैं, तब क्या यह लोग श्रायु-र्वेदके स्वस्थ - वृत्तके सेवन न करने से प्रतिदिन बीमार ही रहते हैं? यदि दूस Gujarat. An eGangotri Initiative
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४६४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) -६३ नहीं; तब क्या शङ्काकर्ता दृष्टशास्त्र - आयुर्वेदको ही श्रसत्य मान लेंगे? बारीर यदि नहीं, तब यहां भी वैसा क्यों नहीं सोचा जाता? श्रद्धा, जैसे श्रायुर्वेदकी पूर्वोक्त श्राज्ञाओं के पालन न करने पर उस समय मनसे स्थूलरूपसे तो हानि नहीं दीखती; पर अग्रिम समय में वह ' सूक्ष्मरूपसे नन ' । हो ही जाती है, अर्थात् वह दोष अवहेलनकर्ता के अन्दर सञ्चित हो 18 = नस्य ) जाता है । इस प्रकार क्रमश: आयुर्वेद नियमोंके, श्रतिक्रमण करने पर वे दोष उसमें सञ्चित होकर शक्ति - हास होते - होते, समय पर ज्वर श्रादि-वति ' रूपसे प्रकट हो जाते हैं, वैसे ही ग्रहणादिके समय शास्त्राज्ञा के व्यति-क्रमसे सूक्ष्म रूप से सञ्चित दोष क्रमशः इकट्ठे होकर कालान्तर में धार्मिक-ननका शक्तिका हास कर आचार - विचार - भ्रष्टता, बुद्धिमन्दता, स्वल्प चायुं, कर पुनः पुनः व्याधि होना - इत्यादिरूपसे प्रकट हो जाया करते हैं । इसी-तथा लिए मनुजीने भी कहा है- धर्मातिक्रमणका फल सद्यः नहीं मिल सत्य जाता, किन्तु कालान्तर में प्रकट होकर सब कसर पूरी कर लेता है-' नाधर्मश्चरितो लोके सद्यः फलति गौरिव । शनैरावर्तमानस्तु कतु-मूलानि कृन्तति ' ( ४।१७२ ) यदि नात्मनि पुत्रेषु, न चेत् पुत्रेषु नप्तषु । · नाती; नस्वेवं तु कृतोऽधर्मः कतुर्भवति निष्फलः ( १७३ ) श्रधर्मेणैधते तावत् स्त्रको ततो भद्राणि पश्यति । ततः सपत्नान् जयति संमूलस्तु विनश्यति ' कें ( ४ । १७४ ) । है... ग्रहण के समय कुश आदि रखने तथा गुग्गल धूपादिके धुएं तथा ध्या- रेशमी वस्त्रोंके पहनने का यही रहस्य है कि जहां इनकी स्थापना होती प्रति · है; वहां इस प्रकारके कीटाणु नहीं बैठ पाते । इनसे दूसरेकी विद्युत्का संक्रमण भी रुक जाता है । इसीलिए भगवान् श्रीकृष्णने ध्यानके समय आयु- ' चैलाजिनकुशोत्तरम् ' ( गीता ६ । ११ ) ऐसा श्रासन माना है । इनमें यदि दूसरेकी विद्युत् तथा कीटाणुओं के रोकनेमें अपूर्व शक्ति है, इसलिए 1 CC - 0. Ankur Joshi Collection ग्रहण और उसका सूतक ४६५ बिजली की तार पर रेशम लपेटा जाता है । उस समय गांवर लेपन भी करना पड़ता है; गोबरसे भी कीटाणुओं का विनाश प्रसिद्ध है । पीतल श्रादि धातुके पात्रोंमें ग्रहणादिके समय अग्नि इस कारण डाली जाती है जिससे तापवश कीटाणु वहांसे हट जाते हैं । इसीलिए वेदादिमें अग्निको भूत - प्रेत यादिको हटाने वाला माना गया है । मिट्टी-के जूठे पात्रों में कीटाणुओं का अतिशय प्रभाव होता है: इस कारण अस्पृश्यतामें उन्हें गिरा दिया जाता है । उनकी अपेक्षा पीतल श्रादिके पात्रों में न्यून प्रभाव पड़ता है, इसलिए उनको भस्म तथा अग्निसे शुद्ध किया जाता है | सुवर्ण आदिके पात्रमें उन कीटाणुओं का प्रभाव पड़ता नहीं । उसका प्रमाण यही है कि- शेरनीका दूध अन्य पात्रों में कीटाणुओंके प्रभाववश शीघ्र विकृत हो जाता है; परन्तु सुवर्णपात्रमें वह नहीं फटता, क्योंकि 5-. उस पर कीटाणुओंका प्रभाव नहीं पड़ता । इसलिए सुवर्ण धारण करने वाले पुरुपकी आयु दीर्घ मानी गई है । देखिये इस पर ' अथर्ववेद ' -' नैनं रक्षांसि न पिशाचाः सहन्ते... यो विभतिं दाक्षायणं हिरण्यम् ' ( १।३३।२ ) । ' आयुष्मान् भवति यो बिभर्ति ' । श्र ० १६२६।२ ) । इसका कारण यह है कि वह सुवर्ण किसी से हुआ हुआ होता है; अतः वह कीटाणुओंोंको दूर करता रहता है । स्त्रियों पर इन अणुस्वरूप भूत - प्रेतादियोंका प्रसवादि - समय में प्रभाव बहुत पड़ता है; श्रुतः उससे बचाव के लिए सनातनधर्मानुसार उन्हें सुवर्ण - भूषणोंके पहिरनेका श्रधिक अधिकार दिया गया है । यही लक्ष्य करके ' आपस्तम्बगृह्यसूत्र ' में ~~ ' छिद्र े सुवर्णम् उत्तरयाऽन्तर्धाय उत्तराभिः पञ्चभिः स्नापयित्वा ’ ( २४८ ) इस प्रकार वधूका स्नान भी सुवर्णस्पृष्ट जलसे बताया गया है । यही सुवर्ण - जैसा प्रभाव कई मणियोंका भी हुआ करता है । Gujarat. An eGangotri Initiative
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४६६ श्री सनातनधर्मालोकः ( ४ ) इसीलिए ‘ अथर्ववेद ' में कई मणियोंका बहुत महत्त्व बताया गया है । इन्हीं कारणोंसे सुवर्ण तथा मणियां बहुमूल्य हुा करती हैं । कहा भी है – ' अमेध्यादपि च काञ्चनम् ' ( मनु ० २।२३६ ) यही धातु पात्रोंकी शुद्धि में तारतम्य है । इस प्रकार कीटाणुओं का प्रभाव चन्द्रग्रहण में भी जानना चाहिए । रातको यद्यपि सूर्यके ं न होनेसे कीटाणु हो जाते हैं, तथापि बहुत कीटाणुत्रोंको चन्द्रमा भी हटाता है, क्योंकि चन्द्रमा भी सूर्य की एक किरणसे प्रकाशित होता है । कोटाणुओंका प्रसार अन्धेरेमें होता है । बहुतसे कीटाणु प्रकाशमात्रको देखकर मर जाते हैं चाहे वह प्रकाश सूर्यका हो, चाहे चन्द्रमाका, चाहे अग्निका, चाहे दीपक वा बिजलीका । जब चन्द्रमाका ही स्वयं ग्रहण हो, तो कीटाणुओं का क्या कहना! जब पूर्ण चन्द्रग्रहण होता है तब ६८ प्रतिशत उसकी ऊष्मा हट जाती है । शेष दो भागोंकी ऊष्मा पूर्णग्रहणकी अन्तिम कोटिमें नष्ट हो जाती है । तबं कीटाणु खूब बढ़ जाते हैं । ज्यों ही चन्द्रमा राहु - केतु की छाया -. से बाहर आता है, त्यों ही उसकी ऊष्मा बढ़ जाती है । तब बाहरके-कुछ कीटाणु तो नष्ट हो जाते हैं; शेष भीतर - बाहरके कीटाणु नष्ट करनेके लिए स्नान करना पड़ता हैं । • चन्द्रग्रहणके लिए यह जानना चाहिये कि ' चन्द्रमा मनसो जात: ' " ( यजुः ३१:१२ ) ' चन्द्रमाः पातु ते मनः ' ( सुश्रुतसंहिता सूत्रस्थान ३।२७ ) ' मनसि तृप्ते चन्द्रमास्तृप्यति ' ( गोपथब्रा ० १२ २२ ) किमसुभिल--पितैर्जड! ( चन्द्र! ) मन्यसे मयि ( चन्द्र े ) निमज्जतु भीमसुतामनः ' ( नैषधीयचरित ४ | ५२ ) इन प्रमाणसे मनका चन्द्रमासे सम्बन्ध सिद्ध ' होता है । सूर्यसे बुद्धिका सम्बन्ध होता है; यह पहले केतित किया जा चुका है । ग्रहण - समयमें सूर्य - चन्द्रमासे बुद्धि एवं मानसिक शक्तिके CC - 0. Ankur Joshi Collection ग्रहण और उसका सूतक E ४६८ आदान - प्रदानमें कुछ व्यवधान हो जानेसे हानिकी श्राशंकोका के अन्दर करके शास्त्रकारों ने उस समय में दान - ध्यानकी ओर प्रवृत्ति कराई लक्ष्य सकते । • जिससे आसुरी माया नष्ट हो जावे । है, होती है; करना ही जिसकी जैसी प्रकृति हो, वहां वैसी विकृति हानि नहीं पहुँचाती । विधिव्यि जैसे कि हम दुर्गन्ध प्राप्त करते हैं, तो नासिकाको घृणासे सड़ हैं । उसके कीटाणु हमारे मस्तिष्कको विघूर्णित कर देते हैं; पर भंगी जो आदि विष्ठाकी, चमार चमड़ेकी, मुसलमान मांस पकनेकै समयकी गन्ध उसमें का से बैंसी हानि प्राप्त नहीं करते; जैसे कि हम, क्योंकि विषका कीड़ा विषसे शक्ति हो नहीं मरता । इसलिए ‘ श्रीमद्भागवत ' में भी कहा है- गर्भिणीक " दर्शन में ' समानकर्माचरणं पतितानां न पातकम् । दर्शन नि औत्पत्तिको गुणः सङ्गो न शयानः पतत्यधः ' ( ११।२१।१७ ) । उदाहरण अतः हम कृष्णपक्षको रात्रिमें वैसी प्रकृति वाले होनेसे वैसी ह अपनी स प्राप्त नहीं कर सकते; जैसे कि ग्रहणके समय प्राप्त कर सकते हैं; स्त्रीके श क्योंकि राहु - केतुके सम्बन्धसे ही कीटाणुलोकी हानिजनकता विशेष पर सतत की भी हुआ करती है | स्वाभाविक अन्धकार अन्य होता है; राहु - केतुकृत अन्य | इससे यह भी सिद्ध होता है कि जो कभी भी स्नानादि नहीं पति पत्न किया करते, और दुर्गन्ध यादिसे श्रोत - प्रोत हैं, वे पहले 8 से ही स तक किं कीटाणुओं की स्थितिवश ग्रहण जन्य कीटाणोंसे नयी हानि प्राप्त नहीं उत्पन्न हो करते; जैसे कि हम | असावधा ग्रहणमें बार्ल, वृद्ध, आातुरोंको जो कि अस्पृश्यतादोष नहीं लगाया जैस जाता; उसमें भी रहस्य है । ग्रहण - कीटाण रक्त - द्वारी ही शरीरको वान लेन दूषित करते हैं । बच्चों और बूढ़ोंमें रक्ताणु अत्यन्त न्यून होते हैं; इस. हो । आ कारण वहां का अपना प्रभाव नहीं डाल सकते । आतुर ( बीमार ) स्वामीजी Gujarat. An eGangotri Initiative
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६६७ ४६८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) | के अन्दर भी ऊष्मा होती है, कीटाणु उस पर भी प्रभाव नहीं कर लक्ष्य सकते । अथवा उसे स्नान कराया जाय; तो उसकी हानि श्राशंकित होती है; उपवास वह कर ही रहा होता है । स्वास्थ्य में उसने स्नान -करना ही होता है । ' शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ' इससे पूर्वका उसका विधिव्यतिक्रम सह्य होता है । बाती 1 लेते जो स्त्री सद्यो गर्भिणी हो; उसे भी ग्रहणदर्शनका निषेध होता है, भंगी उसमें कारण यह है कि- स्त्रीके गर्भाशय में इस प्रकारकी आकर्षण-गन्ध शक्ति होती है जो फोटोग्राफके शीशेंमें होती है । इसीसे श्रायुर्वेद में विषसे गर्भिणीकी सर्वविध - रक्षाके लिए विविध उपाय बताये गये है । ग्रहण-दर्शन में भो गर्भ में उसका श्राकार संक्रमण न हो जाएं, अतः उसका दर्शन निषिद्ध किया जाता है । इसमें एक अँग्रेजके काले लड़केका 1 उदाहरण प्रसिद्धः ही है । उसने अपने काले लड़केको पैदा हुआ देखकर अपनी स्त्रीको व्यभिचारिणी समझा, पर पीछे देखा गयां कि — उस स्त्रीके शय्यास्थल में एक काले हब्शीका चित्र लटका हुआ था । उसी पर सतत दृष्टि पढ़नेसे उसके संस्कार - संक्रमणवश, पैदा होने वाले लड़के-विशेष को भी वैसा आकार हो गया । उस समय परमात्माके ध्यानके अतिरिक्त तुकृत पति पत्नीको कोई बात नहीं करनी पड़ती । वे स्थिर होकर बैठें, यहां तक कि खुजलें भी नहीं, कुछ लिखें भी नहीं । श्राजकल ग्रहणके चिन्ह उत्पन्न होते हुए बालकों से कभी देखे भी जाते हैं - उसमें दम्पतिको नहीं सावधानता ही कारण होती है । गाया जैसे ग्रहण - समय के अशौच में तत्व है, वैसे सभी अशौचमं तत्त्व रीरको जान लेना चाहिये । मरणाशौच तब होता है, जबकि किसीकी मृत्यु • इस. हो । आजकल श्रार्यसमाजी इस शुद्धिको नहीं मानते; परन्तु उनके मार ) स्वामीजी मान गये हैं । उन्होंने लिखा है - ' जब गुरुका प्राणान्त हो; CC - 0. Ankur Joshi ग्रहण और उसका सूतक ४६६ तब मृतक शरीर जिसका नाम प्रेत है, उसका दाह करने हारा शिष्य प्रेतहारु श्रर्थात् मृतकको उठाने वालोंके साथ दशवें दिन शुद्ध होता है, ( सं ० प्र ० २ समु ० पृष्ठ १५ ) यहां वे दशवें दिन मरणाची शुद्धि मानते हैं; अतः यह पद्य स्वामीजीके मतमें प्रक्षिप्त नहीं । परन्तु श्राज-कल धार्यसमाजी इतने दिनकी अशुद्धि नहीं मानते । ' विज्ञायते, तस्य द्वौ अध्यायौ यद् श्रात्मा अशुचिः, यद् देशः ' ( श्राश्वलायनगृह्यसूत्र ३ | ४ | १ ) यहाँ सूतक ग्रादिकी अशुद्धि से ब्रह्मयज्ञ भी निषिद्ध किया गया है । 1 Collection Gujarat. मृत्यु - समयमें भीतर गर्मी न होनेसे कीटाणु शव पर श्राक्रमण करते हैं; तब शवके स्पर्श तथा उसके कीटाणुओंके इतस्ततः फैलनेसे जीविताका शरीर भी श्रशुद्ध हो जाता है - इसलिए शव उठाने वाले 1, शब - दाहके बाद स्नान करते हैं, परन्तु सम्बन्धियोंकी तो अशुद्धि ‘ दशाहं सर्पिण्डेषु ' ( श्राश्व॰गृ ० ४ । ४ । १८ ) कई दिन तक रहती है । उसमें कारण यह होता है कि - सम्बन्धियोंमें सदृश - रुधिर होनेसे उन कीटाणुओंका उन पर विशेष आक्रमण होता है और नियत समय उनमें स्थिति रहा करती है । इसीलिए बोधायन धर्मसूत्रमें कहा है -' सपिण्डेषु श्रादशाहमाशौचमिति जनन - मरणयोरधिकृत्य वदन्ति ' ( १।११।१ ) । वैखानसगृह्यसूत्र में भी कहा है- ' कुमारस्य कुमार्याश्च जनने सपिण्डानां दशाहमाशौचं विधीयते, पुरुषस्य सपिण्डता पष्ठ-पुरुषावधिः, कन्या॒यस्त्रिपुरुषावधिर्भवति । स्वाध्यायदानप्रतिग्रहाणि च वर्जयति ' ( ६।४ ) यहाँ पर इस अशौचके समय सन्ध्या- श्रादिका न करना भी कहा है । उसमें भी जो कि ब्राह्मणादिकी अशुद्धि के हटने में वर्णोंका दिन - भेद बताया है, उसमें भी विज्ञान है । ब्राह्मण प्रायः जन्मसे ही पवित्र होते है, क्योंकि सात्विक भोजनादिसे उत्पन्न शुद्ध रजोवीर्य से उनकी An eGangotri Initiative
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५०० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) उत्पत्ति होती है । उनका सूक्ष्मशरीर तथा भोजन भी अपेक्षा-कृत शुद्ध होता है । श्राचार - विचार - विहार भी शुद्ध होते हैं, अतः उनसे अपवित्रताके कीटाणुं स्व - सदृश खाद्यकी प्राप्ति न होनेसे क्षत्रिय श्रादिकी अपेक्षा शीघ्र ही हट जाते हैं; इस कारण उनकी शुद्धि भी अवधि दस दिन तक, क्षत्रियोंकी १२ दिन तक, वैश्योंकी १२ दिन तक, और शूद्रोंकी ३० दिन तक शुद्धि कही गई है । जैसे कि- ' शुध्वेद् विप्रो दशाहेन द्वादशाहेन भूमिपः । वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुध्यति ' ( ११८३ ) उसमें यही कारण है कि - निम्नजाति-जातमें उत्तरोत्तर अधिक अशुद्ध परमाणु रहते हैं; क्योंकि उनका अशुद्ध भोजन होता है, और सत्वगुण नहीं होता । अधिक - अशुद्ध परमाणुओं में स्थित अशुद्ध कीटाणु सदृशतावश D अपने खाद्यको प्राप्तिसे उन्हें छोड़ना नहीं चाहते । इसी कारण दो चाण्डालोंके मध्य में जाना भी निषिद्ध हुश्ना करता है; क्योंकि — दोनोंके कीटाणु वा बिजलियों दोनोंक मध्यम गर्ने भी सदृशतासे व्याप्त हो जाते हैं, इस कारण मास तक क्रमशः शुद्धि करने पर तभी वे शब - कीटाणु शूद्रसे छूटते 22 हैं, AN तब PRE उसके अपने ही कीटाणु बच जाते हैं, वे स्नानसे भी नहीं जाते, स्नानके पीछे . फिर शुरू हो जाते हैं । विदेशमें होने पर भी पिताको मृत्युमैं पुत्रकी अशुद्धिका कारण यह है कि पिताके मरने पर उसके कौटाणु वा बिजली विदेशमें स्थित भी उसके! पुत्रमें व्याप्त हो जाते हैं । जैसेकि घातक वाले पिता के मरने पर भी उसके अग्रिम सात पुरुषोंको वे श्रातशककै परमाणु नहीं छोड़ते । अथवा बिच्छू काटकर हमें अपना रुधिर दे जाता है, जितना-जितना वह भिन्न देशमें भी दौड़ता है, उतना उतना ही उसका रुधिर भी हममें चलता है जिससे नियत समय तक हमें उसकी पीढ़ा रहा करती है । जैसेकि - पिताकी लाभ - हानिमें विदेश - स्थित पुत्रका भी CC - 0. Ankur Joshi Collection ग्रहण और उसका सूतक ५०१ 10.२ दाहिना बायां श्रङ्ग फड़क उठता है, वैसे विदेश स्थित पुत्रमें भी नियत स्पृश्यास्पृ समय तक अशुद्धि संक्रान्त रैहती है । अथवा इसमें यह जानना विज्ञान सम चाहिये क़ि - कोई रेडियो यन्त्र पर बोल रहा है, यद्यपि उसकेभाषण के मृत्यु परमाणु सर्वत्र व्याप्त हो जाया करते हैं, तथापि उनका श्राक- प्रसव तब र्षण बहुत दूर विदेशों में भी ठहरे उस जातिवाले रेडियो विशेषत: यन्त्रमें हो जाता है, अन्यन्त्र नहीं । चाहे उसमें टेलीफोनको रहती है, तरह तारका सम्बन्ध नहीं भीं होता । इस प्रकार मृत्यु समपर्क पित्रोस्तु स परमाणु भी यद्यैपि सर्वत्र ब्याप्त हो जाते हैं, तयापि उनका तावन्माता आकर्षण उस जाति वालोंमें ही होता वे दूर देशोंमें भी जितना म क्योंकि उनके कर्मोंका परस्पर सम्बन्ध सर्वत्र रहता है । यदि दूरस्थ होवे, मनुजीने 2 परन्तु स उन जाति वाले सम्बन्धियोंका पारस्परिक परमाणु - सम्बन्ध, विच्छिन्न न्धियोंपर माना जावे, तब वो आता अपनी बहिन से दूर - देश में स्थित होने पर अपनी बान्धवाः बहिनके विवाह में अधिकृत भी हो जावे! पर नहीं होता, क्योंकि — दूर पूर्ण - शुद्धि स्थित होने पर भी उसमें बहिनसदृश ही परमाणु रहा करते हैं, अथवा बाद अप उन दोनोंके परमाणुओंका परस्पर श्रादीन - प्रदान रहा: करता है, वैसे सपिण्डे ही अशौचके परमाणुनका भी । पर फिर इसका अपबाद यह होता ( २६१ ) है कि — जब उस बहिनका वेदमन्त्रों द्वारा विवाह हो जाता है, तब मंत्र- दिन नाम कारण है शक्तिसे भ्राताका गोत्र - सम्बन्ध विच्छिन्न हो जाता है, तब समीपमें स्थित भाष्य में भी उसे हमारी सूतकादि अशुद्धि प्राप्त नहीं होती । यदि विशिष्ट- यस्य [ च विज्ञानवश हमारे रेडियोमें किसी देशके अंशके साथ सम्बन्धसूत्रयर्थः, हो जावे; तो उस देशके शब्दको हमारा यन्त्र नहीं खींच सकेगा । उस " नामधेयं समय दूसरेकी लड़कीसे विवाह सम्बन्ध हो जाने पर उससे हमारा ईशमी - ग्र श्रध्याहार Gujarat. An eGangotri Initiative