सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 271–280
सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 271–280
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५०१ १०.२ श्री सनातनधर्मालोकः ( ४ ) नियत स्पृश्यास्पृश्यता सम्बन्ध शुरू हो जाता है । इस प्रकार अस्पृश्यता-विज्ञान समूलक सिद्ध हो गया |: चाहिये राके मृत्युकी भांति प्रसवमें भी अशौचका रहस्य जान लेना चाहिये । थाक- तब प्रसव समय में निकले हुए अशुद्ध रुधिरके कीटाणुओंोंका भी श्राक्रमण विशेषतः माता - पिता पर होता है, अतः अधिक श्रशुद्धि भी उन्होंमें रहती है, अतः श्रीमनुजीने कहा है- ' सर्वेषां शावमाशैौचं, माता-नम पित्रोस्तु सूतकम् ' ( २१६२ ) । बोधायन धर्मसूत्रमें भी कहा है – ' जनने वावन्मातापित्रोर्दशाहमा शौचम् ( १।११।१७ ) उसमें भी कीटाणुओंका उनका । जितना माता पर आक्रमण होता है, उतना पिता पर नहीं । इसीलिए मनुजीने कहा है – ' सूतक मातुरेव स्याद् उपस्पृश्य पिता शुचिः ' ( २।६२ ) परन्तु समान - रुधिरवश उन कीटाणुओंका साधारण श्राक्रमण सम्ब-छिन्धिर्योपर भी हुआ करता है - जैसाकि ' मनुजीने कहा है – ' श्रशुद्धा अपनी बान्धवाः सर्वे सुतके च तथोच्यते ( २१८ ) । यदि वे सम्बन्धी अपनी — दूर पूर्ण - शुद्धि चाहें; तो वे जननी जनककी भांन्ति सूतक रखें, मर्यादा बाद अपनी शुद्धि करें । इसलिए मनुजीने कहा है- ' यथेदं शावमाशौचं थवा वैसे सपिण्डेषु विधीयते । जननेप्येवमेव स्याद् निपुणं शुद्धिमिच्छताम् ' ( ५२६१ ) । इसलिए स्वा ० द ० जीने भी उत्पन्न हुए लड़केका ११ वें होता दिन नामकरण कहा है ( संस्कार विधि पृ ० ६३ ) उसमें सूतकाऽशुद्धि हो - मंत्र- कारण है अन्य नहीं । इसीलिए १।१७।१ पारस्करगृह्यसूत्रके हरिहर-स्थित माध्यमें कहा है – ' अत्र दशम्यामिति सूतकान्तोपलक्षणार्थम् । ततश्च शिष्ट- " यस्य [ चर्णस्य ] यावन्ति दिनानि सूतकम्, तदन्तदिने सूतकोत्थापन-श्रुति मित्यर्थः श्रपरदिने च नामकरणम् । " इस प्रकार श्रीमेधातिथिने भी उस ' नामधेयं ' दशम्यां तु ' ( २।३० ) इस मनुवचनमें लिखा है-- ' इह केचिंद् हमारा दशमी - ग्रहणमशौचनिवृत्तिरित्युपलक्षणार्थं वर्णयन्ति श्रतीतायामिति च । अध्याहारः । दशम्याम् श्रतीतायां ब्राह्मणस्य, द्वादश्यां क्षत्रियस्य, CC - 0. Ankur Joshi ग्रहण और उसका सूतक ५०३ पञ्चदश्यां वैश्यस्येति ' । श्रीकुल्लूकभट्टने भी लिखा है- ' अशौचे तु व्यतिक्रान्ते नामकर्मं विधीयते ' इति शङ्खवचनाद् दशमेऽहनि श्रतीते एकादशेऽहनि ' | राघवानन्दने भी लिखा है- ' दशम्यामिति पूर्वाशौच-निवृत्तिपरम् ' । प्रसङ्ग होनेसे हमने यहां यह वर्णन किया है । अब ग्रहण समय में दान - पुण्यको कथा सुनिये - उस समय तमः के श्रावरणसे पापका साम्राज्य बढ़ रहा होता है; हमें उसे हटानेकै लिए पुण्यका साम्राज्य बढ़ाना पड़ता है, जिससे पाप- राज्यका दमन हो जय । दान - ध्यान श्रादिसे पुण्यका राज्य बढता है- यह सर्वसम्मत है । उसका प्रमाण यह है है कि रातको पापराज्यके बढ़नेसे हम प्रातःकाल उठकर स्नान करते हैं, फिर सन्ध्या करते हैं । इस प्रकार देवपूजनसे रात्रि - स्थित पापराज्यका निराकरण होता है; वैसे ग्रहणान्त में भी जानना चाहिये । शीतकालके अन्त तथा गर्मीके श्रारम्भमें, ग्रीष्मके अन्त तथा शीतके आरम्भमें दोनोंकी सन्धि होनेसे रोग उत्पन्न होते हैं! इस • प्रकार दिनके अन्त तथा रात्रिके यारम्भमें, रात्रिके अन्त तथा दिनके प्रारम्भ में भी दोनों कालोंकी सन्धि होती है । उसमें स्थूल रोग तो नहीं, परन्तु सूक्ष्म मानसिक रोगोंकी याशङ्का रहती है । इस प्रकार प्रातःकी शीतलताके अन्त तथा मध्याह्नकी उष्णता के श्रारम्भ में दोनोंकी सन्धि होती हैं । इन तीनों कालोंकी सन्धिसे उत्पन्न होने वाली मान-सिक्न विषमता दूरीकरणार्थ जैसे त्रिकालसन्ध्या की जाती है, वैसे ही ग्रहण के समयमें भी प्रकाश एवम् अन्धकारकी सन्धिके समय श्राशङ्कित मानसिक - विषमताके दूरीकरणार्थ जप - तप आदि किया जाता है । तभी सिद्धान्तशिरोमणि के गणिताध्याय ( चन्द्रग्रहणाधिकार ) प्रथम - पद्यमें कहा गया है— ' बहुफलं जपदानहुतादिके स्मृतिपुराणविदः प्रवदन्ति हि ' । यहां स्मृति एवं पुराणके वचन ये दिये गये हैं- ' स्नानं स्याद् उपरागादौ Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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५०४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) मध्ये होमसुरार्चने । सर्वस्वेनापि कर्तव्यं श्राद्धं वै राहुदर्शने । अकुर्वा-णस्तु नास्तिक्यात् पङ्क गौरिव सीदति । स्नानं दानं तपः श्राद्धमनन्तं राहुदर्शने ' । श्रीवराहमिहिरकी ' बृहत्संहिता ' में भी कहा है – ' योऽसौ असुरो राहुस्तस्य वरो ब्रह्मणाऽयमाज्ञप्तः । आप्यायनमुपरागे दत्तहुतां-शेन ते भविता ' । इस प्रकार ग्रहण समयमें दान, हवन, स्नान शास्त्रीय सिद्ध हुए । इसलिए ग्रहणके समयकेलिए प्रामाणिक ग्रन्थ ' सूर्यसिद्धान्त ' में भी कहा है- ' स्नानदानजपश्चाद्धव्रतहोमादि - कर्मभिः । प्राप्यते सुमहच्छ्रे यस्तत्काल ज्ञानतस्तथा । ११।१८ ) । ग्रहणके समयमें जो · दान दिया जाता है; वह अशुद्ध होता है अतः उस समय शुद्ध - ब्राह्मण वो नहीं लेते । या तो उसे शनिदानोपजीवी ब्राह्मण लेते हैं; या श्रन्त्यज लिया करते हैं । इससे उनकी सहायता भी हो जाती है । इधर ग्रहण - समयमें कभी ग्रहोंके परस्पर आकर्षण - विकर्षण के समय श्राकर्षणको शक्तिकें सामन्जस्य हट जानेसे ग्रहोंके पतनसे प्रलयकी श्राशंका भी उपस्थित हो जाती है । बहुतसे थाकाशस्थ ग्रह हमारी पृथिवीसे भी वढ़े होते हैं, यह बात निर्विवाद है । ग्रहण - समय में चाकर्षण - विकर्षण स्वाभाविक होनेसे यदि उसमें सामञ्जस्य उपस्थित हो जाय; तो ग्रहके एक अंशके गिरने से भी पृथिवीमें खण्डप्रलय हो सकता है । सब ग्रह तथा पात श्रदि, भगणोंको पूर्ण करते हुए एक बिन्दुमें जब मिल जाते हैं तब सृष्टिका अन्त वा प्रलय होता है, अतः ग्रहणमें भी वैसी शंका उपस्थित होनेसे, धर्म में बुद्धि लगाकर जप, यज्ञ श्रादि किया जाता है । श्रन्त - समयकी श्राशङ्कामें सभी इष्टदेवका स्मरण किया - कराया करते ही हैं । गत वर्षों में सात ग्रहोंके एक राशिमें थानेसे हो विहारका भूकम्प हुआ - यह कौन नहीं जानता । इस प्रकार ग्रहणमें भी ' सम्भव है । ग्रहणका अर्थ भी आकर्षण है, वैसी श्राशंका में अपने इष्टदेव को स्मरण करना ठीक ही है । तभी चेदमें ' शं नो ग्रहाचान्द्रमसाः CC - 0. Ankur Joshi Collection ग्रहण और उसका सूतक ५०५ ५०६ शमादित्यश्च राहुणा ' ( अथर्व ० १६/६/१० ) राहु - द्वारा ( चान्द्रमसा में ही ह ग्रहाः चन्द्रग्रहणानि ) चन्द्रग्रहण तथा सूर्यग्रहणको शान्त्यर्थ प्रार्थन की गई है । ' सूर्यसिद्धान्त ' में भी ग्रहण के समयको दारुण कहा शास्त्ररू है— ' श्राद्यन्तकालयोर्मध्यः कालो ज्ञेयोऽतिदारुणः । प्रज्वलज्ज्वलनाकारः गया उपासना सर्वकर्मसु गर्हितः ' ( ११।१६ ) । ऐसे भयावह काल में थोड़ा किया हुआ भी. सिद्ध हो यहाँ ' पो दान - ध्यानादि माङ्गलिक हो जाता है । दुर्जनतोषन्यायसे ग्रहण हानि- वैज्ञानिक कारक न भी माना जाय; तो भी उस समयका किया हुआ स्नान, दान, ध्यान कभी व्यर्थं तो नहीं हो सकता; क्या किये हुए पुण्यकर्म कभी निष्फल भी हो सकते हैं? ' तब इससे सुधारकोंको प्राकुलता क्यों तो प्र होती है? ' मृत्यु ' कि - ध यहाँ यह भी जानना चाहिये कि — ग्रहण और भूकम्पकै समय जब यूरे पृथिवीकी समान दशा हुआ करती है । भूकम्पके समय भी पृथिवीस्थ वा दाग सभी वस्तुएँ अपनी - अपनी शंक्तिको छोड़ देती हैं । ग्रहणको आकर्षण- हुई । इ शक्तिका भी बड़ा प्रभाव होता है । जैसे चुम्बक मणिको देखिये । उसके जहाँ भूकम्प अधिक हुआ करते है, वहाँ चुम्बकके साथ एक सुई को हुई । ज रखते हैं । वह सदा उससे मिली रहती है, परन्तु भूकम्पसे कुछ पहले फलका ही चुम्बक़ अपनी शक्तिको खो बैठता है, सुई उससे अलग होकर गिर भी अपन जाती है | शास्त्रानुसार भूकम्प पृथिवी में पाप - राशिके इकट्ठ े होने पर ( पृष्ठ १ पृथिवीके तेजकी क्षीणतासे होता है । आधुनिक विज्ञान यह कहता है ' मनुस्मृ कि — भीतरी अन्याय ( ऊष्मा ) से पृथिवी में भूकम्प होता है, जब पाँच महने ल अँगुलियाँ मिल जाती है; तो मुक्का प्रहार प्रवल हो उठता है, पर ठीक भी एक - एक अँगुलि वैसा कार्य नहीं कर सकती । भूकम्पका अनुभव ह भस्म पीछे होता है, पर उसका प्रभाव उक्त सूची द्वारा पहले से ही बताया बहुत स जाता है । इस प्रकार जैसे भूकम्पमें पृथिवीकी शक्ति क्षीण हो जाती है, गैसोंका वैसे ही ग्रहणमें भी 1 । " और उसका सूक्ष्म - प्रभाव ग्रहणके वेध ( छाया ) Gujarat. An eGangotri Initiative
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२०५ ५०६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) मसां में ही होने लग जाता है, पर स्थूल दृष्टिवाले उसे नहीं जान पाते; शास्त्ररूपी सुई ही हमें बताती है । उस समय बलकी प्राप्त्यर्थं ईश्वरकी गया उपासना दानादि, पुरुषोंके कल्याणार्थ तथा बलकी उत्पत्त्यर्थ समर्थ कारः सिद्ध होते हैं - इसी कारण शास्त्रकार तदर्थं प्रेरणा करते हैं । जो 7 भी. यहाँ ' पोपलीला ' समझते हैं, वे विज्ञानके ज्ञानसे होन है । हमारे महान् ज्ञान- वैज्ञानिक शास्त्रकार इन विषयोंमें दान, कभी केतुका ही एक भेद क्यों तो प्रत्यक्ष हैं । श्रथर्ववेद ' मृत्यु ' विशेषण थाया है । कि - धूमकेतु मृत्यु तक भी दे समय जब यूरोपमें ' धूमकेतु ' दिखाई दाग वाला ज्वर फैला, उसके अत्यन्त सप्रतिभ थे । धूमकेतु होता है, उसके दुष्फल ( १६६ / १० ) मन्त्रमें धूमकेतुका इससे यह भी सिद्ध होता. है देता है । तभी तो सन् १५३१ में पड़ा, तो उसके फलस्वरूप वहाँ पर बाद प्लेग फैला, जिससे बहुत मृत्यु एँ हुई । इसी तरह १६८२ तथा १७१८ में भी वहां धूमकेतु दिखाई पड़ा, उसके फलस्वरूप समस्त यूरोपमें महामारी फैलने से बहुत - सी मृत्यु हुईं । जब इस विषय में वेदका तथा प्रत्यक्षका अनुग्रह हुना; तब उसके फलका अपलाप कैसे किया जा सकता है? इसीलिए स्वा ० द ० जीने भी अपने ' उणादि - कोष ' ( १।७४ सूत्रकी व्याख्या ) में ' धूमकेतुः - उत्पातः ' ( पृष्ठ १८ ) इस प्रकार धूमकेतुको उत्पात ( उपद्रवजनक ) माना है । ' मनुस्मृति ' ( ११३८ ) में भी केतुयोंकी सृष्टि कही है । इस पर कुल्लूक-भट्टने लिखा है ' केतवः शिखावन्ति ज्योतींषि उत्पातरूपाणि ' । यह , पर ठीक भी है । धूमकेतुकी शिखाओंके झर जानेसे जहाँ - जहाँ उसकी हमें भस्म गिरती है, वा उसकी वायु प्रभाव डालती है, वहाँ - वहाँ ताया बहुत समय तक बीमारी फैली रहती है, क्योंकि धूमकेतु में हानिकारक ती है, गैसोंका संम्मिश्रण पाश्चात्य - वैज्ञानिक भी मानते हैं । राया ). CC - 0. Ankur Joshi ग्रहण और उसका सुतकं ५०७ श्रार्यसमाजी विद्वान् श्रीप्रियरत्नजी श्रार्ष भी अपने ' वैदिक ज्योतिष-शास्त्र? पृ ० १७३-१७४ में लिखते हैं- " वेदमें धूमकेतु नामक पुच्छवाले ज्योतिष्पिण्ढों का वर्णन थाता है । ' शं नो मृत्युधूमकेतुः ' मन्त्रमें धूम-केतुका मृत्यु- मारक विशेषण इसलिए है कि इसमें विषैले पदार्थ होते हैं । ' सौर - परिवार ' ( पृष्ठ ६८१ ) में लिखा है- ' उनकी पुच्छोंमें कार्बन एकौषिद् विषैले गैस अवश्य होते हैं । हमारा वायुमण्डल इतना कलुषित हो जावे कि - हम सब मर जावें । ( पृष्ठ १७३ ) ' स नो महान् अनिमानो ( अपरिमित आकारवाला ) धूमकेतुः ( पुच्छल तारा ) पुरुश्चन्द्रः । धिये ' वाजाय हिन्वतु ' ( ऋ ० १/२७/११ ) ( पृष्ठ १७६ ) ' नक्षत्रमुल्काभि-हतं शमस्तु नः ' ( श्र ० १६६६ ) यहाँ उल्काथोंसे घिरे हुए जड - नक्षत्र-को कहा गया है । ऐसा नक्षत्र धूमकेतु ही हो सकता है, धूमकेतु-उल्काओंको छोड़ते हैं " | इसी तरह राहु - केतु द्वारा सूर्य - चन्द्रके ग्रहण में भी दुष्फल हुआ करता है — यह हमारे पौरस्त्य ज्योतिषी जानते थे, अतः उस विपाक-समयकी अस्पृश्यता तथा उसके बाद अपनी शुद्धि यदि हमारे उन पूर्वजोंने लिखी है— उसे निर्मूल मानना या उसकी हँसी उड़ाना अपन श्रनभिज्ञता प्रकट करना है, अथवा अपनेको लार्ड मैकालेका मानसिक दास सूचित करना है ।. जो वे हमारे पौरस्त्य ज्योतिषी दूरस्थ श्राकाशकी बात बता देते हैं; तो वे यहांकी सूक्ष्म बान बता देने में समर्थ क्यों न हों? जिस दिन. 3 Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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205 श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) वे चन्द्रदर्शन बताते हैं, उसी दिन चन्द्र दौख जाता है । यदि वह मेघोंके श्रावरणले नहीं दीखता; तो क्या उस दिन चन्द्रदर्शन नहीं होता? इस प्रकार यदि उस समयकी अस्पृश्यता आदि नहीं दीखती, तो उसका अभाव नहीं हो जाता । उस समयके वायुमण्डलका अशुद्ध " होना वादी - प्रतिवादी सभी मानते हैं, तब उस श्रशुद्धताको दूर करने-के लिए स्नान - ध्यानादि क्यों न किया जाय? एक यह भी किन्होंका दुराग्रह हुआ करता है कि ये ग्रहणादिक तथा अन्य नियम क्या हिन्दुओंको ही दुःख दिया करते हैं; दूसरोंको तङ्ग नहीं करते? इसका उत्तर प्रकारान्तरसे ' न्यायदर्शन ' में दिया है-' अभ्युपेत्य कालभेदे दोषवचनात् ' ( २।१।१८ ) अर्थात् जो नियम परम्परा-से स्वीकृत कर लिये गये हों, उनके न पालने पर दोष हुआ करता है । क्या कारण है कि हिन्दु चाचेकी लड़कीसे विवाह करता हुआ डरता है, और मुसलमान निडर होकर उसे अपनी अङ्कशायिनी बना लेता है? इसमें वही स्वनियम - पालन मानना पड़ेगा । जबकि हमारे पूर्वजों को सौ में नव्वे बातें सत्य सिद्ध हो रही हैं तो अवशिष्ट अज्ञात नियमं वो उनके रहस्यपूर्ण हैं- - यह मानना पड़ेगा । उनका श्राचरण हमें कर्तव्य है ही । जैसे कि हिन्दु धर्ममें यह प्राचीन नियम हैं कि अपने गोत्रमें विवाह न करना, शिखा रखना, यज्ञोपवीत पहनना इत्यादि, पर मुसलमान लोग अपने गोत्रमें विवाह करते हैं, शिखा यज्ञोपवीत धारण नहीं करते; तथापि उनको कोई बाह्य हानि नहीं होती दीखती, यह CC - 0. Ankur Joshi Collection ग्रहण और उसका सूत्रक ZOE सोचकर हमें उक्त अपने नियम छोड़ नहीं देने पड़ते । बहुत विचार करने पर हिन्दु धर्मके सभी नियम रहस्यपूर्ण सिद्ध होते हैं, परन्तु खेदका अवसर है कि सुधारक लोग इनको तब मानते हैं जब कि उस पर पाश्चात्यांकी मुहर लग जाय । यह पाश्चात्यांकी मानसिक दासता • इस पूर्ण स्वराज्य के समय में अब हट जानी चाहिये । हिन्द यदि पाश्चात्यकी शैलीसे भी ग्रहण सिंद्ध होता है, तथा हमारी प्राचीन समाप्त वि शैलीसे भी । केवल सिद्ध ही नहीं होता, प्रत्यक्ष भी हो जा इ, तब शित किय अपनी शैली छोड़कर अर्वाचीन शैलीमें गिरनेकी क्या आवश्यकता है । के एक प आप उपनयन आदिके लिए पाश्चात्योंका अनुसरण नहीं करते, ' श्चोप बैठता है, अन्त्येष्टि अंग्रेजोंकी तरह मृतकको भूमिमें दबाकर नहीं करते, तब ग्रहण- अग्रिम भ के विषय में भी अपनी प्राचीन शैली ही अपनाइये, अर्वाचीन नहीं । हमारी, " जायेंगे; उ फलतः सिद्धं हुया कि ग्रहण राहु - केतुकतृ के है, उसकी अशुद्धि, भी प्रकाशित समूल है, उस समयका दान - ध्यान - स्नानादि भी प्रयोजनीय हैं । संश- महोदय . - यात्माओं को इस परं विचार कर अपना संशय दूर कर देना चाहिये । इस ग्रन्थ | से प्रकाशि इति ' श्रीगौरीदेवीगर्भजेन, श्रीपं ० शीतललालश मसेतुपालतनु- Dir: उपकार ` जनुषा, मुलतानस्थ स ० ध ० संस्कृत - कालेजस्य भूतपूर्वाध्यक्षेण इदानीं दस महो देहली – रामदल - द्रीवास्थ सं ० हिं ० महाविद्यालयाध्यक्षेण, विद्यावागीश-प्रणीते सहस्र पृष्ठ विद्याभूषण, विद्यानिधिपदभाजा श्रीदीनानाथशर्मशास्त्रिसारस्वतेनं माला के स ' श्रीसनातनधर्मालोके ' सनातनधर्म - मुख्यविषय - निरूपक - तद्ग्रंथमालाया-श्चतुर्थसुमनो - विकासः सम्पूर्णः । Gujarat. An eGangotri Initiative भाग नही की सहाय | है | जो बहुत बन सहायता कुछ भी
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५०६ विचार परन्तु उस विशेष सूचना सिता हिन्दुधर्म - सनातनधर्म का निरूपक यह भाग बड़ा हो जानेसे यहीं समाप्त किया जाता है, शेष सनातनधर्मके विषयोंको अग्रिम पुष्प में प्रका-जायगा, पर यह जनताके सहयोग पर निर्भर है । इस प्रकार -के एक पुष्पको प्रकाशित करने में एक सहस्र रुपये से अधिक ही व्यय धाप बैठता है, यदि कोई महोदय न्यून - से - न्यून एक हजार रुपये दें, तो अग्रिम भाग में पर्याप्त विषय श्रा सकता है । और इससे वे महींदय ग्रहण- हमारी इस ' श्रीसनातनधर्मालोक ' - ग्रन्थमाला के संरक्षक भी माने 1 जावेंगे; उनका चित्र भी छपेगा । उनका प्रत्येक प्रकाशनमें नाम भी प्रकाशित होता रहेगा । इस वार श्रीमान् पं ०. मुरारीलालजी: मेहता महोदय ( ७०, विवेकानन्द रोड कलकत्ता ) एक सहस्र रुपया देकर ये । इस ग्रन्थमाला के सर्वप्रथम संरक्षक बने हैं, यह चतुर्थं पुष्प उन्हीं के रुपये -. से प्रकाशित हुआ है - इससे हिन्दु - जनताका तथा सनातनधर्मियोंका कितना उपकार ' होगा यह अनुभवी विद्वान् ही जान सकते हैं । इस प्रकार इदानीं दस महोदय भी एक - एक सहस्र रुपया अर्पण कर दें, तो हमारी देश-गीश- सहस्र पृष्ठका ' श्रीसनातनधर्मालोक ' नामक महाग्रन्थ इस प्रकार ग्रन्थ-प्रणीते मालाके रूपमें अधिकांश प्रकाशित हो सकता है । इसमें जो महोदय स्वयं लाया- भाग नहीं ले सकते, चे प्रेरक बनकर समर्थ पुरुषोंसे एक सहस्र रुपये-कीं सहायता दिलवावें, तो यह ग्रन्थमाला शीघ्र प्रकाशित हो सकती । है । जो यह भी नहीं कर सकते, वे एक - एक सौ रुपयेके सहायक तो बहुत बनवा सकते हैं— उससे भी ग्रन्थमालाको शीघ्र निकलने की सहायता प्राप्त होगी । यह बात पाठक अवश्य याद रखें कि हमें जो कुछ भी धन इस ग्रन्थमालाकेलिए तथा मालासे मिलता है वा CC - 0. Ankur Joshi ५११ मिलेगा, वह सभी. इसी ग्रन्थमालामें व्यय किया जावेगा | हमारे निजी कार्यमें उसका उपयोग नहीं होगा । अतः कोई भी पाठक इस ग्रन्थमालाको अमूल्य न लें । प्रत्युत इसका प्रचार करवा कर प्रचुर-मात्रा में द्रव्य साहाय्य दिलवावें । अन्तमें हम सनातनधर्मके दृढव्रती ' मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम् ' इस कथनको पूरा चरितार्थ करने वाले, धन्तर्बहि: - निश्छल श्रीमान् पं ० दुर्गादत्तजी त्रिपाठि -महाभाग ( भूतपूर्वं ' सिद्धान्त ' ' सन्मार्ग ' के सम्पादक ) का यदि यहाँ नाम न लें, तो यह हमारी कृतघ्नताको पराकाष्ठा होगी । वे हमारे प्रत्येक कार्यमें जो सहयोग दिया करते हैं, उसका वर्णन करनेमें हमारी वाणी वा लेखनीमें क्षमता नहीं । केवल • हृदयमें कृतज्ञता स्वीकार तथा उनको सुखी रखनेकी परमात्मासे प्रार्थना करनेके अतिरिक्त हम अन्य कर दी क्या सकते हैं? यह चतुर्थ पुष्प यहाँ समाप्त किया जाता है— अग्रिम पुष्पके प्रकाशन में सहायता करनेके लिए पाठकों, अनुग्राहकों एवं हिन्दुधर्म - प्रेमियोंको अनुरोध करके हम पाठकोंके पुनर्दर्शनार्थ श्रव बिंदा लेते हैं । J - * ० * -Collection Sujarat. An eGangotri Initiative
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