सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 1–10
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 1–10
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श्रीसनातनधर्मालोक पञ्चम सुमन हिन्दुधर्मके आचार विचार - - पर्व एवम् उनका वैज्ञानिक - रहरु: दीनानाथ
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भन पेट वेग विद्यालय अन्यजिय वायस क्रमांक.... पेनांक.
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‘ श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थमालाका पञ्चम सुमन ( संरक्षक- श्रीपं ० मुरारीलालजी मेहता, कलकत्ता ) सनातनधर्मका विश्वकोष एवं महाभारत श्रीसनातनधर्मालोक हिन्दुधर्मके आचार - विचार एवं पर्व तथा उनका वैज्ञानिक - रहस्य । प्रणेता-पं ० दीनानाथशर्मा शास्त्री सारस्वत, विद्यावागीश, विद्याभूषण, विद्यानिधि [ भूतपूर्वं प्रिन्सिपल स ० ध ० सं ० कालेज, मुलतान ] प्रिन्सिपल सं ० हिं [ ० महाविद्यालय, रामदल, दरीबाकलां, देहली ६ प्रकाशक-श्रीनारायण शर्मा ' राजीव ' सारस्वत शास्त्री, प्रभाकर श्रीसनातनधर्मालोक - प्रन्थमाला कार्यालय फर्स्ट बी ० १६, लाजपतनगर, नई देहली १४ . विजयादशमी सं ० २०१३ ] [ मूल्य ११ )
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प्रकाशक-श्रीनारायणशर्मा ' राजीव ' शास्त्री सारस्वत, प्रभाकर श्रीसनातनधर्मालोक - ग्रन्थमाला कार्यालय फर्स्ट बी ० १६, लाजपतनगर, नई देहली १४ प्रथम संस्करण ग्यारह मूल्य साढ़े चार रुपये 1 मुद्रक जमना प्रिंटिंग वर्क्स पीपल महादेव, देहली ।
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* प्रारम्भिक शब्द " वामाङ्गीकृतवामाङ्गि कुण्डलीकृत कुण्डलि । आविरस्तु पुरो वस्तु भूतिभूत्यम्बराम्बरम् ॥ ” करुणावरुणालय श्रीपरमेशानके दद्यादान एवं जनता - जनार्दनके सहयोगसे ' श्रीसनातनधर्मालोक'- प्रन्थमालाका पञ्चम- सुमन विकसित हो रहा है । पाठकोंने देखा होगा कि इसमें कितनी उत्तरोत्तर उन्नति हो रही है । हमारी ओरसे इसके प्रचारकी न्यूनता अवश्य रही है; पर जनताने इस ग्रन्थमालाका आदर करके अपनी गुणग्राहकताको परिचायित करके हमारे उत्साहको बढ़ा दिया है । यह ग्रन्थमाला अपने देशमें प्रचलित तो हुई ही है; विदेश ( दक्षिणी अमेरिका डचगायना, ब्रिटिशगायना आदि ) में भी इसकी मांग हुई है । इसे सनातनधर्मियोंने तो लिया ही है, गुणग्राही आर्यसमाजियोंने भी इसे लिया एवं अपनाया है । इस पश्चम - सुमन के लिए तो विद्वानोंके बहुत आग्रहपूर्ण पत्र आये कि आप इसके प्रकाशनमें विलम्ब क्यों कर रहे हैं? हम उन सभी प्रेरकों, प्रचारकों, ग्राहकों तथा अर्थ सहायकोंका हृदयसे धन्यवाद करते हुए ' हिन्दुधर्मके आचार - विचार एवं पर्व तथा उनका वैज्ञानिक-रहस्य ' नामक पञ्चम - सुमन उनकी सेवामें उपहृत करके उनसे सम्भावना करते हैं कि वे पूर्वकी भांति इस सुमनका भी सम्यक् प्रचार करेंगे, और पूर्ववत् अर्थसाहाय्य भी स्वयं तथा दूसरोंसे कर-कराकर आगेके छटे - पुप्पके विकासकी भूमिका बांधने में भी सहयोग
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[ ख ] प्रारम्भ कर देंगे । सहायता जितनी शीघ्र प्राप्त होगी, नवीन - सुमन भी उतनी शीघ्रता से विकसित होंगे । प्रस्तुत - सुमन में हिन्दुधर्मके आचार - विचारों एवं पर्वोके वैज्ञानिक - रहस्य बताये गये हैं । इसमें हमने जनता के लाभार्थ कई प्राचीन एवं अर्वाचीन विद्वानोंके विचारोंको भी उनके ग्रन्थों वा दुहकर अपने क्रमसे रखा है; अतः उन सभी विद्वानों के कृतज्ञ होते हुए हम उन्हें धन्यवाद प्रदान करते हैं । यह सुमन बहुत ही बड़ा ( ६१० पृष्ठका ) हो गया है; अतः कई उपयोगी भी निबन्ध इससे निकाल लेने पड़े, जिनका उपयोग फिर अन्य-पुष्पों में होगा । इस सुमनको सभी प्रकार के विचार रखनेवाले हिन्दुमात्रको अपने पास रखना चाहिये | प्रत्येक पुस्तकालयको यह सुमन सुवासित करनेवाला सिद्ध हो सकता है । यह गत पुष्पमें बताया जा चुका है कि — हमारा ' श्रीसनातनधर्मालोक ' मृल - महाग्रन्थ संस्कृतमें है, और दशसहस्त्र पृष्ठका है, पर इस देशकाल में संस्कृतका बहुत प्रचार न देखकर इसकी ग्रन्थमालाको हिन्दीमें प्रकाशित किया जा रहा है । इसके पञ्चम-सुमन - इतने २० पुष्प विकसित हो सकते हैं । इस ग्रन्थमालाको जनताने बहुत ही पसन्द किया है, और अपनी लम्बी - लम्बी सम्मतियां भेजी हैं, पर स्थानाभाव - वश पूरी तथा सभी सम्मतियों को उपस्थित नहीं किया जा सकता । ग्रन्थमालाका आरम्भ कैसे हुआ? जब मैं छात्रावस्था ( प्राज्ञ - विशारद श्रेणी सन् १६१५-१६१७ )
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न ई न नी 7-त T का I ' [ ग ] में था, उस समय अपने पूज्यपाद गुरुवर श्रीमान् पं ० हीरानन्दजी शास्त्रीको पं ० कालूरामजी शास्त्रीकी ' धर्मप्रकाश ' आदि पुस्तकें पढ़ते हुए देखता था । उनसे मुझपर सनातनधर्म के संस्कार पड़े । फिर शास्त्रि-श्रेणी ( सन् १ ९१८-१९ ) के गुरुवर श्रीपं ० जगन्नाथजी शास्त्रीके आर्य-समाजकी वेदीपर सनातनधर्म की ओर से डिबेट में भाग लेने और विपक्षियोंको चुप • करानेसे १५-१६ वर्षकी अवस्थावाले मुझपर उक्त-संस्कारोंका प्राबल्य हुआ । सन् १ ९ २१ में जब मैं अलीपुर ( मुज़फ्फ़रगढ़ ) सनातनधर्म संस्कृत - विद्यालय में मुख्याध्यापक बना; वहां उसके मन्त्री श्री पं ० खण्डालालजी शर्माकी प्रेरणा से मैंने वहां के पुस्तकालय में श्री पं ० ज्वालाप्रसाद जी, श्री पं ० भीमसेन जी, तथा श्री पं ० कालूरामजी शास्त्री तथा अन्य विद्वानोंके सनातनधर्म-विषयक समस्तन्प्रन्थ पढ़ डाले । इससे मुझे इस विषय में उद्बोधना तथा प्रेरणा मिली । फिर मुलतान स ० घ०'संस्कृत कालेज ( सन् १६२४ ) में आकर मैंने प्रतिपक्षियोंके ग्रन्थ भी देखे, स्वयम् अनुसन्धान भी किया । तत्फलस्वरूप दशसहस्र फुलिस्केप पृष्ठका ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थ संस्कृत में लिखा । सन् १६२५ से लेकर १६३५ तक इसका परिष्करण, परिवर्तन - परिवर्धन होता रहा । मुलतान में आये हुए श्री पं ० कालूरामजी शास्त्रीने उस हमारे महाग्रन्थके बहुतसे निबन्ध सुने, इससे वे बहुत प्रभावित एवं प्रसन्न हुए, और अपने किये हुए भाषानुवादसे युक्त उक्त - प्रन्थ प्रकाशित करनेकेलिए मुझसे मांगा । इससे पूर्व मैं केवल संस्कृत - पत्रों में लेख भेजता था, हिन्दीमें नहीं । उनके अनुरोधसे मैंने पत्रोंमें
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[ ] सनातनधर्म - विषयक हिन्दी के लेख भी भेजने प्रारम्भ किये । उसी महाग्रन्थ के निबन्ध मैंने संस्कृत - हिन्दी पत्रों में भेजे; उसका विद्वानोंपर गम्भीर - प्रभाव पड़ा और उससे मुझे बहुत प्रोत्साहन दिया गया । इससे उक्त महाग्रन्थ छपवानेका विचार दृढ होगया । उस समय उक्त महाग्रन्थ छपवानेकेलिए मांगनेवाले श्री पं ० कालूरामजी शास्त्री, तथा सव्ध ० कालेज मुलतान के चाचार्य श्री पं ० देवराजजी शास्त्री वेदकाव्यतीर्थमहोदय का देहावसान हो चुका था । श्रीलक्ष्मीदेवीकी कृपा अपनेपर न होनेसे स्वयं छपवानेका साहस ही न होता था । विचारते - विचारते देशभङ्ग हो गया, और इधर खण्डित हुए हिन्दुस्थान में आ जाना पड़ा । सौभाग्यकी यह बात हुई कि — लिखित उक्ल - महाग्रन्थ सुरक्षितरूपसे साथ आगया । यदि वहीं नष्ट होजाता, तो फिर उत्साह शेष ही न रह जाता । इससे उक्त ' महाग्रन्थ परमेशानको इष्ट है - ऐसा अनुभव करके अति-शयित - प्रमोद प्राप्त हुआ, और परमेशानकी असीम कृपा - कटाक्षका बार - बार स्मरण प्राप्त होता रहा । अब छपे कैसे? यह विचार हुआ कि — जब प्रभुने इसे यहांतक सुरक्षित पहुँचावाया है, तो आगेके योग - क्षेमका विचार भी तो उसी प्रभुने करना है – हमें इसकी चिन्तासे क्या प्रयोजन? स्वयं ही इसके प्रकाशनके निमित्त बन जाएँगे । बात भी ठीक थी । मुझ जैसे किसीके पास न आने जानेवाले - से यह कार्य हो भी नहीं सकता था । यहाँ आकर गुरुकुल घरौ डाके आचार्य महाशय से उनकी ' अभिमत ' नमस्तेकी एकपदता ' पर पत्रव्यवहार द्वारा विचारजारी