सनातन धर्मलोक ५
5 Sanatan Dharmalok by Dinanath Sharma Shastri Sarasvat - Shri Sanatan Dharmalok Granthamala Office Delhi · 944 पृष्ठ · 95 खण्ड
विषय सूची
- श्रीसनातनधर्मालोक पञ्चम सुमन हिन्दुधर्मके आचार विचार - - पर्व एवम् उनका वैज्ञानिक - रहरु: दीनानाथ भन पेट वेग विद्यालय अन्यजिय वायस क्रमांक.... पेनांक. 1 ‘… 1–10
- 51 न 1 न i [ ङ. ] हुआ । चार पत्रोंके उत्तर देने के बाद उन्होंने पत्रोत्तर देना बन्द कर दिया, और पुस्तक छपवानेकेलिए उत्तेजित किया… 11–20
- [ ए ] ( ५ ) आपके सब ग्रन्थ हमने मँगाये थे; उन्हें पढ़कर हमः बहुत प्रभावित हुए । आपकी विद्वत्ता और श्रमशीलता सब प्रकार सराहनीय है... ' ( पं ० श्रीरामशर्मा… 21–30
- हिन्दुधर्मके आचार विचार -एवम् उनका वैज्ञानिक रहस्य ( १ ) वैदिक मङ्गलाचरणम् । ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे, कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्… 31–40
- श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ११ स्मृतिके आचाराध्यायमें ' विनायकः कर्मविघ्नसिद्ध्यर्थं विनियो-जितः । गणानामाधिपत्ये च रुद्रेण ब्रह्मणा तथा, ( २७१ ) में विनायकको… 41–50
- श्रीगणेशका मङ्गलाचरणं २१ ६ ' । ( ऋ. २ । १ । ३ ) ' त्वमग्ने! राजा वरुणो... त्वं मित्रो ' ( ऋ. २ । १… 51–60
- श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ३१ पति: ( १ २ । ११ ) । इस छान्दोग्य उपनिषद्वचनके अनुसार वाणीरूप बुद्धिके पति होने से गणपतिही यौगिक बृहस्पति बने… 61–70
- श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ४१ गये हैं; जैसेकि काशी केदारनाथ - माहात्म्य में उनके लिए कहा है- 1 ( ख ) ' विघ्नध्वान्तनिवारणैकतरणिविघ्नाट बीहव्यवाट्… 71–80
- श्रीगणेशका मङ्गलाचरण २१ न ? र में एक ही कालमें ( इसमें १५-२० वर्षोका अन्तर नगण्य है ) बड़ा भेद मिलता है… 81–90
- श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ६१ प्राप्त होगई । कहीं यह बात ब्राह्मणभागकी होनेसे प्रतिपक्षियोंको खटक न जाए; अतः उन्हें संहिता भी देख लेनी चाहिये- ' आथर्वणाय… 91–100
- शिखाकी वैज्ञानिकता ७१ शिखा वाह्य चिह्न ( ३ ) शिखा हिन्दुजातिका उपयोगी बाह्यचिह्न है । यद्यपि ' न लिङ्ग ' धर्मकारणम् ' ( मनु ० ६… 101–110
- शिखाकी वैज्ञानिकता ८१ I " i I Π , यत्र असौ केशान्तो विवर्तते व्यपोह्य शीर्षकपाले ' ( ११६१ ) तालुके मध्य में स्तनकी तरह जो केशराजि दीखती है— इसमें केशोंका… 111–120
- शिखाकी वज्ञानिकता तो क ? त ना I: चा को क में * क में तथा ऋषिप्रवर - सङ्ख्यया । ' अथैनमेकशिखस्त्रिशिखः पञ्चशिखो वा यथा वा एषां कुलधर्मः स्यात् यथपिं शिखां… 121–130
- शिखाकी वैज्ञानिकतां स्थूल शरीरके सुन्दर बनाने में लगे रहने से उन्हें शिखा उसमें असुन्दरताका कारण प्रतीत होनेसे उसे वे कटा डालते हैं… 131–140
- शिखाकी वैज्ञानिकता १११ नर ठीक हो सकता है? स्वामी दयानन्दजीने भी कहा है - जो विद्या (? ) का चिन्ह यज्ञोपवीत और शिखाको छोड़कर मुसलमान-वै ईसाइयोंके सदृश बन… 141–150
- यज्ञोपवीत - रहस्य १२१ तं I I I i ही देता है, यज्ञोपवीतकी रचना - विधि से एतदादिक प्रश्नोंका उत्तर स्वयं होजाता है… 151–160
- यज्ञोपवीत - रहस्य १३१ चह येत ३१-ध ० ०, रण, नेता ' को नको लिए ४ ) पतं है । यः की, बाहुकी सीमा क्षत्रियकी, कमरकी वा ऊरुकी सीमा वैश्यकी है… 161–170
- यज्ञोपवीत- रहस्य १४१ भी मूल्य ३1 ) है; पाठक हमसे मंगा सकते हैं । स्त्री - शूद्रको उपनयन आ तथा वेदाधिकार देनेके जो प्रमारण दिये जाते हैं; उन पर इसमें पढ़… 171–180
- यज्ञोपवीत - रहस्य १३१ क से ई pr, 15 क , 15 के dir to व F F न न्य त से से a 7 I संस्कारसे ही चमकता है… 181–190
- ( ५ ) गायत्री मन्त्रकी महत्ताका रहस्य । ' गायत्री छन्दसामहम् ' ( भगवद्गीता १० । ३५ ) ' उपनयन - रहस्य ' हम बता चुके; उपनयनमें गायत्री मन्त्रका उपदेश किया… 191–200
- गायत्री मन्त्रकी महत्ता १७१ खोदने पर दफीना ( माणिक्य ) तो मिला नहीं, किन्तु एक देवमन्दिर मिला… 201–210
- गायत्री मन्त्रकी महत्ता १८१, साधारण पुरुषोंका भय हट जाता है, उसके उदयसे बुद्धिकी शुद्धि और कर्मों की प्रेरणा से बुद्धिकी वृद्धि प्रत्यक्ष है… 211–220
- गायत्री मन्त्रकी महत्ता १६१ होगा । अस्तु । ब्राह्मणके लिए तो गायत्री - सावित्री ही आई है । उसकेलिए तो इतना कहा है कि अन्य यदि वह कुछ न कर सके तो… 221–230
- षोडश संस्कार- रहस्य २०१ उसका संस्कार कहा जाता है । जब तक किसी पदार्थका संस्कार नहीं होता, तब तक वह सदोष और गुणहीन रहता है… 231–240
- षोडश संस्कार - रहस्य २११ पृथक् न होनेपर भी. ' शुभे रौक्मे च कुण्डले ' ( १४ । ३६ पद्य ) में स्पष्ट है, सुश्रुत - चरकादिमें भी स्पष्ट है… 241–250
- गर्भाधान - संस्कार - रहस्य २२१ तो उस समय स्थापित किये हुए गर्भसे पुत्रका जन्म होता है । छठी, आठवीं आदि युग्म या सम रात्रियोंमें ऋतुस्नाता पत्नीके साथ… 251–260
- नामकरण ' - रहस्य २३१ ( ५ ) नामकरण - रहस्य ' एकादशेऽह्नि नाम ' ( व्यासस्मृति १ । १७ ) ' म्यारहवें दिन नामकरण संकार करे… 261–270
- नामकरण - रहस्य २४१ द्विनामा ' इति ( काठक २६ । १ ) ( कुछ लोगोंका कहना है कि दूसरा नाम रक्खा जाता है । त्राह्मण के दो नाम रखने चाहियें… 271–280
- उपनयन- रहस्य III वर्षोंमें किया जाता है । पहले जीव माता - पिताके गर्भमें शरीर-धारणार्थ आता है, फिर आचार्य के गर्भ ( आचार्यकुल ) में विद्या-शरीर… 281–290
- कन्याका विवाह कब? २६३ सकेगी? इसलिए उसका भार पितापर ही ठीक है । कन्याके वाल्य वा यौवनमें अनुभव पिताके वार्धक्यके अनुभवसे न्यून ही होता है… 291–300
- वैवाहिक रीति- विशेषोंका रहस्य २७३ निष्कर्ष है कि — मैं ऋषिऋण, देवऋण, पितृऋणसे बंध गया हूं । अव इन्हें उतारूंगा… 301–310
- दैवाहिक विधियोंका रहस्य २८३ तात्पर्यके विषय हो सकते हैं । सो पहलेके तीन वर्गोंमें स्त्री पुरुषसे आगे ही रहती है… 311–320
- विवाह तथा अग्न्याधानका रहस्य २६३ इत्यादि द्वारा वस्त्र - प्रदान करता है, वैसे ही विवाह में भी वर उक्त मन्त्रसे वधूको वस्त्र प्रदान करता है… 321–330
- पितृमेध वा अन्त्यकर्म ३०३ शास्त्रानुसार अस्थिसंचयन, नित्यक्रिया, दशगात्रादि - कर्म, एकोद्दिष्ट, सपिण्डन, धर्मशान्ति तथा श्राद्धादि पितृकर्म मृतकके आत्माकी… 331–340
- हिन्दुधर्मके आचार - विचारोंके रहस्य ३१३ नींदके हटने से स्वास्थ्य बिगड़ने की आशंका रहती है । सर्दी में प्रातः स्नान करना निमोनियाको न्योता देना है… 341–350
- प्रातः हस्तदर्शनका विज्ञान ३२३ भगवान् का स्मरण तथा जप करके गोविन्द को प्राप्त करते हैं । तब ' करपृष्ठे च गोविन्दः ' कहना भी ठीक हुआ… 351–360
- मट्टी से हाथोंकी शुद्धि ३३३ है यह भी स्मरण रखनेकी बात है कि विद्यालयों में वा घरोंमें, वा अन्य स्थानोंमें एक ही स्थानमें वहुत लोग लघुशंका करते हैं; वह ठीक… 361–370
- तेल- नियमका विज्ञान. ३४३ कहा है - ' अपामग्नेश्च संयोगाद् हैमं रौप्यं च निर्वभौ ' ( ५/११३ ) इधर चन्द्रमाका पुत्र होनेसे चन्द्रमाके जलकी शीतलता से भी युक्त… 371–380
- कुशासनका वैदिक विज्ञान ३१३ आसन विल्लानेसे उपासनाके समय पार्थिव विद्युत् हमारे शरीर में संक्रान्त नहीं हो सकती, इसीलिए हमारे ध्यान में विघ्न भी नहीं पड़… 381–390
- देवकार्य पूर्वाभिमुख ३६३ सम्भव है यह रोगके विरुद्ध ही युद्धकी विजय - दुन्दुभि हो, अस्तु । यद्यपि प्राचीन ऋषि - मुनियोंने एतदादि विज्ञान अपने मुखसे नहीं… 391–400
- मार्जन - विज्ञान ३७३ कुशोंका, अपामार्ग तथा दूर्वाका मार्जन उपयुक्त किया जाता है । कुशसे तेजगत दोष, अपामार्ग से विशेषरूप से रक्तगत दोष, और दूर्वासे शुक्रगत… 401–410
- सूर्यको अर्ध्य और उसका उपस्थान ३६३ प्राणायाममें पहले मन्त्र द्वारा दाहिनी नाकको बन्द करके बाहरी शुद्ध वायु खींचनी पड़ती है; फिर बाईं ओर दाहिनी नाककी… 411–420
- जप - पाठविज्ञान ३६३ करती हैं । शब्दोंके क्रमविशेषसे ही सङ्गीत वन जाता है, जिससे पशु - पक्षी भी प्रभावित होते हैं… 421–430
- मालाकी मणियोंकी १०८ संख्याका विज्ञान ४.०३ युगों का जोड़ ४३,२०,००० है, यहां भी ६ अङ्क ही बनता है… 431–440
- मन्त्रसिद्धिका सूक्ष्म - विज्ञान ४१३ है, उसमें पत्थर एक - दूसरे पर इस प्रकार जुड़े हुए हैं कि — उनके पास मध्यम स्वरसे बजाने से वे कांपते हैं… 441–450
- शंख - ध्वनि - विज्ञान ४२३ गांववालोंको टाइमका भी पता लग जाता है 1 । बौद्ध, जैन, ईसाइयों-के मन्दिरोंमें भी इसका प्रयोग होता है… 451–460
- यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व ४३३ = प्रकारके क्षेत्र में, अमुक - नक्षत्र में, अमुक मन्त्रोंसे बोई जाती थीं; उन्हें अमुकप्रकारके जलसे सींचा जाता था; और उनमें… 461–470
- यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व ४४३ ऋषिमुनियोंने उपाय सोच लिया था । वह यह था कि - साक्षात् अग्निदेवता तथा ब्राह्मणस्थ वैश्वानर- अग्नि इन दोनोंके द्वारा उन्हें… 471–480
- यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व ४५३ तो उसका प्रभाव नहीं होता । जब सूक्ष्म बिन्दु करते हैं; तो उससे हमारा हाथ जल जाता है । डाक्टर उससे पानी गर्म कर लेता है… 481–490
- यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व ४६३ जीसे प्रणीत वेदोंकी पदानुक्रमणिकाओंको देख लीजिये; उसमें ' यज ' धातुका प्रयोग ऋग्वेद - पदानुक्रमणिकाके ३२२ पृष्ठके तीसरे… 491–500
- श्री तुलसीपूजन - विज्ञान ४७३ हैं; वहाँ मानसिक एवं आत्मिक लाभ भी होते हैं - यह बात स्वयं जानी जा सकती है । ( ४१ ) श्रीतुलसी पूजन - विज्ञान… 501–510
- श्रीतुलसीपूजन - विज्ञान ४८३ ऋषि - मुनियोंने एतदादिक गुण जानकर उससे आध्यात्मिकतामें भी लाभ जानकर इसका धर्मसे भी सम्बन्ध देखा था… 511–520
- श्रीगङ्गाजलकी विशेषताका विज्ञान I करके, इसमें मृतकोंकी सद्गतिका विचार करके उनकी अस्थियां डाली जाने लगीं… 521–530
- वृक्षोंकी चेतनता २०३ जिनसे वृक्षोंके सुख - दुःखका अनुभव प्रत्यक्ष होता था । पर यूरोपके वैज्ञानिकोंने इस पर विश्वास न किया; क्योंकि वे वृक्षोंको जड़ मानते… 531–540
- गोबर में लक्ष्मीका निवास ५१३ लक्ष्मीने कहा था- - ' ' दिष्ट्या प्रसादो युष्माभिः कृतो मेऽनुग्रहात्मकः । एवं भवतु भद्रं वः पूजितास्मि सुखप्रदा ' ( ८२… 541–550
- भोजन - विधिके विज्ञान १२३ द्रौपदीने एक शाकका पत्ता ही तो भगवान् कृष्णको खिलाया था । विश्वम्भरकी तृप्ति होने से विश्व - भरकी तृप्ति हो गई थी… 551–560
- बाजारू अन्न खानेका निषेध २३३ उपकार कर सकता है । तब ' घृतपक्क अन्न ब्राह्मणगरण रसनाके लौल्यसे खाते हैं ' यह आक्षेप असत्य ही है, किन्तु वह विशुद्ध होने से… 561–570
- भोजन के बाद नियम २४३ वह घृताक्त हाथ आंखोंपर फेरना चाहिये - इससे आंखोंकी ज्योति बढ़ती है । घृतको हाथसे उतारने के लिए साबुन से हाथ धोकर हाथको रूखा करना ठीक… 571–580
- उपवास एवं एकादशी - विज्ञान ५५३ वन्ध्या विजानाति गुर्वीं प्रसववेदनाम् ' । एक दिन भी जिसने उपवास नहीं किया; वह प्रतिदिन फांका करनेवाले चुत्पीड़ित… 581–590
- उपवास एवं एकादशी - विज्ञान २६३ अवलम्बन करनेपर न तो आपको डाक्टरोंकी आवश्यकता रहेगी, न अस्पतालों में रहने की, न दवाइयोंकी, न जुलावकी, न किसी अन्य साधनकी!… 591–600
- शयनके समय विशेष दिशाका विचार २७३ स्पष्ट देवदिशा है । पूर्वं वा दक्षिण दिशामें सिर करके सोना प्रशस्त है - यह संकेत हम पूर्व दे ही चुके हैं; उसमें विज्ञान… 601–610
- अस्पृश्यता - विज्ञान १८३ मनोविज्ञानवेत्ता भी मानस- विचारतरङ्गोंका वायुमण्डल - द्वारा दूसरों में संक्रमण मानते हैं; भौतिक विज्ञानके आचार्य भी… 611–620
- संवत्सरका प्रारम्भ फाल्गुन मासमें १४ शिवरात्रि तथा १५ होलीको कई पर्वोंसे सम्बद्ध अन्य विषयोंपर भी लिखा है — इससे ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के पाठकोंको प्राप्त… 621–630
- कल्प एवं सृष्टि - संवत्सरं ६०३ जाते हैं । इस जबर्दस्तीके अर्थ में भी वही हमारी कही संख्या निकली । पर उक्त वेदमन्त्रके इस अर्थ करनेमें कई दोष आते हैं… 631–640
- मास एवं वारोंका नामक्रम - विज्ञान ६१३ ( २ ) मास एवं वारोंका नामक्रम - विज्ञान । हम ' संवत्सर ' के विषय में बता चुके… 641–650
- वार - क्रम - रहस्य ६२३ , न I पड़ा करती है यह हम पहले सूचित कर चुके हैं; जब तक राशियों-का ज्ञान न हो; तबतक ग्रहण कैसे निकले? पर हमारे पूर्वज ग्रहणको जानते… 651–660
- श्रीरामनवमी ६३३ बतानेसे उसका सूक्ष्मतम आकार सिद्ध कर दिया गया । केवल निराकार इष्ट होने पर अपेक्षाकृत सूक्ष्मत्व भी परमात्मामें नहीं हो सकता… 661–670
- वेदमें श्रीरामावतार ६४३ ते, :, भी नी र, । तो भी ल दि ६२ कारोंने भाष्य में भी मुख्यतया याज्ञिक दृष्टि रखी है… 671–680
- श्रीव्यास - पूर्णिमा ६५३ इन्हीं पुराण- इतिहास आदि के द्वारा ही अर्वाचीन- सम्प्रदायोंके उपदेशक लोग अपने व्याख्यानको विस्तीर्ण तथा रोचक बना लेते हैं!… 681–690
- श्रीकृष्ण - जन्माष्टमीव्रत पूर्णतः वैज्ञानिक ६६३ विषयों से ' छुटकारा हो जाता है । निर्विषयता हुई, तो अनन्य भक्ति भी हो सकती है… 691–700
- मृतकश्राद्ध - विज्ञान ६७३ के अनुसार जीवको दो गतियां बताई गई हैं - एक उत्तरगति; दूसरी दक्षिण- गति… 701–710
- मृतकश्राद्ध - विज्ञान ६८३ पदार्थोंको छूता हुआ वहीं पर बैठता है । इसलिए यह सब हवि आदि सामग्री उसी प्रकारका यन्त्र बन जाती है, जिस प्रकार चन्द्रमरिण… 711–720
- विजयदशमीका महत्त्व एवं विजयका रहस्य ६६३ ( ८ ) विजयदशमीका महत्त्व एवं विजयका रहस्य । यह विजय दशमीका दिन है… 721–730
- दीपावलीका वैज्ञानिक - रहस्य ७०३ कृपा - कटाक्ष भी आ उपस्थित होते हैं । उस समय हमें घरोंकी स्वच्छताका अवकाश ही नहीं मिलता… 731–740
- दीपावलीका वैज्ञानिक- रहस्य ७१३ 5 “ समय में महिषमर्दिनी श्रीदुर्गादेवीको आधारभूत करके शक्ति-· उपासनामें लग जाते थे… 741–750
- गीताजयन्ती एवं गीतोपदेशकी तिथि ७२३ P I T ], ने न के र ना म न ना नी क दिनके सम्बन्धमें विद्वानों में मतभेद हैं… 751–760
- युद्धमें गीताका सुनाना सम्भव ७३३ नहीं थे । इससे पूर्व सेनाओं के व्यूह रचे गये । वे बीर अपने-अपने नियत स्थानों में थे । कर्ण तो सारी सेनाके पीछे ही था… 761–770
- गीताकी सर्वप्रियताका कारण ७४३ उसकी इष्टसिद्धि होती है, उसके चित्तको शांति मिलती है । यह अवश्य है कि गीता के मत में भी कर्म आदिम - काण्ड है और ज्ञान अन्तिम… 771–780
- गीताका गूढ उद्देश्य वा विषय ७१३ होगा । संसार सुखी और समृद्ध होगा । वस, फिर सफलता ही सफलता है; हमारे भारतकी फिर विजय ही विजय है… 781–790
- गीताका गूढ उद्देश्य वा विषय ७६३ अर्जुनने भी स्वीकार कर लिया कि - ' करिष्ये वचनं तव ( १८/७३ ), तब उसमें यही रहस्य है कि – कामोपभोग छुड़ानेवाले भगवान्,… 791–800
- श्रीमहीधरका अर्थ यजमानकी कन्यासे हँसी - ठट्ठा आदि कराना सिवाय वाममार्गी-लोगों से अन्य मनुष्यका काम नहीं है ' ( स ० प्र ० १२ पृ ० २५६ )… 801–810
- ( ) श्रीमहीधरका अर्थ: ७८३ भला क्या हो सकता है? क्या मृतकका वीर्य भी रह जाता है? वीर्य -की शुष्कता से ही तो मृत्यु होती है… 811–820
- ७३३ ( तै ० सं ० ७ । ४ । १६ । ३ ) इत्यादि मन्त्रान्तर- प्रसिद्धम् ' । यही वह मन्त्र है, जिसका स्वामी दयानन्दजीने महीधरका अर्थ उपस्थित करके उसे फटकार दो… 821–830
- श्रीमहीधरा अर्थ ८०३ ' क्षकामा देवाः प्रत्यक्षविद्विषः ' ( शतपथ ०७ । ५ । १ । २२ ) परोक्षवाद देवता एवं ऋषि - मुनियोंको बहुत प्रिय होता है… 831–840
- गणेश एवं गणनायकके स्वरूपका परिचय ८१३ का प्रसङ्ग उपस्थित हो सकता है । इसके अतिरिक्त गणनायकको बड़े कान वाला भी होना चाहिये… 841–850
- = न 1 न ी के - } a II I गणेश एवं गणनायकके स्वरूपका परिचय २३ विश्वास से आक्रान्त नहीं रखोगे; तो तुम्हारा व्यवहार नहीं चल सकता… 851–860
- शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायका स्थापक ८३३ वह पूजा इस समय में नष्ट हो जाती; पर इस शिवरात्रिके चूहेने उसे दृढ करा दिया । आज हम इसपर विचार करते हैं… 861–870
- शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायका स्थापक ८४३ ( ११ ) मालूम होता है कि — दयानन्दजी आशय यह था कि— महादेव मेरे सामने प्रत्यक्ष होकर — चूहेको दण्ड देते; तभी… 871–880
- र I ? का के शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायको स्थापक ८५३ शिवरात्रिके दिन प्रभु - विश्वनाथके घर महोत्सव होता है । देश - विदेशमें इस दिन बड़ा समारोह होता है… 881–890
- होली विज्ञानकी कसौटीपर ८६३ गिराया, हाथीके पैरों तले दबवाया, तलवारसे उसकी गर्दन काटने का प्रयत्न किया; परन्तु वह हिरण्यकशिपु उसमें सफल न हुआ… 891–900
- ( १० ) ‘ ओम् ' का महत्त्व | ‘ गिराम् अस्म्येकमक्षरम् ' ( भगवद्गीता १० । २५ ) हम ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थके पञ्चम - पुष्पके आरम्भमें श्रीगणेशका… 901–910
- ' प्रोम् ' का महत्त्व चक्कीके पाटमें पड़कर ‘ अचू ' पिस जाते हैं, दीखते ही नहीं; अथवा विकृत हो जाते हैं; पर ' ओम् ' यह ब्रह्मका नाम है, यह भला व्याकरणमें… 911–920
- ' ओम् ' का महत्त्व ८६३ ' ' अभ्यादान ' का ' अयज्ञकर्म ' अर्थ करनेकी क्या आवश्यकता थी? इससे श्रीनागेशने यह सिद्ध किया हैं कि उक्त सूत्र से ' ओम्'को… 921–930
- ' ओम ' व 1 साधारण रहता; पर अब अलग होकर उन मन्त्रोंसे भी श्रेष्ठ होकर सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हुआ । और ' ॐ ' होनेपर वह गजानन-गणेशका प्रतीक सिद्ध हुआ… 931–940
- वेद वेदांगविद्यालय मन्त्रालय t1............... 000 000 000 000. ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थमाला के सहयोगी संरक्षक श्री पं ० सुरारी मेहता, कलकः… 941–944