श्रीगणेशाय नमः।
सनातन धर्मालोक ५
5 Sanatan Dharmalok by Dinanath Sharma Shastri Sarasvat - Shri Sanatan Dharmalok Granthamala Office Delhi · 944 पृष्ठ · 95 खण्ड
In English
Sanatan Dharmalok, Volume 5
This is the fifth volume of a large encyclopedia titled Shri Sanatan Dharmalok, written by Dinanath Sharma Shastri Sarasvat. This specific volume covers the customs, thoughts, and festivals of Hindu religion along with their scientific secrets, presented in Hindi.
This book answers
- What are the scientific reasons behind hindu festivals?
- What are the customs and traditions of sanatan dharma?
- What is the significance of hindu religious practices?
विषय सूची
- श्रीसनातनधर्मालोक पञ्चम सुमन हिन्दुधर्मके आचार विचार - - पर्व एवम् उनका वैज्ञानिक - रहरु: दीनानाथ भन पेट वेग विद्यालय अन्यजिय वायस क्रमांक.... पेनांक. 1 ‘… 1–10
- 51 न 1 न i [ ङ. ] हुआ । चार पत्रोंके उत्तर देने के बाद उन्होंने पत्रोत्तर देना बन्द कर दिया, और पुस्तक छपवानेकेलिए उत्तेजित किया… 11–20
- [ ए ] ( ५ ) आपके सब ग्रन्थ हमने मँगाये थे; उन्हें पढ़कर हमः बहुत प्रभावित हुए । आपकी विद्वत्ता और श्रमशीलता सब प्रकार सराहनीय है... ' ( पं ० श्रीरामशर्मा… 21–30
- हिन्दुधर्मके आचार विचार -एवम् उनका वैज्ञानिक रहस्य ( १ ) वैदिक मङ्गलाचरणम् । ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे, कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्… 31–40
- श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ११ स्मृतिके आचाराध्यायमें ' विनायकः कर्मविघ्नसिद्ध्यर्थं विनियो-जितः । गणानामाधिपत्ये च रुद्रेण ब्रह्मणा तथा, ( २७१ ) में विनायकको… 41–50
- श्रीगणेशका मङ्गलाचरणं २१ ६ ' । ( ऋ. २ । १ । ३ ) ' त्वमग्ने! राजा वरुणो... त्वं मित्रो ' ( ऋ. २ । १… 51–60
- श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ३१ पति: ( १ २ । ११ ) । इस छान्दोग्य उपनिषद्वचनके अनुसार वाणीरूप बुद्धिके पति होने से गणपतिही यौगिक बृहस्पति बने… 61–70
- श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ४१ गये हैं; जैसेकि काशी केदारनाथ - माहात्म्य में उनके लिए कहा है- 1 ( ख ) ' विघ्नध्वान्तनिवारणैकतरणिविघ्नाट बीहव्यवाट्… 71–80
- श्रीगणेशका मङ्गलाचरण २१ न ? र में एक ही कालमें ( इसमें १५-२० वर्षोका अन्तर नगण्य है ) बड़ा भेद मिलता है… 81–90
- श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ६१ प्राप्त होगई । कहीं यह बात ब्राह्मणभागकी होनेसे प्रतिपक्षियोंको खटक न जाए; अतः उन्हें संहिता भी देख लेनी चाहिये- ' आथर्वणाय… 91–100
- शिखाकी वैज्ञानिकता ७१ शिखा वाह्य चिह्न ( ३ ) शिखा हिन्दुजातिका उपयोगी बाह्यचिह्न है । यद्यपि ' न लिङ्ग ' धर्मकारणम् ' ( मनु ० ६… 101–110
- शिखाकी वैज्ञानिकता ८१ I " i I Π , यत्र असौ केशान्तो विवर्तते व्यपोह्य शीर्षकपाले ' ( ११६१ ) तालुके मध्य में स्तनकी तरह जो केशराजि दीखती है— इसमें केशोंका… 111–120
- शिखाकी वज्ञानिकता तो क ? त ना I: चा को क में * क में तथा ऋषिप्रवर - सङ्ख्यया । ' अथैनमेकशिखस्त्रिशिखः पञ्चशिखो वा यथा वा एषां कुलधर्मः स्यात् यथपिं शिखां… 121–130
- शिखाकी वैज्ञानिकतां स्थूल शरीरके सुन्दर बनाने में लगे रहने से उन्हें शिखा उसमें असुन्दरताका कारण प्रतीत होनेसे उसे वे कटा डालते हैं… 131–140
- शिखाकी वैज्ञानिकता १११ नर ठीक हो सकता है? स्वामी दयानन्दजीने भी कहा है - जो विद्या (? ) का चिन्ह यज्ञोपवीत और शिखाको छोड़कर मुसलमान-वै ईसाइयोंके सदृश बन… 141–150
- यज्ञोपवीत - रहस्य १२१ तं I I I i ही देता है, यज्ञोपवीतकी रचना - विधि से एतदादिक प्रश्नोंका उत्तर स्वयं होजाता है… 151–160
- यज्ञोपवीत - रहस्य १३१ चह येत ३१-ध ० ०, रण, नेता ' को नको लिए ४ ) पतं है । यः की, बाहुकी सीमा क्षत्रियकी, कमरकी वा ऊरुकी सीमा वैश्यकी है… 161–170
- यज्ञोपवीत- रहस्य १४१ भी मूल्य ३1 ) है; पाठक हमसे मंगा सकते हैं । स्त्री - शूद्रको उपनयन आ तथा वेदाधिकार देनेके जो प्रमारण दिये जाते हैं; उन पर इसमें पढ़… 171–180
- यज्ञोपवीत - रहस्य १३१ क से ई pr, 15 क , 15 के dir to व F F न न्य त से से a 7 I संस्कारसे ही चमकता है… 181–190
- ( ५ ) गायत्री मन्त्रकी महत्ताका रहस्य । ' गायत्री छन्दसामहम् ' ( भगवद्गीता १० । ३५ ) ' उपनयन - रहस्य ' हम बता चुके; उपनयनमें गायत्री मन्त्रका उपदेश किया… 191–200
- गायत्री मन्त्रकी महत्ता १७१ खोदने पर दफीना ( माणिक्य ) तो मिला नहीं, किन्तु एक देवमन्दिर मिला… 201–210
- गायत्री मन्त्रकी महत्ता १८१, साधारण पुरुषोंका भय हट जाता है, उसके उदयसे बुद्धिकी शुद्धि और कर्मों की प्रेरणा से बुद्धिकी वृद्धि प्रत्यक्ष है… 211–220
- गायत्री मन्त्रकी महत्ता १६१ होगा । अस्तु । ब्राह्मणके लिए तो गायत्री - सावित्री ही आई है । उसकेलिए तो इतना कहा है कि अन्य यदि वह कुछ न कर सके तो… 221–230
- षोडश संस्कार- रहस्य २०१ उसका संस्कार कहा जाता है । जब तक किसी पदार्थका संस्कार नहीं होता, तब तक वह सदोष और गुणहीन रहता है… 231–240
- षोडश संस्कार - रहस्य २११ पृथक् न होनेपर भी. ' शुभे रौक्मे च कुण्डले ' ( १४ । ३६ पद्य ) में स्पष्ट है, सुश्रुत - चरकादिमें भी स्पष्ट है… 241–250
- गर्भाधान - संस्कार - रहस्य २२१ तो उस समय स्थापित किये हुए गर्भसे पुत्रका जन्म होता है । छठी, आठवीं आदि युग्म या सम रात्रियोंमें ऋतुस्नाता पत्नीके साथ… 251–260
- नामकरण ' - रहस्य २३१ ( ५ ) नामकरण - रहस्य ' एकादशेऽह्नि नाम ' ( व्यासस्मृति १ । १७ ) ' म्यारहवें दिन नामकरण संकार करे… 261–270
- नामकरण - रहस्य २४१ द्विनामा ' इति ( काठक २६ । १ ) ( कुछ लोगोंका कहना है कि दूसरा नाम रक्खा जाता है । त्राह्मण के दो नाम रखने चाहियें… 271–280
- उपनयन- रहस्य III वर्षोंमें किया जाता है । पहले जीव माता - पिताके गर्भमें शरीर-धारणार्थ आता है, फिर आचार्य के गर्भ ( आचार्यकुल ) में विद्या-शरीर… 281–290
- कन्याका विवाह कब? २६३ सकेगी? इसलिए उसका भार पितापर ही ठीक है । कन्याके वाल्य वा यौवनमें अनुभव पिताके वार्धक्यके अनुभवसे न्यून ही होता है… 291–300
- वैवाहिक रीति- विशेषोंका रहस्य २७३ निष्कर्ष है कि — मैं ऋषिऋण, देवऋण, पितृऋणसे बंध गया हूं । अव इन्हें उतारूंगा… 301–310
- दैवाहिक विधियोंका रहस्य २८३ तात्पर्यके विषय हो सकते हैं । सो पहलेके तीन वर्गोंमें स्त्री पुरुषसे आगे ही रहती है… 311–320
- विवाह तथा अग्न्याधानका रहस्य २६३ इत्यादि द्वारा वस्त्र - प्रदान करता है, वैसे ही विवाह में भी वर उक्त मन्त्रसे वधूको वस्त्र प्रदान करता है… 321–330
- पितृमेध वा अन्त्यकर्म ३०३ शास्त्रानुसार अस्थिसंचयन, नित्यक्रिया, दशगात्रादि - कर्म, एकोद्दिष्ट, सपिण्डन, धर्मशान्ति तथा श्राद्धादि पितृकर्म मृतकके आत्माकी… 331–340
- हिन्दुधर्मके आचार - विचारोंके रहस्य ३१३ नींदके हटने से स्वास्थ्य बिगड़ने की आशंका रहती है । सर्दी में प्रातः स्नान करना निमोनियाको न्योता देना है… 341–350
- प्रातः हस्तदर्शनका विज्ञान ३२३ भगवान् का स्मरण तथा जप करके गोविन्द को प्राप्त करते हैं । तब ' करपृष्ठे च गोविन्दः ' कहना भी ठीक हुआ… 351–360
- मट्टी से हाथोंकी शुद्धि ३३३ है यह भी स्मरण रखनेकी बात है कि विद्यालयों में वा घरोंमें, वा अन्य स्थानोंमें एक ही स्थानमें वहुत लोग लघुशंका करते हैं; वह ठीक… 361–370
- तेल- नियमका विज्ञान. ३४३ कहा है - ' अपामग्नेश्च संयोगाद् हैमं रौप्यं च निर्वभौ ' ( ५/११३ ) इधर चन्द्रमाका पुत्र होनेसे चन्द्रमाके जलकी शीतलता से भी युक्त… 371–380
- कुशासनका वैदिक विज्ञान ३१३ आसन विल्लानेसे उपासनाके समय पार्थिव विद्युत् हमारे शरीर में संक्रान्त नहीं हो सकती, इसीलिए हमारे ध्यान में विघ्न भी नहीं पड़… 381–390
- देवकार्य पूर्वाभिमुख ३६३ सम्भव है यह रोगके विरुद्ध ही युद्धकी विजय - दुन्दुभि हो, अस्तु । यद्यपि प्राचीन ऋषि - मुनियोंने एतदादि विज्ञान अपने मुखसे नहीं… 391–400
- मार्जन - विज्ञान ३७३ कुशोंका, अपामार्ग तथा दूर्वाका मार्जन उपयुक्त किया जाता है । कुशसे तेजगत दोष, अपामार्ग से विशेषरूप से रक्तगत दोष, और दूर्वासे शुक्रगत… 401–410
- सूर्यको अर्ध्य और उसका उपस्थान ३६३ प्राणायाममें पहले मन्त्र द्वारा दाहिनी नाकको बन्द करके बाहरी शुद्ध वायु खींचनी पड़ती है; फिर बाईं ओर दाहिनी नाककी… 411–420
- जप - पाठविज्ञान ३६३ करती हैं । शब्दोंके क्रमविशेषसे ही सङ्गीत वन जाता है, जिससे पशु - पक्षी भी प्रभावित होते हैं… 421–430
- मालाकी मणियोंकी १०८ संख्याका विज्ञान ४.०३ युगों का जोड़ ४३,२०,००० है, यहां भी ६ अङ्क ही बनता है… 431–440
- मन्त्रसिद्धिका सूक्ष्म - विज्ञान ४१३ है, उसमें पत्थर एक - दूसरे पर इस प्रकार जुड़े हुए हैं कि — उनके पास मध्यम स्वरसे बजाने से वे कांपते हैं… 441–450
- शंख - ध्वनि - विज्ञान ४२३ गांववालोंको टाइमका भी पता लग जाता है 1 । बौद्ध, जैन, ईसाइयों-के मन्दिरोंमें भी इसका प्रयोग होता है… 451–460
- यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व ४३३ = प्रकारके क्षेत्र में, अमुक - नक्षत्र में, अमुक मन्त्रोंसे बोई जाती थीं; उन्हें अमुकप्रकारके जलसे सींचा जाता था; और उनमें… 461–470
- यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व ४४३ ऋषिमुनियोंने उपाय सोच लिया था । वह यह था कि - साक्षात् अग्निदेवता तथा ब्राह्मणस्थ वैश्वानर- अग्नि इन दोनोंके द्वारा उन्हें… 471–480
- यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व ४५३ तो उसका प्रभाव नहीं होता । जब सूक्ष्म बिन्दु करते हैं; तो उससे हमारा हाथ जल जाता है । डाक्टर उससे पानी गर्म कर लेता है… 481–490
- यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व ४६३ जीसे प्रणीत वेदोंकी पदानुक्रमणिकाओंको देख लीजिये; उसमें ' यज ' धातुका प्रयोग ऋग्वेद - पदानुक्रमणिकाके ३२२ पृष्ठके तीसरे… 491–500
- श्री तुलसीपूजन - विज्ञान ४७३ हैं; वहाँ मानसिक एवं आत्मिक लाभ भी होते हैं - यह बात स्वयं जानी जा सकती है । ( ४१ ) श्रीतुलसी पूजन - विज्ञान… 501–510
- श्रीतुलसीपूजन - विज्ञान ४८३ ऋषि - मुनियोंने एतदादिक गुण जानकर उससे आध्यात्मिकतामें भी लाभ जानकर इसका धर्मसे भी सम्बन्ध देखा था… 511–520
- श्रीगङ्गाजलकी विशेषताका विज्ञान I करके, इसमें मृतकोंकी सद्गतिका विचार करके उनकी अस्थियां डाली जाने लगीं… 521–530
- वृक्षोंकी चेतनता २०३ जिनसे वृक्षोंके सुख - दुःखका अनुभव प्रत्यक्ष होता था । पर यूरोपके वैज्ञानिकोंने इस पर विश्वास न किया; क्योंकि वे वृक्षोंको जड़ मानते… 531–540
- गोबर में लक्ष्मीका निवास ५१३ लक्ष्मीने कहा था- - ' ' दिष्ट्या प्रसादो युष्माभिः कृतो मेऽनुग्रहात्मकः । एवं भवतु भद्रं वः पूजितास्मि सुखप्रदा ' ( ८२… 541–550
- भोजन - विधिके विज्ञान १२३ द्रौपदीने एक शाकका पत्ता ही तो भगवान् कृष्णको खिलाया था । विश्वम्भरकी तृप्ति होने से विश्व - भरकी तृप्ति हो गई थी… 551–560
- बाजारू अन्न खानेका निषेध २३३ उपकार कर सकता है । तब ' घृतपक्क अन्न ब्राह्मणगरण रसनाके लौल्यसे खाते हैं ' यह आक्षेप असत्य ही है, किन्तु वह विशुद्ध होने से… 561–570
- भोजन के बाद नियम २४३ वह घृताक्त हाथ आंखोंपर फेरना चाहिये - इससे आंखोंकी ज्योति बढ़ती है । घृतको हाथसे उतारने के लिए साबुन से हाथ धोकर हाथको रूखा करना ठीक… 571–580
- उपवास एवं एकादशी - विज्ञान ५५३ वन्ध्या विजानाति गुर्वीं प्रसववेदनाम् ' । एक दिन भी जिसने उपवास नहीं किया; वह प्रतिदिन फांका करनेवाले चुत्पीड़ित… 581–590
- उपवास एवं एकादशी - विज्ञान २६३ अवलम्बन करनेपर न तो आपको डाक्टरोंकी आवश्यकता रहेगी, न अस्पतालों में रहने की, न दवाइयोंकी, न जुलावकी, न किसी अन्य साधनकी!… 591–600
- शयनके समय विशेष दिशाका विचार २७३ स्पष्ट देवदिशा है । पूर्वं वा दक्षिण दिशामें सिर करके सोना प्रशस्त है - यह संकेत हम पूर्व दे ही चुके हैं; उसमें विज्ञान… 601–610
- अस्पृश्यता - विज्ञान १८३ मनोविज्ञानवेत्ता भी मानस- विचारतरङ्गोंका वायुमण्डल - द्वारा दूसरों में संक्रमण मानते हैं; भौतिक विज्ञानके आचार्य भी… 611–620
- संवत्सरका प्रारम्भ फाल्गुन मासमें १४ शिवरात्रि तथा १५ होलीको कई पर्वोंसे सम्बद्ध अन्य विषयोंपर भी लिखा है — इससे ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के पाठकोंको प्राप्त… 621–630
- कल्प एवं सृष्टि - संवत्सरं ६०३ जाते हैं । इस जबर्दस्तीके अर्थ में भी वही हमारी कही संख्या निकली । पर उक्त वेदमन्त्रके इस अर्थ करनेमें कई दोष आते हैं… 631–640
- मास एवं वारोंका नामक्रम - विज्ञान ६१३ ( २ ) मास एवं वारोंका नामक्रम - विज्ञान । हम ' संवत्सर ' के विषय में बता चुके… 641–650
- वार - क्रम - रहस्य ६२३ , न I पड़ा करती है यह हम पहले सूचित कर चुके हैं; जब तक राशियों-का ज्ञान न हो; तबतक ग्रहण कैसे निकले? पर हमारे पूर्वज ग्रहणको जानते… 651–660
- श्रीरामनवमी ६३३ बतानेसे उसका सूक्ष्मतम आकार सिद्ध कर दिया गया । केवल निराकार इष्ट होने पर अपेक्षाकृत सूक्ष्मत्व भी परमात्मामें नहीं हो सकता… 661–670
- वेदमें श्रीरामावतार ६४३ ते, :, भी नी र, । तो भी ल दि ६२ कारोंने भाष्य में भी मुख्यतया याज्ञिक दृष्टि रखी है… 671–680
- श्रीव्यास - पूर्णिमा ६५३ इन्हीं पुराण- इतिहास आदि के द्वारा ही अर्वाचीन- सम्प्रदायोंके उपदेशक लोग अपने व्याख्यानको विस्तीर्ण तथा रोचक बना लेते हैं!… 681–690
- श्रीकृष्ण - जन्माष्टमीव्रत पूर्णतः वैज्ञानिक ६६३ विषयों से ' छुटकारा हो जाता है । निर्विषयता हुई, तो अनन्य भक्ति भी हो सकती है… 691–700
- मृतकश्राद्ध - विज्ञान ६७३ के अनुसार जीवको दो गतियां बताई गई हैं - एक उत्तरगति; दूसरी दक्षिण- गति… 701–710
- मृतकश्राद्ध - विज्ञान ६८३ पदार्थोंको छूता हुआ वहीं पर बैठता है । इसलिए यह सब हवि आदि सामग्री उसी प्रकारका यन्त्र बन जाती है, जिस प्रकार चन्द्रमरिण… 711–720
- विजयदशमीका महत्त्व एवं विजयका रहस्य ६६३ ( ८ ) विजयदशमीका महत्त्व एवं विजयका रहस्य । यह विजय दशमीका दिन है… 721–730
- दीपावलीका वैज्ञानिक - रहस्य ७०३ कृपा - कटाक्ष भी आ उपस्थित होते हैं । उस समय हमें घरोंकी स्वच्छताका अवकाश ही नहीं मिलता… 731–740
- दीपावलीका वैज्ञानिक- रहस्य ७१३ 5 “ समय में महिषमर्दिनी श्रीदुर्गादेवीको आधारभूत करके शक्ति-· उपासनामें लग जाते थे… 741–750
- गीताजयन्ती एवं गीतोपदेशकी तिथि ७२३ P I T ], ने न के र ना म न ना नी क दिनके सम्बन्धमें विद्वानों में मतभेद हैं… 751–760
- युद्धमें गीताका सुनाना सम्भव ७३३ नहीं थे । इससे पूर्व सेनाओं के व्यूह रचे गये । वे बीर अपने-अपने नियत स्थानों में थे । कर्ण तो सारी सेनाके पीछे ही था… 761–770
- गीताकी सर्वप्रियताका कारण ७४३ उसकी इष्टसिद्धि होती है, उसके चित्तको शांति मिलती है । यह अवश्य है कि गीता के मत में भी कर्म आदिम - काण्ड है और ज्ञान अन्तिम… 771–780
- गीताका गूढ उद्देश्य वा विषय ७१३ होगा । संसार सुखी और समृद्ध होगा । वस, फिर सफलता ही सफलता है; हमारे भारतकी फिर विजय ही विजय है… 781–790
- गीताका गूढ उद्देश्य वा विषय ७६३ अर्जुनने भी स्वीकार कर लिया कि - ' करिष्ये वचनं तव ( १८/७३ ), तब उसमें यही रहस्य है कि – कामोपभोग छुड़ानेवाले भगवान्,… 791–800
- श्रीमहीधरका अर्थ यजमानकी कन्यासे हँसी - ठट्ठा आदि कराना सिवाय वाममार्गी-लोगों से अन्य मनुष्यका काम नहीं है ' ( स ० प्र ० १२ पृ ० २५६ )… 801–810
- ( ) श्रीमहीधरका अर्थ: ७८३ भला क्या हो सकता है? क्या मृतकका वीर्य भी रह जाता है? वीर्य -की शुष्कता से ही तो मृत्यु होती है… 811–820
- ७३३ ( तै ० सं ० ७ । ४ । १६ । ३ ) इत्यादि मन्त्रान्तर- प्रसिद्धम् ' । यही वह मन्त्र है, जिसका स्वामी दयानन्दजीने महीधरका अर्थ उपस्थित करके उसे फटकार दो… 821–830
- श्रीमहीधरा अर्थ ८०३ ' क्षकामा देवाः प्रत्यक्षविद्विषः ' ( शतपथ ०७ । ५ । १ । २२ ) परोक्षवाद देवता एवं ऋषि - मुनियोंको बहुत प्रिय होता है… 831–840
- गणेश एवं गणनायकके स्वरूपका परिचय ८१३ का प्रसङ्ग उपस्थित हो सकता है । इसके अतिरिक्त गणनायकको बड़े कान वाला भी होना चाहिये… 841–850
- = न 1 न ी के - } a II I गणेश एवं गणनायकके स्वरूपका परिचय २३ विश्वास से आक्रान्त नहीं रखोगे; तो तुम्हारा व्यवहार नहीं चल सकता… 851–860
- शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायका स्थापक ८३३ वह पूजा इस समय में नष्ट हो जाती; पर इस शिवरात्रिके चूहेने उसे दृढ करा दिया । आज हम इसपर विचार करते हैं… 861–870
- शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायका स्थापक ८४३ ( ११ ) मालूम होता है कि — दयानन्दजी आशय यह था कि— महादेव मेरे सामने प्रत्यक्ष होकर — चूहेको दण्ड देते; तभी… 871–880
- र I ? का के शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायको स्थापक ८५३ शिवरात्रिके दिन प्रभु - विश्वनाथके घर महोत्सव होता है । देश - विदेशमें इस दिन बड़ा समारोह होता है… 881–890
- होली विज्ञानकी कसौटीपर ८६३ गिराया, हाथीके पैरों तले दबवाया, तलवारसे उसकी गर्दन काटने का प्रयत्न किया; परन्तु वह हिरण्यकशिपु उसमें सफल न हुआ… 891–900
- ( १० ) ‘ ओम् ' का महत्त्व | ‘ गिराम् अस्म्येकमक्षरम् ' ( भगवद्गीता १० । २५ ) हम ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थके पञ्चम - पुष्पके आरम्भमें श्रीगणेशका… 901–910
- ' प्रोम् ' का महत्त्व चक्कीके पाटमें पड़कर ‘ अचू ' पिस जाते हैं, दीखते ही नहीं; अथवा विकृत हो जाते हैं; पर ' ओम् ' यह ब्रह्मका नाम है, यह भला व्याकरणमें… 911–920
- ' ओम् ' का महत्त्व ८६३ ' ' अभ्यादान ' का ' अयज्ञकर्म ' अर्थ करनेकी क्या आवश्यकता थी? इससे श्रीनागेशने यह सिद्ध किया हैं कि उक्त सूत्र से ' ओम्'को… 921–930
- ' ओम ' व 1 साधारण रहता; पर अब अलग होकर उन मन्त्रोंसे भी श्रेष्ठ होकर सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हुआ । और ' ॐ ' होनेपर वह गजानन-गणेशका प्रतीक सिद्ध हुआ… 931–940
- वेद वेदांगविद्यालय मन्त्रालय t1............... 000 000 000 000. ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थमाला के सहयोगी संरक्षक श्री पं ० सुरारी मेहता, कलकः… 941–944