सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 11–20

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 11–20

पृष्ठ 11

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51 न 1 न i [ ङ. ] हुआ । चार पत्रोंके उत्तर देने के बाद उन्होंने पत्रोत्तर देना बन्द कर दिया, और पुस्तक छपवानेकेलिए उत्तेजित किया । उसी विषयका प्रथम - पुष्प ' श्रीस्वाध्याय ' के संपादक- महोदयने ' श्रीस्वाध्याय ' में छपवाकर उसे पृथक रूप से भी छपवा दिया । दूसरा पुष्प शुरू करवाकर भी कारणवश उसमें उन्होंने अपना सहयोग बन्द कर दिया । उस समय जनताके द्वारा कुछ सहायता प्रारंम्भ होगई थी । उससे द्वितीय - पुष्प छपा । फिर तृतीय - पुष्पकी तैयारी हुई, वह भी छप गया । फिर चतुर्थ - पुष्प छपा । अब पश्चम - पुष्प आपके समक्ष है । छठे - पुष्पकी तैयारीकी आशा भी बँध रही है । यह सब जनता - जनार्दनकी सहायताका फल है । इस प्रकार जनता अपना सहयोग देती चले, तो २० पुष्प पूर्ण होकर उक्त १० सहस्र पृष्ठका महाग्रन्थ पूरा प्रकाशित हो जाय । यदि प्रतिपुष्प में एक नवीन-महोदय संरक्षक होते चलें, शेष २० सहायक होते चलें, तो यह ग्रन्थ-माला शीघ्र पूर्ण हो सकती है । धर्मानुरागी जनताका ध्यान इधर अपेक्षित है । इस विषय में हमसे पत्रव्यवहार किया जा सकता है । सनातनधर्मी विद्वान् । सनातनधर्मके इस ग्रन्थ में सनातनधर्मी - विद्वानोंका भी कुछ परिचय अपेक्षित है । यों तो सनातनधर्मी - विद्वानोंकी संख्या की ही नहीं जा सकती । पर उनमें प्रसिद्ध विद्वान् श्रीपं ० ज्वालाप्रसादजी तथा पं ० श्रीभीमसेनजीने बड़ा भारी कार्य किया । इनके बाद श्री पं ० कालूरामजी शास्त्री युक्ति - विशारदका नाम न लिया जावे; तो यह हमारी कृतघ्नता होगी । इनके ग्रन्थ सुमधुर एवं सुगम - भाषा में

पृष्ठ 12

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[ च ] इस शैलीसे लिखे गये हैं कि - सनातनधर्म - सिद्धान्तोंके अज्ञाताको भी उसमें बड़ा लाभ प्राप्त हो जाता है । मैंने सनातनधर्म के विषय में गवेषणा श्री पं ० कालूरामजी शास्त्री आदि अपने से पूर्व विद्वानों की अपेक्षा बहुत अधिक कर रखी है; पर मैं यह स्पष्ट कह देता हूँ कि मुझे श्रीपं ० कालूरामजीशास्त्रीके ग्रन्थ ही सभ्ध की वेदीपर ले आये । उनमें श्री पं ० भीमसेनजीके ' ब्राह्मणसर्वस्व ' स्थित लेखों का तथा पं ० ज्वालाप्रसादजी के ' दयानन्दतिमिरभास्कर ' का भी बड़ा हाथ था । म ० म ० पं ० गिरिधरशर्मा न्यायशास्त्रीजीने भी सनातनधर्मका अद्भुत प्रचार किया । अपनी व्याख्यानमाला तथा शास्त्रार्थों से जनताको बहुत ही प्रभावित किया; पर म ० म ० जीमें यह त्रुटि रही कि — उन्होंने सनातनधर्म - विषयक विशाल ग्रन्थ अभी तक भी जनता के समक्ष नहीं रखा, जो कि उनके जीवन के बाद उनकी स्थानपूर्ति कर सके । यदि वे चाहें तो उनमें इस विषय में अद्भुत क्षमता है । पर उन्हें अपेक्षित वृत्तिकी न्यूनता इधर नहीं आने देती । सनातनधर्मी धनिकों वा संस्थाओं का कर्त्तव्य था कि उन्हें वृत्तिसे निश्चिन्त कर देते; तब देखते कि — उनसे कैसा सुन्दर सनातनधर्म-विषयक ग्रन्थरत्न बनता । इसे सनातनधर्मका दुर्दैव ही कह सकते हैं । एक पत्र में प्रकाशित उनके एक लेखमें यह जानकर कि - ' उन्होंने पुराण - विषयक कुछ रचनायें प्रस्तुत करना प्रारम्भ कर दिया है ' मुझे अत्यन्त ही प्रसन्नता हुई है । उनके एक - एक अक्षरमें अति-•.शयित - ज्ञान भरा होता है ।

पृष्ठ 13

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[ छ ] इनके बादके स ० ध ० प्रचारक विद्वान थे मुलतान के गोवामी पं ० यदुकुलभूषण शास्त्री महामहोपदेशक । उनकी भी स्तुति इस मुख से नहीं की जा सकती । उन्होंने बड़े - बड़े शास्त्रार्थ किये; सुन्दर ट्रैक्ट प्रकाशित किये । एक सुन्दर ग्रन्थ छपवाना प्रारम्भ ही किया था कि- काल के कराल - गाल में अकालमें ही समा गये । इससे धार्मिक-जनताको बड़ी चोट लगी । उनके वादके प्रचारक विद्वान् हैं महामहोपदेशक शास्त्रार्थ-महारथी श्री पं ० माधवाचार्यजी शास्त्री । इनका वर्णन करना भी इस मुखसे सम्भव नहीं । वस्तुतः इन्होंने अपने सुन्दर - भाषणों, शास्त्रार्थों तथा सुन्दर पुस्तक - निर्माण से देश - विदेशमें प्रतिपक्षियोंके छक्के छुड़वा दिये । यह बहुत सभ्य, शिष्ट, संयत और वाग्मी हैं । प्रतिपक्षीके हृदयपर धाक डाल देते हैं । इनके बाद सनातनधर्म - संसार में मुझे अन्धकार दीख रहा है । इन्हें चाहिये कि- अपने जैसे किसी अधिकारीको अपने जीवन में नियुक्त कर जावें, जिससे इनका प्रारम्भ किया हुआ भाषणादि कार्य आगे भी चलता रहे । एक बात मैं भूल गया, जिससे मुझे कृतघ्नता प्राप्त हो सकती थी; वह है सनातनधर्मके प्रसिद्ध एवं सुमधुर व्याख्याता श्रीस्वामी दयानन्दजी महाराज भारतधर्म - महामण्डल तथा कविरत्न पण्डित अखिलानन्दजीका निरूपण । इन दोनों महापण्डितोंने भी सनातनधर्म-विषयक बहुत सुन्दर- पुस्तकें बना दी हैं । वेदमन्त्रोंके प्रमाणोंपर कविरत्नजीका विशेष प्रयत्न रहा है । विपक्षी समुदाय इनसे जलता

पृष्ठ 14

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[ जं ] है, इन्हें विविध धूर्तताओं से बदनाम करता है । पर इनके ग्रन्थ बहुत ही उत्तम हैं, आशा है - इस वार्धक्य में भी वे अपना शेष-साहित्य जनताको सौंप जायेंगे | स्वामी दयानन्दजी में यह विशेषता रही है कि वे प्रतिपक्षीका खण्डन इस प्रकार करते हैं कि किसीको उसमें खण्डन मालूम ही नहीं होता । इनका ' धर्मविज्ञान ' ग्रन्थ बहुत सुन्दर है । आजकल के सनातनधर्मके विद्वानोंमें श्री पं ० दुर्गादत्तजी त्रिपाठी ' सिद्धान्त सम्पादक ( काशी ) बड़े परिनिष्ठित हैं । वे जब किसी सनातनधर्म - विरोधीकी आलोचना करते हैं, तो विषयके बीच घुस जाते हैं, बहुत सुन्दर, शिष्ट एवं संयत अकाट्य -विवेचना देते हैं । शेष श्री पं ० ब्रह्मदेवजी शास्त्री आदि विद्वानोंका परिचय फिर दिया जायगा । सनातनधर्मके जागरणमें हम उसकी अर्वाचीन विपक्षि - शाखा आर्यसमाजका भी आभार मानते हैं । यदि सचमुच यह सम्प्रदाय शुरू न होता; स ० ध ० को जली - कटी न सुनाता, खण्डन - मण्डनका प्रचार न करता; चालाकियां करके अर्थका अर्थ न करता; तो सोये हुए स ० ध ० के विद्वानोंको आजका ईसाइयों का नवीन संस्करण सुधारक सदाकेलिए सुला देता । फिर उन विद्वानोंको जागरित * ' सिद्धान्त ' के प्रधान - सम्पादक श्री पं ० गङ्गाशङ्करजी मिश्र हैं । प्राप सनातनधर्मके ऊँचे पण्डितों में हैं ॥ पौरस्त्य - पाश्चात्य दोनों साहित्योंमें तथा राजनीतिक - शास्त्रमें परम - प्रवीण हैं । ' सिद्धान्त ' पहले साप्ताहिक, पर अब पाक्षिक पत्र है, यह भी संग्रहणीय - पत्र है । दैनिक ' सन्मार्ग ' भी इन्हींकी सम्पादकता में निकलता है । मँगानेका पता - ' -'सिद्धान्त ' कार्यालय गङ्गातरङ्ग, नगवा, बनारस ।

पृष्ठ 15

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[ झ ] करनेवाले व्याख्यानबाचस्पति पं ० दीनदयालुशर्मा जैसे सुमधुर तथा युक्तिपूर्ण व्याख्याता कहांसे निकलते? सचमुच आजके स ० ध ० के सभा - सोसायटीके रूपमें जागरणका श्रेय इन्हीं पण्डित- महानुभाव ( श्री दीनदयालुजी ) को है, इसमें कोई चाटुकारिता वा मृषावाद नहीं । आ ० स ० के प्रतिद्वन्द्वी - प्रचार से सनातनधर्म में पर्याप्त जागृति आई । आज कांग्रेसका युग आ गया है । इसने यह विवाद समाप्त करा दिये हैं । पर हमें शास्त्रार्थों का वह समय उत्कण्ठापूर्वक स्मरण आता है । चाहे आर्यसमाजी- पण्डित चालाकियां करते थे; अर्थका अनर्थ भी करते थे, ग्रन्थोंके प्रामाण्य- अप्रामाण्य में अपने स्वैराचारको ही मुख्य रखते थे; तथापि इन दोनों संस्थाओंके विद्वान् इस मिषसे शास्त्रोंको तो देखते - भालते थे । आज फिर शास्त्रोंका देखना-भालना बन्द हो गया है । सनातनधर्मी विद्वान् फिर ऊँघ रहे हैं: उनको जगानेकेलिए ही हमने यह ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थमाला जारी की है । यह पञ्चम- सुमन आपके हाथों में है । यदि आप सहायता करते - कराते चलें; तो पञ्चम - सुमन - इतनी बीस पुष्पोंकी यह ग्रन्थमाला शीघ्र पूर्ण हो जावे । आज भीषण - युग प्रवर्तमान है, अधिक कहनेकी आवश्यकता नहीं । यदि यह ग्रन्थमाला पूर्ण हो गई, तो सनातनधर्मपर होने-वाली शङ्काएँ प्रायः समाप्त हो जायेंगी यह हमारा जनताकी सम्मति देखकर विश्वास है । अब इसे अपना कार्य समझकर अपनाइये । हमें बहुत कहने - लिखने का अवसर न दीजिये ।

पृष्ठ 16

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[ न ] ग्रन्थमालाके सहायक । इस बार कोई महोदय संरक्षक नहीं बने । हां, सहायक बने हैं । इस बार जगद्गुरु - शङ्कराचार्य ज्योतिष्पीठाधीश्वर श्री १००८ स्वामी कृष्णबोधाश्रमजी महाराज सहायक बने हैं । इस देश में आने पर श्रीचरण हमारा ध्यान आरम्भ से ही रखते रहे हैं । इन्हींने स्वामी श्री १०८ भूमानन्दजी महाराज तथा दानवीर पं ० कृष्णचन्द्र जी वैंकर्सको भी सहायक बनवाया है । इसके बाद ' पण्डितभूषण ' स्वामी श्रीरामदासजी शास्त्री आयुर्वेदाचार्य, अध्यक्ष श्रीचन्द्र-चिकित्सालय समोसा - गली देहली, इसके सहायक बने हैं । यह मुलतान निवासी हैं, जहाँ आप आयुर्वेद के योग्य विद्वान् हैं, वहाँ रोगियोंकी चिकित्सामें भी सिद्धहस्त हैं । फिर स्वामी श्री १०८ वासुदेवानन्दजी महाराज शास्त्री वेदान्ताचार्य, दर्शनाचार्य सहायक बने हैं । आप पंजाव निवासी हैं, और योग्य विद्वान् हैं । फिर आगरा के कारोनेशन प्रेस के अध्यक्ष रायबहादुर गोस्वामी ब्रजनाथजी शर्मा सारस्वत - महोदय भी सहायक बने हैं । मारवाड़ मूंडवा सुप्रसिद्ध वैद्यराज श्री पं ० वनमालिदत्तजी व्याकरणायुर्वेदाचार्य ( अध्यक्ष श्रीवेङ्कटेश्वरधर्मार्थ औषधालय ) महाभागने श्रीगोपीलालजी काबरा महोदयको सहायक बनाया है । उनके भी प्रेरक श्री पं ० रामेश्वरजी शास्त्री महाभाग हैं । सहायकों का न्यूनसे न्यून १०० ) नियत है । यह सब सहायक वा प्रेरक ब्राह्मण वा चतुर्थाश्रमी हैं । इसके बाद सेठ श्रीभांगीरामजी सेठ श्रीछबीलदास जी बम्बईइस

पृष्ठ 17

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[ ट ] ग्रन्थमालाके १५१ ) देकर सहायक बने हैं । इनके प्रेरक सेठ श्री तेजभानजी तथा दैवज्ञधुरीण श्रीपं ० बालमुकुन्दजी मुलतान-निवासी हैं । अर्थदाता इस पुष्प में श्री सेठ कुम्भनदास विशनदासजी, तथा सेठ श्री भगवानदास जी डी. गांधी बम्बई ने ५१ ) -५१ ) रुपये, श्रद्धेय श्री पं ० दुर्गादत्तजी त्रिपाठी — महोदयने २५ ), मुलताननिवासी श्री पं ० बालमुकुन्दजी ज्योतिर्वित् - महोदयने २५ ), श्रीमान् पं ० भवानीशंकर जी शास्त्री संस्कृत - शिक्षक दरबार मिडल स्कूल जयपुर महोदयने इस बार भी २५ ) ग्रन्थमालाको सहायतार्थ दान दिये हैं । सनातनधर्मके भक्त श्री रामशरणदासजीने ११ ) दान दिये हैं । पूर्वके सहायक श्री पं ० ब्रह्मदत्तजी शर्मा सांकरिया निवासी, ( अध्यापक माध्यमिक-विद्यापीठ कादेड़ा ) महोदय तो आरम्भसे ही इस ग्रन्थमालाके सहायक हैं । तृतीय- पुष्पसे लेकर प्रत्येक पुष्प में १०० ) की सहायता दिया करते हैं । दूसरे श्री पं ० हरिप्रसादजी शास्त्री पाराशर ओ. टी. ( संस्कृत - शिक्षक S. D. हाईस्कूल पठानकोट ) महोदय इस बार भी १०० ) रु ० के सहायक बने हैं । इस मालाके सबसे पूर्वके सहायक श्री पं ० रेवाशंकरजी शास्त्री पुरोहित देलवाड़ाकर ( बम्बई ) थे, पर हमें यह जानकर अत्यन्त ही खेद हुआ कि वे इस लोकको छोड़ चुके हैं । ग्रन्थमालाको उनके इस आत्यन्तिक - वियोगसे बड़ा आघात पहुँचा है । अस्तु, वे स्वर्गसे मी ग्रन्थमालाकी शुभाशंसा कर रहे

पृष्ठ 18

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[ 5 ] होंगे । श्री पं ० रामेश्वरजी शास्त्री प्रत्येक पुष्पको पर्याप्त संख्या में बिकवाकर इसका प्रचार कराया करते हैं । श्री पं ० विष्णुदत्तजी बी. ए. ( बूंदी ) महोदय ने भी पुस्तकोंके विक्रय में अपना हाथ टाया है । अस्तु, इन सब सहायकों, अर्थदाताओं, प्रेरकों तथा ग्रन्थमाला-के प्रचारकोंको हृदयसे धन्यवाद देते हुए हम अन्य महोदयों को भी प्रेरणा करते हैं कि वे भी इस ग्रन्थमालाको स्वयं सहायता दें; तथा दूसरोंसे भी दिलवायें । इस ग्रन्थमालाके इतने ही बीस सुमन खिलने हैं । उनमें सनातनधर्मके सभी विषय आगये हैं । जनताके सहयोगसे यह ग्रन्थमाला शीघ्र पूर्ण हो सकती है । ग्रन्थमालाको अनन्तश्रीविभूषित श्री १००८ स्वामी श्रीकरपात्रीजी महाराजका हृदय से आशीर्वाद प्राप्त है । यदि वे किसी समर्थ भक्तको इस यज्ञ में कुछ अंश आहुति देनेकेलिए प्रेरित करदें; तो इस धर्मयज्ञकी शीघ्र ही पूर्णता सम्पन्न हो सकती है । सोल - एजेन्ट सूरिनेम ( डचगायना - दक्षिण अमेरिका ) में हमारे सोल एजेन्ट श्रीलोकनाथजी हैं । ये सनातनधर्मके सच्चे प्रेमी हैं । इनके श्रीपिताजी उधर सनातनधर्मके महोपदेशक हैं । यह भी इस ग्रन्थमालाका प्रचार दक्षिण अमेरिकामें कर रहे हैं । प्रस्तुत - पुष्प प्रस्तुत- पुष्पमें हिन्दुधर्मके आचार - विचार एवं पर्वोंके वैज्ञानिक रहस्य बताये गये हैं । आजका संसार विज्ञानसिद्ध. सिद्धान्तको

पृष्ठ 19

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[ 3 ] प्रमाणित करता है, अतः इस पुसमें हमने विज्ञानको ही लिया है, जिससे ' सनातनधर्म वैज्ञानिक बसे है. वैज्ञानिक नहीं ' यह जनता को ज्ञात हो सके । इसे हिन्दुमात्रको अपनाना चाहिये । अमूल्य कोई भी न ले | यह ध्यान रहे कि - हमें इस ग्रन्थमालामें जो भी सहायता वा मूल्य प्राप्त होता है, वह सब द्यागेके पुष्पोंके प्रकाशनार्थं जमा कर लिया जाता है; उसका एक पैसा भी अपने कामसें नहीं लगाया जाता; अतः कोई भी महोदय इन ग्रन्थोंको बिना मूल्य न । यदि कोई महोदय अधिक सहायता न भी कर सकें; तो ग्रन्थका मूल्य अवश्य दें, और इस ग्रन्थमालाके प्रचार तथा विक्रयण में अवश्य सहायक बनें इससे अग्रिम पुष्पके प्रकाशन में सहायता मिल जाती है । सहायता के नियम | दस हजार रु ० देनेवाले ग्रन्थमालाके ' सर्वस्व ' माने जाते हैं, पांच हजार देनेवाले महासंरक्षक, ढाई हजार देनेवाले मान्य- संरक्षक और एक हजार देनेवाले संरक्षक माने जाते हैं । इनका नाम प्रत्येक प्रकाशन में छपता है, और चित्र प्रथम प्रकाशन में । ' सर्वस्व ' तथा महासंरक्षकका परिचय भी दिया जाता है । पांच सौ रु ० देनेवाले सम्मान्य - सहायक, और ढाई सौ दाता- मान्यसहायक और एक सौ रु. देनेवाले सहायक माने जाते हैं । अधिकारी - विद्वानोंसे प्रार्थना है कि - विचार में यदि कोई त्रुटि रह गई हो; तो सूचना दें, जिससे आगे ध्यान रखा जा सके । इन शब्दोंके साथ यह भूमिका समाप्त है । निवेदक-विजय दशमी | दीनानाथशर्मा सारस्वत शास्त्री विद्यावागीश [ प्रिन्सिपल सं. हिं. महाविद्यालय, दरीबाकलां ] सं ० देहली -६ २०१३

पृष्ठ 20

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[ ] श्री सनातनधर्मालोक ( ४ ) के सम्बन्ध में -: कुछ विद्वानोंके भावोंका संक्षेप ( १ ) ' आपका प्रखर पाण्डित्य और परिश्रम तो सदैव स्तुत्य रहा है, परन्तु उक्त - पुष्पकी छपाई -सफाई आदि में भी सर्वथा आधुनिक बनानेकी कला देखकर अतीव हर्ष हुआ । सनातनधर्मको आपकी लेखनी पर गर्व है ' । ( पं ० श्रीमाधवाचार्यशास्त्री शास्त्रार्थ - महारथी, स ० ध ० महामहोपदेशक ) कौल ( करनाल ) । ( २ ) पं ० दीनानाथशास्त्रिरणां यावन्तो निबन्धा आर्यसमाजि-विचारखण्डन- सम्बन्धे तथा स ० ध ० - सिद्धान्तपोषण सम्बन्धे अद्यावधि निर्गताः, ते हि अमूल्याः सर्वेषामपि संस्कृत विदुषां समते समुपस्थापनीयाः सन्ति । " धर्मसम्बन्धे यः शङ्कोद्गमरोगो जायते, तस्य निराकरणार्थ शास्त्रिवर्याणां निबन्धा रामबाणायमानाः सन्ति ।... एभिर्निबन्धैरहं शास्त्रिवर्यान् अभिनन्दितुं बलात्प्रेरितोस्मि ' । ( पं ० श्रीगोपालशास्त्री दर्शनकेसरी, काशी ( सूर्योदये २६।६ - ७ ) ( ३ ) ' इस पुष्पमें हिन्दुधर्मके २० गूढ - विषयोंपर गम्भीर-विवेचन किया गया है । अवान्तर विषय तो अनेकों आगये हैं । शास्त्रीय प्रमाणों के साथ आधुनिक तर्क भी दिये गये हैं । इन ग्रन्थोंसे शास्त्रीजीके ठोस पाण्डित्यका पता लगता है ' ।.. ( पं ० श्रीगङ्गाशंकर मिश्र, सम्पादक दैनिक ' सन्मार्ग ' काशी । ( ४ ) ' यह पुस्तक वस्तुतः आद्योपान्त सनातनधर्मके सिद्धान्तोंका दिग्दर्शन करानेवाला है । ( पं ० श्रीदेवेन्द्रशास्त्री, सम्पादक ' श्रीवेङ्कटेश्वर - समाचार, बम्बई ) । ..