सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 161–170
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 161–170
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यज्ञोपवीत - रहस्य १३१ चह येत ३१-ध ० ०, रण, नेता ' को नको लिए ४ ) पतं है । यः की, बाहुकी सीमा क्षत्रियकी, कमरकी वा ऊरुकी सीमा वैश्यकी है । उससे निचली पांव तककी सीमा शूद्रकी है । वहां जब यज्ञोपवीत धारणका निषेध है, तब शूद्रका यज्ञोपवीत भी शास्त्रीय नहीं । इसके अतिरिक्त यज्ञोपवीतकी तीन तन्तुएँ भी तीन वर्णों में सीमित हैं । जो लोग सब वर्णोंको यज्ञोपवीत पहनाने में उत्सुक हैं, उन्हें उचित है कि वे चार तन्तुओं वाला यज्ञोपवीत बनावें तथा पैरों तक लम्बा बनावें । उक्त परिमाण ( कमर - तकका ) तब ठीक उतरता है जबकि ६६ चप्पा सूत हो । तब कई लोगों से उद्धृत ' जन्मना जायते शूद्र: ' इस वचनमें ' शूद्र ' शब्दका — ' अन्तरेणापि वतिमतिदेशो गम्यते । तद् यथा - एष ब्रह्मदत्तः, अब्रह्मदत्तं ब्रह्मदत्त इत्याह, तेन मन्यामहे ब्रह्मदत्तवद् अयं भवतीति ' ( महाभाष्य १ | १ || २२ ) ' शूद्रवत् ' यह अर्थ है; इसमें मनु ऋदिकी साक्षी दिखलाई जा चुकी है कि -'शूद्रेण हि समस्तावद् ' शूद्रके एकजत्व प्रमाण यह है - ' ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः, त्रयो वर्णां द्विजातयः । चतुर्थ एकजातिस्तु शूद्रः ' ( मनु ० १०।४ ) द्विजत्वके अधिकार न होनेसे ही उसका उपनयनमें अधिकार नहीं । उपनयनमें अधिकार न होनेसे उसका वेदमें भी अधिकार नहीं; क्योंकि उपनयन ही वेदाधिकार देनेका पट्ट है । इसलिए कहा है - ' तस्माद् यज्ञोपवीती एव अधीयीत, याजयेद् यजेत वा, यज्ञस्य प्रसृत्यै ' ( तैत्तिरीयारण्यक २ ( १ ) । इसके अतिरिक्त यजन स्मृतियोंमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंका आया है, यह ' मनुस्मृति में द्रष्टव्य है । शुद्रका यजन - यज्ञ न होनेसे यज्ञोपवीत भी कैसे होसके?
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१३२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ' वसिंष्टधर्मसूत्र ' में कहा है – ' गायत्र्या छन्दसा ब्राह्मणमसृजत् । त्रिष्टुभा राजन्यं, जगत्या वैश्यम्, न केनचित् छन्दसा शूद्रम् - इति संस्कार्यो विज्ञायते ' ( ४३ ) यहाँ पर वर्णोंकी उत्पत्ति छन्दोंसे कही है । गायत्री से ब्राह्मणका द्वितीय जन्म कहा है, क्योंकि पहला जन्म तो माता से कहा है । गायत्री छन्द आठ अक्षरोंका होता है । अतः द्वितीय जन्मरूप यज्ञोपवीत एवं गायत्री छन्दका ग्रहण भी ब्राह्मणका आठवें वर्ष में कहा है । इसी कारण सन्ध्या में गायत्रीके विसर्जन के अवसर पर ' उत्तमे शिखरे देवि! ब्राह्मणेभ्योभ्यनुज्ञाता ' ( तैत्तिरीयारण्यक १० | ३० ) गायत्रीकी ब्राह्मणोंके लिए अभ्यनुज्ञा स्वीकृत की गई है । इसी प्रकार ' स्तुता मया वरदा वेदमाता ' ' ' पाव-मानी द्विजानाम् । ' ' ब्रह्मवर्चसं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम् ' ( अथर्व ० सं ० १६।७१।१ ) इस मन्त्र में भी वेदमाता गायत्रीको द्विजों ( ब्राह्मणों ) की पवित्र करनेवाली कहा है । गायत्रीको माता इसलिए कहा है-यह द्वितीय जन्म कराती है । गायत्रीके आठ अक्षर हैं, इसका द्विगुण सोलह होते हैं । तो सोलह वर्ष गायत्री - सावित्री ( यजुः वा ० सं ० ३।३५ ) प्राप्ति अर्थात् उपनयनकी ब्राह्मणकी अन्तिम अवधि है । त्रिष्टुप् से क्षत्रियकी उत्पत्ति कही है । त्रिष्टुप् छन्दके ११ अक्षर होते हैं । अतः द्वितीय- जन्मात्मक यज्ञोपवीत तथा त्रिष्टुप्-मन्त्रग्रहण भी क्षत्रियका ११ वें वर्ष में कहा है । ग्यारहका दुगना बाईस होता ' है, अतः २२ वर्ष त्रिष्टुप् -सावित्री ( यजुः वा ० सं ० १२।३ ) -ग्रहण अर्थात् उपनयनकी क्षत्रियकी अन्तिम अवधि है ।
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यज्ञोपवीत- रहस्य १३३ वैश्यका द्वितीय जन्म जगती छन्दसे कहा है । जगतीके १२ अक्षर होते हैं; तब वैश्यका द्वितीय जन्मरूप जगतीसावित्री ( यजुः वा ० सं ० १७१७४ ) -ग्रहण भी १ खें वर्ष में नियत है । १२ का द्विगुण २४ होता है; अतः वैश्यकी जगतीमन्त्र - ग्रहणकी अर्थात् उपनयनकी अन्तिम अवधि भी २४ वर्षकी है । इसीलिए ही ' पारस्करगृह्यसूत्र ' में ' गायत्रीं ब्राह्मणेभ्योनुब्रूयात्, त्रिष्टुभथं राजन्यस्य, जगतीं वैश्यस्य ' ( २।३।७-८ - ९ ) इस प्रकार तीन वर्णोंको गायत्री, त्रिष्टुपू, जगती इन भिन्न - भिन्न छन्दों के सावित्री ( सवितृदेवताक ) मन्त्रोंका अधिकार कहा है । यही बात ' मानवगृह्यसूत्र ' ( १/२/३ ) में, ' ऐतरेय ब्राह्मण ' ( १ ॥ २८ ) तथा अन्य गृह्यसूत्रों में कही है । इन सावित्रियोंका ग्रहण ' अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयेत, एकादशवर्ष १ ९ राजन्यम्, द्वादशवर्षं वैश्यम् ' ( पार ० गृ ० ३।२।१-२-३ ) अपने - अपने छन्दोंके एकपादके अक्षरोंके अनुसार इन वर्षोंमें आया है; और अन्तिम अवधि ' आ षोडशाद् ब्राह्मणस्य अनतीतः कालः, श्रा द्वाविंशाद् राजन्यस्य, आ चतुर्वि-१ ९शाद् वैश्यस्य, अत ऊर्ध्वं पतित - सावित्रीका भवन्ति ' ( पार ० २।५ । ३६-३७-३८-३९ ) इन अपने - अपने छन्दोंके दो पादके अक्षरोंके अनुसारी वर्षों में कही है । ब्राह्मणका यज्ञोपवीत वसन्त ऋतुमें होता है, क्षत्रियका ग्रीष्म में वैश्यका शरद्में । वर्ण - विभाग में यह ऋतुएँ भी शतपथके अनुसार क्रमसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य हैं । वसन्तमें न भीषण सर्दी होती है, न घोर गर्मी । ब्राह्मणको भी ऐसी सात्त्विकता अपेक्षित होती है । ग्रीष्म तेजस्वी. है, क्षत्रियको भी तेजस्वी बनना पड़ता है । शरद
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१३४ श्री सनातनधर्मालोक ( ५ ) ऋतु में व्यापार - कार्य शुरू होता है, तृण आदिका संग्रह भी किया जाता है; वैश्यको भी वैसा संग्रही बनना पड़ता है । इन कारणों से यह ऋतुविभाग रखा गया है । परन्तु शूद्रका द्वितीय जन्म न तो किसी छन्दसे कहा है; न ही कोई छन्दोमन्त्र ( सावित्री ) उसके लिए कहा गया है । न उसके सावित्री - ग्रहणार्थ कोई आरम्भिक वर्ष कहा है, न अन्तिम वर्ष । न ही त्रैवर्णिकोंकी तरह अन्तिम वर्षका अतिक्रमण करने पर उन्हें कहीं ' व्रात्य ' कहा है; अतः शूद्रका यज्ञोपवीत भी किसी वर्षमें नहीं होता । जब शूद्रको ही उपनयनमें अधिकार नहीं; तब अवर्ण तथा अन्त्यजादि सङ्कर - जातियोंका तो उपनयनाधिकार हो ही कैसे सकता है? स्वा ० दयानन्दजीने अपने सत्यार्थप्रकाशमें लिखा है- ' जो कुलीन, शुभलक्षणयुक्त शूद्र हो तो उसको मन्त्रसंहिता छोड़के सब शास्त्र पढ़ावे । शूद्र पढ़े, परन्तु उसका उपनयन न करे । यह मत अनेक आचार्योंका है ' ( ३ समु ० पृ ० २५ ) । ' ६ वें वर्षके आरम्भ में द्विज अपने सन्तानोंका उपनयन करके आचार्यकुल में.... भेज दें । और शूद्रादिवर्ण उपनयन किये बिना विद्याभ्यासकेलिए गुरुकुलमें भेज दें ' ( स ० प्र ० २ पृ ० १८ ) यहां पर स्वामीजीने शूद्रोंका उपनयन नहीं माना; तब उन्हें वेदाधिकार भी नहीं हो सकता है । इस कारण उन्होंने अपनी संस्कारविधि में भी उपनयनसंस्कारके बाद ही ' वेदारम्भ - संस्कार ' माना है । ' मनुस्मृति ' में भी कहा है- कृतो- ' पनयनस्यास्य व्रतादेशनमिष्यते । ब्रह्मणो ( वेदस्य ) प्रहरणं चैव
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यज्ञोपवीत- रहस्य १३१ क्रमेण विधिपूर्वकम् ' ( २।१७३ ) यहांपर उपवीतीको ही वैध वेदाध्ययन का अधिकार कहा है | ८-११-१२ वर्ष ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यके उपनयनका मुख्य काल है । मनु ( २।३७ ) के अनुसार ५-६-८ वर्ष तीनोंका काम्यकाल है; क्योंकि उसमें ब्रह्मवर्चस, बल तथा धनकी कामना करनी पड़ती है | मनु ( २३८ ) के अनुसार १६-२२-२४ वर्ष तीनोंका गौणकाल है, अतः आपत्कालरूप है । इसीलिए ' बृहत्पराशरस्मृति ' में कहा है— ' अष्टकद्वादशाब्दानि सगर्भाणि द्विजन्मनाम् । मुख्यः कालो व्रतस्यैष, ह्यन्य उक्तो विपर्यये ' ( गौणत्वे ) ( ४ । १६२ ) । उसके बाद ' व्रात्यता ' तथा प्रायश्चित्तार्हता होती है । ‘ कार्पासमुपवीतं स्याद् विप्रस्योर्ध्ववृतं त्रिवृत् । शरणसूत्रमयं राज्ञो वैश्यस्याविकसूत्रिकम् ' ( मनु ० २।४४ ) यह तीनों वर्णोंका रुई, सन और ऊनके सूत्रोंसे यज्ञोपवीतका भेद है; जिससे अनायास मालूम हो नाय कि — यह किस वर्ण का है; परन्तु आजकल जैसे तीन वर्णोंका छन्दभेद नहीं दिखाई पड़ताः वैसे यज्ञोपवीतभेद भी नहीं दिखलाई पड़ता; वह समयका स्वातन्त्र्य है । क्षत्रिय, वैश्यका सन तथा ऊनका यज्ञोपवीत उसकी दृढ़ताके लिए अनुमित होता है, युद्ध एवं व्यापारके काममें लगे क्षत्रिय - वैश्योंके लिए उपयुक्त भी यही प्रतीत होता है । यह बाह्य उद्देश्य हैं; श्रभ्यन्तरिक उद्देश्य अदृष्ट-मूलक हो सकता है । ' एकैकमुपवीतं तु यतिनां ब्रह्मचारिणाम् । गृहिणां च वनस्था-नामुपवीतद्वयं स्मृतम् ' ( वृद्धहारीतस्मृति ८ ( ४४ ) ' गृहस्थाश्रमी यज्ञो-
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१३६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) पवीते... धारयेत् ' ( वैखानसधर्मसूत्र ३ | १ | १ ) ' उपवीतं बटोरेक, द्वे तथा इतरयोः ( गृहस्थवानप्रस्थयोः ) स्मृते ' ( पारिजात में देवल वचन ) ' यज्ञोपवीते द्वे धार्ये श्रौते स्मार्ते च कर्मणि । तृतीयमुत्तरीयार्थे वस्त्राभावे तदिष्यते, ( हेमाद्रि ) इत्यादि वचनों से गृहस्थियों को श्रौत -स्मार्त कर्मके कारण दो यज्ञोपवीत पहनना कहा है । जो लोग दूसरा यज्ञोपवीत स्त्रीके प्रातिनिध्यसे पहनना कहते हैं कि - ' दूसरा यज्ञोपवीत स्त्रियोंका होता था; परन्तु स्वाथियोंने उनके गले से उतारकर स्वयं पहिन लिया, यही कारण है कि पुरुषके गलेमें दो यज्ञोपवीत होते हैं'- - उनका कथन उक्त प्रयोजनसे खण्डित हो गया । नहीं तो तीसरा यज्ञोपवीत उत्पन्न हुए बालकके प्रतिनिधित्व से हो जाय! परन्तु ऐसा नहीं । प्रयोजन वहांपर कहा ही जा चुका है । वस्तुतः स्त्रियोंको यज्ञोपवीतका अधिकार नहीं होता । विवाह ही उनका यज्ञोपवीत संस्कार है । श्रीमनुने कहा है- ' वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः । पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ' ( २।६७ ) यहांपर स्त्रियोंके विवाहको ही उपनयनस्थानीय कहा है, पतिसेवा ही उनका गुरुकुलवास माना गया है । घरका काम आदि उनका यज्ञ कहा है । इसमें टीकाकारोंकी सम्मति भी मिलती है । हम उनकी उक्त पद्यकी टीका उद्धृत करते हैं-श्रीकुल्लूकभट्ट लिखते हैं- ' अनेन [ अमन्त्रिका ' ' इति पद्येन स्त्रीणाम् ] उपनयनेपि प्राप्ते विशेषमाह - विवाहविधिरेव स्त्रीणां वैदिकः संस्कार उपनयनाख्यो मन्वादिभिः स्मृतः । पतिसेवैव गुरुकुले
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यज्ञोपवीत - रहस्य १३७ वासो वेदाध्ययनरूपः । गृहकृत्यमेव सायं प्रातः समिद्धोमरूपोऽग्नि-परिचर्या । तस्माद् विवाहादेरुपनयन - स्थाने विधानाद् उपनयनादे-र्निवृत्तिरिति ' । श्रीमेधातिथिने भी लिखा है- ' पूर्ववचनेन [ स्त्रीणां ] जात-कर्मादिवद् उपनयनेपि मन्त्रके प्राप्ते तन्निवृत्त्यर्थमारभ्यते— वैवाहिको विधिरिति - — वेदग्रहणार्थो वैदिकः संस्कार उपनयनाख्यो यः स स्त्रीणां वैवाहिको विधिः । विवाहे भवो, विवाहविषयो, विवाह-साध्यः । अतो विवाहस्य उपनयनस्थाने विहितत्वात् तस्य निवृत्तिः । ( प्र. ) यदि विवाहस्तत्- ( उपनयन ) कार्यम्, हन्त! प्राप्तं वेदाध्ययनं, प्राप्ता च ब्रह्मचर्या, उपनयनं नाम मा भूदिति? ( उ. ) एतद् उभयमपि निवर्तयतिपतिसेवा गुरौ वासः, पतिं या सेवते, उपचरति, आराधयति, सा एव अस्याः ( स्त्रियाः ) गुरौ वसतिः ” । श्रीगोविन्दराजने लिखा है - ' एवमुपनयनेपि [ स्त्रीणाम् ] अमन्त्र-के प्राप्ते आह— वैवाहिक इति । यद् विवाहविधानम्, तदेव सां वैदिक संस्कारोपनयनस्थाने, पतिसेवा च गुरुशुश्रूषास्थाने, गृहकृत्य च अग्निपरिचरणस्थाने ' । श्रीनारायणने लिखा है- ' उपनयनं तु न कार्यं तासाम्, विवाहसंस्कारस्य तत्स्थानीयत्वादित्यर्थः । वैदिक वेदाधिगमार्थः उपनयनरूपः । धर्मातिदेशार्थं तदङ्गसम्पादनोक्ता पतिसेवेति । यथा गुरुशुश्रूषा व्रतिनः, तेनैव प्रकारेण स्त्रिया पतिः शुश्रूष्यः । यथा चाप्रमादेन अग्न्युपचरणं तत्र, तथा गृहार्थेषु गृह-प्रयोजनेषु पाकादिषु श्रप्रमत्तया भाव्यमित्यर्थः । परिक्रिया - परिचर्या । शूद्रस्य तु द्विज - सेवैव गुरौ वास इति प्राह्यम् ' ।
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१३८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) यहां पर राघवानन्दने लिखा है- ' तेषु स्त्रीणां विशेषमाह— ' वैवाहिको वक्ष्यमाणविवाह सम्बन्धी संस्कारः उपनयनसंस्कार-स्थानीयः । तेन तन्निवृत्तिः । वैदिकः -- वेदमन्त्रकृतः — ' विवाहस्तु समन्त्रकः ' इत्युक्त ेः । तासां पतिसेवैव गुरुकुलवासतया विधीयते, अकरणे प्रत्यवायस्मरणात्, करणे च स्तुतिस्मरणात् । एवं गृहार्थो गृहकृत्यमेव सायं - प्रातः समिद्धोमरूपा अग्निपरिचर्या ' । यहीं श्री नन्दनने लिखा है — ' उपनयनं तासां समन्त्रकम्, तच्च विवाह एवेत्याह वैवाहिको विधिरिति । संस्कारः - उपनयनम् । वैदिकः समन्त्रकः । तत्र गुरुकुलवासोऽग्निकार्यं च उत्तरार्धे प्रोक्तम् । गृहार्थ: -गृहकार्यम् । अग्निपरिक्रिया - अग्निपरिचर्या । विवाहस्य उपनयन-प्रतिपादनं तत ऊर्ध्वं कामचारवादभक्षादि - वर्जनार्थम् ' । यहीं श्री रामचन्द्रने लिखा है — ' स्त्रीणां - कन्यानाम्, संस्कारः वैवाहिको विधिः, वैदिकः — वेदमन्त्रैः स्मृतः । स्त्रीधर्मानाह – - पति सेवा गुरौ वासः गुरोराचार्यस्य समीपे वासः । अग्नेः परिक्रिया - गृहार्थे पाकनिमित्तम् ' । इस प्रकार स्त्रियोंका उपनयन ही जब नहीं है; तब ' पुरुषका यज्ञोपवीत स्त्रीके प्रातिनिध्यसे है ' यह कइयोंका अनुमान ठीक न रहा । ' आह्निकसूत्रावली ' में कहा है - ब्रह्मचारिण एकं स्यात् स्नातस्य द्वे बहूनि वा ' । ब्रह्मचारियोंको केवल वैदिक कर्म करना पड़ता है, इसलिए उनका नाम ' ब्रह्मचारी ' हुआ करता है । ' ब्रह्म चरति ' यह उसकी व्युत्पत्ति होती है । इसलिए वे एक ही सूत्र धारण करते हैं । स्नातक हो जानेपर वैदिक एवं स्मार्त दोनों कार्य
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यज्ञोपवीत - रहस्य १३६ र-स्तु बते, थ श्री ह 5: 1 करने पड़ते हैं, इस कारण उन्हें दो सूत्र पहनने पड़ते हैं । स्मृतियाँ भी उतनी होती हैं; जितनी मंत्र - संहिता | वेदार्थस्मरणका नाम ' स्मृति ' हुआ करता है । तब स्मार्त - कर्म के लिए दूसरा सूत्र धारण करना पड़ता है, वादिप्रोक्त कारणसे नहीं । आजकल सुधारक लोग यज्ञोपवीत छोड़ रहे हैं; इसीलिए क्या अपनी स्त्रीको दो यज्ञोपवीत दे रहे हैं? बिना यज्ञोपवीतके जबकि द्विजात्युत्पन्न भी वेदाध्ययनका अधिकारी नहीं रहता; तब यज्ञोपवीताधिकार से रहित तो भला वेदाध्ययनमें किस प्रकार अधिकृत हो सकता है?? इसके अतिरिक्त पत्नी विवाह हो जाने पर उस पदवीको अनायास प्राप्त कर लेती श्री है, जिस पदवीको उसके पतिने बड़े प्रयास से प्राप्त किया था । यह लोक प्रत्यक्ष है कि पण्डितकी स्त्री पण्डितानी, मास्टरको स्त्री रौ मास्टरानी, चौधरीकी पत्नी चौधरानी, राजाकी स्त्री रानी कही ि जाती है; उसकी सन्तान भी पतिगोत्रज वा पतिकी जातिकी मानी जाती है । प्रत्युत स्त्रीका पितृगोत्र भी बदल जाया करता है, पतिका का न त् झ गोत्र हो जाता है । ' अनूढा न पृथक् कन्या पिण्डे गोत्रे च सूतके । पाणिग्रहरण - मन्त्राभ्यां स्वगोत्राद् भ्रश्यते ततः ' ( ८४ ) ' विवाहे चैव संवृत्ते चतुर्थेऽहनि रात्रिषु । एकत्वं सा त्रजेद् भर्तुः पिण्डे गोत्रे च सूतके ' ( ८६ ) यह इस ' यमस्मृति ' तथा ' लिखित स्मृति ' के वचनसे विवाहिता स्त्री पितृगोत्रसे हटकर पति गोत्रकी हो जाती है । उस स्त्रीका और्ध्वदेहिक भी पति - गोत्र से होता है । इस प्रकार पतिसे अभिन्न रूप उसके लिए उपनयन आदिकी पृथक् आवश्यकता भी
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१४० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) नहीं रहती, पतिके यज्ञोपवीतसे वह यज्ञोपवीतके बिना भी यज्ञोपवीतिनी मानी जाती है । तभी उसका विवाह मन्त्र - सहित हुआ करता है, विशेष कई स्वाधिकृत मन्त्र भी वह वरके सहारे पढ़ सकती है । उसका पृथक् उपनयन तो लौकिक दृष्टिसे भी उचित नहीं. सिद्ध होता । उसका स्त्रीत्व प्रायः उसे अपवित्र दशामें रखनेको बाध्य करता है, जिसके सबब वह यज्ञोपवीत के नियम नहीं पाल सकती । प्रतिमास रजस्वला होने पर क्या वह यज्ञोपवीतको बार-बार बदलती रहेगी? प्रसवकालमें क्या वह चालीस दिन तकके लिए उपवीतको छोड़ देगी? इधर नवजात शिशुको अपने साथ सुलाने के सबब स्त्रीका समय प्रायः बच्चोंके मलमूत्र में ही जाता है । क्या वह ढाई वर्षके लिए फिर यज्ञोपवीतको सन्दूकमें बन्द कर रखेगी? फिर ' नित्ययज्ञोपवीतिता ' कैसे होगी? स्त्रीके जिस वक्षःस्थल पर सुधारक परम पवित्र उपवीत लटकाना चाहते हैं; वह तो धूलि - धूसरित, मलमूत्रव्याप्तसर्वाङ्ग नवजात शिशुका दिन-रात स्तनपानके समय उसका क्रीडास्थल बनेगा । वह उसे रस्सी मानकर खींचेगा, तोड़ेगा, उसके साथ खेलेगा और फिर वह सूत्र उसके तेल - उबटनसे सना रहेगा । इस प्रकार सोचने से उसका स्त्रीके कन्धेपर लटकाना लौकिक दृष्टिसे भी ठीक नहीं जँचता; शास्त्र - दृष्टिसे तो निषेध है ही । इस विषय में ' सिद्धान्त ' ( काशी ) पत्रके ७-८ वर्षमें हमारा शास्त्रार्थं छप चुका है । इस विषय में ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के तृतीय पुष्पमें भी हम स्पष्टता कर चुके हैं । ( इस तृतीय पुष्पका