सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 151–160

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 151–160

पृष्ठ 151

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यज्ञोपवीत - रहस्य १२१ तं I I I i ही देता है, यज्ञोपवीतकी रचना - विधि से एतदादिक प्रश्नोंका उत्तर स्वयं होजाता है । अब हम यज्ञोपवीत - निर्माणकी विधिका रहस्य बताते हैं । यहाँ हमने विविध विद्वानोंके विचार यथास्थान सन्निवेशित कर दिये हैं- जिससे यह निबन्ध जनताके योग्य होगया है । यह यज्ञोपवीत हाथकी चार अंगुलियों ( चप्पा ) पर छियानवें बार लपेटा जाता है । इसमें कई लोग कारण बताते हैं-( क ) ' चतुर्वेदेषु गायत्री चतुर्विंशतिकाक्षरा । तस्माच्चतुर्गुणं कृत्वा ब्रह्मसूत्रमुदीरयेत् ' अर्थात् चारों वेदोंमें गायत्री २४ अक्षरकी है । इसलिए ब्रह्मसूत्र भी २४४४ = ६६ बार चप्पे पर लपेटा जाता है । ( ख ) अथवा - छान्दोग्यसूत्र परिशिष्ट में कहा है - ' तिथिर्वारं च नक्षत्रं तत्त्ववेदगुणान्वितम् । कालत्रयं च मासाश्च ब्रह्मसूत्रं हि षण्णव ' । अर्थात् १५ तिथि, ७ वार, २७ नक्षत्र, २५ तत्त्व, ४ वेद, ३ गुण, ३ काल, १२ महीने इनकी संयुक्त संख्या ६६ होती है; यज्ञोपवीत में भी ये सब निहित हैं; अतः उसे भी ६६ बार लपेटा जाता है । ( ग ) परमेष्ठी ( ब्रह्मा ) के शरीर में सूत्रात्मक प्रारणका ६६ वस्तु-रूप राशिचक्र कन्धे से लेकर कमर तक यज्ञोपवीतकी तरह होता है, यही उसका स्वाभाविक यज्ञोपवीत है ( प्रजापतेर्यत् सहजं ); तब ब्रह्मसूत्रमें भी वैसी शैली रखनी पड़ती है । ( घ ) अन्य रहस्य यह है कि सामुद्रिक शास्त्रमें पुरुषका परिमारण अपनी अंगुलियोंके नापसे ८४ से लेकर १०८ अंगुलियों तक माना

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१२२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) गया है । ८४ और १०८ का मध्यमान ( औसत ) ६६ होता है; इस कारण पुरुषका उपनयन - सूत्र भी ६६ चप्पेका होता है । ( ङ ) वस्तुतः बात यह है - ११३१ संहितात्मक वेद में कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड, ज्ञानकाण्ड- ये तीन भाग होते हैं । इनके सब मन्त्र एक लाख हैं । जैसे कि ' वायुपुराण ' में कहा है- ' आद्यो वेदश्चतुष्पादः शतसाहस्त्र - सम्मितः ' ( ६०।७ ) । यही विष्णुपुराण ( ३ । ४ । १ ) में कहा है । अन्यत्र भी कहा है- ' लक्षं तु वेदाश्चत्वारो लक्षं भारतमेव च ' ( चरणव्यूह ५ ( १ ) । इनमें स्थूल गणना से कर्मकाण्डके मन्त्र ८० सहस्र हैं । उपासनाकाण्ड के १६ हजार मन्त्र हैं; शेष चार सहस्र ज्ञानकाण्डके हैं । इस प्रकार एक लाखकी पूर्ति होती है । यही बात निरुक्तकार भी सूचित करते हैं । ' तास्त्रिविधा ऋचः, परोक्षकृताः प्रत्यक्ष कृताः, आध्यात्मिक्यश्च । परोक्षकृताः प्रत्यक्षकृताश्च भूयिष्ठाः, अल्पश आध्यात्मिक्यः ' ( ७ | ३ | १ ) ' परोक्ष ' शब्दसे ' कर्म-काण्ड ' इष्ट है, क्योंकि कर्मकाण्ड परोक्ष कर्म - फलका प्रतिपादक होता है । ' प्रत्यक्ष ' शब्द से ' उपासनाकाण्ड ' इष्ट है, क्योंकि वह प्रत्यक्ष - फलका निदर्शक है । ' आध्यात्मिक ' शब्द से ' ज्ञानकाण्ड ' इष्ट है. क्योंकि आत्म - साक्षात्कार ही ज्ञान होता है । इस प्रकार ज्ञानकाण्डके मन्त्रोंकी अल्पता सिद्ध हुई । ज्ञान-काण्डके मन्त्रोंकी अल्पतासे ज्ञानकाण्डको कर्मकाण्डसे अवर ( हीन ) न समझ लेना चाहिये; क्योंकि वरता वा अवरता संख्या पर निर्भर नहीं होती । एक भी सूर्य लाखों तारोंसे ' वर ' हो तो होता है । ज्ञानकाण्ड कर्मकाण्डकी अपेक्षा होना भी अल्प ही चाहिये । युद्धमें

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यज्ञोपवीत - ह १२३ त व : ा । सेनापति ' ज्ञान ' होता है । सेना ' कर्मकाण्ड ' होती है । जितनी संख्या सैनिकोंकी होती है, उतनी सेनापतियोंकी नहीं । यदि सभी सैनिक सेनानायक बन जाएँ; तो विजय कभी होगी ही नहीं । लोकमें भी ज्ञानी बहुत होजाएँ; तो सबकी भिन्न - भिन्न बुद्धि हो जाने से वे जनताको कर्म में प्रवृत्त कर ही न सकें! इसीलिए लोकमें जैसे ज्ञानी वा नेता थोड़े होते हैं, परन्तु उनकी आज्ञामें चलनेवाले कर्मिष्ठ बहुत अपेक्षित होते हैं; जो उनकी आज्ञा, बिना विशेष विचार किये ही मान लें, वैसे ही वेद में भी ज्ञानकाण्ड थोड़ा होता है, कर्मकाण्डकी उसकी अपेक्षा संख्या बहुत अधिक होती है । 1 इसके अतिरिक्त कर्मकाण्ड ज्ञानकाण्डकी अपेक्षा अवर होता हुआ भी सर्वथा अवर नहीं जाता । यदि कर्मकाण्ड सर्वथा न हो तो ज्ञान निराधार हो जाय । ' ज्ञानं भारः क्रियां विना । ' नेता व्यर्थ हो जाता है यदि कर्मिष्ठ जनता न हो, यद्यपि जनता नेताकी अपेक्षा वर होती है । फलतः वेदके तीनों काण्डों के मन्त्र एक लाख हैं । यह यज्ञोपवीत चप्पेपर ६ वार लपेटा जाता है, इसीलिए ११३१ संहितात्मक चार वेदोंमें स्थित कर्मकाण्ड एवम् उपासना-काण्डके ८० + १६ = १६ सहस्र मन्त्रोंका अधिकार पट्ट ' चपरास की तरह द्विजको अर्पण किया जाता है । शास्त्राने केवल कर्मकाण्ड-उपासनाकाण्डके अधिकार तक ही यज्ञोपवीत नियमित किया है ।. वे ६६ सहस्र मन्त्र चारों वेदों के हैं — इस कारण चार अङ्ग ुलियों ( चप्पे पर उतनी संख्यासे सूत्र लपेटा जाता है । फिर जो पहले उसे तिगुना करके ऊपर बांई ओर लपेटा जाता है, इससे इसमें

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१२४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन तीन वर्णोंका अधिकार सिद्ध होता है । इस तीन डोरी वाले सूत्रको जो फिर तिगुना करके नीचेसे दाहिनी ओर लपेटा जाता है इससे ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वान-प्रस्थ इन तीन आश्रमोंको इसमें अधिकृत बताया जाता है । पूर्व तथा यहांपर यह भी अभिप्राय व्यक्त हो रहा है कि ऋग, यजुः, साम ये तीन प्रकारके वेद ( मन्त्रविशेष ) इसके विषय हैं, और श्रौत - यज्ञोंमें ब्रह्मा, विष्णु, महेशरूप गार्हपत्य, दाक्षिणात्य, एवम् आहवनीय इन तीन अग्नियोंका उपयोग होता है । जैसे कि ' ब्रह्मा वै गार्हपत्ये स्याद् ईश्वरो दक्षिणे तथा । विष्णुराहवनीये तु अग्निहोत्रे त्रयोग्नयः । ( गृह्या संग्रह १७ ) । अथवा धर्म, अर्थ, काम यह त्रिवर्ग उसका विषय होता है । इन सबसे मनके मल, आवरण विक्षेप तीन दोष दूर किये जाते हैं । इस प्रकार यह नव - तन्तुका सूत्र हो जाता है । प्रत्येक तन्तुका एक देवता हुआ करता है । जैसे कि ' गृह्यासंग्रह ' में कहा है-' यज्ञोपवीतं कुर्वीत सूत्रेण नवतान्तवम् । देवतास्तत्र वक्ष्यामि आनुपूर्व्येण याः स्मृताः । ( २४८ ) ओङ्कारः प्रथमस्तन्तुर्द्वितीयश्चाग्नि-दैवतः । तृतीयो नागदैवत्यश्चतुर्थः सोमदैवतः । पञ्चमः पितृदैवत्यः षष्ठश्चैव प्रजापतिः । सप्तमो वायुदैवत्यश्चाष्टमो यम ( सूर्य ) दैवतः । नवमः सर्वदैवत्य इत्येते नव तन्तवः । ' ( २।४६-५० -५१ ) इन नौ देवताओंके पृथक् - पृथक् गुणोंके साथ यज्ञोपवीतधारण द्वारा द्विज बालकको भूषित होना चाहिये । ओंकारका गुण ब्रह्मज्ञान, दूसरे अग्निदेवताका तेजस्वी होना, तीसरे देवता अनन्तनागका गुण

पृष्ठ 155

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यज्ञोपवीत- रहस्य १२१ धैर्य धारण करना, भार उठाना, चतुर्थ देवता चन्द्रका गुण सर्वजन-मनः - प्रह्लादक बनना, पञ्चम देवता पितृगणका गुण स्नेहशीलता तथा अपनोंका संरक्षण करना, छठे देवता प्रजापतिका गुण प्रजा-पालन, सातवें देवता वायुका गुण बलशाली होना, अष्टम देवता यमका गुरण दुष्टोंको दण्ड देना, अथवा सूर्यका गुण प्रकाश धारण करना, नवम देवता विश्वेदेवोंका गुण सब दिव्य गुण तथा सात्त्विकता धारण करना इन नवतन्तुयुक्त यज्ञोपवीतधारण - द्वारा · इन देवताओंका नित्य स्मरण तथा उनके गुणोंका अवलम्बन करना अपना कर्तव्य सूचित होता है । फिर इस नव - तन्तु सूत्रको इस प्रकार तिगुना किया जाता है कि जिससे तीन सूत्रोंकी योजना सिरमें एक हो जावे । इस समयकी त्रिगुणता ऋषिऋरण, देवऋण, पितृऋणको सूचित करती है । इसीलिए देवतर्पण, पितृतर्पण एवम् ऋषितर्पण में यज्ञोपवीतको क्रमसे सव्य, अपसव्य, तथा निवीती करना पड़ता है । ' मैं इस अधिकृत कर्मको अवश्य करूंगा, अवश्य करूंगा, करू'गा ' इस प्रकार तीन वार प्रतिज्ञाको भी सूचित करता है । यदि इस यज्ञोपवीत - सूत्रको सनातनधर्मका संक्षिप्त चित्र कह दें; तो अत्युक्ति न होगी, यह बताया ही जा चुका है इससे सनातनधर्मका परमार्थवाद अद्वैतवाद भी सिद्ध हो रहा है । सनातनधर्मका सिद्धान्त है कि - ब्रह्मसे सम्पूर्ण जगत् प्रकट होता है, उसीके आश्रयसे अवस्थित रहता है, अन्तमें भी फिर उसीमें लीन हो जाता है । एक ही ब्रह्म से त्रिगुणात्मक जगत्का प्रपंच

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१२६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) . होता है, अन्त में एक ब्रह्म ही हो जाता है । इस सिद्धान्त के अनुसार एक ब्रह्मका सूत्र ही सारे संसार में प्रसृत है; अन्त में सारे संसारका उसी ब्रह्ममें लय हो जाता है । अव ब्रह्मसूत्र यज्ञोपवीतकी रचना पर भी ध्यान दीजिये । एक ही सूत्रसे उसकी रचना प्रारम्भ होती है । एक ही सूत्र से तीन सूत्र वन जाते हैं । अन्तमें एक ही ब्रह्मग्रन्थिमें उसकी समाप्ति हो जाती है । - सनातनधर्म के सिद्धान्तमें एक ही ब्रह्मसे सत्त्व, रज, तम यह त्रिगुणात्मक सृष्टि होती है, अन्तमें एक ब्रह्म ही अवशिष्ट रह जाता है । इस प्रकार यज्ञोपवीत भी एक सूत्र से त्रिगुण होकर अन्तमें ब्रह्मग्रन्थिमें ही समाप्त हो जाता है । जगत्‌की उत्पत्ति से पूर्व भी एक ही अद्वितीय ब्रह्म होता है, प्रलयमें भी वही । संसार - दशा अथवा व्यवहार - दशा में त्रिगुणात्मक प्रकृतिका चक्र है. अवस्था ब्रह्मसूत्र ( उपवीत ) की भी है । आरम्भ में भी एक सूत्र, अन्तमें भी सब मिलकर एक ब्रह्मग्रन्थि में समाप्त होता है, मध्य में ही केवल त्रिगुणचक्र होता है । अब आगे चलिये - ऊपरकी तीन या पांच ग्रन्थियाँ प्रवर-संख्याको सूचित करती हैं, ग्रन्थिका नाम ब्रह्मपाश हुआ करता है । शूद्रोंका वेदमें अधिकार न होने तथा गोत्रप्रवरादि न होनेसे तन्मूलक उपनयन भी उनका नहीं होता । स्त्रियोंके भी स्वतन्त्र गोत्र - प्रवर नहीं होते, इस कारण उनका भी स्वतन्त्र ( पृथकू ) यज्ञोपवीत नहीं होता । इस यज्ञोपवीतके कर्म - उपासनाकाण्ड़ार्थ होनेसे, ऋरणन्नयकी

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यज्ञोपवीत - रहस्य १२७ i 7 I , सं E I पूर्तिका मूल होनेसे, तथा धर्म, अर्थ, काममूलक होनेसे ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ आश्रम तक उसका अधिकार होता है, फिर ' ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत् ' ( मनु ० ६ । ३५ ) अधीत्य विधिवद् वेदान् पुत्राश्चोत्पाद्य धर्मतः । इष्टा च शक्तितो यज्ञैर्मनो मोक्षे निवेशयेत् ' ( मनु ० ६।३६ ) ' ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात् ' ( मनु ० ६३८ ) इस प्रकार मोक्षप्राप्त्यर्थं संन्यासाश्रममें केवल ज्ञान-काण्डका उपयोग करना पड़ता है । इस कारण उसमें यह यज्ञो-पवीत छोड़ना पड़ता है; क्योंकि - यह वेदके ६६ सहस्र कर्म-उपासना काण्डके धर्म, अर्थ, कामप्रतिपादक मन्त्रोंका ही अधिकार देता है । इस पूर्ति हो जाने पर मोक्षप्राप्त्यर्थ अवशिष्ट वेदके ज्ञानकाण्डके चार सहस्र मन्त्रोंके मननका क्रम प्राप्त हो जाने से इस यज्ञोपवीत - सूत्रको छोड़ना पड़ता है । इष्ट स्थानकी प्राप्ति हो जाने पर यात्री अपना ‘ टिकट ' देकर ' स्टेशन ' पार हो जाता है । इस प्रकार संन्यासाश्रमसे पूर्व द्विजको इसे छोड़ना न चाहिये - यह भी - इससे सूचित हो जाता है । संन्यासीके शिखा - सूत्र नहीं होते; इस विषय में ' शङ्करदिग्विजय ' में स्वा ० शङ्कराचार्य तथा श्रीमण्डन मिश्रका संवाद भी प्रमाण है । जब आचार्य शङ्कर माहिष्मती नगरीमें मण्डनमिश्रके यहाँ शास्त्रार्थ करने पहुँचे; तो संन्यासी होनेसे इनके शिखा सूत्र नहीं थे; पर कन्धे पर भारी कन्था ( भोली ) रखी हुई थी । इस पर मण्डनमिश्रने स्वा ० शं को कहा- ' कन्थां वहसि दुर्बुद्धे! गर्दभेनापि दुर्वहाम् । शिखा यज्ञोपवीताभ्यां कस्ते भारो भविष्यति ' ( ८।२० ) ( इतनी भारी

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१२८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) झोलीको तो उठा रहे हो, शिखा वा जनेऊका कोई बड़ा भार था कि उसे नहीं पहना? ) । श्रीशंकरने भी उसी शैलीसे उत्तर दिया कि-' कन्थां वहामि दुर्बुद्धे! त्वत् - पित्रापि सुदुर्ब्रहाम् । शिखा - यज्ञोपवी-ताभ्यां श्रुतेर्भारो भविष्यति ' ( २१ ) कन्था तो इतनी भारी है कि उसे तुम्हारे पिता भी नहीं उठा सके; पर संन्यासी के लिए शिखासूत्र श्रुतिके प्रतिकूल होनेसे उसे रखने से श्रुति पर ही भार चढ़ेगा । इसलिए नहीं पहरे ) । यही नारद - परिव्राजकोपनिषद्के तृतीयोपदेश में लिखा है-' सशिखं वपनं कृत्वा बहिः सूत्रं त्यजेद् बुधः । यदक्षरं परं ब्रह्म तत् सूत्रमिति धारयेत् ' ( ७७ ) ' यज्ञोपवीतं छित्त्वा ' ओं भूः स्वाहा ' इति अप्सु वस्त्रं कटिसूत्रं च विसृज्य ' संन्यस्तं मया ' इति त्रिवारम-भिमन्त्रयेत् ' ( संन्यासोपनिषद् २।६ ) इससे संन्यासीको यज्ञोपवीत हटा देना पड़ता है | जो लोग वेदको ११३१ संहितात्मक नहीं मानते, वर्तमान चार संहिताकी पोथियोंको ही वेद मानते हैं; तब उनके मन्त्र तो अधिक-से - अधिक बीस सहस्रके लगभग हैं; उन्हीं में कर्म, उपासना, ज्ञान-काण्ड अन्तर्भूत हो जाते हैं । उनमें ज्ञानकाण्डके चार सहस्र मन्त्रोंको छोड़कर कर्म एवम् उपासनाकाण्डके सोलह सहस्रके लगभग मन्त्र अवशिष्ट रह जाते हैं । ऐसा होनेपर उनके दाहिने हाथकी चार अंगुलियोंसे ६६ बार लपेटने में कोई भी उपपत्ति नहीं रहती । इस कारण उनका पक्ष भी निर्मूल है । तब वे दाहिने हाथके चप्पेसे १६ वार लपेटे हुए यज्ञोपवीत सूत्रके अत्यन्त छोटे

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यज्ञोपवीत - रहस्य १२६ न्या 5-त्री-कि सूत्र 71 श हा ' म. त नार क-न इस्र ने वहीं . टे होनेसे उसे पहिन ही कैसे सकेंगे? ६६ संख्यासे अन्य संख्या यज्ञोपवीत - निर्माण में कहीं कही भी नहीं गई है । उपनयन - संस्कारसे हम द्विज होते हैं, यह पूर्व कहा ही जा चुका है । यहीं इसका महत्त्व है । जैसा कि स्मृतियोंमें कहा है-' मातुरग्रेऽधिजननं द्वितीयं मौञ्जिबन्धने ' ( मनु ० २।१६६ ) ' जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्काराद् द्विज उच्यते ' ( अत्रिस्मृति १३८ ) ' द्वे जन्मनी द्विजातीनां मातुः स्यात् प्रथमं तयोः । द्वितीयं छन्दसां मातुर्ब्रहरणाद् विधिवद् गुरोः । एवं द्विजातिमापन्नो विमुक्तो वाऽन्यदोषतः । श्रुतिस्मृति - पुराणानां भवेद् अध्ययनक्षमः ' ( व्यासस्मृति १।२२-२३ ) इसी प्रकार ' वसिष्ठस्मृति ' ( २।२ - ३ ) तथा ' शङ्खस्मृति ' ( १६ ) में भी कहा है । इस संस्कारसे पूर्व ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एकजत्व - धर्मसे शूद्र - सदृश होते हैं । तब वे वेदपठनमें अधिकृत नहीं होते, क्योंकि वेदारम्भ - संस्कार उपनयन संस्कारके सम्पन्न होने पर ही हुआ करता है । इसी कारण श्रीमनुजीने कहा है- ' नाभिव्याहारयेद् ब्रह्म स्वधानिनयनाद् ऋते । शूद्रेण हि समस्तावद् यावद् वेदे न जायते ' ( २।१७२ ) इसी प्रकार कई आजकलके सुधारक भी एक वचन कहा करते हैं- जन्मना ' जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उच्यते ' यद्यपि यह वचन किसी स्मृतिके मूलमें नहीं पढ़ा गया; तथापि इसमेंके ' शूद्र ' शब्दका ' शूद्र'- सदृश अर्थ में पर्यवसान होता है; यहां पर उपमावाचक - शब्द लुप्त है । नहीं तो यदि सभी जन्मसे शूद्र हो जायँ; तब उपनयनसे सभी केवल ब्राह्मण होते, क्योंकि वहां कर्म-६ स ० ध ०

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१३० श्री सनातनधर्मालोक ( ५ ) भेद नहीं होता । परन्तु ऐसा नहीं है, किन्तु जन्म से ही वह वह वर्ण माना जाता है । यदि यह बात स्वीकृत न हो तो —'अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयेत गर्भाष्टमं वा, एकादशवर्षं राजन्यं, द्वादशवर्षं वैश्यम् ' ( पारस्करगृ ० २।२।१-२-३, आपस्तम्बगृ ० ४।१०।१-२-३, ब्राह्यायणगृ ० ३।४।१-३-५, जैमिनिगृ ० १।१२, गोभिलगृ ० २।१०।१-२-३, वसिष्ठध ० ११।४४, मनु ० २२३६-३७, व्यासस्मृ ० १११६, शङ्खस्मृ ० २ श्र ०, याज्ञवल्क्यस्मृ ० आचाराध्याय १४ ) इत्यादि वचनों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य शब्द असम्भव होते । इस कारण जन्मना ' जायते शूद्रः ' यहां पर ' ताद्धर्म्यात् ताच्छव्यम ' इस न्याय से ' शूद्रसधर्मता ' ही अर्थ है, वास्तविक शूद्र हो जाना नहीं । अन्यथा जन्म- शूद्रको भी उपनयनाधिकार तथा द्विजत्वकी प्राप्ति हो जाती; परन्तु उसको जीवन तक ' एकज ' माना जाता है ' द्विज ' नहीं । इससे शूद्रको यज्ञोपवीतका भी अधिकार नहीं । यज्ञोपवीतकी रचना भी यही सूचित करती है । उसके लिए कहा है — ' स्तनादूर्ध्वमधो नाभेर्न कर्तव्यं कदाचन । स्तनाद् ऊर्ध्वं श्रियं हन्ति नाभ्यधस्तात् तपः क्षयः ' ( गोभिलगृह्यासंग्रह २।५४ ) ' पृष्ठवंशे च नाभ्यां च धृतं यद् विन्दते कटिम् । तद् धार्यमुपवीतं स्याद् नातो लम्बं न चोच्छ्रितम् ' इस ' कर्मप्रदीप ' के वचन से यज्ञोपवीतको अधिकसे अधिक कमर तक धारण करना कहा है । कमर तकका भाग वैश्यकी सीमा है- ' मध्यं तदस्य यद् वैश्यः ( अथर्व ० शौ ० सं ० १ ९ । ६ । ६ ) । शरीर में मुखकी सीमा ब्राह्मणकी,