सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 181–190

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 181–190

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यज्ञोपवीत - रहस्य १३१ क से ई pr, 15 क , 15 के dir to व F F न न्य त से से a 7 I संस्कारसे ही चमकता है । हीरेको यदि शान पर चढ़ाकर संस्कार से चमक न लाई जाय, तो उतना बहुमूल्य नहीं होता, जितना कि चमकदार होने पर | स्वच्छ मरिण भी शानके संस्कारकी अपेक्षा रखती ही है । लकड़ीकी बनी हुई वस्तु रंगरोगनके द्वारा संस्कृत की हुई अधिक शोभा भी पाती है, टिकाऊ भी बनती है । इस अर्थ में तो सभी संस्कार प्रयोजनीय हैं; पर उपनयन तो विशेष - संस्कार है । उसीसे ही उसके अधिकारियोंकी शुद्धि होती है । यज्ञोपवीतको देवकार्यमें बाएँ कन्धे पर रखा जाता है, मृतक-पितृकार्य में दाहिने कन्धे पर रखा जाता है । ऋषिकृत्य में निवीती-रूपमें ( कण्ठीकी भांति ) धारण किया जाता है । यह गृह्यसूत्र एवं स्मृतियों में स्पष्ट है । इनका लक्षरण तथा इनका सम्बन्ध भी प्रकरण-वश बताया जाता है - इनको सव्य अपसव्य भी कहा जाता है । ‘ वामं शरीरं सव्यं स्याद् ' ( अमर ० ३।१।८४ ) ' सव्यं वामे च ' ( अजय ) ' सव्यदक्षिणयोर्यत्र विशेषो नास्ति हस्तयो: ' ( पञ्चतन्त्र ) इत्यादि प्रमाणोंसे ' सव्य ' बाएँ - कन्धे पर यज्ञोपवीत रखनेका नाम है । इसी का पर्यायवाचक उपवीती, वा यज्ञोपवीती है — ' तस्माद् यज्ञोपवीती एव अधीयीत याजयेद् यजेत वा यज्ञस्य प्रसृत्यै ' ( तैत्तिरीयारण्यक २।१ ) । – ' अपसव्यं तु दक्षिणम् ' ( अमरकोष ३ । ११८४ ) दक्षिणका नाम अपसव्य है । तो यज्ञोपवीतको दाहिने कन्धे पर करना उसका ‘ अपसव्य - करण ' है । इसीका पर्यायवाचक ' प्राचीनावीती ' होता है । निवीतीका अर्थ है यज्ञोपवीतका कण्ठी करना ' निवीतं कण्ठ-लम्बितम् ' ( अमर ० २ | ७ | ५० ) ।

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) १३२ अब इनके लक्षण देखिये - ' उद्धृते दक्षिणे पाणौ उपवीती -त्युच्यते द्विजः । सव्ये प्राचीन श्रावीती निवीती कण्ठसज्जने ' ( मनु ० २२६३, अमरकोष २ । ७ । ४६ - ५० ) गलेमें पहने हुए यज्ञोपवीत - सूत्र में दाहिना हाथ घुसा दे । इस प्रकार वह बाएँ — कन्धेमें हो जाता है । यही ' यज्ञोपवीती ' है । जैसा कि ' गोभिलगृह्यसूत्र में कहा है- ' दक्षिणं वाहुमुद्धृत्य शिरोऽवधाय सव्येंसे प्रतिष्ठापयति दक्षिणकक्षमन्ववलम्बं भवति, एवं यज्ञोपवीती भवति ' ( १।२।२ ) । गले में पहरे हुए यज्ञोपवीत-सूत्रमें बाएं हाथको घुसेड़ दे; तो यज्ञोपवीत दाहिने कन्धे पर हो जाता है । इसीका नाम अपसव्यकरण वा प्राचीनावीती है । जैसे कि ' गोभिलगृह्य ' में कहा है- ' सव्यं बाहुमुद्धृत्य शिरोऽवधाय दक्षिणें से प्रतिष्ठापयति, सव्यं कक्षमन्ववलम्वं भवति, एवं प्राचीना-वीती भवति ' ( १।२।३ ) । गलेमें मालाकी तरह यज्ञोपवीतको पहने, बायां वा दाहिना हाथ उसमें न घुसेड़े; तो निवीती होता है । जैसे कि ‘ शिरोवधाय दक्षिणपाण्यादौ अनुद्धृते कण्ठादेव आसज्जने ऋजुप्रालम्बे यज्ञसूत्रे वस्त्रे च निवीती भवति ' । अब यह प्रश्न है कि — सव्य, अपसव्य, निवीतित्व किस - किस कर्ममें कर्तव्य है । इसमें जानना चाहिये कि देवकर्म में यज्ञोपवीती, पितृकर्म में प्राचीनावीती, और ऋषि कर्ममें निवीती होना चाहिये । ‘ प्राचीनावीतिना सम्यगपसव्यमतन्द्रिणा । पित्र्यमानिधनात् कार्यं विधिवद् दर्भपाणिना ' ( ३।२७६, गोभि ० ११२४ ) यहां पर पितृकर्म प्राचीनावीतित्व में कहा है- ' कृतोपवीती देवेभ्यो, निवीती च

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यज्ञोपवीत- रहस्य १५३ ने नह i त्य य भवेत्ततः । मनुष्यांस्तर्पयेद् भक्त्या ऋषिपुत्रान् ऋषींस्तथा ' ( आह्निकतत्त्व ) । शेष प्रश्न यह है कि ये भेद क्यों? इसपर ' शतपथब्राह्मण'-का कथन यह है 1 । ' ततो देवा यज्ञोपवीतिनो भूत्वा दक्षिणं जानु आच्य उपासीदन् ' ( २।४।२।१ ) वहां पर देवताओंको यज्ञोपवीती -बाएँ कन्धेमें सूत्र किये कहा है । अतः हमें भी देवकार्यमें वैसा करना पड़ता है.। प्रायः हमें देवकार्य करना पड़ता है; अतः सामान्यतया उपवीत भी हमें बाएँ कन्धेपर ही रखना पड़ता है; इसमें एक और भी प्रयोजन सूचित होता है । वह यह कि शरीरका दाहिना भाग पुरुषका होता है और बायां स्त्रीका । पुरुष पुरुषरूप होता है, स्त्री प्रकृतिरूप । पुरुष स्वतन्त्र होता है, प्रकृति पुरुषके अधीन होती है । बाएं कन्धेपर सदा सूत्र रखनेसे, दाहिनेमें उसके सर्वदा न रखने से सूचित होता है कि स्त्री सदा परतन्त्र रहती है और पुरुष स्वतन्त्र । स्त्रीको पुरुषके अधीन होना चाहिये, पुरुषको प्रकृतिके अधीन नहीं होना चाहिये । ' शतपथ में पूर्व के आगे पितरोंके लिए कहा है- ' अथैनं पितरः प्राचीनावीतिनः सव्यं जानु आच्य उपासीदन; तानब्रवीद् मासि मासि वोऽशनम् ' ( २।४।२।२ ) यहांपर पितरोंको प्राचीनावीती कहा है; तो जो कि-प्रतिमास हम उन्हें भोजन सौंपते हैं, वहां हमें भी प्राचीनावीती होना पड़ता है । आगे — ' अथैनं मनुष्या ( ऋषयः ) प्रावृता उपस्थं कृत्वा उपासीदन् ' ( २ | ४ | २ | ३ ) यहाँ पर मनुष्य- विशेष ऋषियोंका प्रावृत - निवीती होना ( ' निवीतं प्रावृतं त्रिषु ' ( अमरकोष २।६।११३ )

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१५४ श्रीसनातनधर्मा लोक ( ५ ) दिखलाया है; तब ऋषिकर्म में भी निवीती होना पड़ता है । इस प्रकार तीन ऋणों के शोधनार्थ यज्ञोपवीतकी परम आवश्यकता होती है । अतः यज्ञोपवीतको शरीरसे कभी भी पृथक नहीं करना चाहिये । ' सदोपवीतिना भाव्यं सदा वद्धशिखेन च । विशिखो व्युपवीतश्च यत् करोति न तत् कृतम् ' ( कात्यायन-स्मृति १४ ) । ' बिना यज्ञोपवीतेन द्विजातिर्यद्युपस्पृशेत् । प्राजापत्यं प्रकुर्वीत निष्कृतिर्नान्यथा भवेत् ' ( लघुहारीत ० २१ ) ' विना यज्ञो पवीतेन भुङ्क्त े तु ब्राह्मणो यदि । स्नानं कृत्वा जपं कुर्वन् उपवासेन शुध्यति ( २३ ) । यह यज्ञोपवीत छोड़नेका प्रायश्चित्त कहा है । स्वामी दयानन्दजीने ' सत्यार्थप्रकाश ' ( ११ समु ० पृ ० २४४ ) में यज्ञोपवीतको ' विद्याका चिह्न ' माना है, यह बात ठीक नहीं । ऐसा मानने पर वे स्वयं अविद्वान सिद्ध हो जाएंगे; क्योंकि उनका यज्ञोपवीत नहीं था । ' न्यायदर्शन ' ( १।२।१३ ) में ' ब्रात्य ' ( उपनयनादि-रहित ) को भी ब्राह्मण माना गया है; अतः वह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंका द्विजत्वसम्पादक तो हो सकता है, विद्वत्ता - सम्पादक वा हिन्दुत्व - सम्पादक नहीं । जहां यज्ञोपवीत धारणका यह प्रयोजन है, वहांपर द्विजत्व - चिह्नका भी प्रयोजन है, सब चिह्नोंके रखनेसे बड़े - बड़े लाभ होते हैं । मुलतानमें एक दंगे में मुसलमानोंने एक ब्राह्मणको मार डाला । यह हिन्दु है या मुसलमान —यह पता न लग सके; इस कारण मुसलमानोंने उसके परिचय - चिह्न नष्ट कर डाले । उसकी चोटी काट ली, तिलक मिटा दिया, इन्द्रिय भी काट दी, धोती भी हटा दी, मुहकी खाल भी उतार ली कि पहिचाना न

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यज्ञोपवीत- रहस्य ता ह्रीं - । न. 7 न में का I, ना न ते क न र न जावे; पर शीघ्रता से कमीजमें छिपा हुआ यज्ञोपवीत तोड़ना वे भूल गये; उसके शवको उन्होंने कुऍमें फेंक दिया । सिपाहियों द्वारा लाश मिलने पर उसके यज्ञोपवीत - द्वारा उसकी पहिचान होगई, क्योंकि — उसकी खोज पहलेसे ही जारी थी । तब उसके हत्यारोंको फांसी मिली । कहनेका भाव यह है कि - सभी चिह्नोंके रखनेसे जब - तब लाभ हो ही जाया करता है । खेद है कि आजकल पुरुष समाज में यज्ञोपवीत पहिननेका विचार हटता जा रहा है । बड़े नेता कहे जानेवाले भी इसके पहननेसे पराङ्मुख हैं । अन्य बाबू लोग नैकटाई प्रेमसे लगाते हैं जो ईसाकी फाँसीका चिह्न है; हैटके चमड़ेको बड़े गौरवसे सिर पर धारण करते हैं, पतलून खैचनेवाले चमड़े के पट्टे को कन्धेपर बड़े गर्वसे पहनते हैं । रेलवेके टी ० टी ०, पुलिसके थानेदार आदि जनेऊकी तरह चमड़े के पट्टे को बड़ी प्रतिष्ठा समझकर पहनते हैं; पर वे यज्ञोपवीतका भार - सा समझते हैं जो कि नहीं पहरते- -यह आश्चर्यका अवसर है! स्वा ० दयानन्दजीने भी ऐसे व्यक्तियोंको ठीक डांटा है कि – जब ' पतलून आदि वस्त्र पहनते हो; और तमगोंकी इच्छा करते हो; तो क्या यज्ञोपवीतादिका कुछ बड़ा भार होगया? ( सत्यार्थप्र ० ११ समु ० २४४ पृ ० ) ' यज्ञोपवीत और शिखा को छोड़ मुसलमान और ईसाइयोंके सदृश बन बैठना व्यर्थ है । ' ( स ० प्र ० पृ ० २४४ ) । ऐसे व्यक्तियों से यदि पूछा जाय कि आप कौन हैं? तो कहते हैं - हम हिन्दु हैं । परन्तु वेष उनका ईसाइयोंका होता है,

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१५६ श्रीसनातनधर्मालोक ( २ ) भाषा भी उर्दू - अंग्रेजी होती है, सिर पर चोटी भी नहीं होती, माथे पर तिलक भी नहीं होता, ग्रीवामें यज्ञोपवीत भी नहीं होता । हिन्दुत्वका अन्य कोई चिह्न नहीं होता; वे अपने आपको हिन्दु कैसे सिद्ध कर सकते हैं? गोरे न होने से वे अंग्रेज भी नहीं । सुन्नत न होनेसे वे मुसलमान भी नहीं । केश, कड़ा आदि न होनेसे सिक्ख भी नहीं । क्या ' इतो भ्रष्टास्ततो नष्टाः ' ही का नाम हिन्दु है? क्या अपने कोई चिह्न भीतर - बाहर न रखनेवालेका ही नाम हिन्दु है? हाय खेद! ऐसोंको लज्जा क्यों नहीं आती? कुछ समय के बाद इन्हें ' हिन्दु ' नाम कहते हुए भी शर्म लगेगी । आजकल स्त्री, शूद्र, अन्त्यज भी यज्ञोपवीत पहननेमें उत्कण्ठित दिखाई देते हैं; पर शास्त्रानुसार उनका उसमें अधिकार नहीं; इस विषय पर ' श्रीसनातनधर्मालोक में ५०० पृष्ठ दिये गये हैं । कुछ अंश ‘ श्रीसनातनधर्मालोक के तृतीय पुष्पसें भी दिया है । पाठक उसे मँगाकर देख सकते हैं । इससे उनके एतद्विषयक सन्देह मिटेंगे । इस उपनयनका नाम ' यज्ञोपवीत ' प्रसिद्ध है । इसका अर्थ है-‘ यज्ञका सूत्र ' । यज्ञमें द्विजका अधिकार होता है— ' अयं स होता यो द्विजन्मा ' ( ऋ ० १।१४६ ५ ) । तब द्विज पुरुषों से अतिरिक्त यज्ञ का व अन्य कौन ले सकता है । इस कारण स्त्री - शूद्रान्त्यजादि यज्ञ तथा यज्ञ - विषयवाले वेद में अनधिकृत हैं । जोकि स्वा ० दयानन्दजीने ' यज्ञे सौत्रामणीसुते ' ( यजुः १६।३१ ) इस पदसे यज्ञोपवीत धारण करना अर्थ किया है, वह ठीक नहीं । अपने वेदभाष्यमें स्वामीजीने इस प्रकार अर्थ किया है - ' यज्ञे

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यज्ञोपवीत - रहस्य १५७ ( सौत्रामणी ) सूत्राणि - यज्ञोपवीतादीनि मणिना - प्रन्थिना युक्तानि क्रियन्ते यस्मिन्, तस्मिन् ( सुते ) सम्पादिते ' जिसमें यज्ञोपवीतादि ग्रन्थियुक्त सूत्र धारण किये जाते हैं, उस सिद्ध किये हुए यज्ञमें ' । स्वामीजीका यह अर्थ ' मीमांसादर्शन, शतपथ ब्राह्मण, कातीयश्रौत-सूत्र तथा कोश - व्याकरणादिसे विरुद्ध ही है । सौनामरिण एक यज्ञविशेष ही है; यह यज्ञोपवीतका नाम नहीं । शतपथ एवं मीमांसा-दर्शन में सौत्रामणी - यज्ञविशेषके देखने से स्पष्ट है कि यह यज्ञविशेष है, यज्ञोपवीत - संस्कार नहीं । ' शतपथ ब्राह्मण ' में लिखा है— ' सुरावान् वा एष बर्हिषद् यज्ञो यत् सौत्रामणी ' ( १२ / ८३१-२ ) इसी कारण यजुर्वेद में ' सुरावन्तं बर्हिषदं सुवीरं यज्ञ ' ( यजुः १६।३२ ) मैं यह कहा है । ' सौत्र'का ' यज्ञोपवीतवत् ' ' मणि ' का ग्रन्थि ' सुते ' का ' सम्पादिते ' यह अर्थ भी निर्मूल होनेसे असङ्गत ही है । ' गौतमधर्मसूत्र ' में ४८ संस्कारोंमें यज्ञोपवीतसे ‘ सौत्रामणी ' को पृथक् रखा गया है । अस्तु-जो लोग स्त्री - शूद्रादिको यह कहकर उत्तेजित करते हैं कि-सनातनधर्मियोंने तुम्हें उपवीतका अधिकार न देकर तुम्हारा अपमान किया है, उन्हें यह तो देखना चाहिये कि वही सनातनधर्म संन्यासियोंको यज्ञोपवीत नहीं देता, वा उन्हें नहीं पहनने देता; क्या इससे वह उनका अपमान करता है? नहीं - नहीं । बल्कि संन्यासी वा यती लोग तो सर्वनमस्करणीय माने गये हैं । अतः • वादियोंकी यह उत्तेजनात्मक नीति ठीक नहीं । यहाँ तो अधिकार-अनधिकार में शास्त्रकी ही मान्यता होती है । तीन आश्रम, तीन वर्णों

पृष्ठ 188

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१२८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) के पुरुषों में ही उपवीतका अधिकार होता है; तभी यज्ञोपवीतकी तीन तन्तुएँ होती हैं । इस प्रकार ' उपनयन ' मुख्य संस्कार तथा रहस्यपूर्ण सिद्ध हुआ । उपनयन में मेखला उपनयनमें मेखला हुआ करती है । मेखलाका माहात्म्य पारस्कर-गृह्यसूत्रके ' इयं दुरुक्कं परिबाधमाना वर्णं पवित्रं पुनती म आगात् । प्राणापानाभ्यां बलमादधाना स्वसा देवी सुभगा मेखलेयम् ' ( २ राश ८ ) इस मन्त्र में आया है । इससे स्पष्ट है कि - यह लाभदायक है । प्राण - अपानको बल देनेसे यह हार्निया रोगको नहीं होने देती । पाठकोंने देखा होगा कि कई वृद्ध पुरुष नल वढ़ आने से रबड़की एक साँपकी भांति नलके स्थान पर एक पेटी बांधते हैं; इससे वह स्थान दबा रहनेसे नल - वृद्धि नहीं हो पाती । ब्रह्मचर्यावस्थासे मेखला रखने पर पच्चीसवें वर्ष उतार देने पर फिर उस रोगकी सम्भावना नहीं रह पाती । कोई अन्त्ररोग नहीं हो पाता । इसी मेखलाबन्धनका ही दूसरा रूप पतलून पर पेटी बांधना, पजामे में नालेका बांधना, नेकर पहिनना, कमरबन्द बांधना, सिपाहियोंका पेटी बांधना आदि है । कटिके निचले स्थल पर मेखलाका दबाव पड़ने से प्रारण अपानकी गति ठीक रहती है । इसी से कमर कसने पर चुस्ती मालूम पड़ने लगती है । अतः अन्त्रवृद्धि की शङ्का नहीं हो पाती । यद्यपि धोती, साड़ी, लहंगा आदिके बन्धन भी इसीके रूपान्तर हैं; तथापि वैध - संस्कार वा अभिमन्त्रण द्वारा मेखलाबन्धन विशेष लाभदायक है जैसा कि मन्त्रमें कहा जा

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यज्ञोपवीत- रहस्य १२३ चुका है । वह वायुको शान्त करके कामचेष्टामें संयम लाती है, पुस्त्वको भी स्थिर रखती है । मेखला -भेद वर्ण - भेदको बताता है, जिस प्रकार पेटीका भेद पुलिस, मिलटरी आदिमें भेद बताता है । मेखला मूंजकी जो कही गई है; तो मुञ्जमें यह विशेष गुण है कि वह दाह, रक्त, मूत्राशय-सम्बन्धी रोगों तथा नेत्र रोगोंको दूर करता है । इस मौञ्जीको कमर में कसकर स्नान - ध्यान आदिसे तेज समस्त देह में भर जाता है । इससे ब्रह्मचारीका बल बढ़ जाता है, तथा प्रारण अपानकी शक्ति प्राप्त होती है । यह मेखला विद्युत् शक्तिको लौटाती है, और उसको स्थानान्तरित भी करती है । जैसे बैटरी में जोड़ी हुई गोलाकार तार विद्युत्को लौटाती है, और स्थानान्तरित करती है । मेखला बांधने से कमरकी शक्ति बढ़ती है । आजकल यौवनमें ही नवयुवकों की कमर जो कि झुक जाती है; वहाँ मेखलाका धारण न करना ही हेतुभूत है । अंग्रेजोंका ' वेल्ट ' बांधना मेखलाका ही अनुकरण है । पर मौञ्जीमें जो गुण है, वह कमरबन्दमें कहांसे हो सकता है । मौजी मेखलामें व्यय भी नहीं है, गुण बहुत से हैं । यह सर्वविदित है कि - संकट उपस्थित होने पर कार्यकर्ताको उत्साह देनेके लिए कहा जाता है कि- ' कमर कसकर तैयार हो जाओ ' । तब कमर कस लेने पर निर्बलका भी साहस बढ़ जाता है । तब वैध मेखला - धारणके लाभ कितने हो सकते हैं - यह स्वयं सोचा जा . सकता है | क्षत्रियके लिए धनुषकी डोरीके समान तनी हुई मूर्वा-तृणकी, और वैश्यके लिए सनकी मेखला कही गई है । क्षत्रिय

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१६० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) और वैश्यको बल - व्यापारादिमें भविष्य में लगने से कमरकी दृढता बहुत अपेक्षित होती है; अतः उनके लिए भिन्न मेखलाका विधान है । उपनयनमें भिक्षा एवं गायत्री उपनयनमें भिक्षा भी माँगी जाती है, उसका रहस्य यह है कि धनीका भी लड़का निर्धनके समान भिक्षा मांगे, जिससे भविष्य में उसे धनका गर्व न रहे और सभी अपने पर देशका ऋण समझें । भविष्यमें वे अपनेको देशका ऋणी समझकर देश- सेवा द्वारा उस ऋरणकी पूर्ति करें । अन्य इस विषय में ' षोडशसंस्कार- रहस्य ' में बताया जायगा । उपनयनसंस्कार में वेदके सारस्वरूप सावित्र - मन्त्रका उपदेश भी दिया जाता है, जिसे ' गायत्री मन्त्र ' कहा जाता है । उस गायत्री-मन्त्रका क्या महत्त्व तथा उस महत्त्वका क्या रहस्य है, यह अग्रिम निबन्धमें बताया जाता है, ' आलोक ' पाठक इसे भी सावधानता से देखें | सूचना – यह पञ्चम पुष्प है; इससे पूर्वके चार पुष्पोंका मंगाना भी आवश्यक है ॥ जिनके पास न हों; वे उन्हें हमसे मंगा लें । मूल्य ७ । ) डाक - व्यय पृथक् ।