सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 191–200

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 191–200

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( ५ ) गायत्री मन्त्रकी महत्ताका रहस्य । ' गायत्री छन्दसामहम् ' ( भगवद्गीता १०।३५ ) ' उपनयन - रहस्य ' हम बता चुके; उपनयनमें गायत्री मन्त्रका उपदेश किया जाता है । यह क्यों? इसका इतना महत्त्व क्यों? इसपर अब विचार किया जाता है । ' ॐ भूर्भुवः स्वः, तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् । ' यह मन्त्र धार्मिक जगत् में प्रसिद्ध है । यह ' अथर्ववेदसं ० ' से अतिरिक्त तीन वेदोंकी संहिताओं में मिलता है । ' अथर्ववेद ' की शौनकसंहितासे भिन्न किसी संहितामें उक्त मन्त्र कदाचित् मिल जाय; यह सम्भावना हो सकती है । तथापि अथर्ववेद - शौनकसंहिता ( १६।७१।१ ) में वेदमाता गायत्रीकी महिमा तो वर्णित है ही । ' ऋग्वेद ' की शाकलसंहिता में ( ३।६२।१० ) उक्त मन्त्र ं मिलता है, ' सामवेद ' की ' कौथुमसंहिता ' में भी उत्तरार्चिक ( १३।४।३।१ ) में मिलता है । शुक्ल यजुर्वेदकी वाजसनेय - संहिता ( ३।३५, १६।३, २२/६, ३०/२ ) में, तथा काण्वसंहिता ( ३।४३, २४ | १३, ३४ | २ ) एवं ' कृष्णयजुर्वेद ' की ' तैत्तिरीयसंहिता ' ( १२५२६३१२, १ | ५ | ८ | १०, ४ | १ | ११ | ७ ) में तथा कृष्णयजुर्वेदकी ' मैत्रायणी - संहिता ' ( ४ । १० । ७७ ) में भी मिलता है । इस प्रकार अन्य वेदसंहिताओंमें भी इसका मिलना सम्भव है । यह गायत्री मन्त्र, सावित्री, गुरुमन्त्र आदि नामोंसे प्रसिद्ध है । गायत्री छन्दवाला होनेसे यह ' गायत्री ' नामसे प्रसिद्ध है । यद्यपि ११ स ० ध

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१६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) गायत्री छन्दवाले मन्त्र अन्य भी बहुत से हैं; तथापि ' प्रधानेन हि व्यपदेशा भवन्ति ' इस न्यायसे प्रधान इसी मन्त्रका उक्त नाम प्रसिद्ध है । अथवा ' गायत्री गायतेः स्तुतिकर्मणः ' ( निरुक्त ७ | १२ | ६ ) ' गायतो [ ब्रह्मणो ] मुखादुदपतत् - इति ब्राह्मणम् ' ( नि ० ७११२।५ ), तथा ' गायन्तं त्रायते ' इत्यादि निर्वचन से योगिक रूप से भी उक्त नामसे प्रसिद्ध है । ' सा हैषा गयान् [ प्रारणान् ] तत्रे, तस्य प्राणान् त्रायते ' ( शत ० १४/८/१५/७ ) इस प्रकार गायत्री प्राण-रक्षणी विद्या भी है । ' सवितुरियम् ऋकू ' इस विग्रह से यह मन्त्र ‘ सावित्री ' नामसे भी प्रसिद्ध है । इसी कारण ही इसकी स्त्रीलिङ्गसे प्रसिद्धि है । अथवा गायत्री, त्रिष्टुप् जगती इन तीन छन्दोंके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंके सावित्र मन्त्र हैं, तब इन छन्दोंके स्त्रीलिङ्गान्त होनेसे गायत्री - सावित्री, त्रिष्टुप् -सावित्री, जगती-सावित्री इस प्रकार भी ' सावित्री ' में स्त्रीत्व है । इस प्रकार ' वेदमाता ' ( अथर्व ० १६७१।१ ) इस नाम से प्रसिद्ध होने से भी इसमें स्त्रीलिङ्ग-रूपसे प्रसिद्धि है । इसके अतिरिक्त सविता वाले मन्त्र में सविता की शक्ति भी सन्निहित है, क्योंकि - शक्ति तथा शक्तिमान्‌का अभेद हुआ करता है; कभी उस शक्तिमान्को शक्तिरूपसे भी वर्णित किया जाता है । शक्ति स्त्रीलिङ्ग होनेसे उसे ' देवी ' रूप में वर्णित किया जाता है । सविता की शक्ति ही गायत्रीदेवीके नामसे विख्यात है । इसी कारण सनातनधर्मकी सन्ध्या में उक्त मन्त्रके विसर्जनके अवसर पर ' उत्तमे शिखरे देवि! ' ( तैत्तिरीयारण्यक १० ३० ) इस प्रकार स्त्रीत्वका प्रयोग है | सविताको शक्तिरूप होनेसे उसका ' श्वेतवर्णा

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गायत्री मन्त्रकी महत्ता १६३ समुद्दिष्टा ' इस प्रकार देवीरूपसे वर्णन आया है । इसी गायत्रीका उपस्थान ' गायत्र्यस्येकपदी... असावदो मा प्रापत् ' ( १४/८/१५/१० ) शतपथ - प्रोक्त इस मन्त्रमें आया है, जो सन्ध्यामें पढ़ा जाता है । उपनयन होजाने पर वेदारम्भ में आचार्य पदवी को धारण करने वाला गुरु इसी मन्त्रका उपदेश करता है । इस कारण यह ' गुरु-मन्त्र ' नामसे प्रसिद्ध भी है । यद्यपि वेदारम्भ- संस्कारमें वेदका ही आरम्भ अपेक्षित है; तथापि उस समय विद्यार्थी वेदाङ्ग पढ़े हुए न होनेसे वेदमें चल नहीं सकता; तव वेदका सारभूत यही मन्त्र गुरुद्वारा उपदिष्ट किया जाता है । ' उक्त मन्त्र वेदका साररूप है'-यह आगे बताया जायगा । इस मन्त्रमें ' सविता ' देवतासे प्रार्थना है । ' सविता ' सूर्यको कहते हैं । इससे ' अभिमानिव्यपदेशात् ( २२११५ ) इस ' वेदान्त-दर्शन ' के सूत्रके आधारसे सूर्यमण्डलान्तर्गत सूर्याभिमानी देवविशेष लिया जाता है, जो चेतन है । जैसे जड़ जलोंका चेतन देव वरुण, वेदमें ' यासां ( अपां ) राजा वरुरणो याति मध्ये सत्यानृते अवपश्यन् जनानाम् ' ( ऋ ० ७ । ४६।३ ) [ यहां पर ' आपो देवता: ' है, अप् - शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग है ] इस मन्त्र से संकेतित किया गया है; वैसे ही जड़ सूर्यमण्डलका भी चेतन- देव ' योऽसावादित्ये पुरुषः सोसावहम् ' ( ४०।१७ ) इस यजुर्वेद ( वा. सं. ) के मन्त्रमें संकेतित किया गया है । सूर्यादिका अभिमानी देवता भी उसी - उसी नामसे प्रसिद्ध होता है । जो कि वेद हमें सूर्य आदिकी उपासना सिखलाता है, उसे वहाँ उनकी चेतनता इष्ट है । चाहे सूर्य आदि पदार्थ लौकिक-

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१६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) व्यवहारमें जड़ प्रसिद्ध हों; पर वास्तव में ये चेतन हैं; क्योंकि— इनके अन्दर इनका अभिमानी ( अधिष्ठाता देवता विराजमान है । इसी कारण ' अभिमानिव्यपदेशस्तु ' ( २।१५ ) इस ' ब्रह्मसूत्र ' के शाङ्कर-भाष्य में कहा है- ' मृदाद्यभिमानिन्यो वागाद्यभिमानिन्यश्च चेतना देवता वदनसंवदनादिषु चेतनोचितेषु व्यवहारेषु व्यपदिश्यन्ते, न भूतेन्द्रियमात्रम् ।... अनुगताश्च सर्वत्र अभिमानिन्यः चेतना देवता मन्त्रार्थवादेतिहास - पुराणादिभ्योऽवगम्यन्ते - " इति । यहां पर आचार्यने भूत तथा इन्द्रियोंके अधिष्ठाता के चेतन होनेमें वेदके मन्त्रभाग तथा ब्राह्मणभागकी भी साक्षी बताई है । तभी वेदमें-' वरुणोऽपामधिपतिः ' ( अथर्व ० ५।२४।४ ) ' आपश्च, वरुणश्च राजा ' ( अथर्व ० १५।२६ ) ' इन्द्रो वै यज्ञस्य देवता ' ( शतपथ ० ३।५।२।६ ) जल, यज्ञ आदिके अधिष्ठाता देवता वरुण, इन्द्र आदि माने गये हैं । इसीको स्वा ० श्रीशंकराचार्यने ' वेदान्त दर्शन ' के १।३।३३ सूत्रके भाष्यमें भी स्पष्ट किया है । जैसे कि - ' ज्योतिरादिविषया अपि आदित्यादयो देवतावचनाः शब्दाः, चेतनावन्तम् ऐश्वर्याद्युपेतं तं तं देवतात्मानं समर्पयन्ति, मन्त्रार्थवादादिषु तथा व्यवहारात् । अस्ति हि ऐश्वर्ययोगाद् देवतानां ज्योतिराद्यात्मभिश्च अवस्थातुम्, यथेष्टं च तं तं विग्रहं ग्रहीतु ं सामर्थ्यम् । तथाहि श्रूयते - ' मेधातिथिं ह काण्वा-यनमिन्द्रो मेषो भूत्वा जहार ' ( षड्विंशब्राह्मण १।१ ) स्मर्यते च-' आदित्यः पुरुषो भूत्वा कुन्तीमुपजगाम ह ' इति । मृदादिष्वपि चेतना अधिष्ठातारोऽभ्युपगम्यन्ते - ' मृदब्रवीद्, आपोऽब्र वन - इत्यादि -दर्शनात् । ज्योतिरादेस्तु भूतधातोरादित्यादिषु श्रचेतनत्वमभ्युप-

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गायत्री - मन्त्रकी महत्ता १६२ गम्यते । चेतनास्तु अधिष्ठातारो देवतात्मानो मन्त्रार्थवादादि-व्यवहाराद् — इत्युक्तम् ' । ( देवताधिकरणेऽष्टमे ) । इस सिद्धान्तका विशदीकरण आर्यसमाजी विद्वान् श्रीराजाराम -जी शास्त्रीने अपने ‘ अथर्ववेदभाष्य ' की भूमिका में इस प्रकार किया है - ' परमेश्वरकी सृष्टिमें देहधारी जीवोंकी सृष्टि नाना- प्रकार की है । इस भूलोक में ही शैवाल, तृण, घास आदि नाना - प्रकारके स्थावर और पशु - पक्षी आदि नानाप्रकारके जङ्गम हैं, ये सारे जीव-विशेष हैं । मनुष्य इन सबसे ऊंची श्रेणिका जीव है, पर परमात्मा की सृष्टि यहीं तक समाप्त नहीं है । मनुष्यसे कई दर्जोंमें ऊंचा पद रखनेवाले जीव भी उसकी सृष्टिमें विद्यमान हैं; जो मनुष्योंकी नाई चेतन हैं । वे अपनी शक्ति और ज्ञानमें इतने ऊंचे पहुँचे हुए हैं कि — मनुष्यकी शक्ति और ज्ञान उनके सामने तुच्छ हैं । इस अनेक प्रकारकी ऊंची सृष्टिमें सबसे ऊंचा स्थान देवताओंका है । देवता चेतन हैं । मनुष्योंसे ऊपर और परमेश्वरसे नीचे हैं । परमेश्वरकी ओर से उनको भिन्न - भिन्न अधिकार मिले हुए हैं जिनका कि वे पालन करते हैं । देवता अजर और अमर हैं, पर उनका अजर - अमर होना मनुष्योंकी अपेक्षासे है, वस्तुतः उनकी भी अपनी अपनी -आयु नियत है । ब्रह्माण्डकी दिव्य शक्तियों में से एक - एक शक्ति पर एक - एक देवताका अधिकार है । जिस शक्तिपर जिसका अधिकार है, वही उसका देह है जो उसके वशमें है । जैसे हमारे देहमें एक जीवात्मा है, जो इस देहका अधिपति है, इसी प्रकार उस शक्तिके अन्दर भी एक जीवात्मा है, जो उसका

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१६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) अधिपति है | जैसे हमारे अधीन यह देह है, वैसे ही एक देवताके अधीन सूर्यरूपी देह है । हम एक थोड़ीसी शक्तिवाले देह के स्वामी हैं, वह एक बड़ी शक्तिवाले देहका स्वामी है, वह अध्यात्म शक्तियों में इतना बढ़ा हुआ है कि अपनी इच्छा के अनुसार जैसा चाहे, बैसा रूप धारकर, जहां चाहे वहां जा सकता है | वही देव सूर्यका अधिष्टाता कहलाता है और सूर्यके नामसे ही बुलाया जाता है । इसी प्रकार अग्नि और वायु आदिके अधिष्ठाता देवता हैं । देवताओंका ऐश्वर्य वहुत बड़ा है; पर वह सारा परमेश्वर के अधीन है । एक - एक देवता एक - एक दिव्यशक्तिका नियन्ता है । पर उन सबके ऊपर उन सव का नियन्ता परमेश्वर है । इसलिए भी सभी देवता मिलकर जगत्. का प्रवन्ध इस प्रकार कर रहे हैं - जिस प्रकार राजाके अधीन उसके भृत्य उसके राज्यका प्रबन्ध करते हैं । देवताओंकी उपासनाथोंसे उन कामनाओंकी सिद्धि होती है, जिसके कि वे मालिक होते हैं ।... वे तब तक दिव्य शरीरको धारण किये रहते हैं, जबतक उनका वह अधिकार समाप्त नहीं हो लेता, जिस अधिकार पर उनको परमेश्वरने लगाया है । अधिकारकी समाप्ति पर वे मुक्त हो जाते हैं और उनकी जगह दूसरे ग्रहण करते हैं; जो मनुष्यों में से ही उपासना द्वारा उस पदके योग्य बन गये हैं । देवताओंके ऐश्वर्यके दर्जे हैं, सबसे ऊँचा दर्जा ब्रह्माका है, ( अथर्ववेदभाष्यभूमिका पृ ० ११ ) इससे स्पष्ट है कि सूर्य आदि देवता चेतन हैं । बल्कि शास्त्रों में तो यहां तक कहा है कि सभी वस्तुएँ चेतन हैं । इसी अभिप्रायसे

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गायत्री मन्त्रकी महत्ता १६७ महाभाष्यकार श्रीपतञ्जलिने भी ३ | १ | ७ सूत्र में ' सर्वस्य वा चेतनावत्त्वात् ' इस वार्तिकके विवरण में कहा है- ' अथवा सर्वं चेतनावत् । एवं हि आह — ' कंसकाः सर्पन्ति, शिरीषोऽयं स्वपिति, सुर्वचला श्रादित्यमनु पर्येति । ‘ आस्कन्द कपिलक ' इत्युक्ते तृणमास्कन्दति । अयस्कान्तमयः संक्रामति ॥ ऋषिः [ वेदः ] पठति ' शृणोत प्रावारणः ' यहां पर ' शृणोत प्रावारणः ' यह वेदमन्त्र देकर सिद्ध किया गया है कि सभी जड़ दीख रही वस्तुएँ भी चेतन हैं । उक्त वेदमन्त्र यह है— ' शृणोत्वग्निः समिधा हवं मे, शृण्वन्तु. आपो धिषणाश्च देवीः । शृणोत प्रावाणो विदुषोऽनु यज्ञ भुं शृणोतु देवः सविता हवं मे ' ( कृष्णयजुर्वेद - तैत्तिरीयसं ० १ | ३ | १३ | १ ) जब यहां जड़ पत्थरको भी वेदने सुननेकेलिए कहा है; तब पत्थर आदि वाह्य व्यवहारमें अचेतन कहे जाते हुए भी, वेदकी दृष्टिमें चेतन हैं, यह वैदिक सिद्धान्त है । यह महाभाष्यकारका आशय है । इसीको ' प्रदीप ' में कैट ने स्पष्ट किया है- ' सर्वस्य वेति ' आत्मा-द्वैतदर्शनेनेति भावः । ऋषिरिति - वेदः सर्वभावानां चैतन्यं प्रतिपाद-यतीत्यर्थः । वैचित्र्येण च पदार्थानामुपलम्भात् सर्वचेतनधर्मः सर्वत्र नोद्भावनीयः ' । इसमें इस प्रश्नका कि यदि पत्थर आदि चेतन हैं तो वे भी हम चेतनोंकी तरह चलते - बोलते क्यों नहीं — इसका उत्तर दे दिया गया है कि पदार्थों में परस्पर विचित्रता भी हुआ ही करती है, तब सभी चेतनोंके धर्म उसी रूपमें सभी चेतनोंमें नहीं मिल सकते, क्योंकि किसी में चेतनता अभिव्यक्त होती है; किसीमें अनभिव्यक्त । श्रीनागेशभट्टने भी अपने ' उद्योत ' में इसीका इस

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१६८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) प्रकार समर्थन किया है— ' वैचित्रयेणेति ' चेतनेषु मनुष्येष्वपि नानाजातीय - व्यवहारदर्शनाद् इति भावः । सर्वत्र परिणामदर्शनेन चेतनाधिष्ठानं विना च तदसम्भवात् सर्वस्य तदधिष्ठितत्वं ज्ञायते इति तात्पर्यम् ' । अर्थात् जब चेतन मनुष्यों में भी नाना प्रकारके व्यवहार दिखलाई पड़ते हैं, तब चेतन पत्थर आदियों में भी सभी चेतनोंवाले व्यवहार नहीं हो जाते । चेतन मनुष्यों में भी लकवा आदिके कारण चलना - बोलना आदि चेष्टा नहीं रहती । जव सर्वत्र परिणाम - परिवर्तन आदि विकार दीखता है, तब वह चेतनके अधिष्ठान के बिना नहीं हो सकता । जब ऐसा है तब सभी पदार्थ चेतन हैं - यह स्पष्ट है । वार्तमानिक विज्ञान भी इस सिद्धान्तकी पुष्टि करता है । वैज्ञानिकोंने रेडियम धातुकी विद्युत्कणिकाका परीक्षण करके यह ज्ञान प्राप्त किया है कि ' रेडियम ' धातुके एक परमाणुसे हजारों विद्युत् - करिणका प्रतिक्षण में प्रकट होती हैं । परिमाणमें वे करण इतने छोटे होते हैं कि एक हज़ार भी मिले हुए उनका संयुक्त - परिमाण वा गुरुत्व ' हाईड्रोजन ' के एक परमाणुके तुल्य भी नहीं होता । इनके निकलनेका वेग प्रकाशके वेगका लगभग दो - तिहाई होता है । प्रकाशका वेग एक सेकंडमें १,८६,००० मीलके लगभग सिद्ध किया गया है । सूर्य से लगभग साढ़े नौ करोड़ मीलकी दूरी पर स्थित पृथ्वी पर उसका प्रकाश आठ मिनटमें पहुँचता है । इन अपूर्व बातोंको देखकर वैज्ञानिकोंकी यह धारणा हो गई है कि समस्त चराचर जगत् में सारभूत वस्तु कोई भी नहीं है और

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गायत्री मन्त्रकी महत्ता १६६ संसारमें कोई भी पदार्थ जड़ नहीं है । जड़ कहे जानेवाले पदार्थोंके छोटे - से - छोटे करण अर्थात् परमाणुको देखनेसे तथा उसे तोड़कर उसके सहस्रों भाग करने पर विद्युत्कणियों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं मिलता । फिर भी उनकी सत्ता दिखाई पड़ती है और नियमसे प्रतिक्षण उनकी चलन - प्रवृत्ति मिलती है; इससे वर्तमान वैज्ञानिकोंके विचारमें जड़ वस्तुओं में भी दैवी शक्तिका आभास दीखने से जड़ों में भी चेतन - सत्ता सिद्ध हुई । वस्तुतः यह सिद्धान्त है भी ठीक ही । शास्त्रका भी यही सिद्धान्त है । शास्त्र परमात्माको अणु - अणु में व्याप्त मानता है । अद्वैत - सिद्धान्तमें तो अणु - ऋणु भी परमात्मा का ही रूप है, वा परमात्मा ही है । उस ( परमात्मा ) से भिन्न किसी भी वस्तुकी पारमार्थिक सत्ता नहीं है । ईश्वर ' सच्चिदानन्द ' इस शब्दसे चेतन ही है; तो समस्त सांसारिक वस्तुएँ जड़ दीख रही हुई भी वस्तुतः चेतन ही हैं । जो कि उनमें स्थूलतासे चैतन्यकी अभिव्यक्ति नहीं दीखती; उसमें कारण है उनमें स्थूलतासे इन्द्रियों तथा मनकी अनभिव्यक्ति । आत्माको ही देख लीजिये, वह चेतन है । जब उसमें मरणके समय इन्द्रियाँ और मन अभिव्यक्त नहीं होते; तब वह आत्मा भी चेष्टाशाली नहीं मालूम होता । प्रत्युत आत्माके शरीर में विद्यमान होने पर भी, उसमें होती हुई भी इन्द्रियाँ कारणवश कार्य करनेवाली नहीं होतीं, वा निर्बल हो जाती हैं; तब आत्म - युक्त शरीरवाले होने पर भी पुरुषकी चेष्टा नहीं दीखती । इस विषय में मूर्च्छित ( बेहोश ) पुरुषोंका उदाहरण

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१७० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) देख लीजिये । अथवा न मूच्छित भी निर्बल इन्द्रियशक्ति वाले, वा लकवा बीमारीसे घिरे पुरुषोंका उदाहरण देख लीजिये । परमात्मा चेतन माना जाता है, पर उसमें ' हरकत ' क्यों नहीं दीखती? । उसमें भी कारण है उसका स्थूल इन्द्रिय - मन आदि से संयोग । इसीलिए उसके शब्द आदि व्यवहार भी स्थूल नहीं हुआ करते । इससे सिद्ध हुआ कि — जड़ वस्तु भी वास्तव में चेतन हुआ करती है । भैंसकी पुरीषके जड़ परमाणुओं में जब स्थूलतासे विशिष्ट शक्तिका संयोग व्यक्त होता है; तब उसके पुरीषमें कीड़े होजाते हैं । यदि जड़ोंमें चेतन - शक्ति सर्वथा न होती; तो अभावसे भावकी उत्पत्ति कैसे होगई? जो चैतन्य - शक्ति कीड़ोंमें है, वह भैंसकी पुरीषके जड़ कहे जानेवाले परमाणुओं में भी थी । परन्तु इन्द्रियादिकी अभिव्यक्ति न होनेसे वह चैतन्य- शक्ति अपना उपयोग न कर सकी । वल्ब न होने पर विजली नहीं जला करती । इसी सिद्धान्तको मानकर स्वर्गीय जगदीशचन्द्रवसुने वृक्षोंमें चेतनता मानी थी; इसी प्रकार पत्थरों में भी मानी । इसी अभिप्राय से वर्तमान वैज्ञानिक लोग सूर्यमें भी प्रसन्नता अप्रसन्नताके परमाणु मानने लगे हैं । इसका विवरण इस प्रकार है । कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी लण्डनमें सूर्यके विषयमें एक लैक्चर हुआ था; जो समाचार - पन्नोंमें प्रकाशित हो चुका है । उसको तो हम फिर अन्य पुष्पों में पाठकोंको उपहृत करेंगे । उसमें प्रकृतं अंश यह है । उस व्याख्याताने कहा - ' उत्तरी अमेरिकाके ग्रेनलैण्ड प्रदेशमें एक दफीनेका खोदना शुरू हुआ ।