सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 251–260

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 251–260

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गर्भाधान - संस्कार - रहस्य २२१ तो उस समय स्थापित किये हुए गर्भसे पुत्रका जन्म होता है । छठी, आठवीं आदि युग्म या सम रात्रियोंमें ऋतुस्नाता पत्नीके साथ समागम करनेसे पुत्र पैदा होते हैं । इसलिए पुत्रको इच्छा रखनेवाला पुरुष ऋतुकाल आने पर युग्म रात्रियोंमें स्त्री- सहवास करे । ' ) इस प्रकार पुत्र होता है । विषम रात्रियों में पूर्वक्रमवश रजका वेग अधिक होनेसे शुक्रकी कमी हो जानेके कारण लड़की उत्पन्न होती है । ' स्त्री भवत्यधिके ( रजसि ) स्त्रियाः ' ( मनु ० ३।४६ ) ( समागमकाल में पुरुषके वीर्यकी अपेक्षा यदि स्त्रीके रजकी अधिकता हो, तो कन्याका जन्म होता है । ) ऋतुकी रात्रियों में पहली चार तथा ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्रियाँ मनुके ( ३।४७ ) अनुसार निन्दित होती हैं, शेष ६, ८, १०, १२, १४, १६ रात्रियोंमें पुत्रार्थी तथा ५, ७, ६, १५ रात्रियों में कन्यार्थी स्त्री - गमन करे | उनमें भी पर्वकी रात्रियों — पूर्णिमा, अमावस्या, अष्टमी तिथियों में भी गर्भाधान न करे ( मनु ० ४ | ५२८, ३४५ ) । ऐसा करने पर गृहस्थाश्रमी भी ब्रह्मचारी माना जाता है, जैसे कि मनुजीने कहा है- ' निन्द्यास्वष्टासु चान्यासु स्त्रियो रात्रिषु वर्जयन् । ब्रह्मचार्येव भवति यत्र तत्राश्रमे वसन् ॥ ( ३।५० ) ( ' छः निन्दनीय रात्रियों में और आठ अनिन्दनीय रात्रियों में भी जो स्त्री - सहवासका त्याग करता है और शेष दो ही रात्रियों में स्त्री - समागम करता है, वह किसी भी आश्रम में रहकर ब्रह्मचारी ही समझा जाता है । ' ) दिन - रातमें कई वारकी विषयासक्तिसे पुरुष जहाँ अपनी स्त्रीको राजयक्ष्मा आदि बीमारियों तथा व्यभिचार - प्रवृत्तिमें

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२२२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) फँसाता है; वहाँ अपनेको भी । ऐसा करना अपने भावी आनन्दका समय न्यून करना है । अतः दम्पति उक्त शास्त्रीय वचनोंपर ध्यान दें । ( २ ) पुसवन संस्कारका रहस्य । ' तृतीये मासि पु'सव: ' ( व्यासस्मृति १।१६ ) । गर्भाधानसे तीसरे महीने में पुंसवन संस्कार होना चाहिये । इस संस्कार से पुरुषका शरीर बनता है । ' पुमान् सूयते येन कर्मणा, तदिदं पु ' सवनम् ' जिस कर्म से पुरुषका प्रसव ( पुत्रका जन्म ) हो, उस गर्भ - संस्कार - कर्मका नाम ' पु'सवन ' है । गर्भसंस्कारकर्म — ' आश्वलायनगृह्यसूत्र के ( ११११११ ) सूत्रकी व्याख्यामें भाष्यकार श्रीहरदत्ताचार्यने कहा है- ' येन स गर्भः पुमान् भवति तत् पु'सवनम् । ' जिससे वह गर्भ पुरुष होता है, वह पुंसवन कर्म है । चार मासतक गर्भ में स्त्री - पुरुषका भेद नहीं होता है, अतः स्त्री-पुरुषके चिह्नकी उत्पत्तिसे पूर्व ही यह संस्कार किया जाता है । अथवा कई वैज्ञानिकों के मतानुसार उस समय तक पुत्र - पुत्री दोनोंके चिह्न बनते हैं, फिर स्त्रीत्व अथवा पुंस्त्व, जिसको शक्ति प्राप्त होती है, उस चिह्नकी वृद्धि तथा दूसरे चिह्नका ऊपर - नीचेकी मांसोत्पत्तिसे आच्छादन तथा स्थगन हो जाता है । पु ंस्त्वको शक्ति प्राप्त करानेकेलिए ही पुरंसवन संस्कार में पहले समय में ओषधि-विशेषको स्त्रीकी नासिकाके मार्ग से भीतर पहुँचाया जाता था । जैसा कि सुश्रुतसंहिता में लिखा है- ' लब्धगर्भायाश्च एतेषु अहःसु

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' पुंसवन संस्कार - रहस्य २२३ लक्ष्मणावट शुङ्गासहदेवीविश्वदेवानामन्यतमं क्षीरेण अभिघुट्य त्रीन् चतुरो वा बिन्दून् दद्याद् दक्षिणे नासापुटे पुत्रकामायै न च तन्निष्टीवेत् । ' ( शारीरस्थान २।३४ ) ( ' जिसने गर्भ धारण कर लिया हो, उसकेलिए इन्हीं दिनोंमें लक्ष्मणा, वटशुङ्गा, सहदेवी और विश्वदेवा इनमें से किसी एक ओषधिको दूधके साथ खूब महीन पीसकर उसकी तीन या चार बूँदें उस स्त्रीकी दाहिनी नाक के छिद्रमें डाल दे । यदि उसे पुत्रकी इच्छा हो तभी ऐसा करे । स्त्रीको चाहिये कि वह उस औषधको थूके नहीं । ' ) इसी प्रकार चरकसंहिता ( शारीरस्थान ८३५-३६ ) में दाहिने नथुने द्वारा पीने से पुत्र - प्राप्ति और बायें द्वारा कन्या - प्राप्ति कही है । इससे योनि - दोष दूर होकर पुरुष - संतान उत्पन्न हुआ करती थी । आजकल डाक्टर लोग भी इन्हीं दिनोंमें स्त्रीको कोई ऐसी ओषधि खिलाते हैं और शर्त बाँधते हैं कि अवश्य बालक ही होगा ।. बालकका महत्त्व सभी जानते- मानते हैं । वह हमारे वंश-कुलकी, हमारी सम्पत्ति तथा वेदादिकी सम्पत्तिकी वृद्धि करता है, हमारे पितरोंकी सद्गति तथा हमारे पितृ ऋणका शोधन करता है, हमारा उत्तराधिकारी बनता है । इसीलिए वेदमें भी उस पुत्रके लिए ही प्रार्थना आई है; क्योंकि वेद अपना अधिकार पुरुषको ही देना चाहता है । इसलिए इस संस्कारका नाम भी पु'सवन रक्खा गया है । वेदमें कहा है- ' पुमांसं पुत्रमाधेहि ' ( अथर्व ० ६।१७११० ) ‘ पुमांसं पुत्रं जनय ' ( अ ० सं ० ३।२३।३ ) यहाँ पुत्रका ' पुमान् ' यह विशेषरण पुरुष - संतानको बता रहा है । अथर्ववेद-

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२२४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) गोपथ ब्राह्मण में कहा है- ' पुमांसः श्मश्रुवन्तः श्राश्मश्रुवः स्त्रियः ' ( १।३।७ ) ' जिनके दाढ़ी - मूंछ हों वे पुरुष हैं । जिन्हें दाढ़ी - मूंछ नहीं हैं वे खियाँ हैं । ' यहां भविष्य में होनेवाली दाढ़ी - मूंछ को ध्यानमें रखकर पुरुष संतानका यह लक्षण दिया गया है । ' तैस्त्वं पुत्रं विन्दस्व ' ( अ ० ३।२३।४ ) ( उनके द्वारा तुम पुत्र प्राप्त करो । ' ) ' आ ते योनिं गर्भ एतु पुमान् ' ( अ ० ३।२३।२ ) ( ' तुम्हारी योनिमें पुरुष - गर्भका आगमन हो । ) पुमानका बलशाली अर्थ भी हो सकता है - वह भी अबला - संततिकी इष्टाभावताको ही द्योतित करता है । ' विन्दस्व पुत्रं नारि ' ' दश अस्यां पुत्रान् आधेहि ' ( ऋ ० सं ० १०।८५।४५ ) ‘ कृपणं दुहिता, ज्योतिर्ह पुत्रः ' ( ऐत ० ब्रा ० ७११३ ) ' पुत्रं ब्राह्मणा इच्छध्वम् ' ' स वैलोको वदावदः ' ( ऐ ० ७१३५ ) ' ऋरणमस्मिन् सन्नमयति अमृतत्वं च गच्छति । पिता पुत्रस्य जातस्य पश्येच्चे-जीवतोमुखम् । ( ऐ ० ३।१ ) ' तौ एहि सम्भवाव, सह रेतो दधाव है, पुसे पुत्राय वेत्तवै, ( तै ० ना ० ३७११६ ) ' पुमान् गर्भस्तवोदरे ' ( गोभिलगृ ० २।६।३ ) ( ' नारी! तुम्हें पुत्र प्राप्त हो ' ' इस स्त्रीके गर्भ में क्रमशः दस पुत्रोंका आधान करो ' ' दुहिता कृपण है, ' पुत्र ही ज्योति है ' ' ब्राह्मणो! पुत्रकी इच्छा करो ' ' वही वदावद लोक है, ' ' यदि पिता उत्पन्न हुए जीवित पुत्रका मुख देख ले, तो वह अपना पैतृक ऋण उतारकर उसीपर रख देता हैं और स्वयं अमृतत्वको प्राप्त होता है, ' अतः आओ हम दोनों समागम करें, पुरुष - पुत्र की प्राप्तिकेलिए एक साथ रज - वीर्यका आधान करें ' ' तुम्हारे उदर में पुरुष गर्भ है । )

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पुंसवन संस्कार - रहस्य २२१ वेद तो यहाँतक कहता है- ' जायमानं मा पुमांसं स्त्रियं क्रन् ' ( अथर्व ० ८६२५ ) अर्थात् हो रहा हुआ पुरुष स्त्री न बन जाय, जिसकी पुंसवनकी असफलतामें सम्भावना हो सकती है । ' आग्निवेश्यगृह्यसूत्र ' ( १ | ५ | ५ ) में भी कहा है- ' पुमान् स्त्री जायतां गर्भे अन्तः ' ( स्त्री गर्भ अन्दरसे पुरुष बन जाय । ) ' पुमांसं गर्भमाधत्स्व, पुमांस्ते पुत्रो नारि ते पुमान् अनुजायताम् । ' ' पुमान् अयं जनिष्यते ' ( गोभि ० २२७/१५ ) ' पुरुष- गर्भको धारण करो । नारी! तुम्हारा पुत्र पुमान् ( मर्द ) हो । तुमसे बार - बार पुरुषका जन्म हो । ' ' यह पुरुष जन्म लेगा । ' इसी पुत्रके उत्पादनार्थ अजीता ओषधिको नाकके द्वारा देते थे, जैसे कि श्राश्वलायनगृ ० ( १ । १३ । ५ ) में कहा है । जिसका मूल वेद में भी मिलता है- ' तास्त्वा पुत्रविद्याय ( पुत्रलाभाय ) दैवीः प्राबन्तु ( सहाया भवन्तु ) श्रोषधयः ' ( अथर्व ० ३।२३।६ ) ' पुत्रकी प्राप्तिकेलिए दिव्य ओषधियाँ तेरी सहायता करें । ' ) स्वामी दयानन्दजीकी ‘ संस्कारविधि ' में भी कहा है- ' पु ' सवन-संस्कार करना चाहिये, जिससे पुरुषत्व अर्थात् वीर्यका लाभ होवे ' ( पृ ० ४७ ) जब ओषधिविशेषसे गर्भाशयस्थित वीर्यको लाभ अर्थात् सहायता पहुँचेगी, तब वीर्यके प्राबल्यसे रजकी शक्ति कम होकर कन्या उत्पन्न न होकर पुत्र ही उत्पन्न होगा । इसलिए उक्त ' संस्कारविधि'में — पुमान् गर्भस्तवोदरे ' ' पुमांसं पुत्रं विन्दस्ख, ते पुमान् अनुजायताम् ' ( मं ० ना ० १।४।८-६ ) ये मन्त्र पुंसवनमें आये हैं । १५ स ० ध ०

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२२६ श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) वैदेशिक भी पुत्रका गौरव मानते हैं । भारतीयोंका तो क्या कहना? भारतीय विद्वान् उसे ' पुत् ' नामक नरकसे बचानेवाला मानते हैं, क्योंकि वह मरणमें पिता - माताको पिण्डदान करके उनकी सद्गति कराता है । जैसे कि निरुक्तमें कहा है- ' पुत्र: -पुरुत्रायते, निपरणाद् वा, पुन्नरकं ततस्त्रायते - इति वा ' ( २।११।१ ) यही बात अथर्ववेदके ' गोपथब्राह्मण ' में भी कही गई है-' पुन्नाम नरकम् अनेकशततारम्, तस्मात् त्राति पुन्नः, तत् पुत्रस्य पुत्रत्वम् ' ( १।१।२ ) यही बात ' मनुस्मृति ' ( ६।१३८ ) में भी कही गई है । आर्यसमाजी विद्वान् श्रीतुलसीराम - स्वामीजीने भी इस पद्यको प्रक्षिप्त नहीं माना । यही का यही पद्य ' बोधायनीय गृह्यपरिभाषासूत्र ' ( १ । २ । ५ ), ' महाभारत ' आदिपर्व ( २३१।१४ ) तथा ' वाल्मीकिरामायण ' ( २।१०७ । १२ ), ‘ वैखानसगृह्यसूत्र ' ( ६२ ) आदि में भी कहा गया है । इससे इस संस्कारकी महत्ता सिद्ध होती है । इससे गर्भको शक्ति भी प्राप्त होती है । यह संस्कार ' मनुस्मृति ' में स्पष्ट तो नहीं है, पर उसको इष्ट है । आश्वलायनगृ ० तथा पारस्करगृ ० में आया है । वेद में तो स्पष्ट. ही है । इस संस्कार से कन्याका अभाव इष्ट नहीं । ' दशपुत्रसमा कन्या '. ( ‘ कन्या दस पुत्रोंके समान है ) यह भी भारतीय नाद ही है । उसके दान देनेसे जो पुण्य होता है वह और कहाँ मिलेगा पुत्र हमारे स्वार्थ की सिद्धि करता है, कन्या परार्थकी । पर प्रथम संतान अवश्य ही पुरुष हो - यह इस संस्कारका लक्ष्य है ।

पृष्ठ 257

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सीमन्तोन्नयनका - रहस्य २२७ ( ३ ) सीमन्तोन्नयनसंस्कारका रहस्य ।...... ' सीमन्तश्चाष्टमे मासि ' ( व्यासस्मृति ( १।१७ ) ' सीमन्तोन्नयन संस्कार आठवें मासमें होता है ' । इस संस्कारमें सीमन्तका उन्नयन करके यह बताया जाता है कि अब स्त्री. शृङ्गार न करे, पति - सहवास न करे; नहीं तो गर्भपतनकी आशङ्का रहती है तथा सन्तानके विचार गन्दे होते हैं । सीमन्त शब्दके आनेसे स्त्रियोंका केश रखना गर्भहिताधायक सिद्ध होता है । इससे संतान के मस्तिष्कपर प्रभाव पड़ता है । इसीसे कोई भी सधवा स्त्री केशों को नहीं मुडवाती । विधवाएँ इसीलिए केशोंको मुडवाती हैं कि अब हमें सन्तान उत्पन्न नहीं करनी है । जैसे कि - संन्यासी पुरुष केशोंको मुडवा देते हैं; स्त्रियोंका वैधव्य ही उनका संन्यास है । केशोंमें बल हुआ करता है । स्त्रीकी अपेक्षा अधिक स्थानों में केशवाला होनेसे ही पुरुष ' पुमान् ' कहा जाता है । दाढ़ी - मूछोंवाला होनेसे ही पुरुष स्त्रीकी अपेक्षा वलवान् होता है । मूछें पु ंस्त्वका चिह्न होती हैं । यह संस्कार छठे - आठवें मास में करना पड़ता है । इससे देव-पूजाद्वारा गर्भकी रक्षा होती है । कइयोंका विचार है कि इससे सन्तानकी मानसिक शक्ति बढ़ती है; इसलिए इसे मनके देवता. चन्द्रमाकी आरम्भिकस्थिति ( शुक्लपक्ष ) में किया जाता है । सिरमें विभक्त हुई ' पाँच सन्धियाँ सीमन्त होती हैं । ' पञ्च संधयः शिरसि विभक्ताः सीमन्ताःः तत्र आघातेन उन्माद्भयचेष्टानाशैर्मरणम् ( सुश्रुत ॰ ' शारीर ० ६८१ ) सीमन्तस्य उन्नयनस् उद्भावनम् इति सीमन्तोन्नयनम् । ·

पृष्ठ 258

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२२८ श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) इन सन्धियोंकी उन्नति वा प्रकाश होने से मस्तिष्क- शक्ति उन्नत होती है । इस समय गर्भ शिक्षण योग्य होता है । इन्हीं दिनों गर्भस्थ प्रह्लादको नारदका उपदेश और अभिमन्युको चक्रव्यूह --प्रवेशका उपदेश मिला था इसलिए दोनों इस विषय में अप्रतिभट बने । अतः माता - पिता इन दिनों में अपनी मानसिक स्थितिको अच्छी रखें । शास्त्रविरुद्ध व्यवहार न रक्खें । जबसे गर्भ में स्पन्दन एवं अनुभूति प्रवृत्त हो जाते हैं, तबसे बच्चे के मनपर संस्कार प्रारम्भ होने लग जाते हैं और वे उसके समस्त जीवनके भावी निर्माण तथा विकास में प्रभाव डालते हैं । यदि उस समय माता-पिता कुसंस्कारों तथा शास्त्रविरुद्ध व्यवहारोंको धारण करेंगे तो भीतरी वच्चेपर भी वैसा कुप्रभाव पड़ेगा । अच्छे संस्कारोंसे बच्चे के आगेके संस्कार भी उत्तम बनते हैं । ' नवे हि भाजने लग्नः संस्कारो नान्यथा भवेत् । ' यह संस्कार ' मनुस्मृति ' में तो स्पष्ट नहीं; परन्तु पारस्कर, आश्वलायन आदि गृह्यसूत्रों में आया है । ( ४ ) जातकर्मसंस्कार - रहस्य ।

स जातकर्मण्यखिले तपस्विना तपोवनादेत्य पुरोधसा कृते ।

दिलीपसूनुर्मणिर।करोद्भवः प्रयुक्तसंस्कार इवाधिकं बभौ ॥

( रघुवंश १८ ) जैसे ( खानसे निकली हुई मणि शानपर चढ़ाकर संस्कृत कर देनेके बाद अधिक चमकने लगती है, उसी प्रकार जब तपोवनसे आकर तपस्वी पुरोहित वशिष्ठजीने सम्पूर्ण जातकर्म संस्कार सम्पन्न

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जातकर्म - रहस्य २२६ कर दिया, तब दिलीपकुमार रघु अपने स्वाभाविक तेजसे अधिक प्रकाशित होने लगा । ) यहाँपर रघुके जातकर्म संस्कार से श्रीकालिदास ने रघुकी प्रकाशमानता बताई है । ' जाते जातक्रिया भवेत् ' ( व्यासस्मृति १।१७ ) ' बालकके जन्म लेनेपर जातकर्म संस्कार होता है । ' इस • संस्कार से लड़केको गर्भमें माताके रस पीनेका दोष हटता है । यह संस्कार पुत्रके जन्म - समय में किया जाता है । इसमें सोनेकी शलाकासे बालककी जिह्वापर असम मधु तथा घृत घिसाकर चटाया जाता है । यह बच्चेकी आयु और मेधा बढ़ानेवाली रासायनिक ओषधि वन जाती है । सुवर्ण वातदोषको शान्त करता है, मूत्रको स्वच्छ करता है, रक्तकी ऊर्ध्वगतिके दोषको दूर करता है । वह विषनाशक, स्मृति तथा पवित्रताकारक होता है । छोटे शिशुकी जिह्वापर उस सुवर्णको घिसाकर किये स्पर्शसे ही उस सुवर्णका गुण परमाणु-रूपसे वा विद्युदुरूपसे उसके अन्दर पहुँच जाता है, जैसा कि थर्मामीटरको जीभपर रखने से भीतरी ऊष्मा व्यतिरेकसे उसमें प्राप्त हो जाती है । यहाँ जिह्वाके स्पर्शसे उसका प्रभाव अन्दर पड़ता है; घृत और मधुके परमाणुओं से मिलकर अपूर्व प्रभावको उत्पन्न करता है । मधु लालाका संचार करता है, पित्तकोषकी क्रियाको बढ़ाता है । कफ - दोषको दूर करता है । यह रूपसुधारक, बलकारक, रक्त-संशोधक, त्रिदोषका शान्तिकर्ता होता है - ( सुश्रुत ० सूत्रस्थान ४५ अ ० ) । घृत वायु तथा पित्तको शान्त करता है; स्मृति, मेधा, कान्ति, " त

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२३० श्रीसनातनधर्मालोकं ( ५ ) ` स्वर, लावण्य, ओज, तेज एवम् आयुको बढ़ाता है- ' आयुर्वे घृतम् ' ( कृष्णयजुर्वेद तै ० सं ० २।३।२।२ ) विषैले परमाणुओंका नाशक भी होता है ( सुश्रुत ० सूत्र ० ४५।१ घृतवर्गे ) । प्रसवकी यन्त्रणा से सद्योजात शिशुकी रक्तगति ऊपरको हो जाती है, कफदोष वढ़ जाता है । उसकी डाँतड़ियों में काले रंगका मल इकट्ठा हो जाता है, उसके न निकलने में बच्चेको अनेक प्रकारकी पीड़ाए हो जाती हैं । जात-कर्म में की जाती हुई उक्त क्रिया और अभिमन्त्रणका प्रभाव इस समय जादूका काम करता है, शिशुका उपकार करता है, उसे जीवन - प्रदान करता है । जीवनकी वाधाओं को दूर करता है । इसमें कोई सन्देह नहीं कि संस्कारोंकी क्रियाएं स्वयं ही लाभ पहुँचानेवाली होती हैं; पर जब साथ ही अभिमन्त्रण - क्रिया होती ' है तो उसका विशेष महत्त्व हो जाता है; उससे अभ्युदय होता है । ' महाभाष्य में इस विषय में प्रकाश डाला गया है - ' अग्नौ कपालानि अधिश्रित्य अभिमन्त्रयते - ' भृगूणामङ्गिरसां धर्मस्य तपसा तप्यध्वम् ' इति । अन्तरेणापि मन्त्रमग्निर्दहनकर्मा कपालानि संतापयति, वेद-मन्त्रप्रयुक्तसंस्कारेण च धर्मनियमः क्रियते — - एवं क्रियमाणमभ्युद्य-कारि भवति । ' ( पस्पशाह्निक ) ' आगपर कपालोंको रखकर अभि-मन्त्रित करते हैं । ( मन्त्र पढ़ते हैं ) कि तुम सब भृगु और अङ्गिरा गोत्र वाले महर्षियोंके धर्मकी तपस्यासे तप जाओ । यद्यपि बिना ' मन्त्रके भी दाहक अग्नि कपालोंको तपा दे सकती है तथापि वेद-मन्त्रप्रयुक्त संकारद्वारा उसमें धर्मका नियमन किया जाता है । इस प्रकार किया हुआ कर्म अभ्युदयकारक होता है ।