सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 241–250

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 241–250

पृष्ठ 241

सनातन धर्मलोक ५, पृष्ठ 241 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

षोडश संस्कार - रहस्य २११ पृथक् न होनेपर भी. ' शुभे रौक्मे च कुण्डले ' ( १४।३६ पद्य ) में स्पष्ट है, सुश्रुत - चरकादिमें भी स्पष्ट है । दसवाँ संस्कार उपनयन मनु २।३६-६४ पद्यमें और ब्रह्मारम्भ २७१ - १४०-१७३ पद्यमें, ग्यारहवाँ केशान्त ( २।६५ ) श्लोकमें बारहवाँ स्नान ( समावर्तन ) २ । १०८ - २४५ श्लोकमें तथा ३।४ पद्यमें, तेरहवाँ विवाह - गृहाश्रम ३।२, ४/१ पद्यमें, चौदहवाँ वनवास ६ २ पद्य में, पन्द्रहवाँ परिव्रज्या ६ । ३३ पद्यमें कहा है । १६ वाँ पितृमेध मनुजीके मतमें पूर्व दिखाया ही जा चुका है । परन्तु कई विद्वान् पितृमेधकर्मको तो स्वीकार करते है. पर उसे संस्कार नहीं मानते । वस्तुतः वह भी शरीर - संस्कार ही है । उसके संस्कृत होने से ही वेदादिमें उसके आत्माकी सद्गति मानी जाती है । वेदमें इस प्रकारके मन्त्र आते हैं, जिनसे सूचित होता है कि मृतक कच्चा न रह जाय, पूरा जल जाय । ईसाई - मुसलमान आदिका संस्कारोंमें अधिकार न होनेसे ही उनके शरीरको भूमिमें गाड़ा जाता है, अग्निसंस्कार उनका नहीं किया जाता । ' नास्य कार्योऽग्निसंस्कारो न च कार्योदकक्रिया ' ( ५२६६ ) इस मनुजीके वचन से संस्कारानई बालकोंका भी अग्निसंस्कार कहा गया है; अतः वह भी संस्कारोंमें गिने जाने योग्य है । वस्तुतः संस्कारोंका वर्गीकरण किया जाय, तो यह स्पष्ट दीखता है कि मोक्ष - धाममें जानेकेलिए ब्रह्मचर्याश्रम, गार्हस्थ्याश्रम, वान-प्रस्थाश्रम, संन्यासाश्रम - यह चार जंक्शन स्टेशन हैं । यह शुक्रमें आनेके दिनसे लेकर आगकी लपटोंमें समा जानेतक जीवनको

पृष्ठ 242

सनातन धर्मलोक ५, पृष्ठ 242 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२१२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) सुसंस्कृत बनानेवाले हैं । इनमें वीर्य में जानेसे लेकर जन्मतक १ गर्भाधान, २ पुंसवन, ३ सीमन्तोन्नयन, ४ जातकर्म संस्कार हैं । फिर उसी जात ( उत्पन्न ) के साथ संबन्ध रखनेवाले ५ नामकरण, ६ निष्क्रमण, ७ अन्नप्राशन, ८ चूडाकरण, ६ कर्णवेध -- यह पांच संस्कार हैं । फिर ब्रह्मचर्याश्रमके १० उपनयन वेदारम्भ, ११ केशान्त, १२ समावर्तन — यह तीन संस्कार हैं कुल बारह संस्कार हुए । मनुजी से कहे केशान्तको ' वेदारम्भ ' कहना ठीक नहीं; अन्यथा वेदारम्भ १६ वें वर्ष में करना पड़ेगा - ' केशान्तः षोडशे वर्षे ' ( मनु ० २।६५ ) गोभिलके मतमें भी केशान्त समावर्तन है, वेदारम्भ नहीं । उपनयन के पीछे वर्णित होनेसे ' केशान्त ' वेदारम्भ नहीं हो जाता । फिर गृहस्थाश्रमका संस्कार ( १३ ) विवाह एवं अग्न्याधान है । तब ब्रह्मचर्याश्रम एवं गृहस्थाश्रमके सहचारी वानप्रस्थ आश्रम तथा संन्यास आश्रमका होना भी अनिवार्य है । वानप्रस्थ तथा संन्यासाश्रम्-में प्रविष्ट होनेकेलिए जो विधि अवलम्बित की जाती है, वही इन संस्कारोंकी विधि हो जाती है । अतः मनुस्मृतिकी शैलीसे हमने इन अन्तिम दो श्राश्रमोंको भी संस्कारोंमें स्थान दिया है; इस प्रकार यह अपने स्वतन्त्र संस्कार हुए । अन्तिमका नाम अन्त्य है - इसी को ' पितृमेध ' कहते हैं । मृतक शरीर केलिए वेदादि - शास्त्रों में ' पितृ ' शब्द आता है । इस प्रकार संस्कार चार आश्रमोंमें वर्गीकृत हैं । इन्हींसे मोक्षधामकी प्राप्ति होती है । संस्कारोंका संक्षिप्त रहस्य अब १६ संस्कारोंका संक्षिप्त रहस्य बताया जाता है यद्यपि

पृष्ठ 243

सनातन धर्मलोक ५, पृष्ठ 243 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

षोडशं - संस्कार - रहस्य: २१३ सनातनधर्मानुसार संस्कारोंका मुख्य प्रयोजन अदृष्ट ( धर्म ) -प्राप्ति ही है, हिन्दु धर्मका उद्देश्य भी यही है, पर संस्कारोंके कई दृष्ट प्रयोजन भी विद्वानोंने अनुभूत किये हैं; इससे ' सोना और सुगन्ध ' तथा ' एका क्रिया द्वथर्थकरी प्रसिद्धा ' यह न्याय चरितार्थ हो जाते हैं । हम उनके वैज्ञानिक एवं लौकिक रहस्य भी लिखने की चेष्टा करते हैं । ' स्मृतिसंग्रह ' में विवाहान्त संस्कारोंके निम्नलिखित फल लिखे हैं-गर्भाधानले वीर्यसम्बन्धी तथा गर्भसम्बन्धी पापका नाश होता -है; तथा क्षेत्रका संस्कारभी गर्भाधानका फल कहा गया है । पु'सवनसे गर्भमें पुरुष - चिह्न प्रकट होता है । सीमन्तोन्नयनका फल गर्भाधानके फलके समान ही जानना चाहिये । जातकर्मले गर्भस्राव-जन्य सारा दोष नष्ट हो जाता है । आयु एवं तेजकी वृद्धि तथा लौकिक व्यवहारकी सिद्धि - विद्वानोंने नामकरणका यह फल वर्णित किया है । सूर्यदर्शन से निश्चय ही आयुकी वृद्धि होती है । निष्क्रमणसे भी विद्वानोंने आयुवृद्धि बताई है । अन्नप्राशनसे गर्भमें माताका मल खाने आदिका दोष दूर होता है तथा बल, आयु एवं तेजको वृद्धि चूडाकर्मका फल कहा गया है । द्विजत्वकी प्राप्तिके साथ - साथ वेदाध्ययनके अधिकारकी प्राप्ति ऋषियोंने उपनयनका फल बताया है । ब्राह्म आदि आठ प्रकारके विवाहोंके फलस्वरूप उत्पन्न हुआ पुत्र पितरोंको तारनेवाला होता है । श्रेष्ठ ऋषियोंने विवाहका यही फलं व्यक्त किया है 1 । इसी प्रकार विवाहके द्वारा पत्नीके सहयोग से अग्निहोत्र आदि बन पाता है और उनका स्पष्ट फल स्वर्गकी

पृष्ठ 244

सनातन धर्मलोक ५, पृष्ठ 244 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२१४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) प्राप्ति है । इन मूल वचनोंके आधारपर पाठकोंके समक्ष इनपर विवेचना दी जाती है । ' कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतथं समाः । ' ( यजु ० वा ० सं ० ४०१२ ) इस प्रकार वेद कर्मोंकी आवश्यकताका निरूपण करता है । तब हमें इनपर ध्यान देना चाहिये । संस्कारों का फल मनुजीने इस प्रकार कहा है- ' वैदिकैः कर्मभिः पुण्यैर्निषे-कादिर्द्विजन्मनाम् । कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च ' ॥ ( २।३६ ) गार्भैर्होमैर्जातकर्मचौडमौञ्जीनिबन्धनैः । वैजिकं गार्मिक चैनो द्विजानामपमृज्यते ॥ ( २।२७ ) इन वचनोंसे संस्कारोंको पाप-मार्जन करनेवाले होनेसे इहलोकमें अभ्युदयार्थ और परलोकमें निःश्रेयसार्थं अवश्य करना चाहिये । इनसे जीवन कलापूर्ण हो जाता है । इनके रहस्यका प्रतिपादन करनेकेलिए हम प्राचीन तथा अर्वाचीन विद्वानोंके तथा अपने विचारोंका यथास्थान उपयोग करेंगे । १. गर्भाधान -रहस्य । ' गर्भाधानं प्रथमतः ' । ( व्यासस्मृति १ । १६ ) यह संस्कार पितृ ऋण के संशोधनार्थ और धार्मिक संततिके उत्पादनार्थ किया जाता है । इस संस्कारसे बीज एवं गर्भसे सम्बद्ध मलिनता नष्ट हो जाती है तथा क्षेत्रका संस्कार हो जाता है । इसमें कामभाव न करके धर्म - भाव किया जाता है । यह बालकका संस्कार नहीं; पर बालक बननेका संस्कार है । इसमें सावधानता न करने से बालकका भविष्य नष्ट हो जाता है । काममूलक - मैथुनसे सन्तान

पृष्ठ 245

सनातन धर्मलोक ५, पृष्ठ 245 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

गर्भाधान - संस्कार- रहस्य २१२ कामवाली उत्पन्न होती है; उसमें आगे चलकर व्यभिचारकी भी शङ्का रहती है । संस्काररूपसे वैध गर्भाधान होनेपर उसमें— ' अमावास्यामष्टमीं च पौर्णमासीं चतुर्दशीम् । ब्रह्मचारी भवेन्नित्य-मप्यृतौ स्नातको द्विजः ' ॥ ( मनु ० ४।१२८ ) ( स्नातक द्विजको चाहिए कि पत्नीका ऋतुकाल आने पर भी अमावास्या, अष्टमी, पूर्णिमा और चतुर्दशी तिथियोंको सदा ब्रह्मचर्यका ही पालन करे ) । ' इन अमावास्या, अष्टमी, पूर्णिमा और चतुर्दशी आदिको ब्रह्मचारी रहने आदि नियमों का पालन अनिवार्य होनेसे धर्मानुकूलता आ जाती है । ' धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ । ' ( गीता ७ । ११ ) ( भरतश्रेष्ठ! मैं सम्पूर्ण भूतोंमें धर्मानुकूल काम हूँ ) । ' प्रजन-श्चास्मि कन्दर्पः ' ( गीता १०।२८ ) ( मैं शास्त्रोक्तरीतिसे सन्तानकी उत्पत्तिका हेतुभूत कामदेव हूँ । ) इस प्रकार धर्मसे अविरुद्ध होने पर वही काम भगवद्रूप हो जाता है । यही समय भावी सन्तानके जीवनके मूल रखनेका होता है । इस समय माता - पिताकी मानसिक तथा शारीरिक स्थिति जैसी शुद्ध पवित्र होगी; बालकका मन. और शरीर भी उससे वैसा ही प्रभावित होगा । यदि माता - पिता केवल कामवासना रक्खेंगे तो उनकी सन्तान भी वैसी ही कामी होगी । अतः गर्भाधानके समय शरीरकी नीरोगताके साथ माता - पिताका मन भी स्वस्थ और धर्मान्वित हो-यह आवश्यक है । तब माता - पिताके विचार गर्भ - समय में जैसे होंगे- -उनका पुत्र भी वैसा ही होगा । जैसे कि सुश्रुतसंहिता शारीर-

पृष्ठ 246

सनातन धर्मलोक ५, पृष्ठ 246 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

- ५१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) स्थानमें कहा है - ' आहाराचारचेष्टाभिर्यादृशीभिः समन्वितौ । स्त्रीपुंसौ · समुपेयातां तयोः पुत्रोऽपि तादृशः ' ॥ ( २२४६।५० ) ( ' स्त्री और पुरुष - जैसे आहार, व्यवहार तथा चेष्टा आदि से युक्त होकर परस्पर समागम . करते हैं, उनका पुत्र भी वैसे ही स्वभावका होता है । ' ) गर्भावस्था में माता - पिता के खान - पानका स्थिति - परिस्थितिका, एक - एक शब्दका, जो उनके कान में पड़ता है, एक - एक दृश्यका जो • उनकी आँखोंके सामने उपस्थित होता है, एक- एक संकल्पका. जो . उनके मनमें उठता है, गर्भस्थ बालक पर प्रभाव पड़ता है;. अतः आदिम तीन गर्भके संस्कारों में माता - पिताको बड़ी सावधानी रखनी चाहिये । महाभारत के अनुसार अभिमन्युने चक्रव्यूहमें प्रवेश · तथा उसका भेदन मातृगर्भ में ही सीखा था, जब कि अर्जुनने अपनी गर्भवती पत्नी सुभद्राको सुनाया था । जब अर्जुन चक्रव्यूहसे . निर्गमनका प्रकार सुभद्राको सुना रहे थे, उस समय उसे नींद आ गई थी, सुभद्रा नहीं सुन सकी; इसीसे गर्भस्थ अभिमन्यु भी उसे नहीं सीख सका; अतः वह उससे निकलने में सफल न होकर मारा गया । इसीसे समन्त्रक गर्भ संस्कार की आवश्यकता सिद्ध होती है । प्रह्लाद दैत्य- माता - पिताका पुत्र होने पर भी गर्भावस्थामें : नारदजीका उपदेश पानेसे महान् भगवद्भक्त बन गया — यह घटना पुराणोंमें सुप्रसिद्ध है । महाराष्ट्र - राष्ट्रपति शिवाजी के इतने प्रतापी होनेका कारण भी यही बताया जाता है कि उनकी माता जीजाबाई सदा उसी प्रकारके विचारोंसे युक्त रहती थी । नेपोलियन बोनापार्ट -की अतुल शूरवीरता और अदम्य साहस एवं उत्साहका कारण भी

पृष्ठ 247

सनातन धर्मलोक ५, पृष्ठ 247 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

गर्भाधान - संस्कार - रहस्य २१७ यही था कि उसकी गर्भवती माता रणक्षेत्र में रहा करती थी और शूरवीरोंकी गाथाएँ प्रतिदिन सुना करती थी । मातामें भी पहलेसे जैसे संस्कार पड़े होते हैं, उसका गर्भदोहद भी उसी प्रकारका होता है । गर्भका दोहद पूर्ण करने पर बालकमें भी पूर्णता होती है । सुश्रुत शारीरस्थानमें दोहदों के भिन्न - भिन्न फल लिखे हैं । जैसे कि— ' राज संदर्शने यस्या दोहदं जायते स्त्रियाः । अर्थवन्तं महाभागं कुमारं सा प्रसूयते । (.३।२२।२५ ) ( ' जिस गर्भवती स्त्रीको राजांके दर्शनकी इच्छा होती है, वह परम सौभाग्यशाली और धनवान् पुत्र उत्पन्न करती है । ' ) देवताप्रतिमायां च [ दोहदे ] प्रसूते पार्षदोत्तमम् । दर्शने व्यालजन्तूनां हिंसाशीलः प्रजायते ' ॥ ( ३।१४।२७-२८ ) इत्यादि । ( ' देवमूर्तियोंके दर्शनकी इच्छा होने पर वह श्रेष्ठ भगवद्भक्त बालक को जन्म देती है । सर्पों तथा हिंसक जन्तुओं के दर्शनकी इच्छा होने पर उसके गर्भसे हिंसक स्वभावका बालक पैदा होता है । ) इस प्रकार समक्षस्थित दृश्यके प्रभावका यह उदाहरण प्रसिद्ध है कि एक अमेरिकन रमणीके शयनागार में एक हब्शीका चित्र सामने दीवाल पर टँगा हुआ था । सदा - सर्वदा उस पर दृष्टि पड़ते रहने से उसका लड़का भी काला हब्शी- जैसा उत्पन्न हुआ, जिससे उस अमेरिकनको अपनी पत्नीके चरित्र में भी सन्देह उपस्थित - होगया था । पीछे पता लगने पर सन्देह दूर हुआ । किन्हींकी सन्तान बन्दरों - जैसी, किन्हीं भारतीयोंको सन्तान चीन आदि भिन्न देशीयों - जैसी होजाती है; अतः गर्भावस्था बहुत सावधानताका

पृष्ठ 248

सनातन धर्मलोक ५, पृष्ठ 248 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२१८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) समय है । इस समय गर्भिणी स्त्रीका सिनेमाओं में जाना. तो अत्यन्त ही हानिप्रद है; क्योंकि अच्छे - से - अच्छे चलचित्रमें भी कामवासना - वासित शृङ्गार रक्खा जाता है, जिससे गर्भस्थ बालक पर भी उसका दुष्प्रभाव पड़ना अनिवार्य होजाता है । फलतः इन आदिम तीन संस्कारों में माता - पिताको सदा कुलपरम्परासे चले आते आचार - विचार एवं व्यवहारका पालन अवश्य करना चाहिये । यह संस्कार मनुस्मृति, आश्वलायनगृ ०, पारस्करगृ ० आदि में आया है । वेदमें भी स्पष्ट आया है । पर्वमें गर्भाधान - निषेधका रहस्य । ' पर्ववर्जं ब्रजेच्चैनाम् ' ( मनु ० ३।४५ ) पर्वोको छोड़कर अन्य तिथियों में ऋतुस्नाता पत्नीके पास जाय । ' अमावस्यामष्टमों च पौर्णमासीं चतुर्दशीम् । ब्रह्मचारी भवेन्नित्यमप्यृतौ स्नातको द्विजः ' ( मनु ० ४।१२८ ) इसमें कहा हुआ अमावास्या, पूर्णिमा, अष्टमी श्रादिमें स्त्रीगमनका निषेध केवल शास्त्रोक्त नहीं, अपितु वैज्ञानिक भी है । समुद्रमें सबसे अधिक ज्वार - भाटा पूर्णिमा में, सबसे कम अमावस्यामें हुआ करता है । मध्यम ज्वार - भाटा वह होता है, जहाँ जलका उतार - चढ़ाव मध्यम हो - यह दोनों अष्टमियोंका समय है । यह सूर्य - चन्द्रके आकर्षण - विकर्षण से नियमानुसार होता है 1 । जैसे— सूर्य - चन्द्र दोनोंका प्रभाव समुद्र वा नद - नदी, तालाबों तथा फलों पर पड़ता है, वैसे ही प्राणियोंके रक्त पर भी पड़ता है; क्योंकि— रक्त भी जलका ही भाग है । चन्द्रमाका प्रभाव पुरुषकी अपेक्षा स्त्री पर अधिक पड़ता है । उक्त तिथियों में स्त्री - पुरुषों की वीर्य आदि

पृष्ठ 249

सनातन धर्मलोक ५, पृष्ठ 249 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

गर्भाधान - संस्कार - रहस्य २१६ धातुएँ विषम होती हैं, अतः यदि इन पर्वोंकी रात्रियों में स्त्री - सम्पर्क किया जाता है तो वैषम्यापन्न शुक्रशोणित विकृत होकर स्वास्थ्यको विकृत कर देते हैं; और इन अवसरोंपर यदि गर्भस्थिति होजाती है तो भावी सन्तान रक्तविकार - दोषवाली, फोड़े - फुन्सी आदि व्रणोंवाली, प्राणशक्तिमें दुर्बल तथा हृदयदोष ( जिससे हार्ट - फेल होजाता है ) आदि बीमारियोंको भोगनेवाली होती है । इसके अतिरिक्त पूर्णिमा देवतिथि है, अमावास्या पितृतिथि और अष्टमी दोनोंकी सम्बद्ध तिथि है । अतः अपने बड़ों के इन विशिष्ट दिनों में स्त्री - संयोग करना अपनी धृष्टता या निर्लज्जताको भी सिद्ध करने वाला होता है । यही कारण है कि पहले समयके लोग इस अवसर पर यज्ञ - व्रत - उपवास आदिका अनुष्ठान करते थे; इसी कारण इन दिनों में वेदोंका अनध्याय भी हुआ करता था । दिनमें गर्भाधानका निषेध । यह संस्कार स्त्रीके ऋतुस्नानके समय तथा गर्भाधानकी योग्यता होने पर करना चाहिए । यह ऋतु प्राकट्यके पाँचवें दिनसे सोलहवें दिन के अन्दर तक, क्योंकि इतने ही दिनों तक स्त्रीमें ऋतु रहता है - अर्धरात्रिके समय करना चाहिये । दिनमें गर्भाधान करना शरीर और मनकेलिए हानिकारक है । प्रश्नोपनिषद् में कहा है- ' अहोरात्रो वै प्रजापतिः । तस्य अहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः । प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति, ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते, ब्रह्मचर्यमेव तद् यद् रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते । ( १।१३ ) ( ' दिन और रातका जोड़ा ही प्रजापति है । उसका दिन ही प्राण है तथा रात्रि

पृष्ठ 250

सनातन धर्मलोक ५, पृष्ठ 250 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२२० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ही रयि है । अतः जो दिनमें स्त्री - सहवास करते हैं, ये लोग सचमुच अपने प्राणों को ही क्षीण करते हैं तथा जो रात्रि में बी-सहवास करते हैं, उनका वह सहवास भी ब्रह्मचर्य ही है । ) यहाँ पर दिनको रति करना प्राणोंका क्षीण करना बताया है, रान्त्रिकी रतिको ब्रह्मचर्यावलम्बन कहा है । दिनमें सूर्यमूलक ऊष्मा होने से किया गया गर्भाधान प्राणोंकी - बलकी हानि करनेवाला होता है । इसका फल सन्तानको भी भोगना पड़ता है; श्रतः माता - पिता बननेवालोंको इधर भी अवश्य ध्यान देना चाहिये । पुत्र या कन्याकी उत्पत्तिका रहस्य । रजस्वलात्वकी विषम रात्रियोंमें ऋतुका वेग बहुत रहता है और सम रात्रियों में कम । ऋतुका पहला दिन विषम होता है, इसमें ऋतुका वेग बहुत हो — यह स्वाभाविक ही है । दूसरा दिन सम होता है - इसमें रजका वेग अधिक होने पर भी अपेक्षाकृत कम होता है । फिर तीसरे विषम दिन रजका पुनः प्राबल्य होजाता है । इन तीन रात्रियों में तो गर्भाधानका सर्वथा निषेध है । फिर चतुर्थ - समरात्रि में रजका वेग कम होता है । इस प्रकार विषम रात्रियोंमें रजका वेग अधिक और सम रात्रियों में कम होता है । सम रात्रि में स्त्रीगमन करनेसे रजका वेग कम होनेके कारण शुक्र प्रबल बन जाता है; अतः ऋतुकी सम रात्रिमें गर्भ स्थापित होनेसे-• ' पुमान् पुंसोऽधिके शुक्रे ' ( मनु ० ३।४६ ) युग्मासु पुत्रा जायन्ते ' ". ” । " तस्माद् युग्मासु पुत्रार्थी संविशेदार्तवे स्त्रियम् ' ॥ ( ३ | ४८ ) ( ' स्त्री-• सहवास के समय यदि पुरुषका वीर्य रंजकी अपेक्षा अधिक हुआ