सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 321–330
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 321–330
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विवाह तथा अग्न्याधानका रहस्य २६३ इत्यादि द्वारा वस्त्र - प्रदान करता है, वैसे ही विवाह में भी वर उक्त मन्त्रसे वधूको वस्त्र प्रदान करता है । उपनयनमें वहीं आचार्यद्वारा ब्रह्मचारीका सांगुष्ठ दक्षिणहस्त ग्रहण किया जाता है, वैसे विवाह में वर भी पत्नीका सांगुष्ठ पाणिग्रहण करता है. इत्यादि । अतः विवाह ही कन्याका द्विजत्व - सम्पादक उपनयनरूप है, इससे अलग कन्याका उपनयन संस्कार नहीं होता । यह दारपरिग्रह करना ही गृहाश्रम - संस्कार है, उसी विवाहाग्निको विधिपूर्वक कन्याके गृहसे मण्डपसे लाकर उस अग्निको पति अपने जीवनतक अपने घरमें रखता है । उसीमें अपने पञ्चमहायज्ञ आदि स्मार्तकर्म करता है, इसीको आवसथ्याधान वा स्मार्ताग्निपरिग्रह वा गृह्याग्नि, औपासनाग्नि वा वैवाहिकाग्नि कहा जाता है । इसीमें वैश्वदेव, नैत्यिक - होम आदि करना पड़ता है । पत्नीकी सहायतासे तथा उसको अपने साथ बैठाकर यह सब कर्तव्य करना पड़ता है । पत्नीको भी अभिन्न एवं सहायक होने से इसका फल मिलता है । पत्नीको सदा उस अग्निकी रक्षा करनी पड़ती है कि वह अग्नि बुझे नहीं, उसी अग्निसे पाक - क्रिया भी करनी पड़ती है । जैसे कि मनुस्मृतिमें कहा है- ' वैवाहिकेऽग्नौ कुर्वीत गृह्य कर्म यथाविधि । पञ्चयज्ञविधानं च पक्तिं चान्वाहिकीं गृही | ( ३ | ६७ ) ( ' गृहस्थ वैवाहिक अग्निमें विधिपूर्वक गृह्य कर्म- -अग्निहोत्र आदि पञ्चयज्ञका अनुष्ठान और प्रतिदिनकी रसोई करे । ' ) ' वैश्वदेवस्य सिद्धस्य गृह्य ऽग्नौ विधिपूर्वकम् । अभ्यः कुर्याद् देवताभ्यो ब्राह्मणो होममन्वहम् । ( ३/८४ ) ' ब्राह्मण वैवाहिक अग्निमें
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२६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) विधिपूर्वक तैयार किये हुए विश्वेदेवसम्बन्धी अन्नका इन देवताओं-केलिए प्रतिदिन होम करे । ' इसी अग्निमें पक्षादिकर्म भी करने पड़ते हैं । इसीका दूसरा अङ्ग त्रेताग्निसंग्रह वा श्रौताधान वा वैज्ञानिक कर्म आदि हैं । इसमें दर्श, पौर्णमास आदि वैदिक यज्ञ करने पड़ते हैं । पत्नीको यज्ञशाला से भिन्न देशान्तरमें जानेका निषेध है; तभी उसका ' गृहपत्नी ' नाम सार्थक है । इस कार्य में त्रुटि न पड़े, इसलिए यहाँपर बहुपत्नीविवाह भी संकेतित होता है; क्योंकि एक ही पत्नीके होनेपर उसके भिन्न स्थान में जानेपर विवाहाग्नि नष्ट हो जाती है । फिर प्रायश्चित्तपूर्वक पुनराधान करना पड़ता है; अथवा उसी एक पत्नीके रजस्वला होनेपर यज्ञमें उपस्थिति सम्भव न होनेसे यज्ञ अपत्नीक होनेके कारण अप्रशस्त हो जाता है; उस समय अन्य पत्नी उसका कार्यनिर्वाह कर देती है । यदि एक-. पत्नीव्रत ही इष्ट हो तो सुवर्णमय सीता की तरह कुशकी स्त्री, वा स्त्रीका प्रन्थिबन्धनवाला वस्त्र ही उसका प्रतिनिधि मान लेना पड़ता है । पर उस पत्नीकी मृत्यु हो जानेपर उसी अग्निसे उसका दाह . करके वह अग्नि समाप्त कर दी जाती है, फिर अन्य अग्निके आधानकरणार्थ अन्य विवाह करना पड़ता है । यदि पतिकी मृत्यु हो जाय तो उससे पतिका संस्कार कर दिया जाता है । पत्नीका स्वतन्त्र अग्न्याधान न होनेसे वह न फिर नूतन अग्न्याधान कर सकती है, न विवाह । वह वैधव्य उसका संन्यास - स्थानीय होता है । संन्यासी भी अनग्नि ( अग्नि - रहित ) होता है ।
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विवाह तथा अग्न्याधानका रहस्य २६१ यदि पति अपनी पत्नीकी मृत्यु हो जाने पर अन्य आधान तथा अन्य विवाह न करना चाहे तो वह गृहस्थ आश्रम में रह नहीं सकता । अग्नि न होने से वानप्रस्थ में भी नहीं रह सकता । उसे संन्यासमें चला जाना चाहिये । नहीं तो — ' एवं वृत्तां सवर्णां स्त्रीं द्विजातिः पूर्वमारिणीम् । दाहयेदग्निहोत्रेण ( श्रौतस्मार्ताग्निभिः ) 6 यज्ञपात्रैश्च धर्मवित् । भार्यायै पूर्वमारिण्यै दत्त्वाऽग्नीनन्त्यकर्मणि । पुनर्दारक्रियां कुर्यात् पुनराधानमेव च । ( मनु ० ५।१६७-१६८ ) ( ' धर्मज्ञ द्विज ऐसे चारवाली अपनी सजातीय पत्नीकी अपने से पहले मृत्यु होनेपर अग्निहोत्रकी अग्नि तथा यज्ञपात्रोंद्वारा उसका दाह - संस्कार करे । पहले मरी हुई पत्नीको अन्त्येष्टिकर्मके समय आग देकर गृहस्थ मनुष्य पुनः पत्नी - परिग्रह और अग्निस्थापन करे । ' इस प्रकार पुनर्विवाह कर यज्ञादि धर्म - कर्म में संलग्न रहे, केवल कामसे नहीं । इस प्रकार अपने नित्य - नैमित्तिक कर्तव्य करते रहनेसे-' महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः ' ( मनु ० २।२८ ) ( ' पञ्च महा-यज्ञों तथा ज्योतिष्टोमादि - यज्ञों द्वारा यह शरीर ब्रह्मप्राप्तिके योग्य बनाया जाता है । ' ) ब्राह्मी गति ( मुक्ति ) प्राप्त होती है । इसके अतिरिक्त यज्ञोंसे वृष्टि आदि होनेपर अन्नकी समृद्धि होने से देशका तथा अपना उपकार होजाता है । अङ्गरूप देवपूजा से अङ्गी महान् देवकी पूजा भी हो जाती है । गृहाश्रम २५ वर्षसे लेकर ५० वर्ष तक अवलम्बन करना पड़ता है । ब्रह्मचर्यमें संहिताओंका अध्ययन करना पड़ता है; आचार्यकी अग्निमें केवल समिदाधान करना पड़ता है, गृहस्थ
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२३६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) में वेदके ब्राह्मण - भागका अभ्यास तथा तत्प्रोक्त अनुष्ठान, संहिताहोम आदि करना पड़ता है । इसमें यथासमय पूर्वोक्त गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन संस्कार द्वारा सन्तानकी प्राप्ति करके उनका पालन - पोषण, लड़केका यथासमय आचार्य - कुलमें प्रेषण तथा लड़कियोंका रजःकालसे पूर्वतक पोषण, संरक्षण, गृहकार्यशिक्षण तथा यथासमय उनका विवाह कर देना पड़ता है । यहाँ तक १६ संस्कारोंकी विधि पं ० श्री भीमसेनजी - इटावाप्रणीत ' पोडश संस्कार-विधि ' में देख लेनी चाहिये । असवर्णाविवाह निषेध - सवर्णाविवाहकी व्यवस्था के प्रश्नको आजके आलोचक वेदशास्त्रोंके प्रमाणोंसे नहीं मानते; वैज्ञानिक अन्वेषणाओं अनुसन्धानोंसे कदाचित् मान जायँ । उसमें असवर्णाविवाहके निषेधके विषय में वेदादि - शास्त्रों के प्रमाणों से उपनिबद्ध निबन्ध अन्य पुष्पोंमें प्रकाशित होगा । यहांपर उसके विषय में विज्ञानके नवीनानुसन्धानको रखते हैं । शिकागो नगरके डाक्टर इब्राहीम जगत्के एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक हैं । अमेरिकाके ' न्यूसाइन्स भूफिटिङ्ग ' नामक पत्र में उनके लेख प्रकाशित हुआ करते हैं । उन्होंने सवर्णा- असवर्णाविवाहकी व्यवस्थाके विषयमें पर्याप्त विचार किया । २५ साल प्राणियोंकी रक्तपरीक्षाके बाद उन्होंने अद्भुत बातोंके ज्ञापक यन्त्र बनाये । रक्तकी प्रथम परीक्षासे उन्होंने अनुसन्धान किया कि काम, क्रोध, लोभ, मोहकी अवस्थामें भी इनका परिवर्तन हो जाता है । उससे मनुष्यका विषयीपन, क्रोधीपन, अथवा ईर्ष्या - द्वेष पहिचाना जाता
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सवर्णाविवाह निषेध २६७ है । कभी किसीके रुधिरमें लवणका परिमाण अधिक होता है; किसीके रक्तमें कम । इससे मानुषिक प्रेमकी परीक्षा ठीक - ठीक हो सकती है । दूसरी परीक्षा रक्तके मिश्रणसे होती है । उक्त वैज्ञानिकने ' आसीलोखोट ' नामक यन्त्रका आविष्कार किया है । अमेरिकाके न्यायालय इस यन्त्रका प्रयोग करते हैं । इस यन्त्र से जाना जा सकता है कि अमुक पुरुष अपने पिताकी सन्तान है, या नहीं? अथवा उसकी माताके व्यभिचारसे उसके रक्तमें संकर है क्या? अर्थात् यह परीक्षा हो सकती है कि छामुक स्त्री सती है या व्यभिचारिणी? दूसरा यन्त्र है सीतापरीक्षा । विवाहसे पहले इस यन्त्रकी परीक्षा होती है । इस यन्त्रमें दो विभाग हैं; वे सदा कांपते रहते हैं । उनमें से एक में पुरुषका रक्त, और दूसरे में स्त्रीका रक्त रखकर परीक्षा की जाती है 1 । रक्तवाले दोनों भाग जब आपस में मिलते हैं; तो उसमें तीन प्रकारके परिणामका पता चलता है । ( १ ) जब निकटतम सम्बन्धी स्त्री - पुरुषोंके रक्तको इसमें रखा जाता है; तो उनके मिश्रण के बाद उन रक्तोंका स्पन्दन शान्त हो जाता है । ( २ ) सर्वथा असम्बद्ध स्त्री - पुरुषोंका रक्त जब रखा जाता है; तब उनकी गति तीव्र हो जाती है । ( ३ ) यदि समान जातिवाले स्त्री - पुरुष हों; परन्तु निकट सम्बन्धी न हों; तो उनके रक्त - संयोग होने पर कांपते हुए वे विभाग जब मिलते हैं; तो दोनोंकी गति पूर्ववत् चालू रहती है, कुछ भी उनमें परिवर्तन नहीं होता ।
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२६८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) इन परिणामोंका अभिप्राय डाक्टर महाशय यह बताते हैं कि जहां निकट - सम्बन्ध में विवाह हो; वहां पुत्र अथवा पौत्र, अथवा प्रपौत्रको भयानक रोग हो जायेंगे । दो - तीन पीढ़ियोंके बाद उस वंशका उच्छेद हो जावेगा । ( हमारे पूर्वजोंने भी इसीलिए प्राचीन-कालसे इसका निषेध कर रखा था - ' असपिण्डा च या मातुरस-गोन्ना च या पितुः । सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने ' ( मनु ० ३।५ ) यहां माताकी छः - सात पीढ़ियां, तथा पिताके गोत्रवाली लड़कीके साथ विवाह निषिद्ध किया है । जहां सर्वथा भिन्न वर्णके स्त्री - पुरुषों का विवाह होगा; वहां कुछ समय के बाद रक्त अपवित्र - विकृत हो जायगा । माता - पितामें जो नीच होगा, उसके कारण से सन्तान नीच होगी । सन्तानमें उससे भी अधिक दोष होंगे । ( इसीलिए कदाचित स्मृतियोंमें वैसी सन्ततियोंका बहिष्कार प्रायः देखा गया है ) । उक्त डाक्टरने इन बातोंसे यह सिद्धान्त प्राप्त किया था कि विवाहार्थ समान जातिवाले स्त्री - पुरुष होवें; पर वे निकट - सम्बन्धके न हों, वही उचित विवाह है । परन्तु हमारे धर्मशास्त्रोंने तो लाखों वर्षोंसे पहले ही सपिण्ड - सगोत्र विवाहका निषेध कर रखा है । ( १४ ) वानप्रस्थ वा वनवासका रहस्य गृहाश्रमके बाद ५१ वर्षसे ७५ वर्ष तक वानप्रस्थाश्रम - संस्कार करना पड़ता है । इसमें घरका भार आचार्य कुल से लौटे हुए प्रथम पुत्र पर डालकर पत्नीके साथ अपनी गृह्य अग्निको लेकर वन में निवास करना पड़ता है, जिससे संन्यासकी योग्यता प्राप्त हो सके । यह एक शान्त जीवन होता है । इसमें शहर से दूर रहकर
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परिव्रज्या वा संन्यासका रहस्य २६६ परलोक - लाभार्थ धर्म - कर्म में संलग्न रहे । घरकी चिन्ता तथा गृहस्थके धन्धोंसे मुक्त हो जाय । इसमें मुख्यतया आरण्यकोंका स्वाध्याय करना पड़ता है, तपस्या तथा विविध व्रत आदि करने पड़ते हैं । संसारसे सम्बन्ध धीरे - धीरे हटाकर मुनिवृत्ति अवलम्बन करनी पड़ती है । यज्ञ यहाँ भी करने चाहिएँ । यहाँ मुख्यतया निष्काम कर्म करने पड़ते हैं । पचास वर्ष तक पूर्ण अनुभव हो जाने से मुनि लोग धर्म - प्रचारार्थ इन पच्चीस वर्षों में ५१ से ७५ तक वेदार्थ - व्याख्यानरूप ग्रन्थरचना भी करते थे, समाधि से · प्राप्त ज्ञान उनका सहायक होता था । उनको अन्नादिसे उदर - पूर्तिकी चिन्ता नहीं करनी पड़ती थी; देश उनको इस चिन्तासे मुक्त कर देता था । तब वे नये - नये अनुसंधान तथा आविष्कार करके लोक-हिताधायक नियमोंका प्रचार करके उनको ग्रन्थ - बद्ध करते थे । नास्तिक वा सनातनधर्म - द्वेषी लोगोंके तर्कोंका प्रत्युत्तर दार्शनिक-ग्रन्थ रूपमें निबद्ध कर देते थे । यही वानप्रस्थाश्रमका रहस्य है । ( १५ ) परिव्रज्या वा संन्यासका रहस्य । इसमें पूर्व सर्व कर्मोंका संन्यास ( त्याग ) करना पड़ता है । इसमें अग्निका भी त्याग करना पड़ता है, अग्नि लिवानेवाली स्त्रीको भी छोड़ना पड़ता है; क्योंकि स्त्री धर्म, अर्थ, काम इस त्रिवर्गका साधन है, चतुर्थ मोक्षका नहीं । मोक्ष - पथमें तो वह— ' एषा कण्ठतटे कृता खलु शिला संसारवारां निधौ ' - ( ' संसार-सागर में डूबनेवालों के लिए यह स्त्री गले में बाँधी हुई शिलाके समान है । रोड़ा रूप है । ) उसे अपने पुत्रोंके सहारे छोड़
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३०० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) दिया जाता है । इसमें पुत्रादि - सबसे अपना सम्बन्ध सर्वथा छोड़कर सदाचारी, दम्भरहित, निश्चल होकर मुमुक्षुत्वका अवलम्बन करना पड़ता है । साथ ही ग्रामग्राम में घूमकर उपदेश श्रादिसे जनोपकार भी किया जाता है; वह सांसारिक अव्यवस्था तथा अज्ञानको दूर करता है । संन्यासी पुरुष चलता - फिरता पुस्तकालय, चलता - फिरता ज्ञान होता है । सब सन्देहों का निराकर्ता होता है । तब उसका भोजन- निर्वाह भी देशको ही करना पड़ता है । यह सदा देशमें शान्ति - व्यवस्था भी करता है, जनहिताधायक सब कार्य करता है । इस आश्रम में ज्ञानका संचय करना पड़ता है । इसमें वित्तैषणा, लोकैषणा ( यश ), पुत्रैषणा आदि सभी एषणाओंका त्याग करना पड़ता है । इसमें तन, मन, धन अपने नहीं रहते । धनका तो वानप्रस्थके आश्रयण करते ही त्याग कर दिया जाता है; अब तन तथा मनको भी जनताकी भलाई में लगा दिया जाता है । इसमें गेरुए रंगके वस्त्र पहनने पड़ते हैं । गेरू रंग नेत्रहितकारी; दाह, पित्त, कफ, रुधिरविकार, ज्वर, विष, विस्फोटक, अर्श, रक्त, पित्तको हरनेवाला होता है । रक्तसंशोधक होनेसे त्वग् - रोग नहीं होते । इसमें कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड तक सीमित शिखा तथा यज्ञोपवीत - सूत्र तथा यज्ञोंका भी त्याग करना पड़ता है । ७६ वर्षसे लेकर शेष जीवन तक इस संन्यासाश्रमको ही अवलम्बन करना पड़ता है । वानप्रस्थाश्रम तक पुरुषका स्त्री तथा परिवारसे कुछ
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परिव्रज्या वा संन्यासका रहस्य ३०१ सम्वन्ध बना रहता है । ' यह मेरा है ' ' यह तेरा है ' ऐसा व्यवहार कुछ रहा करता है; परन्तु संन्यास में ' तेरा मेरा ' - भाव तनिक भी शेष नहीं रहता । यहाँ तो संसारसे पूर्ण वैराग्य करना पड़ता है । किसीकेलिए मोह, शोक नहीं करना पड़ता । निःस्वार्थता, निष्कामता रखनी पड़ती है । इसमें तो न कोई लड़का है न लड़की; न स्त्री; न भाई; न जमाई, न वहिन; न मित्र, न शत्रु, न अपना, न पराया । यहाँ तो ' वसुधैव कुटुम्बकम् ' करके उदारभाव अवलम्बन करना पड़ता है । संकुचितभाव न रहने से उसे मृत्यु-समय कोई चिन्ता नहीं होती । क्रमप्राप्त संहिताओंके ज्ञानकाण्डीय चार- सहस्र मन्त्रों एवं उपनिषदोंका इसमें मनन करके ज्ञानसंचय करना पड़ता है । इसमें भिक्षासे अपना निर्वाह किया जाता है । अधिक दिनों तक एक स्थान में स्थिति नहीं की जाती । मृत्यु हो जाने पर - अग्नि - त्याग हो जाने पर संन्यासीका दाह भी नहीं होता, किन्तु भूमिखनन वा जलप्रवाह ही हुआ करता है । कई विद्वान् ऐसा व्यवहार परमहंसकोटिवाले संन्यासियोंका ही मानते हैं; आदिम कोटिवाले संन्यासियोंका वे यज्ञ - त्याग वा अनग्नित्व स्वीकार नहीं करते; किन्तु उनका निष्काम - यज्ञ स्वीकार करते हैं और उसी यज्ञाग्निसे उसका दाह मानते हैं । संन्यास में ब्राह्मणोंका अधिकार होता है, कइयोंके मतमें समस्त द्विजोंका; पर शूद्र इसका सर्वथा अधिकारी नहीं । स्त्री भी नहीं । पर स्त्री-शूद्रोंका त्यागवृत्ति रूप अवैध संन्यास कहीं - कहीं ' संन्यास ' शब्द से वर्णित मिल जाता है ।
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३०२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) यद्यपि ' कलौ पञ्च विवर्जयेत् ' इत्यादि वचनोंसे कई हानियों का विचार करके संन्यासको कलिवर्जित किया गया है तथापि -' यावद् वर्णविभागोऽस्ति यावद् वेद: प्रवर्तते । संन्यासं चाग्निहोत्रं च तावत् कुर्यात् कलौ युगे । ' ( कलिमें जब तक वर्णोंका विभाग है और जब तक वेदी प्रवृत्ति है, तब तक कलियुग में अग्निहोत्र और संन्यास अपने अधिकार के अनुसार करे । इस पूर्ववचन के अपवादभूत देवल - वचनसे वह भी अपवाद रूप से कर्तव्य है । ( १६ ) पितृमेध वा अन्त्यकर्म यह संस्कार पितृमेध, अन्त्यकर्म, अन्त्येष्टि वा श्मशान आदि नामसे प्रसिद्ध है । आश्वलायन गृह्यसूत्रादि में इसका वर्णन है । कई गृह्यसूत्रों में इसका वर्णन नहीं मिलता, उसका कारण यह है कि-पहले गृह्यसूत्रोंके ' पितृमेधसूत्र ' पृथक् बने होते थे । जिनको संन्यास का अधिकार नहीं होता अथवा जिन्होंने कलियुगमें संन्यासका निषेध होनेसे वा अब्राह्मणता के कारण संन्यासमें अधिकार न होने सेवा ब्राह्मण होने पर भी अपनी वैसी योग्यता न देखकर संन्यासको स्वीकार नहीं किया, उनकी मृत्युमें अपनी गृह्याग्नि दाह होता है । उस पुरुषके पुत्र, सम्बन्धी आदि उसकी गृह्याग्निको उसके यज्ञपात्रसहित श्मशान में लाकर उसमें गृह्यसूत्रोक्त विधि अन्त्येष्टिकी आहुतियां देकर उसके उन सभी यज्ञपात्रों को श्राश्वलायन आदिके अनुसार मृतकके अङ्गपर रखकर फिर उस अग्निसे मृतकका दाहमात्र कर देते हैं । फिर उसकी उदकक्रिया - तर्पण आदि करके यथासमय