सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 311–320

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 311–320

पृष्ठ 311

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दैवाहिक विधियोंका रहस्य २८३ तात्पर्यके विषय हो सकते हैं । सो पहलेके तीन वर्गोंमें स्त्री पुरुषसे आगे ही रहती है । धर्मके कार्य में भी स्त्री पुरुषसे आगे ही रहती है— बढ़ी रहती है । अर्थ - धनके कार्य में भी । तभी श्रीमनुजीने स्त्रीकेलिए कहा है— ' अर्थस्य संग्रहे चैनां व्यये चैव नियोजयेत् ' ( १।११ ) ( स्त्रीको धनके संग्रह और व्ययके कार्य में नियुक्त करे । ) पति यदि संगृहीत धन स्त्रीके हाथमें दे, तो वह उसका उपयुक्त बैंक सिद्ध हो सकती है । इससे आपत्तिकालमें पुरुषको अर्थकष्टका मुख नहीं देखना पड़ता । काममें तो स्त्री अगुआ होती ही है । चतुर्थ परिक्रमा मोक्षकी होती है । मोक्षमें स्त्री मार्ग - प्रदर्शन नहीं कर सकती; अत; चतुर्थ परिक्रमा में स्त्रीको आगे न रखकर पुरुषको ही आगे रक्खा जाता है । चौथी परिक्रमाके वाद वाएँ ओर बैठाना - स्त्रीका वाम ओर बैठाना प्राचीनकाल से चालू हुई- हुई प्रथा है । उसमें कारण है कि स्त्री कोमलाङ्गी होती है; उसे दृढाङ्ग पुरुषकी रक्षाकी अपेक्षा होती है । इसी भावके द्योतक होते हैं पति - पत्नी शब्द । पति रक्षक है, पातीति पतिः । पत्नी रक्षणीय है । जैसा कि वेद कहता है-‘ ममेयमस्तु पोष्या ' ( अ ० १४ | १ | ५२ ) । शरीरके अन्दर कोमलतम एवं प्रेमका आधार अङ्ग हृदय होता है । उसे परमात्माने बाईं ओर रखा है; अतएव जब स्त्री पूर्ण पत्नी नहीं बनी तब वह भार्या ( भर्तव्या ) भी नहीं थी । इसलिए प्रेमका आधार और हमारा अभिन्न हृदय भी नहीं थी, और उसके परिवर्तनकी भी आशंका थी; अतः उसे पहले दाहिनी ओर बैठाया गया । जब उसमें पुरुषका

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) अधिकार हो गया तो चौथी परिक्रमा में उसे वरने जो उससे आगे चल रही थी अपने पीछे किया; फिर चौथी परिक्रमाके बाद वा सप्तपदी हो चुकने पर अपने हृदयकी भांति उसे बाईं ओर बैठा दिया जाता है | वह पत्नी भी हृदयकी भांति कोमल है, अतः प्रेम का आधार भी बन गई । कहीं कन्यादानादिके अवसर पर सुविधा केलिए कन्यादाताका अपनी पत्नीको दाहिने बैठाना अपवाद है । उत्सर्ग यही है कि उसे बाएँ ओर बैठाया जाय । अतएव स्त्रीका नाम ‘ वामाङ्गी ' प्रसिद्ध है । लाजाहोम का रहस्य शमीसे मिश्रित लाजाओंका अग्निमें हवन करनेसे जो परमाणु सूक्ष्म होकर निकलते है, वे विवाहित वर - वधू के लिए लाभप्रद होते हैं । वधूके तथा वरके भीतरी दोषोंको दूर करनेवाले होते हैं । उसीमें कन्या ' आयुष्मानस्तु मे पतिः, एधन्तां ज्ञातयो मम स्वाहा ' यह आकांक्षा करती है । वधू अपने भ्रातासे वे लाजा लेती है, पति अपने सहारेसे उसे डलवाता है; उसका यह तात्पर्य है कि दोनों मिलकर यज्ञकर्म किया करें । मन्त्रपाठ वर करता है; कभी कोई स्त्रीका मन्त्र - विशेष या जावे तो उसके प्रातिनिध्य से भी मन्त्र-पाठ कर लेता है । क्योंकि स्त्री में पूर्ण धातु तथा पूर्ण स्वर न होने से वह स्वर वर्ण आदिके पूर्ण उच्चारण में समर्थ नहीं होती, अतः वरका आश्रय उसे सदा अपेक्षित रहता ही है । अतः उसका स्वतन्त्रतासे यज्ञकर्ममें अधिकार नहीं रहता । ' वसिष्ठस्य पत्नी ' में वसिष्ठकी पत्नीको वसिष्ठकट क यज्ञकी फलभोकूत्री माना जाता है ।

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वैवाहिक विधियोंका रहस्य २८१ तब यज्ञ पति करता है, फल पत्नीको भी मिल जाता है; तभी तो दोनोंके वस्त्रको ग्रन्थिबद्ध करना होता है, हाथ उसमें स्त्रीका भी होता ही है । भाई द्वारा लाजाएँ इसलिए दिलवाई जाती हैं कि यह कन्या अभ्रातृका तो नहीं; कि कहीं इसे ' पुत्रिका - धर्म ' न करना पड़े, अर्थात् इसकी सन्तानका मैं मालिक न बनकर इस लड़कीका पिता ही कहीं मेरी सन्तानका मालिक बने । इसलिए मन्वादि धर्मशास्त्रों तथा वेदादिमें अभ्रातृका कन्याके विवाहका निषेध आया है । लाजाहोममें कन्या यह भी सूचित करती है कि- स्वामीजी! आपका वंश शमीकी भांति कैसा ही हरा - भरा क्यों न हो; परन्तु मेरे अनादरसे आपकी दशा खोलोंकी तरह होगी । जैसे खीलोंका अंकुर नहीं होता; वैसे आप भी सन्तानरूप अंकुरको प्राप्त नहीं कर सकेंगे । इससे यह प्रतीत हो रहा है कि - लाजा धान्यरूपा होती है । त्वक् तथा तण्डुलका उसमें पहले संयोग होता है । जब तक तो इनका संयोग है; तब तक दोनोंकी रक्षा है और तण्डुलमें उत्पादक शक्ति भी है । वधू कहती है- मैं त्वक् हूँ, आप तण्डुल . हैं । यदि आप त्वरूप मुझसे कवचित रहेंगे; तब आपमें उत्पादनशक्ति भी रहेगी । मुझसे विरहित तण्डुलरूप आप उत्पादनशक्तिसे रहित रहेंगे । अकेले तण्डुलको अग्निमें डाला जाता है, वह अग्निमें जलता है और उसकी लाजा बन जाती है; अतः आप भी मुझसे विरहित होकर विरहाग्निमें जलते रहोगे । लाजाहोम करके स्त्री यह भी सूचित करती है कि यह लाजा पहले

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२८६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) छिलकेसे आवृत थी, इस प्रकार मैं भी पितृगृहमें कन्यात्वसे आवृत थी । जब मैं बढ़ी तो मेरा उस छिलके में समाना कठिन हो गया । फिर अग्निका सम्पर्क पाकर इस धान्यका छिलका जल गया और वह खिल गई; इसी प्रकार अग्निस्वरूप आप ( पति ) का सम्पर्क पाकर मेरा कन्यात्व एवं पितृसम्बन्ध समाप्त हो गया है । उस बन्धन से मुक्त होकर और आपको पाकर मैं भी विकसित हो चुकी हूँ । अब जैसे चावलका रक्षक छिलका न रहा; इस प्रकार मुझ कन्यापर भी पिताका कोई आधिपत्य न रहा । कन्या इससे यह भी सूचित कर रही है कि त्वक्से रहित धान्य - करिणका जिस प्रकार उत्पादनशक्ति से रहित होती है, त्वक् - सहित ही वह अनेक धान्य उत्पन्न करती है; वैसे मैं और आप भिन्न - भिन्न रहकर वन्ध्य ही रहेंगे और त्वक्से रहित उस धानको अग्नि में डाल दिया जाता है, अतः आपका और मेरा आपस में एकीभाव होनेसे ही आपका वंश बढ़ेगा और मैं भी सुरक्षित रहूँगी । अश्मारोहण — बधूको जो कि पत्थर पर चढ़ाया जाता है; उससे उसको सङ्केतित किया जाता है कि जैसे पत्थर दृढ होता है, वैसे तुम भी दृढ रहना, परपुरुषपर अनुरक्त न रहना; आपत्ति-कालमें भी विचलित न होकर अपने पातिव्रत्य धर्मकी रक्षा करना । साङ्गुष्ठ - हस्तग्रहण –— इसका प्रयोजन यह है कि — ' गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तम् ' इत्यङ्गुष्ठमेव गृह्णीयाद् यदि कामयीत पुमांस एव मे पुत्रा जायेरन् ' ( ११७१३ ) ' अंगुलीरेव स्त्रीकामः ' ( १ | ७ | ४ ) ‘ रोमान्ते हस्तं सांगुष्ठमुभयकामः ' ( ११७१५ ) । आश्वलायन - गृह्यसूत्रके

पृष्ठ 315

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वैवाहिक विधियोंका रहस्य २८७ इस वचनमें विवाह में पाणिग्रहणके समय बताया गया है कि यदि पुरुष चाहता है कि मेरे लड़के हों, तो वधूके हाथमें केवल अंगुष्ठ को पकड़े । ' अंगुष्ठ ' शब्द पुलिङ्ग है; अतः उससे पुत्रका सम्वन्ध स्पष्ट है । यदि पुरुष चाहता है कि मेरे लड़कियां उत्पन्न हों, तो वह पाणिग्रहण करते समय वधूकी अंगुलियां शब्द ' स्त्रीलिङ्ग ' है; अतः उससे कन्योत्पत्तिका फिर लिखा है कि यदि दोनों - पुत्र - पुत्रीकी अंगुष्ठसहित हस्तांगुलियों को पकड़े; तो दोनोंके पुत्र - पुत्री दोनोंकी उत्पत्ति स्पष्ट है । महाभाष्यकारने श्लोकों की अप्रमारणता पर कहा

श्लोक, सूत्र आदि प्रमाण नहीं होते; इसका

पकड़े । ' अंगुलि '

सम्बन्ध स्पष्ट है । उत्पत्ति चाहे; तो उभयलिङ्ग होनेसे है कि ' उन्मत्तगीत ' भाव यह हुआ अनुन्मत्त गीत अर्थात् सावधान होकर कहे हुए श्लोक - सूत्रादि प्रमाण होते हैं । यदि विचित्र बात केवल एक व्यक्ति कहे; तो उसके वचनके अप्रामाण्यकी शंका हो सकती है; पर अन्योंकी भी जब उसमें सम्मति वा साक्षी मिल जावे तो ' सौ सयाने एकमत ' यह कहावत चरितार्थ हो जाती है । जैसे कि भगवद्गीता में कहा है-' व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । बहुशाखा ह्यनन्ताश्च वुद्ध-योऽव्यवसायिनाम् ' ( २।४१ ) अर्थात् निश्चयात्मिका बुद्धि एक हुआ करती है और अनिश्चयात्मक बुद्धियां अनेक एवं परस्पर - विप्रतिपन्न हुआ करती है । अब इसमें अन्य आचार्योंकी सम्मति भी देखनी चाहिये । हिरण्यकेशीयगृह्यसूत्रमें भी पूर्व जैसी ही बात लिखी है- ' यदि

पृष्ठ 316

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२८८. श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) कामयेत पु ँ सो जनयेयम इति, अंगुष्ठं गृह्णीयात् । यदि कामयेत स्त्रीः इति, अंगुलीः । यदि कामयेत उभयं जनयेयम् इति, अभीव लोमानि अंगुष्ठ ँ सहांगुलिभिगृहीयात् ' ( १६।६।२० ) । इस साक्षी से पूर्वोक्त बात यथार्थ सिद्ध हो गई । इस प्रकार आघस्तम्बगृह्यसूत्र में भी कहा है- ' यदि कामयेत स्त्रीरेव जनयेयम् इति अंगुलीरेव गृह्णीयात् ( २।४।१२ ) । यदि कामयेत पु ंस एव जनयेयम् इति अंगुष्ठमेव ' ( २ | ४ | १३ ) । आर्य-समाजियोंकी संस्कार - विधिके १५२ पृष्ठमें भी वधूका अंगूठा पकड़-वाया जाता है, मालूम नहीं कि वे इसमें क्या प्रयोजन मानते हैं? पुरुष - स्थापन और हवन ० वैवाहिक होमसे पूर्व वर - कन्याके पीछे एक दृढ पुरुषको ठहराना पड़ता है; उसके साथमें जलका कुम्भ भी होता है उसे चुप होकर अभिषेक तक ठहरना पड़ता है । कुम्भ वा लोटेको वह ऊपर उठाकर ठहरे, ऐसा नियम है । उसमें एक रहस्य यह है कि-होमके घृत, तथा घृताक्त हविके परमाणु ऊपर जाते हैं; उन्हें हाथके कुम्भका जल अपने में आकृष्ट करता है । वे मन्त्र - संस्कृत हविके परमाणु कितने शुद्ध एवं लाभप्रद हो सकते हैं, यह हम आगे यज्ञ - रहस्यमें लिखेंगे । होम समाप्त होने पर उस दृढ- पुरुषसे वह कुम्भ लेकर वर उसमें पड़ी हुई कुशा वा आमके पत्ते से अपने पर तथा अपनी वधू पर ' आपो हि ष्ठा ' आदि मन्त्रोंसे अभिषेक करता है । उससे उसका तथा उसकी वधूका अतिशयित लाभ होता है ।

पृष्ठ 317

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वैवाहिक विधियोंका रहस्य २८६ दूसरा | लौकिक लाभ वह भी है कि कभी हवनके समय उठा हुन त वर - वधूके वस्त्र पर लग जाए. तो उस समय जलकी आवश्यकता पड़ेगी ही । ' संदीप्त भवने तु कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः ' उस समय पानी मंगानेकी शीघ्रता में कुछ सूझता नहीं; अतः पहले से उसका प्रबन्ध भी रखना ही चाहिये । इसीलिए दृढ- पुरुषको चुपचाप ठहरना पड़ता है कि उसका ध्यान दूसरी ओर न वँटे, केवल वर - वधूका तथा अग्निका ध्यान रखे । इसी कारण वर - वधूके पीछे उसे ठहराना संगत भी हो जाता है; पर यह ध्यान रहे कि यह अवान्तर प्रयोजन है; मुख्य प्रयोजन तो पूर्व कहा ही जा चुका है । ग्रन्थिबन्धन - परिक्रमाके समय ग्रन्थिबन्धनका रहस्य यह है कि हम दोनों पहले अलग - अलग थे; अब हम एक बन्धनमें बद्ध हुए हैं, इसलिए मिलकर सब कार्य करेंगे । वही गांठका कपड़ा इस समय से लेकर वरके घरमें पहुँचने तक दोनों में बँधा होता है; इससे लौकिक लाभ यह भी होता है कि स्त्रीका पतिसे पार्थक्य आशङ्कित नहीं होता । ऐसा न होनेसे एक बार रेलगाड़ीसे उतरती हुई दो बारातों की दो नववधुएँ घूँघट होनेसे बदल गईं, एककी वधू दूसरेके साथ चली गई, क्योंकि इस अवसर पर वधुओंके वस्त्र प्रायः एक-होते हैं । अन्तर - पट विधान ' परं मृत्यो ' इत्यादि मन्त्रसे आहुतिके समयमें जो वर - वधूके मध्य में वा आगे वस्त्रका आवरण दिया जाता है उसका अभिप्राय १६ स ० ध ०

पृष्ठ 318

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२३० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) यह है कि वह आहुति मृत्युको दी जाती है । मेरी वधू अकाल में अपनी वा मेरी मृत्युको आगे न देखे । इसी कारण अन्तर - पट दिया जाता है । फिर सप्तपदी करके पतिकी प्रिया बनकर -- पतिका हृदय बनकर वह उसके वामाङ्गमें हो जाती है । पुरुषका हृदय उसका प्रिय तथा वाम अङ्गमें हुआ करता है - ऐसा वैज्ञानिक मानते हैं । सप्तपदी - सप्तपदी में पति अपनी पत्नीको अपने पीछे सात पग चलवाता है । सतां साप्तपदं सख्यम् ' इस शास्त्रोक्तिसे सात पग इकट्ठा चलनेपर सत्पुरुषोंमें मैत्री मानी जाती है । सप्तपदीमें सात बातें बताई गई हैं । इससे लोक व्यवहारकी तथा दाम्पत्य की पूर्णता होती है । इसमें पहली वस्तु है अन्न । धनके बिना जीवन चल जाता है, पर अन्नके बिना नहीं चलता । पश्चिमी बंगाल में जब अकाल पड़ा था — और बहुत भारी रकम खर्च करके भी अन्न नहीं मिलता था— उसमें जनता की कितनी दुर्दशा हुई थी । वेश्याओं को अपनी लड़कियां देकर उनसे अन्न लिया जाता था । अतः सप्तपदी में पहले ' एकमिषे ' में अन्नके संरक्षणार्थ स्त्रीकी प्राप्ति कही गई । दूसरेमें ऊकू ' ( शारीरिक - बल ) मांगा गया । बलवीर्य सम्पन्न व्यक्ति ही दाम्पत्यका निर्वाह कर सकते हैं । अपने से छोटी आयुकी स्त्री भी बलवर्धक मानी गई है । तीसरे में रायस्पोष ( धन - वस्त्र ) मांगा गया । धन - वस्त्रादिके बिना गृहस्थ जीवन सर्वथा नीरस और उद्वेगप्रद रहता है । अतः इसमें धन - वस्त्र प्रार्थित किया गया । चौथे में मयोभुव ( सुख ) मांगा गया । सुख ही गृहस्थका प्रारण है; यदि

पृष्ठ 319

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दैवाहिक रीतिविशेषोंका रहस्य २६-१ उसमें सुख नहीं मिला; तो गृहस्थाश्रम निष्प्राण है - मुर्दा है । पांचवें में पशु ( गाय आदि ) मांगे गये । गृहस्थावस्थामें दूध - घी आदिके लिए गौ आवश्यक है ही । तभी गृहस्थी ठीक चल सकेगी । उसके दही आदि भी बहुत लाभप्रद हैं । उसकी देखरेख भी स्त्री ही ठीक कर सकती है । छठेमें ऋतुओंका सुख मांगा गया । शीतकाल एवं उष्णकालका सुख स्त्रीके द्वारा ही प्राप्त होता है । सातवें में पत्नीका सखित्व, अपना अनुव्रत अनुसरण होना मांगा गया । वही अबसे आवश्यक है; अतः इसे उत्तरपक्षमें रखा गया । इन सातों साधनों से मिला हुआ ही पुरुष पूर्ण - गृहस्थ होता है - यह इससे सूचित किया गया है । पतिके वामाङ्गमें आकर इस प्रकार पत्नी उसकी पोष्या बनी एवं उसकी अधीनता स्वीकार की । ध्रुवदर्शन; सूर्यदर्शन आदि - सूर्यका दर्शन वधूको इसलिए कराया जाता है कि वह भी सूर्य से शक्ति प्राप्त करके १०० वर्ष तक जिये, क्योंकि सूर्य स्थावर - जङ्गमका आत्मा है । रात्रिको वा उस समय उसे जो ध्रुवदर्शन कराया जाता है उसमें रहस्य यह है कि उसे ध्रुवकी भांति स्थिरताका संकेत दिया जाता है । अन्य तारे सारी रातभर पूर्व से पश्चिममें जाते हुए दीखते हैं; पश्चिममें जाकर अस्त हो जाते हैं; पर ध व अपने ही स्थान पर उत्तरमें ठहरा रहता है; जरा भी नहीं विचलित होता है । यही बात स्त्रीको समझाई जाती है । तलाक देनेवाली, एक पतिको छोड़कर इतस्ततः गतागत करनेवाली चंचल - स्त्रियोंको इस ध्रुवसे शिक्षा लेनी

पृष्ठ 320

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२६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) चाहिये कि वे अपने विवाहित उसी पतिमें अविचलित भावसे रहें । जहाज चलानेवाले भी ध्रुवके आश्रयसे ही अपने गन्तव्य वा लक्ष्य स्थलको प्राप्त होते हैं, मार्गभ्रष्ट नहीं होते । वैसे स्त्री भी ध्रुवको देखकर अपने एकपति व्रतको स्वीकार करके मार्ग से भ्रष्ट न होवे, यही स्त्रीको ध्रुवदर्शन करानेका रहस्य है । आगे सिन्दूरदान आदिसे स्त्रीका सौभाग्यवती होना बताया गया है । विधवाके माथेमें दुर्भगतावश सिन्दूरकी बिन्दी नहीं होती । विवाह - संस्कार ही कन्याका उपनयनस्थानीय संस्कार है । इसमें पति उसका आचार्यस्थानीय होता है । पतिकुल उसका आचार्यकुल होता है, पतिकुलवास एवं पतिसेवा उसका आचार्य-कुलवासके साथ आचार्य सेवन होता है । घरका काम - काज, पति के यज्ञमें सहायता करना, उसमें उसके साथ बैठना — यही उसका अग्निहोत्र होता है । इस प्रकार विवाह ही उसका द्विजत्व-सम्पादक संस्कार है । इसी कारण जैसे आचार्य उपनयन्में शिष्यको सूर्य - दर्शन कराता है, - ' मम व्रते ते हृदयं दधामि ' ( ' मेरा जो व्रत है, उसमें तुम्हारे हृदयको लगाता हूँ । ) - आदि मन्त्र पढ़कर शिष्यका हृदय - स्पर्श करता है, वैसे ही पति पत्नीका उसी मन्त्रसे हृदयालम्भनादि करता है । यह गृह्यसूत्रादिमें स्पष्ट है । हिरण्यकेशी गृह्यसूत्रमें उपनयनमें आचार्य ब्रह्मचारीको-' या अकृन्तन्... आयुष्मन् इदं परिधत्स्व वासः ' ' जरां गच्छ परिधत्स्व वासः ' ( ' जिन्होंने काता " आयुष्मन्! यह वस्त्र पहन लो । ' ' यह वस्त्र धारण करो एवं वृद्धावस्थातक पहुँचो ।१ ) -