सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 341–350
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 341–350
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हिन्दुधर्मके आचार - विचारोंके रहस्य ३१३ नींदके हटने से स्वास्थ्य बिगड़ने की आशंका रहती है । सर्दी में प्रातः स्नान करना निमोनियाको न्योता देना है । सन्ध्या करना परमात्माकी चापलूसी करना है; क्या परमात्मा टोडी बच्चा है? जप करने से क्या लाभ है?? ऊँचे स्वर से मन्त्रोच्चारण से मेंडकोंकी तरह टर्र - टर्र क्यों किया जाता है? बाहर अपनी भक्तिका परिचय देना एक पाखण्ड है । क्या ईश्वरकी भक्ति मनमें नहीं हो सकती? व्यर्थं कण्ठको दुखाना क्यों? सूर्य - चन्द्रके ग्रहणमें अनशन क्यों किया जाता है? उत्तरकी ओर वा पश्चिम की ओर मुख करके क्यों न सोया जावे?? घरमें तुलसी - वृक्षका पूजन जडकी पूजा है । पीपलकी पूजा क्यों? शंखकी ध्वनि क्या हड्डीको छूना नहीं? खड़ाऊँ पहनने से क्या लाभ? गायका दूध छानकर क्यों पीया जाता है? कुशासन वा मृगचर्म एवं व्याघ्रचर्मका आसन क्यों? रात में सिरहाने जल क्यों रखा जाता है E?? बच्चोंके गलेमें रक्षा पहराने से क्या लाभ है? कुत्रोंपर घीके दीपकको क्यों जलाना? यज्ञ - हवन करके मनुष्यका अन्न तथा घृत क्यों आग में झोंका जाता है? पृथिवीपर लात मारनेका क्यों निषेध है? भोजनसे पहले ग्रास रखना वा अग्निमें डालना, वा काकबलि क्यों? शास्त्रोक्त दिनचर्या तथा रात्रिचर्यां किस तात्पर्यको रखती है - एतदादि बहुतसे प्रश्न ' आज पूछे जाते हैं । प्रष्टा लोग इनके ऐहिक लाभ भी पूछना चाहते हैं । यद्यपि सनातनधर्म में एतदादि नियम, व्रत एवं पर्व साक्षात् अदृष्ट फलक तथा धर्मार्थ ही माने जाते हैं; तथापि उनके अवान्वर प्रयोजन रूप ऐहिक लाभ भी होते हैं; उनसे आत्मिक शक्ति तथा
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३१४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) मानसिक - शक्ति एवं शारीरिक शक्ति भी प्राप्त होती है । संसारमें जैसे - जैसे विज्ञान - शक्तिकी वृद्धि होगी; वैसे - वैसे ही सनातनधर्मके सिद्धान्तों, नियमों, तथा व्रत पर्वो आदिका महत्त्व भी बढ़ता चला जावेगा । वर्तमान शङ्काकर्ताओं का भी इनके विज्ञानके जाननेमें तात्पर्य हुया करता है; अतः हम भी एतद्विषयक विज्ञानको इतस्ततः संकलित करके अपनी शैलीसे लिखेंगे । पहले यह जानना चाहिए कि- प्राचीनकाल में भी विद्यद्-विज्ञान तथा योग - विज्ञानकी विशिष्ट उन्नति थी । महावली रावणने दुर्जयशक्तिके द्वारा लक्ष्मणको निस्पन्द कर दिया था । यह प्राचीन-कालमें तडिद् - विज्ञानकी उन्नतिका प्रमाण है । बाणोंमें विद्युत्शक्ति डालने की क्रियाको आजके पाश्चात्य आविष्कारक भी अभी आविष्कृत नहीं कर सके । नागपाशशक्ति, सम्मोहनात्र आदि अद्भुतशक्तिसे मिले हुए अस्त्र भी जो पुराकालमें थे; उनमें तडिद्-विज्ञानको उन्नति स्पष्ट अनुमित हो रही है । देवमन्दिरके ऊपर अष्टधातुके चक्रकी, अथवा त्रिशूल आदिके जोड़ने की जो विधि आज भी प्रचलित है; यह भी विद्यदु - विज्ञानकी उन्नतिका चिह्न है; क्योंकि आजके विज्ञानकी दृष्टिसे भी यह प्रमाणित हो गया है कि – अष्टधातुका चक्र बिजलीके पतनको हटाता है । इसलिए देवमन्दिरके ऊपर उसे स्थापित किया जाता है । इस प्रकार उत्तराभिमुख सिर न करके सोना, नये कच्चे फलकी ओर अंगुलि तक न उठाना, न ' छुए हुए अन्नको न खाना, चैलाजिन- कुश - कम्बलके आसनपर बैठकर उपासना
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हिन्दुधर्मकै श्राचार - विचारोंका रहस्य ६११ करना; सौभाग्यवती स्त्रियोंको सुवर्णके भूषणोंकी आज्ञा देना, विधवाको न देना - एतदादिक प्राचीन नियम प्राचीन युगमें विज्ञानकी उन्नतिको परिचायित करते हैं । श्राजके विज्ञानने भी प्रमाणित कर दिया है; कि- उत्तरकी ओर सिरकरके सोनेसे दुःस्वप्नोंकी सम्भावना होती है; क्योंकि — पृथिवीका स्वाभाविक विद्युत् - प्रवाह दक्षिण से उत्तराभिमुख चलता है, इस कारण वैसे सोनेसे रक्तकी गति पांवसे मस्तककी ओर अधिक रूप से हो सकती है । इस प्रकार कच्चे फलकी ओर अंगुलि उठाने से वह हमारी शारीरिक विद्युत् द्वारा दूषित हो जाता है । इस प्रकार शूद्र में तमोगुणकी अधिकतासे उससे छुआ हुआ अन्न भी उसकी दूषित विद्युत् द्वारा दुष्ट होने से, श्रेष्ठ विद्य त् वाले ब्राह्मणके शरीर में · अहितकारक सिद्ध होता है । पृथिवी सदा जीव - शरीरान्तर्गत विद्य त्को आकर्षित करती रहती है । उपासनाके समय मनुष्यके शरीर में सात्त्विक विद्युद - वृद्धि होती है, पर पृथिवी पर बैठकर उपासना करनेसे उस विद्युत्संग्रह की पृथिवी द्वारा नष्ट होनेकी आशंका रहती है; किन्तु चैलाजिन कुश - कम्बल तथा लकड़ीके फट्टे के व्यवधानसे पुरुषकी विद्य 3 त्-शक्तिको पृथिवी नहीं ले सकती, अतः वैसे आसन पर बैठकर सात्त्विक विद्युत् क्षीण नहीं होती । सुवर्ण आदि धातुएँ विद्युत बढ़ानेवाली होती हैं । विद्युत - शक्ति के बढ़नेसे शारीरिक - इन्द्रियोंमें विशिष्ट स्फूर्ति हो जाती है । इन्द्रियोंमें विशिष्ट - स्फूर्ति होनेसे; तथा सुवर्ण में कीटाणुनाशिनी
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३१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) शक्ति होनेसे स्त्रियाँ सुख - प्रसव करके सुसन्ततियोंको उत्पन्न कर सकती हैं । इसीलिए प्राचीन ऋषि - मुनियोंने स्त्रियोंको धातुरत्नादि -मय अलङ्कारोंको धारण करनेका आदेश दिया था । पर विधवा स्त्रियोंको उन्होंने वैसी आज्ञा नहीं दी । विद्युद् - विज्ञानपूर्ण इन आचारोंको सुनकर साधारण बुद्धिवाले भी व्यक्ति जान सकते हैं कि — प्राचीन ऋषि - मुनियोंने इस सूक्ष्म विज्ञानको कितनी उन्नत अवस्था तक पहुँचाया था । तब उन्हीं मुनियोंके बनाये प्राचीन सिद्धान्तों में उन मुनियोंने विविध विज्ञानोंको नहीं रखा था - ऐसा कहनेका कौन साहस कर सकता है? इस कारण इस विषय में ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के इस पञ्चम- पुष्पमें उन रहस्योंका वर्णन अनुचित नहीं होगा — यह सोचकर उसमें विज्ञानका यथाशक्ति विवरण किया जायगा । तथापि यह याद रखने की बात है कि पहले समय में प्रायः इनके प्रयोजन वा लाभ नहीं बताये जाते थे; उसमें यह कारण है कि- पहले इन नियमों में धर्म जानकर इनका आचरण किया जाता था; तब वे उन लाभों को भी प्राप्त कर लेते थे; पर आजकल पहले उनके लाभोंको पूछते हैं । फिर उन लाभोंको सुनते वा जानते हुए भी लोग उन नियमोंका उपयोग नहीं करते । जैसे— शंख आदि, तथा शिखा आदिके लाभोंको जानते हुए भी, सुनते हुए भी वे उनका उपयोग नहीं करते । उसमें धार्मिक अनिवार्यता न देखकर उसमें उपेक्षा कर जाते हैं । परिणामस्वरूप वे उन लाभोंसे भी वचित रह जाते हैं । तब हमारे पूर्वजोंका इन
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ब्राह्ममुहूर्तमें उठनेका विज्ञान ३१७ आचरणों के लिए धार्मिक विभीषिका रखना कुछ अनुचित नहीं था । तथापि आज के समय की जिज्ञासाके अनुसार धार्मिक नियमोंके लाभ भी दिखलाए जाते हैं; नहीं तो आजकलके कई व्यक्ति उन नियमोंको ' ढकोसला ' बतानेकेलिए भी तैयार हो जाते हैं । उनकी सार्थकता के प्रदर्शनार्थं कई नियमोंके स्थूल लाभ दिखलाए जाते हैं । तथापि यहाँ लाभोंकी इयत्ता नहीं समझ लेनी चाहिए कि इतने ही लाभ हैं; अन्य नहीं । किन्तु जो लाभ हम बताने जा रहे हैं - वे दिङ्मात्र ही हैं - इससे अधिक भी लाभ हैं । हम इन प्रष्टव्य प्रश्नोंको अपने क्रमसे रखकर उन पर वैज्ञानिक रहस्य विवृत करेंगे; आशा है- ' आलोक ' के दर्शक - पाठक इधर अवहित होकर हमारे परिश्रमको सफल करेंगे । ( १ ) ब्राह्ममुहूर्त में उठनेका विज्ञान ' ब्राह्म मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थौ चानुचिन्तयेत् । कायक्लेशांश्च तन्मूलान् वेदतत्त्वार्थमेव च ॥ ( मनु ० ४।६२ ) हिन्दुधर्ममें ब्राह्ममुहूर्तमें ( प्रात: ४ बजे ) उठनेकी आज्ञा है । इस समयका वातावरण सात्त्विक, शान्त, जीवनप्रद और स्वास्थ्य-प्रदायक होता है । इसी समय वृक्ष अशुद्ध वायुको आत्मसात् कर लेते हैं और शुद्ध वायु ( आक्सिजन गैस ) हमें देते हैं । कमल आदि इसी समय खिलते हैं । नदी आदिका जल सम्पूर्ण रात्रि के, तारामण्डलके, एवं चन्द्रमाके अमृतसने प्रभावको आत्मसात् करके इसी समय उसे व्यक्त करता है । इसके संसर्गसे ही सुरभित, और उदय होनेवाले दिनकरके निर्मल किरणोंके प्रभाव से पवित्र हुई हुई
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३१८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) वायु हमारा आत्मिक एवं मानसिक कल्याण करती है । सूर्य ही समस्त क्रियाओं तथा विद्युत्शक्ति, प्राणशक्ति आदि समस्त शक्तियों का आकर होता है । सभी धातुएँ, सभी जीव, सब मनुष्य इसीकी शक्तिका अवलम्बन लेते हैं । ब्राह्ममुहूर्त में जागने पर हमारी साधारण शक्ति सूर्यकी शक्तिके अवलम्वसे वहुत सवल हो उठती है । उसके प्रभाव से हमारे मन और बुद्धि आलोकित हो उठते हैं । रात्रिमूलक - तमोगुण और तमोमूलक जड़ता हट जाती है । यदि इस सुन्दर समय में भी हम निद्रादेवी वा दूसरी देवी में आसक्त रहे; तब हम अपनी आयुको स्वयं घटानेवाले सिद्ध हो सकते हैं; क्योंकि निद्रा में तन्मूलक दौर्बल्यवश वह वायु हमें लाभके बदले हानि भी पहुँचा सकती है, ' देवो दुर्बल घातकः ' । वैसा करने पर हमारा आलस्य बढ़ जाता है, स्फूर्ति नष्ट हो जाती है । उस समय उठ बैठनेसे निद्रामूलक दुर्बलता नष्ट होकर हममें वल उत्पन्न होता है । तब वही वायु हमें लाभदायक सिद्ध होता है - ' सभी सहायक संबलके ' । ब्राह्ममुहूर्तमें उठानेकी प्रकृतिकी ' टाइमपीस घड़ी ' मुर्गा हुआ करता है । इस समय सम्पूर्ण दिनकी थकावट और चिन्ता आदि रात्रिके सोनेसे दूर होकर हमारा मस्तिष्क शुद्ध तथा शान्त एवं नवशक्ति-युक्त हो जाता है, और मुखको कान्ति एवं रक्तिमा चमक जाती है । मन प्रफुल्ल हो उठता है, शरीर नीरोग रहता है । यही समय शुद्ध मेधाका होता है । इसी समय मनः प्रसत्ति होनेसे प्रतिभाका उद्य होता है । उत्तम ग्रन्थकार इसी समय ग्रन्थ लिख रहे होते हैं ।
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ब्राह्ममुहूर्त में उठनेका विज्ञ ३१६ चित्त सात्त्विक होनेसे पुण्य कार्य में प्रवृत्त होता है । सुन्दर एवं प्रभावोत्पादक ग्रन्थोंका निर्माण भी इसी समय सम्भव होता है । शरीरमें भी इसी समय सब आलस्यादि हटकर स्फूर्ति उत्पन्न होती है । इस कालको उत्कृष्ट कार्यों में प्रयुक्त करना अपनी आयुर्वृद्धि, आत्मिक बल तथा मनोबल एवं शारीरिक और चारित्रिक - बलको निमन्त्रण देना है । जैसे कल्पका श्रारम्भ ब्रह्माके दिनका आरम्भ होता है, उसी समय ब्रह्माका दीर्घनिद्रामें विश्रान्त हुई हुई सृष्टिके निर्माण एवं उत्थानका काल होता है; ज्ञानरूप वेदका प्राकट्यकाल भी वही होता है, उत्तम ज्ञानवाली एवं शुद्ध - मेधावती ऋषि - सृष्टि भी तभी होती है, सत्त्वयुग वा सत्ययुग भी तभी होता है; धार्मिक प्रजा भी उसी आरम्भिक कालमें होती है, यह काल भी वैसा ही होता है । उसी ब्राह्मदिनका संक्षिप्त संस्करण यह ' ब्राह्ममुहूर्त ' होता है । यह भी सत्सृष्टि - निर्माणका प्रतिनिधि होनेसे सृष्टिका सचमुच निर्माण ही करता है । अपने निर्माण कार्य में इस ब्राह्ममुहूर्तका उपयोग लेना हमारा एक आवश्यक कर्तव्य हो जाता है । इसके उपयोग से हमें ऐहलौकिक - अभ्युदय एवं पारलौकिक - निःश्रेयस प्राप्त होकर सर्वाङ्गीण धर्मलाभ सम्भव हो जाता है । ढाई घड़ी का एक घंटा होता है । रातकी अन्तिम चार घड़ियों में पहलेकी दो घड़ियां ब्राह्ममुहूर्त नामसे और अन्तिम दो घड़ियाँ रौद्रमुहूर्त नामसे कही जाती हैं । इनमें ब्राह्ममुहूर्तमें ही शय्या-त्याग कहा गया है । उसमें रहस्य यही है कि उस समय हमारी
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३२० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) बुद्धिका प्रेरक सूर्य भगवान् अपनी सात्त्विक ज्योतिः और शक्तिका भूलोक में संचार एवं प्रसार करता है । चन्द्र और नक्षत्रोंकी किरणोंके सहचारी अमृतको इसी समय ही लेकर शीतल, मन्द और सुगन्धित समीर चला करती है; जो सर्वाङ्गीण - लाभप्रद होती है । रात्रिमें तमोवृद्धि होनेसे उस अमृतका प्रभाव नहीं पड़ सकता । उषःकालमें सात्त्विक ज्योतिःपुञ्ज निकट होनेसे उसीको वह प्रातःकालकी वायु ग्रहण कर लेती है । इसी बातको जानकर आजकलके लोग प्रातः नगरसे बाहर भ्रमणार्थ जाते हैं । पर यदि धार्मिक रीति से वे कर्तव्य करते चलें; तो नास्तिकता की समाप्ति होकर आस्तिकता बढ़ जाय । ( २ ) प्रातःस्मरण पद्य ' प्रातरग्निं प्रातरिन्द्रं हवामहे, प्रातर्मित्रावरुणा प्रातरश्विना । प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिं प्रातः सोममुत रुद्रं हुवेम ' ( ऋ ० ७ । ४१।१ ) ' मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद! ' इस समय में किया हुआ गान भी अपने तथा दूसरोंके आकर्षणका साधन होता है; जब उसमें भी भगवद्भक्ति ओत - प्रोत हो; तो फिर तो क्या कहना? यह ' सोना और सुगन्ध ' हो जाया करता है । इसलिए प्रातः भगवान्को आकृष्ट करनेके लिए, तथा स्वयं भी तन्मयीभावार्थ कई राग वा भजन गाये जाते हैं, जिससे हमारा भावी दैनिक कार्यक्रम भी सुन्दर और निष्पाप बने । पर हमारी लौकिक भाषा अपभ्रंश भाषा होनेसे भगवान् के उतने निकट नहीं पहुँच पाती । देवभाषा देवोंसे प्राप्त हुई एक भाषा है, इससे हम देवों तथा देवाधिपति
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प्रातः स्मरणपद्य ३२१ भगवान् के निकट उन शब्दोंको शीघ्र पहुँचा सकते हैं । यद्यपि वैदिक शब्द तो उससे भी बहुत निकटताकारक हैं; पर उस समय हम अस्नात होनेसे उनमें अधिकृत नहीं । उनका तो स्नानोत्तर सन्ध्या आदिमें उपयोग करना पड़ता है । अतः शयनसे उठते ही संस्कृत पद्योंकी आवश्यकता पड़ती है । पद्यकी रचना लययुक्त होने से तन्मयता में विशेष साधन बन जाती है । इनमें कई इस प्रकारके भी पद्य होते हैं, जो भगवान् के ध्यानके साथ ही हमें धर्म तथा अपने देशके आन्तरिक परिचय करानेवाले भी होते हैं । इससे हम उस अपने देश तथा अपने धर्मको छोड़ने वा उससे द्रोह करनेका कभी स्वप्न भी नहीं देख पाते । अपने जीवनदाता एवं त्रारणकर्ता उस प्रभुको तथा पूर्वोल्लिखित वेदमन्त्रों में कहे हुए देवोंको उस सात्त्विक समय में स्मरण करना हमें भविष्यत् में भी असन्मार्ग में जाने नहीं देता । प्रातः स्मरणके कुछ पद्य हम लिख देते हैं-' वामाङ्गीकृतवामाङ्गि कुण्डलीकृत कुण्डलि । आविरस्तु पुरोवस्तु भूतिभूत्यम्बराम्बरम् ॥१ ॥ श्रगजाननपद्मार्कं गजानन-महर्निशम् । अनेकदन्तं भक्तानामेकदन्तमुपास्महे ॥२ ॥ वेदानुद्धरते
जगन्निवहते भूगोलमुद्बिभ्रते, दैत्यं दारयते बलिं छलयते क्षत्रक्षयं कुर्वते । पौलस्त्यं जयते हलं कलयते कारुण्यमातन्वते, म्लेच्छान्मूर्च्छयते दशाकृतिकृते कृष्णाय तुभ्यं नमः || ३ || सूर्यः शौर्यमथेन्दुरुच्चपदवीं सन्मङ्गलं मङ्गलः, सद्बुद्धिं च बुधो गुरुश्च गुरुतां शुक्रः श्रियं शं शनिः । राहुर्वाहुबलं करोतु विपुलं केतुः कुलस्योन्नतिं, नित्यं प्रीति-२१ स ० ध ०
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३२२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) करा भवन्तु किल नः सर्वे प्रसन्ना ग्रहाः || ४ || शारदा शारदाम्भोज-वदना वदनाम्बुजे । सर्वदा सर्वदास्माकं सन्निधिं सन्निधिं क्रियात् ॥५ ॥
प्रसन्नतां या न गताभिपेकतस्तथा न सम्लौ वनवासदुःखतः ।
मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मंजुलमङ्गलप्रदा ॥६ ॥
कृष्ण! त्वदीयपदपङ्कजपञ्जरान्ते श्रद्यैव मे विशतु मानसराजहंसः ।
प्राणप्रयाणसमये कफवातपित्तैः कण्ठावरोधनविधौ स्मरणं कुतस्ते ॥७ ॥
भृगुर्वसिष्ठः क्रतुरङ्गिराश्च, मनुः पुलस्त्यः पुलहश्च गौतमः । रैभ्यो मरीचिश्च्यवनश्च दक्षः कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ॥८ ॥ प्रह्लाद-नारदपराशरपुण्डरीक - व्यासाम्वरीपशुकशौनक भीष्मदाल्भ्यान् ।
रुक्माङ्गदाजु नवसिष्ठविभीषणादीन् पुण्यानिमान् परमभागवतान्
नमामि ॥ ॥ अयोध्या मथुरा माया काशी की अवन्तिका ।
पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः ॥१० ॥
( ३ ) प्रातः हस्तदर्शनका विज्ञान । प्रातः हाथका दर्शन शुभ हुआ करता है । कहा भी है-' कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती । करपृष्ठे च गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम् ' । इस पद्य में हाथके अग्रभागमें लक्ष्मीका, मध्यभागमें सरस्वतीका और पृष्ठभाग में गोविन्द का निवास कहा है । यह केवल ‘ कथनमात्र ' नहीं; किन्तु ठीक भी है । हाथका महत्त्व किससे छिपा है? इसी हाथसे हम लक्ष्मी कमाते हैं; तब ' कराये वसते लक्ष्मीः ' ठीक ही हुआ । इसी हाथसे लिखना - पढ़ना सीखकर हम सरस्वतीदेवीको प्राप्त करते हैं; तब ' करमध्ये सरस्वती ' भी कहना ठीक हुआ । इसी हाथसे हम मालाकी मणियां घुमाकर