सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 351–360

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 351–360

पृष्ठ 351

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प्रातः हस्तदर्शनका विज्ञान ३२३ भगवान् का स्मरण तथा जप करके गोविन्द को प्राप्त करते हैं । तब ' करपृष्ठे च गोविन्दः ' कहना भी ठीक हुआ । संसारके सर्वस्व लक्ष्मी, सरस्वती और गोविन्द जब हाथमें या गये; तो हाथ में बड़ी शक्ति सिद्ध हुई । संसार में यही तो वस्तुएँ अपेक्षित हैं, और चाहिये क्या? ऐसी शक्तिको धारण करनेवाले, हमारी संसार - यात्राके एकमात्र अवलम्ब एवं लक्ष्मी आदिके प्रति-निधि हाथका प्रातःकाल दर्शन शुभकारक ही सिद्ध हुआ; क्योंकि इसी हाथसे ही तो हमने सभी कार्य करने हैं । केवल पुराण ही हाथकी महत्ता बताते हों; ऐसा भी नहीं है । वेद भी उस हाथ की महत्ता इससे भी बढ़कर बताते हैं । देखिये-' अयं मे हस्तो भगवान् अयं मे भगवत्तरः । अयं मे विश्वभेषजोऽयं शिवाभिमर्शनः ' ( ऋ ० १०/६० । १२ ) इस मन्त्रका देवता भी ' हस्त ' है । इसमें हाथको भगवान और अतिशयितसामर्थ्ययुक्त और सब रोगोंका भेषजभूत ( दवाई रूप ) साधन - सम्पन्न स्वीकृत किया है । जो जितनी अधिक शक्तिवाला होगा; उसके हाथमें शक्ति भी उतनी ही अधिक होगी । इसलिए हम जिनकी वन्दना करके उनका आशीर्वाद चाहते हैं; वे भी अपने हाथसे ही हमारे सिरको स्पर्श करके आशीः देते हैं । मैस्मरेजम तथा हिप्नोटिज्म के अभिज्ञ अपने हाथमें शक्ति सम्भृत करके उससे अपने समक्षस्थित पुरुषको जैसा चाहे-नाच नचाते हैं, उठाते हैं — बैठाते हैं । यहाँ तक कि बेहोश भी कर देते हैं । कई योगविद्याविशारद इसी हाथके स्पर्शसे विविध रोगियोंके रोगोंको दूर कर देते हैं । कई अधिक शक्तिवाले महात्मा

पृष्ठ 352

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३२४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) तो मरे हुए को अपने हाथके स्पर्शसे जिला देते हैं । हाथमें शक्ति होनेसे ही विवाह में दूसरेकी लड़कीके हाथको पुरुषके हाथमें दिलवाकर ( पाणिग्रहण कर ) उसे उसकी पत्नी बनवा देते हैं । हाथमें प्रेमकी भी स्थिति होनेसे मित्र मित्रोंके हाथका स्पर्श करते हैं । हाथमें अमृतके भी स्थित होनेसे गुरुओं द्वारा शिष्यको हाथ से मारने पर भी ' सामृतैः पाणिभिर्ध्नन्ति गुरवो न विषोक्षितैः ' यह कथन प्रसिद्ध है । इससे हाथमें हानिजनक शत्रुओं के लिए विष भी सन्निहित है - यह भी प्रतीत होता है । इस प्रकारके हमारे अवलम्बभूत, यजुर्वेद ( बृहदारण्यकोपनिषद् ) के ' सर्वेषां कर्मणां हस्तौ एकायनम् ' ( २ | ४ | ११ ) इन शब्दों में सब कर्मोंके मूल - जिसके न होनेसे हम ' निहत्थे ' कहे जाते हैं - सारी रात्रि के ग्रहनक्षत्रादि के प्रभावसे तथा प्रातःकालिक वायुसे पवित्र उस हाथके दर्शनसे हमारा शुभ होना सोपपत्तिक ही है । ( ४ ) प्रातः भूमिवन्दन, उस पर उठते ही पांव न रखना । प्रातः उठते ही अपनी आश्रयभूत भारतभूमिकी वन्दना करनी श्रेयस्कर हुआ करती है । तभी कहा है- ' जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ' । जन्मभूमिको स्वर्गसे भी बढ़कर माना गया है । इसीलिए वेदने भी उसे नमस्कार करनेका आदेश दिया है-' शिला भूमिरश्मा पांसुः सा भूमिः संधृता धृता । तस्यै हिरण्यवक्षसे, पृथिव्या अकरं नमः ' ( अथर्व ० १२ १२६ ) । ' नमो मात्रै पृथिव्यै नमो मात्रे पृथिव्यै ' ( यजु ० ६।२२ ) यहाँ पर दो बार पृथिवी माताकी वन्दुना करके वेदने अपने भक्तोंको उसकी पूजाका आदेश दे दिया

पृष्ठ 353

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प्रातः भूमिवन्दन ३२१ है । इसीलिए वेदानुसारी पुराणोंने भी ' समुद्रवसने देवि! पर्वतस्तनमण्डिते! विष्णु - पत्नि! नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे ' उसे नमस्कार करके उस पर पांव रखनेकी क्षमा चाही है । इससे हम भारत - भूमिके भक्त भी बने रहेंगे, विलायती भूमियोंके प्रेमी बनेंगे । उठते ही पृथिवीपर एकदम पाँव रखना लौकिक दृष्टिसे भी ठीक नहीं, क्योंकि - सारी रात हम खाट पर सोते हैं; उसमें भी शीतकाल में रजाईसे अपने आपको ढककर सोते हैं । इस कारण निद्राके सबब से हमारे अन्दर उष्णता पर्याप्त होती है, विशेषकर पैरोंमें; क्योंकि तब पांव प्रायः ढके रहते हैं; उस समय ठण्डे परमाणुओंसे युक्त भूमिमें एकदम ही पाँव रखना ठीक नहीं; क्योंकि — गर्मी - सर्दी पांवके ही द्वारा हमारे शरीरमें तत्क्षण संक्रांत होती है । अतः कुछ देर तक खाट पर बैठकर निद्रा पूर्णतया दूर करके जब अधिक ऊष्मा हटकर उसका समीभाव हो जाता है, तब पांवका भूमि पर रखना ठीक होता है । इसके अतिरिक्त भारतभूमि हमारी माता है, हम उसके पुत्र हैं, जैसे कि अथर्ववेदसंहितामें कहा है- ' माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः ' ( १२।१।१२ ) और भूमि देवतारूप भी है । अतः उस पर पांव रखना उचित नहीं दीखता; पर अनिवार्य होनेसे कुछ समय तक उससे पादस्पर्शकेलिए क्षमा मांगना उचित भी है । ' हम जड़ पृथिवीसे प्रार्थना क्यों करें; तब हमें मूर्तिपूजक बनना पड़ेगा ' ऐसा सोचना अपने आपको वेदानभिज्ञ सिद्ध करना है । अथर्व ०

पृष्ठ 354

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३२६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) के १२ वें काण्डका प्रथमसूक्त ही उसमें पृथिवीसूक्त है; उसमें पृथिवीसे विविध प्रार्थनाएँ की गई हैं । पृथिव्यभिमानी देवता चेतन हुआ करती है; पृथिवीसे प्रार्थना करना उसी चेतन - देवता से प्रार्थना करना है । मूर्ति - पूजक होना भी कुछ बुरा नहीं; क्योंकि— वेदका उस पक्ष पर अनुग्रह है - इस बातको जाननेकेलिए ' श्रीसनातन-धर्मालोक ' चतुर्थ- पुष्पमें ' मूर्तिपूजा - रहस्य ' विषय देखें | वास्तु क्षमा प्रार्थना करने तक हमारी निद्रा बहुत कुछ दूर हो जाती है; तब तक शयनकालीन शारीरिक ऊष्मा भी यथावस्थित हो जाती है । तब शौचार्थ बाहर जाकर शुद्ध वायुका सेवन करके प्रातः-कालीन शुद्ध वायुसे पवित्र तुषारयुक्त तृणप्रदेशपर, बिना जूता पहने घूमना आंखों के लिए लाभकर हो जाता है, क्योंकि पांवकी निचली नसोंका आंखकी ज्योतिसे विशेष सम्बन्ध होता है । ऐसा करनेसे पीलिया ( पाण्डु ) रोग भी नहीं होता । पर भूमिमें लात मारना ठीक नहीं; क्योंकि—- पांव के तलवों में चोट लगने से अपनी ही भीतरी हानि होती है । इसलिए भूमिपर पांवकी ठोकर मारना पापजनक माना गया है । आरम्भ में हमने जो पृथिवीसे क्षमा - प्रार्थना करनेवाला पौराणिक पद्य लिखा है कि- ' समुद्र - वसने देवि! पर्वतस्तनमण्डिते! विष्णुपत्नि! नमस्तुभ्यं ' यह पुराणका होनेसे उपहास - योग्य भी नहीं माना जा सकता । इसमें भारतभूमिकी रक्षाकेलिए तरीके से · प्रेरित किया जा रहा है । इसमें भारतभूमिका वसन ( वस्त्र ) समुद्रको बताया गया है;

पृष्ठ 355

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प्रात: भूमिवन्दन ३२७ अर्थात् यदि भारतीयोंने समुद्रको अपने आधिपत्यमें न रखा; तो वह भारतमाताको वस्त्रविहीन नंगा करवा बैठेंगे । यही अब आप देख रहे हैं कि कराचीका समुद्र हमारे हाथमें नहीं है; आज वहां पाकिस्तानका अधिपत्य है; इससे भारतमाताका एकदेश नङ्गा हो रहा है यह स्वयं अनुभवकी बात है । अतः भारतीयताके प्रेमियोंको संघटन करके उस भागपर इस तरीकेसे आधिपत्य कर लेना चाहिये; जिससे हमारी भारतमाताको नग्नता दूर हो । हमारा ' हिन्दु ' नाम भी इसी ' सिन्धु ' के कारण हुआ था । इस बातको जाननेके लिये ' श्रीसनातनधर्मलोक ' चतुर्थ - पुष्पको मँगाकर उसमें ' हिन्दुशब्द की वैदिकता ' देखें | फिर इस भारतमाताके स्तन पर्वत बताये हैं । माताके स्तन जैसे वालकको दूध देते हैं; वैसे ही हिमालयादि पर्वत भी हमें वर्षा आदि ऋतुएँ, गङ्गा आदि नदियां दे रहे हैं । यदि यह पर्वत भी अभारतीयोंके हाथमें पड़ गये; तो यह अपनी माताका दूसरोंसे कुचग्रहण होना होगा, क्या ऐसी बात सह्य होगी? ' विष्णुपत्नी ' कहने से इस पृथिवीके पति विष्णु भगवान् बताये गये हैं, इससे भारतमाताका सौभाग्यवती होना और हमारा सपितृक होना भी सिद्ध है । इससे भारतीयको नास्तिकताका अबलम्बन न करना चाहिये, किन्तु विष्णु भगवान्का भक्त भी रहना चाहिये; तभी भारतीयता सम्पन्न होगी, यह सूचित हो रहा है । फलतः भूमिपर पांव रखने के समय हमें उससे क्षमा - प्रार्थना सोपपत्तिक है; तभी हम भारतभक्त बन सकते हैं ।

पृष्ठ 356

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३२८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ( ५ ) प्रातः मलसूत्रका त्याग और उसके नियम । ( क ) सब रोगोंका मूल मल हुआ करता है; और इसके विसर्जनका, युक्त समय प्रातःकाल है । उस समय मलमूत्र त्याग से शरीर स्वस्थ रहता है । यदि प्रातः पहले यही कार्य न करके पुरुष अन्य कार्य में लग जाय; तब उस समय मल - अवतरणकी प्रकृति भी धीरे - धीरे हट जाती है, और मलका दूषित रस रक्त में मिलकर मलको कठोर कर देता है, जिससे सब रोगोंकी जननी. बद्धकोष्ठता ( कब्ज़ ) उत्पन्न हो जाती है । मलका दूषित रस रक्त में मिलने पर रक्तविकार भी हो जाते हैं । रक्तदोष हो जाने पर खुजली, फोड़े आदि हो जाते हैं । शरीर और मुखमें दुर्गन्ध रह जाती है । प्रातः भी यदि हम मल- विसर्जन नहीं करते, तो वह मल भीतर पड़ा रहता है; फिर हम स्नान करने पर भी अशुद्ध रहते हैं । उस अशुद्धावस्थामें सन्ध्यावन्दन आदि ठीक नहीं जंचता । उसके बाद भोजनका क्रम आता है, पेट खाली न होनेसे किया गया वह भोजन रोगोंकी उत्पत्तिका कारण बन जाता है, अतः प्रातः मलमूत्र का त्याग बहुत ठीक होता है । उस समय वेग न होने पर भी जाने से फिर मल त्यागकी उस समय प्रकृति बन जाती है । ( ख ) मल - त्याग के समय सिर आवृत ( ढका हुआ ) रहना चाहिये । उस समय बोलना और थूकना भी ठीक नहीं; क्योंकि मलके परमाणु मुख- द्वारा भीतर जाकर हानि पहुँचाते हैं । उस समय खाते रहना, वा मुख चलाते रहना भी अच्छा नहीं; क्योंकि वैसा करनेसे पूर्वोक्त हानिके अतिरिक्त शरीर के ऊपरकी स्नायुओंको

पृष्ठ 357

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प्रातः मलमूत्रका व्याग ३२६ कार्य करना पड़ जाता है । तब निचले भागकी स्नायु वा पेशियां मलको बाहर करने में पूर्णरूपेण सक्षम नहीं हो सकतीं, और कोष्ठकी विशुद्धि न होने से वह कोष्ठबद्धता और भीतरी गन्दी वायुका विपाक्त धुत्रां मस्तिष्क में पहुँचनेसे वे कई प्रकारके रोगोंको उत्पन्न कर दिया करते हैं । इसीलिए वैद्य एवं डाक्टर लोग रोगीसे पहले टट्टी - पेशाबके लिए ही पूछते हैं । मन परमाणुरूप होनेसे एक ही इन्द्रियसे लगता है । यदि गुदके कार्य में संलग्न होनेपर उसे अन्य ऊपरके कार्यमें खींचा उपस्थित होंगे भी ठीक नहीं; आ जाते हैं । ' जिनियारी ' उसे पहर कर ( ग ) वायु, करना चाहिये जायगा; तो गुदकी पूर्ण शुद्धि न होने से वही दोष । अपने मल - मूत्रको उस समय आंख जमाकर देखना क्योंकि वे दूषित परमाणु मुख, नाक वा आंख में आंखोंके अग्रभागमें सूजन - सी हो जाती है, कहते हैं । जिन वस्त्रोंको पहरकर शौचालय जावे; भोजनादि भी न करे । अग्नि, सूर्य और पूज्यके सामने शौच भी नहीं । ऐसा करने से एक तो इन पूज्योंकी अवहेलना है । दूसरा स्वयं भी इनके सामने ठहरने से कुछ संकोच होता ही है । उस समयकी संकोचावस्था मलकी विशुद्धि पूर्णरूपसे नहीं होने देती । इसके अतिरिक्त सामनेको वायु मूत्रकी व दें जहां हमारे ऊपर डलवाएगी; वहां हमारे मलका दुर्गन्ध भी हमारी नाकमें पहुँचकर हमें हानि पहुँचावेगा । अग्नि, जल और सूर्य आदिके सामने मल - त्याग करनेसे शरीर के ऊपरकी स्नायुएँ स्वयं ही कार्य प्रारम्भ कर देती हैं; क्योंकि अत्यन्त उज्ज्वल और चंचल और

पृष्ठ 358

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३३० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ऊष्मावाली वस्तुओंके सामने होनेपर ऊपरकी स्नायुएँ स्वयं ही उद्दीप्त हो जाती हैं और कार्य करना शुरू कर देती हैं । जब शरीरके ऊपरी भागकी स्नायुओं में क्रिया प्रारम्भ हो जावे; तो निचले भागकी पेशियां अपने कार्यको ठीक नहीं कर पाती । तब कोष्ठविशुद्धि में बाधा आ पड़नेसे रोगोंका होना स्वाभाविक हो उठता है । सूर्य और अग्निके सामने मलत्याग करने पर हमारे तेज वा शक्तिकी क्षीणतासे मल ठीक नहीं उतरता; श्रतः शास्त्रों में वैसा करना निषिद्ध किया गया है । शास्त्र जो बात कहते हैं उसमें कोई हमारा हित ही अन्तर्निहित होता है, चाहे उसे हम न भी जान सकेँ, यह बात कभी भूलनी नहीं चाहिये । ( घ ) टट्टी - पेशाब खड़े होकर भी नहीं करना चाहिये । खड़े होकर पेशाब करनेवाले ब्राह्मणको भी ' अब्राह्मणोयं यस्तिष्ठन् मूत्रयति ' ( महाभाष्य, नब्बूसूत्र ) इस प्रकार निन्दार्थवाद से ‘ अब्राह्मण ' कहा जाता था । उसका तात्पर्य उसकी निन्दा में है कि — ऐसा नहीं करना चाहिये । बैठकर मूत्र तथा मल विधिसे उतरते हैं; खड़े होकर करनेसे एक तो छींटे अपने पर पड़ते हैं, दूसरा जोर लगाना पड़ता है, जिससे नसोंमें हानि पहुँचती है, तीसरा गली आदिमें शिश्न पकड़कर एक दीवार पर पेशाब करना असभ्यता भी है । यह पशु - व्यवहार है; जैसे कि — कुत्ते आदि किया करते हैं । ऐसा व्यवहार पतलून पहनने वालोंने जारी किया है; क्योंकि बैठ नहीं सकते । पर उनकी देखादेखी पजामे वा धोती पहननेवाले भी ऐसा करने लग गए हैं — इसीका नाम ' अन्धपरम्परा ' होता है;

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प्रातः मलमूत्रका त्याग ३३१ यह अंग्रेजी प्रसाद हैं । अव जिस प्रकार हमने अंग्रेजोंको समुद्र पार भेज दिया है; अब उनकी रीतियोंको भी समुद्र पार ही भेजना चाहिये । वही प्राचीन धोती श्रादिका वेप, तथा नीचे टिककर टट्टी पेशाब आदि करना चाहिये । वैसा करनेसे नसोंमें बहुत जोर नहीं लगाना पड़ता । असभ्यता भी नहीं होती । छींटे आदि भी अपने कपड़ोंपर नहीं पड़ते । इन्हें देखकर अपटुडेट लड़कियों का भी खड़े होकर ऐसा व्यवहार करना सुना गया है - यह और भी बुरा है । इससे अपने कपड़ेकी अपवित्रता होती है अतः यह ठीक नहीं । ( ङ ) ग्रामसे बाहर ही यथासम्भव मलमूत्र त्याग होना चाहिये । ऐसा होनेपर उस देश में रोग बहुलतासे नहीं हो पाते । जैसे श्मशानस्थान दुर्गन्धित परमाणुयुक्त होनेसे उस देशके लाभार्थ उस नगरसे बाहर रखा जाता है; वैसे ही मलस्थान भी बाहर ही होना उचित है; क्योंकि- – एक संकुचित स्थान होनेसे उसके दुर्गन्धका प्रभाव हम पर पड़ सकता है; पर बाहर खुले स्थान होनेसे उसका प्रभाव किसी पर नहीं पड़ता । पर शहर में ऐसा न होने से कई प्रकारके रोग घेरे रहते हैं; जिससे डाक्टरोंकी दुकानों को भी बढ़नेका अवसर प्राप्त हो जाता है । ग्रामवालोंका स्वास्थ्य नगर वालों की अपेक्षा इसीलिए अच्छा हुआ करता है, क्योंकि गांवके बाहर शोचार्थ जानेसे प्रातःकालकी विशुद्ध वायुका सेवन भी अनायास हो जाता है । घरमें बैठने से बढ़ी हुई आलस्यकी प्रवृत्ति हटकर जीवन पुरुषार्थमय भी हो जाता है । सर्दी - गर्मी से डर भी हट जाता है । इसके

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३३२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) अतिरिक्त नंगे पैरोंसे तुषार - ( स ) क्लिन्न शाद्वल ( तृणयुक्त - प्रदेश ) पर घूमनेसे स्वास्थ्य बढ़ता है और नेत्ररोग हटते हैं, जिससे बाल्यकालमें चश्मे लगानेकी आवश्यकता नहीं रह पाती । ( ६ ) लघुशंका आदिके अन्य नियम । लघुशंकाके बाद मूत्रयन्त्रको ताजे ठंडे जलसे धोना चाहिये, क्योंकि - मूत्र पित्त - प्रधान होता है । उसमें विषाक्त पदार्थ भी होते हैं । तब शाटिका आदिमें मूत्रांश लगने से जहां अशुद्धि रहती है, वहां कई प्रकारके रोगोंकी सम्भावना भी रहती है; अतः मूत्र-· यन्त्रका यथासम्भव प्रक्षालन उपयोगी है । उपस्थेन्द्रियके अग्र-भागमें कई ऐसी सूक्ष्म स्नायुएं होती हैं; जो थोड़ी भी उत्तेजना प्राप्त करके उत्तेजित हो उठती हैं । मूत्रोत्सर्गके समय उष्ण एवं दूषित मूत्रांशोंके स्पर्शसे उन स्नायुत्रों में उत्तेजना प्राप्त हो जाती है । जलद्वारा प्रक्षालनसे वह आशंका नहीं रहती । मुसलमान लघुशंका करके मूत्रांशके प्रस्रवणकी आशंकाके समय तक तत्काल उठाये हुए ढेले आदिके द्वारा शुद्धिमें लगे होते हैं । यह असभ्यता दीखती हुई भी बहुत कुछ अंश में ठीक है । हमारे पूर्वज भी उस समय उपस्थको भित्तिस्पर्श द्वारा शुद्ध करते थे । पर इन व्यवहारोंसे भी कुछ हानिकी आशंका रहती है; क्योंकि — गर्मी में उस दीवारके वा तत्काल उठाये हुए ढेलेके उष्ण होनेसे, तथा शीतकाल में उन दोनों के बहुत ठंडे होनेसे उनके स्पर्शसे उपस्थके द्वारा वह सर्दी - गर्मी अन्दर प्रविष्ट होकर उपस्थको हानि पहुँचा सकती है । अतः ताजे जलके द्वारा उपस्थ - शुद्धि ही