सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 401–410
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 401–410
पृष्ठ 401
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
मार्जन - विज्ञान ३७३ कुशोंका, अपामार्ग तथा दूर्वाका मार्जन उपयुक्त किया जाता है । कुशसे तेजगत दोष, अपामार्ग से विशेषरूप से रक्तगत दोष, और दूर्वासे शुक्रगत दोष दूर किये जाते हैं । कुशोंमें विसर्पदाह, रक्त - मूत्राशय और नेत्र रोगोंको शान्त करनेमें क्षमता है, और दूर्वा में रक्तपित्त, कफ, दाह, पिपासा और क्षयको दूर करनेकी योग्यता है, अपामार्ग में कफ, वायु, दाह, अर्श, कण्डू, जठररोग और रक्तपित्त एवं विषदोषको दूर करनेकी शक्ति है । इनसे मार्जनके द्वारा जब स्नान कर चुके हुए भी पुरुषके शुष्क शरीर पर शुद्ध, एवं अभिमन्त्रित जलकी बूंदें पड़ती हैं; तब आक-र्षणशक्तिके प्रभावसे अशुद्ध ऊष्मा बाहर निकल जाती है; बाहरी शुद्ध वायु और सूर्यकी किरणें भीतर जाकर अवशिष्ट अशुद्ध - परमाणुओं को भी निकाल देते हैं । शीतकाल में तो स्नान एवं मार्जनसे अशुद्ध ऊष्मा वा भाफका बाहर निकलना प्रत्यक्ष ही होता है; परन्तु ग्रीष्मकालमें वायुमण्डलकी रूक्षता तथा उष्णतासे वह भाप अति-सूक्ष्मरूप होकर उड़ जाती है; इसी कारण अदृश्य होती है । गर्मीकी ऋतुमें किसीकी आंखें आई हुई हों; अर्थात् दाहयुक्त हों; उसपर कुशाद्वारा दिनमें दो बार जलद्वारा मार्जन करनेसे नेत्रदाह शान्त हो जाता है । यदि किसीको बिच्छूने काटा हो; तब वह स्नान करके श्रद्धासे अपामार्ग ( विशेष बूटी ) द्वारा अपने पर मार्जन करवा ले, तब बिच्छूका विष भी दूर हो जाता है । इस प्रकार दूर्वा - द्वारा मार्जनसे दाह वा व्याकुलता नष्ट हो जाती है । आर्यसमाज-
पृष्ठ 402
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३७४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) प्रवर्तक स्वा ० श्रीदयानन्दजीने मार्जनके विषय में अपना नव्य— अनुभूत वैज्ञानिक (? ) आविष्कार भी अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ' सत्यार्थ प्रकाश में प्रकाशित किया है कि - मार्जनद्वारा नींद दूर हो जाती है । यह भी वैज्ञानिकतासें गई है । ( २७ ) अभिषेक । अभिमन्त्रित जलसे भरे घड़ेके जलसे नाम अभिषेक हुआ करता है । यज्ञके बाद होता है । साधारण रीति से भी शिरपर जल सन्ध्या में आती हुई एक नई कड़ी जुड़ मस्तकको सींचनेका यजमानका अभिषेक डालने से महान् लाभ होता है, तब यदि श्रभिमन्त्रित जलको विधि से डाला जावे; तो उसके लाभके विषयमें क्या कहना? आर्यसमाज प्रवर्तक स्वामी दयानन्दजीके गुरु स्वामी विरजानन्दजीके जीवनकी एक घटना है कि एकबार उन्होंने भ्रमसे संखिया अधिक मात्रा में खा ली । पता लगनेपर उन्होंने जलसे भरे घड़ोंका जल अपने सिरपर डलवाना शुरू किया । सायंकाल तक विषका प्रकोप सर्वथा शान्त हो गया । यह है अभिषेकका महत्त्व । ( २८ ) आचमन - विज्ञान | सन्ध्या में मार्जनके बाद संकल्प करना पड़ता है । संकल्पसे सृष्टिके समयका ज्ञान, अपने धर्मकी प्राचीनता, तथा वर्तमान देशी तिथि वार आदिके ज्ञानमें प्रवृत्ति बनी रहती है । इस पर ' विविध-पर्वविज्ञान ' में ' संवत्सरका आरम्भ ' में लिखा जायगा; यदि इस पुष्पमें स्थान निकल सका । फिर आसनशुद्धि एवं भूशुद्धि
पृष्ठ 403
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
याचमन - विज्ञान ३७५ अभिमन्त्रित - जलद्वारा करके — जिससे आसनके नीचे ठहरे कीटाणु दूर हो जावें, क्योंकि पृथिवीपर जल डालनेसे पृथिवीको ऊष्माका उद्वमन होनेसे कीटाणु दूर हो जाते हैं; फिर मन्त्र द्वारा आचमन किया जाता है । उसके फलके विषयमें शतपथ ब्राह्मणमें आया है — ‘ अमेध्यो वै पुरुषो यद् अनृतं वदति, तेन पूतिरन्तरतः । [ मनुष्य असत्य बोलने से भीतर से अशुद्ध है ] मेष्या वै आपः, मेध्यो भूत्वा व्रतमुपायानीति । पवित्रं वै आपः । तस्माद् वै अप उपस्पृशति, [ जल पवित्र होता है, आचमनसे पुरुष पवित्र हो जाता है ] ( १ | १ | १ | १ ) इस प्रकार द्राह्मायरणगृह्यसूत्रमें भी आया है— ' प्रत्युपस्पृश्य शुचिर्भवति ' ( १ | १ | १२ ) इससे आचमन हमारीः पवित्रता करनेवाला सिद्ध हुआ । यज्ञमें संस्कृतभाषाके अतिरिक्त हिन्दीभाषा बोलनेका निषेध है । जब जप आदि यज्ञों में निरत ब्राह्मणोंको अनिवार्यतावश हिन्दी में बात करनी पड़ती है; तो यह यज्ञमें विघ्न हो सकता है, क्योंकि अपभाषण से यज्ञमें अपवित्रतावश पराजय हो जाता है । महाभाष्य में लिखा है- ' तेऽसुरा हेलयो हेलय इति कुर्वन्तः पराबभूवुः ' दैत्य लोग यज्ञमें अशुद्ध बोल बैठनेसे हर गये । तब हिन्दीभाषा भी संस्कृतसे अपभ्रष्ट होने से यज्ञमें विघ्नका कारण बन सकती हैं; अतः यज्ञमें असंस्कृत वाणी कभी न बोले; पर अनिवार्यतावश बोलनी पड़े तो वहां अशुद्धता हो जाती है । अशुद्धि - निवारणका उपाय मुनियोंने बताया है कि उस समय आचमन कर ले । आचमनका अभिमन्त्रित जल भीतर पहुँचकर
पृष्ठ 404
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३७६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ऊष्मा उत्पन्न करके उन अशुद्ध परमाणुओं को जला डालता है; तब पवित्रता स्वतः हो जाती है । यह आचमनमें विज्ञान है । आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्दजीने आचमनमें विज्ञान (? ) यह बताया है कि सन्ध्या समय जो गलेमें कफ आ जावे; तो उसे आचमनसे फिर भीतर डाल लो, शुद्धि हो जावेगी । पर यह वात उचित नहीं दीखती । उस कफको वाहर निकाल देनेसे ही शुद्धि होती है, भीतर डाल देनेसे तो अशुद्धि ही होगी । और फिर कफावसिक्तत्व होनेपर तो शास्त्रों में आचमन का निषेध आया है— ' काससिक्को नाचामेत् ' ( गोभिलगृह्यसूत्र १।२।२५ ) । ' त्रिः पिवेद् अपो गोकर्णवद् हस्तेन, त्रिराचामेद् ' ( ४ | ७ | ३ ) यह बोधायनगृह्यशेषसूत्रमें आचमनको विधि आई है कि हाथको गायके कानकी तरह करके तीन - चार जल पीवे, यही आचमन है । मनुजी ने आचमनके कई भेद लिखे हैं । वे कहते हैं कि - ब्राह्म-तीर्थसे आचमन करे, वा प्राजापत्य वा देवतीर्थसे, परन्तु पित्र्यतीर्थ से आचमन न करे ( २।५८ ) । पित्र्यतीर्थ से पितरों का तर्पण करना पड़ता है; पर आचमन देवकार्य है; अतः पित्र्यतीर्थसे आचमन करनेका निषेध है, अंगुष्ठमूलके नीचे ब्राह्मतीर्थ माना गया है, कनिष्ठा अंगुलिके नीचे प्राजापत्य तीर्थ, अंगुलिके अग्रभागमें देवतीर्थ, अंगुष्ठ और तर्जनीके मध्य में पित्र्यतीर्थ माना गया है ( मनु ० २२५ ९ ) । तीन बार आचमनका फल यह कहा है- ' प्रथमं यत् पिबति,
पृष्ठ 405
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राचमन - विज्ञान ३७७ तेन ऋग्वेदं प्रीणाति । यद् द्वितीयं तेन यजुर्वेदं प्रीणाति, यत् तृतीयं तेन सामवेदं प्रीणाति ' ( वोधायनीयगृह्यशेषसूत्र ४ | ७१४ ) यहां तीन आचमनोंसे तीनों वेदोंकी प्रसन्नता कही है । इसीमें अन्यत्र कहा है — ' अथ अप आचम्य वाह्याभ्यन्तरतः पूतो मेध्यो यज्ञियो भूत्वा ' ( १ । ३ । १ ) यहां आचमनका फल बाहर - भीतरकी पवित्रता कही है । मनुजीने भी लिखा है - ' हृद्गाभिस्तु पूयते विप्रः कण्ठगाभिस्तु भूमिपः । वैश्योऽद्भिः प्राशिताभिस्तु शूद्रः स्पृष्टाभिरन्ततः ' ( २।६२ ) यहां भी आचमनका फल शुद्धि कही है । यहां जो प्रतिवर्ण में आचमनके जलके परिमाण में न्यूनाधिकता कही है कि ब्राह्मण आचमनका इतना जल ले कि वह हृदय तक पहुँचे, क्षत्रियका कण्ठतक पहुँचे इत्यादि; उसका कारण यह है कि जिस वर्णको अधिक शुद्धि अपेक्षित है; उसके जलका परिमाण भी अधिक कहा है । जिस वर्णको बहुत अधिक शुद्धिकी आवश्यकता नहीं होती; उसकेलिए न्यून जलका उपयोग कहा है । इसमें कफकी निवृत्ति प्रयोजन बतानेवाले स्वामी दयानन्दजी से प्रष्टव्य है कि सन्ध्या आदिके समय क्या ब्राह्मण - क्षत्रियादिके कफमें भी तारतम्य होता है? यदि ऐसा है तब तो जन्म से वर्ण व्यवस्था सिद्ध हुई; क्योंकि कफका तारतम्य जन्ममूलक हुआ करता है । नहीं तो ' सन्ध्या - समय कफमें भी तारतम्य होता है ' इसमें क्या युक्ति हो सकती है? यदि प्रतिवर्ण में कफ - तारतम्य नहीं होता, तो मनुजीने वर्णोंका आचमनके जलका भेद कैसे कहा? तब स्वामी दयानन्दसे प्रोक्त गले में ठहरे कफका निवर्तन असङ्गत ही है; उसका तो बाहर
पृष्ठ 406
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३७६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) निकालना ही ठीक है न कि जल- द्वारा उसको भीतर भेजना । ( २६ ) शिखाबन्धनका विज्ञान । इसका रहस्य हम शिखारहस्य में लिख चुके हैं । ( देखिये पृ ० १०५-१०६ ) ( ३० ) प्राणायाम वा समाधिका विज्ञान । सन्ध्या में आचमनके बाद गायत्रीमन्त्र पढ़कर जल द्वारा अपना वेष्टन किया जाता है । इससे अपनी कीटाणुओं से रक्षा होती है । क्योंकि वे जलकण जो भूमिपर चारों ओर पड़ते हैं, भूमि में ऊष्मा होनेसे जल पड़नेसे उस ऊष्मामें उद्वमन होनेसे वाष्प उत्पन्न होती है; वह वाष्प कीटाणुओं को दूर कर दिया करती है । फिर प्राणायामका क्रम होता है । हिन्दुधर्ममें प्राणायाम वा समाधिके बहुत माहात्म्य सुने जाते हैं । कई लोग उन्हें अर्थवादमात्र मानते हैं; पर ऐसा नहीं है । उसमें यथार्थता है, अर्थवाद वा असत्यता उसमें नहीं । प्रत्येक द्विजाति सन्ध्याकाल में प्राणायाम करता है । प्राणायाम द्वारा अशुद्ध विकारोंको बाहर निकालकर शुद्ध वायु अन्दर घुसाई जाती है । इससे आयु तथा तेज बढ़ता है । जलसे भी वायु सूक्ष्म होती है । शारीरिक बाह्य - अवयवोंकी शुद्धि जल और मट्टीके द्वारा होती है । परन्तु शरीरके अन्तःस्थित सूक्ष्म - अवयवों तक जल नहीं जा सकता; अतः वही शुद्धि बाहरी अक्सिजन गैससे की जाती है । अतः इससे आयु बढ़ती है । वही प्राणायाम बढ़कर समाधि रूपमें आ जाता है ।
पृष्ठ 407
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्राणायाम वा समाधिका विज्ञान ३७६ वैज्ञानिकोंका कथन है कि - जो कि हम नींद प्राप्त करते हैं; उसका कारण यह है कि हमारी भीतरी वायु दूषित हो जाती है । उस समय हमारी जम्भाइयाँ शुरू हो जाती हैं, जिससे बाहरी शुद्ध वायु - आक्सिजन हमारे भीतर आवे, परन्तु रात्रि आदिके कारण तमोगुणकी बहुलतासे प्रचुर -परिमाण में शुद्ध वायु प्राप्त न होने से भीतरी वायु बहुत दूषित हो जाती है, जिससे हम मूच्छितसे हो जाते हैं, इसीकी परिभाषा ' निद्रा ' कही जाती है । यही मूर्च्छा वढ़कर महानिद्रा हो जाती है, जिसकी परिभाषा ' मृत्यु ' हुआ करती है । प्रातःकाल प्राप्त होनेपर सत्त्वगुणकी प्रवृद्धि होनेसे क्रमशः शुद्ध वायुके नासिका - द्वारा भीतर प्राप्त होनेपर वह मूर्च्छा क्रम - क्रमसे हट जाती हैं, जिसकी परिभाषा ' जागरण ' कहा जाता है । आक्सिजन गैसके टोप वैज्ञानिक लोग बना चुके हैं; इन्हें सिरपर, मुँह पर निरन्तर पहरनेसे युद्धों में विषाक्त गैसोंसे रक्षा होती है; क्योंकि उन टोपियोंमें आक्सिजन गैस भरी रहती है; जिससे भीतर शुद्ध वायुका प्रवेश रहनेसे उन विषाक्त गैसोंसे होनेवाली मूर्च्छा नहीं होती । अब वैज्ञानिकोंका विचार है कि इन आक्सिन टोपियों में हम और उन्नति करें । इनके निरन्तर पहिनने से हमारे अन्दर भी निरन्तर शुद्ध वायु रहेगी, जिससे हम न तन्द्राको प्राप्त करेंगे; न जम्भाइयाँ आवेंगी, न हमें मूर्च्छारूप नींद आवेगी । इसी प्रकार हमें महानिद्रा ( मृत्यु ) भी नहीं आवेगी । हम थकेंगे भी नहीं; हम
पृष्ठ 408
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३८० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) अमर बन जायेंगे । परन्तु यन्त्रोंकी परतन्त्रता भी ठीक नहीं होती । एक तो उनमें परतन्त्रता है, और उन यन्त्रों में बहुत भारी मूल्य लगेगा; और वह रुपया विदेशों में जाएगा । और वे यन्त्र प्रचुर मात्रा में मिल भी न सकेंगे; जिससे सर्वसाधारण उन्हें खरीद सकें । इसी कारण हमारे प्राचीन महानुभावोंकी आधिभौतिक यन्त्रों में कभी भी आस्था नहीं रही । वे ' पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं ' ' पारतन्त्र्यं महद् दुःखं स्वातन्त्र्यं परमं सुखम् ' इत्यादि बातोंको विचार कर आध्यात्मिक तथा स्वतन्त्र - यन्त्र बनाते थे । उसमें कुछ खर्च भी नहीं होता था, नास्तिकता भी नहीं बढ़ती थी; पारस्परिक होड़ भी नहीं बढ़ती थी- जिससे महायुद्ध शुरू हो जाते हैं । वे स्वतन्त्र यन्त्र हैं-प्राणायाम एवं समाधि । पवित्र देश - काल में प्राणायाम एवं समाधि जोड़ने से और क्रम - क्रम से समाधिके कालकी वृद्धि करनेसे बाहरसे भीतर प्रचुर मात्रा में आक्सिजन गैस भरती रहती है; और भीतरकी खराब गैस बाहर निकलती रहती है । फिर साथ हो ब्रह्मचर्य और - योगका अवलम्बन, इससे पुरुषकी आयु बढ़ती है और अमरता भी प्राप्त हो जाती है । तभी तो श्रीमनुजीने कहा है- ' ऋषयो दीर्घ-सन्ध्यत्वाद् दीर्घमायुरवाप्नुयुः ' ( ४।६४ ) अर्थात् लम्बी सन्ध्या करने से जिसमें प्राणायाम आदि अङ्ग जाते हैं — ऋषियोंने बड़ी लम्बी आयु प्राप्त की । अब इस विषय में भी वैज्ञानिक सहमत होगये हैं । वे कहते हैं कि मनुष्य - शरीर के कार्य कुछ शताब्दियों तक रोककर वे फिर
पृष्ठ 409
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्राणायाम वा समाधिका विज्ञान ३८१ चलाये जा सकते हैं । इस प्रकार जब तक पुरुष समाधिकेलिए अपना उपराम करेगा, उस समयकी गणना उसकी शारीरिक आयु के साथ नहीं होगी । यदि कोई शतवर्षजीवी पुरुष व युवक है, पच्चीस वर्षकी आयु में उसने प्राणायाम वा समाधि शुरू की; पाँच वर्ष वा दस वर्षके बाद वह समाधि से उठा; तब उसके अङ्ग २५ वर्षकी अवस्थावाले ही रहेंगे । वे समाधिके दस वर्ष तो सूदकी तरह उसे स्वयं मिलेंगे । तब समाधिसे उठकर वह अवशिष्ट ७५ वर्ष जीवित रहेगा । इसका उदाहरण भी लीजिये - घड़ी बनानेवाले घड़ीकी ( गारण्टी ) पाँच वा दस साल आदिकी देते हैं । उसकी वह गारण्टी चलाने के समय से ही प्रारम्भ होगी । जितने समय तक वह घड़ी, घड़ीके कार्यालय में विना चले रहेगी, वे वर्ष उसकी आयु में नहीं गिने जाते । उस घड़ीको चलाकर उसे फिर तीन वर्ष तक स्थगित कर दिया जावे; तब फिर उसके चलानेपर अवशिष्ट दश वर्ष तक वह जीवन प्राप्त करेगी । परन्तु उस स्थानमें यदि उस घड़ीमें मैल घुसेगी; तभी उसकी अपेक्षित आयु होगी । यदि उसमें मैल प्रवेश कर जाए; तब उसकी आयु उतनी न हो सकेगी । इस प्रकार शरीरके कार्य त्याग करनेपर भी उसमें मलसंक्रम हो सकता है; जिससे उसकी आयुमें कमी पड़ सकती है । इसलिए शास्त्रकारोंने उसमें प्राणायाम वा समाधिरूप उपाय कहा है, जिससे शरीरकी शुद्धि होती रहे । इसी प्राणायाम एवं समाधि से योगी लोग अपनी आयु लम्बी कर लेते थे । इसके अतिरिक्त ब्रह्ममें अवस्थान
पृष्ठ 410
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३८२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ) ५ होनेसे उसके सम्बन्धसे ब्रह्मकी शक्ति भी शरीरके अन्दर प्राप्त होती रहती है । प्राणायाम करनेपर शारीरिक भीतरी अवयवों में वायुके पर्याप्त भर जाने से वक्षःस्थल विशाल और कठोर हो जाता है । प्रो ० राममूर्ति अपनी छाती पर हाथी चढ़वा लिया करते थे । यह प्राणायामकी महिमा है 1 । मोटर वा वाई- साइकल के पहियों में वायुके भरनेसे उस पर बहुत पुरुष बैठ सकते हैं, और मोटर वा साइकल शीघ्र चल पड़ता है । इस प्रकार प्रारणायाम करनेपर छाती में अद्भुत शक्ति हो जाती है; तब उसपर हाथीका चढ़ाना भी कठिन नहीं रहता । प्राणायामसे आयुके बढ़नेका प्रकार कहा ही जा चुका है; क्योंकि - प्रत्येक पुरुषका श्वास - परिमाण नियत हुआ करता है । जब श्वासोंकी समाप्ति हो जाती है; तो मृत्यु हो जाती है । इस कारण योगी लोग न्यून श्वास लेते हैं, प्राणोंको रोकते हैं, और उनकी आयु उनकी इच्छानुकूल बढ़ती है । मैथुन और कुश्ती आदि में लोगोंके श्वास साधारणतः अधिक खर्च होते हैं; इसलिए बहुत सांस लेनेवाले थोड़ी आयु पाते हैं । व्यायाममें भी यद्यपि श्वासोंका बहुत खर्च होता है, तथापि वह व्यायाम हमारे शरीरको सम - विभक्तावयव कर देता है । इसलिए लाभदायक होनेसे उसे छोड़ना नहीं पड़ता । परन्तु व्यायाम भी अल्पमात्रामें करना चाहिये । उसमें श्वासोंको मुखसे न निकालकर -धीरे - धीरे नाक द्वारा निकालना चाहिये । ऐसा होनेपर उसमें भी प्राणायाम - सदृश लाभ हुआ करता है ।