सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 391–400
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 391–400
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देवकार्य पूर्वाभिमुख ३६३ सम्भव है यह रोगके विरुद्ध ही युद्धकी विजय - दुन्दुभि हो, अस्तु । यद्यपि प्राचीन ऋषि - मुनियोंने एतदादि विज्ञान अपने मुखसे नहीं कहे; तथापि उन्होंने इस विषय में एतदादिक ही विज्ञान अपने हृदय में निहित किया था— यह उनके उक्त पदार्थोंके लिए बहुत बल देनेसे स्फुट हो रहा है । यह हमने बहुत बार कहा है, और यह ठीक भी है कि — उनकी एकदादिक विधियोंका साक्षात् उद्देश्य तो मुष्मिक फल ही था; परन्तु वे ही विधियाँ ऐहिक फलको भी रखती हैं, जिससे हमारा शरीर शुद्ध और स्वस्थ रहे । ' शरीर-माद्यं खलु धर्मसाधनम् ' । इसी शरीरके द्वारा ही तो कर्म करनेसे पारलौकिक फल मिल सकता है; तब पारलौकिक भी विधियां ऐहलौकिक भी स्वतः सिद्ध हुई । तब जो यज्ञोपवीतकाल से ही मृगचर्मका धारण ब्रह्मचारीको आदिष्ट किया है; सो ब्रह्मचर्यकाल से ही उसका उपक्रम मृगवाली सात्त्विकता लाने एवं हमें जर्जर कर डालनेवाली भावी व्याधियोंके निवारणार्थ ही था, जिससे ' न रहे बांस न बजे बांसुरी ' रोगोंकी आशङ्काका बीज ही नष्ट हो जावे । यह यहाँ स्पष्ट हो रहा है । ( २१ ) देवकार्य पूर्वाभिमुख । स्नानादि करके फिर सन्ध्योपासनादिका क्रम होता है; यह आवश्यक है । जिस परमात्माने हमें संसार में भेजा, जिसकी शक्ति रूप देवताओंने हमारी सत्ताको स्थिर किया, हमारा संरक्षण किया; यदि हम उन देवताओं तथा देवदेवके लिए पन्द्रह - बीस मिनट समय निकालकर उनकी उपासना करके दूसरे रूपमें उनकी
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३६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) कृतज्ञता स्वीकार नहीं करते; तो हमसे बढ़कर दूसरा कृतघ्न कौन हो सकता है; आगे भी हमें उन्हींसे अपने मनोरथों को प्राप्त करना है, उन्हींके आश्रयसे सांसारिक कार्य निर्वाह करना है; अतः सन्ध्योपासन हमारा आवश्यक कर्म वा नित्यकर्म ठहरता है - इस को छोड़नेसे हम कृतव्न एवं शूद्रवत् हो जाते हैं । अतः इसे कभी नहीं छोड़ना चाहिए । यह देवकार्य है । देवकार्य पूर्व दिशा वा उत्तर दिशा की ओर मुख करके किये जाते हैं । ' प्राची हि देवानां दिकू ' ( शतपथ ० ११७११।१२ ) यहां देवताओंकी दिशा पूर्व कही गई है । देवताओंके राजा इन्द्रकी • दिशा भी पूर्व मानी गई है । जैसे कि अथर्ववेद संहितामें कहा है — ' प्राच्या दिशस्त्वमिन्द्रासि राजा ' ( ६६८३ ) । ' इन्द्रः प्राङ् तिष्ठन् ’ ( अथर्व ० ६।१२।२२ ) । देवताओंकी दिशा पूर्व है — यह प्रत्यक्ष भी है, देवतारूप जितने ग्रह - नक्षत्र हैं; वह पश्चिम से पूर्व की ओर जा रहे हैं; इससे स्पष्ट है कि - वही उनकी दिशा है । स्थावर - जङ्गमके आत्मा सूर्य आदिका उदय भी तो पूर्व दिशामें ही दीखता है । पश्चिम अस्तकी दिशा है । सूर्यके साथ सन्ध्याका सम्बन्ध होनेसे सायं -सन्ध्या पश्चिमाभिमुख भी होती है; शेष सब देवकर्म पूर्वाभिमुख ही होते हैं । इससे भारतीयोंको यह भी संकेत हो रहा है कि-तुम भी पूर्वके भक्त बनो; तुम्हारा भी उदय होगा । यदि पश्चिमके भक्त बने; तो तुम्हारी भारतीयता का भी अस्त होगा । पूर्व दिशासे ही प्राणशक्तिका अभ्युदय होता है । पूर्व दिशा तेजस्विनी दिशा होनेसे हमारी भी तेजस्विता का कारण बनती है । उत्तर दिशा
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चन्दन तिलक धारण ३६५ भी देवताओंकी दिशा मानी गई है । उत्तरायण होनेपर सूर्यका इधर ही झुकाव होता है । देवयान भी इधर ही माना गया है । उत्तरायण ही देवताओंका दिन होता है । देवाधिदेव महादेवकी ईशानकोण भी पूर्व और उत्तर दोनोंसे ही मेल खाती है । अतः देवकार्य पूर्वोत्तर ओर अभिमुख होकर करना निराधार नहीं । ( २२ ) चन्दन - तिलक धारण- विज्ञान । स्नान के बाद सन्ध्याके अवसर में अपने देवको चन्दन चढ़ाकर स्वयं माथेमें चन्दनका तिलक लगाना भी प्राचीन रीति है । जैसे कि आपस्तम्बगृह्यसूत्रमें कहा ' है - चन्दनेन ' उत्तरैर्देवताभ्यः प्रदाय, उत्तरया अनुलिप्य ' ( ५ । १२ । १८ ) । मीमांसादर्शन के शावर भाष्य में भी कहा है – ' देवाय धूपो देयः पुष्पाणि अवकरितव्यानि, चन्दनेन अनुलेप्तव्यः, उपहारोस्मै उपहर्तव्यः, एवं कृते देवस्तुष्यति ' ( ५।१४ ) यहां देवताको चन्दन चढ़ानेसे देवताकी प्रसन्नता बताई गई है । अस्तु । चन्दन लगाना जहां पुण्यकार्य है, वहां लाभ - दायक भी । इससे दुर्गन्ध आदि दूर होती है । जो कि आजकलके व्यक्ति पुण्य नहीं मानते; उसमें उनके मस्तिष्ककी निर्बलता ही कारण है । यदि वे मस्तकमें चन्दन लगावें; तो उनका मस्तिष्क भी बलवान् बने । बात यह है कि — मस्तक में ऊष्माकी स्थिति होनेसे ही मस्तिष्कमें विकृति उत्पन्न होती है, और मस्तिष्ककी विकृति से ही दुष्कर्म होते हैं । मस्तकमें चन्दन लगानेसे उसमें ठण्डक रहती है, जिससे मस्तिष्क प्रकृतिस्थ ( स्वस्थ ) रहता है । मस्तिष्कके स्वास्थ्य में सुकर्म होते हैं;
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३६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) अतः चन्दन लगाने में पुण्य स्पष्ट ही है । ' दुर्गन्धादिके दूर करनेके प्रयोजन. वाले चन्दनानुलेपनका धर्मसे सम्बन्ध कैसा? ' प्रतिपक्षियों को अपने इस प्रश्नका उत्तर अपने हवन - द्वारा जान लेना चाहिए । जैसे वे भी दुर्गन्धादि दूर करना ही हवनका प्रयोजन मानते हैं; तथापि जैसे उसे धर्म - कर्म कहते हैं, वैसे यहां भी समझ लेना चाहिए । वहाँ सारे देशका उपकार माना जाता है, यहाँ प्रत्येक व्यक्तिका होकर क्रमश: समाज का, इस प्रकार समूचे देशका उपकार हो जाता है । ' अनुलिप्तं परार्थ्येन चन्दनेन परन्तपम् ' ( वाल्मीकि ० २।१६।६ ) यहाँ भगवान् रामका चन्दनानुलेपन स्पष्ट है । श्रीराम मर्यादा-पुरुषोत्तम थे; अतः चन्दनका लगाना भी प्राचीन मर्यादा हुई । चन्दनके गुण राजनिघण्टुमें कहे गये हैं, तब उसके अनुलेपन करनेवालेको भी वे ही गुण प्राप्त होंगे । तब जहाँ चन्दनानुलेपन की प्राचीनता सिद्ध हुई; वहां वैज्ञानिकता भी ॥ वैज्ञानिकता यह है - नासिकामें दो विजुलियाँ रहती हैं, एक नैगिटिव, दूसरी पाज़िटिव । एक ठण्डी होती है, दूसरी गर्म । ये दोनों यहां से मस्तक तक दो नसोंके रूपमें प्राप्त हैं । जब विद्य त् - प्रवाह प्रवाहित होता है; तब उसमें ऊष्मा बढ़ती है । उसमें ठंडक रखनेकेलिए मस्तकके ठीक मध्य में चन्दन तिलक लगानेका विधान है; नहीं तो विद्युत् प्रवाहसे ऊष्मा बढ़ जानेपर मस्तिष्कमें भी ऊष्मा जा पहुँचने से या पाप - सम्भावना होती है - या मस्तिष्ककी नस ही टूट जाती है, जिससे जीवन की भी समाप्ति हो जाती है । चन्दना-
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भस्म तिलक - विज्ञान ३६७ नुलेपन उस आशंका को दूर करता है, इसके कारण अकालमृत्युकी सम्भावना नहीं रहती । अविश्वासियोंको इस विषय में अविश्वास दूर करके इस वैदिक आदेशका अनुसरण करना चाहिए-' ओषधयः शान्तिः ( यजु ० ३६।१७ ) । ( २३ ) भस्मतिलक - विज्ञान । हिन्दुधर्म में बहुत से व्यक्ति माथेपर भस्म धारण भी करते हैं, यह भी महत्त्वपूर्ण नियम है । परन्तु आज के नवशिक्षित इससे भी घृणा करते हैं; पर यह ठीक नहीं । नवशिक्षितोंके दादागुरु स्वामी दयानन्दजी भी चन्दन लगाया करते थे; यथासमय भस्म भी -यह उनके जीवनचरित्रमें स्पष्ट है । तब दूसरों पर आक्षेप कैसा? वस्तुतः भस्मधारण भी महत्त्वपूर्ण है । हिन्दुओंके आराध्यदेव महादेव भी भस्म लगाया करते हैं; साधु एवं योगी भी भस्म लगाते हैं । भस्मधारणसे तेजकी रक्षा रहती है । उससे शीत नहीं लगता, तभी तो साधु सब अङ्गों में भस्म लगाकर शीतकालकी रात्रियोंको बिता दिया करते हैं, सन्धुक्षित की हुई अग्नि भस्म में जितना अपना तेज स्थापित कर सकती है; उतना बाहर नहीं । बाहर जल्दी समाप्त हो जाती है । कोंकी शङ्का होती है कि- ' भस्म लगानेसे रोमकूप बन्द हो जाएंगे; उस दशामें ' कार्बोनिक गैस ( विषाक्त वायु ) भीतर से बाहर न जा सकेगा; और ऑक्सिजन गैस ( प्राणप्रद वायु ) बाहर से भीतर न जा सकेगी । तब भस्म लगानेवाला बीमार पड़ जाएगा ' । पर यह आशङ्का व्यर्थ है । भस्म स्वयं ऑक्सिजन वायुको खींचकर
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३६८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) भीतर प्राप्त कराती है; और भीतरी दूषित विकारोंको बाहर कर देती है । बाहर संधुक्षित हो रही हुई ईन्धन लोगोंकी आँखोंको दुखाती है, परन्तु राख में गाड़ी हुई वह आँखोंको नहीं दुखाती । जव उसके ऊपर घाम पड़ती है; तव जल- तरङ्गकी भांति ज्योति नीचे - ऊपर यातायात करती है; इस प्रकार भस्म लगानेवाले के भी विकारी द्रव्य बाहर निकल जाते हैं; परन्तु प्राणरक्षक तेज नष्ट नहीं होता । भस्ममें पोटास, सोडा, चूना, मैगनेशिया, लोहभस्म, एल्यूमिना, सिलकनभस्म आदि अनेक गुणकारी पदार्थ मिले हुए होते हैं । इसलिए भस्म तेजकी रक्षा करती है, रोम कूपोंको खोलती है, दुर्गन्ध वा मलको नष्ट करती है, खराब वायुको बाहिर निकालती है, शुद्ध वायुको अन्दर लाती है, जठराग्नि ( भूख ) को बढ़ाती है, त्वचाको स्वच्छ करती है, ब्ररण वा ज़रूमको शुद्ध करती है, विष हटाती है, कृमियोंको दूर करती है; ज्वर, सर्दी, वातपित्त, शूल, रक्तविकार, बीमारी, प्लेगरोग, त्वचारोग और उदर रोगोंको दूर करती है । जठराग्निको पोषण करनेका प्रमाण यह है कि - जैसे भस्ममें गाड़ी हुई अग्नि परिपुष्ट होती है; बाहर वाली अग्नि वैसे नहीं; वैसे ही जठराग्नि भी भस्मयोजन से बढ़ती है । दुर्गन्ध दूर करना यह भस्मका स्वाभाविक गुण है । विकृत जलमें भस्मके डालनेसे उसका दुर्गन्ध दूर होता है । भस्मसे बिच्छूका विष भी दूर होता है । भस्मसे आयु भी बढ़ती है; उसका कारण यह है कि - हमारी
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भस्म - तिलक विज्ञान ३६४ आयु हमारे तेज पर आश्रित है । जब तक तेज सुरक्षित है; तब तक तेज बढ़ता है । भस्म तेजको स्थिर करती है; अतः उससे आयु बढ़ती है; इसीलिए ' त्र्यायुषं जमदग्नेः ' ( यजुः ३।६२ ) इस मन्त्र से जो यज्ञकी भस्म माथा, ग्रीवा, और हृदयमें लगाते हैं; उसमें बड़ी आयु दिखलाई गई है । फलतः संसारमें कोई भी ऐसा रोग नहीं है, जिसे भस्म, भस्म न करती हो । इसीलिए आयुर्वेद में भस्मकी महिमा अधिकता से मिलती है । वैद्य सुवर्णादि धातुओंका संशोधन कर उसकी भस्म बनाकर रख लेते हैं; जिनसे वे भयङ्कर रोगोंको दूर करते हैं । सुवर्ण, पारदादिकी भस्ममें जैसे वे वे गुण होते हैं; वैसे ही गोबरकी भस्ममें भी गोबरके गुण रहा करते हैं । गोबरके गुण आगे कहे जायेंगे । इस प्रकार होलीकी भस्ममें उसकी विशेषतावश विशेष गुण होते हैं । बच्चोंकी आँखों पर उसे बाँधनेसे गर्मीके समय आई हुई आँखोंकी लालिमा शान्त हो जाती है । बच्चोंके गलेमें भी उसे यन्त्र ( ताबीज ) की भांति बाँधा जाता है; जिससे उसकी भूत-प्रेतादिसे रक्षा होती है । भूत - प्रेत आदि योनियाँ भी हैं; इसका निरूपण ‘ श्रीसनातनधर्मांलोक के किसी अन्य पुष्पमें होगा; वेद और उपवेदसे उनकी सिद्धि की जाएगी । यज्ञकी भस्म तो अभि-मन्त्रित होनेसे और चरुका परिणाम होनेसे अधिक लाभ - प्रद होती है । इसीलिए ' त्र्यायुषं जमदग्नेः ' इस मन्त्रके द्वारा उसे ललाट, ग्रीवा, स्कन्ध तथा हृदयादिमें जोड़ना गृह्यसूत्रों में कहा है । जिस प्रकार सोने, चाँदी, हीरा, मोती आदिकी भस्म अनेक रोगों २४ स ० ध ०
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३७०. श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) को दूर करने में समर्थ होती है; वैसे ही यज्ञ भस्म भी किसी बढ़िया से बढ़िया ओषधिकी अपेक्षा कम महत्वपूर्ण नहीं | इसके उपयोग से जहाँ अनेक शारीरिक रोग दूर होते हैं; वहाँ उन्माद, बुद्धिमन्दता, उत्तेजना, आवेश आदि मानसिक रोगोंका भी निवारण होता है । मस्तक पर यज्ञभस्सका तिलक लगाने से आज्ञाचक्र, सहस्र-दल - कमल, ब्रह्मरन्ध्र आदि अनेकों सूक्ष्म आध्यात्मिक केन्द्रोंका विकाश होता है । हृदय पर लगाने से सूर्य - चक्र जागरित होता है । अन्तःकरण - चतुष्टयमें तामस तत्त्व घटकर सात्त्विक तत्त्व बढ़ जाते हैं । यज्ञकी अग्नि घी पीकर बलवान् हो जाती है, उसकी भस्म में भी वही गुण होता है । तब उसकी भस्मका तिलक लगाना कोई उपहासकी बात नहीं । कई योगियोंका चिताभस्म लगाना - इस बातके. स्मरणार्थ है कि - कभी हम भी इसी प्रकार जलेंगे; अतएव इस संसार के लिए किसी दूसरेकी हानि न करें; असत्कर्म न करें-इत्यादि । इस प्रकार भस्मका धारण भी महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ । ( २४ ) मूर्तिपूजा - विज्ञान सन्ध्योपासनाके समय देवमूर्ति - द्वारा देवकी पूजा भी की जाती है; पर अर्वाचीन लोग मूर्तिको जड़ मानकर उसकी पूजा ' करते हैं; पर उन्हें जानना चाहिये कि -जड़ ही जड़ ( मूल ) -सबका आधार हुआ करती है । जड़ - सेवाके बिना किसीका भी कार्य नहीं चलता । दूसरेके आत्माकी प्रसन्नतार्थ उसके आधारभूत जड़ - शरीर वा उसके अङ्गोंकी सेवा करनी पड़ती है । परमात्माकी उपासनार्थ भी उसके आश्रय - स्वरूप जड़ प्रकृतिकी पूजा करनी पड़ती है । वायु
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मूर्तिपूजा - विज्ञान ३७१ लोकदृष्टिमें जड़ है, पर क्या उसकी सेवाके बिना कोई भी प्राणी जी सकता है? जड़ - अग्निकी सेवाके बिना क्या आप कोई कार्य कर सकते हैं? क्या अपना पेट भी पाल सकते हैं? जड़ - जलके सेवनके बिना क्या कोई रह सकता है? धन भी जड़ है, उसकी उपासनाके विना भी कोई पुरुष सांसारिक निर्वाह कर सकता है क्या? जड़ - प्रकाशकी उपासना करके आप कितने लाभ उठाते हैं । इस प्रकार जब आप सर्वत्र जड़ोपासना ही कर रहे हैं; तब आप मूर्तिपूजा से क्यों घबड़ाते हैं? उसमें तो आप जड़के द्वारा अणु - अणुमें व्यापक चेतन ( सच्चिदानन्द ) की पूजाको कर रहे होते हैं । आपका शरीर जड़ है; क्या उसके बिना भी आप कोई उपासना कर सकते हैं?? शब्द भी जड़ है; उसकी उपासनासे तो सारा संसार लाभ प्राप्त कर रहा है, निश्चित वृत्त जान रहा है । आप जिस बुद्धि वा जिस मनको आधारभूत करके परमात्मा का ध्यान कर रहे होते हैं; क्या वे भी जड़ नहीं हैं? आप ( आप्ता ) भी तो मानते हैं कि- परमात्मा भी जड - प्रकृतिके बिना कुछ भी नहीं कर सकता, सृष्टि भी नहीं कर सकता । तब सिद्ध हुआ कि - जड और चेतनका परस्पर सम्बन्ध है । तब परमात्मा भी किसी मूर्तिके बिना उपास्य कैसे हो सकता है? बिजुली तबतक प्रकट नहीं हो सकती, जबतक उसके साथ प्रकट करनेवाला केन्द्र - काचका लट्ट ू न लगाया जावे, वा बिजलीका पंखा उसका आधार न हो । इस प्रकार ईश्वर भी केन्द्र से प्रकट होता है, जैसे गायका दूध गायके स्तनको द्वारीकृत करके प्रकट
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३७२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) होता है, यद्यपि वह दूध उसके सारे अङ्गों में व्याप्त होता है | दूध वा माखन गायसे चाहे अभिन्न हैं; लेकिन गायकी पुष्टचर्थ उन्हें गायसे भिन्न किसी पानमें दुहकर वा मथकर उसे गाय को खिलाने पर ही गायकी पुष्टि हुआ करती है, वैसे ही परमात्मा हममें सर्व-व्यापक होनेपर भी उसे किसी मूर्ति में प्रतिष्ठित करके उसकी उपासना ही हमें लाभप्रद हो सकती है । मूर्तिपूजाके पूर्ण - रहस्य-ज्ञानार्थ पाठकोंको ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थमालाका चतुर्थ पुष्प हमसे मंगाना चाहिये । ( २५ ) चरणामृतका विज्ञान । मूर्तिपूजा में चरणामृत भी हुआ करता है । शालग्राम- मूर्ति में सुवर्णका अंश रहता है । कसौटीके पत्थर में भी सुवर्णत्व होने से सुवर्णकी चमकीली रेखा खिंचती है । सुवर्णसे वेद १०० वर्षकी श्रायु मानता है । उस शालग्रामके साथ गङ्गाजल भी होता है, तुलसीपत्र भी । इस प्रकारका चरणामृत ' अकालमृत्युहरण ' हो यह स्वाभाविक है । इसकी स्पष्टता आगे होगी । ( २६ ) मार्जन - विज्ञान । अब सन्ध्याके अङ्गोंपर विचार किया जाता है । उसमें पहले मन्त्रद्वारा मार्जन करना पड़ता है । मार्जनमें शोधनकी अद्भुत क्षमता है । जब कारण - विशेषसे या रोगादिसे स्नान नहीं किया जा सकता; वहाँ स्नानका प्रतिनिधिभूत मार्जन प्रयुक्त किया जाता है । मार्जनसे शरीर- गत सूक्ष्मदोष हट जाते हैं । प्रायः दोष तेज, रक्त तथा शुक्रमें रहा करते हैं । इन तीन प्रकारके दोषोंकी निवृत्त्यर्थ