सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 421–430
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 421–430
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जप - पाठविज्ञान ३६३ करती हैं । शब्दोंके क्रमविशेषसे ही सङ्गीत वन जाता है, जिससे पशु - पक्षी भी प्रभावित होते हैं । इससे शब्द की अचिन्त्य शक्तिमें किसीका भी विरोध नहीं हो सकता । मन्त्र - शास्त्र भी शब्दक्रम पर ही निर्भर है | कई क्रियाओंका मन्त्रसे विधान होनेसे विशिष्ट प्रभाव उत्पन्न होता है । उन्हीं मन्त्रोंका संग्रह मन्त्रभाग - वेद प्रसिद्ध है । उपवेद आयुर्वेद में भी मन्त्र होते हैं; इस प्रकार तन्त्र - शास्त्रमें भी । मन्त्रशक्तिसे ही ब्राह्मण वृष्टि करवाने वा रोकने में समर्थ होते हैं - यह प्रसिद्ध ही है । इस विषय में हम कलकत्ताके ‘ विश्वमित्र ' ( मासिक - पत्र ) में प्रकाशित आर्यसमाजी श्रीसन्तराम बी. ए. के ' रहस्यमय भारत ' लेखका एक अंश उद्धृत करते हैं-“ मन्त्रबलसे वर्षा बन्द ”... इसी प्रकार हाल में ' एस्ट्रालोजिकल मेगज़ीनमें ' एक लेख छपा है । उसमें लिखा है - लामा लोग मन्त्र-बलसे ओले बरसा सकते हैं; और वर्षा बन्द कर सकते हैं । इस सचाईका अब स्पष्ट रूपसे प्रदर्शन किया जा सकता है, जो लोग आध्यात्मिक अनुभवोंको समझ नहीं सकते; वे केवल इनको विशृङ्खलित - बुद्धि लोगोंकी साक्षियां कहकर बहुधा हँसा करते हैं, परन्तु इस प्रकारके मनोभावके मूलमें है अविद्या, और आजकल में दी जानेवाली एकपक्षीय शिक्षा । उसी पत्रिका में के शिक्षणालयों फिर लिखा है- ' वर्षाको बन्द करनेकेलिए एक तुरही ली जाती है । इसके बाहरकी ओर सांकेतिक चिह्न बड़े सुन्दर ढङ्गसे खुदे होते हैं, और उसके भीतर सुवर्ण आदि अनेक धातुओं के टुकड़े कुछ गोरी सरसोंके दानोंके साथ इकट्ठे रखे होते हैं ।
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३६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) जिस समय तूफानका प्रकोप हो रहा हो, लामा उस तुरहीको हाथमें पकड़े हुए मन्त्र पढ़ता है । उसके मन्त्रपाठसे बड़े - बड़े ओले टूटकर बहुत छोटे - छोटे टुकड़े हो जाते हैं; और फसलको हानि नहीं पहुँचाते । इसका पूरा - पूरा वर्णन ' लाइस इलेजवेथ ड्राकोट्टस ' लिखित ' वाइस अफ सिस्टिक इण्डिया ' में मिलता है । लामाओंकी दूसरी रीति यह है कि ओले गिरनेकी ऋतु लामा लोग वाटिकाओं की सीमापर रक्षाप्रद प्रार्थना - पताका लगा देते हैं । जब वादलकी गरज और ओलोंके तूफान गिर रहे होते हैं; लामा अपनी धर्म-पुस्तक लेकर उसमें एक प्राचीन संस्कृत - मन्त्र पढ़ता है । इस मन्त्रका पाठ बड़ी भारी तैयारी, उपासना, उपवास और चिन्तनके अनन्तर ही किया जा सकता है । ओले गिरनेसे पहले जो मेघ - नाद होता है, पहले उसे बन्द करना होता है । इसकेलिए एक विशेष मन्त्र है । फिर जव सचमुच ओले गिरने लगते हैं; तो लामा हाथमें तुरही लिए खेत में जाता है, और जिस दिशा से ओले आ रहे होते हैं; उधर पीली सरसोंके दाने छिड़ककर वह मन्त्र पढ़ता है, उससे ओलोंका बरसना बन्द कर देता है । लोगोंका विश्वास है, और यह विश्वास कुछ झूठा भी नहीं कि मन्त्रके बलसे बड़ेसे बड़े ओले भी टुकड़े - टुकड़े होकर परमाणुके बराबर छोटे हो जाते हैं । इसकी व्याख्या सरल है । मन्त्रोच्चारण से वायुमण्डलमें जो कम्पन उत्पन्न होता है, वह श्रलेपर बिजलीके आघातके सदृश कार्य करता है । इस प्रकार मनुष्यके मुखसे निकले हुए शब्दका प्राकृतिक तत्त्वोंपर प्रभुत्व सिद्ध होता है ' । अलाइस
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जप- पाठ विज्ञान ३६५ इलिनबथ यों लिखती हैं - ' श्रीमान् महाराजा साहबने वर्षामें हमें लामानाच देखनेकेलिए बुलाया । यह नाच साधारणतः खुले मैदान में होते हैं । मैंने महाराजा से पूछा कि – लामाओं के पहिने हुए सुन्दर वस्त्र वर्षांमें खराव न हो जाएंगे? परन्तु उन्होंने इस ढंगसे उत्तर दिया, मानो ऐसी आश्चर्यजनक बातें बिल्कुल साधारण हों । ' मेरा ख्याल नहीं कि उनके कपड़े खराब होंगे; क्योंकि मेरे लामा मन्त्र पढ़कर वर्षाको रोक सकते हैं । " यह बात स्वयं मुझे भी मालूम थी । लामा - नाचके दिन मूसलाधार पानी बरस रहा था । हम वाटरप्रूफ और छातोंसे सुसज्जित होकर घरसे चले । परन्तु जब हम राजभवनके आँगनमें पहुँचे, जहां नाच आरम्भ होनेको था; तो वर्षांकी एक बूँद नहीं गिर रही थी । किसी रहस्यमय रीतिसे ये लोग आँधी - पानीको अपने वशमें करनेकी क्षमता रखते हैं ' ( ट्रिव्यून २० जनवरी १६४१ ) पाठकोंने मन्त्रशक्ति देख ली । इस प्रकार मन्त्रोंके साथ विशेष बीजमन्त्रोंको भी मिलाकर उनमें विशेष - शक्ति प्रादुर्भूत की जा सकती है । इस विषयमें १६२४ अप्रैल मासमें प्रकाशित ' फिजिकल कल्चर ' नामक अमेरिकी मासिक पत्र में ' लेसर लेजारियो ' नामक अष्ट्रियन शास्त्रज्ञका एक लेख प्रकाशित हुआ था; उसमें उसने स्पष्ट किया है कि - ' ह्रां ह्रीं क्लीं ' इत्यादि एकाक्षर मन्त्रोंका उच्चारण करने से क्या लाभ होता है । बीजाक्षरोंके उच्चारणसे उसका प्रभावशाली कार्य शरीर के भीतरी भागमें होता है - इस बातको देखनेकेलिए औंधनरेश श्रीभवानदेव पन्त से बनाई ' सूर्य नमस्कार '
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३६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) नामक अंग्रेजी पुस्तक देखनी चाहिए । उसके अष्टम अध्याय में उस विषय में स्पष्टता की गई है । फलतः वेदमन्त्रोंमें भी विशेष - शक्ति हुआ करती है । जपनादिमें यदि उसकी स्वर वर्ण आदिकी आनुपूर्वीका भङ्ग कर दिया जावे; तो उसके फल में भी भङ्ग होता है; इसलिए प्रसिद्ध है - ' मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिध्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह । स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति, यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ' यद्यपि जपमें मन्त्रोच्चारण एवं शब्दका ही महत्त्व है; तथापि अर्थज्ञानसहित जपन करनेसे उसका विशेष फल होता है । जप करनेवालोंका भी कभी पतन नहीं हुआ करता । जैसा कि मनुस्मृति में कहा है- ' जपतां जुह्वतां चैव विनिपातो न विद्यते ' ( ४।१४६ ) । ' जप ' धातुके दो अर्थ होते हैं, एक ' जप व्यक्तायां वाचि ' स्पष्ट बोलना, दूसरा ' जप मानसे च ' मनमें उसे कहना । अब प्रश्न है कि स्पष्ट बोलनेसे तो मन्त्रकी ध्वनिका प्रभाव माना जा सकता है, पर मन्त्रके मानस जपका क्या प्रभाव पड़ सकता है? इसपर यह जानना चाहिए कि स्पष्ट बोलने से वह वाणी स्थूलतामें होती है; और उसका प्रभाव भी सीमित स्थलमें होता है; पर मनके द्वारा मन्त्रके उच्चारणसे वह वाकू सूक्ष्म हो जाती है । परा पश्यन्ती मध्यमा - यह तीन वाक् भी सूक्ष्म होती हैं; उनके समय में नाभि प्रदेश आदि में प्रयत्न होता है, उससे विद्युत् प्रकट होती है; उसका प्रभाव अपेक्षित स्थल पर स्थूल वाकूकी अपेक्षा अधिक पड़ता है । सूक्ष्म शक्ति
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मालाकी मणियोंकी १०८ संख्याका विज्ञान ३६७ स्थूलकी अपेक्षा अधिक होती है । मन्त्रमें ' मन्त्रि गुप्तभाषणे ' धातु है; मन्त्रका मन्त्रत्व इसी गुप्त - भाषण - मानस जपनसे होता है । उसका प्रभाव भी बहुत पड़ता है । प्रलय में वेद - शब्द भी सूक्ष्म-रूपमें मन्त्रात्मक ही तो थे पर उनका प्रभाव समाधिस्थ ऋषियों पर भी पड़ा । फलतः मानस जपका प्रभाव सारे आकाशमें व्याप्त हो जाता है । अपेक्षित स्थलपर तो पड़ता ही है । ( ३३ ) मालाकी मणियोंकी १०८ संख्याका विज्ञान जपनकेलिए संख्या १०८ होती है, तदर्थ मालाकी आवश्यकता होती है । बिना संख्याके जप करना ठीक नहीं । बृहत्पराशरस्मृतिमें कहा है- ' अप्समीपे जपं कुर्यात् संसंख्यं तद् भवेद् यथा ' ( ४ | ४० ) असंख्यमासुरं यस्मात् तस्मात् तद् गणयेद् ध्रुवम् ' । अब वहाँ जपमालाके विषयमें कहा है- ' स्फाटिकेन्द्राक्ष - रुद्रात्तैः पुत्रजीव-समुद्भवैः । अक्षमाला प्रकर्तव्या प्रशस्ता चोत्तरोत्तरा । श्रभावे त्वक्ष-मालायाः कुशप्रन्ध्याथ पाणिना । यथाकथञ्चिद् गणयेत् ससंख्यं तद् भवेद् यथा ' ( ४।४१-४२ ) यहां रुद्राक्षकी मालाको अन्य मालाओं से श्रेष्ठ माना गया है; उसमें कीटाणुनाशिनी शक्ति भी हुआ करती है । तुलसीकी भी सात्त्विक विद्युत्प्रदान- शक्ति विज्ञान सम्मत होनेसे जपमें तुलसीकी मालाका उपयोग भी हो सकता है । गलेमें भी तुलसी आदिको कण्ठी पहननेका यही लाभ हो जाता है । मौन रूपसे जप करनेसे गलेकी नसोंपर जोर पड़नेसे गलेमें गण्डमाला आदि रोगोंकी आशंका बनी रहती है; तब गलेमें उक्त कण्ठी पड़ी रहने से, गलेसे उसका स्पर्श होते रहनेसे उक्त रोगोंकी आशङ्का
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३६८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) नहीं रह जाती । मालामें तर्जनी अंगुलि नहीं लगाई जाती - यह ध्यान रखनेकी बात है; क्योंकि तर्जनी अंगुली दूसरोंको डाँटने वाली, मारने आदिका भय देनेवाली होनेसे पापयुक्ता एवं निकृष्ट होती है; और जपमें चाहिए पवित्रता; अतः तर्जनी अंगुलीका मालासे स्पर्श नहीं कराया जाता । अब मालाके मणियोंकी १०८ संख्या के विषय में जानना चाहिए । हमारे प्रत्येक पलमें ६ श्वास निकलते हैं । ढाई पल वा एक मिनटमें १५ श्वास निकलते हैं । एक घण्टे में ६०० श्वास हो जाते हैं । १२ घण्टों में १०,८०० श्वास हो जाते हैं । दिन - रात २४ घण्टोंमें हमारे २१,६०० श्वास होते हैं । इसलिए ' योगचूडा-मणि ' उपनिषद् में कहा है- ' पट्शतानि दिवारात्रौ सहस्राण्येक-विंशतिः । एतत् - संख्यान्वितं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा ' ( ३२ ) । इन अहोरात्र के श्वासोंमें आधा भाग यदि सोना, भोजन तथा अन्य सांसारिक कार्यों के लिए रख दिया जाय, अवशिष्ट आधा समय परमार्थ - साधनाका स्थिर किया जाय तो दिनभागके १०८०० श्वासोंमें हमें इष्टदेवको भी इतने बार स्मरण करना चाहिए । परन्तु लोकयात्रामें इतना सम्भव नहीं हो सकता, तब १०८,०० संख्याके पिछले दो शून्योंको हटाकर १०८ वार इष्टदेवका जप किया जाता है । यद्यपि दिन कभी १०॥ घण्टोंका, कभी १३ ॥ घण्टोंका भी हो जाता है; तथापि उसका मध्यभाग १२ घण्टोंका है । रात विश्रामकेलिए होती है, उसमें तम तथा तमोगुणका बाहुल्य होता है; अतः इष्टदेवके स्मरणके लिए दिनके घण्टे ही
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मालाकी मणियोंकी १०८ संख्याका विज्ञान ३६६ ठीक माने जाते हैं । दिनके श्वास १०८०० माने गये हैं । उनकी पूर्ति केलिए १०८ मनकोंवाली माला ही उपाय है । ' जप्येनैव तु संसिध्येद् ब्राह्मणो नात्र संशयः ' ( मनु ० २।८७ ) ' यज्ञानां जपयज्ञोस्मि ' ( गीता १०।२५ ) ' विधियज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टो दशभिर्गु णैः । उपांशु स्यात् शतगुणः, साहस्रो मानसः स्मृतः ( मनु -२।८५ ) यह जपकी महिमा बताई गई है । इसमें उपांशु ( धीमें - धीमें ) जप करने का सौ - गुणा फल बताया गया है । मालाको मणियां १०८ होती हैं; उसके द्वारा उपांशु - मन्त्र जपनेसे सौ - गुना फल होगा । तब १०८ × १०० = १०८०० यह पूर्वोक्त दिनके श्वासोंकी संख्या पूर्ण हो जाती है । इसी कारण मालाकी मणियोंकी संख्या १०८ रखना निराधार नहीं । यह भी जानना चाहिये कि - मायाका अङ्क आठ माना गया है और ब्रह्मका ६ । इसपर गो ० तुलसीदासने ' मानस ' में लिखा है-मायामें परिवर्तन न्यूनता वा परिवर्धन होता है, ब्रह्ममें नहीं । ब्रह्मका अङ्क ६ होता है, हमें परिवर्तन नहीं होता । देखिये-ε × १ = ε । ६ × २ = १८ | ६४३ = २७ | यहाँ १८ में +5 के, और २७ में २ + ७ के जोड़ने से ६ ही होता है । इस प्रकारके ६ के अग्रिम पहाड़ेमें भी स्वयं जाना जा सकता है । अब आठके पहाड़े में न्यूनाधिकता देखिये । ८ १ = ८, ८ २ = १६ ( १ + ६ = ७ ) । ८ × ३ = २४ ( २ + ४ = ६ ) इस प्रकार उत्तरोत्तर न्यूनता होती गई है । ८ × ५ = ४० ( ४ + ० = ४ ) यहाँ ४ ही बचा है । = ६ = ४८ ( ४ + ६ = १२, १ + २ = ३ ) यहाँ ३ ही बचा है । ८७ = ५६ ( ५ + ६
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४०० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) = ११, १ + १ = २ ) यहाँ दो ही बचा है! ८ == ६४ ( ६ + ४ = १०, १ + ० = १ ) यहाँ एक ब्रह्म ही अवशिष्ट हुआ । ब्रह्मके अङ्क ६ में तो विकार नहीं होता ८ × ६ = ७२ ( ७ + २ = ६ ) यह यहाँ प्रत्यक्ष है । हिन्दुजाति प्रारम्भसे ही सूर्यकी भक्त है; इसलिए उसकी सन्ध्यामें सूर्यको अर्घ्य दिया जाता है, सूर्यका ही उपस्थान किया जाता है । सूर्यके ही मन्त्र सावित्री ऋचाका जपन होता है । उस सूर्यके १२ भेद होते हैं; उनमें १२ खां भेद है विष्णु । इधर सूर्यकी १२ राशियां होती हैं । वह सूर्य ब्रह्मरूप होता है - जैसे कि यजुर्वेदसंहितामें कहा है- ' तदेवाग्निः, तदादित्यः, तद् वायुः, तदु चन्द्रमाः । तदेव शुक्र ', तद् ब्रह्म ' ( वा ० सं ० ३२।१ ) । ब्रह्मका अङ्क ६ बताया जा चुका है । तब १२ अङ्कवाले सूर्यका अङ्कवाले ब्रह्मके साथ गुणन करनेसे १०८ संख्या होती है । तब सूर्यात्मक विष्णुका जप भी १०८ वार ठीक है । जपमें साधन होती है माला; तब मालाकी मणियाँ भी १०८ ठीक हैं । १०८ अङ्क १ + = मिलकर ६ अङ्क हो जाता है । ६ अङ्क ब्रह्मका प्रतीक है-यह कहा ही जा चुका है । इसलिए ब्रह्मवित् - संन्यासियोंके नामके साथ भी ' ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति ' ब्रह्मके प्रतिनिधि ' श्री १०८ ' के लिखनेकी शैली चली आती है । इसके अतिरिक्त ‘ ब्रह्म ' अक्षरोंके अनुसार भी १०८ संख्याका होता है । ' क ' से लेकर ' म ' तक २५ अक्षर हैं, ४ य, र, ल, व, हैं और ४ श, ष, स, ह । इस प्रकार व्यंजन ३३ हुए । स्वर ' अ ' से ' अ ' तक १६ हैं । उनका क्रम अ १, २, इ ३, ई ४, ५,
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मालाकी मणियोंकी १०८ संख्याका विज्ञान ४०१ . ऊ ६, ए ७, ऐ, ओ, औ १०, ॠ ११, ऋ १२, ऌ १३, लू ( प्लुत ) १४, १५, अ: १६ । ए, ऐ और ओ औ का इ - उके साथ सम्बन्ध होनेसे ही उनका इनके आगे क्रम रखा गया है । प्रसिद्ध क्रम यह है अ १, आ २, इ ३, ई ४, उ ५, ऊ ६, ऋ ७, ऋ ८, लृ ६, लु १०, ए ११, ऐ १२, ओ १३, औ १४, १५, अः १६ । ' ब्रह्म ' शब्द में ' व, र, ह, म, यह वर्ण हैं । उसमें ' ब ' २३ संख्याका है, ' र ' है २७ संख्याका । ' ह ' की संख्या है ३३, ' म ' की संख्या २५ है । ' अ ' सर्वत्र व्यापक होने से पृथक नहीं गिना जाता । २३ + २७ + ३३ + २५ संख्या जोड़ने से १०८ संख्या होती है । तब ब्रह्मके प्रतिपादक सूर्यका भी १०८ बार जप ठीक है । ' संसार ' शब्दमें ' स - अं - स - आ - र ' वह वर्ण हैं । इनमें स ३२, १५, स ३२, आ २, र २७ यह वर्ण मिलकर १०८ संख्या होती है । तब १०८ संख्यावाले संसार ( जन्म ) के हटानेकेलिए, मुक्तिप्राप्त्यर्थ १०८ संख्यावाले ब्रह्मका जप ठीक ही है । ' सीताराम ' भी ब्रह्म हैं । इसमें स ३२, ई ४, त १६, आ २, र २७, आ -२, म २५ इस संख्यावाले हैं; इन अङ्कोंके भी जोड़ने-पर १०८ संख्या बनती है । इस प्रकार ' रामकृष्ण ' भी ब्रह्म हैं । इनकी संख्या भी देखिये - र २७, आ २, म २५, क १, ऋ ७, ( प्रसिद्ध क्रमसे ), ष ३१, ण १५ । इनके जोड़नेपर भी १०८ होता है । इस प्रकार ' राधाकृष्ण ' भी ब्रह्म हैं । र २७, आ २, ध १६, आ २, क १, ऋ ११ ( पहले कहे हुए विशेष क्रमसे ) घ् ३१, ण १५ । २६ स ० ध ०
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-४०२ श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) यहाँ भी १०८ संख्या बनती है । इस प्रकार ' कैलाशनाथ ' भी ब्रह्म है । इनकी संख्या भी देखिये- ' क १, ऐ ८ ( पूर्व कहे हुए विशेष क्रमसे ), ल २८, आ २, श ३०, न २०, आ २, थ १७ । इनका भी जोड़ १०८ होता है । इनका भी जप होता है । इस प्रकार मालाकी मणियोंकी १०८ संख्याका ब्रह्मसे सम्बन्ध सिद्ध हुआ । १०८ अङ्क १ + ८ = १ जोड़कर ६ होता है - यह हम पहले कह ही चुके हैं । इस १०८,१८, ६ संख्याका ' ब्रह्मसे ' सम्बन्ध होनेसे अक्षय होनेके कारण हमारे पूर्वजोंने भी ग्रन्थ-प्रणयनमें इसका ध्यान रखा । जैसे कि - श्रीवेदव्यासने पुराण भी लिखे १८, उपपुराण भी १८, और औपपुराण भी १८ । महा-भारत के पर्व भी १८ । महाभारतकी अक्षौहिणीकी संख्या भी १८ । गीता में ब्रह्म - श्रीकृष्णके उपदेश भी १८ अध्यायोंमें संगृहीत हैं । श्रीमद्भागवतपुराणके श्लोक भी १८ हजार हैं । गोस्वामी तुलसी-दासने श्रीरामकी सेनामें बन्दर भी १८ पद्म बताये हैं । १८ का योग १ + ८ = ६ है । यह ब्रह्मरूप है - यह कह ही चुके हैं । युगोंकी संख्या भी ऐसी ही है । सत्ययुगके वर्ष १७,२८,००० हैं । के योगमें ६ संख्या बनती १ + है ७ + । २ त्रेतायुगको + ८ के योगमें वर्ष संख्या १८, १२,६६,००० और १ + ८ है । इनका जोड़ भी १ + २ + ६ + ६ = १८, १ + ८ = है । द्वापरयुगकी वर्षसंख्या ८,६४,००० है । इनके जोड़ में भी ८ + ६ + ४ = १८, १ + ८ = ६ संख्या ही निकलती है । कलियुगकी वर्षसंख्या . ४,३२,००० है । इनका जोड़ भी ४ + ३ + २ = ६ ही होता है । चार