सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 431–440

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 431–440

पृष्ठ 431

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मालाकी मणियोंकी १०८ संख्याका विज्ञान ४.०३ युगों का जोड़ ४३,२०,००० है, यहां भी ६ अङ्क ही बनता है । इकहत्तर चतुर्युगोंका १ मन्वन्तर होता है, उसके ३०,६७,२०,००० वर्ष होते हैं; इनका भी जोड़ ३ + ६ + ७ + २ = १८, १ + ८ = ६ ही होता हैः । १४ मन्वन्तरोंका १ कल्प होता है; उसके वर्ष ४,२६,४०,८०,००० होते हैं; इनका जोड़ ४ + २ + ६ + ४ + ८ = २७, २ + ७ = है । इनमें १५ सन्धियां जोड़नी पड़ती हैं, जिनके वर्ष २,५६,२०,००० होते हैं, इनका भी जोड़ २ + ५ + १ + २ = १८, १ + ८ = ६ होता है । सारे कल्पके वर्ष ४,३२,००,००,००० होते हैं । इनका भी जोड़- १ अङ्क बनता है । यह ब्रह्माका दिन है, उतनी ही उसकी रात होती है । इस प्रकार ब्रह्माके दिन - रातका जोड़ ८,६४,००,००,००० है । यहां जोड़ होता है । ब्रह्माका १ मास २,५६,२०,००,००,००० मानुषी, वर्षोंका होता है । एक वर्ष उसका होता है-३१,१०,४०,००,००,००० वर्षोंका । ब्रह्माकी १०० वर्षकी आयु होती है; उसके वर्ष ३१,१०,४०,००,००,००,००० यह हैं । इन सबका जोड़ होता है । अङ्क ब्रह्मका प्रतीक है — यह कहा ही जा ' चुका है । यह नौ का अङ्क अक्षय होता है, इसलिए सत्ययुगका प्रारम्भ भी अक्षयनवमीसे माना जाता है । आज भी कार्तिक शुक्ला नवमी को अक्षय नवमी कहते हैं । इस & के ब्रह्मके अङ्क होनेसे महत्ताके कारण नवदुर्गा होती हैं । नवार्णमन्त्रके वर्ण भी नौ, ग्रह भी ध, नक्षत्र भी २७ ( २ + ७ = ६ ) नौगुणे हैं । नौ अङ्क होनेसे ही ' न ' क्षरतीति नक्षत्रम् ' इस निर्वचनसे नक्षत्र अक्षय होता है । राशियों

पृष्ठ 432

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४०४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) के पादोंके अक्षर भी हैं । तीन व्याहृतियोंके साथ गायत्रीमन्त्रके अक्षर भी २७ ( २ + ७ = ९ ) हैं; इसलिए उसका जपन १०८ भी १ + ५ = ९ होकर अक्षयफल वाला होता है । महाभारत युद्ध में भी मरने से बचे भी थे नौ । पांच पाण्डव, श्रीकृष्ण, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, कृतवर्मा | हमारे शरीर में छिद्र भी ६ हैं । अङ्क भी होते हैं । इस प्रकार नौसे गुणे हुए बहुत अङ्कोंका योग भी ६ हुआ करता है । जैसे १०८ × १ = १७२ ( ε + ७ + २, = १८, १ + ८ = ९ ) । १६४८५६ = १७५३२ ( १ + ७ + ५ + ३ + २ = १८, १ + ८ = ९ ) । १६५६ × ६ = १७६०४ = ( १ + ७ + ६ + ४ = १८, १ + ८ = ९ ) इत्यादि । इस प्रकार अङ्कोंके गुणनफलकी शुद्धता देखनी हो; तब भी ' नौ - कटी की कल्पनासे नौ को कम करना पड़ता है । इस प्रकार सारा संसार भी हमें विभक्त होनेसे • ब्रह्म ही सिद्ध हुआ । इस प्रकार नक्षत्र २७ होते हैं; प्रत्येक नक्षत्रके ' चू चे चो ला अश्विनी ' इत्यादिरूप से चार पाढ़ होते हैं । उनका भी गुणनफल १०८ होता है । इस प्रकार नक्षत्रोंकी मालाके १०८ संख्यावाला होनेसे जपमालाकी मणियोंकी संख्या भी १०८ है । नक्षत्रमालाका जहां दोनों ओरसे सम्मेलन होता है; वह सुमेरु - पर्वत होता है । इस प्रकार जपमालाका भी संयोजन स्थान ' सुमेरु ' है— इस प्रकार मालाके मणियोंकी १०८ संख्या सोपपत्तिक सिद्ध हुई । सुमेरुको लांघना नहीं पड़ता; इस प्रकार ६ अङ्क तथा उसके प्रतिनिधि ब्रह्म . को भी लांघना ठीक नहीं होता । ठीक नहीं होता क्या, लांघा नहीं

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मालाकी मणियोंकी १०८ संख्याका विज्ञान ४०२ जा सकता । सुमेरु - पहाड़का भी कोई अतिक्रमण नहीं कर सकता । अन्य उपपत्ति । माला के मणियोंकी १०८ संख्यामें एक उपपत्ति अन्य भी दी जाती है । आलोक ' ' - पाठक उसका भी सावधानता से मनन करें । भगवान् कृष्णने कहा है- ' वेदा ब्रह्मात्मविषयाः त्रिकाण्डविषया इमे । परोक्षवादा ऋषयः परोक्षं मम च प्रियम् ' ( भागवत ११ | २१ | ३५ ) अर्थात् वेदोंके कर्म, उपासना, एवं ज्ञान तीन काण्ड ब्रह्म और आत्माकी अद्वैतता बतानेवाले हैं । ऋषि लोग सब बातोंको परोक्षता से कहते हैं, मुझे भी परोक्ष - कथन ही प्रिय है । इसीलिए देवताओंके लिए भी कहा है- ' परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षविद्विषः ( गोपथ १।१।१ ) । सो सृष्टिकी उत्पत्ति-प्रलयको परोक्षतासे १०८ रूपमें कहा गया है । भगवान् ने गीता में कहा है- ' अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ' ( ७१६ ) समस्त जगत्की उत्पत्ति तथा प्रलय मैं ही हूँ । और फिर कहा है- ' मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ( ७७७ ) यह सम्पूर्ण जगत् मुझ परमेश्वरमें ऐसे पिरोया हुआ है जैसे सूत्रमें मणियां । यहां मालाका स्वरूप बता दिया गया । अर्थात् दोनों ( परा, अपरा ) प्रकृतिरूप मणियां परमेश्वररूप - सूत्र से गुथी हुई हैं - वही मणिमालाका सूत्र है । भगवान्ने जगदुत्पत्तिरूप अपरा प्रकृतिका वर्णन आठ भेदोंसे किया है — ' भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ' ( गीता ७१४ ) यहां मनसे अहङ्कारका,

पृष्ठ 434

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४०६: श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) वुद्धिसे महत्तत्त्वका और अहङ्कार से अव्यक्तका तात्पर्य है । दूसरी प्रकृति अपरा है— ' अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूतां महाबाहो! ययेदं धार्यते जगत् । ( १५ ) । परा प्रकृतिके जो आठ भेद बताये गये हैं; इन्हें अन्तसे आदि तक विपरीत - क्रमसे. गिनना चाहिये; क्योंकि - सृष्टिक्रम इसी प्रकारका होता है,. इनके गुण भिन्न - भिन्न संख्याके होते हैं । प्रकृतियोंको पैदा करनेवाला मूल है ब्रहा, वह है एक एवं सत् । उससे उत्पन्न अहंकार ( अव्यक्त - प्रकृति ) दूसरी संख्या में है, उसके दो गुण होते हैं - एक ब्रह्मका, एक उसका अपना, आवरण | उससे उत्पन्न बुद्धि ( महान् ) तीसरी और तीन गुण --वाली होती है । पहलेवाले दो गुण, तीसरा उसका अपना, विक्षेप । मन ( अहंकार ) ब्रह्मका चौथा विकार है; उसके चार गुण हैं; तीन पहलेके, चौथा उसका अपना, मल । पांचवां विकार ख ( आकाश ) ५ गुणोंवाला, चार पूर्वके गुण, एक उसका अपना । इसी प्रकार आगे भी जानना चाहिये । छठा विकार वायु है, उसके ६ गुण. हैं । सातवां विकार अनल ( तेज ) है, उसके ७ गुण हैं । आठवाँ विकार, आपः ( जल ) है, उसके ८ गुण हैं । नौवां विकार भूमि है, उसके गुण हैं । यही बात मनुजीने भी कही है - परला- परला. अपने से पूर्व गुणको भी लेता जाता है, जो जितनी संख्यावाला. हैं, वह उतने ही गुणोंवाला हो जाता है- ' आद्याद्यस्य गुणं त्वेषा-मवाप्नोति परः परः । यो - यो यावतिथश्चैषां सन्स तावद्गुणः स्मृतः । ( १।२० ) इस अष्टधा प्रकृति से ही समस्त ब्रह्माण्डः एवं.

पृष्ठ 435

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मालाकी मणियोंकी १०८ संख्याका विज्ञान II शरीरोंकी. सृष्टि होती है । यह संसार - बन्धनरूप अपरा प्रकृति है । इसमें ब्रह्मके एक भेदको तो गिनना नहीं है; वह तो माला में. सुमेरुस्थानीय है; उसे गिना नहीं जाता । शेष अष्टधा अपरा प्रकृतिके २ + ३ + ४ + ५ + ६ + ७ + ८ + ६ = कुल ४४ भेद हुए । ब्रह्मकी परा - प्रकृति जीवरूपा कही गई है; वह जीव अपरा. प्रकृति से निर्मित सम्पूर्ण अपरा प्रकृतिरूप ६ गुणोंवाले जगत्को धारण कर लेता है; अतः दसवां होनेसे १० गुण वाला होता है ।: नौ पहले गुण, १० वां उसका अपना । पहले वे ४४ गुण थे;. अब १० यह होगए । यह ५४ संख्या होगई । यह ५४ मणियों की आधी माला तो तैयार होगई । यह आधी संख्या केवल उत्पत्तिकी है । उत्पत्तिसे विपरीत प्रलय होता है; उसकी भी संख्या ५४ होगी । इस प्रकार १०८ मणियोंकी माला हो जाती है । बिना दोनों.: उत्पत्ति - प्रलय के केवल एकका वर्णन व्यर्थ हो जाता है । तभी तो. कहा है- ' अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ' ( ७१६ ) । ' मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगरणा इव ' ( ७/७ ) यह मालाकी उपमा भी बता दी गई । ' मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनंजय ' ( ७१७ ) यहां बताया गया है कि मुझ परमेश्वरसे अतिरिक्त जगत्का कारण अन्य कुछः नहीं । यही एक मालाका सुमेरु हुआ । प्रलयोत्पत्तिका वर्णन केवलः व्यावहारिक है; सुमेरु जीव - ब्रह्मकी एकता बताता है । ब्रह्ममें और जीवमें अन्तर यही है कि ब्रह्मकी संख्या १ है, और जीवको १० । यहाँ १० में शून्यं मायाका प्रतीक है । जब तक वह जीवके साथ है,

पृष्ठ 436

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४०६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) तव तक जीव बन्धनमें है; जब उस मायारूप शून्यको - जो असत् है - जीवने त्याग दिया; तब वह भी एक हो जाने से ' एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म ' ब्रह्म बन जाता है । ' वासुदेवः सर्वमिति ' ( गीता ७११६ ) मालाका भी यही उद्देश्य है कि - जीव जब तक १०८ मणियोंका विचार नहीं करता, और कारणस्वरूप सुमेरु ( ब्रा ) तक नहीं पहुँचता; तब तक इस १०८ में घूमता रहता है । जब सुमेरुरूप अपने वास्तविक स्वरूपको प्राप्त कर लेता है; तब १०८ से निवृत्त हो जाता है, माला समाप्त हो जाती है । सुमेरुको फिर लांघा नहीं: जाता । जो तात्पर्य प्रलय- उत्पत्तिका है; वही १०८ संख्याकी मालाके जपका भी है । जिस प्रकार जीव ब्रह्म हो जानेपर उत्पत्ति - प्रलय से निवृत्त हो जाता है; उसी प्रकार ब्रह्म - स्थानीय सुमेरु प्राप्त होनेपर मालाकी आवृत्ति से भी निवृत्त हो जाता है । जब तक वह ब्रह्मभाव प्राप्त न हो; तब तक १०८ मणियोंकी मालाकी आवृत्ति होती ही रहेगी । जब पुरुष मालाके समाप्त होने पर भी जप करता रहता है; तब सुमेरुको लांघा नहीं जाता; किन्तु उसे उलटकर फिर शुरू से वह १०८ का चक्र जारी कर देता है । यह जगत् परमेश्वरसे ही उत्पन्न, परमेश्वरमें ही स्थित और परमेश्वरमें ही विलीन होता है — यही भाव मालाका सूत्र प्रदर्शित करता है । सूत्रके दोनों सिरे सुमेरुमें ही स्थित होते हैं; और सूत्रमें सब मणियां स्थित हैं । इस प्रकार १०८ की उपाधिवाला होनेसे जीवके नामके पूर्व १०८ लिखा जाता है । यह १०८ संख्याका शास्त्रीय अन्य रहस्य है ।

पृष्ठ 437

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मन्त्रसिद्धिका सूक्ष्म - विज्ञान ( ३४ ) मन्त्र - सिद्धिका सूक्ष्म - विज्ञान । मन्त्र - शक्तिपर कुछ प्रकाश पूर्व डाला जा चुका है । कुछ यहाँ भी लिखा जाता है । योगदर्शन में कहा है- ' जन्मौषधिमन्त्रतपः-समाधिजाः सिद्धयः ' ( ४ | १ ) यहाँ पर मन्त्र, तप तथा समाधि द्वारा सिद्धि कही गई है । आजकलके व्यक्ति मन्त्र - सिद्धिपर विश्वास नहीं करते 1 । उसे वे प्रकृति - नियम से विरुद्ध मानते हैं, परन्तु मानुष-ज्ञान अत्यन्त सीमित होता है । उनके पास प्रकृति - नियमोंकी पूर्ण सूची नहीं है । लोहा पानी में डूबता है - यह प्राकृतिक नियम है; पर अन्य प्राकृतिक नियमोंके आश्रयसे लोहेका भारी जहाज पानी पर तैरता है । क्या साधारण लोग उन नियमोंको जानते हैं, जिनके अनुसार वायुयान उड़ता है? बिना ही तारके देश - विदेशों के साथ संवाद होता है । इस जगत् में निरन्तर शक्तिका संघर्ष होता रहता है । कभी एक शक्ति, कभी दूसरी शक्ति दबती रहती है । जिसे जितनी शक्तियोंका तथा उसके प्रचालनका जितना ज्ञान है, उसमें उतनी ही सिद्धि है । जब तक हम निश्चयपूर्वक न कह सकें कि इस शक्तिके आगे किसी शक्तिका अस्तित्व नहीं है; तब तक यह कहना कि — अमुक सिद्धि असम्भव है - यह ठीक नहीं । दर्शन - शास्त्रोंके अनुसार मनुष्यका प्रकृति - संयुक्त आत्मा अनन्त-शक्तियोंका भण्डार है । ज्यों - ज्यों चित्तको अन्तर्मुख किया जावे, त्यों - त्यों शक्तियोंका आविर्भाव होता है । योगदर्शनके शब्दों में वह पुरुष पूर्ण - योगी, सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान् हो जाता है; पर उसे सृष्टि - विरुद्ध कार्य करना नहीं चाहिये, यद्यपि वह कर सकता है ।

पृष्ठ 438

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४१० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) वैज्ञानिकोंके अनुसन्धानसे चित्तके चार स्तर जाने गये हैं । सबसे ऊपर तथा सबसे नीचे स्तर वह है, जिसका धर्म चेतना वा विज्ञान है । यही संवेदनाओंका आलय है । इससे नीचे गम्भीर स्तर वह है जिसे ' उपचेतन ' शब्द से कह सकते हैं । यह स्मृतियोंका आलय है । तीसरा स्तर वह है - जिसे ' उपाऽचेतन ' शब्द से कहा. जा सकता है । यह हमारे संस्कार, स्मृति, इच्छा और विचारोंका आलय है । सबसे नीचेका स्तर ' चेतन ' शब्दसे कहा जाता है । यह मनुष्यको सव शक्तियोंका आश्रय है, और पूर्व जन्मके संस्कारोंका आश्रय होता है । इस स्तर के अध्ययनसे मनुष्य-शक्तियोंका वास्तविक ज्ञान होता है । आजके मनोवेत्ता मानते हैं कि - दो प्रकारके मनुष्य होते हैं । पहले वे हैं - जिनकी वृत्ति बहिर्मुखी रहती है । वे चित्तको व्यावहारिक जगत्की ग्रन्थियोंके उद्घाटनका साधन मानते हैं । दूसरे व्यक्ति व्यावहारिक जगत्से दूर रहते हैं, इनकी वृत्ति अन्तर्मुखी होती है; वैसे लोग प्रयत्नसे चित्तके ' अचेतन ' स्तर तक पहुँच सकते हैं । वे उसमें प्रविष्ट होकर जिस किसी भी विषय में अपने आत्माको जोड़ते हैं; चित्तकी एकाग्रतासे उसमें उनका अद्भुत प्रवेश हो जाता है । इस प्रकार वह अननुभूत भी ऐन्द्रियक अनुभवको प्राप्त होता है, अर्थात् अतीन्द्रिय - ज्ञानको धारण करता है । इस प्रकार वह क्रमशः सिद्ध एवं महासिद्ध हो सकता है । अब कर्मकी सिद्धिके सम्भव पर विचार करना चाहिए । जब कि ज्ञान होता है, तब कर्म भी उसके साथ होता है । जिन्हें

पृष्ठ 439

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मन्त्रसिद्धिका सूक्ष्म - विज्ञान ४११ किसी शक्ति- विशेषका ज्ञान है, वे उसका उपयोग भी कर सकते हैं । शक्तिके उपयोगका नाम ही कर्म है । जिसे जितना अधिक ज्ञान है, वह उतने ही अल्प- साधनों से अपना काम पूरा कर सकता है | उसे काम में वह उद्विग्नता नहीं होती; जो एक अल्पज्ञके कार्य में होती है । इस प्रकार जो सर्वज्ञ है, वह सर्व कर्ता भी हो सकता है । उसे ही ' सिद्ध ' कहा जाता है । क्रिश्चियन वैज्ञानिक रोगीकी शय्याके पास कुछ पाठ किया करते हैं । उससे वे बिना ही औषधिके प्रयोगके उसको स्वस्थ कर देते हैं । यह भी एक मान्त्रिक- सिद्धि हुआ करती है । प्रत्येक मन्त्र कईं नियत - ध्वनियोंका समूह होता है 1 । मन्त्रमें अर्थकी विशेष आवश्यकता नहीं हुआ करती हैं । नहीं तो मन्त्रकी अपेक्षित - शक्ति नष्ट हो जाती है; क्योंकि — अर्थ ध्यान में रहनेसे शब्दके यथावत् उच्चारणमें अपेक्षित बल नहीं रह जाता । इसलिए उसमें शब्दको स्वरवर्णादिदोषरहित शुद्ध बोलनेकी आवश्यकता रहा करती है । इसीलिए ही महाभाष्यके पस्पशाह्निकमें कहा है— ' याज्ञे कर्मणि [ प्रयोग - ] नियमः ' अर्थात् यज्ञकर्म में अर्थज्ञानका नियम नहीं होता, किन्तु उस शब्दके प्रयोगमात्रका नियम होता है । विवाह - संस्कारके मन्त्रोंके शब्दों से कन्या संस्कृत होती है, परन्तु मन्त्रोंके अनुवाद में वह शक्ति कैसे हो सकती है? वेद मन्त्रों के संग्रह हैं । मन्त्र निरुक्तमें नियतः आनुपूर्वीवाले तथा नियतपदप्रयोगपरिपाटी वाले कहे गये हैं । इसीलिए काव्य-प्रकाश आदि में वेदको शब्द - प्रधान माना गया है । कौत्समुनि वेदः

पृष्ठ 440

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४१२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) मन्त्रोंको अनर्थक मानते हैं । अनर्थकका यह भाव नहीं कि उनका कुछ भी अर्थ नहीं । इसका यह भाव है कि मन्त्रका उच्चारण - विशेष में ही सामर्थ्य है । अर्थ में ध्यान देनेसे शव्दकी शक्ति मारी जाती है, उसमें कुछ रुकावट पड़ जाती है । इस प्रकार प्रत्येक मन्त्र - विशेषके शक्तिविशेष के विषयमें भी जानना चाहिए । बीजमन्त्र अर्थहीन ही तो होते हैं । ऐं, ह्रीं क्लीं आदि बीजमन्त्र कितना प्रभाव रखते हैं-यह जानना चाहते हो; तो चिन्तामणि- मन्त्र के उपासक श्रीहर्षका ' नैषधचरित ' महाकाव्य तथा उसका १३ वाँ सर्ग देखना चाहिए । जब किसी वस्तुमें किसी कारण से कम्पन होता है; तब उस कम्पनके कारण हमारी कर्णेन्द्रिय पर विशेष प्रभाव पड़ता है, जिसे ' ध्वनि ' कहा जाता है । प्रत्येक वस्तुकेलिए एक कम्पनकी संख्या नियत होती है, जो उसके गुरुत्व और आकारपर निर्भर होती है । यदि वह वस्तु कम्पनको प्राप्त होती है, तो स्वर निकलता है । यदि उसके पास वह स्वर प्रतिध्वनित हो; तो वह वस्तु भी कम्पित होगी । प्रयोगशालाओं में इनके अनेक प्रयोग होते हैं । इसलिए ध्वनिमापक यन्त्र ( सोनोमीटर ) बनाया जाता है । एक शीशेका गिलास लिया जाता है, उसका नियत स्वर उसके पास बजाया जाता है; उसके परिणाममें गतिबद्धता - वश कम्पनके वेगसे गिलास टूट जाता है । पर्याप्त गवेषणा से उपयुक्त ध्वनियोंके प्रयोगसे अर्थात् मन्त्रविशेषके द्वारा बड़े किले या पर्वत गिराये जा सकते हैं 1 । इङ्गलेण्डमें ' स्टोन हैब्ज ' में ' टुइड ' - धर्मोका जो अवशेष