सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 551–560

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 551–560

पृष्ठ 551

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भोजन - विधिके विज्ञान १२३ द्रौपदीने एक शाकका पत्ता ही तो भगवान् कृष्णको खिलाया था । विश्वम्भरकी तृप्ति होने से विश्व - भरकी तृप्ति हो गई थी । आनेवाले अतिथि दुर्वासा आदि के पेट भी फूल गये थे, वे खाने ही नहीं आये · कि कहीं अम्बरीष - भक्तकी भांति युधिष्ठिर भी हमें तंग न करें । वैसे तो दुर्योधनने उन्हें द्रौपदीके खा चुकनेपर भिजवाया था कि उस समय पांडव इन्हें खिला न सकेंगे; तब दुर्वासा शाप देकर उन्हें भस्म कर डालेंगे । पर द्रौपदी - द्वारा श्रीकृष्ण भगवान्को सूर्य से दी हुई वटलोईमें लगे शाकके एक पत्ते को खिलानेसे ही सारा संसार तृप्त होगया था । अतः भगवन्मूर्तिको भोग लगानेसे ही पञ्चमहायज्ञ ते हैं । अन्य ‘ लघूपायोस्ति भूतले ' यह है कि पञ्चमहायज्ञोंके प्रति-निधिस्वरूप पाँच ग्रास रखे जावें; वे ग्रास तथा घी आदि सबके प्रति -निधि अग्निमें समर्पण कर दिया जाय; वा गौ को खिला दिया जावे । पितृकार्य में तो काकबलि भी देनी पड़ती है । इन बातोंसे जहाँ हमें शास्त्राज्ञाके ' स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ' ( गीता २।४० ) ' कुछ ' पालनसे धर्म प्राप्त होगा; वहाँ लौकिक लाभ भी बहुत होगा । वह यह कि हमने जो भोजन करना है; कई कारणोंसे वह भोजन विषमय भी हो सकता है । यदि वह हमारे अन्दर गया; तो हमें हानि पहुँचावेगा । · राजाको तो सदा विषका डर ही बना रहता है; तब यह ग्रास - स्थापना तथा प्रासोंका अग्नि में डालना, वा कौवेको खिलाना उस विषकी परीक्षाका साधन भी बन जावेगा; अन्य भी बहुतसे लाभ प्राप्त करावेगा ।

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५२४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) 1. इस बातको इस प्रकार समझिये - यदि भोजन में विष होगा; तो जो ग्रास हम रखेंगे, तो उसपर बैठने वाली मक्खियाँ मर जाएँगी; वा निर्जीव - सी हो जाएँगी । फिर जो कि ग्रासोंको पूर्व अग्निमें डालेंगे; उससे जहाँ देवताओंके मुख अग्निमें - डालने से देवपूजा होगी; वहाँ यदि भोजन विषमय है; तो उसकी नीली- लपट होगी; और बहुत बुरी दुर्गन्ध फैल जाएगी । काक - बालिका यह लाभ है कि— कौवा विषमय ग्रास नहीं खाता; इससे भोजनकर्ता सावधान हो जाएगा । अन्य भी परीक्षाएँ हैं । बन्दरको भी वह ग्रास यदि विषमय है - तो ग्रास देनेसे मचलता है । बड़ा चंचल आँखें लाल हो जाती हैं -आया है । यदि विष भोजनमें लौकिक लाभ यह होगा उधर घूम रही होंगी; तो वह मुँह और ढंगका बना लेता है-हो जाता है । चकोरको डालने से उसकी आयुर्वेद - ग्रन्थोंमें इन बातोंका निरूपण न भी हो, तब आगे ग्रास - स्थापनका कि यदि उस स्थलमें च्यूँ टियाँ इधर से उनका भोजनकी थाली में आना सम्भव है । यदि वे पाँच - ग्रास थालीके आगे रखे होंगे, तब वे च्यूँ टियाँ वहाँ इकट्ठी हो जावेंगी, भोजनकी थाली में नहीं आवेंगी । इस प्रकार अन्य भी लौकिक लाभ बहुत सम्भव हो सकते हैं । गो - प्रास भी नियमतः रखना चाहिये, इससे गायका पालन होता है । ग्रास रखकर फिर आचमन करके भोजन प्रारम्भ करना चाहिये-' अश्नीयाद् आचम्य प्राङ्मुखः शुचिः ' ( मनु ० २।५१ ) आचमनसे भीतर आर्द्रता हो जाती है; इससे चबाये हुए ग्रासको भीतर प्राप्त

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सिर बन्द करके भोजन न करना ५२१ होने में सुविधा होती है । ( ५३ ) सिर वन्द करके भोजन न करना । मनुजीने कहा है- ' यद् वेष्टितशिरा भुक्ते यद् भुक्के दक्षिणा-मुखः । सोपानत्कश्च यद् भुक्के, तद् वै रक्षांसि भुञ्जते ' ( ३२३८ ) यहाँ सिर पटके ( साफे ) आदिसे बन्द करके और जूता समेत भोजन करने से वह भोजन राक्षसोंको मिलता है- ऐसा कहा है । . इस अर्थवाद में भी रहस्य है । वह यह कि भोजन खाते हुए जो ऊष्मा ( गर्मी ) सम्पूर्ण शरीरमें पैदा होती है, उस ( ऊष्मा ) के निकलनेके दो मुख्य मार्ग हैं, एक सिर, दूसरा पाँव | यदि यह दोनों बन्द होंगे; और वह ऊष्मा इन स्थानोंमें पहुँचकर बाहर निकलनेका जोर लगावेगी । पर दोनों मार्ग वन्द होनेसे वह ऊष्मा प्रकुपित होकर -वल - प्रयोग करेगी; इससे सिर तथा पैर, वल्कि सारे शरीरकी हानि होगी । पांओंमें जूता चर्ममय होने से वह दुर्गन्धित - परमाणुओं को भी भोजनके समय डालता रहेगा, ऊष्मा भी निकलने न देगा; इसलिए भी उस समय जूते पहरे रहना उचित नहीं । अन्य निकलनेका मार्ग है- गुप्त इन्द्रिय, तथा गुदेन्द्रियका छिद्र । भोजनके वाद लघुशंका अवश्य करनी चाहिये, उस मार्ग से भी ऊष्मा निकलेगी । गुदाप्रदेश से तो वह अपानवायु आदिके द्वारा निकलती ही रहती है; तथापि उस समय कौपीन ( लंगोट ) कसा हुआ भी न होना चाहिये । ( ५४ ) कपड़े उतारकर वा रेशमी वस्त्रसे भोजन करना । हम पूर्व कह चुके हैं कि भोजन करते हुए शरीर में प्रचुर

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१२६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) मात्रामें ऊष्मा उत्पन्न होती है; उसे रोमकूपोंसे बाहर निकलनेका अवसर भी देना चाहिये । उसमें कपड़े उतारकर भोजन करना भी एक उपाय है । वस्त्र पहिने हुए होनेपर रोमकूपोंपर आवरण पड़ा होनेसे ऊष्माके निकलने में बाधा पड़ेगी । वह यदि आवरण-वश भीतर रहे; तो हानि पड़ेगी । इसीलिए व्यायाम करनेके अवसर पर भी भीतरी ऊष्माके निकलनेकेलिए कपड़े उतारे जाते हैं । अथवा यदि कसे हुए कपड़े न हों; तो वह वाष्प भीतर से निकलती तो रहेगी, पर वह कपड़ों में लगेगी । एक तो उससे कपड़े खराब होंगे; दूसरा वे शरीरमें लगे होनेसे वह स्वेद - रूपसें निकली वाष्प फिर शरीरको खराब करती रहेगी; क्योंकि वह मलरूपमें जम जावेगी; तब रोमकूपोंके वन्द हो जानेसे कितनी हानि हो सकती है — यह स्वयं सोचा जा सकता है । इसलिए बीमारको जो पसीना आता रहता है उसे एक स्वच्छ कपड़े से साफ करते रहना पड़ता है; नहीं तो मलरूपमें जम जाने से उसकी हानि होती है । कपड़े उतरवा देना भी उसे बाहिरी वायुके लगनेका डर होनेसे विपद्जनक होता है । हाँ, उसके कपड़े बदलवा दिये जाते हैं । कई लोग भोजनके समय कपड़े उतारने में अन्य कारण बताते हैं; उनका आशय यह है कि हमने भोजन करना है; उसमें शुद्धता अपेक्षित होती है । अशुद्धता में भोजन नहीं किया जाता । धोती तो हम प्रतिदिन धो लिया करते हैं । ऊपरके कमीज आदि वस्त्र मैले होने से पूर्व हम नहीं धोते । उनका अशुद्ध होजाना भी सम्भव हो सकता है । अतः धोती न उतारकर अन्य वस्त्र भोजनके

पृष्ठ 555

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भोजन- नियम ५२७ समय उतार देने चाहियें । यदि वह सम्भव न हो तो रेशमी वा ऊनी वस्त्र होना चाहिए; वह भीतरी शक्तिको सुरक्षित रखता है, और बाहरी शक्तिके परिणामको दूर करता है । क्योंकि भोजन करते समय शरीर के प्रत्येक यन्त्रोंकी क्रिया होने लगती है; इसलिए वाहरी वायुकी बाधा रोकनेकेलिए और अन्दरकी शक्ति सुरक्षित रूपसे कार्य करती रहे ' नान्नमद्यादेकवासाः ' ( मनु ० ४।४५ ) एक केवल धोती पहनकर भोजन नहीं करना चाहिये, एक रेशमी दुपट्टा ऊपर से ओढ़ ले, वा उपवस्त्र रखे ले इससे कमीजकी भांति रोमकूप सर्वथा आवृत भी नहीं रहेंगे; और बाहरी ' बाधाओं का प्रभाव भी शीघ्र नहीं पड़ता । ( ५५ ) भोजन - नियम भोजनके कई नियम शास्त्रों में बताये गये हैं- ' न भुञ्जीतो-धृतस्नेहं नातिसौहित्यमाचरेत् । नातिप्रगे, नातिसायं न सायं-प्रातराशित: ( मनु ४।६२ ) ' न भिन्नभाण्डे भुजीत न भावप्रति-दूषिते ' ( ४।६५ ) ' शयनस्थो न भुजीत; न पाणिस्थं न चासने ' ( ४/७४ ) ' सर्वं च तिल - सम्बद्ध नाद्यादस्तमिते रवौ ' ( ४/७७ ) आर्द्रपादस्तु भुजीत नार्द्रपादस्तु संविशेत्, ( ४७६ ) ' नान्नमद्याद् एकवासाः ' ( ४।४५ ) अर्थात् — ( क ) भोजनका स्नेह ( चिकनाहट ) निकालकर न खावे; क्योंकि सार - भाग निकल जानेसे शेष भोजन निस्सार हो जाता है । माखन मिली हुई लस्सी पीने से जो लाभ है; वह अलग कियेसे नहीं । ( ख ) बहुत तृप्त होकर भोजन भी न करे - इससे बहुत बड़ी हानि होती है, भीतर वायुके भी प्रवेश

पृष्ठ 556

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२२८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) न हो सकनेसे कभी मृत्यु भी सम्भव हो जाती है । पेटका कुछ खाली होना ही चाहिये । ( ग ) न बहुत प्रातः न बहुत सायं में भोजन करे । इस समय प्रकाश और तमः के मिश्रण से कीटाणु बहुत फैल जाते हैं — उस समयका भोजन कीटाणुवरा हानिजनक हो जाता है । ( घ ) खाटपर भोजन न खावे । एक तो वह बच्चोंके मलमूत्रके अंशसे भी युक्त हो सकता है । दूसरा दाल वा भोजनादि-का टुकड़ा गिरनेसे उसमें च्यूटियां वा अन्य कीटाणु, खटमल आदि खाटमें घुस सकते हैं, इससे उसपर सोनेवालेकी हानि स्पष्ट है । ( ङ ) तिलसे सम्बद्ध वस्तु रातको न खावे । तिल बहुत गर्म प्रभाव रखते हैं; रातको निद्रामूलक दुर्वलतावश तिलकी गर्मी बढ़ जाने से स्वप्नदोषादि वा अन्य कोई व्याधि हो सकती है । ( च ) आसनपर भोजन रखकर भी खाना ठीक नहीं; क्योंकि-उच्छिष्टके गिरनेसे उसमें कीटाणु प्रवेश कर हानि पहुँचा सकते हैं । ( छ ) हाथपर भी भोजन न खावे । यह संन्यासीको शोभित हो सकता है— गृहस्थको नहीं । हाथ पर भोजन ठीक आ भी नहीं सकता । ( ज ) टूटे बर्तनमें भोजन न करे - बर्तन भोजना-भिमानी देवताका स्थान है, वह टूटा हुआ होना अच्छा नहीं; इससे देवताका अपमान है, वह हाथको चुभ भी सकता है । ( झ ) स्नानके बिना भोजन नहीं होना चाहिये - ' अस्नायी समलं ' भुङ्क्ते ' । भोजन करने में ऊष्मा निकलती है; स्नान न करने में भी ऊष्मा भीतर रहती है, और शरीरसे निकले हुए पसीनेके द्रवभागके वायुमें उड़ जानेसे शेष मलके रह जानेसे उससे रोमकूप

पृष्ठ 557

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घृतपक्व भोजन की शुद्धताका विज्ञान १२६ वन्द रह जाते हैं ।. यदि स्नान न किया जावेगा; तो रोमकूपोंके मलावृत होने से उनके द्वारा भोजनकी ऊष्मा बाहर नहीं निकल सकेगी, उससे भीतर बड़ी हानि पहुँचती है; उससे भीतर मल बना रहेगा । तब ' अस्नायी समलं भुङ्क्ते ' वाली बात ठीक है । उसका बुद्धि और मस्तिष्कपर कुप्रभाव रहता है । इसलिए स्नान न करनेवाली मुसलमान - आदि जातियां भी मस्तिष्ककी कमजोरीसे युक्त होती हैं— अतः हृदयहीन भी होती हैं । ( ञ ) चलते हुए भी भोजन ठीक नहीं; क्योंकि चलते समय रक्तकी गति तीव्र होती है; उस समय भीतर डाला हुआ भोजन रक्तको विकृत कर दिया करता है, रक्तके विकृत होने से अन्न ठीक हज़म नहीं होता । शान्त - चित्तसे रक्तगतिकी समतामें ही भोजन करना लाभदायक होता है । ' अब्राह्मणोऽयं यस्तिष्ठन् भक्षयति ' यह उदाहरण महा-भाष्यकारने नञ्सूत्र में दिया है । यहां खड़े हुए भोजन करनेवालेको ' अब्राह्मण ' कहा है । ' नत्र ' यहाँ अप्रशस्त अर्थ में है । सो यह निन्दार्थवाद खड़े होकर भोजन करनेमें हानि सूचित कर रहा है । ( ५६ ) घृतपक्व - भोजनकी शुद्धताका विज्ञान । घृतपक्व अन्न विशुद्ध होता है । कई आप्ता लोग ब्राह्मणोंकी घृतपक्व अन्न खानेमें प्रवृत्ति देखकर उसमें कारण उनकी रसनाका, लौल्य बताते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है । घृतपक्व अन्न विशेष - शुद्ध होता है — इस विशुद्धिके कारण से ही घृतपक्व अन्नका उपयोग होता है । ब्राह्मणगण ' तस्मात् शास्त्र ' प्रमाणं ते ' ( गीता १६।२४ ) यहां भगवान् से अनुज्ञात शास्त्रानुसरण के प्रणयी होते हैं । न. ३४ स ० ध ०

पृष्ठ 558

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ५३० उसी शास्त्र से वे लोग ' यह कर्तव्य है - यह अकर्तव्य है ' यह जानते हैं । शास्त्रों में लिखा है - घृत देवताओंका अन्न होता है । जब देवाप्सरा उर्वशी शापवश मनुष्य- लोकसें पुरूरवाके घर पहुँची, तब खानेकेलिए पूछनेपर उसने कहा - ' घृतं मे वीर! भक्ष्यं स्यात् ' ( श्रीमद्भागवत ॥१४।२२ ) । यही बात ब्राह्मणभागात्मक वेदमें भी कही है - ' घृतस्य स्तोकं सकृद् अह्न आइनाम् ' ( शतपथ ० ११।५।१।१० ) यही बात मन्त्रभागात्मक वेद में भी कही है - ' घृतस्य स्तोकं सकृद् अह्न आश्नाम् ' ( ऋ ० सं ० १०६५।१६ ) । दोनों जगह उर्वशी कहनेवाली ( ऋषिका ) है । इसी कारण देवयज्ञ होम में भी शुद्ध घृतका ही उपयोग होता है । इस प्रकार घृत देवभोजन होनेसे जब वह विशुद्ध सिद्ध हुआ; तो घृतपक्व अन्न भी स्वतः विशुद्ध सिद्ध हुआ । इसीलिए ' रस्याः स्निग्धाः ( घृतपक्वाः ) स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विक प्रियाः ' ( गीता १७१८ ) यहांपर स्निग्ध आहारको सात्त्विक ( तमोगुणको दूर करनेवाला ) कहा गया है । इसीलिए अपनी अशुद्धि हो जाने-पर स्मृतियोंमें घृतप्राशनसे शुद्धि मानी गई है । जैसे कि मनुजीने कहा है- ' घृतं प्राश्य विशुद्धयति ' ( ५१०३ ) । घृत विषघ्न भी होता है; अतः जब सांप काट जाय; तो उसके विष- दूरीकरणार्थ उसे घी पिलाते हैं । छोटे बच्चेको जातकर्म संस्कार में सुवर्ण-शलाकासे मधु और घृत चटाते हैं; वहां भी विष प्रभाव दूर करना लक्ष्य होता है । रोटीको घृत से चुपड़नेका लक्ष्य भी यही होता है ।

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घृतपक्व - भोजनकी शुद्धताका विज्ञान २३१ व ' शुक्तं पर्युषितं चैव शूद्रस्योच्छिष्टमेव च ' ( मनु ० ४।२११ ) यहाँ पर्युषित ( बासी ) अन्नको निषिद्ध माना गया है, परन्तु यदि बांसी ( कलका ) अन्न भी घृतपक्क हो; तो उसे भी मनुजीने शुद्ध माना है । जैसे कि - ' यत्किञ्चित् स्नेहसंयुक्तं भोज्यं भोज्यमगर्हितम् । तत् पर्युषितमप्याद्य ं हविः - शेषं च यद् भवेत् ' ( ५४ ) इससे घृत - संस्कृत अन्नकी शुद्धता सिद्ध हो जाती है । इसलिए शीतला आदिके अवसर पर घृतपक्क पर्युषित ( बासी ) भोजनका भी उपयोग होता है । ग्रहण के समयमें पड़ा हुआ घृतपक्व मिष्टान्न भी इसी कारण अशुद्ध नहीं माना जाता । 7 7 र्य घृतपक्ककी शुद्धतामें कारण यह है कि घृत गौसे उद्भूत हुए दुग्धका सार है । सार - वस्तु लाभदायक और श्रेष्ठ एवं बलप्रद हुआ करती है । और फिर वेदादि - शास्त्रों के अनुसार गाय में भी देवताओं का निवास तथा सात्त्विकता मानी गई है । इसी कारण उसके पञ्चगव्यका भी महापापोंके प्रायश्चित्तों एवं अशुद्धकी शुद्धि में उपयोग किया जाता है । पञ्चगव्यमें घृत श्रेष्ठ है । घृत बनानेकेलिए दुग्धसे फल्गु पानी निकाल दिया जाता है । इस कारण जलसे संस्कृत अन्न भी तैजस - घृत से संस्कृत अन्नके समान शुद्ध नहीं माना जाता । कीटाणु जलको शीघ्र दूषित एवं विकृत कर दिया करते हैं । इसलिए जल संस्कृत अन्न भी शीघ्र बिगड़ जाता -- है । घृतपर कीटाणुओं का आक्रमण सफल नहीं होता, इसलिए सूर्यादिके ग्रहणके अवसरपर कीटाणुओंके फैल जानेपर जल-संस्कृत अन्न तो अशुद्ध हुआ माना जाता है, इसलिए फेंक दिया I

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२३२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) जाता है, पर घृत- संस्कृत अन्नको न तो अशुद्ध माना जाता है; और न ही उसे फैंक दिया जाता है । दूधसे जलके भागको दूर करनेकेलिए उसे जमाया जाता है, वह दही बन जाता है । दहीसे भी जलके भागको दूर करके उसका माखन बना दिया जाता है । उसके बचे - खुचे जलको भी अग्नि द्वारा जलाकर अवशिष्ट परम - विशुद्ध सार - भाग घृत बन जाता है । इसीलिए सद्योजात वालकके भी अशुद्ध होनेसे उसकी शुद्ध्यर्थ ‘ पारस्करगृह्यसूत्र’में जातकर्म संस्कार में घृतप्राशन कहा गया है-' अनामिकया सुवर्णान्तर्हितया मधुघृते प्राशयति घृतं वा ' ( १।१६।४ ) । इस प्रकार घृत- संस्कृत अन्नकी शुद्धता शास्त्रीय भी सिद्ध हुई; परन्तु उस घृतमें अशुद्ध - घृतादिका मिश्रण न हो । मूत्र वा मद्यसे मिला हुआ गङ्गाजल भी अशुद्ध ही हुआ करता है । घृत बनाने वाला विधर्मी भी न हो, भिन्न जाति वाला भी न हो । देवयज्ञों में वनस्पति घृतका उपयोग करके हम लोग देवताओंको भी ठगते हैं, फल भी तो वैसा ही मिलता है । अस्तु । घृतकी शुद्धिसे हमारा मस्तिष्क शुद्ध हो जाने पर हमारे वाक्, शरीर और मन पुष्ट होंगे । छान्दोग्यके उद्दालक- श्वेतकेतुके संवाद के ' अनुसार घृतके स्थूल भागसे अस्थि, मध्यम से मज्जा और सूक्ष्मसे वाणी बनती है । अस्थि शरीरका मूल है, मज्जा बलका, वाणी सारे संसारके व्यवहारका मूल है । ' आयुर्वै घृतम् ' ( तैत्ति ० सं ० २।३।२।२ ) यहाँ घृतको श्रायु पैदा करने वाला माना गया है । इसलिए भी यह सेवनीय है । आयुकी वृद्धिमें पुरुष शास्त्रीय आचरण करके जगत्का