श्रीगणेशाय नमः।
सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 541–550
सनातन धर्मालोक ५ · पृष्ठ 541–550
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गोबर में लक्ष्मीका निवास ५१३ लक्ष्मीने कहा था- - ' ' दिष्ट्या प्रसादो युष्माभिः कृतो मेऽनुग्रहात्मकः । एवं भवतु भद्रं वः पूजितास्मि सुखप्रदा ' ( ८२।२५ ) इसमें यह बताया गया है कि- कृपा करके लक्ष्मीको कहा था कि तुम हमारे मूत्र, और गोवरमें रहो; इससे तुम्हारी चञ्चलता दूर होगी । सनातनधर्मके आचार - विचारों में यह विशेषता है कि उनमें जहां दृष्टफलकता हुआ करती है; वहां दृष्टफलकता भी होती है । अदृष्टरूपसे उसमें लक्ष्मीकी अभिमानिनी देवता निवास किया करती है, और दृष्टरूपमें उसमें लक्ष्मी भी निवास करती है । इसमें तात्पर्य यह है कि — भूमिमें जब खेती होती रहती हो; उसमें भूमिकी उत्पादक शक्ति क्रमशः क्षीण होती हुई नष्ट हो जाती है । यह बात अमेरिकाके वैज्ञानिकोंने अनुभूत की । तब उन्होंने भूमिकी उत्पादनशक्ति बढ़ानेकेलिए उसमें गोमूत्र से सने हुए गोबर का खाद भूमिमें डाला । जब भूमिकी उत्पादनशक्ति बढ़ी; तो उसके कारण गेहूँ भी प्रचुरमात्रामें बढ़ी, इसलिए गेहूँको संस्कृत में ' गोधूम ' कहते हैं । इस प्रकार गोवरके ही खादसे रुईकी खेती बढ़ती है । गेहूँकी वृद्धिसे अन्नकी वृद्धि तथा रुईकी वृद्धिसे वस्त्रकी वृद्धि होने पर संसारकी अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति होजानेसे लक्ष्मीकी प्राप्ति प्रत्यक्ष है । वह लक्ष्मी हमारी सदा स्थिर रहेगी । इस प्रकार ' गोमये विद्यते लक्ष्मीः ' यह ठीक ही है । गोबरके उपलोंके होनेपर हमें ईन्धन लेनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती, उसकी भस्मसे ही पात्रोंकी शुद्धि होजानेसे हमें पात्र-शोधक यन्त्रोंकी आवश्यकता नहीं रहती । इस प्रकार लक्ष्मीके ३३ स ० ध ०
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५१४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) हमारे पास ही रहनेसे ' गोबर में लक्ष्मीका निवास ' यह कथन यथार्थ ही सिद्ध हुआ । पर आजकल हम ऐसा नहीं करते; उसके फल-स्वरूप हमारी लक्ष्मो भी खिंची हुई विदेशों में चली जा रही है । बूढ़ी वा अपाङ्ग गौ यदि दूध नहीं देती; तो गङ्गाजलरूप में तथा ओषधिरूपमें हमें गोमूत्र तो देती है; इससे रोग दूर होजानेसे हमें विलायती - दवाइयां मंगाकर लक्ष्मीको विदेश में भेजनेकी आवश्यकता नहीं रह जाती । इस प्रकार वह लक्ष्मीरूप गोवरभी तो देती है । तब उस वृद्धाका पालना भी हमारे लिए भाररूप नहीं सिद्ध होता 1 । वैसी गौओंको कसाईखाने में भेजनेकी सम्मति देने वाले कृतघ्न लोग अंग्रेजोंके मानसिक दास होनेसे भारत से अपने धनको विलायत में भेजने के एजेण्ट बने हुए हैं - यह बात भारतीयों को कभी नहीं भूलनी चाहिए । ( ४८ ) पूर्वदिशा की ओर भोजनका विज्ञान । हम यहां तक प्रातःकालके आचार प्रायः बता चुके । अब पाठक मध्याह्नमें भोजनकी तैयारी कर रहे हैं; अतः उस समय के आचार - विचारों पर भी गम्भीर दृष्टि डालें । पूर्वदिशासे प्राणशक्तिका अभ्युदय होता हैं । हमारा प्राणस्वरूप सूर्य पूर्वदिशा से ही उदित होता है । अतः उसकी दिशा की ओर भोजन करनेसे भी हमारी प्राणशक्ति बढ़ेगी, और उससे आयु बढ़ेगी — यह स्वाभाविक है । डा. जार्ज कहते हैं कि — उत्तराभिमुख भोजन करनेसे विद्युत्का प्रवाह धमनियों में अत्यन्त वेगसे चलता है; अतः उत्तराभिमुख भोजन उतनी आयु नहीं देता, जितना कि
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हस्तपादादि - शुद्धिका विज्ञान २१२ पूर्वमें । अतः ‘ आयुष्यं प्राङ्मुखो मुङ्क्ते ' ( २५२ ) यह मनुस्मृतिका वचन ठीक सिद्ध हुआ । ( ४६ ) हस्तपादादि - शुद्धिका विज्ञान । भोजन करने से पूर्व हाथ - पांव आदिको सदा जलसे धो लेना चाहिए । उसमें कारण स्पष्ट है । हाथमें कभी मक्खी आदि बैठ " गई; वा हमने कहीं हाथ अशुद्ध स्थानपर रखा; तो हाथमें विष वा अन्य अशुद्धि रह सकती है । वैसे भी किसी पवित्र वस्तुको छूना हो; हस्तप्रक्षालन अवश्य कर लेना चाहिये । इससे हाथमें भीतरी ऊष्मा प्राप्त होजानेसे उसपर के अशुद्ध - परमाणु दग्ध हो जाते हैं । पवित्र करने में जलसे बढ़कर और कोई नहीं । भोजनका पात्र खानेके लिए जहाँ रखना है; वहाँ भी जलसे लेप कर डालना चाहिए— इससे पृथिवीकी भीतरी ऊष्माके उद्वमनसे पृथिवीपर के संक्रामक - कीटाणु दूर हो जाते हैं । इससे भोजनमें अशुद्ध - परमाणु नहीं पहुँच पाते । प्रातः पाकशालाकी भूमि में जलसे लीपनेका रहस्य भी यही है । भोजनकेलिए कहा है- ' आर्द्रपादस्तु भुञ्जीत नार्द्रपादस्तु संविशेत् । आर्द्रपादस्तु भुञ्जानो दीर्घमायुरवाप्नुयात् ( मनु. ४ । ७६ ) यहाँपर पैर गीले करके भोजन करनेसे दीर्घायुकी प्राप्ति कही है । इसमें वैज्ञानिक रहस्य यह है कि — उससे भीतर कुछ उष्णता उत्पन्न होती है, वह ऊपर उठकर पेटमें संचित हो जाती है, उससे भोजनकी पाकक्रियामें सहायता मिलती है । भोजन ठीक पच जावे; तो कोई रोग नहीं होता । रोग न होने से दीर्घ आयु होगी ही । भोजन
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११६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) करते हुए श्वास - प्रश्वासकी गति बढ़ जाती है । श्वासादिका बढ़ना आयुकेलिए हानिकारक है । हाथ - पांव धोनेसे वह गति कम हो जाती है, और विद्युत - शक्ति उत्पन्न होनेसे भोजनकी पाकक्रिया में सहायता प्राप्त होती है । ( ५० ) भोजन में मौनका विज्ञान । भोजनमें चुप रहनेका रहस्य यह है कि -भोजन करते हुए लार हमारे मुखमें उत्पन्न होती है, उससे भोजनकी परिपचनक्रिया सम्पन्न होती है । उस समय यदि वातचीत की जावे; तो वह लार भोजनके लिए पर्याप्त मात्रा में न बन सकेगी; क्योंकि उसका कुछ उपयोग बोलने में भी होगा । इससे मुखके सूखनेपर बीच - बीचमें पानी पीना पड़ेगा, जिससे वातदोषकी उत्पत्ति हो सकती है । और खाते हुए बोलने से मुहसे बाहर थूक गिरती है; दूसरे पर वा अपने भोजनपर पड़ सकती है । उस समय बातचीत करते हुए · जीभके कटने का डर भी रहता है, क्योंकि मन सदा एक इन्द्रियके साथ रहता है । दूसरी इन्द्रियके साथ उसे बलात् जोड़ने में कई M हानियाँ तथा भोजनकी अनपच हो सकती है । ( ५१ ) आहार - शुद्धिका धर्मसे सम्वन्ध । हमारा धर्म आचार - विचार, आहार तथा व्यवहार इन चार वस्तुओं पर निर्भर है । इनमें आहारकी तो मुख्यता है ही; क्योंकि प्रसिद्ध है - ' जैसा खावे अन्न, वैसा होवे तन और मन ' तो जैसा आहार होगा; वैसे मन और बुद्धि होंगे । जैसे मन और बुद्धि होंगे; वैसे विचार होंगे । जैसे विचार होंगे, वैसे ही आचरण
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चाहार - शुद्धिका धर्मसे सम्बन्धं ५१७ होंगे । जैसे आचरण होंगे; वैसा ही दूसरोंसे व्यवहार होगा । व्यवहार - शुद्धि रहनेपर कोई अशान्ति वा अव्यवस्था नहीं हो में पाती । अव्यवस्था दूर रहने से दुःख भी नहीं रह पाता । तब जो लोग कहते हैं कि - सनातनधर्मियोंने भोजनका भी धर्मसे सम्बन्ध कर दिया है — यह आक्षेप अबहुश्रुतताका फल है । ' अन्नदोषाच्च मृत्युर्विप्रान् जिघांसति ' ( ५४ ) मनुजीने यहाँ पर अन्न - दोषसे ही मृत्युकी प्राप्ति कही है । श्रुतिमें आता है — ' यद्वै मनसा ध्यायति, तद् वाचा वदति, यद् वाचा वदति, तत् कर्मणा करोति ' जैसा मनमें विचार उत्पन्न होता है, वैसा ही वाणी से बोला जाता है । हमारी वाणी जैसा बोलेगी; में कर्म भी वैसा ही किया जायगा । तब सारा विचार एवं कर्म मनपर र निर्भर हुआ; और मन निर्भर हुआ आहारकी शुद्धिपर । तभी तो छान्दोग्योपनिषद् में अन्नकी शुद्धिपर बल देते हुए कहा है- = ए ' आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः, सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः । स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः ' ( ७१२६ २ ) ' अन्नमयं हि सोम्य! मनः, श्रापोमयः प्राणः, तेजोमयी वाकू ' ( ६ | ५ | ४ ) यहाँ पर मनका अन्नसे बनना कहा है; जब कि हमारे सब कार्य मनके श्राश्रयसे होते हैं; तब मनके निष्पादक अन्नकी शुद्धिपर हमें विशेष ध्यान देना चाहिये | अन्नकी शुद्धि होनेसे अन्तःकरणकी शुद्धि कही है; उससे ' निश्चल स्मृतिका प्राप्त होना और निश्चल - स्मृति से सब बन्धनोंका आ कहा है । द्र यही बात पाशुपत ब्रह्मोपनिषत् में भी कही है- ' अभक्ष्यस्य
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५१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) निवृत्त्या तु विशुद्धं हृदयं भवेत् । आहारशुद्धौ चित्तस्य विशुद्धिर्भवति स्वतः ( ३६ ) चित्तशुद्धौ क्रमाज्ज्ञानं त्रुट्यन्ति ग्रन्थयः स्फुटम् । अभक्ष्यं ब्रह्मविज्ञान - विहीनस्यैव देहिनः ' ( ३७ ) । हम संसार में जो भी कार्य करते हैं; वह अपने मन, वाक् तथा प्राणों के सहयोग से करते हैं । यदि यह हमारे मन आदि शुद्ध हैं, तो हमारे कार्य भी शुद्ध होंगे । यदि यह अशुद्ध रहेंगे; तो हमारे कार्य भी । इस कारण हमें अपने मन, वाणी और प्राणोंके उत्पादक अशन, पान, घृत आदिकी शुद्धिमें भी ध्यान देना चाहिये । यह केवल कथनमात्र ही नहीं; किन्तु इसमें भी विज्ञान है । जैसा कि छान्दोग्योपनिषद् में आरुणि उद्दालकने श्वेतकेतुको कहा है- ' अन्नमशितं त्रेधा विधीयते । तस्य यः स्थविष्ठो धातुः, तत् पुरीपं भवति । यो मध्यमः, तद् मांसम् । योऽणिष्ठः, तद् मनः ' ( ६।५।१ ) यहाँ खाये हुए अन्नके स्थूल - भाग से मल, मध्यम से माँस, अत्यन्त सूक्ष्म - भागसे मन बनना कहा है । इसलिए प्रसिद्ध है, ' जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन ' । अन्नके साथ जलपान भी तो होता है; अब उसके तीन भाग वताते हैं - ' आपः पीताः त्रेधा विधीयन्ते । तासां यः स्थविष्ठो धातुः, तद् मूत्रं भवति । यो मध्यमः, तद् लोहितम् । योऽणिष्ठः स प्राणः ’ ( ६२ ) यहाँ जलका स्थूलभाग मूत्र, मध्यम रक्त, सूक्ष्म - भाग प्रारण बनता है - यह कहा है- यह प्रत्यक्ष तथा अनुभव सिद्ध बात है । जब हमारा शरीर रक्त और प्रारणके सहारेसे है; तो पान - शुद्धि में भी हमें बहुत ध्यान देना चाहिये । ' आपोमयः प्राणः ' ( ६।५।४ ) । अन्नके साथ घृत आदि तैजस - पदार्थ भी खाया जाता है;
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याहार - शुद्धिका धर्मसे सम्वन्धं ५१६ उसके परिणाममें उद्दालक तीन भेद बताते हैं - ' तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते । तस्य यः स्थविष्ठो धातुः, तद् अस्थि भवति । यो मध्यमः, स मज्जा । योऽणिष्ठः, स वाक् ' ( ६।५।३ ) ' तेजोमयी वाकू ' ( । ६ ५ । ४ ) यहाँ घृत आदि स्निग्ध - वस्तुका स्थूल - भाग अस्थि, मध्यम - भाग मज्जा, और सूक्ष्म - भाग वाणी हो जाता है - यह कहा है । हमारा सांसारिक कार्य मन, प्राण एवं वाणी से चलता है; तब उसमें मुख्य कारण अन्न ही हुआ । यदि अन्न सात्त्विक होगा; तब मन भी सात्त्विक होगा । जब मन सात्त्विक होगा, तब विचार भी सात्त्विक होंगे । विचार सात्त्विक होंगे तो आचार भी, और आचारसे व्यवहार भी सात्त्विक होंगे — यह सिद्ध होगया । अतः अन्न - शुद्धि विशेष अपेक्षित है । सात्त्विक भोजनसे शरीर स्वस्थ एवं हलका रहता है, चित्त प्रसन्न रहता है । साधारणतः देखा जाता है कि — अन्न न खानेसे मन दुर्बल हो जाता है, चिन्तन - शक्ति नष्ट होती हुई दीखती है । अन्न खानेसे मन सबल और चिन्तन - शक्ति बढ़ती हुई दीखती है । यह अन्न यदि सात्त्विक होता है; तो मन, बुद्धि, प्राण और शरीर सात्त्विक होते हैं । यदि अन्न तामस होता है, तो मन, बुद्धि, शरीर आदि तामस होते हैं । केवल अन्न हो तामस हो - यह भी नहीं; यदि अन्नका स्वामी भी तामस है; तब भी उसका प्रभाव होता है । भीष्मपितामहने दुर्योधनका पापान्न खाया, इससे उनका ज्ञान लुप्त हो गया । द्रौपदीके वस्त्राकर्षणके समय वे इसीलिए द्रौपदीकी रक्षा न कर सके । इससे स्पष्ट है कि -भोजन सत्पात्रका स्वीकार करना
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५२० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) चाहिए; असत्का नहीं । सत् - पुरुष भगवान् से प्रोक्त दैवी - सम्पत्ति वाले होते हैं ( गीता १६।१-३ ) आसुरी - सम्पत्ति वालोंमें शुद्धता आदि नहीं होती - ' न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ' ( गीता १६७ ) उसमें शौच-के विषय में योगदर्शनके व्यासभाष्य में कहा गया है- ' तत्र शौचं मृज्जलादिजनितं मेध्याऽभ्यवहरणादि च बाह्यम् ' ( २।३२ ) यहां शुद्ध भोजनका खाना भी शौच ( शुद्धता ) में शामिल किया गया है । तामस-भोजनके खाने से ब्रह्मचर्य, धारणा, साधन आदि कठिन हो जाते हैं । राजसिक - अन्न खाने से मन एवं बुद्धि चञ्चल हो जाते हैं । अतः पवित्र और सात्त्विक अन्न खाना चाहिए । रसयुक्त, घृताक्त, स्थिर और हृद्य, आयुः, सत्त्व, वल, आरोग्य, सुख, और प्रीति बढ़ानेवाले पदार्थ सात्त्विक होते हैं ( गीता १७१८ ) कड़वे, खट्टे, बहुत गर्म, तीक्ष्ण, रूखे, दाह उत्पन्न करनेवाले पदार्थ राजस होते हैं, उनका परिणाम दुःख, शोक एवं रोग है । ( १७१६ ) बासी, रसहीन, दुर्गन्धित, चार - पांच घण्टोंका पड़ा हुआ, जूठा और अपवित्र आहार · तामस होता है ( १७११० ) । मनुजीने कई पदार्थ अभक्ष्य कहे हैं; उनका भी प्रयोग उचित नहीं, जैसे कि—-' लशुनं गृञ्जनं चैव पलाण्डु ' कवकानि च । श्रभक्ष्याणि द्विजातीनाम-: मेध्यप्रभवाणि च ' ( ५।५ ) लहसन, प्याज, कुकुरमुत्ता आदि पदार्थ • वर्जित हैं । गृञ्जन एक कन्द होता है, जिसके पत्तेकी नसवार • बनती है । कई इससे गाजर लेते हैं, कई शलगम । पर इनमें : तामसपन मालूम नहीं होता । गाजर पौष्टिक है, पर शायद काम-
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भोजन - विधि विज्ञान १२१ वर्धक होनेसे इसे तामसों में गिना गया हो । कन्नौजमें गाजर तो नहीं खाते, पर लहसन खा लेते हैं, यह अनुचित है | लहसुन और प्याज़ यद्यपि कई वातादि दोपोंके दूर करने वाले हैं, पर अत्यन्त उत्तेजक तथा दुर्गन्धित होनेसे भक्ष्य नहीं । मन, बुद्धि, . शरीर, प्राण, श्रात्मा इनको कुविचारपूर्ण करते हैं । बुद्धि आदिकी मलिनता से कामसंचार, ब्रह्मचर्यनाश, पशुभावकी वृद्धि, चित्तकी चंचलता उनसे होती है, जिससे आध्यात्मिक उन्नतिका मार्ग रुक जाता है । इस कारण धर्म - शास्त्रमें कदन्नके भक्षणका निषेध किया गया है । परस्पर जूठा खाना भी ठीक नहीं, इस प्रकार एकके संक्रामक कीटाणु तथा रोग दूसरेमें बहुत शीघ्र संक्रान्त हो जाते हैं । ग्लानि तथा अपवित्रता तो होती ही है । इसीलिए ' नोच्छिष्टं कस्यचिद् दद्यात् नाद्याच्चैव तथान्तरा ' ( २।५६ ) इस वाक्य में मनुजी ने निषिद्ध किया है, आहारपर हमारे शास्त्रकारोंने वहुत कन्ट्रोल लगाये हैं; क्योंकि — आहारका धर्मसे निकट सम्बन्ध है । ( ५२ ) भोजनसे पूर्व ग्रास रखना; अग्नि में डालना, काकबलि आदि विज्ञान । हम जब भोजन करते हैं, तब अपने देवको भी त्वदीयं वस्तु गोविन्द! तुभ्यमेव समर्पये ' इस न्यायसे पहले निवेदन करना उचित है क्योंकि - हम देवोंका दिया ही तो खा रहे हैं । वेदमें कहा है- ' नार्यमणं पुष्यति नो सखायं " केवलाघो भवति केवलादी '
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५२२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ( ऋ. १०।११७१६ ) अर्थात् अकेला भोजन करे; न तो अर्यमा ( यह अपने इष्टदेवताका उपलक्षण है वा देवाधिदेवका ) देवको पहले खिलाता है; न सखाको; केवल अपना पेट भरनेवाला पापी माना जाता है | यही बात भगवद्गीता में कही गई है— ' अधं स केवलं भुङ्क्ते यः पचत्यात्मकारणात् ' ( ३ | १३ ) । मनुजी ने भी कहा है-‘ देवान् ऋषीन् मनुष्याँश्च पितॄन् गृह्याश्च देवताः । पूजयित्वा ततः पश्चाद् गृहस्थः शेषभुग् भवेत् । अधं स केवलं भुङ्क्ते यः पचत्यात्मकारणात् । ( ३।११७-११८ ) अन्य बात यह है कि हमारे घरों में चक्की, चूहा, झाड़ ू , जल का घड़ा, ऊखल - मूसल आदिसे जीवोंकी हत्या अनिवार्यतासे हुआ करती है । मनुजीने इन्हें ' पञ्च सूना ' ( पांच कसाईखाने – ३२६८ ) कहा है; उनके प्रायश्चित्तार्थ ब्रह्मयज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, नृयज्ञ इन पञ्च - महायज्ञोंका विधान ( ३२६६-७१ ) किया है । इनमें पितृयज्ञमें बलि - वैश्वदेवमें कीट - पतङ्ग सबको भोजन देना कहा है । और यह सब वर्णोंको करना कहा है । वेद - पुराणादिका पठन - पाठन ब्रह्मयज्ञ है । इनमें पुराणका पठन शूद्रकेलिए चरितार्थ है । पितरोंका तर्पण पितृयज्ञ है । हवन देवयज्ञ है, बलिवैश्वदेव भूतयज्ञ है, अतिथिको भोजन खिलाना अतिथियज्ञ है । आजकल के देशकालानुसार इन पञ्चमहायज्ञोंको कोई नहीं करता । इसमें दो - तीन सुगम प्रकार ‘ पुराणमित्येव न साधु सर्वं, न चापि सर्वं नवमित्यवद्यम् ' इस न्याय से किये जाते हैं । वह यह कि - अङ्गी भगवान्के आगे भोग घर दो; तो उसके सब अंग तृप्त हो जाएंगे,