सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 571–580

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 571–580

पृष्ठ 571

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भोजन के बाद नियम २४३ वह घृताक्त हाथ आंखोंपर फेरना चाहिये - इससे आंखोंकी ज्योति बढ़ती है । घृतको हाथसे उतारने के लिए साबुन से हाथ धोकर हाथको रूखा करना ठीक नहीं । ( घ ) भोजनके बाद पहले वीरासनसे बैठना चाहिए; उस समय ' अगस्त्यं कुम्भकर्णं च शनिं च वडवानलम् | अन्नस्य परिपाकार्थं स्मरेद् भीमं च पञ्चमम् ' अगस्त्य आदिको याद कर लेना चाहिये । इस स्मृति से हमारे भोजन- परिपाककी क्रियापर प्रभाव पड़ता है । कई इस मन्त्रसे उस समय पेटपर हाथ फेरते हैं; पर हमें वह उचित नहीं जंचता । यद्यपि उससे भोजनके पचने में सहायता मिलती है; तथापि वह भोजन सर्वथा निस्सार हो जाता है । इस विषय में एक आख्यायिका प्रसिद्ध है कि — दो दैत्य थे, कहीं जंगल में रहते थे । आनेवाले अतिथि सत्कारका ढोंग करते थे । एक भाई दूसरी ओर आवरण में अपने भाईको मारकर उसका मांस पकाकर अतिथिको खिला दिया करता था । जव वह खा चुकता तो वह दैत्य संजीवनी विद्याके बलसे अपने भाईको बुलाता । वह भाई उस अतिथिका पेट फाड़कर बाहर निकल आता । उससे वह पथिक मर जाता । महात्मा बने हुए वे दोनों उसे खा जाते थे । इस प्रकार बहुतसे व्यक्ति मर गये । अगस्त्य मुनिको पता लगा । वे भी गये । जब वे भोजन कर चुके, तो दैत्य जब अपने भाईका संजीवनी विद्यासे आह्वान करने लगा; तो मुनिने अपने पेटपर हाथ फेर दिया । आह्नानसे भी वह दैत्य बाहर न निकला तो अगस्त्य मुनिने कहा कि-

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२४४ श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) मेरे पेट पर हाथ फेरनेसे वह गल गया - निस्सार होगया; अब नहीं निकल सकता । इससे दैत्य मुनिपर झपटा तो मुनिने हुँकार से उसे मार डाला और लोकरक्षा की । इस प्रकार पेट पर हाथ फेरनेसे भोजन निःसार हो जाता है । हां, समुद्रपायी - अगस्त्य बहुत खत्रैया कुम्भकर्ण, वृकोदर भीमसेन आदिके स्मरणकी भावना कर लेनी चाहिये । जिससे हममें भी उत्साहशक्ति संकुचित होकर भोजनका परिपाक हो जावे । ( ङ ) भोजनके बाद भुक्त्वा शतपदं गच्छेत, कोऽरुक्, कोऽरुक्, को s रुक्? ( बीमार कौन नहीं होता? ) वामशायी, शतपदगामी, सोऽरुक्, सोऽरुक्, सोऽरुक्, ( बांई करवट सोने वाला, और भोजन-के बाद सौ कदम चलनेवाला कभी बीमार नहीं होता ) इन वचनों के अनुसार धीरे - धीरे सौ कदम चलना चाहिये । इससे यथायोग्य रक्तसंचलन होनेसे भोजनकी परिपाक - क्रियामें सहायता मिलती है । तेज़ चलने में रक्तसंचलनकी गति बहुत बढ़ जानेसे भोजन भस्म हो जाता है । बड़ी हानि होती है । आयु घटती है । खाकर बैठने से बड़े पेटका सेठ वन जाता है । एकदम सो जावे; तो पाक-क्रिया न हो सकनेसे अजीर्ण हो जाता है । न घूमने से पेट बड़ा हो जाता है । घूम - फिरकर भोजन करना भी खतरे से खाली नहीं; क्योंकि उस समय भी रक्त - संचलन जल्दी जल्दी होता है ।

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उपवास एवं एकादशी - विज्ञान २४२ ( ६४ ) उपवास एवं एकादशी - विज्ञान । प्रत्येक पुरुष कभी आवश्यकता से अधिक खा जाता है; तब उसके अन्दर व्यर्थ पढ़ार्थ निरन्तर इकट्ठे होते रहते हैं; वे ही रोगों के मूल कारण बनते हैं । मुनियोंने उन रोगों के उपशमनार्थं समय-समय पर उपवास एवं एकादशीके दिन नियमतः व्रतका विधान नियमित किया था । कोई समय था कि - जब एकादशीव्रत पर उपहास किया जाता था; उसका नियमन ' कसाईपना ' बताया जाता था, पर विज्ञानने जन्म लेकर और उसे प्रश्रय देकर उन आते-प्ताओंको अल्पश्रुत सिद्ध कर दिया है । हमारे प्राचीन महानुभाव वैज्ञानिक - शिरोमणि थे- इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । उन्होंने हमारे लिए कर्तव्यता - रूपसे जो - जो बताया है, उसका रहस्य यद्यपि उन्होंने उस समय प्रकट नहीं किया; तथापि आजके विद्वान् उनके नियमनमें बहुत लाभ होते हुए देखकर उनकी बुद्धि पर प्रकट करते हैं । उपवास करनेसे अन्दर इकट्ठे हुए सब व्यर्थ पदार्थ भस्म हो जाते हैं । हमारी जठराग्नि चुन - चुनकर उन दूषित पदार्थोंको जला दिया करती है । इस प्रकार शरीर नवीन हो जाता है । उन पदार्थों के भीतर रहने तक हमें वास्तविक भूख नहीं लगती । क्षयादि-रोगोंसे अतिरिक्त उपवास प्रायः सभी रोगोंको निर्मूल करता है । इस प्रकार शरीर - स्वच्छताविधायक उपायोंमें उपवास सबसे श्रेष्ठ है । अपने उद्धारार्थ भगवान्का ध्यान भी करना पड़ता है । तब ३५ स ० ध ०

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५४६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) अनन्यमनस्कता अपेक्षित होती है, जैसा कि गीता में माना है ( ८ | १४, ६।१३,३०, १३।१० ) । छानन्य- ध्यान के लिए जहाँ शरीरकी स्वच्छता अपेक्षित होती है, वहाँ मनकी भी । जैसे शरीरकी स्वच्छता उपवाससे, आहार त्यागसे होती है, वैसे मनकी स्वच्छता मनके आहार - त्याग से होती है । मनका आहार होता है विषयविलास-चिन्तन | उसके त्याग अर्थात् मानसिक - उपवाससे निर्विषय मन स्वच्छ हो जाता है 1 । निर्विषय - मन से भगवानका ध्यान अनन्यता से होता है । मन ही बन्ध एवं मोक्षका कारण होता है । जैसे कि ' पञ्चदशी ' - स्थित यह वचन प्रसिद्ध है- ' मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । बन्धाय विषयासङ्ग, मोक्षे निर्विषयं मनः ' ( ११।११७ ) अर्थात् विषयासक्त मन बन्धका कारण होता है, और विषयरहित मन मुक्ति - दायक होता है । तब अपने उद्धारक, मुक्तिके उपायभूत अनन्य - ध्यानकी निष्पत्तिकेलिए मनकी निर्विषयता आवश्यक होती है । उसका उपाय है कि - त्रतवाले दिन निराहार रहा जावे । सतत - आहारसे हमारी इन्द्रियोंमें ऊष्माका वेग बढ़ जाता है, तव उनमें उत्तेजना एवं विषयैषणा उत्पन्न हो जाती है । जब विषयैषणा हुई, तो भगवान्का अनन्य - ध्यान कैसे सम्भव हो? उसकी रक्षार्थ भगवान् ने हमपर अनुग्रह करके यह उपाय बताया है कि- ' विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ' ( गीता २५६ ) अर्थात् निराहार - पुरुषकी विषय - निवृत्ति हो जाती है । निर्विषयता हो जानेपर अनन्य भक्तिमें कोई बाधा नहीं बच पाती, वह भक्ति ठीक हो पाती है ।

पृष्ठ 575

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उपवास एवं एकादशी - विज्ञान २४७ तब प्रश्न उठता है कि- निराहार होने से विषय चाहे छूट जावे, तथापि उनका रस तो नहीं छूटता । त्रिषय - रस न छूटनेसे भगवान् का अनन्य ध्यान फिर कैसे हो? ' इस पर यह उत्तर है कि यह ' कोई नवीन प्रश्न नहीं है । भगवान् ने इसे पहले से ही जान रखा है । अतः उन्होंने कहा है- ' विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्यं देहिनः । रस - वर्जंम् ' ( २।५ ९ ) । तब विषयरस हटने का क्या उपाय है? वह उपाय भगवान् ने इस प्रकार अपने श्रीमुखसे कहा है- ' रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवतेते ' ( २५६ ) अर्थात् निराहारता रूप व्रत हो; और फिर हो भगवान्‌की बाँकी - झाँकीका दर्शन । इस प्रकार विषय और विपयरस छूटकर हमारी अनन्यचित्ततामें सहायक बनेंगे । जब अनन्यचित्तता होगई; तो हमें जगत्का उत्तम लाभ मिलेगा । यही है व्रतोपवासका विज्ञान । उपवासका इसीसे महत्त्व समझिये कि — जब कोई ज्वर वा रोग जारी हो; तो वैद्य पहले उसके पेटकी सफाईकेलिए उसे लङ्घन ( उपवास ) कराते हैं; तभी उसकी चिकित्सा करते हैं । इससे वह ज्वर वा रोग जल्दी हट जाता है । वैज्ञानिकोंने अनुसन्धान करके पता लगाया है कि - उपवाससे ज्वर, सन्निपात ( नमोनिया ) प्रतिश्याय ( जुकाम ), जलोदर, हैजा, कुष्ठ, स्वप्नदोष, खांसी, दमा, सूजन आदि रोग शीघ्र हट जाते हैं । उपवाससे लाभ केवल शरीरका ही नहीं होता, वल्कि – मनका भी लाभ हो जाता है । अतः उपवास मानस - रोगोंके लिए भी उपयोगी सिद्ध है, क्योंकि-उपवाससे शरीरकी विकृति हटने से मनमें भी स्वास्थ्य हो जाता

पृष्ठ 576

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२४८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) है । मन के स्वस्थ होनेपर ' स्वस्थे चित्ते बुद्धयः संस्फुरन्ति ' इस प्रकार बुद्धिका संस्फुरण, तथा ध्यानैकतानता भी होती है— जैसे कि -भगवद्गीताके वचनसे हम पहले बता चुके हैं । इसीलिए ही योगी एवं तपस्वी बड़े - बड़े उपवासोंको किया करते थे । उसी उपवासको सनातन हिन्दुधर्ममें ' व्रत ' नामसे कहा जाता है । व्रतमें उपवासका नियम होता है । उपवास में पहले लघु-भोजन, फिर एक बार मुनिधान्य - श्यामाक ( सांवक ) आदिका उपयोग करना पड़ता है । उसमें उन्नति करनेपर दूध, तब जल, फिर वायु-भोजन करना पड़ता है । व्रतमें पुरुष धर्म समझकर उस दिन पापसे घृणा करता है । दूसरेके धन वा परखीमें कुदृष्टि नहीं करता, असत्य नहीं बोलता, या मौनी रहता है, दूसरेका धन नहीं चुराता, दूसरोंको धोखा नहीं देता । धर्मके पहले अङ्ग धृतिको, फिर क्षमाको आश्रित करता है, मनका दमन और इन्द्रियोंका निग्रह करता है, क्रोध नहीं करता है, शुचि ( पवित्र ) रहता है । स्वाध्याय करता है, भगवान् का ध्यान करता है । कथा सुनता है । भगवान्‌का कीर्तन करता है । इस प्रकार ऐहिक जीवन उत्तम हो जाता है, पुण्य उपार्जित हो जाता है, जिससे पारलौकिक गति भी सुप्राप्य हो जाती है । यही तो एकादशीका व्रत है । यह बात किसी से छिपी नहीं है कि - शुक्ल तथा कृष्ण दोनों पक्षों में एकादशी तिथि आया करती है । उसमें हमारे पूर्वजोंने • उपवासका आदेश दे रखा है । उसके माहात्म्य भी उन्होंने बताये हैं । कार्तिक माहात्म्यमें लिखा है- ' तपो नानशनात् परम् ' ( १७।२५ )

पृष्ठ 577

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उपवास एवं एकादशी - विज्ञान २४६ उपवाससे बढ़कर कोई तपस्या नहीं है । ' व्रतं नैकादशीसमम् ( १७।२७ ) एकादशीके समान अन्य कोई व्रत नहीं है । फिर वहां लिखा है--' एकादशीव्रतं नाम सर्वकामफलप्रदम् । एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि ॥ मातेव सर्वबालानामौषधं रोगिणामिव । रक्षार्थं सर्व - लोकानां निर्मितैकादशी तिथिः ॥ एकादशेन्द्रियैः पापं यत् कृतं येन वा द्विजाः! नरो निर्धूय तन्नूनं श्रीतः स्वर्गतिमान् भवेत् ॥ महापातकयुक्तोपि युक्तोपि ह्युपपातकैः । एकादश्यां निराहारः स्थित्वा याति परं पदम् ' ( १७१३, ४, ५, १० ) यहाँ पर एकादशीको बच्चों के-लिए माताकी तरह, रोगियों केलिए औषधके समान, सबके रक्षार्थ बनी हुई माना है । ग्यारह इन्द्रियोंसे किये हुए पापोंसे हटकर व्रतीका स्वर्ग में जाना बतलाया है । महापातकोंका भी दूर हो जाना माना है । अर्वाचीन पुरुष पहले इन फलोंपर उपहास करते थे, व्रतों का विरोध करते थे, और व्रत - उपवासोंको नियत करनेमें प्राचीन महानुभावोंकी क्रूरता एवं निर्दयता मानते थे पर पाश्चात्य - वैज्ञानिकों ने जब इन लाभोंका अनुमोदन किया; तब अर्वाचीन लोग प्राचीनोंके विज्ञानपर नतमस्तक होगये । उपवास मनुष्योंकेलिए बिना दवाईका श्रौषधालय है । वह रोगके बीजोंको जला डालता है । सचित - मलको अन्दर से निकाल कर शरीरका संशोधन कर देता है । पाचनक्रियाओं को शक्ति देता है । वास्तविक भूख उत्पन्न करता है । मनको शुद्ध एवं प्रसन्न कर देता है । हम जो कुछ खाते हैं, उसका अपकांश जब तब अन्दर

पृष्ठ 578

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ५१० बच जाया करता है । तदन्तर बार - बार खाते रहने से शारीरिक अन्तड़ियों पर बड़ा भार पड़ जाता है, इससे कामोत्तेजना भी प्रारम्भ हो जाती है । अन्तड़ियोंको विश्राम न मिलने से भीतर विष उत्पन्न होकर सारे शरीर में व्याप्त हो जाता है । उसका धुआँ मस्तिष्क में पहुँचता है, जो शारीरिक शक्तिका ह्रास कर देता है । इससे श्वास, कास, कुष्ठ, स्वप्नदोष और दुर्बलता आदि नाना रोग उत्पन्न होकर शरीरको सर्वथा अस्वस्थ कर देते हैं, और मनकी एकाग्रता हट जाती है । मनुष्य रोगाक्रान्त होकर भांति - भांति की विदेशी ओषधियाँ सेवन करता है । वे ओषधियाँ उस रोगको बलात् दूर करती हैं । उनसे भीतरी रोग शान्त नहीं होता, अपितु उन श्रोषधियोंका अपना विष भी भीतर सचित हो जाता है, जो हमें निर्बल बना देता है और कालान्तर में विभिन्न रोग हमपर फिर आक्रमण कर बैठते हैं । ऐसी स्थिति में उपवास ही एकमात्र सर्वोत्तम उपाय है । तभी तो रोगावस्थामें वैद्य लोग भी पहले लंघन ही कराया करते हैं । कहा गया है - ' ज्वरादौ लङ्घनं प्रोक्तं ज्वरमध्ये तु भेषजम् । ज्वरान्ते पाचनं विद्यात् ' । उपवासका महत्त्व पशु - पक्षी भी जानते हैं, अचेतन पदार्थ भी जानते हैं । जब कोई पशु - पक्षी रोगी होता है; तब उसे.. खानेको दीजिये, वह कुछ भी नहीं खायेगा । अब अचेतन पृथिवीको लीजिये । जिस पृथिवीका कृषिकेलिए सदा ही उपयोग किया जाता है, उसे विश्रामका अवसर नहीं दिया जाता;

पृष्ठ 579

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उपवास एवं एकादशी - विज्ञान ५११ तो उसकी उत्पादन - शक्ति धीरे - धीरे क्षीण हो जाती है । तब उसकी स्वाभाविक शक्तिके उत्पादनार्थ उसे भी उपवास कराया जाता है । पृथिवीके बड़ी होनेसे उसका उपवास भी बड़ा होता है । एक साल या छः मास उसे उपवास कराये जाने पर उसकी उत्पादन - शक्ति बढ़ जाती है । फिर उसे बहुत खाद तथा बहुत पानी देनेकी आवश्यकता भी नहीं रह जाती । इस प्रकार हमें भी पक्ष पक्ष में एक - एक उपवास ( एकादशी व्रत ) करने से हमारे पाचन - क्रिया करने वाले अङ्गोंका कार्य भी थोड़ा हो जाता है । विश्राम प्राप्त हो जाने से उन अङ्गों में शक्तिका सञ्चय हो जाता है I । आगेका भोजन अनायास पच जाया करता है और शरीर नीरोग रहता है । उपवाससे शरीरका शोधन होता है । निर्जीव यन्त्रोंका भी उपवाससे संशोधन किया जाता है । इससे वे स्थायी तथा अधिक कार्य करने वाले सिद्ध होते हैं । दो यन्त्र हों; एक वह जिसका संशोधन समय पर हो; और दूसरा वह जिसका संशोधन कभी भी न किया जाय । दोनोंके कार्य - निरीक्षणसे पता चलेगा कि— जिस यन्त्रका उपवासपूर्वक शोधन किया गया है, वह स्वस्थ है, और दूसरा रोगी है, उसका कार्य शिथिल - गति से होता है । इसी प्रकार शरीर भी हमारा यन्त्र है । अन्य यन्त्रोंमें तो शोधनकी यह सुविधा है कि उनके अङ्गको पृथक् - पृथक् करके उनका संशोधन कर फिर उन्हें अपने - अपने स्थान पर फिट कर दिया जाता है, पर हमारे शरीर के अङ्गोंका पृथक् करना सम्भव नहीं । उनको पृथक करना तो दूर रहा; उनमें हमारी दृष्टि भी

पृष्ठ 580

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श्रीसनातनधर्मालौक ( ५ ) ५५२ नहीं पहुँचती । तब शरीर के भीतरी छोटे - छोटे अवयवों तथा सूक्ष्म • स्नायुओं का संशोधन कैसे हो? तो क्या प्रकृतिने हमारे शरीरकी अन्तः - शुद्धिकेलिए कोई मार्ग न रखकर सूर्खता की है? नहीं नहीं । हमारे भीतरी भाग के शोधनार्थ की जानेवाली उपाय - राशिका नाम ही उपवास है । उसके द्वारा शरीर के भीतरी अङ्ग - प्रत्यङ्गों के शोधनका कार्यं सहजही हो जाता है । घरकी सजावटकेलिए जब - तब विशिष्ट स्वच्छता की आवश्यकता भी पड़ती है, तभी वहां दीमक चूहे आदि से बचाव होता है; और उस घरकी आयु बढ़ती है; इसी प्रकार शरीररूपी घरकी भी प्रत्येक पक्षमें शुद्धि करनेसे भीतरी अग्नि अवशिष्ट दोषों को दग्ध कर देती है; इससे शरीर निर्मल हो जाता है, आयु भी उसकी बढ़ जाती है । शरीरकी निर्मलता से मन भी निर्मल होता है । निर्मलताको प्राप्त मन ही धर्म - कर्म तथा उपासनाके योग्य सिद्ध होता है, और लौकिक अर्थ - कामकी सिद्धिमें भी सामर्थ्यवान् सिद्ध होता है । व्रतका एक लौकिक लाभ यह भी है कि यदि घरके सभी व्यक्ति पक्ष - पक्ष में विधिपूर्वक व्रत करें; तो युद्धादिमें राशनिंग सिस्टम में राशनकी कमी मिट जाती है । अथवा बचा हुआ अन्न भूख से पीड़ित भाइयोंके उपयोग में भी आ सकता है । इससे देश में अन्न का अभाव कम हो जाता है । ' व्रतका अभ्यास होजानेपर कहीं विदेश वा स्वदेशमें समयपर भोजन न मिलनेसे व्याकुलता नहीं हो पाती । इसके अतिरिक्त स्वयं भूखका कष्ट सहने से ही हम दूसरे भूखे- नंगे व्यक्तिोंका कष्ट जान सकते हैं; अन्यथा नहीं । ' हि