श्रीगणेशाय नमः।
सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 581–590
सनातन धर्मालोक ५ · पृष्ठ 581–590
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उपवास एवं एकादशी - विज्ञान ५५३ वन्ध्या विजानाति गुर्वीं प्रसववेदनाम् ' । एक दिन भी जिसने उपवास नहीं किया; वह प्रतिदिन फांका करनेवाले चुत्पीड़ित प्राणियोंका कष्ट कैसे जान सकता है? इधर भूखे रहने से यदि कुछ कष्ट होता भी है; तो यह एक तपस्या है । इससे पिछला पाप नष्ट होता है । पापका परिणाम ही दुःख हुआ करता है | जब हम क्रमशः दुःखको झेलते रहेंगे, तब क्रमशः हमारा पाप भी क्षीण होता रहने से हमारे पुण्यकी अभिवृद्धि होगी । कष्ट सहनेका नाम तप है । चान्द्रायण, कृच्छ, आदि व्रत इसीलिए ' तप ' कहाते हैं । अतः एकादशी व्रत भी एक तपस्या है । व्रत तथा उपवास यद्यपि जब - तब किया जा सकता है; तथापि उसमें कोई नियम नहीं रहता । नियमके अनुवर्तन से शरीर उसका अभ्यासी होकर सदा प्रकृतिस्थ स्वस्थ रहता है । इस कारण मुनियोंने हमारे लिए साधारण -उपवास एकादशी में आदिष्ट किया है । ' एकादश ' शब्दसे एकादश इन्द्रियों के विशिष्ट विषयोंका उपवासभी सूचित होता है । जैसे कि ' कार्तिकमाहात्म्य में कहा है- ' श्रोत्रत्व घ्राणदृग् - जिह्वा - वाग् - दो- ( भुज ) मेंढाङ्घ्रि- पायवः । इतीन्द्रियाणि मनसा वश्यान्येकादशैव हि ' ( १७१७ ) इससे मल - मूत्र, दर्शन स्पर्शन आदि अनिवार्य विषयोंका निषेध इष्ट नहीं, किन्तु उन इन्द्रियोंसे वैषयिक - आस्वाद, कामवश कामिनीरूपदर्शन, कामसम्बद्ध- बातोंका श्रवण, अश्लील बातोंका कथन, कामचरितार्थतार्थ स्त्रीका आलिङ्गनादि स्पर्श, एतन्निमित्तक इत्र आदि सुगन्धित वस्तुओंका लगाना वा सूघना, स्वादकेलिए विविध रसोंका खाना, किसी रमणीके घर
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) जानेकेलिए पांओं का उपयोग, इस प्रकार गुप्त - इन्द्रियका वैषयिक कार्योंमें उपयोग — आदिका निरोध करना चाहिये - यह सूचित होता है । वाणीका निरोध मौन है, मौन भी एक तपस्या है; इस विषय में हम पूर्व लिख चुके हैं । ' मुनेर्भावो मौनम् ' यह मौनका विग्रह हैं । मौनसे मुनित्व अनायास प्राप्त हो जाता है । हरिकीर्तन - श्रादिके अतिरिक्त और कुछ न बोलना यह मौन है । इसी कारण मुनियोंने एकादशीके दिन स्नान - दान आदि अतिरिक्त भगवत्पूजन, देव-पूजन, भगवन्नाम - गुणकीर्तन, गान - नृत्य, पुराणादिके श्रवणकी भी आज्ञा दी है । जैसेकि - कार्तिक माहात्म्य में कहा है- स्नात्वा ' च विधिवद् विष्णुमर्चयेत् प्रयतो नरः । गन्धपुष्पादिभिः सम्यग् रान्नौ कुर्वीत जागरम् । गीतं वाद्यं च नृत्यं च पुराणश्रवणं तथा । धूपं दीपं च नैवेद्यं गन्धपुष्पानुलेपनैः ' ( १७।११-१२ ) । उपवासार्थ एकादशी तिथि नियमन करनेमें विज्ञान भी है । वह यह कि - एकादशीका अमावास्या और पूर्णिमा एवं दोनों अष्टमियोंके साथ विशेष योग होता है । अमावस्या में सूर्य और चन्द्रमा दोनों एक राशिमें होते हैं । पूर्णिमा में दोनों सम - रेखा में होते हैं; अष्टमी में दोनों समान कोण में होते हैं; तब उनके आकर्षण - विकर्षणका प्रभाव जल पर तथा कठोर त्वचा वाले रसयुक्त वृक्षों पर भी होता है, मनुष्य शरीरका तो कहना ही क्या? इसी कारण समुद्र में सबसे अधिक ज्वार - भाटा पूर्णिमा में, सबसे कम अमावास्या में, मध्यमरूपसे दोनों अष्टमियों में हुआ करता है ।
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उपवास एवं एकादशी - विज्ञान जैसे सूर्य - चन्द्रके आकर्षण - विकर्षणका प्रभाव समुद्रके जलपर पड़ता है, रसदार वृक्षों पर पड़ता है; वैसे ही प्राणियों के लहू पर भी पड़ता है; क्योंकि - लहू भी जलका ही भाग होता है । उन तिथियोंमें स्त्री - पुरुषोंकी रक्त - वीर्यादि धातुएँ विषम होती हैं । उस समय भोजन करने पर हुई हुई उत्तेजना हानिकारक होती है । अतः इन तिथियोंमें ब्रह्मचर्यपूर्वक व्रत आवश्यक है । इसी कारण ही पूर्व समय में इन तिथियों में अनध्याय, यज्ञ एवं व्रत आदिके अनुष्ठान चलते थे । उक्त प्रकर्षरण - विकर्षरणका प्रभाव अष्टमीसे लेकर पूर्णिमा -अमावस्या तक रहा करता है । एकादशी से वह प्रभाव विशेष- रूपसे आरम्भ होता है । इन्हीं दिनों रोगके बीज भी शुरू होते हैं । तब हमारे ऋषि - मुनियोंने अष्टमी में साधारण व्रत निर्दिष्ट करके एकादशी के दिन उपवास बताया । उसकी विधि यह थी कि अष्टमी के दिन साधारण व्रत किया जावे, फिर नवमीके दिन भोजन किया जावे । फिर दशमीकी रात्रि में उपवास वा लघु - भोजन किया जावे । एकादशीके दिन दिन - रात पूर्ण उपवास किया जावे । फिर द्वादशीके दिन ब्राह्मण भोजन तथा दान - दक्षिणा देकर स्वयं लघु-भोजन किया जावे । रात्रिमें फिर उपवास करके वा मृदु भोजन करके फिर प्रदोष व्रत करके, चतुर्दशी में नियमानुसार भोजन करके फिर पूर्णिमा में ' श्रीसत्यनारायण व्रत ' किया जावे । सायं उसका प्रसाद लिया जावे । श्रमावास्या में अपराह्न तक निराहार पितृपूजन करके फिर पितृश्राद्धमें ब्राह्मणको निमन्त्रित करके
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श्रीसंनातनधर्मालोक ( ५ ) ५५६ जिमाकर उसका शेष भोजन करे । फलतः अमावस्या तक पूर्णिमा में सूर्य और चन्द्रमाका आपस में विशेष - सम्वन्ध होनेसे उसका पृथिवीपर प्रभाव पड़ता है । उससे हमारी जठराग्निपर प्रभाव पड़ता है । उससे रोग सम्भव होता है, परन्तु दशमीकी रात्रिमें भोजन न करने वा लघु - भोजन करनेसे दूसरे दिन एकादशीमें उपवास करने से, फिर द्वादशीमें लघुभोजन वा प्रदोष व्रत करनेसे शरीरकी शुद्धि हो जाती है । यही कार्तिक-माहात्म्यमें कहा है – ' उपवासफलं लिप्सुर्जह्याद् भुक्ति चतुष्टयम्, पूर्वापरदिने रात्र्यामहोरात्रं च मध्यमे ( १७१८ ) इसीकी स्पष्टता अग्रिम पद्यमें की गई है - ' भवेद् दशम्यामेकाशी द्वादश्यां च मुनी-श्वराः! एकादश्यां निराहारः स्थित्वा याति परं पदम् ' ( १७ | १० ) । इस प्रकार करनेपर ' छिन्न े मूले नैव शाखा न पत्त्रम् ' इस न्याय से रोगके बीज दग्ध हो जाते हैं । इन अवसरों पर ब्रह्मचर्य भी करना पड़ता है, निराहार भी रहना पड़ता है । इससे शरीर की निर्मलता हो जाने से सम्भावित शारीरिक एवं मानसिक हानि सर्वथा नहीं हो पाती, क्योंकि उपवास मनुष्योंकेलिए बिना दवाका औषधोपचार होता है । ऐसा करने से हमारा शरीर स्वस्थ रहेगा, शरीर स्वस्थ होने पर हमारा चित्त स्वस्थ रहेगा 1 । चित्त स्वस्थ होने पर बुद्धि - स्फुरण होगा । बुद्धि - स्फूर्ति से हम संसारोपकारक कार्य कर सकेंगे । इस भयको अपने मनसे सदाकेलिए निकाल देना चाहिये कि उपवास हमारेलिए मारक वा निर्बलताकारक सिद्ध होगा ।
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उपवास एवं एकादशी - विज्ञान नहीं, कभी नहीं । अपितु सर्वदा खाते रहना, अन्तड़ियों वा इन्द्रियोंको थोड़ा भी विश्रामका अवसर न देना ही निर्बलताकारक वा मारक सिद्ध होता है, व्रत वा उपवास नहीं । अवकाश सबको दिया जाता है | सरकारने विद्यालयों में साप्ताहिक अवकाश रखा - हुआ है । दुकानों में भी साप्ताहिक अवकाश रखा है । इञ्जन आदि यन्त्रोंको भी समय - समय पर अवकाश देना पड़ता है । इसका प्रयोजन है इनको विश्रामका अवसर देना । विश्रामसे आगे स्वास्थ्य बढ़ता है । आगेका कार्य भी द्रुतगतिसे, स्फूर्तिसे होता है । सतत अशनादिक्रिया होने से भीतरी मिलने से उनपर दबाव बढ़ जाता है, हैं । अतः सतत अन्नाशन ही मारक आदि सब रोग इसी सतत अशनके ही वृद्धि शरीरको जर्जर करके नष्ट कर उपवास तो इन सब दोषों को दूर म्युनिसिपैलिटीका रजिस्टर देखने पर उतने पुरुष नहीं मरते, जितने अवैध वा अन्तड़ियोंको अवकाश न और वे निर्बल पड़ जाती सिद्ध होता है । अजीर्णता परिणाम हैं । अजीर्णताकी देती है, उपवास नहीं । कर देता है । मृत्युका ज्ञात होगा कि उपवाससे सतत - भोजनसे । व्रत एवं तपके अनुष्ठानमें लगे हुए हमारे मुनियोंकी अकालमृत्यु कहीं सुनी नहीं गई है । प्रत्युत उनकी दीर्घ आयु ही सुनी जाती है । इसी कारण कोई भी रोग क्यों न हो, उसे दूर करनेकेलिए वैद्य लोग रोगियोंसे उपवास कराते हैं; तभी उनकी चिकित्सा सफल होती है । फलतः उपवास ही पाचक ओषधि है । उसीसे हमारे भीतरी. अवयव प्रत्यवयव रविवारकी भांति अवकाश पाकर फिर नये हो
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) जाते हैं; और नवीन शक्ति प्राप्त करके भावी रोगोंसे मुकाबला करके उन्हें हटा सकते हैं । उपवाससे भीतरी विष या मल निकल • जाता है | दमा आदि रोगोंको दूर करने के लिए लग्ने उपवासों की - आवश्यकता पड़ती है; परन्तु प्रत्येक पक्ष में एकादशीव्रत करने पर विशिष्ट रोगोंकी उत्पत्ति ही नहीं हो पाती । अतः आगे दीर्घ-: उपवासों की आवश्यकता भी नहीं पड़ती । कभी भी व्रत न करने वाले और सदा ही खाने - पीने में लगे हुए पुरुषों की चर्बी बढ़ जाती है, कफ बढ़ जाता है; शरीर में मल ' व्याप्त हो जानेसे विकारपूर्णता सढ़ा स्थित रहती है, स्फूर्ति नहीं रह ' जाती, सदा उदासीनता - सी बनी रहती है । कोई भी वायु-मूलक रोग जब - तव शरीर में अधिष्ठित रहता है, मनकी वृत्ति दूषित रहती है । परमात्मा या तपस्याके प्रति प्रवृत्ति नहीं हुआ करती । हृदय सदा भोगवासना से वासित तथा कलिकल्मप - कलुषित होकर - दुष्प्रवृत्तियुक्त रहता है । पाचनक्रियामें निर्बलता हो जाती है । तब - खाया हुआ अन्न जीर्ण ( हजम ) नहीं होता, चित्तमें सदा उद्वेग रहता है । ऐसा पुरुष सदा दूसरों पर झल्लाया ही करता है; सदा दूसरोंके प्रति तना ही रहता है । पास पड़ा हुआ धन धीरे - धीरे वैद्योंके औषधालयों में सचित होता जाता है । निर्बलता के कारण किसी भी सत्कार्य में प्रवृत्ति नहीं हुआ करती । निर्बलताके दूरीकरणार्थ वह वैद्योंसे पुष्टिकारक दवाइयोंका " सेवन करता है, पर उसका फल कुछ भी नहीं निकलता; प्रत्युत ..भीतरी निर्बलतासे दुर्बल हुए - हुए अङ्ग उस श्रोषधिके भी उपयुक्त
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उपवास एवं एकादशी - विज्ञान १५० सिद्ध नहीं होते; तब अन्दर विष व्याप्त हो जाता है । यमराजके दूत समय - समय पर दर्शन देने आते हैं । यमदूतोंको डराने वाले व्रत - उपवास द्वारा उसका प्रतिकार न करने पर क्रमशः राजयक्ष्मा आदि रोग अङ्गको आलिङ्गन कर लेते हैं, और फिर यमराज गले में पाश डालकर जीवको खींच जाते हैं । व्रत - उपवास आदि करने पर तो यमराजके दूत, वरुणके पाश, भूतप्रेत आदि यह सब वापिस लौट जाते हैं । तब शरीरकी निर्मलतासे मन भी प्रभावित एवं स्वस्थ हो जाता है । ' स्वस्थे चित्ते बुद्धयः संस्फुरन्ति ' यह कथन चरितार्थ हो जाने से बुद्धिस्फुरण होता है । मस्तिष्क उज्ज्वल हो जाता है । विचारशक्ति प्रवृत्त हो जाती है | विचारशक्ति मानसिक बलपर निर्भर है, और मानसिक बल शरीरको निर्विकारता पर निर्भर है । विकारपूर्ण शरीरमें पुरुषका मानसिक विकास नहीं हो पाता; क्योंकि- शरीरमें विकार होनेपर मानसिक शक्तियों की विचारोंके साथ संलग्नता होती ही नहीं । संलग्नता एवं तन्मयता के लिए मस्तिष्ककी जो रूपरेखा आवश्यक हुआ करती है, वह रूपरेखा पाक्षिक- व्रतके बिना मस्तिष्क में उत्पन्न नहीं हो पाती; क्योंकि तन्मयता एवं संलग्नता आहार अल्प चाहती है । व्रत - उपवास ही उस मिताहारका साधन हुआ करता है । जो लोग व्रत - उपवासके द्वारा शरीरके अथवा मनके अङ्गका संशोधन नहीं करते; उनमें संलग्नता एवं तन्मयता नहीं हुआ करती; क्योंकि उस समय आहारके दबाव से कामातुरता रहनेके कारण पुरुषमें तमोगुणकी वृद्धि होनेसे सात्त्विकता नहीं हो पाती;
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) २६० तब पुरुषका मन कैसे एकाग्र हो? प्राचीनकालमें तपस्वि - गण ईश्वराराधनमें अधिक तन्मयता सिद्ध करते थे, जिससे कि परमात्मा की शक्तिसे अपने - आपको मिला सकें । वे लोग मिताहार तथा एकादशी व्रत, उपवास आदिकी अपेक्षा किया करते थे । जो कभी भी भोजन नहीं छोड़ते, शारीरिक बल के लिए सतत बहु - भोजनमें लगे रहते हैं, उनमें मस्तिष्कचल या प्रतिभावल नहीं रह जाता । हमारे उज्ज्वल - मस्तिष्कवाले ऋषि - मुनि बहुत मोटे - ताजे या सतत - बहुभोजनशाली नहीं हुआ करते थे, किन्तु आभ्यन्तरिक बलधारी और मनोबल - सम्पन्न होते थे । उसमें मिताहार और जब - तब व्रत - उपवासका उनका नियम प्रधान कारण था । बाहरसे हृष्ट - पुष्ट और भीतर से क्षीण एवं रोगी मस्तिष्क - बल तथा प्रतिभा-शालिताको कभी प्राप्त नहीं करते । न वे भविष्य में यशकी स्थापना करनेवाले सद्ग्रन्थोंके निर्माण आदिका कार्य ही कर सकते हैं । जो लोग हिन्दु धर्मपर यह आक्षेप करते हैं कि- ' इनके तो ३६५ दिनों में ३०० व्रत ही निकल पड़ते हैं । तब हिन्दुधर्मके अनुसार चलना भूखों मरना है, अपनी स्त्रीको अपने से विरक्त . करके दूसरोंकी ओर प्रवृत्त करना है ' यह सब आक्षेप अज्ञानवश हैं । सब व्रतों में पूरा उपवास नहीं होता I । वे तो मितभोजन में सहायक हुआ करते हैं । यदि नियमानुसार स्वयं भी व्रत किये जावें; अपनी स्त्रीको भी इस लाईन में प्रवृत्त किया जावे; तो दोनों का संयमी जीवन सुखसे बीतेगा । पुरुष जैसे बनेगा, स्त्री भी वैसी बनेगी; बल्कि उससे बढ़ी हुई सिद्ध होगी । ' अश्वः शस्त्रं शास्त्रं
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उपवास एवं एकादशी - विज्ञान २६१ वाणी वीणा नरश्च नारी च । पुरुष - विशेषं प्राप्ता भवन्ति योग्या अयोग्याश्च ' यह नीतिकारोंका कथन सर्वथा सत्य है । स्त्रीको यदि संयमका मार्ग प्रदर्शित किया जावे तो वह पुरुषसे भी बढ़ जावेगी । यदि उसे व्रत - उपवास आदिकी ओर प्रवृत्त किया जावे तो वह उसमें पुरुष से भी बाज़ी मार ले जाएगी । पुरुषोंसे अधिक धर्म-कर्ममें लगी हुई स्त्रियां ही हमने देखी हैं । तीन - तीन चार चार -दिन तक निरन्तर उपवास करनेवाली स्त्रियां हमने देखी हैं । यदि स्त्रीको भोगवासनाके मार्ग में बलात् प्रवृत्त किया जावेगा; तब प्रच्छन्न अष्टगुरणा कामशक्ति जब उसकी संधुक्षित होकर प्रज्वलित होगी; तब उसका एक पति तो क्या, छः पुरुष भी आकर उसकी उस प्रवृद्ध - भोगलालसाकी तृप्ति नहीं कर सकते । जब वही पुरुष उसमें अपनी निर्बलताके कारण ढील करेगा, तो वही स्त्री दूसरों की ओर मुख करेगी, कुलटा बनकर आपके कुलको कलङ्कित करेगी; परन्तु पुरुषको इस रास्ते पर अपनी पत्नीके लानेका उत्तरदायित्व न लेना चाहिये । ' आहारो मैथुनं निद्रा सेवनात्तु विवर्धते ' यह आहार, मैथुन, निद्रा आदि जितने बढ़ाए जावें, बढ़ेंगे । मनुजीने ठीक ही कहा है कि — कामों के भोगसे कामकी शान्ति नहीं होती; वह तो उल्टे बढ़ती है- ' न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति 1 । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ' ( २६४ ) अग्नि हवि डालते रहने से बढ़ती ही तो जाती है; परन्तु यह असंयमका रास्ता अपने तथा अपनी पत्नीकेलिए विपत्ति-कारक है — ' आपदां कथितः पन्था इन्द्रियाणामसंयमः । तज्जयः ३६ स ० ध ०
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५६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) सम्पदां मार्गे येनेष्टं तेन गम्यताम् ' । संयमका मार्ग ही सम्पत्तिका मार्ग है; उसकी प्राप्ति होगी एकादशी व्रतसे । इससे यह भय हटा लेना चाहिये कि हम नपुंसक हो जायेंगे । यह सचमुच भारी - भूल है । उपवास स्वयं करो, पत्नीको कराओ; और उससे पूर्व दिन, उस दिन, उसके बाढ़का दिन ब्रह्मचारी रहो; फिर संयम से अपना निर्वाह करो । इससे तुममें भोगशक्तिं घटेगी नहीं; बल्कि बहुत समय तक रहेगी । भोगका आस्वाद भी तुम्हें तब ही प्राप्त होगा । भूख न होनेपर भोजन करनेसे क्या कभी आस्वाद आता है? आस्वाद तो भूख लगने पर भोजन करनेसे श्राता है, यही बात यहां पर भी है । विषयास्वाद भी संयमी - जीवन से आयगा । विषयास्वाद शुक्रकी गाढता से आता है, शुक्रकी गाढता संयमी - जीवनसे होती है । असंयमी- जीवनसे, सतत भोगविलासों में लगे रहने से, उन्हींके चिन्तन करते रहने से, शुक्र तरल हो जाता है, फिर शीघ्रपतनादि प्रारम्भ हो जाते हैं, वैसा पुरुष दिनमें आठ बार भी भोगमें लगा हुआ अपनी पत्नीकी तृप्ति नहीं कर सकता । प्रकरणवश यह बात हमने कह डाली है । उसी संयम - जीवनकी प्राप्ति आपको नियमित व्रत - उपवास से मिलेगी । यह हमारे कथनका आशय है । विलासका आनन्द भी आपको इसी व्रत आदि से मिलेगा । फलतः भीतरी अपक्कांशको दग्ध करने और सचित मलको नष्ट करने और भविष्यत् में जठराग्निको प्रदीप्त करनेमें व्रत - उपवास रामबाण औषध है, एक अपूर्व अचूक योग ( नुस्खा ) है । इसके