सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 601–610

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 601–610

पृष्ठ 601

सनातन धर्मलोक ५, पृष्ठ 601 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शयनके समय विशेष दिशाका विचार २७३ स्पष्ट देवदिशा है । पूर्वं वा दक्षिण दिशामें सिर करके सोना प्रशस्त है - यह संकेत हम पूर्व दे ही चुके हैं; उसमें विज्ञान यह है कि समस्त ब्रह्माण्डकी गति ध्रुवकी ओर होती है, और ध्रुबकी स्थिति उत्तर - दिशामें होती है । इस कारण ब्रह्माण्डके अन्तर्गत पृथिवी के भीतरकी विद्य दुधारा भी दक्षिण दिशासे उत्तराभिमुख प्रवाहित होती है । इसलिए जहाजके कुतुबनुमाकी चुम्बककी सुई भी सदा उत्तराभिमुख ही रहती है । समुद्र में दिशा- ज्ञानका उक्त यन्त्र ही एकमात्र साधन होता है । यदि हम उत्तराभिमुख सिर करके सोर्वे, तो वह पार्थिव - विद्युत् हमारे पाओं से होकर हमारे सिरकी ओर प्रवाहित होगी, जिससे शिर में कई रोग हो जाएँगे, जिससे मस्तिष्क में रोग हो जायगा । और स्नायुपुञ्जमें अस्वाभाविक उत्तेजनाकी वृद्धि होनेसे प्रकृति अस्वस्थ रहा करेगी । सारा दिन परिश्रम करने से मस्तिष्क और हमारे स्नायु स्वयं ही दुर्बल हो जाते हैं; तब नींदमें भी यदि विपरीत विद्युत् - पुञ्ज लिया जायगा; तो शरीर में अस्वास्थ्य बढ़ेगा । दक्षिण दिशाको ओर सिर करके सोने से वह विद्युत् सिरसे पांचोंकी ओर जाती है । इससे अस्वास्थ्यकी सम्भावना नहीं रह जाती । पश्चिम की ओर सिर करके सोने पर भी वही हानि है; जो उत्तरकी ओर सिर करके सोनेसे होती है; क्योंकि — जैसे पार्थिव विद्युत् दक्षिणसे उत्तराभिमुख प्रवाहित होती है; वैसे ही सूर्यदेव की प्रारणसयी विद्युत - शक्ति भी पूर्व से पश्चिमाभिमुख प्रवाहित होती है । उक्त विज्ञानके अनुसार पश्चिमकी ओर सिर करके सोने से

पृष्ठ 602

सनातन धर्मलोक ५, पृष्ठ 602 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५७४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) मस्तिष्क तथा स्नायुमण्डलमें वैसे ही पीड़ा होगी । तभी तो वैखानसधर्मसूत्रमें कहा है- ' आर्द्रपाद:, प्रत्यग् ( पश्चिम ) उत्तर-शिराश्च न स्वपिति ' ( ३ | १ | ४ ) यहां पर गीले पांच तथा पश्चिम एवं उत्तरकी ओर सिर करके सोनेका निषेध किया है । तब पूर्व वा दक्षिणकी ओर सिर करके ही सोना ठीक है । शास्त्रों में उत्तराभिमुख वा पूर्वाभिमुख होकर पूजा - पाठादि दैवकार्य करने का आदेश अवश्य है; उसमें कारण यह है कि सौर एवं पार्थिव विद्युत् शक्तियों का सम्बन्ध उस समय शरीर के साथ रहेगा; जिससे वह शक्ति - सम्पन्न रहेगा । ( ७१ ) ब्रह्मचारीका भूमिपर वा तख्त पर सोना । ब्रह्मचारीको खाटपर सोनेका निषेध किया है, उसे या तो भूमिपर सोना पड़ता है, या लकड़ी के तख्तपर । लेकिन यदि वह गृहस्थाश्रम से पहले ही खाट पर सोवे; तो उसकी निन्दार्थ उसे ' खट्वारूढो जाल्मः ' यह कहते हैं । यहां पर ' खट्वा क्षेपे ' ( पा ० २।१।२६ ) इस पाणिनिसूत्र से निन्दा अर्थ में समास होता है । एक तो खट्वा स्त्रीको कहते हैं; उसपर आरोहणका आशय यह हुआ कि - इसने समयसे पूर्व ही ब्रह्मचर्य व्रत तोड़ दिया । ऐसेको अवकीर्णी कहा जाता है । दूसरा - खट्वा खाटको भी कहते हैं । गृहस्थाश्रम से पूर्व उसे खाटपर नहीं सोना चाहिये । इस बात में भी विज्ञान है । वह यह कि - ब्रह्मचारीको २५ वर्ष तक ब्रह्मचर्य रखना चाहिये । ८ वर्षसे २५ वर्ष तक पुरुषकी वृद्धिका काल है । खाटपर सोनेपर उसमें वानके होनेसे खाट स्वाभाविक

पृष्ठ 603

सनातन धर्मलोक ५, पृष्ठ 603 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ब्रह्मचारीका भूमिपर वा तख्त पर सोना २७५ की रहती है; तब ब्रह्मचारीका मेरुदण्ड ( रीढ़ की हड्डी ) भी झुका रहता है । शुरू से ही रीढ़ की हड्डी तनी न रहे; किन्तु झुकी रहे; तो उस पुरुषकी प्रकृति सदा झुककर बैठने वा चलनेकी हो जाएगी । उससे उसकी आयु थोड़ी हो जाती है । जब ब्रह्मचारी भूमिपर वा लकड़ीके तख्त पर सोएगा; तब उनके कठोर होने से उसका मेरुदण्ड भी सीधा रहेगा । इससे उसके मेरुदण्डके तने होनेसे चलने - बैठने आदिमें भी वह सीधा रहेगा । इससे आयु भी यथावत् रहेगी । इस प्रकार २५ वर्ष तक प्रकृति बन जावे; तो आगे खाटपर सोनेपर भी उसकी प्रकृति पूर्ववत् वनी रहती है । क्योंकि इस समय तक जो प्रकृति बन जाती है; वह आगे भी बनी रहती है । आगे परिवर्तन वहुत न्यून होता है । अन्य बात यह है कि - शुरू से खाटपर सोनेसे हमारी स्नायुओं के टेढे होनेसे उत्तेजना - सी होनेके कारण शुक्र - क्षरणकी शङ्का बनी रहती है; जिससे स्वप्नदोष आदिकी सम्भावना रहती है । मेरुदण्ड के तने होनेपर वैसी आशङ्का नहीं रहती । अन्य इसमें यह भी कारण सोचा गया था कि ब्रह्मचारीका जीवन तपोमय जीवन होता है; ' तपः ' कहते हैं कष्ट सहने को । खाट पर सोना कोमल होता है । यदि उसकी कोमलताकी प्रकृति शुरूसे होगी; तो आगे आपत्तिकालमें खाट आदि न मिलने पर वह घबड़ा जायगा । शुरू में वैसी प्रकृति होने पर आगे भी उसे कोई कष्ट नहीं मिलेगा । इसके अतिरिक्त ब्रह्मचारी इस समय विद्यार्थी

पृष्ठ 604

सनातन धर्मलोक ५, पृष्ठ 604 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५७६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) होता है । यदि इस समय भी वह सुखों के ढूढ़ने में लग गया तो उसे विद्या कैसे प्राप्त होगी; क्योंकि - ' सुखार्थिनः कुतो विद्या, कुतो विद्यार्थिनः सुखम् ' । मेरुदण्डके तने न रहनेसे आगेकी निर्बल आयुमें उसके टूटने का डर भी रहता है । योग आदि में भी इसीलिए . तने हुए बैठकर ध्यान करने का विधान आता है । जैसेकि — ' समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । संप्रेक्ष्य नासिकाग्र स्वं दिशश्चानवलोकयन् ' ( ६।१३ ) ' शरीर, सिर और गर्दनको समान एवं अचल करके और स्थिर होकर अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाके, दिशाओं को न देखता हुआ ध्यान करे । मस्तक, गला और धड़ सम - रेखा में रहनेसे मेरुदण्ड तना रहेगा — इससे पृष्ठवंशमें मज्जाप्रवाह निष्प्रतिबन्ध चलने लगता है । मस्तक से पृष्ठ - वंशके निम्न - भागतक मज्जाप्रवाह चलता है । इसमें धन और ऋण प्रवाह हैं । मध्यमें सम - प्रवाह भी है । इस प्रवाहकी निष्प्रति-बन्धतामें सम्पूर्ण शरीरके मज्जातन्तु - संस्थानकी निर्दोषता अव-लम्बित है । यह योगसिद्धिका आनन्द इस सम - स्थिति से ही प्राप्त होता है । अगले पद्यमें लिखा है - ' ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ' ( ६।१४ ) इसका भाव यह हुआ कि ऐसी स्थिति ब्रह्मचारीको करनी पड़ती है; तब ब्रह्मचारीको भूमि वा तख्त पर सोनेका विधान भी उक्त लाभोंको पहुँचानेवाला सिद्ध हुआ । यह बात ब्रह्मचारी वा गृहस्थ सत्रको स्मर्तव्य है कि शीतकाल में कमसे कम अपना मुख एवं नाक रजाईसे बाहर रखें, जिससे उन्हें आक्सिजन ( शुद्ध ) वायु अन्दर जाने के लिए मिलती रहे; अन्यथा

पृष्ठ 605

सनातन धर्मलोक ५, पृष्ठ 605 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शयनमें सिरहाने जल रखना ५७७ वही भीतर से निकली हुई मलिन वायु तथा अपान वायु दुर्गन्ध भीतर जाती रहेगी; इससे यह बड़ी हानि हो सकती आदिकी है । ( ७२ ) शयनमें सिरहाने जल रखना । कई व्यक्ति प्रायः रोगी रहते हैं, और रातको दुःस्वप्न देखा करते हैं । पर यदि किसी पात्रको जलसे भरकर सिरकी चौकी आदि पर रख दिया जावे, तो दुःस्वप्नोंका ओर जाता है, नींद भी सुख से आती है । आवश्यकता उन्मूलन हो आ पड़ने पर जलके इधर - उधर ढूढ़ने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती । लघुशंका करके आवें; तो हाथ सहज ही धोये जा सकते हैं । वह जल ढका भी रहना चाहिये कि चूहे उसको दूषित न कर जायें । 1 इसके अतिरिक्त सनातनधर्मके प्रत्येक कर्ममें जलका बहुत उपयोग होता है । इसमें भी रहस्य है । जलमें आकषेरण - शक्ति पर्याप्त मात्रा में होती है, और उसमें काम - नाशनी शक्ति भी बहुत रहती है । दुर्गन्ध आनेपर जलको नासिका से लगाने पर और मुहसे कुल्ला करनेपर भी दुर्गन्धके परमाणु दूर हो जाते हैं । फूलको यदि जल में रखा जावे; तो उसका गन्ध जलमें प्राप्त हो जाता है । जलीय - पदार्थोंके लिए धर्म - शास्त्रों में कहा है कि उनका हाथसे प्रतिवेशन न करो, किन्तु चिम्मच आदि द्वारा ही । जलमें अंगुलि भी नहीं डालनी चाहिये । इसी आकर्षण के कारण ही अस्पृश्य जातीय व्यक्ति के हाथका जलपान शास्त्रों द्वारा निषिद्ध किया गया है । स ० ध ० ३७

पृष्ठ 606

सनातन धर्मलोक ५, पृष्ठ 606 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) २७८ ( ७३ ) अस्पृश्यता - विज्ञान । पूर्व - निबन्धके अन्तमें स्पर्शास्पर्शके विषय में सङ्केत - सा आया है । उसपरभी कुछ विज्ञान जान रखना चाहिये । सनातनधर्म धर्मप्रधान धर्म है | इसमें अधर्म अत्यन्त निन्दित माना गया है, उसमें भी व्यभिचार, विशेषरूप से प्रतिलोम व्यभिचार निन्दित माना जाता है । अधम - वर्ण उच्चवर्णकी कन्याको लेकर उससे सन्तान उत्पन्न करे; उस व्यभिचारसे उत्पन्नको वर्णसंकर वा अव एवं निन्दित माना जाता है । उसके अशुद्ध- परमाणु प्रवृत्त होजाते हैं, जिनके स्पर्श करनेसे स्पर्श करनेवालेकी भी हानि होती है; अतः उनकी अस्पृश्यता की जाती है । वैसेके साथ स्पर्श तथा खान - पानका शास्त्रोंमें निषेध किया गया है । जैसे विशेष मूत्र, दूध और गोवरके मिश्रण से विष उत्पन्न हो जाता है; उससे विच्छू बन जाते हैं; उनका डंक तड़पा देनेवाला होता है; अथवा जैसे मधु और घृत के सम - मिश्ररण से विष उत्पन्न होजाता है; यह स्वयं वस्तुएं उतनी दूषित नहीं; पर इनका मिश्रण और मिश्रणसे उत्पन्न हुआ - हुआ पदार्थ बहुत दूषित हो जाता है; वैसे ही निम्न-जातीय पुरुषका उच्च जातिवाली कन्या में रक्त - संयोग हो; तो वह दूषित हो जाता है; उससे उत्पन्न सन्तान, विशेष करके दूषित होती है । जैसे पञ्चगव्य में गोमूत्र गोदुग्ध, गोमय आदिका मिश्रण पवित्रताकारक माना जाता है; पर विशेष विशेष गधे आदिका मूत्र, भैंस आदिका पुरीष, एवं किसी अन्यके दूध - दहीके मिश्रणसे विच्छू उत्पन्न होकर अस्पृश्य हो जाता है; स्पर्श करनेसे वह तड़पा

पृष्ठ 607

सनातन धर्मलोक ५, पृष्ठ 607 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अस्पृश्यता- विज्ञान देता है, घृत और मधुका विशेष - मिश्रण भी खानेके उपयोगी नहीं रहता; वैसे ही प्रतिलोम - सम्बन्ध से उत्पन्न सन्ततियोंसे उत्पन्न जातियां भी अत्यन्त - दूषित सिद्ध होती हैं; उनके परमाणु स्पर्शके अयोग्य सिद्ध होनेसे शास्त्रकारोंने उन्हें अस्पृश्य- कोटिमें रखा है । इसमें सनातन हिन्दुधर्मका वैज्ञानिक दृष्टिकोण है, अन्य जातियोंकी संरक्षण - दृष्टि है, विद्वेषकी दृष्टि नहीं । जैसे दौड़ रही हुई ट्रेनका स्पर्श अपनी ही हानि करनेवाला सिद्ध होता है; दूसरेकी स्त्रीका परपुरुषसे स्पर्श उसीकी अपनी हानि करनेवाला सिद्ध होता है; वैसे ही अस्पृश्य के स्पर्शमें अपनी ही हानि हुआ करती है । आजकल वैद्य डाक्टर आदिके शास्त्रोंके अनुसार राजयक्ष्मा, शीतला, प्लेग, हैजा, पीलिया आदि रोगों में रोगीके पास जाना, रहना तथा उसका स्पर्श निषिद्ध किया जाता है; इसमें कोई हमारा उनसे द्वेष सिद्ध नहीं होता; किन्तु अपना संरक्षण ही उसमें इष्ट होता है, क्योंकि — उन रोगियोंके परमाणु हमें भी स्पर्श आदिसे रोगी कर दिया करते हैं; वैसे ही अस्पृश्य-जातियोंके अशुद्ध - परमाणु भी दूसरोंके शरीर में प्रविष्ट होकर हानिप्रद सिद्ध होते हैं - इसमें घृणाका कारण नहीं हुआ करता । पाश्चात्य - वैज्ञानिकोंने सिद्ध कर दिया है कि — केवल हाथके स्पर्शसे ही सहस्रशः कीटाणु एक - दूसरेके शरीर में संक्रान्त हो जाते हैं । घातक कीटाणु अच्छे कीटाणुओं को हानि पहुँचाते हैं; तब अस्पृश्यके स्पर्शमें तथा सदा उन्हींके साथ निवास होने से भी उनके कीटाणु हमारे शरीरमें क्यों न प्रविष्ट होंगे? अस्पृश्य जाति- -भरण ( प्रतापजीवी )

पृष्ठ 608

सनातन धर्मलोक ५, पृष्ठ 608 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२८० श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) वालोंकी शारीरिक - विद्युत् पूर्वोक्त कारणवश जन्मसे ही दूषित होती है । इसीसे उसके स्पर्शसे उच्च जातिवालोंकी विद्युत भी विकृत हो जाती है । इसी कारण हिटलरने भी ' मेरा संघर्ष ' पुस्तक में सवर्णोंके विवाह और संयोगको अतिशयित हानिकारक सिद्ध किया है । उसमें उसने ऐसे संयोगसे हानि उच्चवर्णवालेकी बताई है । यह ठीक भी है । एक राजयक्ष्मा वाला अपने स्पर्शादिसे स्वस्थोंको अस्वस्थ कर सकता है, पर बहुत से स्वस्थ व्यक्ति अपने स्पर्शसे उसे स्वस्थ नहीं कर सकते, यह औत्सगिक नियम है । तच स्पष्ट है कि हिन्दुशास्त्रों में अस्पृश्यताका वर्णन किसीमें घृणा - उत्पादनार्थ नहीं है, किन्तु स्वसंरक्षणार्थ ही है । कदाचित् कारणवश उनका स्पर्श हो जावे, तो स्नानसे वह अशुद्धिका संक्रमण दूर किया जाता है । यदि इसमें घृणा कारण होती, तो अपनी प्राणप्रियाको हम मासिकधर्मके आदिम तीन दिन जो अस्पृश्य मानते हैं, उसे एक चोर घरमें गुप्त होकर ही रहना पड़ता है, तो क्या उससे उसमें हमारी घृणा होती है? नहीं - नहीं, केवल अपने धर्मके संरक्षणार्थ ही ऐसा होता है । स्वधर्म - संरक्षणको कभी दूसरे के प्रति घृणा नहीं कहा जा सकता । वही हमारी पत्नी हमारे पुत्रको उत्पन्न कर लोक - परलोकमें हमारे गौरवको बढ़ा देती है, परन्तु उसीको प्रसवके नियत दिनों में अस्पृश्य माना जाता है । ' सूतकं मातुरेव स्यात् ' ( मनु ० ५।६२ ) । अपने मृत पिताको छूकर हम अपने आपको अशुद्ध मानकर

पृष्ठ 609

सनातन धर्मलोक ५, पृष्ठ 609 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अस्पृश्यता- विज्ञान ३८१ स्नान करते हैं; और वहां कई दिनके स्नानसे भी अपनेको नहीं मानते; किन्तु दस - बारह दिन अपने आपको शुद्ध अस्पृश्य मानते हैं, और उस मृत- पिताको हम जला भी देते हैं; तो क्या उससे कोई अधकचड़ा व्यक्ति हमारी पिता के प्रति घृणा बतानेका साहस कर सकता है? उस अस्पृश्यता के दिनों में हम देवमन्दिरमें जानेके अधिकारी भी नहीं माने जाते 1 यह तो छोड़िये, हम जब तमोमयी - रात्रि में तमोगुणमयी निद्रा-देवीसे आलिङ्गन एवं संयोग करते हैं; इससे हम अपने आपको अशुद्ध मानते हैं; और जब तक प्रातः हम स्नान न कर लें; तब तक हम देवमन्दिर में जानेके अधिकारी भी नहीं माने जाते; न सन्ध्या-वन्दन करते हैं और न ही कुछ उस समय खाते - पीते हैं । यह सब क्यों? केवल उसमें विज्ञान ही कारण है; अन्य घृणा आदि कुछ नहीं । पर चाण्डाल आदि जातियोंका जिस श्रशुद्ध - मिश्रण से जन्म हुआ है, वह मिश्रण उनका जन्मभर नहीं जाता; चाहे वे कितने वार ही स्नान क्यों न करते रहें? हमारे कई अस्पृश्य अङ्ग हैं, हम उनको कितना ही स्नान क्यों न करावें, फिर भी वेअस्पृश्य ही रहते हैं । हम उन्हें काटते नहीं - यदि काटें, तो हम स्वयं मरेंगे, किन्तु उन्हें छूकर अपनी शुद्धि करते हैं । इस प्रकार अस्पृश्य जातियों के स्पर्शके विषय में भी जानना चाहिये । हमारे हिन्दुधर्ममें केवल अन्त्यज श्रादि निम्न जातियोंकी ही अस्पृश्यता की गई हो; ऐसा दोष उसपर कोई भी नहीं लगा सकता । ब्राह्मणवर्ण तो उत्तम है, पर इसमें भी महाब्राह्मण ( प्रेतदानोपजीवी ).

पृष्ठ 610

सनातन धर्मलोक ५, पृष्ठ 610 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३८२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) अव्यवहार्य माने गये हैं । पशुओं में भी गर्दभ आदियोंको अस्पृश्य माना गया है । उत्तम गाय आदिका भी मुख अशुद्ध माना गया है ' न तु गौर्मुखतो मेध्या ' ( बृहत्पराशर ४३२ ९ ) । केवल यहां ही क्या, आप देवता जो मनुष्ययोनिसे उच्च तथा पूज्य माने जाते हैं; उनमें भी राहु - केतुको अस्पृश्य माना जाता है । जब वे सूर्य-चन्द्रमाका स्पर्श अर्थात् ग्रहण करते हैं; तब हम उन सूर्य - चन्द्रमा की उन पूत - किरणों को भी अशुद्ध मानकर उनके स्पर्शसे अपने आपको अशुद्ध मान लेते हैं । राहुकेतुके स्पर्शके दूर होनेपर फिर हम स्नान करके अपने आपको शुद्ध करते हैं । क्या कोई कहनेका साहस कर सकता है कि सनातनधर्मने केवल अन्त्यजोंको ही अस्पृश्य बना रखा है । वस्तुतः सनातनधर्म निष्पक्ष धर्म है; यह विज्ञानका पूर्ण ज्ञान रखने वाला धर्म है । यह जिसमें विकृति देखता है उसे छूनेका निषेध कर देता है; कथंचित् छूनेकी अनिवार्यतामें हमें स्नानादिकी शुद्धि आदिष्ट करता है । यह धर्म जड़ - वस्तुओंमें भी तामसिक वस्तुओं को अग्राह्य मानता है । पूजनीयोंमें माता आदिको तथा अपने प्रियोंमें भी अपनी पत्नी को ऋतुकालादिमें अस्पृश्य मानता है । जैसे डाक्टर लोग रोग-कीटाणुओंका संक्रमण मानते हैं; किसी रोगी आदिको छूकर अपने हाथों को गर्म पानी वा साबुन आदिसे धोते रहते हैं, पर पूर्ण स्नानादिके बिना भी अशुद्धि उनके शरीर में संक्रान्त हो ही जाती है; तभी श्राद्ध आदि में चिकित्सकको भी व्यवहार्य नहीं किया गया । शारीरिक चिकित्सा करने वाले डाक्टरोंकी तरह