सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 921–930

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 921–930

पृष्ठ 921

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' ओम् ' का महत्त्व ८६३ ' ' अभ्यादान ' का ' अयज्ञकर्म ' अर्थ करनेकी क्या आवश्यकता थी? इससे श्रीनागेशने यह सिद्ध किया हैं कि उक्त सूत्र से ' ओम्'को प्लुतोदात्त ' अयज्ञकर्म ' में होता है, यज्ञ - कर्म में नहीं; और प्रारम्भ में ही प्लुत देना आवश्यक भी नहीं । मध्य वा अन्तमें कहीं भी ' ओम् ' आ जावे; तो उसमें प्लुत दिया जा सकता है । इसपर श्रीनागेशने उपपत्ति भी दी है कि - इसीलिए ही जपमें भी शुद्ध-प्रणवको प्लुत ही जपते हैं, पर ' सुब्रह्मण्योम् ' में यज्ञकर्म होनेसे ‘ ओमभ्यादाने ' वाला अयज्ञकर्मपरक - प्लुतोदात्त न हुआ । यहाँपर श्रीनागेशभट्टके यह शब्द हैं- ' अभ्यादानम् - आरम्भः, ` तत्र वर्तमानस्य इत्यर्थ इति वृत्ति: । ' न सुब्रह्मण्याख्यायाम् ' ( १।२।३७ ) इति सूत्रे कैयटस्तु सुब्रह्मण्योम् ' ' इत्यत्र ' श्रमभ्यादाने ' इति प्लुतों-दात्तत्वं ' न भवति, तस्य अयज्ञकर्मविषयत्वात् ' इति वदन् अप्रारम्भेपि अनेन प्लुतमाह । अत एव [ तस्य सूत्रस्य यज्ञकर्मविषयत्वादेव इति भैरवः ] शुद्ध - प्रणवजपेपि तं प्लुतमेव जपन्ति । ' अभ्यादानं'-पदेन ' अयज्ञकर्म ' उच्यते - इति तदाशयं वर्णयन्ति ' । इसपर भैरवमिश्रने ' चन्द्रकला ' में यह समर्थन लिखा है— विधीयमानः ' श्रमभ्यादाने ' इति प्लुतः प्रारम्भेपि ' अयज्ञकर्मणि । न च वृत्ति-भवति, नतु ' अभ्यादान ' पदस्य आरम्भार्थकत्वमिति सम्मतमेव ' अभ्यादान ' पद्स्य आरम्भार्थकत्वमस्तु — इति वाच्यम, प्रारम्भे प्लुतोदात्तस्य ' ओ ३ म् ' इत्यत्र सिद्धावपि जपे यज्ञकर्मणि प्लुतानापत्तेः ' ।..

पृष्ठ 922

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८६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) तृतीय पक्ष । पर हमें वृत्तिकारका ही मत ठीक जँचता है; श्रीनागेश भट्टका । इसमें कारण यह है कि - एक तो श्रीकैयटने ' तस्य ( ' ओम -नहीं भ्यादाने ' इत्यस्य ) अयज्ञकर्मविषयत्वाद् ' इत्याहुः ' यहाँ पर ' इति आहु: ' इस शब्दसे अपनी इस पक्ष में रुचि सूचित की है । यह किन्हीं अन्योंका मत उसने दिखलाया है, अपना नहीं । दूसरा श्रीकैयट ने उन दूसरोंके मतानुसार ‘ ओमभ्यादाने ' इस सूत्र को ही अयज्ञकर्मविषयक बताया है, किन्तु ' अभ्यादानका ' ' अयज्ञकर्म ' अर्थ नहीं दिखाया । तब श्रीनागेशका ' अभ्यादान ' पदेन -'अयज्ञकर्म उच्यते ' यह आशय दिखलाना निर्मूल हुआ, क्योंकि – ' श्रमभ्यादाने ' ( ८२/८७ ) इस सूत्रसे अग्रिम सूत्र ' ये यज्ञकर्मणि ' ( ८२८८ ) है । यदि ‘ अभ्यादान ' पदका अर्थ ही ' अयज्ञकर्म ' होता; तो अग्रिम सूत्रमें ' यज्ञकर्म ' शब्द साक्षात् होने से पूर्व - सूत्र में ' अभ्यादाने ' पद न होनेपर भी स्वतः यज्ञकर्मकी व्यावृत्ति हो जाती; तब ' अभ्यादान ' पद रखना ही व्यर्थ हो जाता । पर यदि वृत्तिके अनुसार ' अभ्यादान ' का अर्थ प्रारम्भ माना जावे, जैसा कि — ' अमरकोष के ' स्याद् अभ्यादान मुद्धात आरम्भ: ' ( ३।२।२६ ) इस प्रमाण में भी ' लिखा है, ' आभिमुख्येन प्रादानं ' यह व्युत्पत्ति भी इसकी इसी अर्थको संकेतित करती है, ' अयज्ञकर्म ' अर्थ में यह सम्बन्ध नहीं बैठता । काशिका - आदिमें भी ' अभ्यादानम् - प्रारम्भः ' इत्यादि उल्लेखसे इसी अर्थकी स्वीकृति प्रत्यक्षदृष्ट है; तो अग्रिम सूत्रमें ' यज्ञकर्मणि ' होने से यह सूत्र ' अयज्ञकर्म ' विषयक भी सिद्ध हो

पृष्ठ 923

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' ओम्'का महत्त्व ८६१ जाता है, और प्रारम्भार्थक ' अभ्यादान ' पद भी सार्थक हो जाता है; और फिर श्रीनागेशभट्टके अनुसार ' ओम् ' के अयज्ञकर्म-विषयक जपनमें भी उसके प्लुतत्वमें कोई बाधा नहीं रह पाती । अतः वृत्तिकारके अनुसार ' अभ्यादान ' का प्रारम्भ अर्थ ही ठीक है । इस प्रकार ‘ सुब्रह्मण्योम्’में प्रारम्भ न होनेसे प्लुतोदात्तकी प्राप्ति ही नहीं है । उसे हटानेकेलिए बलात् ' अयज्ञकर्म ' अर्थ करनेकी आवश्यकता भी नहीं पड़ती । शेष बात यह है कि यदि यह सूत्र अयज्ञकर्म - विषयक माना जावे; तो इससे यज्ञकर्मके आरम्भमें प्लुत नहीं हो सकेगा; पर यज्ञोंमें वेदका जब आरम्भ होता है; तो ' ओ ३ म् ' प्लुत ही बोला जाता है; वेदका विषय भी यज्ञ ही सर्वसम्मत है, अतः ' ओमभ्या-दाने ' इस सूत्रको यज्ञकर्म अथवा यज्ञकर्म दोनोंसे स्वतन्त्र वा दोनों में सामान्य ही समझना चाहिये । हाँ, प्रारम्भ तो अवश्य अपेक्षित होना चाहिये । श्रीनागेशका जपको अयज्ञकर्म बताना भी ठीक नहीं; अन्यथा ' यज्ञानां जपयज्ञोस्मि ' ( गी ० १०।२५ ) इस भगवदुक्ति से विरोध पड़ेगा । जोकि — श्रीनागेशभट्टने प्रणवका जप प्लुतयुक्त माना है; यह भी कोई पूर्व बात नहीं, ' प्रणव ' कहते ही त्रिमात्र ( प्लुतसहित ) ' ओ ३ म्'को हैं । जैसेकि महाभाष्यकारने कहा है- ' पादस्य वा, अर्धर्चस्य वा अन्त्यमक्षरमुपसंहृत्य तदाद्यक्षरशेषस्य स्थाने त्रिमात्र-मोंकारं, त्रिमात्रमोकारं वा विदधति, तं प्रणवमाचक्षते ' ( ८२८८ ) | फलतः इस पक्षमें ' ओम्'को अयज्ञकर्म में प्लुत प्रसक्त तो हो

पृष्ठ 924

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ८६६ है, पर वह प्रारम्भ में ही होगा; अन्य - स्थल में नहीं । जैसे सकता में लिखा है - ' त्रिमान्नश्च प्रयोक्तव्यः कि — बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति कर्मारम्भेषु सर्वदा ' ( २।५ ), मदनरत्नमें श्रीव्यासका वचन भी कहा - ' त्रिमात्रस्तु प्रयोक्तव्यः कर्मारम्भेषु सर्वदा ' । और फिर प्लुत करना वैकल्पिक भी है । ' ओमभ्यादाने ' ( २८७ ) से. पूर्वके प्राचाम् ' ( २६ ) इस सूत्र में ' गुरोरनृतोऽनन्त्यस्याप्येकैकस्य श्रीभट्टोजिदीक्षितने लिखा है - " इह ' प्राचाम् ' इति योगो विभज्यते, तेन सर्वः प्लुतो विकल्प्यते ' अर्थात्- ' प्राचाम् ' सूत्रको पृथक कर देने से सभी प्लुत वैकल्पिक हो जाते हैं । ' प्राचीनोंके मतमें प्लुत होगा, अर्वाचीनों के मत में नहीं । इस प्रकारका एक वार्तिकभी है - ' सर्व एव प्लुतः साहसमनिच्छता विभाषा वक्तव्यः ' ( महाभाष्य ८२२६२ ) । अतः सर्वत्र ' ओ ३ म् ' इस प्रकार लिखना भी आवश्यक नहीं । यह तृतीय पक्ष है । गोपथ ब्राह्मण ( १।१।२५ ) के अनुसार. ऋग्वेदमें इस स्वरितोदात्त, यजुर्वेद में त्रैस्वर्योदात्त, सामवेद में दीर्घ-प्लुतोदात्त और अथर्ववेद में ह्रस्वोदात्त स्वर वाला माना है । यही बात बृहयोगियाज्ञवल्क्य स्मृति ( २७८-८१ ) में बताई गई है । वेद आदिका ' ओम् ' शब्द । एक अन्य बात विचारणीय यह है कि - यह ' ओम् ' जो इन वर्तमान चार - वेदसंहिताओंकी आदि में लिखा मिलता है; यह शब्द ' इन वेदसंहिताओं का अपना है; या इनमें प्रक्षिप्त अर्थात् साम्प्रदा-यिक है?? इस पर एक विचार यह है कि - वर्तमान चारों वेदोंकी ' संहिताएं परमात्मासे प्रोक्त मानी जाती हैं, पर चारों. संहिताओंकी

पृष्ठ 925

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' ओम् ' का महत्त्व ८३७ ध्यादिमें ठहरा हुआ ' घोम् ' शब्द संहिता -मन्त्र के अन्तर्गत नहीं । पहले ऋग्वेद ( शाक ) संहिता को ही लीजिये । ' अग्निम् ' से लेकर ' धातमम् ' तकके मन्त्रमें गायत्री छन्द है; और २४ अक्षर हैं, कोई न्यूनता नहीं है; अतः स्पष्ट है कि - ' ओम् ' से संहिताका आरम्भ नहीं; किन्तु ' अग्निम् ' से है । इस कारण श्रीसायणाचार्यने भी ' सच ' [ संहिता - प्रन्थः ] ' अग्निमीले ' इत्यारभ्य ' यथा वः सुसहासति ' इत्यन्तः ' ' अग्नि ' शब्दसे संहिताका आरम्भ माना है । श्रीयास्कमुनि ने भी ' निरुक्त ' के सप्तमाध्यायमें उक्त मन्त्र ' ओम्'- रहित ही व्याख्यात किया है । आर्यसमाज प्रवर्तक स्वा ० दयानन्दजीने भी अपने ' ऋग्वेदसंहिता ' भाष्यके प्रारम्भ में ' अग्निमीले ' यहां से लेके ' यथा वः सुसहासति ' इस पर्यन्त ॠग्वेद ' ( पृ ० १ ) यह लिखकर ' ओम् ' को वेदसंहिताके अन्तर्गत नहीं माना । इसी प्रकार ' इषे त्वा ' यह यजुर्वेद ( वाज ० ) संहिताका आरम्भिक-मन्त्र है । इस मन्त्रकी आदिमें दीख रहा हुआ ' ओम् ' भी मन्त्रा-न्तर्गत नहीं । तभी महाभाष्यकारने आरम्भ में इन आरम्भिक वेद-' मन्त्रोंकी आदिमें ' ओम् ' नहीं लिखा । इसी प्रकार ' सामवेद ( कौ ० ) संहिता ' के आरम्भिक मन्त्र ' अग्न आयाहि वीतये ' इस मन्त्रमें भी गायत्री छन्द है । अक्षर भी २४ पूरे हैं; तब स्पष्ट है कि- इसका ' ओम्'भी संहिता - मन्त्रसे पृथक् है । इसी प्रकार ' ये त्रिषप्ताः ' इस अथर्ववेद ( शौ ० ) संहिताके मन्त्रमें सबसे पूर्वं ठहरा ' ओम् ' भी नहीं । इसमें अनुष्टुप् छन्द है । अक्षर भी ३२ पूरे हैं संहिताका स्पष्ट है कि - यहाँ का ' ओम् ' भी संहितासे पृथक् है । तब ५७ स ० ६०

पृष्ठ 926

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दह श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) इस विषय में साक्षियां भी हैं । आर्यसमाजके प्रसिद्ध स्वा ० विश्वेश्वरानन्दजी तथा स्वा ० नित्यानन्दजीने इन वर्तमान चारों संहिताओंकी पदसूची बनाई है । इनसे संहिताके पद जाने जा सकते हैं; पर इन चारों पदसूचियों में ' ओम् ' शब्द ऐसा नहीं आया, जिसकी आरम्भिक सूची १।१।१ यह लिखी गई हो । प्रत्युत ' ऋग्वेदसंहिता ' की सारी सूची में ' ओम् ' शब्द ही नहीं । इसी प्रकार यास्कीय - निरुक्त तथा निघण्टुकी शब्दसूचीमें भी ' ओम् ' शब्द ही नहीं । इस प्रकार उक्त स्वामियोंकी ' सामवेदसं ० तथा अथर्ववेद - संहिताकी सूचीमें भी कहीं ' ओम् ' शब्द है ही नहीं । हाँ, यजुर्वेद - संहिताकी उक्ल - सूची में ' ओम'का स्थल संकेत २।१३, ४०।१५-१७ दिया है । इसमें पहला मन्त्र ' मनोजूतिर.. ओ ३ म्प्रतिष्ट ' है । इसमें हमारा प्रकृत ' ओम् ' नहीं है, यह स्वीकार- वाचक है, और यह मन्त्रकी आदिमें भी नहीं है । दूसरा मन्त्र ' तो स्मर ' ( ४०/१५ ) है, इसमें मन्त्रार्गत ' ओम ' अवश्य है, पर मन्त्रकी आदिमें नहीं । इस मन्त्रका आरम्भ तो ' वायुरनिल ' से होता है; हां, उत्तरार्ध की आदिमें तो है । तीसरा मन्त्र ' ओं खं ब्रह्म ' ( ४०/१७ ) है । यहां भी ' ओम् ' मन्त्रान्तर्गत ही है, पर मन्त्रके आरम्भ में नहीं! इस मन्त्रका आरम्भ ' हिरण्मयेन पात्रेण ' से है । इस ' ओं खं ब्रह्म ' को स्वतन्त्र मन्त्र माना जावे; तो अन्य बात है । पर इसकी संख्या ' हिरण्मयेन ' मन्त्रसे पृथक् नहीं; क्योंकि उक्त मन्त्र में आदित्य-मण्डलान्तर्गत - पुरुषको ही ' ओम् ' कहा गया है । अतः ' ओं खं ब्रह्म ' यह उक्त मन्त्रका शेष ही है ।

पृष्ठ 927

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' ओम् ' का महत्त्व तथापि वह बात पूर्ण न हुई, अर्थात् वर्तमान वेदकी चार संहिताओंके आरम्भ में ' ओ ३ म् अग्निमीले ' ' ओ ३ म् इपे त्वा, ओ ३ म् अग्न आयाहि ', ' ओ ३ म् ये त्रिषप्ताः ' इनमें ठहरे हुए ' ओ ३ म् ' संहिताके नहीं - अर्थात् इन चारों - संहिताओंके आदिम - पद ' अग्निम्, इषे, अग्ने,. ये ' ही हैं, ' ओम् ' नहीं; यह पूर्व कहे प्रकारसे: सिद्ध हो चुका है केवल हम ही यह नहीं कहते, किन्तु ' ओम् ' का महत्त्व मानने वाले आर्यसमाजके प्रवर्तक स्वामी दयानन्दजी भी इससे सहमत हैं । वे अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ' सत्यार्थप्रकाश ' में लिखते हैं- " ऐसे ही अन्य ऋषि - मुनियोंके ग्रन्थोंमें ' ओ ३ म् ' और अथ ' ' शब्द लिखे हैं, वैसे ही — ' अग्नि, इट्, अग्नि, ये त्रिषप्ताः ' ये शब्द चारों वेदोंकी आदिमें लिखे हैं, ( प्रथम - समुल्लास पृ ० १३ ) स्पष्ट है कि यहां वे इन शब्दोंको ही वेदसंहिताका आदिम - पद मानते हैं, ' ओम् ' को नहीं ।: अब फिर प्रश्न है कि — ' सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति... ओमित्येतत् ’ ( १।२।१५ ) यह कृष्णयजुर्वेदीय ' कठोपनिषद् ' ' ओम्'की सत्ताकोः सभी वेदोंमें कहती है । स्वामी दयानन्दजीने ' सत्यार्थप्रकाश ' के द्वितीय पृष्ठ में लिखा है- ' देखिये वेदों में ऐसे प्रकरणोंमें ' ओम्'-आदि परमात्माके नाम हैं । यहांपर स्वामीजीने ' वेदों ' यह बहुवचन देकर चारों वेदोंमें ' ओम् ' की सत्ता मानी है । पर अब तो ' ओम् ' पद कहनेवाली केवल यजुर्वेद - वाजसनेयीसंहिता ही हुई; केवल उसीमें ' ओम् ' मिलता है; चारों वेदसंहिताएँ तो क्योंकि न हुईं; क्योंकि उनमें ' ओम् ' मिलता नहीं; और ' ओम ' कहनेवाली

पृष्ठ 928

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ६०० ' ऋचो अक्षरे ' ( ऋ ० १ | १६४३६, अथर्व ० ६।१०।१८ ) इस मन्त्रका ' ओम् ' अर्थ करने में सबका ऐकमत्य नहीं । स्वामी दयानन्दजीने भी स ० प्र ० में ( पृ ० ४१ तृतीय समु ० ) तथा संस्कारविधि के ( २८४ पृष्ठ ) संन्यास - प्रकरण में उक्त - मन्त्रका ' ओम ' परक अर्थ नहीं किया । इधर कठोपनिषदुका उक्त वचन वादि - प्रतिवादि - सम्मत है; तब उस वचनकी सङ्गति कैसे हो? इसपर यह जानना चाहिये कि - यहां पर ' सर्वे वेदाः ' कहा है, ' सर्वा वेदसंहिताः ' नहीं कहा । ' सर्वे वेदाः ' का अर्थ है ' सब वेद ' । सब वेद कितने हैं? चार हैं, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद । पर क्या ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद कहीं मिलते भी हैं? कहीं भी नहीं । आप आर्यसमाजके वैदिक यन्त्रालय अजमेरकी छपी वेद - पुस्तकें भी देख लीजिये, अथवा निर्णयसागर प्रेस, श्रीवेङ्कटेश्वर प्रेस बम्बई, विद्याविलास प्रेस काशी, भारतमुद्रणालय पारडी ( सूरत ) आदि प्रामाणिक यन्त्रालयोंकी मुद्रित वेद- पुस्तकें भी देख लीजिये-आपको ' ऋग्वेदसंहिता, यजुर्वेदसंहिता, सामवेदसंहिता, अथर्ववेद-संहिता ' छपी हुई मिलेंगी, ऋग्वेद - यजुर्वेद आदि छपे नहीं मिलेंगे । जहाँ ऋग्वेद, अथर्ववेद ये नाम छपे हैं उनके सम्पादक - प्रकाशकोंको वस्तुस्थितिका ज्ञान नहीं है । अथवा यदि वे ' समुदायेषु हि शब्दाः प्रवृत्ता अवयवेष्वपि वर्तन्ते ' इस पस्पशाह्निकस्थ - महाभाष्यके वचनानुसार शाकल्यसंहिता, वाजसनेयी - संहिता, कौथुमी - संहिता तथा शौनकी - संहिताको ' ऋग्वेद-यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद लिखते हैं, तो उन्हें बाष्कल संहिता

पृष्ठ 929

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' ओम् ' का महत्त्व ६०१ आदिको भी ऋग्वेद, काण्व, तैत्तिरीय, मैत्रायणी, काठक, कठ-कपिष्ठल आदि संहिताओं को भी यजुर्वेद, जैमिनि, राणायनीय आदि संहिताओंको भी सामवेद, पैप्पलाद आदि संहिताओं को भी ' अथर्व-वेद ' लिखना चाहिये | अवयवरूपमें सब समान हैं । वास्तविक बात यह है कि — ऋग्वेद यदि स्वतन्त्र नहीं मिलते । वेद संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् इन चार भागों में मिलते हैं । इनमें मुख्य भाग दो हैं, - मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग | मन्त्र-भागमें ११३१ संहिताएं आ जाती हैं । ब्राह्मणभागमें पुराण आदि अष्टविध ११३१ ब्राह्मण, तथा इतनी ही उपनिषदें, और इतने ही आरण्यक आजाते हैं । यह सारा साहित्य मिलकर ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद ये चार अथवा सब वेद बनते हैं । तो इन्हीं चारोंकी ११३१ संहिताओंके मध्यमें किसी भी संहिता, किसी भी ब्राह्मण, वा किसी भी उपनिषद् वा किसी भी आरण्यकमें आया हुआ ' ओम्'का वर्णन, आम्नान वा व्याख्यान मिल जावे; वह चारों वेदोंका माना जावेगा । तब ' सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ' इसकी संगति लग गई । हम तत्तद् - वेदोंके संहिता, ब्राह्मण, उपनिषद् आदिके ' ओम् ' - विषयक-प्रमाण दे ही चुके हैं । जो नहीं लिखे, वे उद्धृत किये जा सकते हैं । तब उक्त उपनिषत् - कण्डिकाएं जो स्वयं वेद हैं — ठीक ही है । प्रत्युत इस वचन से ' वेदोंकी कसौटी ' भी निकल आई कि यह सारा साहित्य वेद है 1 । जैसे ' यस्मिन् वेदा निहिता विश्वरूपाः ( अथर्व ० ४७१६ ) ' वेदेन रूपे व्यपिबत् ( यजुः १६७८ ) इनमें परोक्षरूपसे

पृष्ठ 930

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ६०२ - वर्णित ' वेद ' शब्दसे इन वेदका वर्णन करनेवाले मन्त्रोंकी वेदसे भिन्नता नहीं हो जाती; वैसे ही ' त्रयो वेदा अजायन्त ' ( ऐत ० ब्रा ० २५/७ ) . ' वेदा वा एते, अनन्ता वै वेदाः ' ( तै ० ना ० ३।१०।११।४ ) ' सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ' ( कठोपनि ० १ २ ।१५ ) इत्यादि ब्राह्मण - उपनिषदादिके वचनोंमें परोक्षरूपसे कहे हुए ' वेद ' शब्द से ब्राह्मण, आरण्यक-उपनिषदादिकी वेद - भिन्नता भी नहीं हो जाती । बल्कि — यह - सभी साहित्य ' चार - वेद ' सिद्ध हो जाता है । इसी सम्पूर्ण वेद - साहित्यको अवलम्बित करके फिर पुराण, इतिहास, श्रीमद्भगवद्गीता आदिने भी- जो पंचम वेद हैं-. ' ओम् ' की महिमा गाई । इस प्रकार के ' ओम् ' का महत्त्व स्पष्ट ही है । तब इन सब संहिताओंके आरम्भ में भी प्रोक्त ' ओम् ' शब्द संहिताके आविष्कारकसे ही आया । ' गायत्री, अनुष्टुपू ' आदि छन्दोंके अक्षरसे वह बढ़ा हुआ है ' - यह कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि - छन्दोंके अक्षर न्यूनाधिक भी हुआ करते हैं । यदि गायत्री २४ अक्षर, उष्णिकू २८, अनुष्टुप् ३२, बृहती ३६, पंक्ति · ४०, त्रिष्टुप् ४४, जगती ४८ अक्षरवाले हों; तो ' शुद्ध ' कहलाते - हैं । यदि एक अक्षर इनमें कम हो, तो ' निचृत ', दो अक्षर कम हों, तो ' विराट् ', एक अक्षर अधिक हो तो ' भुरिक ' दो अक्षर अधिक हों, तो ' स्वराट् ' कहलाते हैं । छन्द भी वही माना जाता है । कोई त्रुटि नहीं आती । अथवा वेदमन्त्रसे उस ' ओम् ' का पृथक् रखना उसके . वशिष्ट्यर्थ है; अन्यथा वेदमन्त्रान्तर्गत होनेपर वह वैसा हो