श्रीगणेशाय नमः।

सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 911–920

सनातन धर्मालोक ५ · पृष्ठ 911–920

पृष्ठ 911

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' प्रोम् ' का महत्त्व चक्कीके पाटमें पड़कर ‘ अचू ' पिस जाते हैं, दीखते ही नहीं; अथवा विकृत हो जाते हैं; पर ' ओम् ' यह ब्रह्मका नाम है, यह भला व्याकरणमें भी क्यों न अविकृत रहे? अचूके सामने ' यो ' पड़ा हुआ हो तो वह ' औ ' इस वृद्धिरूपमें विकृत हो जाता है । वृद्धि भीतो विकृति होती है । खींचकर कानोंकी वृद्धि कर दी जाय; तो वे भी तो विकृत लगते हैं । पर यदि ' ओम् ' रूपमें वही ' ओ ' अचूके सामने आ जाए; तो उसीका रूप रह जाता है । जैसे कि -' शिव + ओम् = शिवोम् ' । अर्थात् वृद्धि सन्धि ' औ ' न होकर पररूप ' ओ ' ही रहेगा । इस प्रकार अन्य अक्षरोंकी सन्निधि में भी ' ओम् ' अपनी मात्रारूप में ही रहता है । ' ओम् ' अव्यय - ब्रह्म । अन्य बात यह है कि — ' ओम् ' यह अव्यय - शब्द है,. अव्यय-ब्रह्म है । अव्ययका लक्षण प्रसिद्ध है - ' सदृशं त्रिषु लिंगेषु सर्वासु च विभक्तिषु । वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् ' । यह ‘ अथर्ववेद - गोपथब्राह्मण ' ( १ । १ । २६ ) की श्रुति है । यह वहाँपर आई भी ' ओम् ' केलिए ही है । पहले वहाँ अवतरणिका दी गई है-' निपातेषु चैनं वैयाकरणा उदात्तं समामनन्ति, तद् अव्ययीभूतम् । अन्वर्थवाची शब्दः, न व्येति कदाचन ' यह कहकर उक्त श्रुति दी गई है । सो यह शाब्दिक - अव्यय भी है, वास्तविक अव्यय भी । पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग, नपुंसकलिङ्ग तीनों लिङ्गोंमें यह समान है । पुरुष, स्त्रियों तथा नपुसकोंमें भी वही ' ओम् ' - ब्रह्म समानरूपसे व्यापक है । प्रथमासे सप्तमी तककी सब विभक्तियों में भी यह

पृष्ठ 912

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८८४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) शब्द समान है, और ' ओम् ' - ब्रह्म भी संसारके सब विभागों-( विभक्तियों ) में समानरूपसे व्यापक है । एकवचन, द्विवचन, बहुवचन तीनों वचनोंमें यह शब्दरूपमें समान है, ब्रह्मरूपमें ' ओम् ' वाच्य, तात्पर्य, लक्ष्य, व्यङ्ग्य इन वचनों में भी समान-रूपसे व्यापक है । यह ' ओम् ' शब्द भी ' न व्येति ' भिन्नतारूप-विकारको प्राप्त नहीं होता; ' ओम् ' - ब्रह्म भी विकारको प्राप्त नहीं होता । ब्राह्मणभागात्मक- अथर्ववेद ( गोपथ ब्राह्मण ) में. भी ' ओम् ' की बहुत महिमा कही गई है । हम उसे अंशतः उद्धृत करते हैं । जब ब्रह्माजी की उत्पत्ति कमलसे हुई, तो ब्रह्माजीने सोचा- ब्रह्म ' ह वै ब्रह्माणं पुष्करे ससृजे । स खलु ब्रह्मा सृष्टः चिन्तामापेदे – केन · अहम् एकेन अक्षरेण सर्वांश्च कामान्, सर्वांश्च लोकान्, सर्वांश्च देवान्, सर्वांश्च वेदान्, सर्वांश्च यज्ञान्, सर्वांश्च शब्दान्, सर्वाश्च व्युष्टीः, सर्वाणि च भूतानि स्थावर - जङ्गमानि अनुभवेयम् इति । ( मैं किस प्रकार एक अक्षर से सब कामनाओं, सब देवताओं, वेदों, यज्ञों तथा सब प्राणियोंका अनुभव करू ) स ब्रह्मचर्यमचरत् ७.,. स ओम् - इत्येतद् अक्षरमपश्यत् ' ( १ | १ | १६ ) ' ब्रह्मचर्य कर के ब्रह्माजीने इसी ' ओम् ' अक्षर को देखा, जो सर्वव्यापी, सर्वविभु, चतुर्मात्र, अयातयाम- ब्रह्मरूप था । उसकी प्रथम मात्रामें ब्रह्माजीने ऋग्वेद, पृथिवीलोक ( १७ ), द्वितीय- मात्रा में यजुर्वेद और अन्तरिक्ष लोक ( १८ ), तृतीय- मात्रा में सामवेद और द्युलोक ( १६ ), चतुर्थ- मात्रा से अथर्ववेद ( २० )

पृष्ठ 913

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' ओम ' का महत्त्व ६६५ मकार की मात्रा से इतिहास - पुराणका अनुभव किया ( २१ ) । अबं इस ' ओम् ' का माहात्म्य देखिये - ' तदेतद् अक्षरं ब्राह्मणो यं काममिच्छेत्, त्रिरात्रोपोषितः, प्राङ्मुखो, वाग्यतो, बर्हिषि उपविश्य सहस्रकृत्व आवर्तयेत्, सिध्यन्ति अस्य अर्थाः, सर्व-कर्माणि च ' ( गोपथ १११।२२ ) ( जो इस ओङ्कारका एक सहस्रवार जप करे, मुख पूर्व में हो, बोले - चाले नहीं, तीन रातका उपवास किये हो, कुशा पर बैठा हो; उसके मनोरथ सिद्ध होते हैं । ) यहाँ-परं प्रसक्तानुप्रसक्त पूर्वदिशाकी ओर मुख करनेका तथा कुशका महत्त्व भी सिद्ध हो गया । तभी श्रीपाणिनि - द्वारा. अष्टाध्यायी-निर्माणके समय महाभाष्यकारने पूर्वदिशाकी ओर मुख करके तथा हाथ में कुश पहिनकर बैठना कहा है- ' प्रमाणभूत आचार्यो दर्भ-पवित्रपाणिः, शुचौ अवकाशे, प्राङ्मुख उपविश्य सूत्राणि प्ररणयति स्म । ` तत्र अशक्यं वर्णेनापि अनर्थकेन भवितुम् ' ( १ | १ | ३ | १ ) ' ओम् ' का सर्वसाधारणस्थलमें अप्रयोग । इस प्रकार जब कि सनातनधर्मके ग्रन्थ ' ओम् ' की महिमासे भरे पड़े हैं; फिर सनातनधर्मियोंकी पत्रव्यवहार में, वा ग्रन्थकी आदिमें ' ओम् ' लिखनेसे उदासीनता देखकर, उनके द्वारा ' श्रीःका -प्रयोग देखकर बहुत से धर्मप्रेमियोंको आश्चर्य मिश्रित खेद: होता है । पर सनातनधर्मी जो इसका सर्वसाधारण - स्थल में प्रयोग नहीं करते; इसका कारण उनकी इसमें अश्रद्धा हो - यह बात नहीं; किन्तु वे उसको परम - पवित्र मानते हैं । परम पवित्रको सर्वसाधारण-स्थलमें, सर्वसाधारण - रूपसे प्रयोग में नहीं लाया जाता । सर्वस्मृतिमूर्धन्य,

पृष्ठ 914

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ६८६ वेदानुगत, सृष्ट्यादि - प्रणीत ' मनुस्मृति ' में कहा है- ' प्राक्कूलान् पवित्रैश्चैव पावितः । प्राणायामैस्त्रिभिः पूतः, तत पर्युपासीनः ' ( २।७५ ) ' पूर्वाग्र - कुशों को बिछाकर उनपर बैठे, और ओंकारमर्हति ( कुशों ) से अपनेको मार्जन कर पवित्र होवे, तीन - प्राणायामों पवित्रों हो जावे, तब ओंकार के प्रयोगके योग्य होता है । से जब पवित्र ) के पीछे दिये प्रमाण में भी यही बात ‘ गोपथब्राह्मण ' ( अथर्ववेद प्रत्यक्ष ही है । इस कारण सनातनधर्मियोंका यह हार्दिक आशय है कि जब कि वेदपर भी अधिकार- अनधिकारका प्रतिबन्ध है; तो यह अक्षर तो सब वेदोंका नवनीत एवं सर्वश्रेष्ठ माना जाता है; तब इसकी सर्वसाधारणता कैसे की जाय? उसे अनधिकारी ग्रहण न करें, उसे सर्वसाधारण पर न गिरा दिया जाय; अन्यथा ' अतिपरिचयादवज्ञा ' इस न्याय से उसका निर्दिष्ट - फल भी नहीं मिला करता; अतः वे इसका सर्व-साधारण - स्थल पर तथा सर्वसाधारण अवस्था में वैधरूपेण प्रयोग में लाना प्रतिसमय उसका लिखना कहना उचित नहीं समझते । किसी वस्तुको सर्वसाधारण से छिपाना ( जैसे अपनी धर्मपत्नी आदिका ), इससे उनका उसमें प्रेम नहीं झलकता, किन्तु अत्यन्त - गाढ अनुराग सूचित होता है । तभी तो विशिष्ट-मन्त्रोंकेलिए सनातनधर्मी कहते हैं- ' गोपनीयं, गोपनीयं, गोपनीयं प्रयत्नतः ' । गुप्त करने से तो उस वस्तुपर प्रेम बढ़ता ही है, घटता नहीं । ' मन्त्र ' शब्द भी ' मन्त्रिं गुप्तपरिभाषणे ' ( चु.आ.से. ) धातुसे बना है, जिसका अर्थ ही ' गुप्तरूपसे बोलना, विचारना ' है;

पृष्ठ 915

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‘ ओम् ' का महत्त्व तब यह ' ओम् ' तो मन्त्रराज है । यही उनका श्रोङ्कारको सर्व-साधारण - स्थलमें प्रयुक्त न करनेका वास्तविक दृष्टिकोण है, अन्य उसके प्रति उदासीनता आदि कारण नहीं । सब शास्त्रीय - कर्म-विशेषों के आरम्भ में तो वे उसका प्रयोग मानते ही हैं । तभी तो सनातनधर्मकी सन्ध्यामें लिखा है- ' ओंकारस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्री छन्दोऽग्निर्देवता, शुक्लो वर्णः, सर्वकर्मारम्भे विनियोगः ' । ' ओम् ' की वास्तविक आकृति । ' ओम् ' को एक अक्षर माननेपर तो ' वर्णात् कार: ' इससे ‘ कार ’ प्रत्यय हो जाता है; पर वर्णसमुदाय माननेपर ' उच्चैस्तरां वा वषट्कारः ' ( १।२।३५ ) इस पाणिनिके निर्देशसे समुदायको भी ' कार ' प्रत्यय होकर ' ओङ्कार ' शब्द बन जाता है । इसकी वास्तविक एवं विशुद्ध आकृति तो ' ओम् ' यह है । इसके समक्ष कोई भो अक्षर न पड़ा हुआ हो; तो ' ओम् ' ही लिखना वेदाङ्ग - सम्मत है । सामने अच् अक्षर पड़ा हो; तब भी ' ओम् ' ही लिखना व्याकरणानुशिष्ट है 1 । जैसे कि ‘ ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ( गीता ८।१३ ) ' तस्माद् श्रोमित्युदा-हृत्य ' ( १७ | २४ ) यदि सामने व्यञ्जन वर्ण ( हल्प्रत्याहार ) पड़ा हो, तो ' म्'को अनुस्वार कर देना चाहिये, अर्थात् वहां ' च ' लिखा जाना व्याकरणानुगृहीत है | पर सामने अच् अक्षर होनेपर अथवा कोई भी अक्षर सामने न होनेपर ' त्र ' लिखना व्याकरण - विरुद्ध है । मूल ' म् ' ही होता है, अतः गोपथ ( १।१।२५ ) में लिखा है— अनुस्वारका ' मकारं व्यञ्जनमित्याहुः ' पर ' ॐ ' यह तो शिवलिङ्गकी अथवा प्रणवात्मक प्रतीक प्राकृति - विशेष भी है, गणेश आदि पांच - देवोंकी

पृष्ठ 916

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श्रीसनातनधर्मालोक ' ( १ ) ' अर्थात् यह एक चित्र ( मूर्तिविशेष ) है । अत ' ॐ ' इस प्रकार . लिखनेवाले, वेदाङ्गके अनुसार अशुद्धि जानकर भी जानबूझकर -यदि इस आकृतिको लिख रहे हैं; तो समझना पड़ेगा कि – वे ' ॐ ' • इस रूप में गणेश की मूर्ति लिख रहे हैं; इस विषय में ' श्रीगणेशका ' मङ्गलाचरण ' आरम्भिक निबन्ध देखें । उसमें तो अक्षरात्मकता न होने से व्याकरणका प्रतिबन्ध हो ही नहीं सकता । श्री पं ० दुर्गादत्तजी त्रिपाठी- महोदय ( काशी ) ने लिखा है कि - ' प्र ` ते इन्द्रं! पूर्व्याणि ' ( ऋ ० १०१११२८ ) में कहा गया है - शिव - पार्वती एक बार प्रणव - चित्रकी ओर एकाग्रता से ध्यान कर रहे थे । उनके संकल्पके बलसे उस चित्रसे परब्रह्मतत्त्व गणपति रूप से प्रादुर्भूत हुआ, जिसमें गजका गण्डस्थल, शूर्पकर्ण, शुण्डा - दण्ड, चन्द्रकला की आकृति थी 1 । श्रीगणपति ही परब्रह्म हैं । जैसा कि - गणपत्युप-निषद् में लिखा है । श्रीगणेशके परब्रह्म होने से ' तस्य वाचकः प्रणवः ' ( योगदर्शन १।२६-२८ ) उसका वाचक कारको बताया गया है । वाच्य वाचकका अभेद हुआ करता है । तब सर्वकर्मा -रम्भमें ॐकारका उच्चारण गणपतिका पूजन है । सो ' तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः । प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः ' ( गीता १७१२४ ) ' दानयज्ञतपः - स्वाध्यायजप - ध्यानसन्ध्योपासना-प्राणायाम- होमदेवपित्र्यमन्त्रोच्चारण, ब्रह्मारम्भादीनि प्रणवमुच्चार्य प्रवर्तयेत् ' ( शांठ्यायन ) इत्यादि तथा ' गणेशः सर्वदेवानामादौ पूज्यः ' सदैव हि ' ( रुद्रकल्पद्रुम ) ' आदौ विनायकः पूज्यो ह्यन्ते च कुलदेवता ' - ( बहु चपरिशिष्ट ) ' सर्वकर्म - समृद्ध्यर्थमादौ पूज्यो विनायकः '

पृष्ठ 917

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" ओम् ' का महत्त्व मद ( लिङ्गपुराण ) इत्यादि शास्त्र - वचनोंकी इसीसे एकवाक्यता हो जाती है । अतः सर्व कर्मोंके आरम्भमें ' ॐ का उच्चारण तथा स्मरण गणपतिका ही संक्षिप्त - पूजन है । अतः उक्त ऋग्वेदके अग्रिम-( १०।११२ / ९ ) मन्त्रमें गणपतिका वर्णन किया है । कई लोग कहते हैं- " गणेशकी उत्पत्ति ' ३ ' से हुई है; क्योंकि प्रारम्भमें वही मंगलाचरण - रूप में लिखा जाता है, उसमें ' अ ' शिर और शरीर है, आरम्भिक भाग सूड है, ऊपरकी मात्रा गणेशका एकदन्त है, और अनुस्वारका भाग उसका मोदक है । प्लुत ( ३ ) का चिन्ह उसका मूषक वाहन है । इस प्रकार ' ३ ' से ही मोदकभोजी, मूषकारोही और एकदन्तधारी - गजाननकी उत्पत्ति हुई है । ' ३ ' लिखते - लिखते और उसकी वास्तविक - आकृतिको भुलानेसे गजानन बन गया है " - - पर इस कल्पनामें कुछ थोड़ा - सा • भेद कर दिया जाता है । वस्तुतः गणेशकी ही एक आकृति ' ॐ ' भी है, जैसे कि गणेशपुराण में लिखा हैं - ' ॐकाररूपी भगवान् यो वेदादौ प्रतिष्ठितः । यं सदा मुनयो देवाः स्मरन्तीन्द्रादयो हृदि । ‘ ओंकाररूपी भगवानुक्तस्तु गणनायकः । यथा सर्वेषु कार्येषु पूज्यतेऽ-सौ विनायकः ' । सो ' गणपति ' तो एक देव सिद्ध हो ही गये । ॐकार उन्हींका एक संक्षिप्त - संस्करण वा संक्षिप्त प्रतीक वा मूर्ति सिद्ध हुआ । तो नहीं बताई गई किन्तु उसकी मूर्ति बताई गई है । . यहां भूल वेदका ‘ यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः ' ( ऋ. १।१६४ / ३६ ) * इसमें है । अर्थात् इस ' ओम् ' में सब देवता विराजते हैं । तब यह मन्त्रांश साक्षी भूल नहीं; किन्तु इसमें वैदिकता है । उससे देवमूर्ति निकलना

पृष्ठ 918

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श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) इसका संकेत हम ' श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ' निबन्ध में भी कर चुके हैं । यजुर्वेद वा ० सं ० ( ४०।१५-१७ ) मन्त्रके भाष्य में उवट - महीधरने इसे आदित्य - स्थित ब्रह्मकी ' प्रतिमा ' माना है । उसपर भला व्याकरणका नियन्त्रण कैसे हो सकता है? इसपर बृहद्योगियाज्ञवल्क्य - स्मृतिका यह वचन विचारणीय FRACKING ' अनुस्वारो मकारस्तु ओङ्कारस्य शिरो यदा । प्रकृतिः साधनं कृत्वा व्यञ्जनादौ तु लुप्यते ' ( २८१ ) ' ओ ३ म् ' लिखने में तीन पक्ष । अब ' ओम् ' की एक आकृति ' ओ ३ म् ' इस प्रकार प्लुत - सहित भी है । पर इस प्लुत - सहितका भी सर्वत्र प्रयोग उचित नहीं । यहाँ पर ' श्रमभ्यादाने ' ( ८ | २ | ८७ ) इस पाणिनिसूत्र से अभ्यादानमें प्लुत होता है । जैसा कि — गोपथब्राह्मण में भी कहा है- ' तिस्रो मात्राः अभ्यादाने हि सवते ' ( १।२७ ) अभ्यादान सबसे पूर्वके आरम्भको कहते हैं । वह सबसे पूर्वका आरम्भ भी वेदका ही इष्ट है; क्योंकि-' ओम् ' वेदका ही सारस्वरूप है । तभी ' सिद्धान्तकौमुदी ' में इसका लोकमें उपयोग न होनेसे इस सूत्रको वैदिक - प्रक्रियामें रखा गया है । इसी कारण हो श्रीभट्टोजिदीक्षितने इसका उदाहरण ‘ ओ ३ म्-अग्निमीले पुरोहित - ' यह वेदका ही रखा है । काशिकाकार श्रीवामन - जयादित्यने भी यही उदाहरण लिखा है । इससे सिद्ध हो रहा है कि — इस ' ओ ३ म् ' का प्रयोग वेदसंहिताका सबसे पूर्वका आरम्भ करनेके समय किया जाना चाहिये, सर्वत्र इसे नहीं

पृष्ठ 919

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' ओम् ' का महत्त्व लिखना चाहिये । ' अग्निमीले ' यह मन्त्र ' ऋग्वेदसंहिता'का सर्वा-दिम है | अतः उसके पूर्व ' ओ ३ म् ' का प्रयोग ठीक ही है । बीसवीं शताब्दी के वेदानुरागी रूपसे प्रसिद्ध, आर्यसमाज - प्रवर्तक स्वा ० दयानन्दजीने भी अपने ' वेदाङ्गप्रकाश ' के ' सन्धिविषय ' के ' संज्ञाप्रकरण ' ४ र्थ पृष्ठमें उक्त सूत्र के उदाहरण ' ओ ३ म् इषे त्वा ऊर्जे ` त्वा ' ‘ ओ ३ म् अग्निमीले पुरोहितम् ' यह दो दिये हैं । यह दोनों ही वेदसंहिताओंके आरम्भके हैं । पहला उदाहरण यजुर्वेदवाजसनेयी-संहिताका सर्वादिम है, दूसरा ऋग्वेदशाकलसंहिताका सर्वादिम है । स्वामीजीने उक्त सूत्रके ‘ अभ्यादान ' पदका अर्थ भी ' आरम्भ ' ही किया है । इससे दो बातें सिद्ध हो रही हैं, एक यह कि — इस ' ओ ३ म् ' का प्रयोग केवल वेदके आरम्भमें किया जावे, सर्वसाधारण-स्थलपर नहीं । दूसरा यह कि - वेदके प्रत्येक मन्त्रके साथ जो ' ओम् ' बोला जाता है, न तो वहाँ प्लुत - सहित ' ओ ३ म् ' लिखना चाहिये, न ही वेद - संहिताओंके मण्डल, अष्टक, अध्याय, आर्चिक, पर्व, काण्डोंके आरम्भिक मन्त्रोंमें; क्योंकि वह आरम्भ होनेपर भी सर्वादिम - आरम्भ नहीं । तभी तो अभ्यादानके प्रत्युदाहरणमें ' में ' ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ' तथा काशिकामें ' ओमित्ये-' सिद्धान्तकौमुदी यह उदाहरण दिया गया है । यहाँ आरम्भ तदक्षरमुद्गीथमुपासीत ' होने पर भी सर्वादिम - आरम्भ नहीं । इसका तत्त्व यह है कि - जब यज्ञों में वेद संहिताओंका उच्चारण जाता था; तब उससे पूर्व ' ओ ३ म् ' इस प्रकार प्लुत प्रारम्भ किया में इसे लम्बे स्वर में बहुत निमान्त्रता से बोला जाता था । त्रिमात्रता

पृष्ठ 920

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A श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) देर तक बोलना पड़ता है । इससे आस - पास बैठे हुए यज्ञसम्बद्ध सब अधिकारियोंको पता लग जाता था कि अब वेदसंहिताका आरम्भ होगया है । इसी कारण उस प्रारम्भमें वहाँ ' ओ ३ म् ' लिखा जाता है । वह लिखनेकेलिए नहीं है, किन्तु वहाँ वैसा बोलने के लिए है । अतः आजकल जो वेदसे इतर स्थल लोकमें, तथा सर्वादिम आरम्भ न होनेपर भी जो कि ' ओ ३ म् ' लिखा जाता है, यह अनार्ष व्यवहार है । प्लुत तो लिखना भी व्यर्थ है, वह बोलनेका द्योतक है; पर आजकल जो कि लिखने में प्रयुक्त किया • जाता है, वहाँ बोलने की कोई बात ही नहीं होती । अतः प्लुत - सहित उसे सर्वसाधारण - स्थलपर बोलना वा लिखना शास्त्रीय नहीं । दूसरा पक्ष | यह एक पक्ष है, अब दूसरा पक्ष दिया जाता है । वह यह है कि — यह आवश्यक नहीं कि - प्लुत- सहित ' ओ ३ म्'को आरम्भ में ही लिखा जावे, और वह भी वेदमें ' | ' श्रमभ्यादाने ' ( पा ० ८२८० ) के ' अभ्यादान'का आरम्भ यह अर्थ ' वृत्ति ' में ही लिखा है, यह अर्थ सर्वसम्मत नहीं । श्रीनागेशभट्टने उक्त सूत्रपर ' शब्देन्दुशेखर ' वैदिक - प्रक्रिया में लिखा है कि- ' न सुब्रह्मण्याख्यायां ' ( १।२।३७ ) इस सूत्रमें कैयटने ' सुब्रह्मण्य़ोम् ' इसमें ' ओमभ्यादाने ' से प्लुतोदात्त नहीं माना । उसका आशय यह है कि - ' इस सूत्रके ' अभ्यादान ' पदका अर्थ ' यज्ञकर्म ' है, ' प्रारम्भ ' नहीं । यदि उसका अर्थ ' प्रारम्भ ' ही होता; तो ' सुब्रह्मण्योम् ' में प्रारम्भ न होने से प्लुतोदात्त ..की प्राप्ति ही नहीं थी; तब उस प्लुतोदात्तकी अप्राप्त्यर्थ श्रीकैयटको