सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 1–10

सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 1–10

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- 6 IIIIIIIII CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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' श्रालोक ' - ग्रन्थमालाका छठा सुमन ( संरक्षक - श्री पं ० मुरारिलालजी मेहता, कलकत्ता ) सनातनधर्मका विश्वकोष एवं महाभारत-श्रीसनातनधर्मालोक अखण्डानन्द पुस्तकालय श्री संख्या हिन्दुधर्मके विविध विषय विषय... १६२ लोकहित तथा वेद, पुराण, प्रत्यक्ष घटनायें प्रन्यास प्रणेता-पं ० दीनानाथशर्मा शास्त्री सारस्वत, विद्यावागीश, विद्याभूषण, विद्यानिधि [ भूतपूर्व प्रिन्सिपल स ० ध ० सं ० कालेज, मुलतान ] प्रिंसिपल सं ० हिं ० महाविद्यालय, रामदल, दरीबाकलां, देहली -६ प्रकाशक-श्रीनारायण शर्मा ' राजीव ' सारस्वत शास्त्री ( बी.ए. ) प्रभाकर श्रीसनातनधर्मालोक - ग्रन्थमाला कार्यालय फर्स्ट बी ० १६, लाजपतनगर, नई देहली १४ विजयदशमी ] सं ० २०१६ [ मूल्य १६ ) CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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प्रकाशक-श्रीनारायणशर्मा ' राजीव ' शास्त्री सारस्वत, श्रीसनातनधर्मालोक - ग्रन्थमाला कार्यालय फर्स्ट बो ० १६, लाजपतनगर; नई देहलो १४ प्रथम - संस्करण सोलह मूल्य एस रुपये प्रभाकर मुद्रक--जमना प्रिंटिंग वर्क्स पीपल महादेव, देहली । CC - 0. Ankur Joshi Collection * श्रीः * उपक्रम “ आलम्बे जगदालम्बे हेरम्बचरणाम्बुजे । शुष्यन्ति यद्- रजः - स्पर्शात् सद्यः प्रत्यूहवार्धयः ॥ ” सर्वावलम्ब - श्रीभगवान्की अकम्प - अनुकम्पा तथा हमें नही प्राच करव यदि नव्य मान्य- सफ वदान्य ( दानी ) महानुभावोंके सहयोग और पूज्य पूर्वजोंके वरद-हस्त एवं गुरुजनोंके आशीर्वाद तथा शुभचिन्तकों की शुभाशंसासे पृष्ठ म ' श्रीसनातनधर्मालोक ' - प्रन्थमालाका यह षष्ठ सुमन विकसित हो हम रहा है । यद्यपि सनातनधर्मका प्राचीन साहित्य ही अपने मिल संरक्षणार्थ पर्याप्त है; तथापि आजके स्वैराचार - प्रधान युगने उसे तदन आक्षिप्त करके साधारण जनताको सन्देहके झूले में डाल रखा विक है । उसी प्राचीन सनातनधर्मकी अंशतः सेवा करना इस ग्रन्थमालाके प्रकाशनका मुख्य ध्येय है । सनातनधर्मियोंने सनातनधर्मके संरक्षणार्थं आजतक बहुत खर्च किया है, यह द्रव्ययज्ञ है; यह भी आवश्यक . उससे उत्तम ज्ञानयज्ञ सनातनधर्म - संरक्षक साहित्यका है । द्रव्ययज्ञका सम्वन्ध बाहर से है, ज्ञानयज्ञका भीतरसे ज्ञान दोनोंका सामञ्जस्य अपेक्षित होता है; तभी सफलता ईंटोंका न उ है; पर हैं, निर्माण स्थित । कर्म-मिलती होता है | सनातनधर्मके विरोधियोंका ' खण्डक ' - साहित्य — जिसमें प्रायः आव असत्य एवं छलसे शास्त्रोंके अर्थ बदलनेका ब्लैकमार्कीट किया संन्य सेठ-जाता है - बढ़ता ही चला जा रहा है; पर स ० ध ० का ' मण्डक ' साहित्य तो नहीं - सा है, उसमें कोई वृद्धि नहीं हो रही - यही देखकर Gujarat. An eGangotri Initiative

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[ ख ] हमें इस क्षेत्र में अवतीर्ण होना पड़ा है । इसमें मेरा कुछ भी नहीं है; जो कुछ है, वह प्राचीन साहित्य का है । हमने केवल प्राचीन साहित्यके अक्षरोंको नये सांचे में ढालकर आगे - पीछे करके उन्हें इस ग्रन्थमाला में अपनी शैली से फिट कर दिया है । यदि इसे देखकर आजके विद्वान् भी सनातनधर्म की सिद्धिकेलिए नव्यरूपमें कुछ लिखने लगे; तब हम अपनी श्रतिशयित-न्य सफलता समझेंगे । रद- ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ' मूल ग्रन्थ संस्कृत में है, और दशसहस्र-सासे पृष्ठ में है । यदि हमें उसके प्रकाशनार्थ प्रोत्साहन दिया जाता; हम पहले उसे ही प्रकाशित करते; पर उसमें हमें प्रोत्साहन नहीं अपने मिला; हाँ, हिन्दी में उसके प्रकाशनार्थ कुछ सहयोग मिला । तदनुसार पाँच पुष्पोंके विकसित होनेके अनन्तर यह छठा पुष्प रखा विकसित हुआ है | इस हमारे पास न इस ( ' आलोक ' ) के प्रचार करनेके साधन हैं; टोंका न उतना समय, न धन, न सब्जबाग दिखलाने की चालबाजियाँ पर हैं, तथापि जो यह मन्थरगतिसे सही, कुछ उन्नति करता जा रहा र्माण है; इसमें हमारा कुछ पुरुषार्थ नहीं, यह तो ' केनापि देवेन हृदि कर्म- स्थितेन, यथा नियुक्तोस्मि तथा करोमि ' के अनुसार अपने आप लती होता जा रहा है । ' आलोक ' - पाठकोंको यह जानकर बहुत प्रायः आश्चर्य तथा प्रसन्नता होगी कि इस ज्ञानयज्ञमें आहुति प्रायः किया संन्यासियों एवं पीठाधीशों तथा ब्राह्मणोंकी पड़ रही है । इसमें एडक ' सेठ साहूकारोंका पर्याप्त हाथ होना चाहिये था; पर अभी वह खकर [ ग ] यथेष्ट प्राप्त नहीं हो रहा । यदि वे अपने द्रव्यके कुछ अंशका विनियोग इस ' आलोक ' के विकाशार्थं कर दें; तो यह शीघ्र ही उद्योतित होकर फैले हुए तमको दूर करनेमें सहायक होकर भूली - भटकी जनताको सुपथ दिखलानेवाला सिद्ध हो जाय । अस्तु वे अपने कर्तव्यका स्वयं पालन करेंगे, और हमने अपना कर्तव्य पालन करना है । इसमें द्रव्य देकर प्रोत्साहन देनेवाले बम्बईके श्री पं ० रेवाशङ्करमेघजी शास्त्रीका इस ग्रन्थमालाको वियोग सहना पड़ा ही था; पर विविध प्रकारोंसे हमें प्रोत्साहन देनेवाले ' सिद्धान्त ' के स ० सम्पादक, सनातनधर्मप्राण श्रीमान पं ० दुर्गादत्तजी त्रिपाटि-महोदयका भी असह्य - वियोग इसे सहना पड़ा है । ' सिद्धान्त ' ( काशी ) का ‘ वर्णव्यवस्था - विशेषाङ्क ' बहुत उत्तम रूपमें निकलवा-कर वे ( श्रीत्रिपाठी जी ) उसके प्रधान - सम्पादक श्री पं ० गङ्गाशङ्कर-जी मिश्रमहोदय तथा ' धर्मसंघ के प्रवर्तक अनन्तश्री जगद्गुरु-शङ्कराचार्य स्वामी श्रीकृष्णवोवाश्रमजी महाराज एवं अनन्तश्री-स्वामी करपात्रीजी महाराजको और हमें भी चिरसन्तन करके स्वर्गेके देवता बननेके लोभसे इस संसारको छोड़ गये । इनके आगे - पीछे सनातनध मैके प्रचारक विद्वान पं ० श्रीदेवनायकाचार्य-जी तथा श्रीपं ० अखिलानन्दजीका भी अत्यन्त वियोग हो गया है । इससे हमें बहुत दुःख हुआ; परमात्मा इन्हें सद्गति - प्रदान करें । अस्तु — यह ग्रन्थमाला जनताको उपयोगिनी सिद्धे हुई है - यह CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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[ घ ] प्रतिदिन आनेवाले पत्रोंसे सिद्ध हो रहा है । पत्रों में पूर्व प्रकाशित हमारे इसी महाग्रन्थके ही निबन्धोंका सनातनधर्म के चोटी के नेताओंों, उपदेशकों एवं महोपदेशकोंने भी अपने ग्रन्थों तथा व्याख्यानोंमें उपयोग किया है; इससे हमें प्रसन्नता के साथ ही साथ यह बोध भी हुआ कि- हम ठीक- दिशामें चल रहे हैं । गत पुष्पमें सनातनधर्म के आचार - विचार - संस्कार एवं पर्वोंके वैज्ञानिक - रहस्य बताये गये थे; अब इस पुष्पमें सनातनधर्मके शास्त्रीय एवं आवश्यक़ विषय रखे गये हैं, इनका ज्ञान भी बहुत आवश्यक है । इस पुष्पमें जगद्गुरु- शङ्कराचार्य श्री १००८ स्वामी कृष्ण-बोधाश्रमजी महाराज पूर्वकी भांति सहायक बने हैं; श्रीचरणोंने ही पूर्ववत् दण्डिस्वामी श्री १०८ भूमानन्दजी महाराज तथा दानवीर पं ० कृष्णचन्द्रजी शर्मा बैंकर्सको भी सहायक बनवाया है । इसके साथ ही जगद्गुरुजीने गत पुष्पका प्रचार भी बहुत कराया है । जगद्गुरु - शङ्कराचार्य श्रीशारदापीठाधीश्वर इस वार फिर इसके सहायक बने हैं । इस बार जगद्गुरु श्री १००८ रामानुजाचार्य स्वा ० अनिरुद्धा-चार्यजी महाराज भी इस प्रन्थमाला के सहायक बने हैं; श्रीचरणोंने आगेकी अपनी सहायता का आश्वासन भी दिया है । इसके बाद महामण्डलेश्वर तपोमूर्ति स्वा ० प्रकाशानन्दजी महाराज, तथा स्वामी श्री १००८ वैष्णवाचार्यजी महाराज श्रीदरबार पिण्डोरीधाम भी सहायक बने हैं । दक्षिण अमेरिका के श्री पं ० लोकनाथजी शर्मा भी इसके १०० ) के सहायक बने हैं, आगेकेलिए उन्होंने [ ङ ] आप वासन भी दिया है; साथ ही साथ इन पुष्पोंको खरीद - बेचकर वह. वे उनकी सुगन्धको देश - विदेशमें फैला रहे हैं । इस बार विष मुलतान के सुप्रसिद्ध - सनातनधर्म - प्रेमी मलिक श्रीमघवद्दत्तजी- अभ जगन्नाथजी भी इसके सहायक बने हैं; आगे भी उनकी सहायता अपर चलती रहेगी - यह उन्होंने विश्वास दिलाया है । और इन्होंने ही क श्रीराधाकृष्णजी कपूर महोदय ( सस्ती हैंडलूम फैक्ट्री मेरठ ) को संरच तथा अन्य महोदयको भी जो अपना नाम प्रकाशित कराना नहीं सहा चाहते - सहायक बनवाया है । सहा इसके बाद ' कल्याणके सञ्चालक, बहुतसे सुन्दर निबन्ध माल प्रकाशित करके सनातनधर्मका प्रचार करनेवाले श्री जयदयालजी गोयन्दका - महोदय भी इस पुष्पसे सहायक बने हैं । आशा है वाम आगे भी इनकी सहायता प्राप्त होती रहेगी । पूर्व की भांति से ० लिय श्री तेजभानजीकी प्रेरणा से से ० श्रीभाँगीराम - छबीलदासजी अतः बम्बईने भी सहायता भेजी है । तथा मुलतानके श्री पं ० बाल- मह मुकुन्दजी दैवज्ञ तथा पं ० नन्दकिशोरजी शास्त्रीने सेठ श्री- दें; हरनारायणजी की भी सहायता भिजवाई है । श्री पं ० रामेश्वरजी बनें शास्त्री - मूंडवाने- जिन्होंने पहले हमारी ग्रन्थमालाको स्वयं सहा-यक बनकर चालू कराया था; तथा ग्रन्थोंको बिकवाया भी था; -इस बार फिर ५१ ) की सहायता दी है । उनकी तथा वैद्यश्रीपं ० गोव वनमालिदत्तजीकी प्रेरणा से सेठ पूषाराम - रामप्रसादजी इनाणी, ( रोल ) भी १०१ ) के सहायक बने हैं । हम इन सबको हार्दिक दिय धन्यवाद देते हुए अन्य महोदयों को भी प्रेरित करते हैं कि— CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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[ च ] आप भी इस ग्रन्थमालामें अपनी शुद्ध कमाईका भाग दें, जिससे कर वह शीघ्र ही पूर्णरूपमें प्रकाशित हो जाए । इसके बाद फिर इसे वार विषयानुसार पृथक् - पृथक् प्रन्थोंमें प्रकाशित करनेका विचार है । जी- अभी तक ग्रन्थमाला अपने पैरोंपर खड़ी नहीं हो सकती कि-अपना प्रकाशन - व्ययं स्वयं कर सके; अतः संरक्षक तथा सहायकों-ही की आवश्यकता रहती है । अभी तक भी कोई महोदय नया संरक्षक नहीं बना । संरक्षकका १००० ) नियत है । संमान्य-नहीं सहायकका ५०० ), मान्य - सहायकका २५० ) और साधारण सहायकका १०० ) । प्रेरकोंको इधर ध्यान देना चाहिये । ग्रन्थ-मालाको उन्हींका आश्रय है । बन्ध अमूल्य कोई भी न ले । नजी यह ध्यान रहे कि हमें इस ग्रन्थमालामें जो भी सहायता है वा मूल्य प्राप्त होता है, वह सब श्रागेके पुष्पोंके प्रकाशनार्थ जमा कर ० लिया जाता है । उसका एक पैसा भी अपने काममें नहीं लगाया जाता; सजी अतः कोई भी महोदय इन ग्रन्थोंको बिना मूल्य न ले । यदि कोई ल- महोदय अधिक सहायता न भी कर सकें; तो ग्रन्थका मूल्य अवश्य श्री- दें; और इस ग्रन्थमालाके प्रचार तथा विकवाने में अवश्य सहायक रजी बनें । इससे अग्रिम पुष्पके प्रकाशनमें सहायता मिल जाती है । सहा- प्रस्तुत पुष्प । था; - प्रस्तुत - पुष्प में ' ब्राह्मणभाग भी वेद है ' ' क्या प्राचीन भारत में पं ० गोवध था? ' पुराणोंके आक्षेपों पर विचार, वर्णव्यवस्था जन्म-णी, सेवा गुणकर्मसे, आदि बहुत महत्त्वपूर्ण विषयोंपर विचार दिक दिया गया है । प्रकरणवश मानसकी प्रसिद्ध - चौपाई ' ढोल, के [ छ ] गँवार, शूद्र, पशु, नारी ' इसके याथातथ्य पर भी विचार किया गया है । कागज बहुत मँहगा होगया है और उसका मिलना भी कठिन हो रहा है; फिर भी प्रेसाध्यक्ष श्रीदिनेशजी -महोदय की कृपासे हमें कागज उपलब्ध होगया, और हमने पञ्चम - पुष्पसे भी. इसके अधिक ( कुल ६६० ) पृष्ट रखे हैं । इस पुष्प तथा गत पुष्पोंका मूल्य भी कुछ बढ़ाना पड़ा । यदि ग्राहकगण एक - एक अन्य ग्राहक देने का उद्योग कर दें; तो गत - पुष्प शीघ्र समाप्त हो जावें. और नयेकेलिए क्रयराशि इकट्टी हो जाया करे । इस बार प्रेसने अपना बहुत कार्य होनेसे हमारी इस पुस्तक के प्रकाशन में आशातीत विलम्ब कर दिया है; बहुत महोदयोंकि इस पुष्पके भेजनेकेलिए पत्र आये; पर हम क्या कर सकते थे; इससे यह ग्रन्थमाला पाठकोंको अभिरुचित है यह जानकर हमें अपने परिश्रमकी सफलता अनुमित होती है । अधिकारी - विद्वानोंसे प्रार्थना है कि यदि विचार में कुछ त्रुटि रह गई हो; जिसका रहना असम्भव नहीं; तो उसकी सूचना १ दे दिया करें, जिससे आगे ध्यान रखा जा सके । निवेदक-विजयदशमी दीनानाथ शर्मा सारस्वत शास्त्री विद्यावागीश सं ० २०१६ [ प्रिंसिपल संस्कृत महाविद्यालय. दरीबा कलाँ, ] देहली -६ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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ज J श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) के तथा ग्रन्थकार के सम्बन्ध में कुछ विद्वानोंके भावोंका संक्षेप । ( १ ) श्रीविद्यागुरुजीका श्राशीर्वाद - ' अकाट्य तर्क तथा प्रमाणों-द्वारा अपने विषयको पूर्ण समर्थ करनेवाले तुम्हारे अपूर्व अनुपम अलौकिक - लेखों को पढ़कर अत्यन्त आह्लादका अनुभव करते हुए प्रभुसे प्रार्थना करता हूँ कि वे तुम्हें दीर्घायु प्रदान करें, जिससे धर्म- सेवा इससे भी अधिक करके तुम अपने तथा धर्म-प्रेमी जनताके जीवनको सफल कर सको ' ( विद्याभूषण श्री-हीरानन्दशर्मा शास्त्री - अम्बाला सिटी ) । ( २ ) आपका प्रकाशन मानव समाजको सन्मार्ग दर्शानेवाला है । आधुनिक कालके मनुष्यों में नवजीवन उत्पन्न करनेवाला सच्चा इन्जेक्शन है । जिस मनुष्य के हृदय पटल पर आपका यह ' इन्जेक्शन ' पड़ चुका है, उसपर अपने जीवनपर्यन्त पाश्चात्य -भौतिकवादका प्रबल - इन्जेक्शन कुछ भी प्रभाव नहीं डाल सकता । अतः मैं आपके ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के ५ म पुष्पका हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ ' । ( रतनलाल आर्य डीडवाना, राजस्थान ) । [ यह महोदय ' आलोक ' के चार पुष्पोंके लेने से पूर्व कट्टर - श्रार्य-समाजी थे । श्रच वे पञ्चम - पुष्पके मँगाने के अवसर पर सनातनधर्मी हैं ' प्र. ] ( ३ ) ' श्रीयुत महायशस्कशास्त्रिमहोदयेषु ' आलोक ' आलो-कितः, प्रसन्नता जाता । सनातनधर्मस्य श्रीमतामयं परमोपकारः ' ( श्रीभगवदाचार्यस्वामी ) । ( ४ ) छपाई, सफ़ाई, कागज उत्तम है । मतभेद होते हुए भी ग्रन्थ उपयोगी है, और स्थल - स्थल पर आपकी विद्वत्ता, अनुसंधान तथा परिश्रम ज्ञात होता है ।.. ( श्रीशिवपूजनसिंह जादूसम्राट्, वैदिकगवेपक - कानपुर ) । [ झ ] ह ( ५ ) यह ग्रन्थ एक प्रकारसे सव्ध ० का ज्ञानकोष है । इसमें श्र हिन्दुधर्मके आचार - विचार एवं पर्व तथा उनका वैज्ञानिक - रहस्य है । लेखकने १६ संस्कारों पर अत्यन्त सुन्दर प्रकाश डाला है । व ... पुस्तकमें धार्मिकतत्त्व वैज्ञानिक ढंग से समझाये गये हैं । मा अपने विषय पर लेखकका सराहनीय अधिकार है ' । ( श्री दीनानाथ- हम ' दिनेश ' भार्गव, सम्पादक ' मानवधर्म ' देहली ) । सम ( ६ ) पञ्चमपुष्पमालोक्य नितान्तं समतुष्यदन्तरङ्गम् । रम- धम णीयविवेचन - चातुरीधुरीणं, श्रुत्यनुकूलतर्क - सौगन्ध्य बन्धुरं, विश विशालवेदशास्त्र - कान्तारसञ्चरणश्रमापहरं, सनातनधर्म मर्मा-विष्कारकर्मण्यलङ्कर्मीणम्, आर्यसमाजीयदुर्विचारपारावार-मन्दरायमाणं, वैदिकसिद्धान्त - सिद्धान्जनायमानं, युक्तिवेंशारद्य- शन परिपाक - सीमान्तशैलायमानं तत्रभवतां लेखपाटवं नूनममृतायते - नाथ नश्चेतसि । तदिदं धर्मप्रचारकार्य नवतरुणानां मनसि दुर्विचार-घनतिमिरमपसारयेत् । पण्डितानां मनः- सरोजेषु स्वानन्दसुगन्ध- पृष्ठ मुद्वेल्लयेत् । तर्कशौण्डानां च दुस्तर्कताण्डवमवखण्डयेद् - इति पूर्व वाढं विश्वसिमः ।. ' ( श्री भालचन्द्रविनायकमुले शास्त्री काव्य- भगव तीर्थैः, प्रवचनकारः, श्रीक्षेत्रत्रयम्बकेश्वर - नासिक ) । भी श ( ७ ) ' पञ्चम- पुष्प मुझे बहुत पसन्द आया । इसमें आपने बादल खूब परिश्रम किया है । ' श्रीगणेशका मङ्गलाचरण, और ' ॐ ' अपन निका गणेशमूर्तिका प्रतिपादक ' आदि अन्त में अच्छा रहा । ' गीताका गूढ उद्देश्य ' मुझे बहुत भाया । वैसे तो सभी संग्रह अच्छा हुआ स्कूल, है ।-- ( श्री रणछोड़दास ' उद्धव ' गीतालङ्कार, धर्मभूषण, साहित्य-पढ़ा, रत्न, श्री रणछोड - प्रकाशनमन्दिर महिदपुर ( म ० भा ० ) । शास्त्री ( ८ ).. ' आप - श्रीकी परमपूज्या जननीको हम अपने अन्त: - कालेज करणसे अनेकानेक धन्यवाद देते हैं कि- जिन्होंने हमारे लिए आपश्रीसदृश विशिष्ट - प्रौढपाण्डित्यपूर्ण प्राज्ञरत्नको प्रकट किया । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative