सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 11–20

सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 11–20

पृष्ठ 11

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[ अ ] हम चिर- कृतज्ञ ही नहीं, अपने नष्ट - धनको प्राप्त कर एक विशेष-झमें आनन्दका अनुभव कर रहे हैं; और भविष्य में करेंगे, और इस्य आपसे निरन्तर साभिमान रहेंगे । आपश्रीने अपने शुभ - जीवनमें है । वह ठोस कार्य किया है, जो वाणीका अविषय है । इस ग्रन्थ-I माला से पूर्व भी बहुत कालसे अनेक पत्रादिकोंमें आपके लेख ाथ- हम्गत किये हैं । आपश्रीकी अलौकिक प्रतिभाका प्रभाव आज समस्त - भारतकी भित्ति में अति होगया है । यह ग्रन्थमाला . धर्मकी अनुपम - सेवा है ' ( श्रीजगन्नाथ मिश्र कर्मकाण्ड - शास्त्रार्थ-चुरं म, विशारद - हाथरस ) । र्मा- ( ६ ) ‘ भारतीयाचारविचाराणां रहम्यज्ञानाय सुप्रसिद्धैर्मनी T र- षिभिः श्रीदीनानाथशास्त्रिभिः सनातनधर्मालोक -- ग्रन्थमाला - प्रका-रद्य- शनद्वारा महत्तरं श्लाघनीयं च कार्य सम्पादितम् ।... ' ( श्रीकेदार-ते- ' नाथ शर्मा सारस्वतः संस्कृत रत्नाकरसम्पादकः, देहली ) । ार- ( १० ) ५ म पुष्प देखकर ही हृदय आनन्दसे भर गया । कुछ न्ध- पृष्ठ पढ़कर तो सारा अन्तरात्मा ही आनन्दमय बन गया । मैंने इति पूर्व ही कहा था कि- आपका यह निष्काम उद्योग अवश्य त्र्य- भगवान्की कृपाका पात्र बन जायगा । आशा है कि अन्य सुमन भी शीघ्र प्रकाशित होंगे । धार्मिक जगत् पर जो अन्धकारमय प बादल छाये हुए थे, वे सव नष्ट - भ्रष्ट होकर सनातनधर्म फिर ॐ अपना उज्ज्वल प्रकाश दिखाकर जगत्को नास्तिकता के भंवरसे का निकालेगा । ' ( श्रीरामचन्द्र बी ० ए ०, रि ० हैडमास्टर आर्यहाई-स्कूल, अम्बाला ) । हुआ न्य- ( ११ ) ' आपका प्रयत्न प्रशंसनीय है, जिस विषयको उठाकर पढ़ा, उसीमें पूर्णताका अनुभव हुआ । ( श्रीघनश्यामचन्द्र-शास्त्री विद्यामार्तण्डः, प्रिंसिपल ऋषिकुल- ब्रह्मचर्याश्रमसंस्कृत तः- कालेज, लक्ष्मणगढ़ - सीकर ) । ना । CC - 0. Ankur Joshi [ द ] ( १२ ) यह होते हुए भी सनातनधर्मके शाश्वत - संरक्षक परमेश्वरकी प्रेरणा से उन पाखण्ड मय - कुतर्कों के निरसन के लिए समय - समयपर विद्वज्जन प्रादुर्भूत होकर उन कुशङ्काओं से उत्पन्न अन्धकारके उच्छेदनका प्रयास करते रहते हैं । ऐसे प्रयासशील-विद्वानोंमें हम निःसंकोचरूपसे श्रीसारखत- महोदया सम्मानके साथ नाम ले सकते हैं । श्रीशास्त्रीजी अनेक श्रत्यन्त वर्षांस अपनी ओजस्विनी लेखनी द्वारा सव्ध की जो सेवा कर रहे हैं, वह अभूतपूर्व है । अधिक लिखना सूर्यको दीपक दिखाने-जैसा होगा । ' आलोक ' - प्रन्थमालाके अब तक प्रकाशित पुष्पोंका अध्ययन करनेपर इस कथनकी सत्यता पाठकपर स्वयं व्यापक-रूपमें प्रकट हो जायगी । संक्षेपमें इस ग्रन्थमालाको सव्ध विश्वकोष कहा जाय; तो प्रत्युक्ति न होगी । इसके अध्ययनसे का पढ़नेवालेके मनकी सनातनधर्मविषयक विपरीत - भावना एवं शङ्काओंका पूर्ण समाधान तो होगा ही, वह दूसरेकी भी वैसी कुशङ्काओंका निवारण करके सव्ध की सेवामें महत्त्वपूर्ण सहयोग देसकता है | ( आनन्दशेखर सहकारी - सम्पादक, दैनिक-सन्मार्ग वाराणसी ) एतदादिक याचित - सम्मतियां बहुत अधिक आई हुई हैं, स्थानाभाववश सभी प्रकाशित नहीं की जा सकीं । ' आलोक'-ग्रन्थमाला स्वयं खरीदकर तथा दूसरोंसे खरीदबाकर सप्तम पुष्पके प्रकाशनमें सहयोग दें । निवेदक-नारायणशर्मा ' राजीव ' सारस्वत शास्त्री, हिन्दी प्रभाकर [ प्रकाशक ] Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 12

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[ ठ ] श्रीसनातनधर्मालोक - ग्रन्थमाला ( छठे पुष्प ) की विषय - सूची ( हिन्दुधर्मके विविध - विषय क्रमाङ्क विषय ( क ) उपक्रम ( ख ) सम्मतियां एवं विषय - सूची ( धर्म एवं वेदका स्वरूप ) १. मङ्गलाचरणम् २. सनातन हिन्दुधर्मका स्वरूप ३. सनातनधर्मकी प्राचीनता एवं महत्ता ४. सनातनहिन्दुधर्मके व्याधारभूत शास्त्र ५. वेदस्वरूपनिरूपण ( ब्राह्मणभाग भी वेद है ) ६. स्वा. द. के छः हेतुयोंकी समीक्षा ७. स्वा. द. के वेदके उदाहरण 5. अन्य विद्वानोंके तर्कोंकी समीक्षा ६. वेदोंका विषय ' यज्ञ ' १०. वेदाधिकारि - विचार ११. देवमन्दिरप्रवेशपर वैदिक - दृष्टि १२. छुआछूत हटानेके कुछ? १३. ढोल, गँवार, शूद्र, पशु, नारी, ( वेद - पुराण में, गाय अघ्न्या ) 198. क्या प्राचीन भारतमें गोवध होता था? • ११. क्या गौयोंकी वधशाला वेदसम्मत है? १६. क्या बृहदारण्यकमें बैलका मांस विहित है? १७. वसिष्ठस्मृति एवं शतपथका अतिथि सत्कार ) पृष्ठ संख्या ( क - छ ) ( ज - ट ) 9 २-११ १२-३६ ३६-४४ ४४-१७८ १४-१२४ १२६-१४० १२४-२६, १४६-७८ १४०-१४६ १७८-२०६ २०३-२१६ २१६-२७३ २७३-३१० ३११-४७१ ३१२-३२० ३२०-३३० ३३०-३४३ [ ड ] क्रमाङ्क विषय १८. अतिथिकी ' गोव्न ' संज्ञा पर विचार १६. ऐतरेय ब्राह्मणका व्यतिथि सत्कार, २०. शतपथमें पुरोहितका गवाशन २१. वसिष्ठ - वचन २२. एक प्रश्न वार २३. रन्तिदेवादि यज्ञ २४. गोमेघ्र--२५. आदिका गोयज्ञ वधूकी गोधर्मपर स्थिति २८. उत्तररामचरितका वत्सतरी- विशसन २६. समांस - मधुपर्क ३०. याज्ञिक - पश्वालम्भ ३१. ' अश्वालम्भं गवालम्भं कलौ पञ्च विवर्जयेत् ' ३२. गोशब्दके अर्थ तथा उपसंहार ३३. गायकी प्रत्यक्ष विशेषता ( पुराण - चर्चा ) ३४. क्या पुराणों में वेदविरुद्ध अंश है? ३५. इन्द्रकी कथा ३६. वृन्दा- जलन्धरकी कथा ३७. चन्द्रमाका गुरुतल्पगमन ३८. भगवान् कृष्णका सुदर्शनचक्र ( पुराणोंके कृष्ण पर आलोचनात्मक दृष्टि ) अगस्त्य ऋषिका समुद्रपान ४०. स्त्रीसे पुरुष वा पुरुपसे स्त्री होना CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 13

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[ ड ] क्रमाङ्क विषय ४१. नेत्रादिद्वारा जलानेमें उपपत्ति ८-३६० ४२. पौराणिक बहु - सन्तानोंपर विचार --३७१ ( सैद्धान्तिक चर्चा ) -350 -३५० ४३. ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( ग ) -३८८ ८-२०२ ४४. ४५. -१३ - ११७ ४६. -४३६ ४७. -४४० -४४२ -४४४ -४५४ ४१. - ४१६ ५०. ( जन्मना वर्ण - व्यवस्था ) " " ( घ ) ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( ङ ) ( क्या वर्णव्यवस्था गुणकर्मसे है? । क्या ब्राह्मणादि वर्णं नहीं? क्या ब्राह्मणादि जाति नहीं? चातुर्य मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ( परिशिष्ट ) पुराणों जैसी समाचारपत्रोंकी प्रत्यक्ष घटनायें ' नमस्ते - प्रदीप ' का निर्वाप ४६८ ( ग ) उपसंहार, अन्यमाला - परिचय -४७१ पृष्ठ संख्या ७३४-७४० ७४७-७६३ ७६४-७८८ ०८१-८१३ ८१४-८५१ ८२१-८७६ ८७-८८७ ६३२-६४१ ३१, ३४२ [ संशोधन - ६२० अवतारों की सूचीके क्रम मेदमें यह जानना ५१३ चाहिये कि - जैसे - वेदोंमें ' ऋचः सामानि छन्दांसि ' आदि मन्त्रोंमें कहीं ४६ ' साम'का नाम ' यजुः से पूर्व, और कहीं पीछे, कहीं अथर्व यादिका आगे, ५०० कहीं पीछे; इससे चेदकी श्रप्रमाणता नहीं हो जाती, वैसे पुराणोंमें भी ५१० अवतारक्रमभेदमें जान लेना चाहिये ] ६८७ ७१२ ०३४ CC - 0. Ankur Joshi Colled on Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 14

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' श्रीसनातनधर्मालोक ' प्रणेता शास्त्री दीनानाथ श्री दीनानाथशर्मा शास्त्री सारस्वतः विद्यावागीशः, विद्याभूषणः, विद्यानिधिः प्रिंसिपल सं. हिं. महाविद्यालय रामदल, दरीबाकलां, देहली । हिन्दुधर्मके विविध विषय ( १ ) मङ्गलाचरणम् ।

वन्दारु - मन्दारमिन्दुभूषणनन्दनम् ।

श्रमन्दानन्द - सन्दोह - बन्धुरं सिन्धुराननम् ' ॥

' सुहवमग्ने कृत्तिका रोहिणी चास्तु भद्र ं

मृगशिरः शमार्दा ।

पुनर्वसू सूनृता चारु पुष्यो भानुराश्लेषा प्रयनं मघा मे ॥

पुण्यं पूर्वा फल्गुन्यौ चात्र हस्तः चित्रा शिवा स्वाति सुखो मे अस्तु

राधे विशाखे सुहवाऽनुराधा ज्येष्ठा सुनक्षत्रमरिष्ट मूलम् ॥

अन्नं पूर्वा रासतां मे पाढा ऊर्ज देवी उत्तरा श्रावहन्तु ।

अभिजिन्मे रासतां पुण्यमेव श्रवणः श्रविष्ठाः कुर्वतां सुपुष्टिम् ॥

श्रा मे महत् शतभिषग वरीय या मे द्वया प्रोष्ठपदा सुशर्म । ज ( प्रा रेवती चाश्वयुजौ भगं मे श्र मे रथिं भरण्य श्रावहन्तु ' ॥ ( अ ० १६७१२, ३, ४, ५, ) ' मेधां मे देवः सविता श्रादधातु मेधां मे देवी सरस्वती यदधातु । उ मेघां मे अश्विनौ देवावधत्तां पुष्कर खजौ ' ॥ ( 9170 21815 ) हि ' श्रीसनातन धर्मस्याऽऽलोकोऽयं प्रकाश्यते । तमांस्यनेन दूरे स्युर्धः मार्गः स्फुटीभवेत् ॥१ ॥ पर

पूर्व पञ्चाप ( मुलतान ) वास्तव्य इदानीं देहलीं श्रितः । श इमं ग्रन्थं विनिर्माति श्रीदीनानाथ - नामकः ॥२ ॥ तो

सारस्वतस्य तस्याऽयं प्रयत्नः शास्त्रिणो महान् । अ साफल्यमेतु पूर्ति च भगवत्कृपया ध्रुवम् ॥३ ॥

CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 15

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श्रीसनातनधर्मा लोक ( ६ ) सनातनधर्मका स्वरूप ३ न ( २ ) सनातन - हिन्दुधर्मका स्त्ररूप । न जातु कामान्न भयान्न लोभाद् धर्मं त्यजेद् जीवितस्थापि हेतोः । ( महा ० उद्योग ० ४०।१२ ) ( पुरुष काम, लोभ, भय वा जीवनके लिए भी धर्मका त्याग करे । ) स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् । ( गीता २ । ४० ) ( इस धर्मका थोड़ा अंश भी अनुसृत किया जावे; तो बड़े भयसे रक्षा हो जाती है । )

धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा, लोके धर्मिष्ठं प्रजा उपसर्पन्ति ।

1 धर्मेण पापमपनुदन्ति, धर्मे स प्रतिष्ठितम् तस्माद् धर्मं परमं वदन्ति ॥

( कृष्णयजुर्वेद तै ० प्रा ० १०।६३ ) ( धर्म ही सब जगत्की प्रतिष्ठा है । धर्मिष्ठके पास ही प्रजाएँ जाती हैं । धर्मसे हो पाप दूर होता है । धर्म में सबकी प्रतिष्ठा ( स्थिरता ) है । इसी कारण धर्मको सबसे बड़ा कहा जाता है । ) ,, ) हिन्दुधर्मको जानने के लिए उसके सनातनधर्मका स्वरूप तथा 1 उसके मुख्य ग्रन्थ वेदका स्वरूप जानना आवश्यक है । पहले हम 5 ) हिन्दुधर्मका निरूपण करते हैं । -हिन्दुधर्मका प्राचीन नाम ' सनातनधर्म ' है । हम उसका यहाँ पर स्वरूप बताते हैं । कई लोग कहा करते हैं कि – ' सनातनधर्म ' शव्दकी रचना आजकल की है, यह शब्द पहले नहीं था । पहले ' तो हमारे धर्मका ' वैदिक ' यह विशेषण होता था, ' सनातन ' नहीं । अतः ‘ वैदिकधर्म ' वा ' आर्यधर्म ' यह नाम रखना चाहिये, ' सनातनधर्म ' नहीं । जो आप लोग अपने आपको ' सनातनधर्म ' कहते हैं, आप सब ' पौराणिक ' ही हैं, और ' पौराणिक धर्म ' मध्यकालीन अर्वाचीन ही है ' । इस पर हम विचार करते हैं । हमारे धर्मकी ' सनातनधर्म ' यह संज्ञा सृष्टि के आदिकाल से ही है । हमारे धर्मका नाम ' सनातनधर्म ' भी है । ' पुराणधर्म ' भी, और ' वैदिकधर्म ' भी । उसमें सनातनधर्मके दो प्रकार के विग्रह होते हैं । सनातनस्य धर्मः; ' सनातनो वा धर्म:: ' इनसे सनातनधर्म का बोध अनायास हो सकता है । पहले विग्रह में ' सनातन ' परमात्मा का धर्म होनेसे इसका नाम ' सनातनधर्म ' है । अथर्ववेदसंहिता में कहा है- ' सनातनमेनमाहुः उताऽद्य स्यात् पुनर्णवः ( १०/८/२३ ) ' उस देवको सनातन ( पुराण - पुरुष नित्य - पुरुष ) कहते हैं; परन्तु वह आज भी नया है । स ० प्र ० की टिप्पणी में स्वा ० वेदानन्द इसका अर्थ लिखते हैं- ' भगवान्को सनातन - नित्य कहते हैं, वह आज भी नया है । ( पृ ० २१ ) ' यो देवमुत्तरावन्तमुपासातै सनातनम् ' ( अ ० १० | ८ | २२ ) ' जो उच्चपद देनेवाले सनातन देवकी उपासना करता है, वह सुखी तथा अन्नयुक्त रहता है ' । सम्पूर्ण विश्व में सनातनधर्मका डंका बजानेवाली भगवद्गीता में भी कहा है ' त्वमव्ययः शाश्वत - धर्म गोप्ता, सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ' ( ११।१८ ) ' तुम सनातन पुरुष हो; अतः सनातनधर्मके रक्षक हो ' । ' योसौ अतीन्द्रियग्राह्यः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः ' ( मनु ० १७ ) यहाँ सर्वत्र ' सनातन ' यह परमात्माका नाम है, उसके धर्म होनेसे ' सनातनधर्म ' यह नाम है । यह धर्म भी नित्य है, आज भी नया CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 16

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) है । यह ' सनातनका ' अर्थ ठीक भी है क्योंकि — ' सना भवः सनातनः ' । ' सना ' सदाको कहते हैं । सो सदा रहनेवालेको ' सनातन ' कहते हैं । यहाँ ' सना ' शब्द से ' - अव्ययेभ्यः ट्युट्युलौ तुट् च ' पा ० ४।३।२३ ) इस सूत्र से ' ट्य, लू ' प्रत्यय होकर ' तुटू ' का आगम होता है । ' युवोरनाकौ ' ( ७ । १ । १ ) इससे ' यु ' को ' अन ' होकर ' सनातन ' शब्दकी सिद्धि होती है । नित्य रहनेवालेको ' सनातन ' कहते हैं । ऐसा परमात्मा ही तो है, उस परमात्माका धर्म ' सनातनधर्म ' सम्पन्न होता है । परमात्माका न कभी जन्म कहा जासकता है. अतः यह धर्म आदिमान् नहीं, न कभी उस परमात्माको अपने पद से रिटायर किया जा सकता है, अर्थात्-वह कभी मरता नहीं । ऐसा ही तो ' सनातन ' हो सकता है; उस सनातनका धर्म ही सनातनधर्म हुआ करता है । फलतः ईश्वर-प्रचालित धर्मका नाम ही ' सनातनधर्म ' हुआ । तब यह धर्म सृष्ट्यादिसे ही चालू प्रतिफलित हुआ । हम इस कल्पकी सृष्टिका आदि तो कह सकते हैं कि इसे १,६७,२६ ४६, ०५८ वर्ष हुए; र कितने कल्प बीत चुके, इसे कोई निश्चित रूप से नहीं कह सकता है; अतः सृष्टि - प्रवाह अनादि होने से यह धर्म भी अनादि सिद्ध होता है । जब यह ईश्वरका धर्म है, और ईश्वर अव्यय- पुरुष है; तब उसका धर्म भी अविकारी रहता है; अतः यह सनातन धर्म भी अविकारी रहता है । इसमें परिवर्तन नहीं होता, यह एक रूपमें रहता है । इसीलिए इस धर्म में प्रमाणवादको उत्तम स्थान सनातनधर्म का स्वरूप दिया गया है, तर्कको इसमें उत्तम स्थान प्राप्त नहीं । कार ' तक यह है कि — तर्क अप्रतिष्ठित हुआ करता है; क्योंकि - वह पुरुषर्क विद्यासे उद्भावित हुआ करता है । श्रीयास्कमुनि अपने निरुक्तो I पुरुषकी विद्याको अनित्य मानते हैं, इसीलिए एक तर्कको अ नि तकं गिरा दिया करते हैं । तर्क एक वकालत हुआ करती है, उस सत्यको भी असत्य और असत्यको भी सत्य किया जा सकता है अ तक उसमें चाहिए प्रतिभाकी उत्कृष्टता, और चाहिए मस्तिष्को उस तन्तुओं की तीव्रता ।. कर एक मद्यव्यसनी - परन्तु उत्कृष्ट वकील अपने पक्ष हो व्यक्तिका पक्ष गलत समझने के कारण उसके विरोध में ऐसे प्रक ' य तर्क दे रहा था कि - प्रतिपक्षी वकील भी वैसे तर्क उद्भावित न क प्रम सकता । अतः वह प्रसन्न हो रहा था, और समझ रहा था कि-रस मद्यका दौरदौरा आज इसका तीव्र हो रहा है । तब अपने मुन्शीं वकीलको सुझाया कि यह आप क्या कर रहे हैं? अपने ही प कम वालेका खण्डन कर रहे हैं! वकील सँभल गया । उसने का जव कि— प्रतिपक्षका वकील इतने ही तर्क दे सकता था, वे मैंने रख दिए, अब मैं इनका प्रत्युत्तर शुरू करता हूँ ——यह कहक इस उसने विविध धाराओंके विकल्पोंका निर्देश करके उन तक धर्म चूर्ण - विचूर्ण कर दिया । तभी तो महाभारतमें कहा है – ' तर्कोऽप्रतिष्ठः ' ( ३।३१३'११ ' रचि तर्कके पांव नहीं रहा करते । न्यायशास्त्र तर्कशास्त्र माना जाता । पर वह भी तर्ककी अप्रतिष्ठितता को जानता है, अतः कहता सन CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 17

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) सनातनधर्मका स्वरूप | कारण ' तर्कः प्रमाणसहितो बादे साधनाय उपालम्भाय च अर्थस्य भवति ' - पुरुषर्क ( १ । १ । १ ) ' अयं तर्कः तत्त्वज्ञानार्थः न तत्त्वज्ञानमेव, अनवधारणात् । निरुक्तो अनुजानाति श्रयमेकतरं धर्मं कारणोपपत्त्या, न तु अवधारयति, न को निश्चिनोति... सोयं तर्कः प्रमाण सहितो वादे प्रदिष्टः ( १ | १ | ४० ) उसो अर्थात् – तर्क तत्त्वज्ञान के लिए तो है पर तत्त्वज्ञान नहीं । पुरुष कता है तर्कसे एक बातको जान तो सकता है, पर उसकी अप्रतिष्ठिततासे नस्तिष्को उसे निश्चित नहीं कर सकता, अतः तर्कको प्रमाण सहित ही प्रयुक्त करना चाहिये, प्रमाण - निरपेक्ष नहीं । प्रमाण - रहित तर्क न्याय न क्ष होकर न्यायाभास हो जाता है - यह न्यायदर्शनके शब्द हैं, से प्रका ' यत्पुनरनुमानं ( तर्कः ) प्रत्यक्षागमविरुद्ध ' न्यायाभासः सः ' ( १ | १ | १ ) सो वतन क प्रमाणवादको अधिक आदर देने से ही यह सनातनधर्म सर्वत्र एक-था कि- रस तथा अविकारी है । मुन्शी · दूसरा इसका विग्रह है- ' सनातनो धर्मः सनातनधर्मः ' यह ही प कर्मधारय समास है । नित्य रहनेवाला धर्म सनातनधर्म है । सो सका जब किसी वस्तुका सनातनधर्म हटा दिया जायगा, तब वह वस्तु मैंने भी नहीं रहेगी । धर्मके बिना धर्मीकी सत्ता नहीं रह जाती 1 कहक इसको यों भी कहा जा सकता है कि - धर्मको नष्ट करनेवालेको तकन धर्म मार दिया करता है, और धर्मके रक्षककी धर्म रक्षा करता है । तभी श्रीमनुजीने कहा है- ' धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति १३'११ ' रक्षितः । तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मों हतो वधीत् ' ( ८।१५ ) । जाता यह बात ठीक भी है और विज्ञान सम्मत भी । अग्निका हता है- सनातनधर्म उष्णता एवं प्रकाश - प्रदान है । यदि उसकी उष्णता नष्ट की जायगी तो अग्नि, अग्नि ही न रह पावेगी, वह भस्म हो जाएगी । आपको रोटी न खिलाकर अन्धेरे में डालकर ठोकरें ही खिलाएगी । जलका सनातनधर्म तरलता, शीतलता तथा प्यासको दूर करना है; जब वह उसका सनातनधर्म नष्ट होगा तो जल, जल ही न रहेगा; कीचड़ हो जावेगा । ' हम उस अग्नि या जलसे कोई अपेक्षित लाभ प्राप्त न कर सकेंगे । तब यह स्पष्ट है कि-सनातनधर्म, देश - कालानुसार बदल भी नहीं सकता । अग्निकी प्रकटता में देश - कालानुसार प्रक्रियाभेद हो सकते हैं, जलको पृथ्वी से खींचने में देश - कालानुकूलतावश भेद हो सकते हैं, पर उसका सनातनधर्म बदल नहीं सकता । पहले ' दिए तले अँधेरा ' होता था, अब दीएके ऊपर अँवेरा हो गया है । पर उस अग्निका ऊपर जाना और प्रकाशधर्म या उष्णता कोई बदल नहीं सकता । फलतः सनातनधर्म भी मर नहीं सकता या बदल नहीं सकता । यदि इसे हम मारेंगे तो हम भी मरेंगे । यदि इसके स्वरूपको बदलेंगे तो हम भी वे न रहकर कुछ और हो जायेंगे - यह स्वाभाविक है । अतः इसमें इसकी रक्षार्थ काटनेवाले - तर्कका अवलम्बन लेकर बनानेवाले प्रमाणका आश्रय रखा गया है । तर्ककी अव्यवस्थितता तो यही होती है कि हम आज जिन तर्कों को बड़े धड़ल्ले से कह रहे होते हैं, पांच - छः वर्षोंके बाद हम उन्हें स्वयं काट रहे होते हैं । सो यह तर्क भूपकका प्रतीक होता है । इस ' मूषकसे बोधकी प्राप्ति ' कभी नहीं हो सकती । हमारे सनातनधर्म में इस मूषकको हमारी श्रद्धाके प्रतीक प्रमाणभूत गणेशजीने अपना CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 18

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म श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) वाइन बना रखा है, उसे नीचे दबा रखा है, उसे स्वतन्त्र नहीं छोड़ा गया है । उसे स्वतन्त्र कर देने पर तो वह तर्क- मूषक खण्डन की— काटने की प्रवृत्तिको नहीं छोड़ेगा । जब इस सनातनधर्मका मूल ही सनातन - पुरुष है; जैसा कि महाभारत में कहा है – ' सनातनस्य धर्मस्य मूलमेतत् सनातनम् ' ( आश्वमेधिक ६१३४ ) तब इसकी रक्षा भी उसीपर आ पड़ती है, उसके अवतार समय - समय पर इसकी रक्षा करते हैं, जैसे कि श्रीमद्भागवत पुराण में कहा है- ' त्वत्तः सनातनो धर्मो रक्ष्यते तनुभिस्तव ' ( ३।१६।१८ ) । इसको इसीलिए अमृत - धर्मं कहा गया है— ' सनातनोऽमृतो धर्मः ' ( महा ० वनपर्व ३१३ ६६ ) । इसी सनातनधर्मके वैदिक धर्म, स्मार्त धर्म, पौराणिक धर्म— यह अंग हैं; पर इन सब धर्मोकी समुच्चित ( मिली हुई ) संज्ञा · सनातनधर्म है । संसारके सम्पूर्ण धर्म, मूलभूत सनातनधर्मकी शाखायें हैं; उनमें कई अर्वाचीन शाखायें त्रुटित भी हैं; कई जी और कीटों से व्याप्त हैं, कई टूटी हुई हैं; पर उनकी हरियाली देखकर लोग उन पर लट्टू हो जाते हैं और मूलको धूल में देख वे उसकी परवाह नहीं करते । वे मूलमें पानी न देकर उन शाखाओं को ही पानी दिया करते हैं; पर इसका परिणाम नहीं विचारते । इसी धर्मकी स्थिरतार्थ इसको तर्कमात्र पर न रखकर इसको प्रमाणवाद पर रखा गया है । हम पूर्व संकेत कर चुके हैं कि--तर्क में स्वार्थ होता है और दूसरोंके हितका विघात होता है, पर सनातन धर्मका स्वरूप 10 तपोबलसे प्रमाणरूप - परमात्मा - द्वारा जो ज्ञान ऋषियोंको प्राप्त हुए बाद करता है, वह जहां निर्भ्रान्त होता है वहां उसमें दूसरेका बिघा का नहीं होता, अतः वह ज्ञान निष्पक्ष होनेसे उपादेय होता है. श्रव्य उसमें वह यथाधिकार व्यवस्था अवश्य बताता है । पिता की श्र सत्पु से जो काम बड़े लड़केको दिया जाता है, वह छोटेको नहीं दि उन जाता । बड़े लड़के को उठाने के लिए एक मन का बोझ दिया जा प्रत्यु है पर छोटेको वैसा करनेके लिए वाध्य नहीं किया जाता, इसलि इस धर्म में सीमित ८-१० नियम नियत नहीं; किन्तु इनमें देशा का पात्र - भेद से बहुत नियम हैं; अतः यह धर्म सभीका उपयोगी ह है, सभी का अस्तित्व रखनेवाला सिद्ध होता है । उन्हीं नियमों का सं काव्य ही प्रमाण- पुञ्ज है । वह प्रमाण- पुञ्ज यह है - मनुजी कहते हैं- प्रस्तुत ' वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । एतच्चतुर्विधं प्रा है, साक्षाद्धमंस्य लक्षणम् ( २।१२ ) इन्हें साक्षात् धर्मका लक्षण मा मुगल गया है । इनमें वेदको मुख्य रखा गया है । इस वेद दो भागों में विभक्त है - मन्त्र और ब्राह्मण । उनमें म ब्राह्मणात्मक वेदके चार भाग हैं; उन चार भागों की महाभाष्यानुस ११३१ संहितायें हैं | उतना ही ब्राह्मरण - भाग परमात्मकर्तृ क उस धर्म म व्याख्यान है; क्योंकि - अपने मन्त्र ( मत्रि गुप्त - भाषणे ) प्रिय व्याख्यान भी उसके अतिरिक्त कोई नहीं कर सकता । फिर यहाँ । ज्ञानको नियमरूपमें व्यवस्थित करनेवाली स्मृतियां हैं । जि सभी मन्त्र - भाग उतना ही ब्राह्मण - भाग और उतना ही स्मृति - भाग है, उ स्मृतिमें धर्मसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मशास्त्र अन्तर्भूत हो जाते हैं । स हितैषी CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 19

सनातन धर्मलोक ६, पृष्ठ 19 का मूल पृष्ठ
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१० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) नाप्त हु बाद है ' सदाचार ' सत्पुरुषों का आचार । मन्त्रभागात्मक वेद श्रव्य-विधा काव्य हैं और फिर हैं लोहे के चने, स्मृति है उनकी व्यवस्थापक । ता है श्रव्य - काव्यको दृश्य - काव्यका रूप देनेवाला होता हैं उदाहरण, की सत्पुरुषोंका आचार | वह है पुराण- इतिहास | पुराण - इतिहास में हीं दि उन वेद और स्मृतिके पारम्परिक ( परम्परा से आए हुए ) उदाहरण-दया जा प्रत्युदाहरण देकर उनको स्पष्ट कर दिया गया है । इसलि वेदका उपदेश है ' सत्यं वद ' । वह श्रव्यकाव्य है, और लोहे देशका का चना है, कैसे चबाया जाय? अतः वह केवल सुना ही जाता योगी है, और काव्यमें पड़ा ही रहता है । जब उस उपदेशको दृश्य-का सं ' काव्य ' राजर्षि- हरिश्चन्द्र ' के उपाख्यान रूप में पुराण - इतिहास हते हैं. प्रस्तुत करता है; तब उसका सर्वसाधारण पर भारी प्रभाव पड़ता वैधं प्रा है, सभी उसका अनुसरण करने के लिए तत्पर हो उठते हैं । क्षरण मा मुगलोंके क्रूरकालमें, अंग्रेजोंके कूटनीतिक मोहककाल में, और इस धर्मनिरपेक्षता के उपेक्षाकालमें हम अपने धर्म पर जो सुस्थिर नम हैं - इसका श्रेय इन्हीं पुराण- इतिहास को है । यह सर्वमान्य है । ष्यानुस फिर आगे कहा है- ' स्वस्य च प्रियमात्मनः ' वेदादि शास्त्रों में - क उस धर्म में भी बहुत से विकल्प हैं, उनमें जो तुम्हें अपने आत्माको षणे ) प्रिय लगे. उसीका अनुसरण करो - यह सूचित किया गया है । फिर यहाँ किसीको बाध्य नहीं किया जाता कि - तुम अवश्य ही धर्म के । जिस सभी विकल्पों को अनुसृत करो, नहीं, जो तुम्हारे आत्माको प्रिय -भाग है, उसी धर्म - विकल्पको अनुसृत करो । कैसा है यह जीवमात्र-हितैषी सनातनधर्म? उसीकेलिए ही भगवद्गीता में कहा है-सनातनधर्मका स्वरूप 21 ' स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ' ( २४० ) तुम इस धर्मका अंशतः भी यदि अनुसरण करोगे, तो तुम्हें यह धर्मं बढ़े भयसे बचाएगा । इस विशाल धर्मको कितना संक्षिप्त कर दिया गया है, गागर में सागर भर दिया गया है । इसी सनातनधर्मका ही तो यह सिद्धान्त है - ' सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयाद् मा त्र यात् सत्यमप्रियम् । प्रियं च नानृतं न यात्, एष धर्मः सनातनः ' ( ४ | १३८ ) ' सत्य बोलो, प्रिय बोलो, सत्य भी अप्रिय मत बोलो, प्रिय भी असत्य न बोलो - यह सनातनधर्म है । यह सनातनधर्मका चित्र - चित्रण है । यही इसका संक्षिप्त स्वरूप है । जब हम इसके इस स्वरूपको समझ जायेंगे; तब अपने भारतको ' अमर भारत ' कर सकेंगे! यदि हम किसीसे दव कर, देशकालानुकूल असत्य पर सत्यका मुलम्मा चढ़ाकर अपने धर्मको विरूप करने में तत्पर हो जायेंगे, तो हम भी वही सृष्टिके आदि पुरुष नहीं रहेंगे, हम विरूप हो जायेंगे, फिर संसार हमें पहचान भी न सकेगा । जो संसार हम पर विश्वास करता था; अब वह हमें अर्वाचीन रूपमें देखकर शंकित - दृष्टि से देखेगा | जिससे हमारा गौरव देश - विदेश में है, जिससे भारतका मस्तक उन्नत है, यदि हमने उस सनातनधर्मको न अपनाया, दूसरोंके असत्यकी चकाचौंध देखने में हम उत्सुक रहे, तो अपनी ज्योति हम नष्ट करवा लेंगे । हमें तब अन्धकार ही अन्धकार मिलेगा ।; तब हमारा पतन अनिवार्य होगा । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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सनातन धर्मलोक ६, पृष्ठ 20 का मूल पृष्ठ
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११ श्रीसनातनधर्माल्लोक ( 1 ) ( ३ ) सनातनधर्मकी प्राचीनता एवं महत्ता । हम गत निबन्ध में ' सनातन हिन्दुधर्मका स्वरूप ' बता चुके; अब इसमें सनातनधर्मकी प्राचीनता तथा महत्ता बताते हुए पूर्व-निबन्धकी शेष पूर्ति करते हैं । ' सनातनधर्म ' के दो प्रकारके ( षष्ठीतत्पुरुष तथा कर्मधारय समास ) विग्रह बताये जा चुके हैं । परमपुरुष परमात्मा ' सनातन ' होता है - यह हम कह ही चुके हैं । जीवात्मा भी ' सनातन ' होता है- ' ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ( गीता १५/७ ) । उस सनातन पुरुषका पुस्तक वेद भी ' सनातन ' है, उसका कार्य संसार भी ' सनातन ' है; तब उसका धर्म ' सनातन ' ही होगा । अन्य जो तथाकथित धर्म हैं, वे नित्य नहीं: और न परमात्मा से बनाये हैं । परमात्मासे बनाये हुए धर्म में नियमोंकी इयत्ता नहीं होती । उसमें उत्सर्ग - अपवाद आदि अनेक व्यापक नियम होते हैं । उसमें सार्वभौमता और सार्वकालिकता होती है; इसी कारण उसमें परिवर्तन नहीं होता; इसीसे वह सनातनधर्म होता है । मनुष्यों से बनाये हुए धर्मो में ही ६-१० नियम होते हैं । अतः वे धर्म एकदेशी तथा कालानुसार परिवर्तनशील होते हैं, सनातन नहीं होते । परन्तु परमात्मा से बनाये हुए धर्ममें सभी प्रकारके अधिकारियों के हितार्थ विविध नियम होते हैं । सनातनधर्म परमात्मा के समकालमें ही होता है, इसलिए उसे वेदमें ' पुराणधर्म ' भी कहते हैं । जैसे कि- ' धर्म पुराणमनुपालयन्ती ' ( अथर्व ०१८ | ३ | १ ) यहां पर सतीधर्म जो पुराणधर्म है - का प्रतिपादन सनातनधर्मकी प्राचीनता एवं महत्ता किया गया है । ‘ अयं पन्था अनुवित्तः पुराणो ' ( ऋ ० शासं ० ४ । १८ । १ ) यहां ' पुराण - धर्म ' का वर्णन किया गया है । अर्वाचीन लोग हमारे धर्मका नाम ' पुराणधर्म ' यह द्वेष - वश ही कहते हैं, परन्तु वेदने हमारे धर्मका नाम ' पुराणधर्म ' कहा है; तब द्वेष क्यों? पुराणधर्मका मी ' सनातनधर्म ' की भांति ही विग्रह है - ' पुराणस्य धर्मः, पुराणो वा धर्मः ' । ' पुराण ' यह भी परमात्माका नाम है । जैसे कि - ' महाभारत में - ' पुराणपुरुषो विभुः ' १८६।५४ ) । श्वेताश्वतर - उपनिषद् में - ' वेदाहमेत मजरं पुराणं सर्वगतं विभुत्वात् ' ( ३।२१ ) ' प्रत्नमिन्द्र! हवामहे ' ( अथर्व ० यहाँ इन्द्र ( परमेश्वर ) का विशेषण ' प्रत्न ' है, पूर्व स्थल में है । ' प्रत्न'का अर्थ भी ' पुराण ' है । अतः उसके प्रवर्तित ‘ सनातनधर्म ' वा ' पुराणधर्म ' नाम है । ‘ मा नः पथः पित्र्यान्मानवाद् अधिदूरं नैष्ट ' ( ऋ ० सं ० ( वनपर्व सर्वात्मानं य ध २० / २४।६ ) ' सनातन ' • स धर्मका भी तब का ८ | ३० | ३ ) सम्प्र ' हे ' देवताओ! हमें पितृपरम्परा ' प्राप्त मार्गसे मत दूर करो । ऐसा ' हम पित्र्य मानवधर्म ' सनातनधर्म ' ही है । ' वच्ये सनातनं धर्मं नारायण-प्रका मुखाच्छ्र, तम् ' ( श्रीमद्भागवत ७ १११५ ) ' मूलं हि विष्णुर्देवानां यत्र वाक्य धर्मः सनातनः ' ( श्रीमद्भागवत १० | ४ | ३६ ) इत्यादि प्रमाणों से जहाँ ' पुरुष ' सनातनधर्मे ' शब्द की प्राचीनता सिद्ध होती है; वहाँ सनातनधर्म की ' सत्प भी प्राचीनता और परमात्म- मूलकता सिद्ध है । पादित इस प्रकार ' त्वत्तः सनातनो धर्मो रक्ष्यते तनुभिस्तव ' ( श्रीमद्भा ० ३ सम ३।१६ ८ ) यहाँ परमात्मा के अवतारोंसे सनातनधर्म की रक्षा कही है । मानते a ' अन्यस्मिन् हि नियुञ्जाना धर्म हन्युः सनातनम् ' ( मनु ० ६६४ ) यहाँ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative