सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 181–190

सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 181–190

पृष्ठ 181

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ३३५ ३३६ सिद्ध हो नहीं; अतः वात्स्यायन - मत पुरातन ऐतिह्य पर आश्रित है । क्या ब्राह्मणों हुआ और रामायण, पुराण तथा धर्मशास्त्र आदि की भाषाका नथ ब्राहाण थोड़ा - सा अन्तर इन ग्रन्थोंकी शैली और विपय - भेदके कारण स्वाभाविक हुआ है " । इससे हमारे कथन की पुष्ट हुई । उक्त महाशयजी ही ' वैदिक वाङ्मयका इतिहास ' इस अपनी श्री जयदे पुस्तक के द्वितीयभाग ( १६० पृष्ठ ) में लिखते हैं कि - ' वही ऋषि इतिहास है । ब्राह्मणों का प्रवचन करते थे, और वही धमशास्त्र- यादिका भी । अतः द है कि भाषा के साक्ष्य पर कोई बात सिद्ध नहीं की जा सकती । भाषा तो है, वह भी विषयानुसार भिन्न - भिन्न प्रकारको हो सकती है ' । ऋषिगण हो ' भारतवर्षका वृहद् इतिहास ' ( १ म भाग ७२ पृष्ठ ) में श्री-रचते थे; हो मगवद्दत्तजी लिखते हैं- ' जिन ऋषियोंने चरक, काठक आदि लौकिकप्रत्यये संहिताएं और ब्राह्मण तथा कल्पसूत्र प्रवचन किये, उन्हीं ऋषि - मुनियोंने रणनि और इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र और त्र्यायुर्वेद ग्रन्थोंकी लोकभाषा - संस्कृतमें ( पृ ० १ ) रचना । यही कारण है कि वर्तमान - धर्मसूत्रों के अनेक बचन - ए. महान तथा याज्ञवल्क्य और महाभारत के अनेक पाठ ठीक ब्राह्मणसदृश-इतिहास मापा में हैं " । काम पू इसीको स्पष्ट करते हुए अनुसन्धाताजी आगे लिखते हैं-टायवा ' पं ० ईश्वरचन्द्रजी ( भूतपूर्व दयानन्दोपदेशक विद्यालय गुरुदत्तभवन रचयिता है । लाहौर के दर्शनाध्यपक ) ने ' ब्राह्मणग्रन्थों के द्रष्टा और इतिहास-सत्य - इति पुराण तथा धर्मशास्त्र के रचयिता ऋषियों का अभेद ' नामक एक विरुद्ध हे वृहद् ग्रन्थ रचा है । इस ग्रन्थ में उन्होंने सिद्धू किया है कि— करते, पर ' शतपथ - ब्रह्मणकी भाषा वैदिक प्रवचन- शैलीका भाषा होने तथा ' इ वै ' श्रादि प्रयोगोंकी बहुलता पर भी याज्ञवल्क्य स्मृतिकी भाषाले प्रप्रालि Joshi शतपथका अतिथि सत्कार ३३७ Collect, Gujarat. सदृशता रखती है । याज्ञवल्क्यस्मृतिके अनेक पाठ पाणिनीय व्या-करण के प्रभावसे उत्तरोत्तर बदले गये हैं । पहले वे पाठ पुरातन लोकभाषा में थे " ( पृष्ट ७३ ) । उक्त ग्रन्थ के ५४ पृष्ठमैं तो आपने अन्य भी स्पष्टता कर दी है । वे लिखते हैं- ' याज्ञवल्क्यस्मृति ' वाजसनेय [ शतपथ ] ब्राह्मणके प्रवक्ता [ श्रीयाज्ञवल्क्य ] ने बनाई थी इस विषयका विशद विवेचन पं ० ईश्वरचन्द्रजीके ग्रन्थ में देखिये । याज्ञवल्क्यस्मृतिके १०० से अधिक प्रयोग पाणिनिसे पूर्व के हैं । ' श्रीमगवद्दत्तजी बी ० ए ० की यह बात समूल भी है । शतपथ-ब्राह्मणके अन्त में कहा है- ' आदित्यानि इमानि शुक्लानि यनूषि वाजसनेयेन याज्ञवल्क्येन आख्यायन्ते ' ( १४ | ६ | ४ | ३३ ) यहाँ पर श्रीयाज्ञवल्क्यको सूर्यके द्वारा शतपथ ब्राह्मणकी प्राप्ति कही है । इसका स्पष्टीकरण महाभारत के शान्तिपर्व में है । यहाँ याज्ञवल्क्यने मिथिलाके राजा जनकको यह कहा था- ' मयाऽऽदित्याद् अवाप्तानि यजूंषि वसुधाधिप '! ( ३१८ । १ ) ततः शतपथं कृत्स्नं चक्रे ' ( ' चक्रे'का यहाँ प्रकथन अर्थ है, क्योंकि ' कथां कुरुते ' आदिमें पाणिन्यनुसार उसका प्रयोग देखा गया है ) ' संपरिशेष च ' ( ३१ ।११ ) इससे स्पष्ट है कि - श्रीयाज्ञवल्क्य मिथिलामें उसके राजा जनकके पास रहा करते थे । यही याज्ञवल्क्यस्मृतिमें भी द्रष्टव्य है । उसमें कहा है - ' मिथिलास्यः स योगीन्द्रः [ याज्ञवल्क्यः ] क्षणं ध्यात्वाऽब्रवीन्मु-नीन् ' ( १ | १ | २ ) उसी स्मृति में श्रीयाज्ञवल्क्यने अपनी ' बृहदारण्यक ' के लिए-सन्ध ० २२ An eGangotri Initiative

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३३८ श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) जो कि शतपथका अन्तिम ( १४ वां ) काण्ड है- - कहा है- ज्ञेयं ' चारण्यकमहं [ याज्ञवल्क्यः यद् आदित्याद् ( सूर्याद् ) अवाप्तवान् ' ( प्रायश्चित्ताध्याय ४।११० ) यहाँ श्रीयाज्ञवल्क्यने अपनी स्मृति में अपनेसे प्रवचन किए हुए बृहदारण्यक ( शतपथके १४ वें काण्ड ) की सूर्य द्वारा प्राप्ति कही है । इससे स्पष्ट है कि - शतपथका दृष्टा तथा याज्ञवल्क्यस्मृति - प्रणेता श्रीयाज्ञवल्क्य कोई भिन्न - भिन्न नहीं; किन्तु एक व्यक्ति हैं । जब ऐसा है, तो उक्त ' महोक्षं महाजं वा पचेत् ' इस शतपथके वचनका शतपथ-ब्राह्मणमें तथा उसका उद्धरण देनेवाली वसिष्ठस्मृति में भी वही अर्थ इष्ट है, जो ' याज्ञवल्क्यस्मृति ( १।५।१०६ ) में श्रीयाज्ञवल्क्यने कहा है, अर्थात् उस बड़े वैल वा बड़े बकरे का ' यह आपके ही हैं ' ऐसा अतिथिको कहना ही इष्ट है - उनका मारना इष्ट नहीं । इसी कारण शतपथानुसारी उक्त वसिष्ठस्मृतिके वचनमें टीका-कार श्रीकृष्णधर्माधिकारीने भी ऐसी व्याख्या लिखी है - ' गृहागताय अभ्यागताय • महोक्षाणं - बलीवर्द, महाजं वा पचेत् भवदर्थमिति उपकल्पयेत्, न पाकं कुर्यात् प्रत्यभ्यागतमुक्षाऽसम्भवात् । एवमस्मै अभ्यागताय आतिथ्यं सत्क्रियां क्रियासुः ' ( ४८ ) । तब इस वचनसे ' वैलको मारना ' अर्थ याज्ञवल्क्यसे प्रतिकूल ही है । यही वेद में ' अतिथिग्व ' शब्द से कहा है - जिसका अर्थ श्रीसायणाचार्य ने अपने अथर्ववेदभाष्य में ' अतिध्यर्था गावो यस्याऽसौ अतिथिग्वः ' ( २०/२१/८ ) किया है । सो यह अतिथिसत्कारार्थ है, न कि गोवधार्थ । CC - 0. Ankur Joshi Collection शतपथका अतिथि सत्कार अथवा — याज्ञवल्क्यस्मृतिके ' उपकल्पयेत् ' शब्द का अर्थ ' दार भी हो सकता है । ' उत्तररामचरित ' के चतुर्था में उद्धृत ' श्रोत्रिय पय अभ्यागताय वत्सतरीं महोक्षं वा निर्व॑पन्ति गृहमेधिनः ” इस पर्द कर सूत्र के वचन में - जो कि शतपथके अनुसार ही है- ' निर्वपति ' है, अर्थ ‘ ददति ' ( देते हैं ) ही है । टीकाकारोंने भी यही लिखा है । भा अमरकोष ( २ | ७ | ३० ) में मी ‘ निर्वपरण ' शब्द दानके पर्यायवाचक है । तब उक्त सब स्थलोंमें ' दान ' का अर्थ मी सम्भव है, ए तथ ' मारना ' अर्थ तो असम्भव है । वेदमें गाय - बैल की बड़ी महिमा बताई गई है । उसमें गाय पाच ' अघ्न्या ' ( देखो यजुर्वेदसंहिता ८४३ ) तथा वैलको ' अन्य ' दिखे वन अथर्ववेदसंहिता ६ | ४ | ७ ) कहा है; तब उनकी हिंसाका प्रह उपस्थित नहीं होता । इस प्रकार ' गौर्मधुपर्क: स्यात् स्नातकर ' पक उपस्थिताय राज्ञे वा ' ( २८ ) इस ' आपस्तम्बश्रौतसूत्र ' के वच उसक भी ' गोदान ' इष्ट है, ' मारना ' किसी भी शब्दका अर्थ नहीं । क्या अर्थ ' र्हयेत् ( पूजयेत् ) प्रथमं गवा ' ( ३३ ) इस मनुवचनमें से साथ अभिमत है कि — स्नातकको गाय देकर उसका सम्मान करे । भी वस्तुतः ' गौर्मधुपर्कः ' आदि में लुप्ततद्धित - प्रक्रिया से गाया यहा नवनीत, घृत, दुग्धादि मधुपेय ही इष्ट है, जो अतिथि, वा आ ' पक्कः वा वरको दिया जाता है । ' नामांसो मधुपर्कः स्यात् ' का भाव यह है शब्द कि — उक्त वस्तुएँ मांसल ( स्निग्ध ) हों, पुष्टिकारक हों, निःसारर ' पक्क हों । ‘ मांस’में ‘ अर्शआदिभ्यो ऽच् ' ( अष्टा ० ५/२/१६७ ) मुझे सुलत मत्वर्थीय ‘ अच् ' प्रत्यय हुआ - हुआ है, जिसका ' मांसल ' हैं । Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 183

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ३ ॥ ३४० अर्थ ' दा पर्यवसान हो जाता है । ' श्रोत्रियार ' महोक्षं पचेत् ' आदिमें ' पच ' धातुका पूर्व कहा हुआ ' व्यक्ती-इस धर्म करण ' अर्थ ठीक सङ्गत हो जाता है - जिसे मिताक्षराकारने बताया निर्वपन्ति है, अथवा सम्पादन, जिसे श्रीसायणने ( ऋ. १।१६४।४३ ) अपने लिखा है । माध्यमें बताया है । ' परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति प्रत्यक्ष-नयवाचको विद्विषः ' ( गोपथब्रा ॰ १ | १ | १ ) इस न्याय से महान देवके काव्य वेदमें म है, तथा देवोपम ऋषि - मुनियोंके ग्रन्थों में भी कहीं - कहीं वह वह बात परोक्ष - शब्दों से कही जाती है, जिसे यथाश्रुत - ग्राही नहीं जान पाते । समें गाय. पाश्चात्य तथा पाश्चात्यानुयायी पौरस्य विद्वानोंने आपाततोदर्शी धन्य ' दिखे कर यही त्रुटि की है, जिससे यत्र - तत्र भ्रम फैल गया है । प्रश्न हो यह भी बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि- ' पाक'का केवल स्नातका ' पकाने ' ही अर्थ में प्रयोग नहीं होता; किन्तु अन्य अर्थों में भी के वचनरे उसका प्रयोग होता है । ' पाकः अहं ' ( ऋ. १०२८५ ) इस मन्त्रका नहीं । व्ही क्या यह अर्थं किया जावेगा कि - ' मारकर पकाने योग्य मैं '? श्री-नुवचनमें से सायणाचार्यने यहाँ उसका ' पक्तव्यप्रज्ञः ' अर्थ किया है । निरुक्तमें न करे । भी यही ' विपक्कप्रज्ञः ' [ सम्यग्दर्शी ] ( ३ । १२ । १ ) अर्थ किया है । यासेगा यहाँ ' पाक'का मांस पकानेकी भांति अर्थ नहीं । जैसे अन्न के लिए वा आ ' पकः ' शब्दका प्रयोग होता है, वैसे उसके पर्यायवाचक ' सिद्ध ' भाव यह है शब्दका भी प्रयोग होता है, जैसेकि - ' सिद्धमन्नम् ' | वैसे ही निःसार‍ ' पक्कप्रज्ञोऽयम् ' ' सिद्धोऽयम् ' यह पुरुषकेलिए भी प्रयुक्त होता है । ६७ ) मुलतानी भाषा में चतुर पुरुषको ' यह पक्का है, पकोट है ’ – यह कहते सा हैं । इसी प्रकार चतुर पुरुषके लिए ' विदग्धोऽयम् ' भी कहा जाता वैसिष्टस्मृतिका अतिथि - सत्कार ३४१ है, इसमें मूल धातु ' दह ' है, जिसका अर्थ जला हुआ अर्थात् पका हुआ होता है पर इससे पुरुषको न तो पकाया जाता है, न जलाया जाता है ' बुद्धिकी परिपक्कता वा पाक ' में भी बुद्धिको मारकर चूल्हे पर चढ़ाया नहीं जाता; किन्तु वहाँ पर उसकी सिद्धता एवं परिपूर्णता ही इष्ट होती है । मुलतानी मापामें पढ़े हुए को ' पढ़ा हुआ ' और अनुभवीको ' कढ़ा हुआ ' कहते हैं, यह ' कथित ' शब्दका पर्यायवाचक होता है, दूधको कथित किया जाता है, जला कर पकाया जाता है, परन्तु पुरुषमें वह अर्थ इष्ट नहीं होता है, किन्तु वह ' सिद्ध पुरुष है ' इस अर्थको रखता है, इस प्रकार ' महोक्षं पचेत् ' में भी समझ लेना चाहिये कि - वृषभको ' सिद्ध ' करके उसे पूर्ण करके अर्थात् उसे सजाकर, तैयार करके अतिथिके लिए लावे । श्रीसायणाचार्यका ' पच ' धातुका ( ऋ. ११६४।४३ ) सम्पादन अर्थ पूर्व लिखा ही जा चुका है - यहाँ भी वही अर्थ है । सो यह उसका त्याग अपने से अलग कर देना भी एक हिंसा है, पर अतिथि यज्ञादिमें वह अहिंसा ही मानी जाती है । इसी प्रकार ' पचन्ति ते वृषभान् अत्सि तेषां ' ( ऋ. १०/२८३ ) ' वृषभं पचानि ' ( १०।२७१२ ) इत्यादि मन्त्रोंकी व्याख्या भी होगई । यहाँ ' अत्सि ' का भक्षण है पर वह वेदमें हो नहीं सकता, जब उसी वेदने गायको ' अन्य ' और वैलको ' अघ्न्य ' कहकर पुकारा हो । सो या तो वृषभ - अदनसे ओषधि - विशेषका पकाना तथा खाना अर्थ होगा, या वृषमका बैल अर्थ होनेपर उसके भक्षण का भाव ' स्वीकार ' ' उपयोग में लाना ' है । इस प्रकारके प्रयोग लाक्षणिक अर्थों में CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 184

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३४२ श्रीसनातन धर्मा लोक ( ६ ) प्रायः हुआ करते हैं । यहाँ भी वैसा समझ लेने से कोई भी भ्रम न रह सकेगा | यहाँ ‘ अद् ' धातुका अर्थ ऐसा है, जैसे - ' दायाद ' में ' दायमत्तीति दायादः ' इसमें जायदादका खाना अर्थ नहीं होता; किन्तु उसका ' उपभोग - उपयोग ही अर्थ होता है- यहाँ पर भी वही समझना चाहिये । अथवा – ' उक्षा ' का अर्थ ' सोम ' भी होता है, जैसे कि - ' सोम उक्षाऽभवत् ' ( ऋग्वेदसं. के सायणभाष्य में १ । १६४।४३ ) उसीका पचन - सम्पादन यहाँ इष्ट है; यह संगत भी है । वस्तुतः महोक्षं पचेत् ' इस ब्राह्मणका मूल ' उक्षाणं पृश्निमपचन्त ' ( ऋ. १।१६४ । ४३ ) यह मन्त्र मालूम होता है; यहाँ सायणने उसका अर्थ सोम - सम्पादनका किया है; अतः ब्राह्मण में भी वही सङ्गत प्रतीत होता है कि-अतिथिकेलिए सोम- सम्पादन करना । अथवा ' उक्षा ' ऋषभकन्द भी होता है । इनके नाम सभी वैलवाचक होते हैं । मांसल होने से दीर्घायु बढ़ानेवाली ओषधियों में ' उक्षा ' वनस्पति भी है ( राज-निघण्टु व- ५ ) । वहाँ उसके ऋषभः, उक्षा, गौः, वृषभः — यह पर्यायवाचक शब्द भी आये हैं । ' अज ' का अर्थ ' अजमोदा ' भी है । ' महाजा ' यह बड़ी अजवायनका नाम भी होता है । अतिथिको भोजन - क्रियाके बाद पाचनक्रियार्थ अथवा बलवर्धनार्थ इन ओषधियोंका दान भी सम्भव हो सकता है । अथवा अजा ' व्रीह-यस्तावत् सप्तवार्षिकाः ' ( पञ्चतन्त्र काकोलूकीय ३ कथा ) ' अजैर्यज्ञेषु यष्टव्यमिति वै वैदिकी श्रुतिः । अजसंज्ञानि बीजानि नो छागं इन्तु-मर्हथ ' ( महामारत शान्तिपर्व ३३७१४ ) इस उक्ति से ' अज ' शब्दका CC - 0. Ankur Joshi Collection शतपथका अतिथि सत्कार ३ ' सात वर्षके पुराने चावल ' यह अर्थ भी है, अतिथिके लिए उन्ह पकाना वा वृषभकन्द वा सोमरसका पकाना मी इष्ट हो सकता है I परन्तु पाश्चात्य विद्वानोंने इस सर्वाङ्गीणताको न विचार ही अर्थ लिये हैं; पर वह ठीक नहीं; यह हमने सिद्ध वेद दिया है । शतपथब्राह्मणमें ( ३/१/२/२१ ) गोभक्षकको गर्भपत फि सर्वभक्षी और पापी कहा है - तब श्रोत्रियकेलिए शतपयको है आतिथ्य कैसे सम्मत हो सकता है? फलतः ' वसिष्ठस् विच वचनमें तथा उसके मूलभूत शतपथब्राह्मणके वचनमें गोवद विच शासन सर्वथा सिद्ध न हुआ । पाश्चात्योंकी इन कल्पनाओं कोई मूल्य नहीं । व्या ' गोघ्न ' अतिथिका नाम क्यों है, ' उक्षाणं वेहतं वा चरने ब्राह्म इस ऐतरेय ब्राह्मणके वचनका क्या आशय है - इसे आगे दैनि हम है-( ४ ) अतिथि की ' गोघ्न ' संज्ञापर विचार | तो भ हम ' राज्ञे वा ब्राह्मणाय वा महोक्षं महानं वा पचेत् ' ( ३१६ स्वीक इस शतपथके वचनका वास्तविक अर्थ लिख चुके हैं; पर संकेत दृष्टिकोण रखनेवाले पूर्वपक्षी कहते हैं कि - ' यह अर्थ ठीक उसने यहां अतिथि के लिए ' बैल मारना ' ही इष्ट है । तभी ' गोनो अनुज्ञ व्याकरणादिमें भी अतिथि के लिए ' गोघ्न ' शब्द प्रसिद्ध | गोष्नो यह गौतमधर्मसूत्रमें ( २ | ८ | ३० ) सूत्रके व्याख्याता श्री हरदत्त ' वध ' सिद्धिकेलिए यही शब्द दिया है, उसमें वह वृच ( पूर्वमाच अर्थकी गोबध ब्राह्मणकी साक्षी भी दी है, अतः स्पष्ट है कि - ' प्राचीन मह Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 185

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१४४. श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) के लिए उन्हो गोबध हुआ करता था । तब ' महोक्षं पचेत् ' का सम्पादन वा हो सकता व्यक्तीकरण अर्थ विचार सह नहीं ' । न विचार इसपर हम कहते हैं कि - कभी कई व्याख्याता अपनी समझमें हमने सिद्ध वेदका यथाश्रुत अर्थ समझकर वेदकी हिंसाको ' अहिंसा ' समझकर को गर्भधा फिर उसपर विचार करने की आवश्यकता नहीं समझते; अतः शतपथको वे श्रापाततः प्रतीयमान अर्थको कर दिया करते हैं; यह अधिक " वसिष्ठरानी विचार न करनेके कारणसे होता है । अब हम इस विषयपर भी नमें गोव विचार करना चाहते हैं । कल्पनाच गौतमधर्मसूत्रमें गाय - वैलकी अभक्ष्यता के प्रसङ्ग ( २ | ८ | ३० ) में व्याख्याता श्रीहरदत्तने ‘ बह्व् च - ब्राह्मणे श्रूयते ' कहकर ऐतरेय-हवा च ब्राह्मणका ' उक्षाणं वेहतं वा तदन्ते ' यह वचन दिया है; उसपर गे हम विचार अग्रिम निबन्धमें करेंगे । उसके आगे उसने लिखा है — ‘ अतिथेर्भक्ष्यम्, अन्येषाममच्यम् ' यहां उसने अतिथिकेलिए बार । तो भक्षण स्वीकृत किया है, दूसरे के लिए नहीं । भक्षणका तात्पर्यार्थ चित् ' ( ३४ ) स्वीकार वा उपयोग भी हुआ करता है ( जैसा कि हम गत निबन्धमें हैं; पर संकेत दे चुके हैं. यह उसने सोचनेका कष्ट नहीं किया । इससे अर्थ ठीक उसने सन्तोष न करके आगे लिखा है- ' वधोपि किल. तत्र ' गोध्नो अनुज्ञातः दाशगोघ्नौ ' संप्रदाने ' ( पा ० ३ | ४ | ७३ ) गौर्यस्मै हन्यते स द प्रसिद्ध गोष्नोऽतिथिरिति ' । यहां श्री हरदत्तने ' गोघ्न ' में हन्धातुका रचनेम ' वध ' समझा है । यह लिखकर उसने आगे लिखा है— ' एवं किल अर्थ हवृच ( पूर्वमाचारः, इदानीं गन्धोपि न ' अर्थात् पहले अतिथिसत्कारमें आचीन गोबधका आचार - था; अब तो: उसका गन्ध भी नहीं' पर यह CC - 0. Ankur Joshi अतिथिकी ' गोघ्न ' संज्ञापर विचार ३४१ उसका मत ठीक नहीं । उससे उद्धृत बह वृच ( ऐतरेय ब्राह्मणके वचनपर तो हम विवेचना अग्रिम निबन्ध में करेंगे ही, अब यहां उसके ' गोघ्न ' शब्द के अर्थपर विचार किया जाता है । यहां श्रीहरदत्तने यह नहीं सोचा कि यदि गाय - बैल अतिथि-. के लिए मक्ष्य है, तो फिर दूसरेके लिए अमच्य क्यों है? अतिथि-सत्कार पञ्चमहायज्ञान्तर्गत ' नृयज्ञ ' का नाम है । ' नृयज्ञ ' प्रतिदिन करना पड़ता है; यज्ञशेषका स्वयं भी भक्षण करना पड़ता है; तब श्री हरदत्तने उसका अन्यकेलिए निषेध क्यों किया? वा उसकी क्या सङ्गति होगी? अन्य के लिए यदि निषिद्ध है तो वह ' अन्य ' किसीका ' अतिथि ' बनकर जावे; तो क्या उसे उसका भक्षण करना पड़ेगा? यदि करना पड़ेगा तो अतिथिकी अनतिथिसे न क्या विशेषता रही? अतिथि आया एक, उसकेलिए घेन्वनडुहका मी हो गया, उसने उसे खा भी लिया । एक अतिथि पूर्णपशुको वध तो खा नहीं सकता; दूसरोंने उसे श्रीहरदत्त के अनुसार खाना नहीं है, तो फिर शेष पशु तो व्यर्थ हो जायगा । क्या यह ' चर्मवन्तौ महिषीं हन्ति ' ' चमड़ेकी छोटी तन्तुकेलिए भैंसका मारना ' नहीं? और फिर नृयज्ञ ' ' प्रतिदिन होगा; तो इतने बैल कहांसे आयेंगे? इन असङ्गवियोंको न सोचनेके कारण हो श्रीहरदत्तको अपाततः प्रतीयमान अर्थ करना पड़ा । आश्चर्य तो यह है कि अपना विशाल दृष्टिकोण बतानेवाले अँग्रेजी शिक्षितोंने भी इसे बिना ' ननुनच ' के मान लिया; तब इसका उत्तरदायित्व भी अब श्रीहरदत्त पर न होकर उन नवशिक्षितोंपर है । हम उस पर विचार देते हैं-Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 186

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३४६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) विचार करने से पूर्व यह बात ध्यान में देने योग्य है कि इसपर गायका नाम ' अघ्न्या ' ( यजुः वा.सं. ८८३ ) और बैलका नाम वेदमें ' अघ्न्य ' ( अथर्व ० ६ | ४ | १७ ) आया है, जिसका अर्थ है ' न मारने योग्य ' । गायका नाम निघण्टुमें ' अहो ' ( २।११ ) भी है, जिसका अर्थ श्रीदेवराजयज्वाने ' अहन्तव्या ' किया है, इसी प्रकार गायके ' अदिति ' नामका निर्वचन उसीने ' अखण्डनीया ' किया है, यह ' दोऽवखण्डने ' धातुका प्रयोग और नव समास है । इसीका निगम ' गां मा हिंसीरदितिं विराजम् ' ( यजु: १३।४३ ) यह है । अन्य किसी पशुकेलिए ऐसा शब्द नहीं आया । यदि वेदमें ' गोघ्न ' शब्द से ' गायका मारना ' इष्ट हो, तो उसका ' अघ्न्या ' शब्द के साथ वेदादि-शास्त्रोंमें परस्पर व्याघात - विरोध उपस्थित हो जाय । व्याघात होने से वेदादिशास्त्र ही अप्रमाण हो जांय । तब विचारणीय है वेदमें ' गोघ्न ' शब्दका क्या अर्थ है? वस्तुतः ' गोघ्न ' शब्द अतिथि पूजाका अर्थवाद है अर्थात् अतिथि इतना पूजनीय है कि उसके लिए परमपूजनीय गाय - बैल को भी न्योछावर कर दिया जाता है । इससे गायका मारना तात्पर्य विषय नहीं, किन्तु गायकी अपेक्षा भी अतिथिको अधिक पूजा यहां विवक्षित है । अतिथिकी महिमा वेदोंमें प्रत्यक्ष है । अथर्ववेद संहिताके अतिथिसूक्त ( १५।३।१-२-३-४-५-६-७-८-६-१०, ६६ + २६ ) के मन्त्र तो अत्यन्त स्पष्ट हैं । इस ' गायकी अपेक्षा अतिथिको अधिक पूजा करने से सर्वाधिक पूजनीय गायका अपमान हो जाता है । उस गायका अपनेसे निम्न से भी निम्न CC - 0. Ankur Joshi Collection ' गोघ्न ' संज्ञापर विचार ३४६ किये जाने के कारण होगया हुआ अपमान उसका ' वध गायक यह अपमान करानेवाला होता है ' है । वस्तुत अतिथिको ' गोधन ' कहा जाता है — यह तात्पर्य अतिथि, होने है । अथवा पृषध यही प्रकार हुआ करता है । उसमें शब्दका अर्थ न लेकर तात्पर्य ही लिया जाता है । उड़ा वाच ' महाभारत ' के कर्णपर्व में गाण्डीव धनुषकी, अति निन्दा करते हु जावा युधिष्ठिरको जब अर्जुन अपनी प्रतिज्ञानुसार मारने दौड़ा । भगवान् श्रीकृष्णने उससे कहा कि बड़े को ' तूं ' कह देना आ काशि वध हुआ करता है । तुम भी युधिष्ठिरका इसी प्रकारका ( ' तू ' व्ह ऋत्वि बध कर दो ' ( कर्णपर्व ६६८३-८६ ) । अर्जुनने वैसा ही किया तया फिर इस गुरुवधके प्रायश्चित्तार्थ जब अर्जुनने स्वयं चि योग्य जलना चाहा, तब भगवान् ने उसे अपनी ( अर्जुन की प्रशंसा करे ' अस के रूपमें आत्महत्याका उपदेश दिया । गोहन फलतः हिंसा भी अनेक प्रकारकी होती है । इस प्रकार योग्यत अर्थवादका तात्पर्य वास्तविक - हिंसा में न होकर एक उच्चो एवं उ अपमान तथा दूसरे निम्नको उत्कृष्टतर बनाने में हुआ करता है ॥ कारण ' गोध्नोऽतिथिः ' का भी वही आशय हुआ करता है कि अति गोघा गायकी अपेक्षा अत्यन्त कम होता हुआ भी अपने सत्का तब उ समय में सर्वोत्कृष्ट गायको अपनी अपेक्षा निम्नतर बनवार ' सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ' ( आहतकी अर्को ' हिंसा उसकी मृत्युकारक होती है ) ( भगवद्गीता २।३४ ) इस न्यारा यहां ' पोषक हो जानेसे ' गोघ्नोऽतिथिः ' इस नामसे कहा जाता है इसलि Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 187

सनातन धर्मलोक ६, पृष्ठ 187 का मूल पृष्ठ
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ३४६ गायको मरवानेसे नहीं । नहीं तो वह अपने लिए गोघातक ' है । वस्तुतः विधि, इसलि होनेसे ' चाण्डाल ' कहा जाता, पर उसे वैसा नहीं कहा जाता । है । अपने गुरुकी गायको अन्धेरेमें शेरके धोखे में मारनेसे शूद्र लेकर श्रवा पृषत्र माना गया । यहां तो कामपूर्वकता में मरवाने से उ वा चाण्डालवत् अतिथिको भी चाण्डाल क्यों न कहा जाता? पर नहीं कहा , दा करते जाता । दौड़ा, इसलिए ‘ दाशगोध्नौ सम्प्रदाने ' ( पा ० ३ | ४ | ७३ ) इस सूत्रपर देना उमर काशिका तथा न्यासमें कहा गया है - ' निपातनसामर्थ्यादेव गोन ऋत्विगादिरुच्यते, न तु चाण्डालादि: । श्रसत्यपि गोहनने तस्य योग्य-ही किया तया ' गोघ्न ' इत्यभिधीयते ' । इससे उस अतिथिकी गोहननमें स्वयं चि योग्यता दिखलाई गई है, गोहनन नहीं दिखलाया गया । बल्कि प्रशंसा क असत्यपि ' गोहनने ' इस शब्द से हमारा ही पक्ष सिद्ध होता है । गोहनन न होने पर भी उसे ' गोघ्न ' कहा जाता है । गोहनन में इस प्रकार योग्यता अतिथिकी वही पूर्वोक्त है कि वह गौको अपनेसे न्यून एक उच्च एवं उसे अप्रतिष्ठित बनाकर, अपमानित करके उसके हननका करता है । कारण बनता है, नहीं तो काशिकाकार और न्यासकार उस 5 अति गोघातक - अतिथिको चाण्डाल कहते, पर उन्होंने वैसा नहीं कहा । ने सत्तासे तब उस शब्द में प्रतिपक्षियोंका इष्ट अर्थं सिद्ध न हुआ । र बनवार इसके अतिरिक्त ' इन् ' धातुका ' गति ' अर्थ भी होता है, केवल अपनी ' हिंसा ' अर्थ नहीं । पाणिनीय धातुपाठ में ' हन हिंसागत्योः ' ( अ.प.अ. ) स न्यावा यहां ' हन् ' का गमन अर्थ भी माना है, केवल हिंसा नहीं । जाता है इसलिए वार्तिककार ने भी ' हन्तेहिंसायां यङि घ्नीभावो वाच्य; ' CC - 0. Ankur Joshi ' गोधन ' संज्ञापर विचार ३४६ जेनीयते ' यह कहकर जङ्घन्यते ' ' इत्यादिमें हिंसासे भिन्न गमन अर्थ भी माना है । यदि केवल ' हन् ' धातुका ' हिंसा ' अर्थ होता, तो वार्तिककारका इस वार्तिकमें ‘ हिंसा ' अर्थ कहना व्यर्थ होता । यह अर्थ कहने से सिद्ध होता है कि छन् धातुका हिंसासे भिन्न अर्थ मी होता है । एक अन्य विशेष ध्यान देनेकी यह बात है कि ' वैदिक-निघण्टु ' ( २।१४ ) में गत्यर्थक धातुयोंमें ' हन् ' धातु भी थाया है । अन्य विशेषता यह है कि निघण्टु ( २।१६ ) में वध - अर्थंवाले धातुओं में ' इन्'का प्रयोग सर्वथा नहीं है । गतिकर्मक धातुओं में वहां ' हनति, हन्ति, हन्तात् ' ( २।१४ ) यह इनके प्रयोग आये हैं, पर वधार्थक ३३ धातुओं में ' छन् ' धातुका प्रयोग सर्वथा नहीं आया, इससे वेद में ' गोघ्न ' आदि शब्दों में भी ' वध ' अर्थ कैसे हो सकता है? जब वेदमें नहीं; तब वेदाङ्ग - व्याकरण, कल्प आदिमें मी हनन अर्थ कैसे हो सकता है! तब अर्थ हुआ - गां ' हन्ति गच्छति अस्मै इति गोघ्नोऽतिथिः ' अस्मै – अतिथ्यर्थे दुग्धादिप्रापणार्थं 1 गोपार्श्वं गच्छति ' इस प्रकार अतिथि ' गोघ्न ' हुआ - उस अतिथि को दूध देनेके लिए गायके पास गमन करनेसे ' गोल ' शब्द बना । इसके अतिरिक्त ' हिंसा ' का केवल हनन अर्थ नहीं होता, किन्तु ताडन या श्राद्दनन अर्थ भी हुआ करता है । ' हंस ' शब्दका निर्वचन करते हुए निरुक्तकार श्रीयास्कने लिखा है - हंसा ' हन्तेः, घ्नन्ति अध्वानम् ' ( ४ । १३ । १ ) । यहां पर मार्ग में गमन करने वा Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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३५० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) मार्गके ताड़न करनेके अतिरिक्त हननका प्राणवियोग अर्थ सम्भव नहीं हो सकता । इसी प्रकार ' यत्र वैद्यतः ( अग्निः ) शरणम् ( भूमिम् ) अभि- हन्ति ' ( निरुक्त ७ २३/६ ) यहां पर श्रीयास्काचार्यको ' हन् ' धातुका गति ( प्राप्ति ) वा ताड़न अर्थ इष्ट है कि ' बिजुली जब पृथ्वी में प्राप्त होती है । इसीलिए श्रीदुर्गाचार्यने भी यहां व्याख्या लिखी है - ' निहन्ति - श्रभिगच्छति प्राप्नोति इत्यर्थः । ' तब ' गां हन्ति-ताडयति, अतिथये दानार्थं ताडनद्वारा गमयति - इति गोघ्नोऽतिथिः ' यह अर्थ निकला, अर्थात् पुरुष गायका इसलिए ताड़न करता है कि वह वहांसे चले और अतिथिको इसका दान किया जाय या उसे उसका सद्यः ( धारोष्ण ) दूध दिया जाय । कृदन्तों में ' हन् ' धातुसे निष्पन्न ' घन ' ( पा ० ३ | ३ | ७७ ) शब्द काठिन्य अर्थ में, ' अन्तर्धन ' ( ७८ ) देश अर्थ में, ' प्रघाण - प्रघण ' ( ७६ ) शब्द घरके एकदेश अर्थ में, ' उद्धन ' ( ८० ) स्थापन अर्थमें, ‘ अपघन ' ( ८१ ) शब्द अङ्ग अर्थ में, ' अयोघन ' ( ८२ ) शब्द वादन अर्थ में, ' स्तम्बघ्न ' ( ८३ ) शब्द गमन आदि अर्थ में, ' उपघ्न ' ( ८५ ) शब्द आश्रय अर्थमें, ' सङ्घ ' ( ८६ ) शब्द समूह अर्थमें, ' उदुध ' शब्द प्रशंसित अर्थ में, ' निघ ' ( ८७ ) शब्द ' मित ' अर्थ में आता है । इन सब स्थलों में ' हन् ' धातुका प्रयोग है, पर यहाँ प्राण - वियोग - अर्थंका थोड़ा भी सम्बन्ध नहीं है, बल्कि ' उपघ्न ' ( कृ ० ३।३८५ ) शब्दकी व्युत्पत्ति करते हुए श्रीभट्टोजिदीक्षितने लिखा है- ' पर्वतेन उपहन्यते - सामीप्येन गम्यते इति पर्वतोपघ्नः । ' यहां पर ' इन् ' धातुका अर्थ स्पष्टतया ' गमन ' ही किया है । ' पद्धति ' शब्द में, CC - 0. Ankur Joshi Collection ' गोन ' संज्ञापर विचार ३ जिसका अर्थ मार्ग होता है ' पादाभ्यां हन्यते - गम्यते ': धातुका गमन अर्थ विश्वश्रुत है ही । यह गम आलङ्कारिक - विद्वानोंका ‘ हन् ' धातुके गमन- अर्थ में करने पर ' असमर्थ दोष ' बतलाना अर्वाचीनकालिक प्रयोग प्राचीन नहीं, बल्कि — ' तीर्थं हन्ति, कुञ्जं हन्ति ' व्यवहार है यह आदि असम व्या उदाहरणों में ' हन् ' धातुका गमन अर्थ में प्रयोग प्राचीन इस अर्थ के प्रचारको बतला रहा है । काळ ‘ उद्घनः ’ ( कृ ० ३।३।८६ ) शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए श्रीदी किने । अव ‘ सिद्धान्त - कौमुदी’के कृदन्त - प्रकरण में लिखा है— ' उद्हन्यदे उत्कृष्टो ज्ञायते । ' वहाँ श्रीदीक्षितने हन्- धातुका ज्ञान अर्थ किय है । इसमें वहाँ हेतु बतलाया गया है - गत्यर्थानां बुद्ध्यर्थत्वाद के इन्तिर्ज्ञाने ' अर्थात् —– ‘ सर्वे गत्यर्था ज्ञानार्था अपि भवन्ति ' इस किन प्रसिद्धिसे गत्यर्थंक - धातुओं का ' ज्ञान ' अर्थ भी होने से यहां क कित धातुका ज्ञान अर्थ किया गया है । इससे इन् धातुका ' गमन ' श्रर्व प्रक भी व्यवहार प्रचलित है, यह सुस्पष्ट होगया । प्राच ऋग्वेदभाष्यके उपोद्बात में ' तृतीयं च हंस ' ( तै ० आ ० २ | १ ) गाय की व्याख्या करते हुए श्रीसायणाचार्यने लिखा है - ' हन्ति सदा योप गच्छतीति हंसो वायुः ' । इससे भी हन् धातुका ' गमन ' अर्थ सिद् गाय हो रहा है । पद तब ‘ गोघ्न ' शब्दको व्युत्पत्ति करते हुए श्रीहरदत्तने यह अ नहीं सोचा कि ' गौः हन्यते - गम्यते, प्राप्यते दुग्धाद्य नह दानार्थं वा अस्मै ' इति गोघ्नोतिथि: ' इस प्रकार हुन् धातुद्म Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) * यह अर्थ भी यहाँ ठीक सिद्ध होता है 1 । जबकि वेदमें गायको हर ) और वैलको ' अघ्न्य ' ( अथर्व ० ६ | ४ | १७ ) ' अध्म्या ' ( ऋ ० १०१८७११६ स्वीकृत किया गया है, तब उसका हननार्थ हो ही कैसे सकता है, व्यवहार प्र यह श्रीहरदत्तने नहीं सोचा । तब श्रीहरदत्तने उक्त गोतम - सूत्रकी है । व्याख्या करते हुए जो लिखा है कि- ' एवं किल पूर्वमाचारः ' यह चीन कालये - लिखते हुए उसने नहीं विचारा कि - गोतम ऋषि भी कोई अर्वाचीन नहीं हैं; तब इस ऋषिने गाय - बैलको भक्ष्योंमें क्यों श्रीदी चित नहीं गिना? उन्हें अभक्ष्यों में क्यों गिनाया? ' राज्ञश्च श्रोत्रियस्य - उद्वहन्यते मधुपर्कः ' ( गौ ० ध ० शश २८ ) ' अश्रोत्रियस्य आसनोदके ' ( २६ ) श्रोत्रियस्य तु पाद्यमर्घ्यमन्न - विशेषाँश्व प्रकारयेत् ( ३० ) यहाँ श्रोत्रिय दुध्यार के लिए मधुपर्कके अवसर पर श्रीगौतमने खीर - पूड़ेका तो निर्देश बन्ति ' इस किया; पर गोमांसका लेशतोऽपि भी संकेत नहीं किया; तब ' एवं यहां हर किल पूर्वमाचारः ' लिखते हुए श्रीहरदत्तने दोनों के अविरोधका मन श्र प्रकार क्यों नहीं सोचा है - यह आश्चर्य है! इससे स्पष्ट है कि. प्राचीन समय में अतिथिसत्कार में गोवधं नहीं होता था, किन्तु ०२११ ) गाय - चैलका ‘ याज्ञवल्क्यस्मृति ' के ' महोक्षं वा महानं वा श्रोत्रिया-इन्ति सदा योपकल्पयेत् ' ( १।५।१०६ ) इस कहे प्रकार से इस स्मार्त - आचार में कार्य सिद्ध गायका दान वा प्रकट करनारूप उपकल्पन वा गोदुग्धसे बनाये पदार्थोंका परोसना वा गो - उक्षा अर्थात् सोमरसका लाना ही अतिथि के लिए होता था, यही ' गोघ्न ' शब्दका अर्थ है, गोहनन त्यह नहीं, क्योंकि ' अघ्न्या ' का हनन कभी शास्त्रीय नहीं हो सकता । अथवा अतिथिपूजामें गोहनन ' मघासु हन्यन्ते गावः, धातुका CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. ' गोघ्न ' संज्ञापर विचार ३५३ अर्जुन्योः पर्युह्यते ' ( १८५ \ १३ ) इस ' ऋग्वेदसंहिता ' के मन्त्रकी भाँति जानना चाहिए । इस मन्त्रका श्रीसायणाचार्यने इस प्रकार व्याख्यान किया है- ' मघासु गावः सवित्रा दत्ताः सोमगृहं प्रति हन्यन्ते - दण्डैस्ताढ्यन्ते प्रेरणार्थम् ' । अर्थात् विवाह के दिन कन्यापिता द्वारा दी गई गौर्वे वरके घर भेजने के लिए ढण्डेसे हाँकी जाती हैं, जैसेकि गौओंको चलानेकेलिए स्वाभाविक है-' दण्डेन गोगर्दभौ ' । इस प्रकार अतिथि भी आकर दूध आदि अपने को देने के लिए या गायका ही अपने आपको दान करवाने के लिए दाता द्वारा गौको पिटवाता है, वा हॅकवाता है, चलवाता है, अतः उसके लिए गति अर्थ वा पीटने अर्थवाले ' इन् ' धातुके प्रयोग से वह ' गोघ्न ' कहा जाता है, मरवाने से नहीं । ' गां हन्ति ताडयति अस्मै प्रदानाद्यर्थम् ' इस विग्रह में ' दाशगोघ्नौ सम्प्रदाने ' ( ३ | ४,७३ ) इस पाणिनिसूत्र से सम्प्रदान- अर्थमें ' गोघ्न ' शब्द की सिधि हुआ करती है । स्पष्ट है कि गाय जिसके पास रहने में अभ्यस्त हो, उससे मिन्नके पास अपनी इच्छा से नहीं जाना चाहती । तब उसे हांकने के लिए उसको डण्डे दिसे पीटना पड़ता है, वही ताड़न वा गमन ' इन् ' धातु से प्रकाशित होता है । इसीलिए ' इन हिंसागत्योः ' यहां ' इन् ' धातुका गमन अर्थ मी किया गया है । ' इन् ' धातु पीटने के अर्थ में भी प्रसिद्ध है, जैसे कि ' मा त्वं विकेशी उर श्रावधिष्ठा: ' ( काठकगृह्यसूत्र २८।४ ) । यहां विधवा स्त्रीका छाती पीटना अर्थ है, छातीको मार डालना अर्थ नहीं, क्योंकि उस अर्थ में सङ्गति नहीं सध ० २३ An eGangotri Initiative

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३१४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) पड़ती । इस प्रकार ' त्रिः हम माऽह्नः वैतसेन दण्डेन [ शिश्नेन ] इतात् ' ( शतपथ ५ | ४ | ४ | ७ ) यहां पर उर्वशी पुरूरवा द्वारा पुंस्प्रजनन से अपना ( वराङ्गका ) हनन कह रही है । इसका मूल संहिता में इस प्रकार है - त्रिः स्म माऽह्नः श्नथ्यो वैतसेन ' ( ऋ.सं. १०।१६५।५ ) । यहां उर्वशीके वाक्यमें ( क्योंकि वही इस मन्त्रकी ऋषिका ( वक्त्री ) है और पुरूरवा देवता [ वाच्य ] है ) ' श्नथय: ' शब्द है । ' इनथ ' धातु वैदिक - निघण्टु ( २/१६ ) में वधकर्मक धातुचों में लिखी है, फिर भी यहां पर वराङ्गका ' वध ' अर्थ न करके ' ताड़न ' अर्थ किया जाता है, क्योंकि शब्दार्थ के अनवच्छेद ( संशय ) में विशेष -लाभदायक संयोगादिकों में ' औचिती ' भी एक पदार्थ आया है, तदनुसार वराङ्गका ताढ़न अर्थ ही उचित है, प्राणवियोग नहीं । इसी प्रकार गायका जहां इनन आपाततः प्रतीत होता हो, वहां पर भी औचितोसे ताड़न ही अर्थ होता है, मारण नहीं, क्योंकि उसे ' वेद में ' अघ्न्या ' कहा गया है । इसी प्रकार ' अथैनं पृष्ठतस्तूष्णीमेव दण्डैर्ध्नन्ति ' ( शतपथ. ५४४७ ) यहां भी इन्- धातुका राजाको ' पीटना ' अर्थ है, मार डालना नहीं, क्योंकि उस अर्थ में सङ्गति नहीं पड़ती । इस प्रकार ' सहि देवान् जिघांसति ' ( शतपथ १ | ४ | १ | २१ ) यहां भी ' हन् ' धातु का अर्थ ' गमन ' ही है, तभी श्रीसायणाचार्यने लिखा है-' जिघांसति - प्राप्तुमिच्छति ' । वैसे ' गोघ्न ' शब्द में भी समझ लेना चाहिये । 1 CC - 0. Ankur Joshi Collection ' गोन ' संज्ञापर विचार यदि ' हन् ' धातुका ' हिंसा ' अर्थ अक्षुण्ण हो रखा भी तो यही अर्थ होगा कि ' अतिथिके पास जाने के लिए उसे जाय, ढ पीटा जाता है ' । सब देवताओंकी आधारस्थली एवं पूज्य गा डण्डे से मारना कि वह अतिथिके पास चले, वह भी तो भ उस हिंसा ही है । उसी हिंसाको प्रोत्साहित करने से ही अतिधि नाम - ' गोघ्नः ' प्रसिद्ध है ॥ अतिथिके पास ले जानेके उसके से उद्देश्य हैं । पहला - उस अतिथिको उस गायका धारोष्ण - वारा दूध देना, या दूसरा - उस गायका ही अतिथिको दान कर देना-इस प्रकार ' गोघ्नोऽतिथिः ' यह शब्द संगत हो गया । हिंसा भी सदा प्राणवियोग अर्थवाली हो; यह भी आवश्य नहीं । ‘ सिद्धान्तकौमुदी ' के दिवादिगण में ' मीङ् हिंसायाम् ' इस ब पर श्रीदीक्षित ने लिखा है - ' हिंसा अत्र प्राणवियोग: ' अर्थात् झ धातु हिंसाका अर्थ ' प्राणवियोग ' है । इससे सिद्ध हुआ ह ' मी ' से भिन्न ' हन् ' ' हिसि ' आदि धातुओंका जहां ' हिंसा ' किया गया है, वहां ' प्राणवियोग ' अर्थ अनिवार्य नहीं । यदि हिंस का सर्वदा एवं सर्वथा तथा सर्वत्र मारना ही अर्थ होता, मिन्न नही तो ' हिंसाऽत्र प्राणवियोगः ' यह लिखना ही प्रसाभिप्राय एवं व्यर्थ हो जाता । इस उल्लेखसे सिद्ध होता है कि हिंसाका ' प्राणवियोग ' नहीं होता । ' गन्धनाव क्षेपण ' ( पा. १ ३/३२ ) सूत्रों सूचना देना वा चुगली कर देने को भी हिंसा माना गया है । तत्र ' गोठ ' भी हिंसाका ' प्राणवियोग ' अर्थ अनिवार्य नहीं हो सकता । ‘ हन् ' धातुके ‘ गमन ' अर्थमें भी हम पूर्व युक्ति - प्रमाण दे ही Gujarat. An eGangotri Initiative