सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 171–180

सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 171–180

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ३१६ ' के नामसे व्याकरणसिद्ध प्रयोग भी जान लेने चाहियें । हितोपदेशमें पाणिनि -- ' स्वर्गेषु मी ' अनेकगो - मानुषाणां वधान्मे पुत्राः मृताः ' ( मित्रलाभ ) इस व्याघ्र-पुंसि वाक्य ' गो ' शब्द ' पशु ' - वाचक सिद्ध होता है । here या है । ' मानुष ' का प्रतिद्वन्द्वी ' गो ' शब्द ' पशु ' वाचक ही है । यदि यहां वेदसंहिता- गायका अर्थ इष्ट हो, तो एक शब्द हो बिशेष - श्रर्थवाला, दूसरा शब्द हों -भाध्यकार सामान्य अर्थवाला, तब असङ्गति पड़ती है । ' गो - त्राह्मणबधाद् ' यह वाक्य किया है । होता, तो दोनोंके विशेपवाचक होने से ' गो ' शब्दका ‘ गाय ' अर्थ च ' ( २३ ) संगत था; पर ऐसे वाक्य में नहीं; तब इस प्रकारके वाक्यमें दोनों चार्यले मो शब्द सामान्यार्थक इष्ट होनेसे ' गो ' शब्द मी ' सामान्य- पशु ' वाचक ही है, यह सिद्ध होता है । वनपर्वकी फलतः वादियों से उपक्षिप्त उक्त वेदमन्त्र में भी ' गो ' शब्द ' पशु ' -गवां उदा सामान्यवाचक ही है; विशेष- पशु गायवाचक नहीं; क्योंकि - गाय कथा फिर वेदके मतमें ' अघ्न्या ' है - यह पूर्व कहा ही जा चुका है; तव वेद-पशव: प्रोक ' विशसन - स्थान ' में भी ' गो ' शब्द गायसे अतिरिक्त ' पशु '.. नयाजिनम् वाचक ही है, ' गाय ' -वाचक नहीं । तभी यहां श्रीसायणाचार्यने भी है । इससे यही अर्थ किया है - ' शसने - विशसनस्थाने गावो न - पशव इव ' । पूर्व - कार्यसमाज के चतुर्वेदभाष्यकार श्रीजयदेव - विद्यालङ्कारने भी यहां — ' गो ' शब्द ऐसा ही अर्थ किया है— ' हत्या -स्थानमें पशुओंके तुल्य वे दुष्टजन चू ' प्रत्यके भी मर कर इस पृथिवीके ऊपर पड़े हैं ' । वधस्थानमें ‘ पशु ’ इस नहीं से सामान्य शब्द के अर्थ को छोड़कर ' गाय ' यह विशेष अर्थ करने ' गोयुग ' से उपमेय वाक्य में कोई विशेषता भी तो नहीं हो जाती! तब वह २६ ) आदि ( गाय का अर्थ सम्भव भी कैसे हो? CC - 0. Ankur Joshi गायकी वधशाला (? ) ३१७ इसके अतिरिक्त उक्तमन्त्र में उपमा है, यहां न ' ' शब्द उपमाबाचक है । उपमासे विधि नहीं बन सकती । ' जैसे कोई पशुवधस्थान में पशुओं को मारता है ' इस अर्थ में वैसी विधि वा वैसा व्यवहार वेदको इष्ट नहीं हो सकता । नहीं तो ' जारं न कन्या ' ( ऋ ० सं ० ६५६।३ ) ' योषा जारमित्र प्रियम् ' ( ऋ ० सं ०६।३२२५ ) इन उपमाओंसे स्त्रियोंका जार- ( उपपति ) सम्बन्ध भी वेद - सम्मत हो जायगा पर यह किसीको इष्ट नहीं । वस्तुतः उक्त मन्त्र में युद्धका वर्णन है यह वादियोंसे प्रोक्त अर्थमें भी स्पष्ट है । तव यहां ' शसने ' का अर्थ शत्रुपक्ष में ' युद्धस्थल ' है 1 । यहां उपमा है ' शसने न गावः ' । इसका यह अर्थ है - ' जैसे ' शसने- शिकारगाह में वाणादिसे मारे गये पशु सो ( गिर ) जाते हैं; वैसे ही शसने- युद्धस्थल में हे इन्द्र! तुमसे मारे हुए शत्रु भी जिससे सो ( गिर ) जाते है; ऐसा तेरा बाप वा शस्त्र कहाँ है-यह अर्थ है । पशुपक्ष में ' शासन ' का अर्थ है - मृगयाका स्थल, -शिकारगाह, जहां पशुओंका शिकार किया जाता है । शास्त्रों में राजाओंके शिकारका वर्णन भी आता है । ' मृगः स, मृगयुः त्वं, ( अथर्व - १०११/२६ ) इस वेदमन्त्र में उसका संकेत है । प्रसिद्ध श्रीसत्यनारायणव्रत - कथा के पञ्चम अध्यायमें भी राजा तुङ्गध्वजका वर्णन ' एकदा स वनं गत्वा हत्वा बहुविधान् पशुन् ' ( २ ) यहां आया है । जैसे युद्धमें राजाओं के प्रजा -हानिजनक शत्रुओं के मारने का वर्णन आया है; वैसे ही प्रजा - हानि - जनक पशुओं के मारनेका वर्णन भी आता है, उसमें दोष भी नहीं माना जाता । इसी Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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३१८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) कारण महाभारतमें भी कहा गया है- ' अतो राजर्षयः सर्वे मृगयां यान्ति भारत! नहि लिप्यन्ति पापेन न चैतत् पातकं विदुः ' ( अनुशासनपर्व ११६ १८-१६ ) तब ' शसने न गावः ' यहां पर ' शिकारगाहमें पशुओं के मारने का अर्थ है । ' जैसे गोहत्या स्थानमें गौएँ काटी जाती हैं ' इस बादियों से कहे जाते हुए अर्धकी यहाँ गन्ध भी नहीं है, क्योंकि-गाय शिकारका पशु नहीं है । घातक शत्रुओं का युद्धस्थलमें बाण आदि अस्त्रसे मारकर सुलाना, और घातक - पशुओंका शिकार के स्थान वन आदिमें शस्त्र बाण आदि से मारकर सुलाना- इन दो उपमान- उपमेय वाक्योंके पूर्णसादृश्यके समन्वय हो जानेसे यही इस मन्त्रका वास्तविक अर्थ है । ' अनागोहत्या वै मीमा ' ( अथर्व. १०।१।२६ ) इस मन्त्रमें निरपराधकी हत्या भयङ्कर बताई गई है, इससे अपराधीको मारना भयङ्कर नहीं, किन्तु वेदसम्मत है - यह सूचित किया गया है । आक्षिप्त ऋग्वेदके मन्त्रमें राक्षसका वाणसे शसनस्थान ( युद्धस्थल ) में मारना सूचित किया गया है । इसके उपमानवाक्यमें भी राक्षस - जैसे घातक पशुओंका शसन ( शिकारगाह ) में बाण आदिसे मारना सूचित किया गया है । दैत्य था राक्षसरूप जो भी कोई पशु हो - उसका मारना शास्त्रीय वा ऐतिहासिक भी है; इसीलिए भगवान् श्रीकृष्णका वृषासुर वा धेनुकासुर आदि दैत्योंका मारना; तथा भगवान् श्रीरामका राक्षस मारीच मृग आदिका मारना; तथा स्वा.दयानन्द द्वारा अपने वेदभाष्य में क्षेत्रविनाशकं CC - 0. Ankur Joshi Collection गायकी वधशाला (? ) 11 33 तथा हिंसक नीलगाय आदिको मारना भी लिखा गया है । उक्त - मन्त्र में उपमानोपमेयभाव की पूर्णोपमालङ्कार के पूर्णता सिद्ध हो गई । तब गायके राक्षस- पशु न होनेसे ' वह यह गायकी वधशाला नहीं मानी जा सकती; किन्तु बाघ- शर बघ मेदिय बद आदि राक्षस पशुओं के मारनेका शिकारगाह ही यहां सिद्धहोता है । यद्यपि उपमेय - वाक्यमें ' रक्षः ' एक वचन है, और उपमान वाक्यमें ‘ गावः ' बहुवचन है; तथापि पशुवाचक ' गो ' शब्द मनु जाति - शब्द होनेसे ‘ जात्याख्यायामेकस्मिन् बहुवचनमन्यतरस्याम् | राज ( पा. १ | २ | ५८ ) इस सूत्रसे एकवचनमें माँ पाक्षिक बहुबचन हुआ इस हुआ है, अतः इसमें ‘ प्राणा इव प्रियो मेऽसौ ' की भांति कोई दोश इस नहीं । फलतः यहां घातक व्याघ्र आदि पशुओंका मारना वेदके मरे । भीषण न होनेसे इसमें कोई दोष नहीं पड़ता । तब उक्त मन्त्रों अत वैसे ही पशु ' शसने न गावः ' यहां इष्ट हैं, गाय नहीं । तब यहां काल कोई भ्रम भी नहीं हो सकता । जब ऐसा है; तब ' इस मन्त्र रचनाकाल गोवध निषेध करनेवाले मन्त्रोंसे प्राचीन है ' यह आ भी परिहृत हो गया । क्योंकि - ' अघ्न्या ' यह गायका नाम वेदकालीन है, पाश्चात्य नहीं । जब वेद गायको अघ्न्या ( अहन्तव्या ), अदिति ( अखण्डनीया ) ( यजुः ८४३ ) बताता है; तब वह गायकी वधशाला कैसे कह सकता है? वह तो ' गावो गोष्ठे असदन्, ( ऋ ० सं ० १ १६१।४ ) गौओका गोशाला में वर्णन कर सकता है, वधशाल अ में नहीं । Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ३२० है । वादियोंसे प्रोक्त ही अर्थको किसी प्रकार मान लिया जाए, तो रके वहाँ गोवधशाला मी राक्षसकी ही इष्ट है, अर्थात् जैसे राक्षससे ' श बधशाला में मारी हुई गौएं पृथिवी में सो जाती बाघ भेड़िय बदलेमें इन्द्रसे मारे हुए राक्षस भी पृथिवी में सद्ध हो रहा हैं, इस प्रकारका तेरा अस्त्र कहाँ है हे र उपमान गोवध करना राक्षसी - व्यवहार सिद्ध किया शब्द मनुष्यों का है, न देवता एवं धर्मात्माओंका हैं, वैसे ही उसके जिससे सो जाते इन्द्र! ' इस अर्थसे गया है । यह । प्रत्युत देवताओंके न्यतरस्याएं राजा इन्द्र तो उसके प्रतीकार में राक्षसों को मार दिया करते हैं । इस प्रकार गोवध करनेवाले राक्षसों को मार डालना चाहिये - यह वचन हुवा कोई इससे प्रतीत होता है । जैसे कि- ' यदि नो गां हंसि तं त्वा सीसेन दोष विध्यामः ' इस अथर्ववेदसं. ( १ | १६ | ४ ) के मन्त्र में गोवधकर्ता- राक्षस को गोली मार देना कहा है । तब यह विधि - वाक्य सिद्ध न हुआ । चिके मह अतः इससे वादियोंकी इष्टपूर्ति भी नहीं हो सकती । फलतः वेद-उक्त मन्त्री कालमें गोवध इष्ट नहीं, इसीका भाष्यभूत वचन महाभारत में कहा । तब यहां है - ' अन्य इति गवां नाम के एता हन्तुमर्हति । महच्चकाराऽकुशलं समन्त्रश वृषं गां वाऽऽलभेत्तु यः ' ( शान्तिपर्व २६२।४७ ) । वृहदारण्यक में वृषभ-यह मांसका वर्णन कई लोगोंके मत में है उसपर विचार अग्रिम निबन्ध वेदकालीन में किया जाता है-T ), अदिति बधशाला २ क्या बृहदारण्यकमें वैलका मांस विहित है? कई महाशयोंका विचार है कि - " बृहदारण्यक उपनिषद्की वधशाल ' अथ य इच्छेत् पुत्रो मे पण्डितो जायेत ' सर्वान् वेदाननुत्र, वीत, " CC - 0. Ankur Joshi बृहदारण्यकमें ऋषभमांस (? ) II Collection Gujarat. सर्वमायुरियाद् इति मा ँ सौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयाताम्, ईश्वरौ जनितवे औक्षेण वा, आर्थमेण वा ( ६ | ४ | १८ ) इस कंडिका में बैल के मांसको पकाकर खाने से दम्पतिका वेदवक्का, विद्वान् लड़का! उत्पन्न होना कहा है । " यह मत मी ठीक नहीं । हिन्दुधर्मेका गोरक्षण एक आवश्यक अङ्ग है । वेदके बहुत स्थलों में गाय - बैलको ' ' अन्य अघ्न्या ' कहा है जिसका अर्थ है - न हनन करने योग्य । तब उपनिषद्रूप वेद में भी बैल के मांसका प्रसंग कैसे आसकता है? बिना हननके उनका मांस प्राप्त नहीं हो सकता; और हनन करने से ' अन्य ' नामका व्याकोप होता है; अतः बृहदारण्यकके उक्त वचनमें वैलके मांसके अर्थका कोई भी प्रसङ्ग नहीं । इसके अतिरिक्त उक्त वचन में ' क्षेण वा अपेभेण वा ' यहांका ' वा ' शब्द इन पदार्थों को एक - दूसरेसे पृथक् कर रहा है । तब केवल वैलका ही अथ कैसे किया जा सकता है? ' उता ' मी यदि वैलका और ' ऋषभ ' मी बैल का नाम है, इसीलिए ही एक बैलका अर्थ किया जाता है; तो फिर यहां यह क्यों नहीं विचारा जाता कि यहां दो पर्यायवाचक-शब्दों को रखकर पुनरुक्ति दोष क्यों किया गया है? पृथकूना-वाचक ' वा ' शब्द भी यहां है- यह क्यों नहीं विचारा जाता? यदि छोटे - बड़े वैलका अर्थ करके पुनरुक्ति हटाई जावे; यह भी ठीक नहीं । छोटे - बड़े वृषभके मांस की कोई विशेषता भी तो नहीं कही गई! और फिर ऐसा अर्थ करने पर ' देहि मे वाजिनं राजन्! गजेन्द्र ं वा मदालसम् ' इस प्रकार दुष्क्रम दोष जा पड़ेगा । पहले An स ०० eGangotri २१. Initiative

पृष्ठ 174

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ३२२ बड़े ( ऋषभ ), फिर उसके न मिलने पर छोटे ( उक्षा ) का ग्रहण होता । और यह भी विचारनेका कष्ट नहीं किया जाता कि उचित के साथकी कण्डिकाओं में भी किसी मांसका निरूपण इस कण्डिका है, या नहीं? एक १४ वीं कण्डिकामें ' तीरौदनं पाचयित्वा ' शुक्लवर्णवाले वेदके वक्का पुत्रकी उत्पत्तिकेलिए दूधमें प्रोदन पकाकर घोके खाना कहा है । १५ वीं कण्डिका में ' दध्योदनं पाचयित्वा ' साथ दो वेदके वक्ता, कपिलवर्ण पुत्रकी उत्पत्त्यर्थ दही में श्रोदन पकाकर खाना कहा है । १६ वीं कण्डिकामें तीन वेदके वक्ता, श्यामवर्ण पुत्रकी उत्पत्त्यर्थ उदौदनं पाचयित्वा ' उदकमें श्रोदन पकाकर खानेकेलिए कहा है । इनमें दूध, दही, जल इन तीन तरल पदार्थों में ओदनका पकाना कहा है । घीको सभी स्थान कहा है । १७ वीं कण्डिकामें पण्डिता ( बुद्धिमती ) लड़की की उत्पत्त्यर्थं ' तिलौदनं पाचयित्वा ' तिल - चावल पकाकर खानेको कहा है । प्रकृत १८ वीं कण्डिकामें सर्ववेदवक्ता पुत्रकी उत्पत्त्यर्थ ' मांसौदन ' पकाकर खाना कहा गया है । यहां पूर्वोत्तर- साहचर्य देखने पर मांसका ओदनके साथ कुछ भी सम्बन्ध नहीं रहता है । पहले एक वेदके वक्ता के लिए श्रोदनका दूधमें, दो वेदके वक्ता के लिए श्रोदनका दहीमें, तीन वेदके वक्ता के लिए श्रोदनका गङ्गादिके जलमें घृतसहित पकाना कहा है । यह तीनों तरल तथा परस्पर - सम्बद्ध वस्तुएँ हैं । १७ वीं कण्डिकामें पुत्रीकी बुद्धिमत्ताके लिए तिल और तण्डुल दोनोंका पकाना कहा है । यहां तिल CC - 0. Ankur Joshi Collection बृहदारण्यकमें ऋषभमांस ( १ ) धान्यविशेष है । तब १८ वीं कण्डिका में पुत्रके पाण्डित्य मांस भला प्रकृत कैसे हो सकता है? पहले दूध लि अ , 3 दही, धोर उनका जल परस्पर सम्बद्ध थे, परन्तु वहां तिल के साथ पा पद क्या सम्बन्ध? श मांस भी यहां आगे - पीछे के साहचयेके अनुसार कोई इस ही चाहिये । ‘ औक्षेण ’ ‘ आर्षभेण ' यह पद तृतीयान्त हैं, पान से श्र दोनोंका विशेष्य ‘ मांसं ' यहां हो भी नहीं सकता, क्योंकि - ' भांख्ये तृतीया नहीं । विशेषण - विशेष्यका समान - विभक्तिकताका नि ए हुआ करता है । उस विशेष्यका दूसरे पदके साथ समास क सम्भव नहीं । यह भी विचारणीय है कि - ' मांसौदनम् ' में समाहारसुन ५ . है । मांसका ' मांस ' अर्थ करने पर समाहारद्वन्द्व नहीं हो सका । ' तिलौदन ' में तो ' विभाषा वृक्षमृगतृण धान्य- व्यञ्जन - पशुशकुनिं ( पा. २ ४ १२ ) इस सूत्र से ' व्रीहियवम् ' की भांति दोनोंके धान होने से समाहारद्वन्द्व हो जाता है; पर ' मांसौदन ' में तो ' सं कोई धान्य नहीं; अतः समाहारद्वन्द्व भी सम्भव नहीं । पर यदि यहां ' मांस ' कोई ' धान्य ' सिद्ध हो जावे, तो सब संगतियां सम जावेगी । य वह संगति यह है कि- ' अतो माषान्नमेवैतद् स्मृतम् । पितरस्तेन तृप्यन्ति श्राद्ध ं कुर्यान्न तद्विना । यथा बलिष्ठ a मांसत्वाद् माषान्नमपि तत्समम् । सौगन्धिकं च स्वादिष्ठं मां द्रव्यभेदतः ' ( १५२-१५३ ) प्रजापतिस्मृति के इस प्रमाणसे ' मांस'च स Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 175

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श्रीसनातनधर्मा लोक ( ६ ) ३६४ ण्डित्यकेलि अर्थ ' माष ' यह धान्य - विशेष भी होता है; क्योंकि मांसल ( पौष्टिक ) दही, और पदार्थ मी ' अर्शआदिभ्योऽच् ' ( पा. ५ | २ | १२७ ) इस सूत्र से ' मांस ’ साथ मांस प्रत्यय करने पर ' मांस ' शब्द से कहे जा सकते है । शब्दसे इसी कारण अच् स्वयं ‘ बृहदारण्यक ' में दस ग्राम्य - धान्यों के निरूपणके र कोई पान अवसर में ' व्रीहियवाः ' तिल - माषाः ( ६ | ३ | १३ ) यहां तिलके बाद माष लिया गया है । पूर्वोक्त समाहारद्वन्द्वकी वैकल्पिकता के कारण यहां कि - ' मांसो एक - वचन न होकर इतरेतरयोग में बहुवचन हो गया है । इस प्रकार ताका निर ' मांसौदनं ' में भी समझ लेना चाहिये । तब यहां ' मांस ' से ' माष ' - समास ये का ग्रहण हो जाने से सत्र संगतियां लग जाती हैं । तत्र आर्यसमाजी-विद्वान् श्रोशित्रशंकरकाव्यतीर्थमहाशय का यहां ' माषौदनम् ' यह समाहारदून पाठ बदल देना अनधिकारचर्चा है । जब उक्त प्रमाण से ' मांस ' हो सकता शब्दका ' भाषधान्य ' अर्थ भी हुआ करता है; तब पाठपरिवर्तनकी पशुशकुनि आवश्यकता क्या? नौके धान तात्पर्य यह है कि माप और चावलोंको घृताक्त पकाकर उनको में तो ग ' उक्षा वा ऋषभ ' के स्वरसके साथ खानेवाले दम्पतियोंका उक्त । पर बंदि गुणवाला पुत्र उत्पन्न होता है । माषकी खीर महापौष्टिक एवं संगतियां लप वाजीकरण हुआ करती है । तब उसका वर्णन पुत्रोत्पत्ति प्रसङ्ग में यहां प्रकृत भी है । अब उक्षा तथा ऋषभ का अर्थ भी विवेचनीय है । ' औक्षण यथा वलिए वा आर्षभेण वा ' यहां दो वार कहे हुए ' वा ' शब्द से यह तो सिद्ध दिष्ठं मधुरं हुआ कि यह दोनों भिन्न - भिन्न पदार्थ हैं । बैल अर्थ करने पर ' मां संगति नहीं बैठती । आयुर्वेद - उपवेद में ' उक्षा ' यह सोम ओषधिका CC - 0. Ankur Joshi Collection वृहदारण्यकमें ऋषभमांस (? ) ३२१ नाम है । श्री सायणाचार्यने मी ऋ. १११६४ ४३ मन्त्रके माध्यमें लिखा है- ' सोम उताऽमवत् ' । यहां ' उक्षा ' सोमका नाम कहा गया है । ' ऋषभ ' यह ऋषभक औषधिका नाम है । वृषभ अर्थवाले शब्द उस औषधि पर्यायवाचक हुआ करते है । यह औषधि हिमालयके वनों में प्राप्त होती है । वृपमके शृङ्ग की भांति होती है । इसके पत्ते छोटे - छोटे होते हैं । यह बल-बुद्धि बढ़ानेवाली होती है, वात एवं क्षय यादि दूर करती हैं, जैसे कि - अथ वेदसंहिता में कहा है- ' यानि भद्राणि वीजानि ऋषभा जनयन्ति, तैस्त्वं पुत्रं विन्दस्व, सा प्रसूर्धेनुका भव ' ( ३।२३।३ ) यहां ऋषभ ओषधिके सेवन करने से पुत्र प्राप्ति सूचित की गई है । निघण्टु रत्नाकर में इसके गुण बताये गये हैं- ' ऋपमो मधुरः शीवो गर्भसन्धानकारकः । शुक्रधातुकफानां च कारको बलदायकः । वृष्यः पुष्टिकरः प्रोक्तः पित्तरक्तातिसारजित् ' । यह दोनों ओषधियां वाजीकरण होनेसे वल बढ़ाने, आयु बढ़ाने और वीर्य उत्पन्न करने तथा मेधावी पुत्र पैदा करने में श्रद्भुत शक्ति रखती हैं । तब उक्त घृताक्त - माषौदन उक्त औषधियों में एकके चाहे वह सोमरस हो, अथवा यदि वह न मिले तो ऋषभके स्वरसके साथ देने से वैसा पुत्र हो सकता है - यह उक्त कण्डिकाका अर्थ है । इस अर्थ में दुष्क्रम दोष भी नहीं रहता । सोमरसको पहले इसलिए रखा है कि उसका सम्बन्ध यज्ञसे तथा यज्ञविषय वाले वेदसे है । यहां पर सर्ववेद - वक्ता लड़का पैदा करना था । ऋषमकका गुण ' भावप्रकाश ' में ' जीवकर्षमको बल्यौ Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 176

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३२६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) शीतौ शुक्रकफप्रदौ ' ( पू ० १ म ० ) यह कहा है । बैलका अर्थ यहां इष्ट भी नहीं है; इसमें कारण यह है कि - बृहदारण्यक उपनिषद् शतपथको उपजीवित करती है । शतपथके ' तद्ध एतत् सर्वाश्यमेव, यो धेन्वनडुहोरश्नीयात् । गर्भं निरवधीदिति पापमकतू- इति, तस्मात् घेन्वनडुयोर्नाश्नीयात् ' ( ३/१२/२१ ) इस वचन से गाय - वलके मक्षकको सर्वभक्षी, पापी और गर्भघातक कहकर जब निंदित किया गया है, तब शतपथब्राह्मण इस अवसर में वैलका मांस किस प्रकार कह सकता है? इस कारण शतपथके अनुसरण करनेवाली बृहदारण्यक उपनिषद्को भी यहां औषधि - विशेषका स्वरस इष्ट है, बैलका मांस नहीं । यदि यहां पर बैलके खाने से वेदवक्ता बालक उत्पन्न होता, तब उसके मक्षक ईसाई या मुसलमान सर्ववेद-वक्ता होते; भारतीय- हिन्दु नहीं । पर यह अनुभव से भी विरुद्ध है; इस कारण यहां यह अर्थ मी नहीं । आशा है ' आलोक ' पाठकों यह सब हृदयङ्गम कर लिया होगा । यद्यपि कई विद्वान्-माष्यकारोंने इस कण्डिकाका मांस सम्बन्धी अर्थ किया है, उसका कारण यह है कि - मन्त्र, ब्राह्मण, तथा उपनिषद् आरण्यक आदिके वेद होने से ' या वेदविहिता हिंसा नियतास्मिँश्वराचरे । अहिंसामेव तां विद्याद् वेदाद् धर्मो हि निर्वमौ ( ५/४४ ) इस मनुके वचनानुसार उन्होंने उक्त हिंसाको भी अहिंसा समझकर उक्त विषय में पूर्वापरकी सङ्गति से विशेष विचार नहीं किया । अतः हम पर उनका कुछ मी प्रभाव नहीं पड़ा । हमने तो वेद - महाभारतादि सभी के पूर्वापर की सङ्गतिसे सम्भवी उक्त अर्थ किया है । अतः यही ठीक है; यह CC - 0. Ankur Joshi Collection बृहदारण्यकमें ऋषभमांस (? ) ३२८ हमारा पूर्ण विश्वास है । मांस के विषय में हम पूर्व विवेचना दे चुके हैं कि मनुष उक्त कि खाते में ' मांस ' से ' भाष ' का ग्रहण इष्ट है अथवा वहाँ ' माँस'का कहत ' मांस ' ही माना जावे; तो इसपर भी विचार कर लेना रे परिय खाये - पिये हुए पदार्थोंका पहला परिणाम १ रस धातु चाहिए परभ और दूसरा परिणाम २ रुधिर धातु बनता है; रुधिर वनता है. गाढ़ा हो तीसरा परिणाम ३ माँस होता है, माँस से ४ वसा ( चर्ची ) वर्द यित्व है । चर्बी कठोर होकर ५ हड्डी बन जाती है । हड्डी से ६ मन्त्र परिण और मज्जा से ७ वीर्य बनता है । घी डा जिस प्रकार यह परिणाम मनुष्य शरीर में होता है; इ प्रकार वृक्ष, फल, कन्द, मूल आदि में भी वैसा ही परिणाम हो है । इसलिए उनके नाम भी वही होते हैं । आप आम नहीं ही ले लीजिये, इसके ऊपर के हिस्सेको पशु - मनुष्य श्रदिक्षुर ऊपर के भागकी तरह त्वचा ही कहा जाता है । पशुको काटने पर होता, उसकी ऊपरकी खाल फेंक देनी पड़ती है, सो आमको भी काटकर तब उसकी ऊपरी त्वचा फैंक देनी पड़ती है । उसका जो रेशा नितम हिंसा है; वह रस ही तो कहा जाता है । अब जो उसका बीचका गूदा है । उसके वही तीसरा परिणाम ' माँस ' है, उसीकी कठोर वसा गुठली बा श्रद वेदज्ञ जाती है, जिसे ' अस्थि ' कहा जाता है, जैसे कि - श्री बाण म कादम्बरीमें आश्रमके वर्णनमें ' शिला- शकल प्रहार संचूर्णिताऽपर सो तात्पय ऽस्थिसञ्चयम् ' यहाँ बहेड़े की गुठलीको ' अस्थि ' कहा है । इस विषयमें अन्य प्रमाण हम अन्यत्र देंगे । जैसे खाने - पीनेका व्यवहार Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 177

सनातन धर्मलोक ६, पृष्ठ 177 का मूल पृष्ठ
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ३२८ में होता है; वैसे वृक्षों में भी होता है । वृक्ष आदि भी मनुष्यों पीते हैं I । जैसे वृक्षादि वा गेहूँ आदि में जिसे ' खाद ' डालना उक्त कण्डिस खाते -' माँस'का कहते हैं; वह उस वृक्षका खाद्य - भोजन है । सो जैसे खाद्यका परिणाम मनुष्य में होता है; वैसे वृक्ष, फल, घास, ओषधि आदि ना चाहिये मी ' वाद'का परिणाम होता है । तु वना पर सो अब जोकि - बृहदारण्यक के गर्भाधान में ' मांसौदनं पाच-गाड़ा होकर यित्वा ' में ' मांस ' शब्द है, सो वहाँ श्रोषधि वा फलका तृतीय चर्बीसे परिणाम ‘ मांस ' है - जिसे ‘ गूदा ' कहा जाता है उसे भावके साथ मिलाकर ६ म घी डालकर खाये तो होता है; इस हुआ । वृक्ष आदिके रिणाम होन है; पर पक्कफल जो नहीं होती; वह ऐसा आमफरो सर्ववेदवक्ता लड़का उत्पन्न होगा ' यह अर्थ जो कच्चे फल हैं; उन्हें खाना तो कुछ हिंसा हैं वे आगे नहीं बढ़ते, उनका खाना हिंसा है, जैसे किसीका बढ़ा हुआ वाल वा नाखून आदि क्षुर आदि से काट लिया जावे । इससे उस पुरुष को दुःख नहीं को काटने होता, वैसे ही पक्कफलके काटने से वृक्षको दुःख भी नहीं होता । पर भी काटका तत्र उस फलके भी बांचबाले भाग मांसरूप गूदा के खाने से न कोई शा निक हिंसा है; न पशु - मनुष्यादि के मांसादि की भांति अपवित्रता है; गूदा है । उसके वाजीकरण तथा पवित्र एवं बुद्धिवर्धक होनेसे उससे युक्त चका श्रोदनका अशन जहाँ गर्भ करता है, वहाँ उस आहित गर्भ से गुठली बर श्री वाणमट्ट वेदज्ञाता पुत्र भी उत्पन्न होता है - यह वहाँ तात्पर्य सिद्ध होता है । सो वृहदारण्यकमें उसी माँसका तात्पर्य है । अपवित्र माँसका है । इस तात्पर्य नहीं; क्योंकि — उसका वेद - ज्ञातृत्व से कुछ भी सम्बन्ध नहीं । औक्षेण वा आईभेण वा ' में हम लिख चुके हैं कि यह औषधियों-का व्यवहार वृहदारण्यक्र में ऋषभमांस (? ) ३२६ के नाम हैं; वाजीकरण वाली ओषधियोंका नाम भी अश्वऋषभ आदि कहा जाता है । जैसे असगन्ध है, उसका नाम अश्वगन्धा ' अश्व ' मी आता है । ' मदनपाल निघण्टु ' में जीवक ऋषभक ओषधियों के नामों में ऋषभ, और वृष यह नाम आते हैं । इनमें बल बुद्धि को बढ़ाना प्रधान गुण होता है, इसलिए यह ' वाजीकरण ' माने जाते हैं । ' वांसा ' ओषधिका नाम भी वृष और वृषभ आता है । इनकी चढ़ती - दशा वा तरुणावस्था में उसे ' उक्षा ' कहा जाता है, और परिपक्व दशाका नाम वृप वा वृषभ कहा जाता है । गर्भाधान के समय ऐसी बल - बुद्धिवर्धक औषधियों का सेवन वाजी-करण हो जाने से पुत्रसन्तान पैदा करनेवाला तथा मस्तिष्कवर्धक होनेसे सर्ववेद - वक्ता लड़का उत्पन्न करनेवाला सिद्ध हो जाता है । आयुर्वेद में जहाँ वाजीकरणका वर्णन मिलता है वहाँ मांसका नाम नहीं मिलता । जहाँ वुद्धकी बात होती है, वहाँ भी मांसका नाम नहीं मिलता; किन्तु इन अवसरों पर दुग्ध घृन आदि वा ओष-धियों के ही बहुत से योग मिलते हैं; इससे प्रतीत होता है कि-उनमें मांसको बाजीकरण - गुणवाला तथा बुद्धिप्रद नहीं माना जाता । लोक में भी ' मांस ' से ' मांस ' बढ़ना माना जाता है; वीर्य वा बुद्धि बढ़ना नहीं । सो वृहदारण्यक वा शतपथके प्रकृत गर्भा-धान- प्रकरण में उक्षा वृषभ आदि शब्दोंसे उन्हीं औषधियोंके ही गूदेका ' मांस ' शब्द से वर्णन इष्ट है; क्योंकि वे वाजीकरण होने से शुक्रको गाढ़ा कर देने से तथा बुद्धि - मस्तिष्क के वृद्धकारक होने से बल वीर्य तथा विद्याशाली पुत्रोंके उत्पादनकी क्षमता रखते CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 178

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३३० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) हैं । सो बृहदारण्यक के आक्षिप्त प्रमाणवाक्यमें भी ओषधियों के गूदेका अर्थ विवक्षित होनेसे अब उसमें बैलके माँसका भ्रम प्रतिपक्षियों को हटा लेना चाहिये । ३ वसिष्ठस्मृति एवं शतपथका अतिथि सत्कार । बहुतसे पाश्चात्य - विद्वान् तथा पाश्चात्यानुयायी भारतीय यह सिद्ध करनेका बहुत प्रयास किया करते हैं कि - " प्राचीन भारत में या वैदिक कालमें अतिथिसत्कारके समय गोवध हुआ करता था, तभी अतिथिको ' गोधन ' कहा जाता है । शतपथब्राह्मण में भी स्पष्ट कहा है- ' यथा राज्ञे वा ब्राह्मणाय वा, महोक्षं वा, महाजं वा पचेत्, एवमस्मै एतद्ातिथ्यं करोति ' ( ३ । ४ । १ । २ ) । यही बात ' वसिष्ठ - स्मृति ' में भी कही है - ' अथापि ब्राह्मणाय वा, राजन्याय वा, अभ्यागताय महोतं वा, महाजं वा पचेत्; एवमस्य आतिथ्यं कुर्वन्ति ' ( ४८ ) । इसी प्रकार ' ऐतरेय ब्राह्मण ' में भी कहा गया है — ' यथैव श्रदो मनुष्यराजे आगते, अन्यस्मिन् वा [ प्रशंसनीये आगते ] उक्षाणं वा बेहतं वा तदन्ते ' ( १।१५ ) । ' गोध्नः ' का विग्रह है ' गां हन्ति अस्मै ' । ' दाशगोघ्नौ सम्प्रदाने ' ( अ. ३।४।७३ ) इस वेदाङ्ग - व्याकरणके सूत्र से उक्त शब्दको सिद्धि हुआ करती है । उक्त वैदिक वाक्यों का यह अर्थ है कि ब्राह्मण वा क्षत्रिय-राजारूप अतिथिकेलिए बड़ा बैल या बड़ा बकरा पकाये । तब आजकलकी सरकारको गोवध रोकने के लिए गृहीत करना शासनके कार्य में अव्यवस्था लाना है " । CC - 0. Ankur Joshi Collection वसिष्ठस्मृतिका अतिथि सत्कार ३३२ पाश्चात्योंके इस बड़े आक्षेप पर जिसने हमारे पौरस्त्य विद्वानों को भी हैरान कर रखा है- हम कुछ विचार करना आय चाहते । हैं । हमें तो उक्त अर्थ में सङ्गति नहीं दिखलाई पड़ती । एक न्वास आगन्तुक अतिथि बड़े बैल, वा वड़े बकरे को खा जावे, यह सम्मन मिता नहीं दिखाई पड़ता — और अतिथि इतने बड़े चैल ( सांड ) किसी उपक घरमें हो भी नहीं सकते, क्योंकि अतिथि प्रायः आते - जाते रहते । यथा-हैं; इतने सांड प्रतिदिन कहांसे द्यावें? श्रोत्रि यह । याद रखने की बात है कि वसिष्ठस्मृति में उक्त वचनाये । निषेव पूर्व ' न च प्राणिवधः स्वर्ग्यः ' ( ४७ ) यह वचन आया है, इसरे प्राणीका वध स्वर्गप्रद नहीं माना । तब इसके बाद ही सहस अति बड़े बैलका पकाना कैसे कहा गया? ' न च प्राणिषधः स्वर्ग्यः स यह ब उपसंहार ' तस्माद् यागे वधोऽवधः ' हो भी नहीं सकता; क्योंकि सत्का यहां असङ्गति स्पष्ट है । मनुस्मृतिके ऐसे ही ' न च प्राणिबध सौन स्वर्ग्यः ' पद्यके चतुर्थपाद में ' तस्मान्मांसं विवर्जयेत् ' पाठ है, व सत्कार करना सङ्गत भी है । वस्तुतः वसिष्ठका उक्त वचन शतपथब्राह्मणके उक्क वचन पर उपप जाते र अवलम्बित है; और शतपथब्राह्मण श्रीयाज्ञवल्क्यसे प्रोत है, आाजाद शतपथके वाक्यका अर्थज्ञान मी श्रीयाज्ञवल्क्यको ही हो सकता है । उन्हीं याज्ञवल्क्यने सूर्य से ' शतपथ ब्राह्मण ' को प्राप्त करके ( देखिये ) न्यून ' चमत इस छठे पुष्पका पृष्ठ ८१ ) फिर अपनी ' याज्ञवल्क्यस्मृति ' बनाई ॥ अब याज्ञवल्क्यस्मृतिको भी देख लेना चाहिये, कदाचित् ऋषित त्रिभिः * उस अपने वाक्यका तात्पर्य उसी अपनी स्मृतिमें दिया हो । Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 179

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ३३२ याज्ञवल्क्य स्मृति में श्रोत्रिय अतिथिके सम्मानार्थ यह पद्य पौरस्त्य है - ' महोक्षं वा महाजं वा श्रोत्रियायोपकल्पयेत् । सत्क्रिया-ना चाहते । आया हती न्वासनं स्वादु भोजनं सूनृतं वचः ' ( १।४।१०६ ) । इसकी व्याख्या ह मिताक्षरा में कही है — ' महान्तमुक्षाणं धौरेयं, महाजं वा श्रोत्रियाय यह सम्म ड ) किसीके उपकल्पयेत् -'भवदर्थमयमस्माभिः परिकल्पितः ' इति तत्प्रीत्यर्थम्, -जाते यथा - ' सर्वमेतत् भवदीयमिति, न तु दानाय व्यापादनाय वा, प्रति-रहते श्रोत्रियमुनाऽसम्भवात्, ' अस्वयं लोकविद्विष्टं धर्ममप्याचरेन्नतु ' इति कवचनसे निषेवाच्च । तस्मात् सत्क्रिया व कर्तव्या । अभिप्राय यह है - श्रोत्रिय * ( संस्कृत एवं विद्वान् जन्म - ब्राह्मण ) है, इसमें ही अतिथि किसीके घर में आ जावे, तो यह कहकर कि - ' महाभाग! सहसा स्वर्ग्य यह बड़ा बैल, या बड़ा बकरा आपका ही है ' इस प्रकार उसका : का सत्कार करे, क्योंकि उस समयका यही धन था । इसीसे उसका क्योंकि प्राणिबधः सौरना कहा है । मिताक्षरा का यहां यह कहना है कि यह वाचिक हैव सत्कार प्रकट करना मात्र है, उस बड़े बैलका उस श्रोत्रियको न तो दान करना इट है, न उसका मारना । इसमें श्रीविज्ञानेश्वर एक बढ़िया वचन उपपत्ति बताते हैं कि - श्रोत्रिय समय - समय पर प्रचुर मात्रामें किसीके घर पर कहै, जाते रहें, तो उन्हें देनेके लिए बलोवई ( सांड ) इतनी मात्रा में कहांसे सकता है । भाजायेंगे? उसका मारना भी इष्ट नहीं; क्योंकि एक बैल तो के ( न्यून से न्यून सौ अतिथियोंका भोजन हो सकता है, तब एककेलिए ' नाई । ' चमवन्तौ महिषीं हन्ति ' की भांति एक बैल कैसे मारा जा सकता है? चित् ऋषि * जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्काराद् द्विज उच्यते । विद्यया याति विप्रत्वं हो । त्रिभिः श्रोत्रिय एव च ' ( अन्निस्मृति १३८ ) CC - 0. Ankur Joshi शतपयका अतिथि सत्कार ३३३ Collection Gujarat. फलतः यहाँ वैसा कहकर श्रोत्रियका वाचिक सत्कारमात्र इष्ट होता है, न सांडका दान, न मारना । यह अर्थ ठीक भी है, क्योंकि शतपथ में ' पचेत् ' का अर्थ ' पकावे ' नहीं है, किन्तु ' व्यक्तीकुर्यात् ( प्रकट करे ) अर्थ है । इसमें ' पचि व्यक्तीकरणे - ( भ्वा ० से ० आ ० ) यह धातु है । बालमनोरमा टीका में ( श्रीगुरुप्रसाद - शास्त्री द्वारा काशी में तथा चौखम्बाके ) प्रकाशित संस्करण में यहाँ लिखा है- ' पचेत्येके ' अर्थात् - इस ' पचि ' धातुका पाठभेद ' पचू ' भी है । तब उसका अर्थ ब्यक्तीकरण ( प्रकट करना ) है । इस अर्थ में शतपथ ब्राह्मण और याज्ञवल्क्य-स्मृतिकी एकार्थकता सिद्ध होगई । अत्र प्रश्न यह है कि उक्त धातु आत्मनेपदी है, पर शतपथके प्रयोग में आत्मनेपद नहीं, इस पर यह जानना चाहिये कि आत्मनेपद तो ' अनुदात्तेत्त्वलक्षणमात्मने-पदमनित्यम् ' इस परिभाषासे अनित्य है । अतः शतपथ के वाक्य में वह नहीं हुआ, अथवा आर्पता से व्यत्ययत्रश नहीं हुआ । हमारा किया हुआ यह अर्थ समूल भी है । ' उनाणं पृश्निम-पचन्त ' ( ऋ सं. ११६४।४३ ) इस मन्त्र में ' पचू ' धातुकेलिए श्री-सायणाचार्यने लिखा है - " उदाणं- फलस्य सेक्कारं सोमम् ऋत्विजः अपचन्त – पचधात्वर्थानादरेण तिङ्प्रत्ययः करोत्यर्थः । स च क्रिया सामान्य-वचनः । अत श्रौचित्यात् सम्पादितवन्तः इत्यर्थः । " अर्थात् यहां ' पंच ' धातु का अर्थ ' सम्पन्न करना ' है । इस प्रकार दिङ्नागकी ' कुन्दमाला ' नाटिका में भी ' इक्ष्वाकूणां च सर्वेषां क्रियाः पुंसवना-दिकाः । अस्माभिरेव पच्यन्ते ' ( १।३१ ) यहाँ भी ' पच ' धातुका An eGangotri Initiative

पृष्ठ 180

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३३४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) अर्थ उपकल्पन वा सम्पादन ही है । इसी प्रकार ' नमो मत्स्य कूर्मादि-नानास्वरूपै... मखादि क्रियापाककर्त्रेऽधहन्त्रे ' इस प्रसिद्ध पुराण- प्रोक्त देव - स्तोत्र में भी ' पाककर्त्रे ' का ' उपकल्पक ' वा ' साधक ' ही अर्थ है । तब याज्ञवल्क्यप्रोक्त - शतपथके वचन में भी ' पच् ' धातुका सम्पादन, उपकल्पन इत्यादि अर्थ है, ' पकाना ' अर्थ नहीं । श्रीयाज्ञवल्क्यको वही अर्थ इसमें इष्ट है, जैसाकि — उन्होंने अपनी ' याज्ञवल्क्य-स्मृति ' में सूचित किया है । अब शेष प्रश्न यह है कि— ' सूर्य से शतपथ ब्राह्मण पानेवाले श्रीयाज्ञवल्क्य तथा याज्ञवल्क्यस्मृति बनानेवाले याज्ञवल्क्य क्या समान व्यक्ति हैं? क्या यह विश्वसनीय है? दोनों प्रन्थोंके भाषाभेद होने से दोनों की समानकालीनता वा एकता कैसे मानी जा सकती है? ' इसपर हम कहते हैं कि यह ठीक है, और विश्वसनीय है । इसमें हम प्रामाणिक विद्वानोंके प्रमाण उपस्थित करते हैं । ' न्यायदर्शन ' ( ४ | १ | ६२ सूत्र ) के वात्स्यायनमाष्यमें कहा है-' द्रष्टृ - प्रवक्तृ - सामान्याच्च धर्मशास्त्रस्य अप्रामाण्यानुपपत्तिः । ' ( अर्थात् जो मन्त्र ब्राह्मणके - द्रष्टा- प्रवक्ता हैं, वे ही धर्मशास्त्र के भी द्रष्टा प्रवक्ता हैं । ) श्री वात्स्यायन यह स्वयं स्पष्ट करते हैं- ' य एव मन्त्र त्राह्मणस्य - द्रष्टारः प्रवक्तारश्च ते खलु इतिहास - पुराणस्य धर्मशास्त्रस्य च ' ( इसीलिए समान- प्रवक्कृकता होने से मन्त्र- ब्राह्मणात्मक वेदके प्रामाण्य की तरह. धर्मशास्त्र - स्मृति का भी प्रामाण्य है ) । इससे शतपथ ब्राह्मण के द्रष्टा श्रीयाज्ञवल्क्य ' याज्ञवल्क्यस्मृति ' CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An शतपथका अतिथि सत्कार २३६ ( ' धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः ' ( मनु. २/१० ) के प्रणेता भी सिद्ध हो हुआ गये । भाषाभेद का कारण यह है कि याज्ञवल्क्यस्मृति ब्राहाण श्रीयाज्ञवल्क्य की अपनी पौरुषेय रचना है और शतपथ ब्राह्मण थोड़ा-उसकी सूर्य से प्राप्त अपौरुषेय रचना है । अतः भाषाभेद स्वाभाविक हुआ है 1 । यहाँ कालभेद की कोई बात नहीं । उ आर्यसमाजके चार वेदसंहिताओंके भाष्यकार श्री जयदेक पुस्तक जी विद्यालंकारने ‘ वेदवाणी ' ( ५/४ ) में ' क्या वेद में इतिहास है । ब्राह्मणो इस अपने निबन्धमें लिखा है - ' ( ३ ) हमारी धारणा है रि भाषा के बेद की भाषा सर्वप्रथम है, लौकिक - संस्कृत उससे भिन्न है, वह भी विषयाज्ञ वेदकालमें प्रचलित रही, और वेदके जाननेवाले ऋषिगण हो ' भ वेदके विद्वान् होकर जब लौकिक साहित्य में ग्रन्थ रचते थे; ते मगद वे लोकप्रसिद्ध संस्कृतमें रचते थे । वैदिक भाषासे उनके लौकिक संहिता ए की भाषा अनेक अंशों में भिन्न थी, जिनका निर्धारण पाणिनि घोर इतिहास उनके पूर्व के ऋषि - मुनियों के व्याकरणों में होता था । ' ( पृ ० ६ ) रचना के आर्यसमाजके रिसर्चस्कालर श्रीभगवद्दत्त जी बी. ए. महाराज तथा या ने अपनी बड़ी गवेषणा से प्रसूत ' भारतवर्षका वृहद् इतिहास माषा में ( प्रथमभाग ७३ पृष्ठ ) में लिखा है - ' वात्स्यायन मुनिका मत पू इस ब्राह्मणग्रन्थोंके द्रष्टा - प्रवक्ता का ' पं ० ईश्व उद्धृत किया जा चुका है । तदनुसार रचयिता । लाहौर के ऋषि ही इतिहास, पुराण, आयुर्वेद तथा धर्मशास्त्र च्यादिके यह मत भारतवर्ष में स्वीकृत सत्य इतिह पुराण त मुनि वात्स्यायनका मत आर्य - परम्परासे विरुद्ध हे वृहद् ग्रन का एक अंग था । यदि यह ' शतपथ-तो बौद्ध और जैन विद्वान् इसका खण्डन अवश्य करते, पर से श्रादिप्रय eGangotri Initiative