सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 201–210

सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 201–210

पृष्ठ 201

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श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) ३७६ नर्मूल उपपत्ति देकर कर रही है, वैसे व्यक्तिको गर्भ हत्यारा, निषेध विवाद और पापी कहती है, तो गाय - बैलके खाने का तो प्रति-है सर्व निषेध सिद्ध होगया । इसीको अनुसृत करके का? अन्नरे पक्षी के अनुसार ' कात्यायन - श्रौतसूत्र ' में भी कहा है – ' घेन्वनडुयोर्नाश्निीयात् ' चाहि हो; तो खा ( ७ | २ | २२ ) इसका अर्थं कर्कभाष्यमें इस प्रकार किया है— ' घेन्बनडुद्द्योमींसं नाशितव्यम् ” तब यह जो वादीने प्रश्न उठाया - कर है कि - पुरोहितको बैलका मांस खाना चाहिये वा गायका- यह देते हैं-G गलत तथा उसकी अपनी गढ़ी हुई निकली! क्योंकि ऐसा कैसे निर्मात प्रश्न होने पर तो उत्तर देने के समय दोमें एककी अभ्यनुज्ञा या करते हैं । पादयति श्रवश्य होती; पर यहां तो दोनों के ही अशनका ' तस्माद् घेन्वनडुह-। योर्नाश्निीयात् ' इस उपसंहारसे निषेध सिद्धान्तित कर दिया; विभृतः । न्येषां तब प्रतिपक्षीसे उठाया हुआ प्रश्न ही निर्मूल सिद्ध हुआ । वच वीर्यमासील जोकि - प्रतिपक्षीने दोनों में एकके मृदु ( नर्म ) मांस होने पर यिष्ठं भुक्क याज्ञवल्क्य के मत में पुरोहितके अशनकी अभ्यनुज्ञा बताई है; अन्तगतिवि भी बनी है । वह ' अश्नाम्येव श्रहम् ' इस मुलसे - पापमद्द विरुद्ध ही है । यहां तो याज्ञवल्क्यका व्यक्तिगत अशन सूचित - सा हो रहा है: यहां ' अहम् अश्नामि ' यह पद तथा उत्तम पुरुषकी ( शशरार ) क्रिया प्रत्यक्ष ही है । तब यह व्यक्तिगत कार्य समष्टिगत कैसे माना जा सकता है? और फिर उसमें विधि - लिहू भी नहीं है कि-है; तब उसकी सर्वसाधारणार्थ आज्ञा हो जावे । वैयक्तिक बात जब नवा वह शास्त्रीय - सिद्धान्तके विरुद्ध हो; तब सर्वसाधारण के लिए कभी के अ विधि नहीं बन जाती; वह अपवाद होती है । अपवाद - वचन उसी CC - 0. Ankur Joshi पुरोहितका गवाशन निर्मूल ३७७ अपने स्थल में संकुचित हो जाता है, उत्सर्ग ( सामान्य - शास्त्र ) को कभी बाधित नहीं कर सकता । अपवाद किसी सिद्धान्त ( उत्सर्ग ) का खण्डन नहीं करता, वह उत्सर्गमें किसी विशेष के लिए सङ्कोच मात्र कर सकता है । प्रत्येक औत्सर्गिक - वचनका अपवाद भी कचित् होता है । सत्य बोलना उत्सर्ग है, पर किसी धार्मिकके प्राणादि बचाने के लिए, वा किसी अन्यायी वा उसके साथी के मारणार्थ असत्य बोल देना अपवाद है! यदि अपवाद उत्सर्गका खण्डन कर दे; तब तो ' सत्यमेव जयते ' ( मुण्डको ३ | १ | ६ ) यह सिद्धान्त ही न रह जाय । अतः शास्त्रकारोंने अपवादको केवल इतना ही अवसर दिया है कि वह विधिशास्त्र में स्वातिरिक्तत्वेन सङ्कोच मर कर सके; तब प्रकल्प्य ( उत्सृज्य वा ) श्रपवादविषयं तत उत्सर्गोऽभिनिविशते ' ( महाभाष्य ३।२।१२४ ) इस नियमसे शेष सर्वत्र उत्सर्ग ही बच जाता है । इस प्रकार उत्सर्ग एवं अपवादकी एकवाक्यता हो जाती है । इसी तरह याज्ञवल्क्यके वैयक्तिक कथन से - जिसमें कि उत्तम पुरुष ज्ञापक है — न तो उसके कथनमात्र से वाशनका सिद्धान्त स्थिर किया जा सकता है; और न ' तस्माद् वेन्वनडुद्दयोर्नाश्नीयात् ' इस श्रौतसिद्धान्तका खण्डन किया जा सकता है । यह सब हमने प्रतिपक्षी के अर्धको मानकर वादितोष न्यायसे उत्तर दिया; वस्तुतः वादीका यह अर्थ ही गलत है । यहां प्रकरण ही भिन्न है, श्रीसायणाचार्यने उसे स्पष्ट कर दिया है । वह यह है कि - जब यजमान क्षौर कराकर स्नान करके वस्त्र पहिरे, तब Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 202

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३७८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) अध्वर्यु उसका शालामें प्रवेश कराये । तब प्रवेशकर्ता यज्ञदीक्षाकी पूर्त्यर्थं उपवास करे; तब गोदुग्धसे निर्मित मलाई - रबड़ी आदि, तथा बैलसे कृष्ट अन्नादि न खावे । यहां श्रीसायणके शब्द यह हैं - ' अस्यापि ( शालाप्रवेश - कर्तः ) अशनकालत्वाद् अत्र अशने कश्चिद् नियममाह-घेन्वै - धेनोः क्षीरादिकम्, अनडुहः सम्बन्धि कर्षणसाध्य-मित्यर्थः, तदुभयं नाश्नीयात् । तद् अश्नतः सर्वाशनं भवति, तस्य च जायाया गर्भ - सम्भवे सति तत् सर्वाशनं तं रेतोरूपेण परिणतं गर्भं हिंस्यात्, तत् पापकीर्तिः स्यात् । तद् उभयोः ( घेन्वनडुयोः ) ( पायसम् ) अन्नं ( च ) नाश्नीयात् । तत्र याज्ञवल्क्य -पक्षमाह् = चेत् - यस्माद् उभया - ( धेन्वनहुहा - ) न्नाशने शरीरम् सलं [ बलवद् ] भवति, तस्मात् तयोरन्नमश्नीयामेव ' । उक्त कण्डिका में ' घेन्वै ' में षष्ठी - अर्थ में चतुर्थी ( २३६२ इस कात्यायन के -वार्तिकसे ) है; यहां द्वितीया नहीं है; जोकि प्रतिपक्षी द्वितीयाका करते हैं । इससे स्पष्ट है कि यहां याज्ञवल्क्यका गोदुग्धसे निष्पन्न पायस आदि तथा वैसे कृष्ट अन्नका अपने लिए खाना कहा है - जो शाला प्रवेशक के लिए निषिद्ध था; तब याज्ञवल्क्यके ऊपर कोई दोष नहीं पड़ता । कइयोंके अनुसार यह सोमयागका प्रकरण है; उसमें उपवास करना पड़ता है । यज्ञसमाप्तिसे पूर्व खाना देवताओं का अपमानकारक होता है । अब प्रश्न हुआ कि - यज्ञकर्ता सर्वथा अनशन करे; तो यज्ञके दीर्घ होनेसे कृशतावश वह यज्ञ कैसे कर CC - 0. Ankur Joshi Collection पुरोहितका गवाशन (? ) सकेगा? तब उसे खाना तो अवश्य ही कुछ चाहिये; पर न खाने जैसा हो: थोड़ा पायस खावे या खेतीका अन्नविशेष वह र श्रमांस उत्तर में गाय के दुग्धजन्य तथा वैलके कर्षणजन्य अन्न दोनों! पद्मि के खाने निषेध कर दिया गया । पर याज्ञवल्क्यका मत है कि दुग्धानि शरीर अंसल - बल युक्त होता है, अतः उसे अल्पमात्रा में खा ले हानि नहीं है । भक्ष्या, फलतः यहां मांसका नाम भी नहीं है; तब उसे इसमें अनुदिष्ट प्रक्षिप्त किया जाता है? कन्याके घरमें जब हम जाबै; तो बन विवदन्त कोई व्यक्ति हमें शिष्टाचारवश भोजनार्थं कहे; तब हम नहीं । देते हैं कि - ' हम कन्याका नहीं खाते ' । तब क्या यहां का हैं, तब मांस ' ` अर्थ कर लिया जावेगा? ' तस्मादाहुने दीक्षितस्य अनी ' सरिता ' ( ऐतरेय ० ६ । ६ ) यहां दीक्षितका खाना निषिद्ध किया गया है । उत्त क्या दीक्षितका मांस खाना कहा जावेगा? ३५ स्थ जोकि प्रतिपक्षी कहता है कि- यदि वह मांस अंसल ' च ' पूर्व हो; तो खा सकते हैं; तो क्या ' असल ' का अर्थ ' नरम ' होता है । मक्ष्याः ' यदि ऐसा है; तो इसमें प्रमारण क्या है? क्या यहां कच्चे मांस होते ' सन्ति ' बात चली हुई थी कि कड़े मांसके अर्थकी प्राप्ति उपस्थित हो दई ' पञ्च - न क्या मनुष्य कच्चा मांस भी खाता है? वह तो राक्षसका को ३१ सूत्र अपकर्षण मनुष्यका नहीं | तब उसका यहां क्या प्रसङ्ग? ' असल'का ' अथातो तो बलकारक होता है, देखिये पाणिनिका सूत्र ' वत्सासम भक्ष्य कामबले ' ( ५।२।६८ ) अमरकोष भी देख लीजिये - ' मांसल क प्रतिपक्षी ( २ | ६ | ४४ ) तो मांसका मांसलता - कथन मी व्यर्थ था; क्या Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 203

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) पर वह भी होता है? इससे प्रतिपक्षीका अर्थ अशुद्ध और नविशेष श्रमांसल हो गया । हमने तो वास्तविक अर्थ बता ही दिया है । १ पर प्रसिद्ध दोनों के सारे कि- ( ७ ) वसिष्ठ - वचन । दुग्धादि पूर्वपक्ष – वसिष्ठस्मृति में लिखा है - ' श्वाविच्छल्य ' ' गोधा भक्ष्याः, नक्रकुलीरा अविकृतरूपाः सर्पशीर्षाश्च, गौरगवयशरभाद्याश्च से इसमें से अनुदिष्टाः तथा; धेन्वनड्वाहौ मेध्यौ वाजसनेयके विज्ञायेते । खड्गे तु जावें; तो विवदन्ति अग्रामसूकरे च ' अर्थ - श्वावित् ( साही ) आदि अभक्ष्य तब हार नहीं । वाजसनेयक के मतमें गाय - बैल मेध्य अर्थात् मक्ष्य यहां ' कला हैं, तब प्राचीन भारत में गोवध सिद्ध हो गया । ( रतनलाल बंसल -स्य अनंद ' सरिता ' में ) या उत्तरपक्ष – प्रतिपक्षीने वसिष्ठस्मृतिके १४-३० । ३१ । ३२ । ३३ । ३४ ३५ स्थलके वचन दिये हैं । यहां पर ' सर्पशीर्षाश्च ' ( ३२ ). यहां अंसल ' च ' पूर्वके ' श्वावित् - शल्यक - शशक - कच्छप- गोधाः पञ्चनखानां = म ' होता है । मदया: ' ( १४ | ३० ) इस सूत्र के ' भक्ष्या: ' इस शब्दसे सम्बद्ध है उचे मांस हो ' सन्ति ' क्रियाका अध्याहार हो जाता है । अब इसका अन्वय हुआ, पस्थित हो ' पञ्चनखानां मध्ये श्वाविधादयो भक्ष्याः ( ३० ) इसी ‘ मक्ष्याः’की इसका का ३१ सूत्र में भी अनुवृत्ति है, ३२ में ( ' सर्पशीर्षाश्च ' ) में भी ' च ' से अपकर्षण है, यह स्पष्ट है । इस अध्यायकी आदिमें लिखा है कि-सलका ' वत्सांसाम ' अथातो भोज्याभोज्यं च वर्णयिष्यामः ' अर्थात् — इस अध्याय में ' मांसलों भक्ष्य और अभक्ष्य पदार्थोंका वर्णन करेंगे । ( १४ । १ ) परन्तु प्रतिपक्षीने इन प्रमाणों में सभी मक्ष्य बतला दिये, अमच्य कोई था; क्या CC - 0. Ankur वसिष्ठ वचन - ३८१ Joshi Collection Gujarat. मी नहीं बताये । ' पञ्चनखानां मदयाः ' के स्थान ' पञ्चनखा नाऽमक्ष्याः ' यह पाठ लिख दिया - यद्यपि इससे हमारे पक्ष की कोई हानि नहीं । आगे ' गौरगवयशलमाश्च अनुदिष्टास्तथा ' यह जो वाक्य वादीने लिखा है; यहांके ' तथा ' का अग्रिम सूत्र के ' घेन्वनड्वाही ' पदसे सम्बन्ध है; परन्तु वादीने ' तथा ' इस आगे के सम्बद्ध पदको इस सूत्र के साथ कर दिया । ' अनुद्दिष्टाः ' को ' अनुदिष्टाः ' रूपसे लिखा, जिससे अर्थ ही उलट गया । हमारे पासमें स्थित ' ब्रह्मप्रेस इटावा'-में प्रकाशित अष्टादशस्मृति में वसिष्ठस्मृति में हमारा दिखलाया ही पाठ है । यह हम पहले कह चुके हैं कि- ' सर्पशीर्षाच ' ( १४३२ ) इस ' च'का ' भक्ष्या: ' इस अपनेसे पूर्वके शब्दसे सम्बन्ध है, और ' सन्ति ' क्रियाका अध्याहार है, सो यह तो ग्रन्थकारके - मतमें परि-संख्याविधिसे अमक्ष्य हैं । परन्तु आगे के सूत्र में ' अनुद्दिष्टाः, यह नई क्रिया है; उससे पूर्व के शब्द ' भक्ष्याः का तो अनुकर्षण- 1. चल रहा है; पर ' अनुद्दिष्टा: ' इस नई क्रियाके आजानेसे ' सन्ति ' क्रियाका अध्याहार न रहा; अब योजना हुई कि - गौरगवयशरभाश्च ' भक्ष्याः ] अनुद्दिष्टाः ( ३४ ) अर्थात् - गौरगवय आदि भक्ष्य नहीं कहे गये, किन्तु अभक्ष्य हैं । इससे सिद्ध हुआ कि— यहांसे अभदय जीवोंका वर्णन जारी हुआ । अथवा ' तथा ' शब्द इस वाक्य की ' अनुद्दिष्टा: ' क्रियासे भी सम्बद्ध माना जावे; तब भी ' तथा ' का अर्थ होगा ' मक्ष्याः ', ' अनुद्दिष्टाः ' का अर्थ होगा- ' न मताः ' अब योजना हुई कि गौरगवयाद्याः तथा ( मक्ष्या ) अनुद्दिष्टा: -न An eGangotri Initiative

पृष्ठ 204

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३८२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) मता: ' । अर्थ यही हुआ कि ये अभक्ष्य हैं । इस प्रकार ' अनुद्दिष्टाः ' क्रियासे स्पष्ट होगया कि - गौरगवयादि भक्ष्यों में नहीं; और अब अमयोंका प्रकरण जारी हुआ । टीकाकारोंने भी इसी प्रकार लिखा है । वेद - व्याख्याता श्रीमीमसेनजीने उक्त स्मृति की अपनी टीकामें ' गौरगवयशरभाश्च अनुद्दिष्टाः ' ( ३३ ) सूत्र पर लिखा है-' गौरमृग, नीलगाय और शरभ मक्ष्यों में उद्दिष्ट नहीं हैं । अन्य प्राचीन विद्वान् श्रीकृष्ण - धर्माधिकारीकी टीका ' विद्वन्मोदिनी ' में भी उक्त सूत्रकी अवतरणिका में लिखा है- ' अभक्ष्यान् श्राह - गौरेति ' । इस प्रकार गौरगवय आदि अमक्ष्य सिद्ध हुए, पर प्रतिपक्षीने इस बातको छिपा दिया है, अर्थ ही नहीं लिखा । तब इस अभदयोंके प्रतिपादक सूत्रसे आगे के ' तथा धेन्वनडु-द्दौ मेध्यौ वाजसनेयके विज्ञायेते ' ( १४।३४ ) इस सूत्र के ' तथा ' शब्दसे, अथवा अभक्ष्योंके प्रकरण में स्थित होनेसे घे ( गाय - बैल ) की अभक्ष्यता स्पष्ट अनुवृत्त हुई हुई है । इसमें हेतु दिया गया है कि- ' तौ मेथ्यौ ' अर्थात् मेधाके अनुकूल हैं; क्योंकि गाय मेघावर्धक दूध देती है, और बैल उस दुग्धका कारण होता है । यदि बैल गाय में गर्भ न धारण करे; तो गायका दूध ही कैसे हो? तब दोनों ही मेध्य तथा अभक्ष्य सिद्ध होगये । बौधायनधर्मसूत्रमें ' वघे घेन्वनडुहोरन्ते चान्द्रायणं चरेत् ' ( १।१६।६ ) यहाँ गाय - बैलके बधका प्रायश्चित्त कहा है । यदि ऐसा है; तो वे भक्ष्य कैसे हो सकते हैं? बिना वधके उनका भक्षण कैसे हो सके? वहीं ‘ श्रमक्ष्याः पशवो ग्राम्याः ' ( १।११।१ ) यहाँ भी CC - 0. Ankur Joshi Collection दशिष्ट - वचन ३६ गाय अश्व आदि ग्राम्य पशुओंको अभक्ष्य सूचित किया वा सूत्रोंमें विरोध नहीं हो सकता, इसलिए गाय - बैल अमय है ही । धर्म वृष ' मेध्य ' का अर्थ ' पवित्र ' भी है - मेधनाह । ' मेधृ सङ्गमे शत च ' ( स्वाद से. ) । यहाँ हिंसार्थ नहीं हो सकता, क्योंकि उसमें वृष अपवित्र हो जाती है । ' मेधा ' का अर्थ यदि सर्वथा ' हिंसा ' माना क्का । ‘ गृहमेधिनः’का अर्थ भी ‘ गृह - हिंसक ' हो जावे, ' गृहस्थ जावे ' नहीं; । से ' सर्वमेध ' यज्ञ में ' सर्वदान ' न होकर ' सर्वहिंसा ' अर्थ हो यह जाए; पर यह अर्थ किसीको भी इष्ट नहीं हो सकता । इस प्रतिपक्षीने वाजसनेयकके मत में बेन्वनडुहको पवित्र अर्थात् | धर्म भक्ष्य माना है | इसमें ‘ पवित्र'का अर्थ ' भक्ष्य ' कैसे होगया? इस पवित्रकी भी हिंसा की जाती है, अथवा बिना हिंसाके उसे हड़ा मान कर लिया जाता है? वस्तुत: यह अर्थ अशुद्ध किया गया है । इस मतकी पुष्टिमें वादीने वाजसनेयका अनुमोदन माना है । वाजसने ' शतपथ ' का नाम है; तब ' शतपथब्राह्मण ' का ' तस्माद् धेन्वनडुङ्ग २६ योर्नाश्नीयात् ' ( ३ | १ | २ | २१ ) यह वचन तो प्रतिपक्षी के अनुसार यी पड़ सिद्धान्तपक्ष कहता है कि धेन्वनडुहका अशन न करना । इसीको घस्य अनुसृत करके कात्यायन श्रौतसूत्र में भी कहा है- ' घेन्वनदुइ-योर्नाश्नीयात् ' ( ७/२/२२ ) इसमें कर्कभाष्य इस प्रकार है- ' चेन्न तथ डुन्मांसं नाऽशितव्यम् ' स धेन्वै अनडुहश्च नाश्नीयात् ' इति वचनात् ' । तब प्रतिपक्षीकी इससे क्या इष्टसिद्धि हो सकती है? उसक आगे तो ' शतपथब्राह्मण ' ' तद्ध एतत् सर्वाश्यमिव यो धेन्वनडु-हयोरश्नीयात्, गर्भं निरवधीत् पापमकत् ' ( ३ | १ | २/२२ ) यह कहना Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 205

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ३८४ वादी अनुसार भी धेन्वनडुहके भक्षककी निन्दा करता है । गो-है । वृषभक्षकको सर्वभक्षी, गर्भघातक एवं पापी कहता है; तब उसी बक्ष्य ही है । शतपथ के मतको आदर से उद्धृत करनेवाला वसिष्ठधर्मसूत्र गो-च ' ( स्वाल इनका अर्थ कैसे कर सकता है? तब ' भदयो ' यह - अपवित्रा क्वाचित्क वृषभ पाठ शतपथसे विरुद्ध होने से उपादेय नहीं । जावे; तो इसीलिए ' गौतमधर्मसूत्र ' में भी ' घेन्वनडुहौ च ' ( २२८ | ३० ) स्थ ' नहीं । यहाँ पर गो - वृषभको अमक्ष्य माना गया है । श्रीहरदत्तने मी जाए पर इसकी टीका में कहा है – ' घेन्वनडुहौ च श्रमच्यौ ' । आपस्तम्ब-धर्मसूत्रमें भी ' एकखुरोष्ट्रगवयग्रामसूकर शरभगवाम् ' ( १ | १७ | २६ ) अर्थात् । इस सूत्र में ' गवाम् ' इस अन्तिम पदसे गौ ( गाय - बैल ) को अभक्ष्य या? क्या माना है । उसे हर ' वेन्वनडुहृयोर्भक्ष्यं, मेध्यमानडुहम् - इति वाजसनेयकम् [ मतम् ] ' ना है । इस ( १ । १७ । ३०-३१ ) यह सूत्र आपस्तम्ब धर्मसूत्र में अभी - अभी कहे वाजसनेव २६ सूत्रके आगे है । इस सूत्र के अर्थ में श्री हरदत्तमिश्रको भ्रम घेवनदु पड़ गया जो कि - उसने लिखा- ' वेन्त्रनडुहोर्मास भक्ष्यम् ' गोप्रतिषे-अनुसार भी घस्य प्रतिप्रसवः ' । जबकि पूर्वसूत्र में गाय - बैलको क्योंकि - गोशब्द । इसी लिङ्ग - भेदसे दोनोंका वाचक होता है - अभक्ष्य माना गया है; धेन्वनदुर तब इस सूत्र में उसे भक्ष्य कैसे कहा जा सकता है? यदि कहो कि— -घेव यह सूत्र उसका बाधक है; तो वह निषेध फिर कहाँ चरितार्थं यात् ' इति होगा? तब तो पूर्व - सूत्र में उसका कथन ही व्यर्थ हो जायगा । यहाँ ती है? उसका ' प्रतिप्रसव ' शब्द कहना भी व्यर्थ है, प्रतिप्रसव वहाँ होता धेन्वनडु है, जहाँ पहले विधि हो, फिर निषेध हो; फिर निषेधको बाँधकर यह कहकर CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. वसिष्ठ - वचन ३८१ विधि हो; तभी प्रतिप्रसव होता है । यहाँ इस प्रकार की बात नहीं । वस्तुतः यहाँ तात्पर्य यह है कि - श्रुतिने तो गायके दूध तथा बैलके कृष्ट अन्नका निषेध कर दिया था; पर वाजसनेय ( याज्ञवल्क्य ) का मत यह है कि गायका दूध, तथा वृषभकृष्ट अन्न जो शाला-प्रवेष्टाकेलिए ‘ तस्माद् ' वेन्चनडुहृयोर्नाश्नीयात् ' ( शत. ३।१।२: २१ ) इस श्रुतिसे अभक्ष्य था, ( देखिये इसमें सायणमाध्य ), वह याज्ञ-वल्क्यके मतानुसार बलकारक होनेसे भक्ष्य बताया गया है, उसका मांस नहीं । इसलिए ३१ सूत्र में आनडुह - चैलसे कृष्ट अन्न, तथा बैलके कारण से अनडुड़ी ( गाय ) में उत्पन्न दूधको वाजसनेयके ( याज्ञवल्क्यके ‘ अश्नाम्येव ' इस ) कथनसे मेध्य कहा है । हरदत्तके अनुसार यदि अनडुह का माँस मेध्य है; तो फिर गायका अमेध्य हो जायगा तब वह मक्ष्य कैसे हो सकेगा? वस्तुतः यह उसका अर्थ भ्रमका दुर्विलसित है । धर्मसूत्रों में परस्पर - सम्बद्ध ही मत सङ्गत हुआ करता है; परस्पर विरुद्ध होनेपर दोनों ही असङ्गत हो जाएँगे । ' अंसलभोजनं वा ' ( कात्या.श्रौ. ७१२/२४ ) सूत्रका अर्थ वही याज्ञवल्क्यानुसार दुग्धादिकृष्ट अन्न आदि पोषक वस्तुओंका भोजन करना है; इसका गाय - बैलके मांसभक्षणसे कोई सम्बन्ध नहीं, क्योंकि उसे तो कात्यायनने पहले ( ७२/२२ सूत्रमें ) ही निषिद्ध कर दिया था । स्थूलत्व - कृशत्वमें घेन्वनडुह - भाव नष्ट नहीं हो जाता कि उसके पहले निषिद्ध कर देने पर फिर उसके स्थूलत्व में उसकी विधि हो जाए? फलतः यहाँ याज्ञवल्क्यके धेन्वनडुहके स ० ध ० २५ An eGangotri Initiative

पृष्ठ 206

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ३८६ - पोषक दुग्ध, कृष्ट- अन्नका अशन इष्ट है, मांसका नहीं - यह अंसल साक्षीसे स्पष्ट कर चुके हैं । यह कात्या-हम पहले सायरणमाष्यकी छायारूप यनश्रौत्रसूत्र के सूत्र भी उसी शतपथके कण्डिकाओंकी ही हैं । अस्तु । के सूत्र पर चलना चाहिये - । अब प्राकरणिक वसिष्ठधर्मसूत्र पूर्व - सूत्र के आगे ' खड्गे तु विवदन्ति ' इस सूत्र से जिसका अर्थ प्रतिपक्षीने यह किया है कि- ' गेंडे और ग्रामशूकर के सम्बन्ध में ऋषिगण विवाद करते हैं, अर्थात्- कोई उन्हें भक्ष्य और कोई उन्हें अमक्ष्य बताता है ' इस अर्थसे तो अत्यन्त स्पष्ट हो रहा है । कि इससे पूर्वसूत्रमें स्थित घेन्वनडुह ( गाय - बैल ) तो निर्विवाद ही श्रमक्ष्य हैं । यदि प्रतिपक्षी के अनुसार गाय चैल निर्विवाद भक्ष्य इष्ट होते; तो यह उनकी मदयता निर्विवाद न होती, क्योंकि उनकी अमक्ष्यता वा उनकी हिंसाका निषेध प्रचुरमात्रा में मिलता है । जैसेकि - ' न चासां [ गवां ] मांसमश्नीयात् ' ( महा.अनुशासन.७८।१७ ) सर्वमान्य वेदमें ही वृषभका नाम ' अन्य ' ( अथर्व. ६।४।१७ ) और गायका नाम ' अघ्न्या ' ( अथर्व ६४ १६ ) इत्यादि स्थलों में प्रसिद्ध है । अन्य धर्मसूत्रों के एतद्विषयक वचन हम उद्धृत कर ही चुके हैं । तब ' घेन्वनडुह ' निर्विवाद भक्ष्य कैसे होते?? तब तो श्रीवसिष्ठ ' घेन्वनडुह'को भी भक्ष्य - अभक्ष्यों में विवादास्पद होने से ' खड्गे तु विवदन्ते ' ( १४।३५ ) इस सूत्र में ही रखते; पर ऐसा न करके श्रीवसिष्ठने उन्हें इस सूत्रसे पहले के सूत्रमें रखा है - इससे बसिष्ठ-के कथनानुसार ही ' घेन्वनडुह ' ( गाय - बैल ) की निर्विवाद वसिष्ट - वचन अभयता सिद्ध हुई । महाभारत के अनुशासनपर्व में ( ७४ गोखाद की दुर्दशा बताकर निन्दा की गई है । इस । ३४ ) । प्रकार प्रति पक्षी इस बड़े प्रमाणका भी समाधान ठीक - ठीक होगया । ( ८ ) एक प्रश्न ( प्र. ) मनु दिने वर्जित मांसों में गोमांसका कहीं भी स्पष्ट | शब्दों में निषेध नहीं किया, तब गोमांस प्राचीनकाल का मक्ष्य ही सिद्ध हुआ । ( सुधारकगण ) उत्तर- मनुजीने कहीं नर - मांसका भी तो स्पष्ट शब्दों में निपेत नहीं किया; तो क्या नरमांस भी प्राचीनकालका भक्ष्य था? मनुजीने तो सभी प्रकारके मांसोंका निषेध किया है । जैसे कि - ' यो ऽहिंसानि भूतानि हिनस्त्यात्मसुखेच्छया । स जीवँश्च मृतश्चैव न क्वचित् सुखमेधते ' ( मनु. ५ | ४५ ) ' नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्वचित् । न च प्राणिवधः स्वर्ग्यः, तस्मान्मांसं विवर्जयेत् ' ( ५/४६ ) समुत्पत्तिं च मांसस्य वधवन्धौ च देहिनाम् । प्रसमीक्ष्य निवर्तेत सर्वमांसस्य भक्षणात् ( ५/४६ ) वर्षे वर्षेऽश्वमेधेन यो यजेत शतं समाः ॥ मांसानि च न खादेद्यः तयोः पुण्यफलं समम् ' ( ५।५३ ) अनुमना विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी । संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातकाः ( ५/५१ ) ' फलमूलाशनैर्मेध्येर्मुन्यन्नानामपि भोजनैः । न तत् फलमवाप्नोति यन्मां सपरिवर्जनात् ' ( ५।५४ ) ' मां स मयता S सुत्र यस्य मांसमिहादुम्यहम् । एतन्मांसस्य मांसत्वं प्रवदन्ति मनीषिणः ' ( ५।५५ ) इतने स्पष्ट शब्दों में सभी मांसभक्षण के निषेष CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 207

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३८० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ३८८ ( ४ ३ ) | करने वाले मनु गोमांसकी भक्षणीयता कैसे कह सकते हैं? वे । कार प्रति तो मांसमात्रको घृणित समझते हैं । जब वे ' विहित ' - मांसका खाना भी अभक्ष्य बताते हैं; तो निषिद्ध - मांसकी भक्षणीयता वे कैसे बता सकते हैं? भी स्पष्ट भक्ष्य ही में निषेध १ मनुजीने हिंसा क्वचित् समुत्पद्यते ( ५४८ ) निवर्तेठ शतं समाः । अनुमन्ता कश्चेति जनैः । भक्षयिता । प्रवदन्ति के निषेध गोहनन के लिए देखो मनुजी क्या प्रायश्चित्त बताते हैं - गोनो ' मासं यवान् पिवेत् । कृतवापो वसेद् गोष्ठे चर्मणा तेन संवृतः ’ ( ११।१०८ ) चतुर्थकालमश्नीयाद् अक्षारलवणं मितम् । गोमूत्रेणा-चरेत् स्नानं द्वौ मासौ नियतेन्द्रियः ' ( १०६ ) दिवानुगच्छेद् गास्तास्तु तिष्ठन् ऊर्ध्वं रजः पिवेत् । शुश्रूषित्वा नमस्कृत्य रात्रौ वीरासनं वसेत् ' ( ११० ) तिष्ठन्तीष्वनुतिष्ठेत्तु व्रजन्तीष्वनुसंव्रजेत् । आसीनासु तथा ss सीनो नियतो वीतवत्सरः ' ( १११ ) यह प्रायश्चित्त गो - सेवा बताकर ( जैसेकि राजा दिलीपने कामधेनु गायका अपमानरूप वध करके किया था ) फिर गोदान कहा है- ' वृषभैकादशा गाश्च दद्यात् सुचरितव्रतः । अविद्यमाने सर्वस्वं वेदविदुद्भ्यो निवेदयेत् ' ( ११६ ) तब मनुजीके मत में गोवध कभी विहित नहीं हो सकता । जब मुख्य स्मृतिकार श्रीमनु निषेधक हैं; तब अन्य स्मृतिकार उसे कैसे लिख सकते हैं? ( ६ ) रन्तिदेवके गोवध पर विचार । पूर्वपक्ष - महाभारत वनपर्व में ' अहन्यहनि वध्येते द्वे सहस्र गवां तदा । समांसं ददतो ह्यन्नं रन्तिदेवस्य नित्यशः ' ( २०८ । ६ ) ' आलभ्यन्त शतं गावः सहस्राणि च विंशतिः ' ( शान्तिपर्व ) यहाँ CC - 0. Ankur Joshi Collection रन्तिदेवके गोवध पर विचार ३८६ रन्तिदेव - राजा द्वारा अतिथियोंके लिए अपनी पाकशालामें दो हजार गौओं के काटने से जिसे मेघदूत में कालिदास महाकविने भी सूचित किया है और इससे इतनी खालें हुई, जिससे चर्मण्वती नदीका प्राकट्य माना गया, जिसे आज चम्बल नदी कहते हैं - से सिद्ध होता है कि - शतपथादिके प्रमाण में महोक्ष- बेल आदिका पकाना अर्थ है, अन्य अर्थ नहीं ( रतनलाल बंसल ' सरिता ' पत्रिकामें ) उत्तरपक्ष - रन्तिदेवकी कथा में उक्त पद्यमें ' गो ' शब्द पशुवाचक है, गाय - वाचक नहीं । इसका प्रमाण निरुक्तादिका पहले हम दे ही चुके हैं; अब पाठक इस कथाकी ही साक्षी देखें! यही रन्तिदेव की कथा फिर द्रोणपर्व में भी आई है । वहाँ यह पद्य मिलता है-' उपस्थिताश्च पशवः स्वयं यं शंसितव्रतम् । बहवः स्वर्गमिच्छन्तो विधिवत् सत्रयाजिनम् ' ( ६७१४ ) यहाँ ' पशु ' शब्द है; इससे स्पष्ट है कि- रन्तिदेवकी कथामें भी गोवध नहीं, किन्तु ' पशुवध ' सम्भव है; गायके ' अघ्न्या ' होनेसे यहाँ उसका नाम कैसे सम्भव हो सकता है? बल्कि प्रतिपक्षीसे दिये हुए पद्यसे पूर्व मी ' पशु ' शब्द आया है - ' राज्ञो महानसे पूर्व रन्तिदेवस्य वै द्विज! द्वे सहस्र तु वध्येते पशूनामन्वहं सदा ' ( वन. २०८८ ) । आक्षिप्त पद्यसे आगे के ' चातुर्मास्ये च पशवो वध्यन्ते इति नित्यशः ' ( १० ) इस पद्यमें मी ' पशु ' शब्द है; तब पूर्वोत्तर - साहचर्य से तथा द्रोणपर्वकी साक्षीसे यहाँ ' गो ' शब्द पशुवाचक सिद्ध हो जाने से प्रतिपक्षीका पक्ष ही सिद्ध होगया । Gujarat. An eGangotri Initiative

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६० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) अथवा ' गाय ' अर्थ ही माना जावे; तो वहाँ ' रन्तिदेवस्य महानसे द्विसहस्र ं गावो बध्यन्ते स्म ' यह अर्थ है कि अतिथि सत्कार के लिए प्रतिदिन दो हजार गौएँ बांधी जाती थीं । उनका बांधना उनके दूधके दोहने के लिए था । उन अतिथियोंको वह दूध दिया जाता था; तथा दूध से बनाया हुआ समांस अन्न अर्थात्-मांसल ( पौष्टिक अन्न ( समांसं ददतो ह्यन्नं ) खीर, मावा, रबड़ी, खुर्चन आदि रूप में दिया जाता था यह अर्थ यहाँपर है । शतपथ ब्राह्मण में ' एतदु ह वै परममन्नाद्य यन्मांसम् ' ( ११ | ७ | १ | ३ ) यहाँ ' मांस'को परमान्न ( खीर ) का नाम माना है- ' परमान्नं तु पायसम् ' ( अमर. २ । ७ । २४ ) । इसकी साक्षी रन्तिदेवकी द्रोण पर्व की कथा में भी मिलती है- ' गृहान् अभ्यागतान् विप्रान् अतिथीन् परिवेषकाः । पक्कापक्क ं दिवारात्रं वरान्नममृतोपमम् ' ( ६७१२ ) ' वरान्न ' यह ' परमान्न'का साथी शब्द है - सो यह खीर- रबड़ी मलाई - मावा आदिको बतानेवाला है । इसीलिए रन्तिदेव के महानस ( पाकशाला ) में बहुतसी गौत्रों बांधने की आवश्यकता पड़ती थी । यह अर्थ जो ' मांस'का किया गया है, यह यहां अयुक्त भी नहीं है; किन्तु युक्त एवं प्रसिद्ध है, बलिष्ठ वस्तुको ' मांस ' कहा भी जाता ही है । आयुर्वेदको पुस्तकों में ' चूतफलेऽपरिपक्वे केसर - मांसास्थि-मज्जानो न पृथग्दृश्यन्ते ' ( सुश्रुत. शारीर ३ अ. ) यहां ' मांस ' गूदेका नाम और अस्थि ' गुठली ' ( बीज ) का नाम और मज्जा ' रेशे ' का नाम है । ' स्वादु शीतं गुरु स्निग्धं मांसं मारुतपित्तचित् ' ( सुश्रुत - सूत्र. ४६।१२ ) यहां मातुलुङ्गके गूदेको ' मांस ' शब्दसे लिखा गया है । CC - 0. Ankur Joshi Collection रन्तिदेव के गोवध पर विचार ३६२ ' समासं मधुरं प्रोक्तम् ' मदनपाल - निघण्टुके इस प्रमाणम भक्ष्य ऊपरवाले हिस्सेको ' मांस ' कहा गया है । ' भल्लातकारथ्याग्निः इस प्र स्वादु शीतलम् ' ( चरक सूत्र. २७११६५ ) यहां वह ' प मल्लाव उप गुठीको अस्थि, ऊपरके छिलकेको त्वचा, तथा गुदेको ' मां कहा गया है । ' खजूरमांसान्यथ नारिकेलं ' ( चरक. चिकिलिए अतिथि का खान २०।२७ ) में खजूरके " भक्ष्य ऊपरी भागको ' मांस ' कहा गया है । चाहे इस प्रकार दूधका पौष्टिक भाग मलाई - रबड़ी आदि भी म शब्द - वाच्य सिद्ध हुआ । यह भी न समझना चाहिये कि महाभार रन्तिदेवेन महाभारत जैसी सुगम - रचना में ऐसे कठिन शब्द कैसे आते है । शासन इस पर स्वयं महाभारतकी साक्षी है — ' अष्टौ लोकसहस्राणि थोपा

श्लोकशतानि च । अहं वेद्मि, शुको वेत्ति, संजयो वेत्ति वा न प्रकरणे

( १ । १ । ८१ ) यहां व्यासजीने महाभारत में ८८०० श्लोक कूट माने है । गृहान्

' जिनका ज्ञान स्वयं श्रीव्यासको तथा शुकदेवको है, संजयको दिवारात्र पूरा नहीं - यह बताया गया है । तब यहां भी वही कूटता है । वरान्न, महाभारत के एक कूटपद्यका आदर्श ' आलोक ' पाठकों के स गौओोंके भी रखा जाता है - ' गोकर्णा सुमुखीकृतेन इपुणा गोपुत्रसम्प्रेषित जावे; त गोशब्दात्मज भूषणं सुविहितं सुन्यक्तगोऽसुप्रभम् । दृष्ट्वा गोष्ट २६।१२७ जहार मुकुटं गोशब्दगोपूरि वै, गोकर्णासनमर्दनश्च न ययौ अ‍वघ मा मृत्योर्वशम् ' ( कर्णपर्व • ६० ४२ ) यहां पाठकोंने देखा होगा कि सु जावे, त कहे जाते हुए महाभारत में यहां कितनी क्लिष्टता है । इस प इतने पु ' गो ' शब्द ७ बार आया है; और भिन्न - भिन्न अर्थ रखता है आदि के इस कूट - पद्यमें कहीं भी ‘ गो ' शब्द ' गाय ' वाचक नहीं आय । पत्ति नह Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ३१२ रन्तिदेवकी कथामें भी ' गो ' शब्द कूट है; वहां पर ध्यग्निः इस प्रकार ' अर्थ में वा गोदुग्ध अर्थ में है, गायके वध अर्थ में नहीं है । वह ' पशु मज्ञावस उपर्युक्त देको ' श्रतिथियोंको चिकिलिए का खाना भी हा गया है । चाहे पितृयज्ञ मी ' गांव महाभारत में अर्थ कारण यह भी है कि यदि रन्तिदेव मांस खिलाता; तो स्वयं भी खाता; क्योंकि - यज्ञाऽवशेष आवश्यक हुआ करता है, चाहे वह देवयज्ञका हो, , वा अतिथियज्ञका अवशेष हो, किन्तु रन्तिदेवका तो मांस न खानेका वर्णन आया है, जैसे कि- ' रैवते चाहिये रन्तिदेवेन... एतैश्चान्यैश्च राजेन्द्र! पुरा मांसं न भक्षितम् ' ( अनु. आते है । शासनपर्व- ११५ / ७२-७७ ) तब जबर्दस्ती उसपर मांसका अर्थ क्यों इस्राणि में थोपा जाय? अर्थ वही ठीक होता है - जो पुस्तकके सब पूर्वापर-तवा न प्रकरणों से सम्बद्ध हो, सङ्गत हो । इसलिए द्रोणपर्व में कहा है— कूट माने है ' गृहान् अभ्यागतान् विप्रान् अतिथीन् परिवेषकाः । पक्कापक्वं संजयको दिवारात्रं वरान्नभमृतोपमम् ' ( ६७१२ ) यहां अतिथियोंको अमृतोपम है । वरान्न, परमान्न ( खोया रबड़ी आदि ) खिलाना कहा है, सो वह कोंके सम गौओके वध से नहीं प्राप्त हो सकता, किन्तु वन्धनसे ही । वध माना त्रसम्प्रेषित जावे; तो ' आलभ्यन्त शतं गावः सहस्राणि च विंशतिः ' ( शान्ति. गोगन २६।१२७ ) में ( १००० X १००२० = २०,००,००० लाख गौत्रोंका यौवध मानना पड़ेगा । एक गाय - बैल १०० पुरुषों का भोजन माना गा कि कु नावे, तो २० करोड़ पुरुषोंको खिलाना मानना पड़ेगा; तो क्या । इस इतने पुरुष एक स्थान पर कभी इकट्ठे हो सकते थे? दूध - खोया रखा है आदिकेलिए इतनी गौत्रोंका बन्धन माना जावे, तो कोई अनुप-हीं आया पत्ति नहीं हो सकती । क्योंकि - दूध - भाषा आदि थोड़ी ही मात्रा में CC - 0. Ankur Joshi रन्तिदेवके गोवध पर विचार ३६३ उतरते हैं । द्रोणपर्व में ' सहस्रशश्च सौवर्णान् वृषभान् गोशतानुगान् । अध्यर्धमासमददद् ब्राह्मणेभ्यः शतं समाः ' ( ६७११०-११ ) यहां रन्तिदेवका ब्राह्मणोंको गाय वृषभोंका दान ही कहा है, जो ' महोक्षं वामहानं वा श्रोत्रियायोपकल्पयेत् ( याज्ञवल्क्यस्मृति आचाराध्याय ५१०१ ) के अनुकूल है । पोडश - राजकीय इस प्रकरणमें राजाओं के दानका वर्णन करके महत्ता बताई गई है, पशु - वघसे वह महत्ता किस प्रकार हो सकती? वनपर्वके व्याधके वक्तृत्वमें उक्त कथनसे ' वध्येते ' का अर्थ बन्धन न करके हिंसा ही माना लावे; तो वहां भी वही भाव है, जो ' अघासु हन्यन्ते गाव: ' में है, यहां श्रीसायणाचार्यने लिखा है-' दण्डैस्ताढ्यन्ते प्रेरणार्थम् ' यह हम पूर्व लिख चुके हैं अर्थात् वहां पीटना अर्थ है, ' वध ' का प्रयोग पीटने अर्थ में मी आाया है - जैसे ' उर श्रावधिष्ठाः ' ( काठ ० २८४ ) यहां ' डरःका वध ' छाती पीटना ही है - इस प्रकार के अन्य प्रमाण हम ' अतिथिकी गोध्नसंज्ञा ' ( ४ ) में दे चुके हैं । गायका पीटना भी एक हिंसा है; जैसे कि- व्याघने उसे बताया । पर वह हिंसा अतिथिकेलिए अभ्यनुज्ञात है, इसे हम ' गोनोऽतिथिः ' में स्पष्ट कर चुके हैं । सो वह पीटना इसलिए होता था कि अपने स्थान से वह चले और अतिथि स्थान तक पहुँचे; उसमें दण्डसे ताड़न करना स्वाभाविक है । इसी प्रकार ' श्रलभ्यन्त शतं गाव: ' इसका भी मारना अर्थ नहीं । रन्तिदेवकी पाकशाला में प्रतिदिन २००० गौएँ कटती थीं ' Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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३६७ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) यह प्रतिपक्षिप्रोक्त अर्थ अनुपपन्न है, गौएँ भला पाकशाला में कैसे कट सकती थीं? वधशाला में काटना कहा जाता; तब तो बात कुछ बनती । पाकशाला में तो अन्न पकानेका काम होता है, पशु काटने-का नहीं । वधशालाको कभी पाकशाला में रखा भी नहीं जा सकता; उसे तो नगरसे बाहर रखना होता है । इधर रन्तिदेव के अतिथि-यज्ञका प्रभाव पशुओं पर भी पड़ता था । बहुत से पशु स्वयं ही रन्तिदेवके अतिथियोंको दूध द्वारा बने कई खाद्य - पदार्थ खिलाने में निमित्त बनने से परलोकमें अपनी स्वर्ग की प्राप्ति मानकर उसके पास उपस्थित हो जाते थे । इसी बात को ' उपस्थिताश्च पशवः स्वयं यं शंसितव्रतम् । बहवः स्वर्गमिच्छन्तो विधिवत् सत्रयाजिनम् ' ( महा. द्रोण. ६७१४, १२/२६ । १२२ ) इस पद्यसे व्यक्त किया गया है । ' पशु ' शब्दसे यहां स्त्री- पशु गौ आदि और पुरुष - पशु बैल आदि भी लिये जा सकते हैं; क्योंकि बैल आदि भी गर्भकारक होनेसे दूध के निमित्त बनते हैं । सो यहां साक्षात् मारना अर्थ उपपन्न नहीं हो सकता । क्योंकि कौन पशु मला स्वयं मरने जाता? प्रतिपक्षी जरा ठंडे दिमाग से सोचें कि - ' ब्राह्मणेभ्यः शतं समाः ' ( महा. १०।६७ । ११ ) यह कर्म रन्तिदेवने १०० वर्ष निरन्तर किया । तो यदि रन्तिदेव प्रतिदिन कभी दो हजार गौएँ ( वनपर्व २०८८ ) कभी इक्कीस हजार गौएँ ( द्रोणपर्व ६७११६ ), कमी २० लाख गौएँ ( शान्तिपर्व. २६।१२७ ) अतिथियों केलिए मरवाता था, और फिर हजारों गौएँ दान भी प्रतिदिन करता था, तो क्या सौ साल तक वह वैसा कर सकता था? इतनी गौएं कहांसे आतीं? और फिर प्रतिपक्षी CC - 0. Ankur Joshi Collection रान्तदेव के गौवध पर विचार इस अर्थ में विरोध भी आता है, उसके दिये वसिष्ठस्मृति निर्वाचन शतपथके वचन से महोक्ष ( बड़ा बैल ) या महाज ( बड़ा बच्च धातुसे बेइत् ( गर्भघातिनी गौएँ ) आतिथ्य के लिए पकवाने चाहिये ॥ यहां ' गम उससे विरुद्ध यहां साधारण गौएं क्यों रखी गईं? ही किया शतपथ के सिद्धान्त से विरोध भी आता है, क्योंकि- दिया है । ( ३ | १२ | २१ ) में गाय - बैल के अन्न खाने वालेको भी जब: ' हन्तेः - पाठ गर्भघातक तथा पाप - कीर्ति वतलाया है; तो गाय - बैल को ही मान कि धातु खा जाने या खिलाने वाले को तो महापापी कहकर निन्दिर केवल उस जाना चाहिये था, पर यहां उसी कर्म से रन्तिदेवकी पुण्यकी पाठार्थे हन्त फैली, जिसके लिए श्रीकालिदासने भी मेघदूत में अपनी ले सूत्रे इदमाह तोड़ दी | इससे स्पष्ट है कि यहां गौधों का वध अर्थात् हिंसा ' ' अर्थ ताडन कर वहां अतिथियोंके पास पहुँचाना, जोकि याद करते हैं । दिव्य जीव के लिए ' वध ' का ताडन अर्थ या वहां बान्धना इस जैसेकि - ' अघासु हन्यन्ते गाव: ' इस मन्त्र के माध्य में श्रीसाय रात्रिमतिथि लिखा है- ' दण्डैस्ताड्यन्ते प्रेरणार्थम् - जिसकी स्पष्टता हम ( ६७११६, अतिथिकी संज्ञा ' इस निबन्ध में कर चुके हैं । वहां यह भी मालभ्यन्त व बताया है कि - पाणिनि ' इन् हिंसागत्योः ' इसमें बधार्थ कहते हैं; कि धातुका ' गमन ' अर्थ भी बताता है । ' इन्यन्ते -गम्यन्ते ' या बानार्थं स्प जाती हैं । निघण्टु ( २।१४ ) में भी गतिकर्मक- धातुओं में ' इन् ' वस्तुका के हाथ स लिए गायक है, पर वधकर्म - धातुओं में न तो ' हन् ' पढा गया है, और न आश्वस्त होकर द्दी । रन्तिदेवके इस प्रकरण में इन्हीं धातुओं का प्रयोग किय आलम्म है । इस विषय में निरुक्तका भी एक प्रमाण देखिये । ' निर ' ( स Gujarat. An eGangotri Initiative