सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 211–220

सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 211–220

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ३६६ सष्ठस्मृति निर्वचन करते हुए पहले ' निगमा इमे भवन्ति ' ( १ | १ | ३ ) यह ' गम् ' बड़ा धातुसे निर्वचन किया गया, फिर ' आहननादेव स्युः ' ( १ | १ | ६ ) ब यहां ' गम् ' धातुके स्थान ' हन् ' धातुका प्रयोग समानार्थकतावश चाहियें ये ई? और ही किया गया है । टीकाकारोंने तो यहां ' हन् ' धातुका ' पठन ' अर्थं क्योंकि दिया है । इसकेलिए प्राचीन - वृत्तिकार श्रीदुर्गाचार्यने लिखा है— जव हन्तेः - पाठार्थे वर्तमानस्य - श्चनेकार्थत्वाद् धातूनां ' । इसका तात्पर्यं यह है कोही कि - धातुओंकी अनेकार्थकतावश ‘ हन् ' धातुका ‘ पठन ' अर्थ है । निन्दिउ केवल उसने कहा ही नहीं, प्रमाण भी आगे दिया है- ' प्रसिद्धश्च पाठार्थे हन्तेः प्रयोगःः एवं हि वक्तारो भवन्ति - ' ब्राह्मणे इदमाहतम् ', अपनी सूत्रे इदमाहृतम् ' इति । इससे सिद्ध है कि- ' इन् ' धातुका केवल अर्थात् ' हिंसा ' अर्थ ही नहीं होता; अन्य अर्थ भी औचित्यवश हुआ जो कि गाव है करते हैं । बान्धना इस कारण ' सांकृते ( संकृति - पुत्रस्य ) रन्तिदेवस्य यां श्रीसायण रात्रिमतिथिर्वसेत् । आलभ्यन्त शतं गावः सहस्राण्येकविंशतिः ’ हम ( १६७११६, १२/२६ १२७ ) इस महाभारतीय - पद्य में भी ' व हां यह भी बालभ्यन्त ' का ' गौएं मारी गईं ' यह अर्थ नहीं, जैसाकि प्रतिपक्षी नं बधार्थक छते हैं; किन्तु इतनी गौएं वहां प्राप्त कराई गईं, ( डुलभष् प्राप्तौ ) नाम्यन्ते । । दानार्थ स्पर्श कराई गई, क्योंकि - दान के संकल्प के समय में ' इन् ' पह वस्तुका हाथसे स्पर्श करना पड़ता है । अथवा गायके दूध उस और न के लिए गायको छुआ जाता है, उसपर हाथ फेरा निकालने जाता है; इससे प्रयोग किय आश्वस्त होकर उसका दूध भी स्निग्ध निकलता है; यही गायके ये । ' विष्णु अलम्म ' ( स्पर्श ) का रहस्य है । ' आलभू ' के स्पर्श अर्थ में निम्न CC - 0. Ankur Joshi रन्तिदेव के गोवध पर विचार ६३७ प्रमाण द्रष्टव्य हैं-( क ) महाभारतके उद्योगपर्व में - ' ऋपभं पृष्ठ आलभ्य ब्राह्मणान् अभिवाद्य च ' ( ८३।१० ) यहां श्रीकृष्ण भगवान्‌का वैली पो आलम्भन अर्थात् स्पर्श करना अर्थ ही महाभारतको विवक्षित है, की पीठका मारना नहीं । ( ख ) ' गामालभ्य विशुध्यति ' ( ७ ) इस मनुके पद्यमें भी नरकंकालके छूनेसे अशुद्ध पुरुषकी गायके आलम्भ, ( स्पर्श ) से शुद्धि मानी गई है । ( ग ) इसी प्रकार ' स्त्रीणां च प्रेक्षणालम्भे ' ( मनु ० २।१७६ ) यहां भी ' स्त्रियोंका आलम्भ ' स्पर्श है, मारना नहीं । ( घ ) यजुर्वेद के २०१४ मन्त्रके उबट - भाष्यमें ' यजमानमालभते - कोसि महीधरभाष्यमें भी ' यजमानमालभते, अध्वर्युर्यजमानं स्पृशति ' तथा कात्यायन श्रौतसूत्र ( १६ | ४ | १६ ) में भी यजमानका आलम्भन - स्पर्शाऽर्थक माना गया है, मारणार्थक नहीं । ( ङ ) गौतमधर्मसूत्र ( 2 | २/२२ ) में श्री हरदत्तने लिखा है-‘ आलम्मनं – स्पर्शनम् ' ( च ) ' ब्रह्मणे ब्राह्मणम् ' ( यजुः वाज ० ३०/१५ ) से लेकर २१ मन्त्र तक २२ मन्त्र - स्थित ' आलभते ' पदका अनुकर्षण है । ' ब्रह्मणे ब्राह्मणमालभते ' ( तै ० ना ० ३।४।१-१६ ) में तो ' आलमते ' पद स्पष्ट है, तो वहां ब्राह्मणादिका आलम्भन - लाया जाना है, मारा जाना नहीं । वे लाकर यूपमें बान्धकर फिर छोड़ दिये जाते हैं । ( छ ) विवाहसंस्कार में वधूहृदयालम्भन ' अथास्यै हृदयमालभते ' ( पारस्कर ११८/५ ) उपनयन में माणवक- हृदयालम्भन, ' अथास्य हृदयमालभते ' ( २।२।१६ ) में हृदयदेशको प्राप्त करना वा स्पर्श करना ही अर्थ है, मारना नहीं । ( ज ) आलभेतासकृद् दीनः Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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३६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) करेण च शिरोरुहान् ' ( सुश्रुत ० कल्पस्थान १ ) यहां भी बालोंका स्पर्श अर्थ है । ( झ ) मीमांसादर्शन ( २ ३ । १७ ) में सुबोधिनीकारने लिखा है- ' वत्सस्य समीपे श्रनयनार्थम् आलम्भः स्पर्शो भवति ' । ( ञ ) ' अक्षान् यद् बभ्रुन् आलमे ' ( ' अथवें ० ७१११४७ ) में भी अक्षोंका आलम्भ - स्पर्श ही है, श्रीसायणने भी यही अर्थ किया है । ( ट ) ' कुमारं जातं पुरा अन्यैरालम्भात् सर्पिर्मधुनी हिरण्येन प्राशयेत् ' ( आश्वलायनगृ ० १११५२१ ) जात - कर्म संस्कारके इस वाक्यमें बच्चे को छूना ही अर्थ आलम्मका है, मारना नहीं । ( ठ ) ' अत ऊर्ध्वम् यसमालम्भनमादशरात्रात् ' ( गोभिलगृ ० २ | ७ | २३ ) में प्रसूता स्त्रीका दस दिन तक असमालम्म अर्थात् छूनेका निषेध किया है । ( ड ) ' केशान् अङ्ग ' वासश्च श्रलभ्य अप उपस्पृशेत् ' ( आपस्तम्बध ० २।२।३ ) में भी बालोंके छूनेपर आचमनका विधान किया है । श्रीहरदत्तने लिखा है - ' आलभ्य - स्पृष्ट्वा । ( ढ ) मीमांसा-दर्शन के शाबरभाष्य ( ११२/१० ) में ' अज इति अन्नं वीजं वीरुद् चा, तम् आनभ्य - उपयुज्य, प्रजाः पशून् प्राप्नोतीति गौणाः शब्दाः ' यहां आलम्भनका उपयोग अर्थ किया गया है । ( ण ) मब्जूषा में श्रीनागेशभट्टने भी लिखा है- ' अग्नीषोमीयं पशुमालभेत ' इत्यत्र आलम्भनं न हिंसनं, किन्तु स्पर्शः । अग्निहोत्रप्रकरणपठिते ' वत्समालमेव ' इति वाक्ये स्पर्शार्थकत्व निर्णयात् ' । फलतः रन्तिदेवके ' आलभ्यन्त शतं गावः ' का भी दानार्थ वा सत्कारार्थ स्पर्श ही अर्थ है । तब गौवोंको अतिथियों के पास प्राप्त कराना, और यास्कके ( निरुक्क २५ ४ ) अनुसार ' गो ' का अर्थ ' गायका रन्तिदेव के गोवध पर विचार ४०० दूध भी होने से उनके दूध के मावेसे- जिसे मांसल होनेके भी कहना सम्भव हो सकता है ऐसा, गौओंका अतिथियो कारण अथा उपयोग रन्तिदेव - जैसा राजा सौ साल तक भी दाल इसी से उसकी कीर्ति फैली । यह अर्थ सभी दृष्टियों कर २१ से ठीक है । शब्द मारना अर्थ तो किसी भी दृष्टिसे उपपन्न नहीं बैठता । बाली लेते रहनेसे उसके फूल बढ़ते हैं? गायका दूध लेते रहने ए २१ नहीं भी बढ़ता है । कहा है — ' गोदुग्धं वाटिकापुष्पं विद्या वाला धनम् । दानाद् विवर्धते नित्यमदानाच्च विनश्यति । सर्वा मान देनेसे भला वृद्धि कैसे हो? वस्तुतः रन्तिदेवका इतिहास हो थिग्वः ' ( २० | २१ | ८ ) इस अथर्ववेदसं. के पदरूप सूत्रका हो ज अर्थ - ' अतिथ्यर्था गावो यस्य सः ' यह सायणाचार्यने किया । अतिि भाध्य ही है, क्योंकि - पुराण - इतिहास में वेद के सिद्धान्त भूत नहीं द्वारा कहीं कल्पित और कहीं पारम्परिक रूप से प्रसिद्ध कह कि - प्र करते हैं । पर म इससे स्पष्ट है कि- महाभारत के इन कूट लोकों का वही बा एक ग अर्थ है- जो हमने किया है । जोकि प्रतिपक्षी ' सांकृते रनिरे रखक यां रात्रिमतिथिर्वसेत् । आलभ्यन्त शतं गावः सहस्रायेकशि काफी का यह अर्थ करते हैं कि- संकृति के पुत्र राजा रन्तिदेव के बा जिस रात में अतिथियोंने निवास किया; उस रात इक्कीस ए यह गौएँ मारी गईं यह अर्थ कैसे उपपन्न हो सकता है; क्योंकि अतिथि साथ वाले १८ वें पद्यमें कहा है- ' तत्र स्म सूपाः क्रोशनि . मणिकुण्डलाः । सूपं भूयिष्ठमइनीध्वं नाद्य मांसं यथा पुरा । ( ६ अर्थ ट CC - 0. Ankur Joshi Collection G An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ४०० के वहां के रसोइये कहते थे कि आज मांस नहीं है, कारण अर्थात् अतिथियो खूब खाइये ' । यदि इससे प्रतिपक्षीके अनुसार पूर्वके पद्य में कर दाल २१ सहस्र गौओंका मारना कहा है, ( बल्कि उस श्लोक में ' शतं ' से ठीक या शब्द भी साथ है, जिससे २१. सहस्रको १०० गुना करने पर ना | है २१ लाख अर्थं हो जावेगा- ) और इसमें कहा है कि - मांस आज बल्ली ते रहने पर नहीं है, दाल हो बहुत खाओ तो यह तो ' यावज्जीवमहं मौनी ' विद्या वाला व्याघात ' हो जावेगा । यदि एक गायको १०० पुरुषोंका भक्ष्य सर्वा मान लिया जाय; तो २१ सहस्र गाय २१ लाख अतिथियोंको पूरी इतिहास हो सकती हैं । एक रातमें रन्तिदेव के घर २१ लाख अतिथि जमा सूत्रका - हो जाएँ; यह सम्भव नहीं हो सकता, कई सौ की संख्या में तो ार्य किया है अतिथि आ सकते हैं; फिर भी उन्हें कहा जाय कि आज मांस द्वान्त भूतारे नहीं है- दाल खूब खाओ - यह सम्भव नहीं । इसलिए स्पष्ट है सिद्ध कहे कि पूर्व पद्य में गायकां मारना अर्थ नहीं है । ' मांस ' का अर्थ यहाँ पर ' मांसल ' खोया- रबड़ी अर्थ है; उसकी कमी सम्भव है । क्योंकि-वही वा एक गाय का दूध ही परिमित होना हुआ; फिर उसी दूधको अग्निपर कृते रनिरखकर खोया बनाने पर काफी कमी हो जाती है । खोया खाया भी ये काफी जा सकता है । देव के श्रीपाददामोदर - सातवलेकरने अपनी ' महाभारत ' की टीका में व इक्कीस ए यह अर्थ किया है - ' महात्मा रन्तिदेव के गृहमें जो एक रात्रि क्योंकि अतिथियोंने निवास किया था; उसमें इक्कीस सहस्र गौवों से क्रोशन्ति हु उनका सत्कार किया गया था । ' इसमें कोई वधकी बात नहीं । यह पुरा । ( अर्थं ठीक लंचता भी है, जैसेकि - मनुस्मृतिमें स्नातकका ‘ अर्द्दयेत् CC - 0. Ankur Joshi रन्तिदेवके गोवध पर विचार ४०१ Collect Gujarat. प्रथमं गवा ' ( ३ । ३ ) गायसे सत्कार करना कहा है । अग्रिम पद्यसे इस अर्थकी संगति भी लग जाती है । इसी प्रकारका पद्य शान्तिपर्व में भी मिलता है - आलभ्यन्त ' शतं गावः सहस्राणि च विंशतिः ' ( २६।१२७ ) इसका भी अर्थ श्रीसातवलेकर महाशयने इस प्रकार लिखा है- जिसके ' घरमें रात्रिमें पहुँचे हुए अतिथियोंके वास्ते वीस हजार गौएँ प्राप्त की गई ' । यह भी अर्थ ठीक मालूम होता है, इससे पूर्वापरकी संगति भी लग जाती है । द्रोणपर्व तथा शान्तिपर्वके इस उपा-ख्यानमें १६ राजाओंकी महिमा बताई गई है । अन्य राजाओं में किसीका भी गोवधकाण्ड नहीं दिखलाया गया; तब उनके सहचारी रन्तिदेवके आख्यानमें भी वह संघटित नहीं हो सकता । जबकि महाभारत ' न चासां मांसमश्नीयात् ' ( अनुशासन. ७८/१७ ) गो-मांसभक्षण निषिद्ध करता है, तब रन्तिदेवके आख्यानमें उसे पुण्य कैसे कह सकता है - इससे स्पष्ट है कि प्रतिपक्षियोंसे दिये हुए रन्तिदेवके पद्योंका तदभीष्ट अर्थ नहीं । यह महाभारतीय कूटपद्य हैं; उनका यथाश्रुत अर्थ करना अपनी अनभिज्ञताका परिचय देना है । यदि रन्तिदेवके अतिथियज्ञमें जीवित पशु मारे जाते; तो वहाँ वधिकोंका वर्णन वा उनकी संख्या आनी चाहिये थी, पर नहीं आई, किन्तु रन्तिदेवके पाचकोंकी तो संख्या आई है कि - वे दो लाख थे ' ( द्रोणपर्व. ६७/२ ) तो वे इतना पायस वा रसगुल्ले आदि तैयार करते थे; कि- अतिथि लोग उतना न खा सकनेके कारण उन गुलाब जामुन आदिकी स ० घ ० २६ An eGangotri Initiative

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४०२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ऊपरी त्वचा उतारकर गिरा देते थे; और भीतरका मावा जिसे मांस भी कहा जा सकता है - खाजाते थे । उसी ऊपरी त्वचाको चर्म - सा कहकर उन ढेरोंके गिरा देनेसे कविकी भाषामें उसे ' चर्मण्वती नदी ' का प्रकट होना कहा गया है । अब भी कहीं ब्रह्मभोजमें खीर बहुतसी बनाई जावे और गिरे भी; तो कहा जाता है कि इस भोज में तो खीरकी नदी बही । विदेशोंके लिए यही प्रतिपक्षी कहते हैं कि- ' विदेशों में आज दूधकी नदियाँ वा नहरें बह रही हैं ' । नहीं तो ' नदी महानसाद् याऽस्य प्रवृत्ता चर्मराशितः । तस्माच्चर्मण्वती पूर्व ' ( द्रोण. ६७५ ) चर्मराशिसे चर्मण्वती नदीका प्रवृत्त होना सम्भव - कोटिमें कैसे आ सकता है? क्या चमड़ेकी भी नदी बन सकती है जो आज तक भी बह रही है? यदि नहीं, तो वहाँ यही हमसे कहा हुआ ही अर्थ है । ( १० ) गोमेध अश्वमेध आदि यज्ञ । प्रश्न - वेद जोकि गायको ' अघ्न्या ' बताता है - यह कथन यज्ञकर्म से बाहरकेलिए है या सब स्थानकेलिए? यदि यज्ञसे वाहिर गायको ' अघ्न्या ' कहा है; तो विना यज्ञके तो सब पशुओंको अवध्य माना गया है - ' मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि ' । यदि गाय यज्ञमें अवध्य है, तो ' गोमेघ ' भी वैदिक यज्ञ है, उसमें कैसी व्यवस्था मानी जावे? अश्वमेध अश्वको मारा जाता था; इस प्रकार नरमेधमें मनुष्यको मारा जाता होगा; इस प्रकार गोमेधमें गायकों भी । तब कैसे कहा जा सकता है कि CC - 0. Ankur Joshi Collection गोमेध अश्वमेध यज्ञ प्राचीन भारतमें गोवध नहीं होता था? उत्तर - यद्यपि ' मा हिंस्यात् सर्वो भूतानि ' से बिना यज्ञके । सब पशु भी अवश्य हैं; तथापि अन्य पशुओंको ' अन्य ' इस विशेष नामसे न कहकर एकमात्र गायका नाम ' अघ्न्या ' कहना उसकी विशेषता बताता है कि अन्य पशु साधारणतया श्रवय हैं - पर गाय तो मनसा, वाचा तथा कर्मणा भी अवध्य है । ' गोमेध ' अवश्य एक वैदिक यज्ञ है, अश्वमेघ भी । पर ' ' गोमेध ' में जीवित गायको मारकर उसका हवन नहीं किया जाता । यदि कहा जावे कि– अश्वमेधकी भांति ' गोमेघ ' शब्द भी बराबर है, तो अश्वकी भांति गायकी भी हिंसा होनी चाहिये-यह बात ठीक नहीं । फिर तो ' सर्वमेध ' यज्ञमें क्या सव लोगोंकी हिंसा करदी जावेगी? ' गृहमेध ' में क्या घरके बाल - बच्चको मार डाला जावेगा? कभी नहीं; सो ' गोमेध ' में भी गायके मारनेका अर्थ नहीं है । उसका कारण यह है कि -'मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि ' · इससे प्राणिमात्रके हिंस्य होने पर भी ' अग्नीषोमीयं पशुमा-लभेत ' इस विशेष वचनसे यज्ञमें पशु हुत किया जा सकता था, इस प्रकार पशुओंमें गायके हवनकी भी प्रसक्ति प्राप्त होने पर उसे ' अघ्न्या ' यह पूर्वोक्त विशेष वैदिक शब्द बचा देता था, जैसाकि हम पूर्व इस विषय में स्पष्ट कर चुके हैं । महाभारत भी यही बात कहता है - ' अघ्न्या इति गवां नाम के एता इन्तुमईवि । । महच्चकाराऽकुशलं वृषं गां वाऽऽलभेतु यः ' ( शान्तिपर्व, मोक्षधर्म-पर्व २६३।४७ ) फिर यज्ञकी पूर्ति कैसे हो — इसकेलिए मीहि Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ४०३ ४०४ ( चावलों ) का पशु बनाया जाता है । इस पर भी मद्दाभारतकी यज्ञके साक्षी है — ' श्रूयते हि पुराकाले नृणां बीद्दिमयः पशुः । येनायजन्त ज्य इस पुण्यलोकपरायणाः ' ( अनुशासनपर्व. ११५/५६ ) । इस-कहना यज्वानः लिए महाभारतमें प्रेरणा की गई है कि- ' विधिदृष्टेन यज्ञेन धर्मस् 7 श्रवध्य | सुमहान् भवेत् । यज बीजैः सहस्राक्ष! त्रिवर्षपरमोषितैः ' ( आश्व-है । मेधिकपर्व ११।१६ ) यहाँ धान्यके बीजोंके इवनसे धर्मकी प्राप्ति भी । पर बताई है । हीं किया यहां स्पष्ट है कि - यज्ञोंमें त्रीहि, धान, श्रोदनका पशु बनाया घ ' शब्द जाता था । इसलिए गोपथब्राह्मणमें भी आया है — ' पशवो वै चाहिये- घानाः ( २ । ४ । ६ ) । शतपथब्राह्मण ( १/२/३/७० ) में भी इस सम्बन्ध लोगों में वर्णन आया है । ब्रीहि- धेनुका वर्णन तो हम दिखला चुके; को मार श्अनुशासनपर्व ( ७१ | ४०,७३ | ३७ ) में तिल - धेनुका वर्णन आया है, मारने का इस प्रकार घृतधेनु ( ७११३६ ), जल- धेनु ( ७११४१ ), यव - धेनु, भूवानि मृत्तिका - धेनु, सुवर्ण - धेनु आदिका भी वर्णन वा उनका दान न्यं पशुमा आता है । शातातपस्मृतिमें ' शर्करा - धेनु ' ( २४६ ), घृतधेनु ( २ | ४८ ) सकता था, रत्न - धेनु ( २ । ५८ ) आदिका वर्णन भी आता है । दधि- धेनु ( ४६ ) होने पर दुग्ध - धेनु ( ४/८ ), मधु- धेनु ( ४/१० ), गुड- धेनु ( ४।११ ), रौप्य - धेनु देता था, ( ५।२७ ) का भी । कहीं पिष्ट- पशु, घृत पशु आदिका वर्णन भी भारत भी आता है । ' गोयज्ञ ' शब्द में ' गोधूम ' शब्द मानकर ' विनापि तुमर्हति । प्रत्ययं पूर्वोत्तरपद - लोपः ' इस वार्तिकसे ' धूम ' का लोप होकर भी मोक्षधर्म- ' गो ' शब्द बचता है; सो उसी गोधूमके आटेका पशु बनाकर एबी ड़ियों उसका होम किया जाता है, यही पिष्ट - पशु बन जाता है । CC - 0. Ankur Joshi Collection गोमेघ - श्रश्वमेव 20k तव गोमेधमें भी त्रीहिनिर्मित गायका ही होम होता है, जीवित गाय को मारकर नहीं होमा जाता था । नहीं तो वह ' अघ्न्या ' कैसे कही जावे? यह भी यद्यपि एक हिंसा है, पर यज्ञमें यह हिंसा अभ्यनुज्ञात की गई है । इसकी स्पष्टता अथर्ववेदके दशमकाण्डके नवमसूक्तमें है । वहां शतौदना गौका याग बताया गया है । शतौदनाका अर्थ है सौ ओदनों या बहुत ( ' शत ' शब्द ' अनेक'-अर्थवाची भी है ) ओदनोंसे बनी गाय । उसीकेलिए वहां उसका शान्त करना ( मारना ), पाक, स्वर्गगमन, अस्थि, लोहित आदि शब्द उपचारसे आये हैं, जैसे कि - ' ये त्वा देवि! शमितारः पक्कारो ये च ते जनाः । ते त्वा सर्वे गोप्त्यन्ति, मा एभ्यो भैषीः शतौदने ' ( अथर्व. १० । ६ । ७ ) । फलतः गोमेधमें जीवित गायका मारना नहीं; किन्तु वहां पिष्ट - पशुका ही होम है । यह ' प्राचीन भारत में गोवध ' का प्रमाण नहीं । इस प्रकार जहां हवनीय पशुके अङ्गोंका ऋत्विजोंकेलिए विभाग कहा गया हो, वहां भी ब्रीहिनिर्मित उस पशुका विभाग समझना चाहिये, जीवित पशुका नहीं । श्रथवा यहां यह भी जानना चाहिये कि सोमयाग आदिमें यजमानको अपने अङ्गोंका ऋत्विजोंको देना कहा है । जैसे कि - ' ब्रह्मणे मनो दद्यात्, अध्वर्यवे प्राणं, होतृभ्यः श्रोत्रम् ' ( आप. श्रीसू. १३ । ६ । ६ ) इत्यादि । तब क्या यजमान अपने इन अङ्गोंको काटकर ऋत्विजोंको देगा? यदि नहीं; किन्तु वहां वैसी भावना की जाती है, वैसे ही यहां भी ऋत्विजोंको उन श्रृङ्गोंके देनेकी भावनामात्र है । यहां प्रतिपक्षी नहीं सोच सकते कि -. Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 216

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hot श्रीसनातनधर्मालौक ( ६ ) गायको ' अघ्न्या ' की घोषणा करनेवाले वेद उसके अङ्गको कैसे कटवावें? ' अन्न ँ हि गौः ' ( शत. ४ | ३ | ४ | २५ ) ' आज्यं मेघः ' ' गावस्तण्डुलाः ' ( अथर्व. ११/२/५ ) इन प्रमाणों के अनुसार अन्न-चावल आदिका हवन भी ' गोमेध ' हो जाता है । हां, अश्वमेघ अवश्य होता था; यह तो बहुत ही प्रसिद्ध है, वह भी किसी चक्रवर्तीके राज्यप्रतिष्ठापनार्थ उसके चक्रवर्ती पुत्र उत्पन्न करनेकेलिए होता था । उसमें भी एक विशेषता ही होती थी । उसमें एक घोड़ा हूँ ढ़ा जाता था; जिसका मिलना भी बड़ा कठिन होता था - यह महाभारतमें स्पष्ट है । जैमिनीय - अश्वमेध भी ऐसे विशेष घोड़ेका वर्णन है, जो राजा युवनाश्वके पास था; जिसकी हजारों रक्षक रक्षा किया करते थे - इसीसे उस अश्वकी विशेषता व्यक्त हो रही है । उसकी परीक्षा की जाती थी ( महा. अश्वमेघ ७२।५ ) इसका भाव यह है कि वह साधारण अश्व न होता था । फिर उस घोड़ेका खिलाना - पिलाना इस प्रकार के ढंगसे होता था; और उसमें सब कार्य मन्त्रों द्वारा किये जाते थे कि उसकी कायाकल्प होकर उसमें साधारणता हटकर दिव्यता आ जाती थी; उसमें रक्त आदि सब धातुओंका परिवर्तन होकर दुर्गन्ध आदि हट जाते थे । वह सुफेद अंशमें होकर ' वपा ' रूपमें हो जाता था । महाभारतमें लिखा है - ' तं वपा - धूमगन्धं तु धर्मराजः सहानुजैः । उपाजिघ्रद् यथाशास्त्रं सर्वपापापहं तदा ' ( आश्व. ८६।४ ) इस पद्यमें उसकी वपाके धुएँका सूँघना कहा है । साधारण घोड़ेकी चर्बी वा अङ्ग आदि अग्निमें डालने पर इतनी दुर्गन्ध CC - 0. Ankur Joshi Collection गोमध अश्वमेध यज्ञं १०६ होती है - वहां बैठा ही नहीं जा सकता; पर इस अश्वमेष की वैधानिक - प्रक्रियासे इस प्रकार कायापलट हो जाती निकलन थी । जिससे उसके होममें सुगन्ध हो जाती थी । जैसे कि ऋ. सं. ' एवं विध ‘ ये वाजिनं परिपश्यन्ति पक्वं य ईमाद्दुः सुरभिर्निर्हरेति ' अश्वकी ( च ) १११६२।१२ ) यहां उस अश्वमेधके अग्निपरिपक्व अश्वको सुरक्षि तेर्षा ' ( शोभनगन्धवाला ) इसी कायाकल्पके कारण सङ्केतित किया है । प्रविष्टं जैमिनीय - अश्वमेधमें उस अश्व की परीक्षाकेलिए धौम्य मुनि विशेष उसका बायां कान निचोड़ा, तो उसमें दूधकी धार निकली ' प ' ततो धौम्यो हयस्याशु वामं कर्णं न्यपीडयत् । ततो दुग्धस गात्राद् धारा तु निर्गता जनमेजय! विस्मिताः सकला लोकाः शोणितं नं कायाक दृश्यते ' ( ६४ । १६-२० ) यहां कहा है कि उस घोड़ेमेंसे दूध ते रुद्रकी । निकला - लहू बिलकुल दिखाई नहीं देती थी, यह देखकर लोगों ये को बड़ा आश्चर्य होता था । फिर उसका सिर काटनेपर बढिमा मुनयस्त होकर वह सूर्य में प्रविष्ट हो गया, उसके गिरे शरीरमें कपूर तु वत्त गन्ध आने लगी- इस विषयमें वहांके प्राकरणिक पद्य ह ( ३७ ) । वहां म उधृत करते हैं— ' मोचि ' ऊर्ध्वं गतं तच्च शिरो न चाधः, सूर्य प्रविष्टं किल बहिरूम् ( ६४ | २२ ) यहां उस घोड़ेके सिरका नीचे भूमिपर गिरना न होश इ सूर्यलोकमें उसका प्रवेश दिखलाया है । ' शुद्ध ज्ञात्वा ही चुके ह उनमें स्तुतोदैनमुरःस्थले । वैल्वेन कण्टकेनापि भिन्नः कृष्णेन पावनः ( १ ) योग्य यहां उस घोड़ेकी ' शुद्ध ' तथा ' पावन ' शब्द से भीतरी कायापता नक्षत्र बताई जा रही है, उसीके परिणाममें उससे दूधकी बार सींचा Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 217

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) १०६ अश्वमेधते है कि- ' निर्गता क्षीरधारा तु तुरगस्य. कलेवरात् ' ( ६४ | २४ ) जाती थी निकलना कहा कस्यापि शुद्धः पूर्व तुरङ्गमः ' ( २५ ) यहां पर उस ' एवंविधो न शुद्धि पूर्वोक्त कारणवश बताई गई है । अवकी भीतरी बाहरी संवदतामेवं तुरङ्गम - कलेवरात् । निर्गतं सुमहत् तेजः को ' सुरक्षि ' तेषां ( २७ ) यहां भी पूर्वोक्त निमित्तसे घोड़ेसे एक प्रविष्टं केशवानने किया है । विशेष तेजका निकलना कहा है । म्य मुनिदे ' पञ्चाच्छरीरं भूत्वा कर्पूरमेव तत् । विभूतिरिव रुद्रस्य च्युता -निकली- गात्राद् अशोभत ' ( ६४ | २८ ) यहां उस घोड़ेका विशेष - विधानसे दुग्धस कायाकल्पताके कारण गिरनेपर कपूर जैसा सुगन्धित और शोणितं नैव रुद्रकी विभूति- जैसा श्वेत होना कहा है । इससे सभी हैरान हो मेंसे दूध रो गये, और उसी कपूरका हवन किया गया । जैसे कि - ' विस्मिता खकर लोगे । नर बहिन सुनयस्ते तु कर्पूरं वीक्ष्य तेऽभवन् । कर्पूरें जुहुवुस्ते तु होमकुण्डे तु तत्क्षणात् ' ( ६४ | २६ ) ( ३७ ) । जो अन्य पशु क पद्य र वहां मारना नहीं कहा, ' मोचिताः पशवः, सर्वे लवहरूम नान हो इसका कारण हम घनसारं जुहावाग्नौ देवतानां पुरस्तदा इस अवसर पर बांधे जाते हैं, उनका भी किन्तु छोड़ देना कहा गया । जैसे कि-ये च यूपे नियन्त्रिताः ' ( ६४ । ५४ ) । ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ( पञ्चम पुष्प ) में कह चुके हैं कि - प्राचीनकाल में हवनीय सभी पदार्थोंका संस्कार करके वाहृषीकेश उनमें सूक्ष्म शक्तियां पैदा की जाती थीं । हवनीय अश्वको खिलाने व्यावनः ' ( २६ ) योग्य अमुक प्रकारका घास, अमुक प्रकारके क्षेत्रमें, अमुक कायापत नक्षत्र में, अमुक मन्त्रोंसे बोया जाता था; अमुक प्रकारके जलसे दूधकी धार सींचा जाता था; उनमें अमुक प्रकारका खाद दिया जाता था । CC - 0. Ankur Joshi गोमेव श्रश्वमेव यश ४०६ अमुक - मुहूर्तमें उसे तोड़ा जाता था; अमुक मन्त्रोंसे उसका संस्कार कर अमुक समयमें घोड़ेको खिलाया जाता था, उसकी अमुक प्रकारकी रहन - सहन आदि सब बातें पूरी करनी होती थीं । जिस प्रकार आज के योग्य वैद्य एक वृद्धका भी कायाकल्प कर देते हैं, वैसे यहांपर भी अनुमान कर लेना चाहिये । और • उन याज्ञिक ऋषियोंमें शक्ति भी विशेष होती थी । यह महाभारतमें स्पष्ट है । इसे हम आगे बतावेंगे । जैसे वे लोग इस प्रकारकी योग - क्रियायें करते थे कि वे अपनी अन्तड़ियोंको भी बाहर निकाल लिया करते थे; उस समय पीया हुआ पानी सीधा गुद्द्द्वारसे निकलकर शरीरको शुद्ध कर दिया करता था । जैसे लोग नाकसे पानी लेकर मुखसे निकाल देते हैं; इससे उस अङ्गकी शुद्धि हो जानेसे फिर प्रतिश्यायू आदि रोग नहीं हो पाते । इस प्रकार घोड़े आदिमें मानसिक - शक्तिसे विशेषता कर दी जाती है । अतः वहां आश्चर्य का कोई अवकाश नहीं । इसके अतिरिक्त श्रश्वमेध यज्ञ चक्रवर्ती राजा लोग किया करते थे; उसमें अन्य फलोंके अतिरिक्त अपने साम्राज्यका प्रतिष्ठापन तन्मूलक चक्रवर्ती लड़का पैदा होनेका उद्देश्य भी प्रायः रहता था । जैसाकि वाल्मीकि रामायणमें- ' सुतार्थं वाजिमेधेन किमर्थं न यजाम्यहम् ' ( १८२ ) सो यह पुत्रेष्टियज्ञ यद्यपि भिन्न भी होता था, तथापि राजाओंके चक्रवर्ती पुत्र करनेकेलिए अश्व-मेघका ही अङ्ग बनता था । जैसा कि रामायणमें कहा है-Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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४१० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ' तुरगश्च विमुच्यताम् । सर्वथा प्राप्स्यसे पुत्रान ' ( ११८ । १२ ) हम पञ्चम - पुष्पमें ‘ श्रीमहीधरका भाष्य ' इस विषय में लिख चुके हैं कि- ' अश्वमेघ यज्ञ तत्प्रोत कर्मोंके व्याजसे राजाकेलिए वाजी-करणके रहस्यको भी सम्भृत करता है । ' उत्सवथ्या अवगुदं घेहि समखिं चारया वृषन्! यः स्त्रीणां जीवभोजनः ' ( २३।२१ ) यहाँ उक्त - क्रियामें जहाँ गणपति - प्रजापतिरूप अश्वसे प्रार्थना है, वहाँ अश्वरूप- पुरुषसे कहना भी सम्भव हो सकता है । प्रतिपक्षी लोग इस मन्त्रके महीधरभाष्य पर खूब हंसी उड़ाया करते हैं; पर कामशास्त्रके विषयमें कोई अश्लीलता नहीं रह जाती । ' अश्व ' वाजीकरणके प्रयोग करनेवाले पुरुषका नाम भी होता है । इ कर्मकाण्डमें जो कि - अश्वके साथ रानीके सहनिवासका वर्णन आता है, प्रतिपक्षी लोग इसमें भी ज्ञान न होनेसे इस पर हंसी उड़ाया करते हैं; वस्तुतः इसमें वैज्ञानिक- रहस्य भी है । रानीके गर्भाशयके शोधनार्थ - जिसमें चक्रवर्ती लड़केका गर्भ रह सके, अश्वमेधके उस विशिष्ट घोड़ेके पृथक् कृत अङ्गसे तैयार किये हुए पदार्थको रानी अपने अङ्गमें डालती है; ' प्रजननं प्रजनने सन्निधाय उपविशन्ति ' यदि यह पाठ कहीं पर है; तो वहाँ विलास नहीं, किन्तु यह चिकित्सा है । प्रजनन- इन्द्रियमें प्रजनन - इन्द्रियका संयोगमात्र है, विलास नहीं, क्योंकि मृतकके साथ विलास कैसा? इससे स्त्रीका वन्ध्यात्व - दोष दूर हो जाता है । इससे उसका सन्तान - बाधक दोष हटकर गर्भाशय सुसंस्कृत हो जाता है । उस अश्वके अङ्गोंके हवन करनेसे - जो मान्त्रिक शक्ति अद्भुत CC - 0. Ankur Joshi Collection गोमेध - अश्वमेध यज्ञ १ शक्तिवाले तथा सुगन्धित हो जाते हैं - वही अभिमन्त्रित अति हैं । यो हुत, इसी लिए ही सूक्ष्मीभूत अङ्गोंकी गन्ध राजा - रानीके संघ भी भीतर प्राप्त होकर शुक्र और योनिके दोषोंको का भ दूर कर देती करनेका यही बातें महाभारतमें ' तं वपाधूमगन्धं तु धमराजः उस विष सहानु उपजिघ्रद् यथाशास्त्रं सर्वपापापहं ( यहाँ पापका भाव गर्भाशयादि विषय में गत दोष भी इष्ट हो सकते हैं ) तदा । शिष्टान्यङ्गानि यान्यास गम्भीर तस्याश्वस्य नराधिपः । तान्यग्नौ जुहुवुर्धीराः समस्ताः पोढलिए पद्धतिया ( आश्व. ८ | ४-५-६ ) यही वाल्मीकि रामायण में भी कहा है- कहाँ तक त्रिरणस्तस्य वपामुद्धृत्य नियतेन्द्रियः । ऋत्विक् परमसंपन्न, अपर- जावेंगे । . मास शास्त्रतः । धूमगन्धं वपायास्तु जिघ्रति स्म नराधिपः । वद घबराते कालं यथान्यायं निर्णुदन् पापमात्मनः । हयस्य यानि चाड्न न किया तानि सर्वाणि ब्राह्मणाः । अग्नौ प्रास्यन्ति विधिवत्समन यहाँ भी षोडशजि: ' ( १।१४।३६-३८ ) उस वक्त वही वेदके अश्लील का वैदि जानेवाले मन्त्रोंके वचन भी इसमें कुछ सहायक हो जाते है । छोड़कर . फिर वाजीकृत किये हुए पतिरूप के रेतसे वह गर्भव साथ यह होता था होकर चक्रवर्ती लड़केको पैदा कर सकती है । एतदादिक - एक महीधरके अर्थों में अश्लीलता कहकर तथा पशुके के काट यह घृणा करनेसे तथा उससे आँख मूंदनेसे नहीं मिलते । जैसे श्रश्वमेघ आयुर्वेद वा डाक्टरी पढ़नेवालेको, पशुको मारकर तथा गवाल फाड़कर अङ्गोंको पृथक्कृत करके आयुर्वेद के रहस्योंका ज्ञान हे पद्यसे है, इस प्रकार स्त्री - पुरुषोंके गुप्त अङ्गका भी विना लज्जार क उपहासके ज्ञान करनेसे ही विशेष चिकित्सा पद्धतियाँ जानी की कोई ऐस Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) II त्रित शुद्ध करनेवाले, तंग वा चौड़ी करनेवाले उपचारों-जीके श्रमि हूँ । योनिको द्वारा ज्ञान करनेसे ही तत्सम्बन्धी रोगोंके दूर संघों का भी रतिशास्त्रों कर देती करनेका ढंग आता है, उस विषयमें हँसी आदि करते रहनेवाला जः विषय में कोरा - का कोरा रह जाता है; वैसे इस वैदिक-सहानुजेः उस - गर्भाशयादि विषयमें भी उपहास न करके अर्थों को न बदलकर इस विषयका न यान्यास । गम्भीर अनुसन्धान करना चाहिये, जिससे वैदिक चिकित्सा-पोपद्धतियाँ भी लुप्त न हो जायें । अर्थोके बदलनेसे अश्लीलताको कहा है- कहाँ तक दबाया जा सकेगा? इससे पुराने विज्ञान लुप्त हो संपन्न जावेंगे । एक समय आप ( प्रतिपक्षी ) भी तो अश्लीलतासे नहीं श्रपवः धिपः । ब घबराते; यदि आप ( प्रतिपक्षी ) उससे घबराये और उसका ज्ञान न किया; तो सन्तानोत्पत्तिसे भी आप हाथ धो बैठेंगे, इसी तरह धिवत्समस यहाँ भी घबरानेकी बात नहीं | यह कर्मके साथ एक वाजीकरण शील का वैदिक हो जाते । छोड़कर वह गर्भ मा यहाँ दादिक होता था । के का यह ते । जैसे अश्वमेघके तथा गवालम्भं योग भी है; अतः यहाँ भी अश्लीलताका विचार ही अन्तस्तलमें प्रवेश करनेकी आवश्यकता है । इसीके उस राजाका स्वयं भी सार्वभौमिक चक्रवर्तित्व अक्षत बात प्रकरणवश बतला दी गई है । कलियुग में वैसे साधन नहीं बन सकते; इसलिए ‘ अश्वालम्मं संन्यासं पलपैतृकम् ।. कलौ पञ्च विवर्जयेत् ' इस प्रसिद्ध का ज्ञान हे पद्यसे अश्वमेध यज्ञका निषेध किया गया है । वाजीकरणमें अश्व-ना लज्जा की आवश्यकता होनेसे अश्वमेघ यज्ञ भी था; पर गोमेधमें वहाँ जानी गई कोई ऐसी बात नहीं । इसके अतिरिक्त उसके अघ्न्या होनेसे CC - 0. Ankur Joshi गोमेध - अश्वमेध यज्ञ ४१३ उसकी पूर्ति व्रीहिनिर्मित गायसे कर दी जाती है । इस प्रकार सायणाचार्य आदिके भाष्यमें वर्णित वृषभ भी त्रीहिनिर्मित समझना चाहिये; हिंसा प्राप्त - जीवित पशु नहीं । श्रीहिमय गौ - वृषभ श्रादि पशुओंके यज्ञसे भी कलियुगमें कई हानियाँ जानकर दूरदर्शी मुनियों द्वारा ' महाप्रस्थान - गमनं गोमेधं च मखं तथा । इमान् धर्मान् कलियुगे वर्ज्यान आहुर्मनीषिणः ' इत्यादि वचनोंसे इन्हें कलिवर्जित कर दिया गया है । इसीसे आज भी श्रद्धालु - सज्जन खांडका बना गायका खिलौना भी नहीं खाते । नरमेधमें ब्राह्मणादि मनुष्यों को यूपोंमें बांधा अवश्य जाता है, ब्रह्म - आदि देवताओंके आगे उन्हें अर्पण करके छोड़ दिया जाता है । शुनः - शेपको भी तो पीछे मुक्त कर दिया था; अतः इसमें मनुष्यकी हिंसाकी कोई बात नहीं । हाँ, संग्रामरूप यज्ञमें ' नरमेध ' स्पष्ट है । Collection Gujarat. ( ११ ) शूलगव पूर्वपक्ष — गृह्यसूत्रों में शूलगवका भी वर्णन आता है, वहाँ साँड - बैलका आलम्भन ( हिंसन ) होता है; उसकी रुद्रको बलि दी जाती है । इससे भी पूर्वकालमें गोवध सिद्ध है । पुरुषकी मृत्युके समय अनुस्तरणी गायके वधका विधान भी आता है । देखो, आश्वलायनगृह्यसूत्र । उत्तरपक्ष — गाय - बैलके वेदानुसार अन्य अघ्न्या होनेसे, उसका मारना तो सम्भव नहीं; अतः वहाँ ' आलम्भ ' का अर्थ ' स्पर्श ' An eGangotri Initiative

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४१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) जाते हैं । उपवेद - आयुर्वेदके प्रन्थ चरकसंहितामें लिखा है- ' आदि-काले खलु यज्ञेषु पशवः समालम्भनीया [ प्राप्तव्याः ] बभूवुः; न आलम्भाय ( वधाय ) प्रक्रियन्ते स्म । ततो दक्षयज्ञप्रत्यवरकालं मनोः पुत्राणां नाभाग - इक्ष्वाक्कादीनां च क्रतुषु पशूनामेव अभ्यनुज्ञानात् पशवः प्रोक्षणमवापुः ' यहाँ पर यज्ञमें पशुओंका वध दक्षयज्ञके बाद प्रारम्भ होना बताया गया है । ' अतएत-त्प्रत्यवरकाले पृषध्रेण दीर्घसत्रेण यजमानेन पशूनामलाभाद् गवामालम्भः प्रवर्तितः ' यहां पर एक लम्बे यज्ञमें दीक्षित, पृषधने अन्य पशु न मिलने से गौओंका आलम्भ शुरू किया; यह बतलाया गया । इससे सिद्ध हो रहा है कि पहले गोवधयज्ञ नहीं होते थे, हां, अन्य पशुओंके यज्ञ होते थे । पर इस नवीन कार्यसे पुरुषोंको बहुत दुःख हुआ - ' तं दृष्ट्वा प्रव्यथिता भूतगणाः ' इसका परिणाम भी खराब निकला । ' उपाकृतानां [ हतानां ] गवां गौरवाद, असात्म्याद् उपहृताग्नीनाम्, उपहृतमनसाम् अतीसारः पूर्वमुत्पन्नः पृषत्रयज्ञे ' ( चिकित्सितस्थान १६ । ३ ) इससे अतीसार बीमारी पैदा हुई; और उससे अग्नियोंका तथा पुरुषों के मनोंका भी उपघात कहा है । इससे ऐसे यज्ञोंकी वैयक्तिकता, क्वाचित्कता, और रोगोत्पादकता एवं मनकी उपघातकता बताई गई है । सो अन्य पशुओंके यज्ञ तो क्वाचित्क तथा कादाचित्क होते थे; पर गौवोंका साक्षात् वध न होकर व्रीहिनिर्मित - गौओंका यज्ञ गोमेघ होता था । उसे भी कलिवर्ज्य कर दिया गया; तब CC - 0. Ankur Joshi Collection गोमेध अश्वमेध यज्ञ 8 ' प्राचीन भारत गोभक्षक था ' यह दोषारोपण अननुसन्धारय है ॥ व्र अनुस्तरणी - गायका भी छोड़ देना वा दान देना उत्तरपक्षरूपमें आता है । जैसे कि वोधायनीय- पितृमेनसूत्रमे है । I | ' उत्सृजेद् वा एनां ब्राह्मणाय वा दद्यात् । दत्ता त्वेव श्रेयसे भवति‍ ( १।१०।२ ) यहां पर अनुस्तरणी गायका छोड़ देना वा ब्राह्मणखे । दान देना यह दो पक्ष कहे गये हैं; इनमें भी उसका दान देन उत्तमपक्ष माना गया है । इससे पूर्वपक्षका स्वयं बाघ हो जात है । ' आश्वलायन गृह्यसूत्र ' में भी ' अनुस्तरणीम् ' ( ४ । २ । ४ ) इस सूत्रपर. गार्ग्यनारायणने वृत्ति की है- ' अत्रापि ' एके ' मह व सम्बध्यते ( अर्थात् यह अनुस्तरणी एकदेशी पक्ष है ) तेन गं अनुस्तरणी अनित्या । कात्यायनेनाप्युक्तम्- ' न वा अस्थिसन्देहा- ' र दिति ’... तस्मान्न भवतीत्यर्थः ' ( अतः ' अनुस्तरणी ' अनित्य है । आवश्यक नहीं । बल्कि कई संदेह उपस्थित हो जानेसे नहीं होती ॥ अ कइयोंके मतमें वहां अनुस्तरणी बकरी बनाई जाती है । पु ( ४ / २ / ६-७ ) पर यह सब कलिवर्जित होनेसे अब कर्तव्य नहीं । च ( १२ ) ब्रह्मवैवर्त आदिका गोमांस वा गोयज्ञ | कु पूर्वपक्ष – पुराणोंमें तो गौओंके मांसका भक्षण स्पष्ट धाद्य देव है । देखिये — ब्रह्मवैवर्तपुराण – ( क ) गवां द्वादशलक्षाणां दहे च नित्यं मुदान्वितः । सुपक्वानि च मांसानि ब्राह्मणेभ्यश्च पार्बति! हि षट्कोटिं ब्राह्मणानां च भोजयामास नित्यशः, ( प्रकृतिस्रङ उस ५०।१३-१४ ) यह सुयज्ञ नाम वाले राजाकी करतूत है २७ स ० ध ० Gurat. An eGangotri Initiative