सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 281–290
सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 281–290
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ५१० २३६ थे कि इससे वे स्त्रियां व्यभिचारिणी ( भिन्न - विचारवाली ) बर्जित होते sad अपने में स्वामीजीका गर्भ स्थिर लेती थीं । उनसे उन्हीं किसीको । बन कर के विचारके हजारों लड़के पैदा हो जाते थे ' ऐसी कविताको ( स्वामी ) गुप्तरूपसे एक अनभिज्ञ आर्यसमाजी शृङ्गार कह देगा, वैसी कविताके मना करना निर्माताको गाली भी दे देगा । पर क्या यह बात दूरदर्शी कविके है । ऐसे लिए ठीक रहेगी? वैसी ही बात वादी यहाँ पर कर रहे हैं । ड़ीं सकती । पुराणका नाम है ‘ ब्रह्म - वैवर्त ’, उसका अर्थ किया गया है— हार्दिक ' तद् ब्रह्म विवृतं यत्र तद्विभूतिमनुत्तमम् । तेनेदं ब्रह्म वैवर्तमित्येवं पेत- विचार च विदुर्बुधाः ' ( ४।१३१।३१-३२ ) कि- इसमें ब्रह्मका विवरण है । रतो कुछ सो श्रीकृष्ण यहाँ ' ब्रह्म ' हैं, राधा उनकी ( विवर्त ) प्रकृति है । जैसे सी बाह कि ' शिवलोके शिवा, त्वं च मूलप्रकृतिरीश्वरी ' ( ६७/६१ ) अहं सर्वस्य अलङ्कारके प्रभवः सा ( राधा ) च प्रकृतिरीश्वरी ' ( ७३ | ५१ ) ' प्रकृतिर्मद् - विकारा च साऽप्यहं प्रकृतिः स्वयम् ' ( ७३ | ४७ ) यहाँ राधाको प्रकृति और कवादीक प्रकृतिको अपना ( ब्रह्म - श्रीकृष्णका ) विवर्त ( रूपान्तर ) बताया के प्रवर्तक है । ' यथा दुग्धे च धावल्यं न तयोर्भेद एव च ।... यथा जीव-दीको स्तथात्मानं तथैव राधया सह । त्यज त्वं गोपिकाबुद्धिं राधायां कह दे कि मयि पुत्रताम् ' ( ५० ) यहाँ अद्वैतवाद बता दिया गया है । फलतः लङ्कारिक इस ब्रह्मवैवर्त में श्रीकृष्ण ब्रह्म और राधा उनसे अभिन्न मूल-कार्या अपने प्रकृति है — यह बताया गया है । इसीलिए इसमें ब्रह्मखण्ड तथा चली जाती प्रकृतिखण्ड यह दो स्वतन्त्र खण्ड आये हैं । उसमें ' वन्दे कृष्णं यानन्द में - रेत ( तेज ) गुणातीतं परं ब्रह्माच्युतं यतः ' ( १ | १ | ४ ) यहाँ ब्रह्मखण्डमें श्रीकृष्ण को ब्रह्म और प्रकृतिखण्डमें ' राधा, लक्ष्मीः, सरस्वती । सावित्री CC - 0. Ankur Joshi राधा कृष्णका विहार १३३ च सृष्टिविधौ प्रकृतिः पञ्चवा स्मृता ' ( २२१११ ) राधाको प्रकृति बताया गया है । सो प्रकृति - पुरुष पति - पत्नी तो कहे जा सकते हैं; पर लौकिक नहीं, किन्तु दिव्य । उन्हींका श्रीकृष्णख एडमें स्पष्टतासे विवरण है । ब्रह्मवैवर्तके अन्य भी बहुत स्थलोंमें पदे - पदे यह बात विवृत कर दी गई है । यदि हम सबका संग्रह करें; तो छोटा - मोटा एक अन्य पुराण बन जावे; पर वादीने उन्हें छिपाया है; तब उसकी क्या शक्ति है कि - राधा और श्रीकृष्ण पर पुराण से दोष लगा सकें । वे ब्रह्मके इस विवर्त में लौकिक-ग्राम्य - शृङ्गाराभास सूंघते हैं, इसका कारण क्या? सो उन्हीं प्रकृति - पुरुपका रमण एवं सृष्टिविधान इसमें बताया गया है । देखिये- ' यथा त्वं च तथाऽहं च समौ प्रकृति-पूरुषौ । नहि सृष्टिर्भवेद् देवि! द्वयोरेकतरं विना । ' ( ६७/८० ) इत्युक्त्वा परमात्मा च राधां प्राणाधिकां प्रियाम् ' ( ८१ ) यहाँ श्रीकृष्णको परमात्मा और राधाको उसकी प्रकृति बताया है । इसी बातको अन्य बहुत - स्थलोंमें स्पष्ट किया है- ' तेन राधा समाख्याता पुराविद्भिः प्रपूजिता । प्रकृष्टा प्रकृतिश्चास्य तेन प्रकृतिरीश्वरी ' ( ८४ । ७४ ) शक्ता स्यात् सर्वकार्येषु तेन शक्तिः प्रकीर्तिता । सर्वाधारा सर्वरूपा मङ्गलाह च सर्वतः ' ( ७५ ) वादी एतदादिक - श्लोकोंकों या तो देखते नहीं; या लोकदृष्टिसे छिपा देते हैं, यह क्यों? ग्रन्थकारका तात्पर्य उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास ( पुनः पुनः वैसा कथन ) इत्यादि छः बातोंसे जाना जाता है, पूर्वापर - प्रकरण - रहित दो - चार बीचके श्लोकोंसे नहीं । Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१४० श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) इसी प्रकार ' राधा - कृष्ण नामके विषयमें कि- पहले राधाका नाम क्यों; यह नारद द्वारा प्रश्न करने पर ब्रह्मवैवर्त में नारायण द्वारा कहा गया है — ' जगन्माता च प्रकृतिः, पुरुषश्च जगत्पिता । ' ( ४ | ५२।३४ ) गरीयसी त्रिजगतां माता शतगुणैः पितुः । राधा-कृष्णेति, गौरीशेत्येवं शब्दः श्रुतौ श्रुतः । कृष्णराधेशगौरीति लोके न च कदा श्रुतः ' ( ५२।३५ ) यहाँ तो बहुत स्पष्ट कर दिया है कि-राधा प्रकृति है, जगत्की माता है, श्रीकृष्ण परमपुरुष हैं, जगतके पिता हैं । इस प्रकार गौरी प्रकृति है, शङ्कर ब्रह्म हैं । यह दोनों सृष्टिके माता - पिता हैं, सृष्टि - विधाता हैं; यद्यपि प्रकृति जड़ है, तथापि उसकी अधिष्ठात्री देवी चेतन - शक्ति राधा है । मनुस्मृति ( २।१५ ) में माताको पिताकी अपेक्षा - अभ्यर्हित माना गया है । अतएव सन्तान पहले माता -राधाका, पीछे पिता - कृष्णका नाम लेती है । इसी प्रकार ' गौरीशंकर, सीता - राम, प्रकृति - पुरुष, माता - पिता आदि शब्द भी कहे जाते हैं । तव जो कहीं राधा-कृष्णका लौकिक - दृष्टिसे विहार दीखता है, जैसा कि -वादीने पृ. १८-१६ में दिखलाया है, और गौरीशङ्करका, जैसेकि पृ. १३ में दिखलाया है; सो यह पुराणकी शैली से प्रकृति - पुरुषका सृष्टि-निरूपण है, कोई लौकिक शृङ्गार नहीं । जैसे भारतवर्ष के नक्शे आदि होते हैं; उसमें टेढी - मेढी लकीरें ही होती हैं; उनको कोई नहीं देखना चाहता, तब उसमें कई तरह के रंग देने पड़ते हैं-जिससे वह नकशा दूसरों को अच्छा लगे; सो वैसे यहाँ पर भी इस नीरस - विषय में सजीवता - सरसता लाने के लिए रसका पुट भी दे देना CC - 0. Ankur Joshi Collection राधा - कृष्णका विहार ६४३ पड़ता है; जिससे पुराणकारके शब्दों में ' कामिनां कामदं प्रत्यक्ष मुमुक्षूणां च मोक्षदम् । भक्तिप्रदं वैष्णवानां कल्पवृक्षस्वरूपश्य १ | १ | ४४ ) इस प्रकार ' सर्वेषामीप्सिततमं सर्वाशापूर्ण कारयम् के कथा ब्रह्मवैवर्तकं नाम सर्वाभीष्टफलप्रदम् ' ( ५७ ) सबके अपने अपने । कहने म -भावानुसार फल देनेवाला सिद्ध हो जाए । वस्तुतः यहां लेकि इ प्रतीत हो रहे हुए शृङ्गारको लौकिक न समझकर उसे दिव्य गमनव दृष्टिसे समझनेका प्रयास करना चाहिये । पर वादीने उसे बेदोंमें ग्राम्य ‘ काम'को दुह्कर अपने आपको ' कामी ' सिद्ध कर दिया । ( शत फिर भी दोष उस पर दे दिया! इसमें पुराणका कोई अपरा नहीं; उसमें तो उसे ‘ सद्यो वैराग्यजननं ' ( १ | १ | ३६ ) कहा गया है मी पर वादीने उसमें विगत - राग न होकर विशिष्ट - राग अप्त श्रीकुम लिया । पुराणके पृथक् किये हुए दो - चार पद्यों पर दृष्टि नहीं श्रादिद वा डलवावें; किन्तु समूची पुस्तक पर दृष्टि डालें । तब वारीचे सूर्य - उप यथार्थ - तात्पर्यं हृदयङ्गम होगा; पर खेद है कि - वादी वैसा ही किया । करते; वा करना नहीं चाहते । अव यह किसका दोष हुआ - मानना वादी ही विचार लें ' अतिरमणीये वपुषि व्रणमेव मक्षिकानिकः शृङ्गार को चरितार्थं न करें । १८००० पद्यों में वादीके दिये दो - चार स्वसुर्ज तो छिप जाएँगे, ढूँढने पर भी न मिलेंगे । ( अ. देवकल्प ऋषि लोग ‘ परोक्षवादा ऋषयः परोक्षं मम जिससे प्रियम् ' ( श्रीमद्भागवत ११ २ १ ३५ ) ' इत्याचक्षते परोक्षेण, परो इससे प्रिया इव हि देवा भवन्ति प्रत्यक्षविद्विषः ' ( गोपथना. ११६१२१ व्य -शतपथ, ७ | ५ | ११२२ ) उस परोक्ष - वर्णनको जनसाधारण शास्त्रमें Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) वस्तुतः अतिपरोक्ष - वृत्तिसे वर्णन करते हैं; क्योंकि-कामदं कें प्रत्यक्षरूपसे, प्रीतिर्भवति आख्यानयुक्ता ' ( १०।१० / २ ) इस निरुक्त-दास्वरूप ऋष्टार्थस्य ऋषियोंको परोक्षका वर्णन आख्यानके ढंगसे -कारमा के कथनानुसार अपने - अपरे कहने में आनन्द आता है । यहां लीक इसके एक - दो उदाहरण भी सुन लीजिये - ब्रह्माकी पुत्री-उसे दि गमन की कथा ' प्रजापतिः स्वां दुहितरमधिष्कन् ' ( ऋ. १०।६१।७ ) चादीने से वेदोंमें तथा पुराणों में भी प्रसिद्ध है । इस प्रकार ' अहल्यायै जार ’ कर दिया है ( शत. ३ | ३ | ४८ ) ' अहल्याया ह मैत्रेय्या [ इन्द्रो ] जार आस ' कोई अपन ( पविंश ब्रा. ११ ) आदिमें अहल्या की इन्द्रसे जारताकी कथा कहा गया है भी प्रसिद्ध है, इसमें बाहरसे अश्लीलता प्रती - राग थप श्रीकुमारिलभट्ट आदिने तथा वादीके मान्य स्वा.द.जीने सूर्य - उषा दृष्टि आदिके रूप में तात्पर्य माना है; तब वेद और पुराणमें भी तबादीचे सूर्य उपा आदि की कथाको सीधे न कहकर क्यों इस रूपमें वर्णित दी वैसा ही किया है, जिसे कई आपात - ज्ञानधारी लोग अश्लील समझते हैं? प हुआ - ना मानना पड़ेगा कि - पुराण - इतिहास आदिने तथा वेदने वहाँ नज्ञिकानि शृङ्गार अलङ्काररूपसे लिखा है । इस प्रकार ' मातुर्दिधिषुमन्त्रवं दो - चार पक्ष स्वसुर्जारः शृणोतु नः ' ( ऋ. ६५५२५ ) ' पिता दुहितुर्गर्भमाधात् ' ( अ. ε | १० | १२ ) इत्यादि वेदमन्त्र क्यों अश्लील - रूपसे लिखे गये, क्षं मम जिससे आपात - ज्ञानधारियोंको शङ्का उपस्थित हो जाती है? क्षण, पर इससे स्पष्ट है कि - जिनकी गति केवल वाच्यार्थ तक सीमित है, यत्रा. श व्यङ्ग्यार्थका ककहरा भी जिन्होंने नहीं जान पाया, उनका साधारण शास्त्रमें प्रवेश, विशेषतः उनका गलत आलोचना मार्ग में प्रवेश गोपियोंसे रमण १४३ अक्षन्तव्य है । इन सब बातसे वादीका श्रागेका अश्लीलता-प्रदर्शन तथा उस पर उपद्दास खण्डित होगया । इससे उसने अपना आपातदर्शित्व व्यक्त कर दिया है । यहाँ हमने विस्तार इसलिए किया है कि - वादी तथा उनके सहवर्गियोंको वस्तुस्थितिका पता लग जाय । ( ५ ) गोपियोंसे श्रीकृष्णका भोग करना सिद्ध करते हुए वादी लिखता है - ' ता वार्यमाणाः पतिभिः पितृभिर्भ्रातृभिस्तथा । कृष्णं गोपांगना रात्रौ रमयन्ति रतिप्रियाः । सोपि कैशोरक - वयो मानयन् मधुसूदनः । रेमे ताभिरमेयात्मा क्षपासु क्षपिवाहितः ' ( विष्णु-पुराण ५।१३ ) यहाँ वादी ' रति ' तथा ' रेमे'का अर्थ करते हुए लिखता है - ' गोपियाँ विषयभोगकी इच्छा रखने वाली कृष्णके साथ रमण ( भोग ) किया करती थीं । कृष्ण भी अपनी किशोर-अवस्थाका मान करते हुए रात्रिमें उनके साथ रमण किया करते थे ' यह वादीका किया हुआ अर्थ उसीके अनुसार ही अशुद्ध है, क्योंकि - पृ ० १ में वादीने लिखा है - ' भगवान् श्रीकृष्णजी महाराज योगेश्वर थे, उनका जन्म यादवकुलमें हुआ था । बाल्यावस्था में गौ चरानेका कार्य उन्होंने किया था । आज भी ग्रामोंमें लड़के-लड़कियाँ ( ग्वाले वा ग्वालिनें ) साथ - साथ गौ चरानेका कार्य करते हैं ' इस अपने लेखसे वादीने भी श्रीकृष्णकी इस समयकी अवस्था बाल्यावस्था मानी है, पुराणमें भी श्रीकृष्णकी यहाँ वाल्यावस्था ही कही है । तब वादी ' रमु क्रीडायाम्'का बाल्या-बस्थामें ' विषयभोग ' अर्थ कैसे कर सकते हैं? क्या यहाँ ' यभ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१४४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) मैथुने ' धातुका प्रयोग है, जो वादी यह अर्थ कर रहे हैं? स्वयं वादी निग्रहस्थानमें हैं | अपने ( पृ ० १ के ) कहे अनुसार वादीने ही ' रसिकधूर्त ' बनकर श्रीकृष्णको शृङ्गाररसका नायक और उन ग्वालिनोंको शृङ्गाररसकी नायिका बनाकर, श्लोकों के पुराणकार-से विरुद्ध गन्दे अर्थ गढ़कर लिख मारे हैं । क्या बाल्यावस्थामें भी वादी ' रमण ' का ' विषयभोग ' अर्थ कभी कर सकता है? ' रमयन्ति'का अर्थ ' प्रसन्न करना ' होता है मैथुन नहीं इस पर आगे लिखा जावेगा । और तो और, उक्तश्लोकके ' कैशोरक - वयो मानयन् ' का अर्थं वादीने भी ‘ अपनी किशोर अवस्थाका मान करते हुए ' यह लिखा है । अव बतलाइये कि - किशोर - अवस्था बाल्यावस्था होती है, या यौवनावस्था? ' धावता हरिणकैर्यथा प्रतिमल्लौ किशोर - सिंहा-नाम् ' ( २।१ ) कुन्दमालाके इस पद्यमें शेर के बच्चोंको ' किशोर'-शब्दसे लिया गया है, और उनसे बच्चे - लवकुशका वर्णन किया गया है । यौवनावस्था तो आप लोगोंके अनुसार भी २५ वर्षकी मानी जाती है । श्रीकृष्ण १० वर्ष तक ब्रह्मवैवर्त और श्रीभाग-वतके अनुसार गोकुल - वृन्दावन में रहे । ११ वें वर्ष में तो वे मथुरा में गये - ' एकादशेऽदे स - बलः ( बलराम - सहितः ) ' ( ब्रह्म. ४६१/८ ) उनका क्षत्रियोचित १ ९ वर्षकी अवस्थामें उपनयन हुआ, फिर वे कभी गोकुल गये ही नहीं । तव यह अवस्था उनकी ८-६ वर्षकी प्रतिफलित हुई | तब उसमें ' विषय - भोग ' अर्थ वादी बलात् क्यों करते हैं? इससे स्पष्ट है कि - वादी श्रीकृष्णको बलात् CC - 0. Ankur Joshi Collection गोपियोंसे रमण ५४ निन्दित करना चाहते हैं । जबकि पुराणकार श्रीकृष्णकीवाल्या. अर वस्था बता रहा है; तब उस समयकी क्रीड़ा विशुद्ध ही होगी प्राथ और इस पद्यमें ' अमेयात्मा, क्षपिताऽहितः ' यह दो विशेषण, श्रीकृष्णके हैं - वादीने इनका अर्थ नहीं किया । ' अमेयात्मा ' का अर्थ ‘ परमात्मा ' है, ‘ क्षपिताऽहितः ' का अर्थ है ' अहित - अशुभको दूर करनेवाला ' । तब वादी परमात्माका ' रमण ' क्या मैथुन पर मानेगा? वा आर्यसमाजिन स्त्रियाँ ‘ आर्याभिविनय ' ( पृ. ४६ ) में स्थित वे ' सोम रारन्धि नो हृदि ' इस मन्त्रसे स्वा. द. जीके अनुसार पर- एत मात्मासे प्रार्थना करती हैं- ' आप हमारे हृदयमें यथावत् रमण का कीजिये ' । यह वही वैदिक ' सोम ' है, जिसे वेदने ' जार की उपमा. दी है, देखिये हमसे पूर्व के लिखे हुए वेदमन्त्र - ' जारं न कन्या ' ( ऋ. ६ | ५६३३ ) ' गच्छन् जारो न योषितम् ' ( ६ | ३८ | ४, १६।१०११४ ) ( ६ । ३२ । ५,६ / ६६ २३ ) इत्यादि । इन सब मन्त्रों में ' पवमान सोम ' देवता ( वर्ण्यमान ) है, देख लीजिये अपनी अजमेर - वैदिक-द. यत्रालयकी ऋ. सं. । स्वा. द. जीने ' सोम ' यहां ' परमात्मा ' माना रम है, सो वेदने उसे ' जार ' की उपमा दी है, पुराणने भी श्रीकृष्णको प्रक ' परमात्मा ' ' बताया है, और वादीकी मान्य भगवद्गीता श्री-कृष्णको ' सोम ' कहती है । देखिये – ' गामाविश्य च भूतानि - नि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसा- ' र त्मकः ( १५/१३ ) तब जब उस सोम वैदिक - परमात्माको जो अ वेदानुसार ' जार ' की उपमा वाला है, जो वाढ़ी की - मान्य गीताके स ० ध ० ३५ Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ५४६ ' कृष्ण ' है, आर्यसमाजिन स्त्रियाँ उससे ' रमण ' की चाल्या. अनुसार करती हैं; तो क्या वहां वादी ' मैथुन ' अर्थ करते हैं? होगी, प्रार्थना विशेषण यदि ऐसा है तो फिर वेदके भाष्य पुराण पर ही वे क्यों बिगड़ते त्मा हैं? दोनों स्थान समान अर्थ होगा । ऋ.भा.भू.के ' वेदविषय-का शुभक विचार ' ( ६५ पृ. ) में ' परमेश्वर एव रथो रमणाधिकरणम् ' यहां मैथुन परमेश्वरको सब खी पुरुषोंके रमण का आश्रय कहा है । यहां भी बादी परमात्मात्रे मैथुनका अर्थ करेंगे? फिर परमात्मा - श्रीकृष्ण पर स्थित वे क्यों दोष देते हैं? ऋ भा. भू. में ' दैवेन चचुषा मनसा र पर एतान् कामान् पश्यन् रमते ' वह जीव शुद्ध - मनसे इन आनन्द-रम कामको देखता और भोगता हुआ उसमें सदा रमण करता है? उपमा, ( मुक्तिविषय पृ. १६५ ) तब क्या डा ० जी मुक्तात्माओंका कामको कन्या ' भोगना और रमण वही मानेंगे, जो यहां नित्यमुक्त - श्रीकृष्णपक्ष १११४ ) मैं कर रहे हैं? सोम ' ' यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: ' इसके अर्थमें स्वा. - वैदिक-द.जीने प्रथम - सत्यार्थप्रकाशमें लिखा है- ' जिस कुलमें नारी लोग माना रमण नाम श्रानन्द - क्रीड़ा करती हैं ' ( ४ र्थ समु. पृ. ११२ ) इस कृष्णको प्रकार द्वितीय स.प्र.प्र. ५८ में भी । यहां भी ' रमण ' का वादी श्री- ' विषयभोग ' अर्थ मानेंगे क्या? ' आत्मारामा विहित - रतयो भूत - निर्विकल्पे समाधौ ' ( १।२३ ) इस वेणी - संहार के पद्यमें योगियोंके रसा- ' रमण ' और ' रति ' का वे ' विषयभोग ' अर्थ करेंगे कि वे योगी को जो अपने से रमण - मैथुन करते थे । श्रीसीता श्रीरामको कह रही गीताके है कि ' शुश्रूषमाणा ते नित्यं नियता ब्रह्मचारिणी । सह रंस्ये त्वया ' रमण'का अर्थ v वीर! वनेषु मधुगन्धिषु ' ( वाल्मी. २२२७/१३ ) यहां श्रीसीताका वनमें ब्रह्मचारिणी रहकर श्रीरामके साथ वनों में रमण करना कहा है, क्या यहां भी ब्रह्मचारिणीका ' रमण ' वादीके मतमें विषय-भोग ही होगा? वादीका अपना ही नाम ' श्रीराम ' है । ' यथा नाम तथा गुणः ' तो उनमें होगा हो, और ' राम ' का अर्थ है ' रमन्ते-ऽस्मिन्, ' ' रमण'का अर्थ वादी ' मैथुन ' करते हैं । तब वादी में दूसरे वैदिक - संघी कौनसा ' रमण ' करते हैं? क्या वही वादी बाला? यदि नहीं; किन्तु क्रीड़ा, प्रसन्नता आदि ही; सो यहां भी बालक श्रीकृष्ण की वा उसके साथ गोपियोंकी रति, रमण क्रीडा-मात्र ही होगी । बाल्यावस्था में मैथुन कैसे सिद्ध किया जा सकता है? यदि कहा जाए कि- ' उस बालकने गोवर्धन पर्वत कैसे उठा लिया ' तो इस पर यह उत्तर है कि - परमात्माका अवतार होनेके कारण | उसकेलिए यह खेलमात्र है, जैसे कि-स्वा. द. ने भी स ० प्र ० में इसका संकेत दिया है- ' क्या ईश्वरके पृथिवी आदि धारण कर्मोंसे कंस रावणादिका वध और गोवर्ध नादि पर्वतोंका उठाना बड़े कर्म हैं? जो कोई इस सृष्टिमें परमे-श्वरके कर्मोंका विचार करे, तो ' न भूतो न भविष्यति ' ( ७ समु ० पृ ० ११७ ) । यदि वादी श्रीकृष्णको परमात्माका अवतार न मानें; यह तो उनकी इच्छा; पर पुराण तो मानता है! तब कदाचित् यह प्रश्न हो कि - ' वह बालक मैथुन भी कर सकेगा ' इस पर यह उत्तर होगा कि - परमात्मा क्या केवल एक तुच्छ मैथुन-के लिए ही अवतार लेगा? उसे अप्राप्त क्या है- जो वह साधारण CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२४५ - श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) मैथुन प्राप्त करनेकी चेष्टा करेगा वह भी बाल्यावस्थामें? वह तो आप्तकाम है । श्रीदामाने श्रीकृष्ण - परमात्मा केलिए ठीक ही कहा था, ' भूभङ्गलीलया कृष्णः स्रष्टुं शक्तव्य त्वद्विधाः । कोटिशः कोटिदेव्यस्त्वं न जानासि च निर्गुणम् ' ( ब्रह्म. ४ । ३ । ८० ) । स्वा. द. जीने रमादेवीको पत्र लिखा था - आपका प्रेमास्पद. आनन्दप्रद पत्र मिला । यदि आप इस समयके बीचमें आवेंगी, तो मेरा समागम होगा ' । इसके संस्कृत शब्द वहाँ यह हैं - ' एत -दन्तराले समये अत्रागमिष्यति चेत्, तर्हि मत्समागमो भविष्यति ' ( म. दयानन्दका जीवनचरित्र - आत्माराम अमृतसरिविरचित पृ ० ३१८ ) । तब वादी स्वामीजीका ' रमा ' के साथ - जिसका अर्थ ' रमते इति रमा ' है - समागम - मैथुन मान लेंगे? ' समागम ' का अर्थ स्वा. दु.जी ' मैथुन ' मानते हैं । देखिये- ' स्त्री से अश्वके लिंगका ग्रहण कराके उससे समागम कराना ( स.प्र. १२ पृ. २५६ ) तव वादी स्वामीजीको ' रमा'का सचमुचका ' स्वामी ' मान लेंगे? यदि ऐसा हो, तो बधाई हो, जो अपने शब्दों में बालब्रह्मचारीका आपने भी समागम, रमण, मैथुन मान लिया; और २३ वर्षकी विधवा ' रमा ' का भी! यदि ऐसा नहीं; तो वालक कृष्ण, या योगिराज वा परमात्मावतार श्रीकृष्णका रमण, मैथुन कैसे होगा? वादी ' अर्धजरतीय ' न करें कि - पुराणसे श्रीकृष्णका बाल्यावस्था में मैथुन तो मान लें, पर वहाँ जो श्रीकृष्णका परमात्मत्व कहा है - जिससे वादीका कल्पना- प्रासाद धराशायी हो जाता है- उसे चुराकर वादी भी ' चोरशिखामणि ' वननेका प्रयत्न करें! गोपियाँ तो श्रीकृष्णका सुदर्शनचक ५५० श्रीकृष्णको कहती हैं - ' सन्त्यज्य सर्वविषयान्तव पादत्र बालक ( भाग. १०।२६।३१ ) हम सभी विषयोंको छोड़कर होकर तुम्हारे चरण की शरण आई हैं, और वादी अर्थ भरवल ( विष वे विषय - भोगोंकेलिए वहाँ आई । बहुत खेद!! करते हैं । जनत ( ख ) आगे वादी विष्णुपुराणसे एकदम कूदकर श्रीमद्भाग से में जा पहुँचता है । लिखता है - ' एवं परिष्वङ्ग करामि किया -स्निग्वेक्षणोद्दामविलासहासैः । रेमे रमेशो व्रजसुन्दरीभिर्यवान तब ' स्वप्रतिबिम्बविभ्रमः ' इस पद्यकी वादीने ' कृष्ण गोपियोंके रेमे ' किस प्रकार रमण किया करते थे ' यह भूमिका बाँधी है, । अर्थ लिखा है- ' कृष्ण कभी उनका शरीर अपने हाथोंसे चाह करते थे, कभी प्रेमभरी तिरछी ( यह ' तिरछी ' शब्द वादीने बहर रूप, है ) चितवनसे उनकी ओर देखते थे, कभी मस्त होकर उनसे कु कर ( यह शब्द भी वादीने अपनी ओरसे बढ़ाये हैं ) मजाक करें बात थे ' [ ' हासं ' का अर्थ हँसना होता है, ' मजाक ' नहीं ], वादीने कुप का भोग सिद्ध करनेकेलिए यह पद्य प्रमाण दिया है, यहाँ है कहाँ? वादीको भोगके स्वप्न सर्वदा आया करते हैं, बह मन-बात? क्या वादीके नाम ' राम ' के ' रमण ' का ' यथा नाम स युवक गोपि गुणः के अनुसार तो सब जगह प्रभाव नहीं पड़ रहा? ‘ उपानद्गूढपादस्य ननु चर्मावृत्तैव भूः ' वाली बात तो दी श्रद्वै वादी अपने चित्तको जब तक कलुषित रखेंगे, तब तक से ' यत्र कलुषित- अर्थ ही सर्वत्र सूमेगा । इस पद्यके उत्तरार्धका अर्थ वादी करता है— ' जिस प्रा पश्ये CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujara! An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) १५० होकर अपनी परछाई से खेलता है, वैसे ही मस्त तव पारम् बालक तन्मय उन व्रज - सुन्दरियोंके साथ रमण, काम - क्रीडा कर भ होकर कृष्णने किया ' । वादी धन्य हैं, वह दिन - दहाड़े, साधारण-नर्थ करते ( विषय - भोग ) हैं । में धूल झोंकता है । ' जैसे बालक अपनी परछाई 1 जनता से खेलता है ' । यहां पर ' खेलता है ' यह ' रेमे ' का ही अर्थ वादीने कर श्री महान्ल है यहाँ उसने उसका ' मैथुन करता है ' यह अर्थ क्यों नहीं किया? किया, तब उसी ' अर्भको रमेशो ब्रज - सुन्दरीभिः स्वप्रतिबिम्वविभ्रमाभिः सह दरीभिर्वधा रेमे ' यहाँ ' रेमे'का अर्थ ‘ विषय - भोग ' कैसे कर दिया? इसीसे गोपियोंक तो यह स्पष्ट है कि — वादी बलात् श्रीकृष्णको कलङ्कित करना बाँधी है, है।पुरा गोपियों को श्रीकृष्णका प्रतिबिम्ब ( अपना ही नेहाथसे चाहता रूप, अपनी वादीने ब रहे हैं; और कर उनसे पु यात? क्या हैं ) मजाक क हो सकता है , वादीने ह है, वहाँ श्रर्मक ( ही परछाई ) बतलाकर उनसे क्रीड़ाका वर्णन कर वादी यहाँ विषयभोग अर्थ कर रहा है, यह क्या अपनेसे वा अपनी परछाईंसे भी कभी विषयभोग ? क्रीडा तो हो सकती है । बालक ) श्रीकृष्णका उपमान- उपमेयभाव ही वादीके ते हैं, बह मन चाहे अर्थको काट रहा है । उसके अनुसार तो उपमा किसी ' यथा नाम व युवककी, कामीकी होनी चाहिये थी, बालककी नहीं । वस्तुतः यहाँ -गोपियोंको श्रीकृष्णका अपना ही प्रतिबिम्ब बताकर उनका पररपर पड़ रहा वांत गेन्दी! अद्वैतवाद बताया गया है । बृहदारण्यक उपनिषद् में कहा है-, तब तक अं ' यत्र हि द्वैतमिव भवति, तदितर इतरं जिघ्रति शृणोति, अभि-वदति । यत्र वाऽस्य सर्वमात्मैव अभूत्, तत् केन कं जित् ड- ' जिस परयेत् शृणुयाद, अभिवदेत ' ( ४ | ५ | १५ ) सो यहाँ गोपियोंको श्रीकृष्णका सुदर्शनचक्र १११ भी श्रीकृष्णसे अभिन्न, श्रीकृष्णकी परछाई ही बताया गया है; अव सोचना चाहिये कि अपनेसे भी किसीका मैथुन हो सकता है? यदि हो सकता है; तो वहां परकीयात्व न होने से व्यभिचार तो न हुआ, तब वादी श्रीकृष्णको कलङ्कित कैसे करता है? जिस पुस्तकका प्रमाण दिया जावे, तब पूर्वापर भी उसका मानना ही पड़ेगा । उसी अध्यायमें लिखा है - ' गोपीनां तत्पतीनां च सर्वेपा-मेव देहिनाम् । योऽन्तश्चरति सोऽव्यन्तः क्रीडनेनेह देहभाकू ' ( १।३३।३६ ) इसका अर्थ यह है- ' गोपियोंके, उनके पतियोंके, समस्त - शरीरधारियोंके अन्तःकरणों में जो श्रात्मारूपसे विराज-मान हैं, जो सबका साक्षी और परम - पति है, वही तो अपना दिव्य चिन्मय श्रीविग्रह प्रकट करके यह क्रीडा कर रहा है ' । जब ऐसा है तब इसमें विपयभोगका क्या काम? यह तो कविता होती है । कई लोग परमात्माको आाशिक - माशुकरूपसे भजते हैं, अपने - आपको वे आशिक मानते हैं, और परमात्मा-को माशूक । तब क्या वादी उसका उससे अपना इष्ट भोग मान गा एक बार आर्यसमाजके श्रीचमूपतिजीने खाद की मूर्तिकी कविता लिखी थी; उसे स्त्रीलिङ्गसे सम्बोधित किया था । उसमें कहा था - ' हे दयानन्दकी तस्वीर! तू क्या है, एक कागज और रंगकी पुड़िया ही तो है, पर तू बड़ा गजब ढाती है, मैं तेरी एक - एक अदापर. आशिक हूँ ' इस कदर प्यारी जो फिर लगती है सच कह क्या है तू । दिल नहीं तुझमें दिलराई पर तासीर है, हाँ नहीं प्यारा, मगर प्यारेकी तू तसवीर है । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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११२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) रोशन आँखोंमें सरूरे सरमदीकी है जया; फूल से हैं गाल दिखलाते तजरुदकी बहार । इस लवे मौजिजनुमासे टपका अमृत चारसू, चाहता जी तेरे कदमोंमें दे शिरको झुका, और न हो सके व तो लें गले से भी लगा । तुझको आंखों पर रख दे इश्ककी लडियां पिन्हा । फूलसे बढ़कर है तू मोती में कमतर जया । इस कदर जलवे मुसव्विरकी कहां तसवीर में । जलवा गर प्यारा है अपने प्यारकी तनवीरमें ' इत्यादि । यह ' कविता ' प्रकाश ' में छपी थी, इसमें स्वामी की मूर्तिके नखशिखका वर्णन है । तब बादी क्या चमूपतिजीको आशिक पति और स्वामीजी की तस्वीरको उनकी प्रेयसी माशूक स्त्री मानकर उनका उससे विषयभोग मान लेगा कि चमूपतिजी - स्वामीजीको स्वामिनी बनाकर उसका अधरामृत - पान किया करते थे, उसका आलिंगन - चुम्बन करते थे । महाशय जी, यह कविता होती है, यह आप समझ लें । आशिक - माशूकवाली परमात्म - सम्बन्धी कविताओंका मनन करें । तब श्रीकृष्णको गोपियोंका कान्त बनाना - जिससे भगवानका नाम ' काह ' वा ' कन्हैया ' हो गया -आप ( वादी ) को निर्दोष मालूम होगा । उसमें वादीको भक्तिकी पराकाष्ठा निहित हुई मिलेगी । भगवान्की निरतिशय अनुरक्ति ही भक्ति हुआ करती है । अब अर्भक ( बालक ) का अपनी तसवीर ( प्रतिविम्ब ) से क्या वादी मैथुन मान सकता है? जब उसकी अपनी परछाई वा तसवीरसे इस उपमान - वाक्यमें वादी क्रीडा ही मानेगा; वैसे ही बालकका रमण ५१४ उपमेय वाक्यमें अर्भक - श्रीकृष्णका भी अपनीपरछाई ध्यान तसवीर गोपियोंसे विषयभोग न होकर क्रीडा ही होगी बात यदि साहित्यज्ञ हैं; तो जानते होंगे कि - उपमामें ।चार फलन होती हैं, १ उपमान, २ उपमेय, ३ वाचक शब्द और धर्म । यही पूर्णोपमा होती है । सो अर्भकका ४ साध अपने प्रति बिम्बसे रमण और अर्भक - श्रीकृष्णका अपनी गोपियोंसे रमण - यह समानार्थ ही होगा । अर्थ ' समानधर्म ' ही होता है । यदि अर्भक ' रेमे'का रमण - क्रीड़ा अर्थ माना जावे; और कृष्णके पक्षमें ‘ रेमे’के रमणका क्रीड़ा अर्थ न अर्थ किया जावे; तो यह ' साधारण ( समान विषम - धर्म होकर उपमाका दोष हो जायेगा प्रतिच्छाय ' साधारणधर्म'च ( बालक ) के पते । ' भत अर्भक ( बालक ). गोपि करके विपयभोग, १० | ) - धर्म ' न होकर प्रभा । आशा है - यदि बादी साहित्यशास्त्रज्ञ है; तो यहाँ अर्थभेदमें अपनी भूल समम होन गया होगा; पर यदि केवल शृङ्गारशास्त्रज्ञताके ' डाक्टर ' होनेकी नम्ब डिग्री उन्हें मिली हुई है, तो भिन्न वात है । प्रक ( ग ) पृ ० १२ में वादी लिखता है - ' पंडितास्तु कलत्रेण रमने ढंग महिषा इव ' कलियुगके पौराणिक पंडित औरतोंसे मैसेके " समान रमण करते हैं ' यहाँ ' रमण ' का अर्थ ' विषयभोग ' है तर्स फिर पृ ० १४ में आप लिखते हैं- ' अतः ' रमण ' का अर्थ | स्वय पुराणों में जहाँ राधा वा गोपियोंकेलिए आया है, वहाँ विषय ' सम भोग ' ही अर्थ होगा, जहाँ रमण योगी श्रथवा भक्त वा ईश्व सम्बन्धके श्रर्थमें श्राता है, वहाँ भक्त वा योगींका ईवले ते CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ११४ होनेके अर्थ में आता है ' । यदि वादीकी यह परछाई ध्यानमें मग्न घाव ठीक है, तब गोपियोंकेलिए श्रीमद्भागवतमें ' श्रीकृष्णकी रोगी बाई ' शब्द तो वादीसे दिये पद्यमें ' कलत्रेण रमन्ते ' चार बाने कलत्र गोपियाँ यह नहीं है किन्तु वे यहां श्रीकृष्णकी भक्त बताई । गैर ४ साधा की भान्ति आया वहां , पर ' ईश्वर ' बताये गये हैं इस अपने हि गई हैं; और श्रीकृष्ण भी हैं, जैसे कि – ‘, तमेव विषयके प्रमाण वादीके दिये उद्धरणोंमें प्रतिच्छाया ' ( प्र. ७ ) ' भगवानपि ता रात्री: ' ( भाग. १० / २६।१ ) बारणधर्मा परमात्मानम् ' भक्ताः ' ( १०।२६।३१ ) यह - गोपियों के लिए आया है । ' न खलु क ) के पदो | भवान् अखिल- देहिनामन्तरात्मदृक् ' ( भाग क ( बालक - ) गोपिका - नन्दनो के लिए आया है । अन्य भी बहुत से विषयभोग १० । ३१ । ४ ) इत्यादि । यह श्रीकृष्ण प्रमाण दिये जासकते हैं; तब उसमें भी व्यभिचार देखना वादी की ' न होकर अपने ही शब्दों में ' हियेकी फूटना ' है; तथा मस्तकके चन्दन - शून्य शायर होनेसे उसमें निन्दाकी गर्मी पहुंच जाना है । तिलकको १११ भूल समय नम्बर बताकर वादीने अंग्रेजोंकी अपनी मानसिक दासता भी क्टर ' होनेकी प्रकट कर दो है; क्योंकि - हिन्दी - अंग्रेजी अंकों से भिन्न • ढंगके होते हैं । वह ऊर्ध्वपुण्ड्र - तिलकमें नहीं घट सकते हैं । रम १११ नम्बर तो नहीं, वादीने दस नम्बरको अपना लिया मालूम होता है । तोंसे भैसेके तभी तो ' पपात धरणीपृष्ठे तैर्व्याप्तमखिलं जगत् । पाताले भूतले पयभोग ' है, स्वर्गे शिवलिङ्गास्तदाऽभवन् ' का डा ० जीने ' तीनों लोकोंमें योनियों वहाँ ' विषय समेत शिवलिङ्ग पैदा हो गये ' यह अर्थ कर लिया । यहां ' योनि-वाई योसमेत ' किसका अर्थ है? इसका भाव तो यह है कि दोनोंके का ईश्वर तेजके पतनसे सर्वत्र शिवलिङ्ग फैल गये ' । शिवलिङ्गका अर्थ CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीकृष्णका विहार १११ अण्डकार शिवमूर्तियाँ हैं । अब भी पाताल देश अमेरिका, रूस, भारत, तिब्बत, हडप्पा, मुहब्जोदाडो - श्रादिमें जहां भी खुदाई हुई, वहां शिवलिङ्ग मिले यह तात्पर्य है । अतः दोनों - गौरी-शङ्करका मैथुन - मिथुनीभाव ही है, जैसे प्रकृति - पुरुषका सृष्ट्यर्थं मैथुन हुआ करता है । हम पीछे सप्रमाण लिख चुके हैं कि-शिव - शिवा भी प्रकृति - पुरुष हैं, उनका रमण भी लौकिक स्त्री-पुरुषोंकी भान्ति नहीं होता, जैसा कि वादी समझते हैं । इसी लिए वहां ' तेज ' शब्द लिखा है, लौकिक ' वीर्य ' नहीं । कविकी कविताका तात्पर्य समझने के लिए उसके साहित्यका पूर्णज्ञान अपेक्षित होता है । अब बतलाइये कि भैंसे की भान्ति संघ - सूंघ कर यहां अपना मन चाहा ' रमण ' वादीने निकाला, या पौराणिक पण्डितोंने? अब कलियुगी पौराणिक ' भैंसा - पण्डित ' तो डा ० जी ही बने । वस्तुतः उक्त पद्यमें मुक्तिके साधनमें दक्षता ही पण्डितत्व है, इस भावमें तात्पर्य है । ( घ ) आगे वादी ' कृष्णविक्रीडितं वीच्य मुमुहुः खेचर स्त्रियः । कामादिताः, यह पद्य देकर ' कामादिताः ' का अर्थ करते हैं— विषयभोगकी उम्र इच्छाएँ उत्पन्न हो जानेसे देवपत्नियोंके शरीर कामरससे अर्द्दिता अर्थात् गीले हो गये ' । वादी संस्कृतका भी भारी विद्वान् मालूम पड़ता है- ' अर्दिताः ' का वादीने ' आर्द्र ' अर्थ कर डाला । पद्यमें ' कृष्णविक्रीडितं ' शब्द है- ' कृष्णकी क्रीडा ', पर वादीने ' कामक्रीडा ' अर्थ कर दिया! क्या कामक्रीड़ा मैदान में और वह भी सबके सामने हो रही थी कि देवखियोंने Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रोसनातनधर्मालोक ( ६ ) १२६ भी उसे देख लिया, और चन्द्रमाने भी? ' वादी धन्य है!!! क्या वादीको अधिकार है कि उसमें अविद्यमान - शब्दों को भी प्रक्षिप्त कर दे? ' देवपत्नियां विषयभोगकी इच्छाएं उत्पन्न हो जानेसे ' यह वादीने श्लोकके किस पदका अर्थ किया? हमें तो वादीके मस्तिष्क में ' कामक्रीड़ा ' घुसी हुई प्रतीत होती है, तभी तो वे अविद्यमान भी विषयभोग - सम्बन्धी बातोंको बीचमें बलात् ठोंस रहे हैं । यहां ' कामादिता: ' में ' काम ' का अर्थ ' कामना-इच्छा ' है कि काश हम भी इस बच्चे श्रीकृष्ण - भगवानसे खेलतीं । शिशु रास ( नृत्य ) क्रीड़ा कर रहे हों, तो जिन वेचा-रियोंके बच्चे नहीं होते, उनको तीव्र कामना - इच्छा होती है कि-हमारे भी बच्चे होते, हम भी उनसे इसी प्रकारकी क्रीड़ाएँ करतीं । देवस्त्रियोंके बच्चे नहीं हुआ करते - यह आप पुराणा-नुसार जानते होंगे; अतः वे देवस्त्रियाँ बच्चे कृष्ण और फिर भगवान्की क्रीड़ाओंसे मुग्ध हो गईं । उनकी बच्चे श्रीकृष्णसे खेलने की तीव्र इच्छा हो गई - यही ' कामादिताः ' का अर्थ है कि- तीव्र कामना - इच्छासे युक्त । ' इच्छा काम: ' ( तर्कसंग्रह ) ' कथं कामं न संदध्यात् ' ( महाभारत १११६६ । ३८ ) । यहां ऋत्विकने द्रुपदकी पत्नी से हव्यको काम -सन्धाता ( इष्टप्रद ) कहा है । ' शशाङ्कः सगणो विस्मितः ' यह तो स्पष्ट अलङ्कार है ही । ( ङ ) अग्रिम पद्य वादी यह लिखता है - ' कृत्वा तावन्तमा-स्मानं यावतीर्गोपयोषितः । रेमे स भगवान् ताभिरात्मारामोऽपि लीलया ' ( २० ) इसका अर्थ वादी यह लिखता है— ' कृष्णने CC - 0. Ankur Joshi Collection गोपियोंसे रमण ५५ जितनी गोपियां थीं; उतने ही रूप रखकर उनके साथ हर रमण किया ' यहां पर वादीने ' भगवान् ' आत्मारामः प्रकार से इत पदोंका जो श्रीकृष्णके विशेषण थे- अर्थ नहीं दिया इन , यह क्यों? इसलिए कि -बना बनाया उसका महल गिरता है । फिर श्रीकृष्ण की निन्दा कैसे होसके? वादी याद रखें कि पुराणकारको. यहां भगवान्से ‘ परमात्मा ' इष्ट है, ' आत्मारामः ' का अर्थ है - अपने आपसे रमण करने वाला; तो क्या परमात्मा अपने से ज रमण-ग्राम्य - मैथुन किया करता है? जब वह परमात्मा है, और कृप गोपियां भी उसीका रूप - प्रतिविम्व बताई गई हैं; तो परकीया व तो कोई हुई ही नहीं; तब वादी ' व्यभिचार ' अर्थ कैसे करता वि है? व्यभिचार तो परकीयासे होता है । जब कि क्षत्रिय दुष्यन्त- वा शकुन्तलाके, बिना किसी की अनुमतिके, परस्पर मैथुन हो जाने पर स्प भी वादी लोग उसे व्यभिचार नहीं मानते, किन्तु उसे गान्धर्व -विवाह जो कि - क्षत्रिय - धर्म है - ही मानते हैं ' गान्धर्वो राक्षस-श्वव धम्र्यौ क्षत्रस्य तौ स्मृतौ ' ( मनु ० ३३२६ ) और उस गान्धर्वका लक्षण ' सकामायाः सकामेन निर्मन्त्रो रहसि स्मृतः ' ( महा. १ | पर ७३।२७ ) यह मानते हैं; यहां भी श्रीकृष्ण क्षत्रिय थे; तब जब यहां कोई मैथुन नहीं, किन्तु विशुद्ध प्रेम है; तब वादीको यहां मा व्यभिचारके स्वप्नदोष क्यों हो रहे हैं? स्पष्ट है कि यहां ' रमण ' का अर्थ ' क्रीड़ा ' है । यहां ' जितनी गोपियां उतने कृष्णके रूप ' अ यह कथन भी सिद्ध करता है कि वे योगेश्वरेश्वर - परमात्मा हैं । न नहीं तो यदि वह कोई साधारण - पुरुष था; तो उसने गोपियों-Gujarat. An eGangotri Initiative