सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 271–280
सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 271–280
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) उनके आगे माथा नहीं रगड़ना पड़ेगा? पुत्रादि जैसे श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण, परमात्माका अवतार बताये रुक्मि उनके गये हैं; वैसे ही महाभारतमें भी । देखिये ( २।३६।१४-१६-१८ ), नाम उद्योगपर्व ५३ । ३, भीष्मपर्व ( ६६।१०-१८ ) । तव जो वादीने अपने ५ चारवर त्रा रुक्मिल बिज्ञापनमें श्रीकृष्णको मनुष्य सिद्ध करनेमें सन्ध्या आदि करने-( १२ का तर्क बताया है, इसका उत्तर वे भगवान् श्रीकृष्ण के शब्दोंमें ) स था ' ( १. देख लें । गीतामें भगवान् कहते हैं— ' न मे पार्थास्ति कर्त्तव्यं त्रिषु १४/२७ ) लोकेषु किंचन । नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥ यदि ) बह ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् । संकरस्य २८३ ( ७ ) यां है । ' रुक्मि च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥ ' ( ३३२२-२३-२४ ) । ‘ यद् म्ववती च यढ़ाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्त-दनुवर्तते || ' ( ३।२१ ) अब यही महाभारत में अन्यत्र देखें— यः कृपणत श्रीकृष्ण कहते हैं - ' अहमात्मा हि लोकानां विश्वेषां पाण्डुनन्दन! अन्य राि ईकि तस्माद् आत्मानमेवाग्र े रुद्र ं संपूजयाम्यहम् ' ( शान्तिपर्व ३४१।२३ ) खि यद्यहं नार्चयेयं वै ईशानं वरदं -इतनी कश्चिदिति मे भावितात्मनः ' ( २४ ) नहीं? समनुवर्तते । प्रमाणानि हि एक भी सी के । गीवारे ( २५ ) नहि मे केनचिद् देयो शिवम् । आत्मानं नार्चयेत् मया प्रमाणं हि कृतं लोकः पूज्यानि ततस्तं पूजयाम्यहम् ' वरः पाण्डवनन्दन! हि नका आपने विष्णुः प्रणमति कस्मैचिद् विबुधाय च । ऋते आत्मानमेवेति नहीं; ग ततो रुद्र ं यजाम्यहम् ' ( २८-२६ ) श्रीकृष्ण कहते हैं कि- मैं अपने ब्लेनी पड़ेगी! आत्माकी पूजा करता हूँ; अन्य किसी देवताकी नहीं । मुझे गीता भागवतके कृष्ण एक ५१६, किसी देवताने वर नहीं देना । केवल यह इसलिए करना पड़ता है कि- अन्य लोक भी पूजा करना सीखें । इसलिए श्रीमद्भागवतमें भी कहा है- ' मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः ' ( ५ | १६ | ५ ) अर्थात् परमात्मा मनुष्यावतार केवल राक्षसोंके वधार्थ नहीं लेता, किन्तु मनुष्योंकी शिक्षार्थ भी लेता है । तथापि लोकोत्तर चरित्र तो उसके भी लोकसे अनुकरणीय नहीं होते । जैसेकि - ' नैतत् समाचरेद् जातु मनसापि ह्यनीश्वरः । विनश्यत्याचरन् मौढ्याद् यथा रुद्रोऽब्धिजं विषम् ' ( श्रीमद्भा. १० | ३३ | ३१ ) ' तेजीयसां न दोपाय वह्नः सर्वभुजो यथा ' ( ३० ) रुद्र विषपान करते हुए भी नहीं मरे; पर हम आप लोग वैसा अनुकरण करते हुए मर सकते हैं । अग्नि सर्वभक्षक होने पर भी दूषित नहीं होती । वहाँ पर ' यद् यदाचरति श्रेष्ठः ' ( गीता ३।२१ ) इस वचनका बाधक ' तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते ' ( १६।२४ ) यह गीता - वचन है । फलतः श्रीकृष्ण महाभारतादिके अनुसार भी परमात्मावतार हैं । ' एवं बहुविधै रूपैश्चरामीह वसुन्धराम् ' । ' ब्रह्मलोकं च कौन्तेय! गोलोकं च सनातनम् ' ( महा. शान्तिपर्व ३४२।१३८ ) में ब्रह्मलोकके साथ ब्रह्मवैवर्तप्रोक्त गोलोक भी महा-भारतमें माना गया है । इस प्रकार वाल्मीकिरामायण ( २।३० / ३७ ) -में भी । तब ब्रह्मवैवर्त - वर्णित गोलोकके स्वामी श्रीकृष्ण सिद्ध हो ही गये; तब उन पर आक्षेप क्या? जब वादी गीता तथा उसके श्रीकृष्णको प्रमाण मानते हैं; तब गीता श्रीकृष्णको परमात्माका अवतार मानती हैं; और TAN 3 CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१२० श्रीसनातनधर्मा लोक ( ६ ) आकाशकी तरह परमात्मा भी निर्लेप रहता है । आकाश मट्टी से मैला, गर्मी से गर्म नहीं होता । परमात्मा विष्ठामें व्यापक भी उससे लिप्त नहीं होता । मद्यमें प्रतिबिम्बित भी चन्द्र अपवित्र नहीं होता । नाली में प्रतिबिम्वित भी सूर्य अपवित्र नहीं होता । इस प्रकार परमात्मावतार श्रीकृष्णको गन्देसे गन्दे कोई भी दोष लगावें, पर वे ' लिप्यते न स पापेन पद्मपत्त्रमिवाम्भसा ' ( ५ ( १० ) इस अपने वचनसे दूषित नहीं हो सकते । सूर्य - चन्द्रमा वा आकाश पर थूका हुआ उन पर न पड़कर अपने पर ही पड़ता हैं । इस प्रकार उन पर आपसे लगाये दोष उन्हींके चचनसे कटकर गिर जाते हैं । अतः आप उन पर जो दोष लगाते हैं, ' न मां कर्माणि लिम्पन्ति ' ( ४ | १४ ) ' न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति ' ( ६६ ) उन सब दोषोंका वादीकी मान्य गीता - द्वारा ही परिमार्जन होगया । इसीसे डा ० जीका ट्रैक्ट साराका सारा खण्डित होगया, आगे उत्तर देनेकी आवश्यकता नहीं रही; तथापि डा ० जीको भ्रम न रहे; अतः आगे भी लिखा जावेगा । ( २ ) आप लिखते हैं- ' राधा ' नामकी कोई औरत कृष्ण के समय में नहीं हुई, बादके पुराणों में राधाका वर्णन मिलता है, जो भागवतमें नहीं है ' । ' राधा ' शब्द तक भागवतमें नहीं ' पर श्रीमद्भागवतमें श्रीकृष्णके बालचरितप्रसङ्गमें किसी भी गोपी के नामका उल्लेख नहीं है; प्रतः ' राधा ' के नामका उल्लेख भी नहीं है; तवं यह डा ० जीका आक्षेप स्वयं खण्डित होगया । ' राधा नाम तक नहीं ' यह उनका कथन गलत भी है । रासक्रीडासे पूर्व राधाका नाम ५२२ } ; गोपियों को छोड़कर जिस गोपीके साथ श्रीकृष्ण चले गये नहीं वही तो राधा थी, ( १०/३०/३६ ) जिसका संकेत श्रीभागवतमे थे; देना, ' अनया राधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः ' ( १०/३०/२८ ) इस । है, आया है । यहाँ ' राधितः ' शब्दसे राधाके नामका परिचय पद । सकत ' यथा नाम तथा गुण: ' इस न्यायसे दे दिया गया है- ' राधयतीति मान ' राधा ' । ' राधया सेवितः इति राधितः यह ' राधा ' इस नामधातुच ' क्त ' - प्रत्ययमें प्रयोग है । गर्गसंहितामें इसे स्पष्ट कर दिया गया पुराण है — ‘ तत्र गोप्योऽतिमानिन्यो बभूवुर्मिथिलेश्वर! तास्त्यक्त्वा है । राधया सार्धं तत्रैवान्तर्दधे हरि: ' ( वृन्दावनखण्ड १ = १० ) तो य वेदमें भी इसका बीजरूपसे संकेत मिलता है - ' इन्द्र ' बय- गई है मनुराधं हवामहे ' ( अ. १६/१५२ ) अनुराधं - राधया अनुगतम् वेदके इन्द्र – परमैश्वर्यशालिनं भगवत्कृष्णं वयमाह्वयामः स्तुमो बा । ' राधा हम राधासे अनुगत ऐश्वर्यशाली कृष्ण - परमेश्वरकी स्तुति करते ३२२५ हैं । इन्द्रका अर्थ ' श्रीकृष्ण ' इसलिए किया गया है कि - ' देवाना- राधा मस्मि वासवः ( इन्द्रः ) ' ( १०/२२ ) वादिप्रतिवादिमान्य - गीता के अन्तर इस वचनमें भगवान् कृष्णने इन्द्र को अपना रूप माना है । वो उपनिप जो लोग राधा - कृष्णकी खुति करते हैं; वह परमेश्वर ही तो मानी मानकर करते हैं । हमारे पूर्वज लोग मनुष्योपासक नहीं है; लावा किन्तु परमात्मोपासक थे । ब्रह्मवैवर्त तथा भागवत आदिमें बस्मान राधा - कृष्णकी परमात्मता स्पष्ट है । वेदका बीजरूप संकेत न गीयते माना जावे; तो चूडाकरण - यज्ञोपवीतादि संस्कार भी अवैदिक समार हो जावें; क्योंकि वेदमें उनका भी संकेतरूपसे वर्णन है, राष्ट्र बदन्ति CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ११ । ५२२ शेष है उक्त वेदमन्त्रमें ' राधा ' का अर्थ वादी द्वारा बदल ले गये थे नहीं ॥ देना, तब अर्थ तो ' सत्यार्थप्रकाश ' नामका भी बदला जा सकता भागवत में ' ' का भी । यह परमात्माका नाम भी बनाया जा इस पद्यये है, दयानन्द तब क्या वादी स.प्र. तथा दयानन्दकी सत्ता नष्ट चय ' देवा सकता है, राधयतीति मान लेंगे? भागवत - पुराण सब पुराणोंके अन्तमें बना है, तब शेष दिया मधातुच पुराण तो इससे पूर्व के हुए । उनमें भी राधाका वर्णन मिलता गया है । ब्रह्मवैवर्तमें तो वादी राधाकी सत्ता मानते ही हैं । ब्रह्मवैवर्त तो यह कहता है – ' राधा ' शब्दकी व्युत्पत्ति सामवेदमें कही गई है - ' राधा ' शब्दस्य व्युत्पत्तिः सामवेदे निरूपिता ' ( ४ | १३ | १०२ ) इन्द्र वय. वेदके दो भेद होते हैं - मन्त्र तथा ब्राह्मण । अनुगतम् मोबा ' राधा ' शब्दका मूलशब्द ' राधस् ' सामवेदसं तुति करते ३ || ५, उ. १ | ७ | ३, तथा ' राधस्पते ' ( उ. ५।१५ २ ) - ' देवाना- राधाके पति भगवान्का वर्णन मिलता है सो मन्त्रभागमें . ( उ. १६३, पू. में संकेत - रूपसे । ब्राह्मणभागके न्यगीताके अन्तर्गत उपनिषद् भी हुआ करती है । सामवेदकी किसी है । वे उपनिपद्में उसकी व्युत्पत्ति मिल जावे, वह भी सामवेदकी बरही तो मानी जावेगी । उसमें ‘ सामरहस्योपनिषद् ' में यह पाठ सुना नहीं है; जाता है - ' स एवाऽयं पुरुषः स्वयमेव समाराधनमकरोत् । आदिमं वस्मात् स्वयमेव समाराधनमकरोत्, अतो लोके वेदे च श्रीराधा प संकेत न गीयते । श्रनादिरयं पुरुष एक एवास्ति । तदेव रूपं द्विधा विधाय अवैदिक समाराधनतत्परोऽभूत् । तस्मात् तां राधां रसिकानन्दां वेदविदो हैप वदन्ति ' । ' राघोपनिषद् में भी कहा है – ' कृष्णेन राध्यते इति राधाका नाम १२३ राधा । कृष्णं समाराधयति सदा - इति राधा '! इस प्रकार पुराणकी बात समूल ही सिद्ध हुई । वेदकी ११३१ संहिता होती हैं, उतनी ही उपनिषद् भी होती हैं - ' एकैकस्यास्तु शाखाया एकैकोपनिषन्मता ' ( मुक्तिकोप. १ ( १४ ) सो सामवेदकी १ सहस्र शाखा होनेसे उतनी ही उपनिषदें भी होगी । सो उनमें उक्त उपनिषदें अन्तर्भूत होती हैं । ब्रह्माण्ड - पुराणके उपोद्यातपादमें भी राधिकाका वर्णन है । देवीभागवतका नौवां स्कन्ध श्रीराधामाहात्म्यसे भरा है । महाभारतके हरिवंशपर्व में ' हा हेति कुर्वतस्तस्य ' की टीका में ' हे राधे! हा चन्द्रमुखि! ' यह इसकी नीलकण्ठने टीका की है, और उसमें एक ऋचा ऋ (. ३।५५ / १४ ) भी उधृत की है । पद्म-पुराणके पातालखण्डमें ६६ से ८३ अव्याय तक श्रीराधा-माहात्म्यका अपलाप किया ही नहीं जा सकता । इसी प्रकार स्कन्दपुराण वैष्णवादि - खण्डोंमें भी राधाका वर्णन है ही । राधाका ' बनावटी ' बनाना वादीका कथन खण्डित हो जाता है । भागवत - पुराणको आदिमें भी माना जावे, उसमें भी तो राधाका संकेत है ही, यह हम दिखला चुके हैं । उसे ही दूसरे पुराणोंने स्पष्ट कर दिया है, तब राधाकी कल्पना उनकी नवीनता सिद्ध न हुई । वादी याद रखें कि -पुराण - समुद्रका मन्थन करने पर सिप्पियां भी प्राप्त हो सकती हैं, मोती भी । कुलक्ष्मी भी प्राप्त हो सकती है, लक्ष्मी भी । सुरा एवं हालाहल भी प्राप्त हो सकता है, सोम CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१२४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) एवं अमृत भी । यह समुद्र में स्वाभाविक है; पर यह वस्तुएँ अपने-अपने भाग्यसे या भावना से मिलती हैं । अमृत देवताओंको मिला, दैत्योंको नहीं । दैत्योंको सुरा ही मिली । वे कामी बन गये । श्रीमद्भागवतमें ठीक ही लिखा है- ' एवं सुरासुरगणाः सम-देशकाल - हेत्वर्थकर्ममतयोपि फले विकल्पाः । तत्रामृतं सुरगणाः फलमञ्जसाऽऽपुः, यत्पादपङ्कजरजः - श्रयणान्न दैत्याः ' ( ८६२८ ) । तब वादियोंको भी उचित है कि - पुराणार्णवसे अमृत निकालकर उसका पान करें, हालाहल निकालने पर और उसका पान करके वे मर सकते हैं, वे रुद्र तो हैं नहीं कि उसे पचा जायेंगे । सुराका उपयोग करनेसे उनको सर्वत्र भोग - विषयविलासकी दृष्टि एवं मस्ती ही व्यापेगी । यदि वादी सचमुच ही तथा हृदयसे भी श्रीकृष्णको ' निष्कलंक ' मानते हैं; और पुराणसे भी जब श्रीकृष्णकी परमात्मता तथा निष्कलङ्कता सिद्ध होती है, तब वे उधर ध्यान न देकर, क्यों पुराणके पूर्वापरको छिपाकर बलात् श्रीकृष्णको कलङ्क लगाते हैं? इससे स्पष्ट है कि वे श्रीकृष्णकी निष्कलङ्कता ऊपरी भावसे ही कहते हैं, भीतरसे तो वे उनको कलङ्क लगाने में ही आनन्दित होते हैं । पुराणमें जहां भी श्रीकृष्णका वर्णन वहां उन्हें स्पष्ट शब्दों में परमात्मा कहा गया है । वादी बतावें कि-कोई ऐसा भी पुराण है जिसमें श्रीकृष्णका वर्णन हो; और उन्हें भगवान् वा भगवान्का अवतार न बताया गया हो । ऐसा होने पर फिर ' निस्त्रैगुण्ये पथि विचरतां को विधिः को निषेधः ' ' भगवान् कृष्णका सुदर्शनचक्र ५२५ ५२६ इस न्यायसे विधिनिषेधसे वहिर्भूत ' निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ( गीता २ ( ४५ ) का उपदेश देनेवाले और स्वयं भी निस्त्रैगुख! | जिस ( त्रिगुणातीत ) भगवान् श्रीकृष्णपर कोई कलङ्क नहीं रह पाता | मुसल ॥ पढ़क क्या मद्यमें प्रतिबिम्बित हो रहे हुए चन्द्रमाको कोई अपवित्र| अगत कहने का साहस कर सकता है? वह भगवान् क्या सबके जननेन्द्रियोंमें नहीं रम रहा है? आपके मैथुनादिके समय साथमें वह भी क्या शामिल नहीं है? क्या वह भी ' स नः पिता कामि जनिता ' ( अ. २ | १ | ३ ) होता हुआ वीर्योत्सर्जन के समय गर्भार्थ चोर वीर्याधान नहीं कर रहा है? स्त्री भी वही है, पुरुष भी वही है-शब्दव ' त्वं स्त्री, त्वं पुमानसि, त्वं कुमार उत वा कुमारी । त्वं जीर्णो पर दण्डेन वञ्चसि · ( चलसि ) त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः ' नहीं ( ०१०१८।२७ ) । प्रविष्ट इस प्रकार जब वादी यह पारमार्थिक अद्वैतदृष्टि रख लें, पुराण तब उन्हें कोई भी लघुशङ्का न वहा सकेगी, कोई भी दीर्घशल है- इस दबा न सकेगी । अन्यथा तो वे अपनी ही की हुई लघुशङ्काओं वादीव में गोते खाते रहेंगे । यदि वादी पुराणोंमें कहे श्रीकृष्णका उत्पन्न परमात्मत्व नहीं मानते; तब उनका ' पुराणोंके श्रीकृष्ण ' पर प आलोचनाका अधिकार ही क्या है? तब वे ' अवेक्षते के लिवनं ' नारद प्रविष्टः क्रमेलकः कण्टकजालमेव, अतिरमणीये वपुपि ब्रणमेव किये मक्षिकानिकरः, तिमिरे हि कौशिकानां रूपं प्रतिपद्यते यहांके ‘ स्तन्यं त्यक्त्वा जलौका हि स्तनात् कर्षति पूयकम् ' इन पर्योच हमारे क्यों अनुसरण करना चाहते हैं? क्यों पुराणोंके पूर्वापरको CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ५२६ वार्जुन श्रीकृष्णको परमात्मा वताया गया है - छिपाकर उस !! जिसमें नेत्रैगुण्य की तरह बन रहे हैं, जिसने एक मौलवीका फतवा ह पाता मुसलमान था कि- ' मत पढ़ो निमाज ' पर उसने उसका । पढ़कर सुनाया अपवित्र वाक्य - जब ' हो नापाक ' छिपा दिया था । अगला या सबके चोर - जार - शिखामणिका भाव । के समय ( ३ ) वादी लिखते हैं- ' गोपालसहस्रनाम ' में ' गोपालः नः पिवा कामिनीजारः, चौरजारशिखामणिः ' श्रीकृष्णको औरतोंके लम्पट गर्भा चोर और व्यभिचारियोंका शिरोमणि ' कहा है । यहां ' जार ' वही है- शब्दका अर्थ व्यभिचारी ही है ' । वादी ' छिद्रदर्शनप्रिय ' तो हैं ही, त्वं जी पर वे अपनी संकुचित तथा रूत बुद्धिको विशाल तथा स्निग्ध नहीं बनाते, जिससे उसमें यह उपस्थित विषय अनायास प्रविष्ट हो जाय । फिर अगत्या हमें ही उनकी संकुचित - बुद्धिमें ट रख पुराणके स्थूल विषयको डालकर उसे विशाल करना पड़ रहा दीर्घ है - इसमें वे कुछ बुरा न मनावें । विषय - मन्थन करनेके अन्तमें लघुशकाओं वादीको इससे बड़ा आनन्द आएगा । उसका फल भी अवश्य श्री कृष्णका उत्पन्न होगा । कृष्ण ' पर पहले वादीको यह बताना चाहिये कि - ' ब्रह्मवैवर्त वा ते के लिवनं ' नारद - पञ्चरात्र'के श्रीकृष्ण जोकि - ' गोपालसहस्रनाम ' में वर्णित पियमेव किये गये हैं, वे वहां मनुष्य माने गये हैं या भगवान्? वादी नद्यते यहांके श्रीकृष्णको मनुष्य तो त्रिकालमें भी सिद्ध नहीं कर सकते । इन पद्यच हमारे प्राचीन महानुभाव वादी के समाजकी तरह मनुष्योपासक पूर्वापरको ( मदु मपरस्त ) नहीं थे, जिसने मनुष्य भी दयानन्दका ईश्वरसे भी CC - 0. Ankur Joshi चोर - जारशिखामणिका भाव १२७ बड़ा मान बना रक्खा है, प्राचीन लोग भगवान् के उपासक थे । तब अन्तमें वादीको ' गोपालसहस्रनाम ' तथा ' ब्रह्मवैवर्त ' के श्रीकृष्णको तत्कथनानुसार परमात्मा ही मानना पड़ेगा । यदि ऐसा है, तो परमात्मा लौकिक - बन्धनमें कैसे आ सकता है? वादी वेदको तो मानते ही होंगे कि - ' इन्द्र मित्र ' इस मन्त्रोक्त प्रकारसे उन लोगोंके मतानुसार वेदमें परमात्माको ' इन्द्र ' शब्दसे, और हमारे मतमें ' इन्द्र ' रूपमें वर्णित किया गया है । ' देवानामस्मि वासवः ' ( इन्द्रः ) ( १०/२६ ) में वादीसे मान्य गीता के इस वचनमें भगवान् श्रीकृष्ण अपनेको ' इन्द्र ' मान रहे हैं । उसी इन्द्रको वेदमें ' जारमिन्द्रम् ' ( ऋ. १०।४२ / २ ) इस प्रकार ' जार ' कहा है । अव तो वेदके तथा गीताके इन्द्र श्रीकृष्ण भी ' जार ' बन गये । अव ' गोपाल-सहस्रनामका उक्त वाक्य वेदके इस सूत्रका भाष्य हुआ या नहीं? अब वैदिक - कृष्ण को भी डा ० जी जारसे ' व्यभिचारी ' ही बतावेंगे क्या? अब तो वेद और पुराणमें दोनों स्थानोंमें समान ही अर्थ होगा । अव पुराण में वेदविरुद्ध मिथ्याकलङ्क लगाना सिद्ध न हुआ, किन्तु पुराण वेद - सूत्रका विस्तृत भाष्य ही सिद्ध हुए । • वादी जानते होंगे कि- मानुषी स्त्रियोंका पति कोई पुरुष ही होता है । उससे भिन्न उसका पति वा प्यारा उपपति अथवा जार वा पर - पुरुष कहा जाता है । पुरुष तो अपनी स्त्रीके पति होते हैं ही, इधर परमात्मा भी सबका पति होनेसे ' भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ' ( ऋ १०।१२११ १ ) स्त्रियोंका भी पति है, पर वह छिपा हुआ Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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५२८ श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) पति है; किसीको वह नहीं दीखता, उनके पतिको भी नहीं दीखता । एक पतिकी विद्यमानतामें दूसरा गुरुपति, अथवा उपपति वा परपुरुष,. लोक वा वेदमें ' जार ' माना गया है । तब प्रत्यक्ष - पतिकी विद्यमानतामें गुप्त ( छिपा हुआ ) पति, वा उपपति वा परपुरुष परमात्मा स्वयं ' जार ' सिद्ध हुच्या । वह साधारण - जार भी नहीं है, किन्तु बड़ा होनेसे तथा जगत्भरकी स्त्रियोंका उपपति, तथा साक्षात् विवाहित न होनेसे पर-पुरुष वह ' जारशिखामणि ' है । इसके अतिरिक्त श्रीकृष्ण ' जार ' इसलिए कहे गये हैं कि - ' जार ' पर - पुरुष हुआ करता है । श्रीकृष्ण भी भगवान् एवं परम - पुरुष होनेसे ' पर - पुरुष ' हैं, इसलिए उन्हें ' पर - पुरुष'के पर्यायवाचक ' जार ' - शब्दसे कहा गया है, और जरयति ' जन्म, सांसारिक दुःखस्य जरयिता वा ' इस प्रकार संसार ( जन्म ) तथा सांसारिक दुःखको जरण ( नष्ट ) करनेसे भी उन्हें ' जार ' कहा गया है । इस प्रकार ' जारशिखामणिः, कामिनीजारः ' श्रीकृष्ण - भगवान् केलिए कहे गये इस शब्दका समाधान हो गया । . अब अवशिष्ट रहा ' चोरशिखामणि: ' इस पर ' नारायणो नाम नरो नराणां प्रसिद्ध - चौरः कथितः पृथिव्याम् । अनेक- जन्मा-जितपापं चौरं चौराग्रगण्यं पुरुषं नमामि ' इस पद्यका मनन करने से ' आर्यसमाजी ' जी को ' बोध - प्राप्ति ' हो जावेगी । हमारे पापों वा जन्मोंका चुराने वाला तथा जरण करने वाला होनेके कारण और फिर साधारण चोर - जारोंसे विलक्षण होनेके कारण श्रीकृष्णभगवान् ‘ चोर - जार - शिखामणि ' भी होगये । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. श्रीकृष्ण चोर - जार (? ) १ १३ वादी आर्यसमाजी हैं, यह उनकी उत्तन्ट्रक्टकी भूमिकार्य स्थित ' ' हम आर्य समाजी ' इस पदसे स्पष्ट है; तब आर्य समाज ( १ श्रीव प्रवर्तक स्वा. दयानन्दजी पर उनकी बड़ी श्रद्धा होगी; क्योंकि ' आद्य - निवेदन ' में वादीने उन्हें ' ऋषि ' माना है । उनका वचन प्रिय भी का वादी के समाधान के लिए उपयुक्त होगा ही । स्वामीजी भी परमा | त्माको ' चोरशिखामणि ' मानते हैं । तभी तो उन्होंने ' श्राय. ( य भिविनय ' में प्रार्थना की है- ' मा नः प्रिया भोजनानि प्रमोपी? वि ( १।१०४ । = ) ‘ हे इन्द्र - परमैश्वर्ययुक्त ईश्वर! हमारे प्रिय - भोगोंको न मा तो स्वयं चुरा न दूसरोंसे चुरवा ' । इससे वैदिक - इन्द्र परमात्मा भी सो बड़ा चोर तथा बड़ा भोगी, अथवा वादीके शब्दों में वह योगेश्वर वेद ' भोगेश्वर ' सिद्ध हुआ; क्योंकि वह वादीके तथा वैदिक - प्रार्थन करनेवाली उनकी स्त्रियोंके प्रिय - भोगों को भी चुराता है । श्रीकृष्ण भी तो उसी वैदिक - इन्द्रपरमात्माके रूप हैं, इसमें बादी अपनी मान्य गीता देखें - ' देवानामस्मि वासवः ' ( इन्द्रः ) ( १०२२ ) । का वेदमें रुद्रको भी जिसका स्वा. द. जीने ' सत्यार्थप्रकाश के ' प्रथम समुल्लास में ' परमात्मा ' अर्थ किया है- ' तस्कराणां पतये नमो नमः ( यजुः १६।२१ ) ' स्तेनानां पतये नमो नमः ' ( १६ २० ) इस प्रकार डर तस्करपति वा स्तेनपति ' चोरशिखामणि ' कहा गया है । यह मार सारा रुद्र- सूक्त है, सो इसमें उसी रुद्रका ही वर्णन है, और छ का होता है. परमात्मा । तभी इस सूक्तके आदिम ' नमस्ते रई ' ( १६।१ ) इस मन्त्रमें मन्युस्वरूप उसे, वा उस रुद्रके मन्यु ( क्रोध ) ' को नमस्कार किया गया है । तव ' रुद्राणां शङ्करवास्मि ' स ० ध ० ३४ An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ८३० भूमिकामे ) वादीकी मान्य गीता के अनुसार वैदिक - रुद्रके रूप -समाजके ( १०/२३ भी ' चोरशिखामणि ' क्यों न हों? इसमें वादी ' मा नः श्रीकृष्ण क्योंकि प्रिया भोजनानि प्रमोषीः ' इस अपने स्वामीजीके अर्थको भूल जानेके वचन भी व्यर्थं आक्षेप कर बैठे । जब यह रुद्र - सूक्त है; तव सर्वत्र कारण भी परमा ' रुद्र'का बरावर अर्थ होगा । ' अजायमानो बहुधा विजायते ' ' आर्या ( यजुः ३१।१६ ) में स्वा.द.जीने जगदीश्वरका बहुत प्रकारोंसे निप्रभोषी ' विशेषकर प्रकट होना और उसके स्वरूपका ध्यान तथा दर्शन ' भोगोंचे न माना है । ' विशेषरूपसे प्रकट होना ' ही अवतार हुआ करता है; मात्मा भी सो रुद्र - परमात्मा के अवतार श्रीकृष्णका ' चोरशिखामणि'त्व योगेश्वर वेद - वाह्य नहीं । दिक - प्रार्थना इसके अतिरिक्त श्रीकृष्ण बचपनमें सबका प्रिय भोग माखन । श्री कृम्ण चुराया करते थे, इसलिए भी ' चोर ' प्रसिद्ध थे । गोपियाँ चाहती दी अपनी भी यही थीं कि यह बच्चा हमारा माखन चुरावे । ऐसा वच्चों-( १०/२२ ) । का स्नेह बच्चोंवाले ही जान सकते हैं । स्वा.द. तो परमात्माको के प्रथम आर्याभिविनय ( १ | १ | ३ | १ ) के अनुसार गुर्चके रसका भोग लगाते नमो नमः थे, अपना प्रियभोग माखन - मिशरी पौराणिक - मूर्ति - पूजा के इस प्रकार डरसे परमात्मा को समर्पण नहीं करते थे; पर गोपियां तो उन्हें है । यह माखन - मिशरी ही खिलाना चाहती थीं । बाल्यावस्था में माखन और छ का उपभोग करके भगवान्ने शिक्षा दी है कि - बाल्यावस्था में बच्चों नमस्ते रख को नवनीतका सेवन कराना चाहिये । यदि न मिले, पिता न्यु ( क्रोध ) कंजूसी वा अन्य किह्नीं कारणोंसे बच्चोंको माखन न खिलावे, करवासिम उसे वेचकर अपने पैसे बनावे, वा अत्याचारी - राजाके पास श्रीकृष्ण चोर - जार (? ) १३१ भेजे, वा विदेशों में भेजे, और बच्चे तरसते रह जावें; तो वे वच्चे उसे चुराकर भी खाएँ और ' माखन चोर ' बनें । इस समय के माखनके उपयोगसे जवानी में उन द्वारा बड़े - बड़े काम होंगे । बड़ी - बड़ी स्पीचें देते हुए भी वे नहीं थकेंगे, बड़े - बड़े लेख लिखते हुए और पोथे बनाते हुए भी उनके मस्तिष्क पागल नहीं हो जाएँगे | बड़े - बड़े पहलवानोंको भी पस्त कर देंगे, अपनी बहुत सी स्त्रियोंको भी प्रसन्न रख सकेंगे । बाल्यावस्थामें माखनका खाना शरीर रूपी महलकी नींवको सुदृढ बनाना है । श्राजकल वैसा न करने - करानेसे ' माखनचोर ' न बनने से भारतीय सन्तानों का जो पददलन हो रहा है, जोकि यह जवानी में ही बूढ़े हो रहे हैं, यह बात किसीसे भी परोक्ष नहीं है । इसमें अन्य भी एक रहस्य है । यहां जितना माखन बनता था; वह अधिकांश अत्याचारी राजा कंसके डरके मारे उसके पास गुप्तरूपसे भेजना पड़ता था, जोकि डरपोक, भोले - भाले, नन्द आदि गोपांके लिए स्वाभाविक था । इससे कंस तथा उसके अत्याचारी दैत्य ही मुसंडे हो रहे थे; प्रजा के आधारभित्ति- बच्चोंको मिलता ही नहीं था; तव उसे स्वयं चुराकर खाना, दूसरे बच्चोंको खिलाना तथा शेष गिरा देना - यह सब दैत्य - कंसकी दुर्बलता केलिए करना श्रीकृष्णका दूरका लक्ष्य था जिसे आजकलके स्थूलदर्शी नहीं समझ पाते; और दोष लगाने में लगे रहते हैं । इसलिए भी श्रीकृष्ण ‘ माखन - चोर ' थे, इन्हीं बातोंसे खीझकर कंस बच्चोंको मरवाने लग गया था । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१३२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) इसके अतिरिक्त गोपबालाओं के वस्त्र चुरानेसे भी श्रीकृष्ण चोर प्रसिद्ध हो गये थे । कपड़े चुरानेसे उन वालाओंको शिक्षा देनी थी कि " तुम लोग नदी में नंगी होकर स्नान न किया करो । इससे जहाँ जलदेव - वरुणकी अवहेलना है, वहाँ तुम लोगोंकी लौकिक - हानि भी है । तुम लोग नदी में स्नान कर रही होओ; और कोई मन-चला किनारे पर रक्खे तुम्हारे कपड़ोंको लेकर चलता वने; तव क्या तुम नंगी होकर घर पहुँचोगी? इधर नदी - तटसे लाँघते हुए कामुक - पुरुष भी तुम लोगोंकी नग्नता देख सकते हैं, जोकि तुम लोगोंके पक्ष में उत्तम नहीं " । उस समय इस प्रकारके व्यवहार किये बिना और उन्हें अधिक लज्जित किये बिना, उनकी यह चिराभ्यस्त नंगा नहानेकी प्रकृति छूटनी नहीं थी । इस पर यह भी याद रखना चाहिये कि - श्रीकृष्ण उस समय सात वर्षकी आयुसे भी छोटे थे । यह गोवर्धन उठाने-से भी पहले की घटना है । गोवर्धन श्रीकृष्णने सात वर्षकी अवस्थामें उठाया था, यह बात ' क सप्तहायनो वालः ' ( १०।२६।१४ ) इस श्रीमद्भागवतके पद्यसे प्रकट है । इधर वे गोपाल - वालाएँ भी उतने ही वर्षोंकी अवस्थाके लगभग थीं । उक्त पुराण में ' नन्दब्रज-कुमारिकाः ' ( १०।२२।१ ) यही पाठ आया है । लड़कियों का विवाह उस समयमें आठ वर्षकी आयुमें हुआ करता था — यह वादी लोग भी ' अष्टवर्षा भवेद् गौरी ' की पौराणिकता बताकर स्वयं सिद्ध किया ही करते हैं । यहाँ पर उन्हें ' कुमारी ' ( अविवाहिता ) कहनेसे वे गोप - बालाएँ आाठ वर्षसे भी कमकी थीं - यह प्रकट है । चोर - जारशिखामणिका भाव १३ ॥ १३ श्रीकृष्णके ब्रह्मचर्याश्रमका आरम्भ तो कंसके मारनेके: नह प्रारम्भ हुआ है । तब यहाँ लौकिक दृष्टिसे भी कोई दोष नहीं बाद । बही श्रीकृष्णके ' चोर - जारशिखामणि ' कहनेका रहस्य है । शेष स श्रीकृष्णका ' उनके गुप्तांगोंके नग्नदर्शन ' करनेका वादीकाआक्षेप मा ( पृ. ३३ ), इसका उत्तर सम्भवतः इस निबन्धके अन्त में दिया जाएगा । यही ' सनातनी - पण्डितोंके किये गये हुए ' चोर- जार.. शिखामणि ' शब्दके अर्थका तात्पर्य है । यह बात वादी स्वयं भी क सोच - समझ सकते हैं कि - गोपालसहस्रनाम श्रीकृष्णका स्तावक स्तोत्र ना है या निन्दक? निन्दक तो वादी उसे त्रिकालमें भी सिद्ध नहीं पर कर सकते; अन्यथा वह स्तोत्र क्यों कहा जाता? तब हारकर वादीको उसे श्रीकृष्णका स्तावक ही मानना पड़ेगा; तव बादी अ स्वयं समझ सकते हैं कि - वह स्तोत्र ' चोरजारशिखामणि ' शब्दसे उन भगवान् - कृष्णकी निन्दा भला क्योंकर करेगा? वह उसकी इस पर शब्द से स्तुति ही तो करेगा! सो इस शब्दसे खुति तभी होगी, ल जब वहाँ हमारा किया हुआ अथ हो । सो उस स्तोत्रमें उक्त श्र विशेषण से श्रीकृष्णकी स्तुति होनेसे वहाँ हमारा किया हुआ अर्थ वास्तविक तथा प्राकरणिक भी सिद्ध हुआ । परं निन्दक घ होनेसे वहाँ वादीका इष्ट अर्थ कैसे हो सकता है? अनिष्ट होनेसे भी बादीका पक्ष स्वतः खण्डित होगया । 1 क ( ४ ) वादी जो कहते हैं कि - ' वास्तवमें यहाँ ' जार ' शब्दका गत अर्थ ' व्यभिचारी ' है, और वे पुराणप्रोक्त परमात्मा श्रीकृष्णको सचमुच ही ' व्यभिचारी ' मानते हैं, सो व्यभिचारीका अर्थ पा CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ५३ ॥ १३४ के वादी क्या करते हैं? यदि ' विना विवाह किये दूसरोंकी बाद नहीं -' बियोंमें रमण करनेवाला ' ही इसका अर्थ है, तो वह परमात्मा हैं नहीं । ही व्यभिचारी, व्यभिचारी तो क्या ' व्यभिचारिशिरो-। शेष सचमुच आक्षेप मणि ' ही है । सारे आर्यसमाजियोंकी स्त्रियोंमें भी वह विना में दिया विवाह किये रमण करता ही है; उनकी क्या, किन्तु भूमण्डलभर-२- जार- की स्त्रियों में जब वह विना विवाह किये ही उनके अङ्गोंमें रमण स्वयं भी कर रहा है, वही मानुषी स्त्रियों तथा पशु - पक्षी स्त्रियोंके प्रजन-वक स्तोत्र नाहोंमें रम रहा है, उनको देख रहा है; तब बोलिये वह सिद्ध नहीं परमात्मा सचमुच व्यभिचारि - शिरोमणि हुआ, या नहीं? न हारकर श्रीकृष्णको गोपालसहस्रनाम तथा ब्रह्मवैवर्त और श्रीभागवत तववादी आदि परमात्मा मानते ही हैं । देखिये पृ ० ७ में वादीका ही ' शब्दसे उद्घृत ' तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्यापि संगताः ' यह पद्य । यह सकी इस परमात्मा कृष्णसे ही यहाँ जार - बुद्धि कही गई है; तब वे क्या दोष नी होगी, लगा सकते हैं? ' व्यभिचारी ' का लक्षण साहित्यकी पुस्तकों में त्रिमें उक्त श्राता है— ' विशेषादाभिमुख्येन चरणाद् व्यभिचारिणः । ' या हुआ ( साहि. ३ परि. ) यह अर्थ व्यभिचारी- परमात्मामें घटा लीजिये, निन्दक घट जायगा । तब ' माधवाचार्य अपना सारा पाखण्ड फैलाकर भी इस अर्थको मिथ्या नहीं कर सकता है, बकवास भले ही करता रहे ' यह ' आर्य'जीके ' सुमधुर शब्द ' तो उन्हींके अपने शब्दका गलेमें ' हार ' डालनेवाले बन गये । कृष्णको राधा एवं श्रीकृष्णका बिहार । अर्थ पता पुराण जहाँ इतिहासरूप हैं, वहाँ काव्यरूप भी हैं । काव्यमें राधा एवं श्रीकृष्णका विहार १३१ कई लौकिक- बातोंको कविता रूपमें भी कहा जाता है । कवितामें शब्दार्थ न देखकर उसके तात्पर्यको देखना पड़ता है । कवि काव्य - संसारका ब्रह्मा होता है - ' अपारे काव्य - संसारे कविरेव प्रजापतिः । यथाऽस्मै रोचते विश्वं तथैव परिवर्तते ॥ शृङ्गारी चेत् कविः काव्ये जातं रसमयं जगत् । स चेत् कविर्वीतरागो नीरसं व्यक्तमेव तत् ' सो कवि लोग सरसता लानेकेलिए किसी कठिन वा रूक्ष विषयको मधुर बनाकर, उसमें रसकी पुट देकर ' गुडजिह्विका ' न्यायसे शृङ्गारके ढंगसे भी काव्याङ्ग बनाकर वर्णन कर देते हैं । इसमें कविका दोष नहीं माना जाता । श्रीरुद्रटने यही अपने काव्यालङ्कारमें लिखा है- ' नहि कविना परदारा एष्टव्या नापि चोपदेष्टव्या । कर्तव्यतयाऽन्येषां न च तदुपायोऽभिधातव्यः ॥ किन्तु तदीयं वृत्तं काव्याङ्गतया स केवलं वक्ति । श्राराधयितु ं विदुषः, तेन न दोषः कवेरत्र ' कवि, जनताके आराधनार्थ स्त्रियोंका वर्णन काव्याऽङ्ग बनाकर वर्णित कर देते हैं । इसमें कविका दोष नहीं माना जाता । परमात्मा जव वर्णित किया जाता है; तब वह भक्तको कैसे प्रिय लगता है - यह बतानेकेलिए ' कामी नार पियार जिमि ' इत्यादिरूपसे शृङ्गाररूपसे भी वर्णन किया जाता है । यह तो हुआ लौकिक उदाहरण, अब ' वैदिकसंघ ' के आगे वेदका उदाहरण देना भी उचित है । उसे भी वादी कान खोलकर सुन लें । वेदमें भी वह शैली दीखती है । कुछ उदाहरण यह हैं - ' जारं न कन्या ' ( ऋ. ६५६३ ) ' गच्छन् जारो न योषितम् ' ( ६ | ३८ | ४ ) ' सरजारो न CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१३६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) योषणां, वरो न योनिं ' ( ६ १०१ । १४ ) ' योषा जारमिव प्रियम ' ( ६ । ३२ । ५ ) ' प्रियां न जारो ' ( ऋ. १६६२३ ) इन मन्त्रों में कैसी अश्लील उरमाएँ हैं? यहाँ सोमकी उत्कट अभिलाषार्थ यह उपमाएँ दी गई हैं । यदि वेद चाहता, तो वह यह अश्लील - उपमाएँ न देकर अन्य अच्छी उपमा दे सकता था, पर यहां गुडजिह्निकान्याय से इस अलङ्कार द्वारा वह तीव्र- लालसा स्पष्टतया समझ में आ जाती है । इस प्रकार वेद - सूत्रों के विस्तृत भाष्य पुराणों में भी नीरस एवं रूक्ष - विषयके विशदीकरणार्थ यह शैली कहीं - कहीं अपनाई गई है । इसी कारण भक्त लोग आज भी श्रीकृष्णसे गोपीभाव वाली भक्ति रखना चाहते हैं । वहां कोई परमात्मा से लौकिक - मैथुन इष्ट नहीं होता; किन्तु जैसे पतिको उसकी प्रिय स्त्री पूर्णतया आत्म - समर्पण कर देती है; उससे कुछ भी गुह्य नहीं रखती; उससे सर्वाङ्ग - आलिष्ट होकर उसका सच्चा प्रेम पाने में ही संश्लिष्ट हो जाती है, उसी प्रकार परमात्माको भी कान्तरूपसे अपना पूर्ण आत्म - समर्पण कर देना और उसके विशुद्ध एवं सात्त्विक प्रेमका रस चाखना गोपीभावमें इष्ट होता है । इसलिए प्रेमी लोग संभोगशृङ्गारकी अपेक्षा विप्रलम्भ-शृङ्गारको ही अधिक पसन्द करते हैं; क्योंकि ' संगमविरह-विकल्पे वरमिह विरहो न संगमस्तस्याः । संगे सैव तथैका त्रिभुवनमपि तन्मयं विरहे ' । जिसको वादी मैथुन - विषयविलास कहते हैं, वह ग्राम्यधर्म होता है । उसमें स्वार्थ भावना आ जाती है, पर शेष विशुद्ध - प्रेम में निःस्वार्थता हुआ करती है । यही जारभावकी भक्ति ५३६ गोपियों के श्रीकृष्ण- प्रेममें भी समझ लें । पतिसेवा तसे अतिरिक्त अन्य सब व्रत स्त्रीको वर्जित डाल हैं । वह पतिको ही परमेश्वर समझे, पतिसे भिन्न किसीको होते । बन परमेश्वर न समझे 1 । पतिकी सेवासे कुछ समय काटकर गुप्तरूपसे ( स्वा या एकान्तमें भगवान से प्रेम लगाना, उसकी उपासना करना एक यह स्त्रीकी परमेश्वरसे जारभावकी भक्ति हो जाती है । ऐसे लिए सम्बन्धकी स्पष्टताकारक उपमा इससे अन्य मिल नहीं सकती ॥ यही पुराणोंके गोपीभावका रहस्य है; पर यह शुद्ध हालि भक्तिभाव रखनेसे तो समझ में आ सकता है, कलुपित- विचार ' तद् रखने पर वा शून्य हृदय - हेतुक ऊपर - ऊपर से तैरनेपर तो कुछ च भी समझमें नहीं आता । शेष जो उसमें कामियोंकी सी वाह-कि लीला प्रतीत होती हैं, वह तो अलङ्कार होता है । अलङ्कार के तात्पर्य को साधारण बुद्धिवाले नहीं समझ पाते । प्रभव चस हम वादीकी संकुचित - बुद्धिमें बैठानेकेलिए एक बादीका अनुसारी उदाहरण देते हैं - स्वा. द. जी आर्यसमाज के प्रवर्तक | प्रकृत है । ' हैं । वादीकी स्त्री भी उन्हें ' स्वामीजी ' कहती हैं, वादीको भी । स्तथा यदि कोई स्वामीजीको वादीकी स्त्रीका ' जार ' कह दे कि ' वे दूसरोंकी पत्नियों के भी स्वामी हैं ' यह कहकर वह आलङ्कारिक इस कवितामें कह दे कि – ' अँग्रेजी विचारवाली हिन्दु - स्त्रियां अपने पतियोंके निषेध करने पर भी रात में उनकी सभा में चली जाती प्रकृत थीं, जार स्वामी उनसे खूब रमण करते थे, विविध विषयानन्दमें मस्त होकर विषय मथ - मथकर उनमें ऐसा अपना रेत ( तेव ) CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative