सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 301–310

सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 301–310

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) १७८ रे सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ' ( १३।३२ ) वयमपि । लिप्यते । भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमान् नए कैसे हो ' यस्य नाहङ्कृतो न निवध्यते ' ( १८१७ ) ' त्यक्त्वा कर्मफलासङ्ग सका कारण लोकान् न हन्ति । कर्मण्यभिप्रवृत्तोपि नैव किञ्चित् करोति सः हो नित्यतृप्तो निराश्रयः जाने पर ( ४ | २० ) निराशीर्यंतचित्तात्मा ' त्यक्तसर्वपरिग्रहः । शारीरं केवलं र्व कुमारीह फर्मे कुर्वन् नाप्नोति किल्विपम् ' ( ४ | २१ ) ' कृत्वापि न निवध्यते ' देखिये - छ ( ४ | २१ ) ‘ ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्ग ं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते ( १४५१६ ) न स पापेन पद्मपत्त्रमिवाम्भसा ' ( ५/१० ) इन पद्योंके वक्ता - ' स्त्रियः पूर्व । श्रीकृष्ण हैं । यहां यह बताया गया है कि यदि कर्मकर्ता कर्मका दिव्य - संयोग अपनेसे सम्वन्ध नहीं रखता, उनका मनसे कोई सम्वन्ध न रहे; के स्वामीको उसमें अहम्भाव नहीं, वासना नहीं, कुछ स्वार्थसिद्धि, फलविशेष-नको व्यभि सिद्धि नहीं, उसका आत्मा शुद्ध है; तब उसका वह कर्म शारीर-हो रूपसे हो रहा हुआ दीखनेपर भी वह ' कर्म ' नहीं रहता । एक यदि बादी बच्चा अपनी माताके वा किसी अन्य स्त्रीके रतनको पकड़ कर चार मानवा खींच लेता है; वा उसके किसी अङ्गको छू लेता है; नखोंसे उसे T, क्योंकि क्षत कर देता है, वह वासना न होनेके कारण पापी नहीं मान हुए - पुरुष लिया जाता । उसका वह कर्म वन्धनकारक नहीं होता । योगवासिष्टमें कहा गया है— ' मनः कृतं कृतं राम! न शरीरकृतं जय श्रीकृष्ण धनञ्जय!! कृतम् । येनैवालिङ्गिता कान्ता तेनैवालिङ्गिता सुता ' अर्थात् । ' योग लड़कीको भी आलिङ्गन किया जाता है, स्त्रीको भी; पर मानसिक-भावके भेदसे लड़कीके आलिङ्गनको आलिङ्गन नहीं माना जाता; म - भूतात्मा काशं नोए मिलना माना जाता है । इसीका संकेत वेदने भी किया है - ' न CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीकृष्णकी निर्लेपता * & कर्म लिप्यते नरे ' ( यजुः ४०/२ ) अर्थात् निष्काम कर्म चाहे लोकदृष्टिमें पुण्य हो वा पाप, जिसमें कामना नहीं; वह कर्म पुरुषको लिप्त नहीं करता । इसी सिद्धान्तसे श्रीकृष्णने पाण्डवों-द्वारा भीष्मद्रोणादि गुरुओंको मरवाया । इसीलिए अष्टावक्र-गीतामें भी कहा गया है- ' निवृत्तिरपि मूढस्य प्रवृत्तिरुपजायते । प्रवृत्तिरपि धीरस्य निवृत्ति - फलभागिनी ' ( १८६१ ) । • भगवान श्रीकृष्ण में भी यही बात थी - देखिये श्रीमद्भागवत-' यस्येन्द्रियं विमथितुं कुद्दकैर्न शेकुः ' ( १११११३६ ) ' आत्मन्यवरुद्ध-सौरतः ' ( १० | ३३ | २६ ) ' आत्मारामः, अखण्डितः ' ( १० | ३० | ३५ ) ‘ योगमायामुपाश्रितः ' ( १०।२६।१ ) ' आत्मारामः ' ( १०२६४२ ) ‘ मन्मथमन्मथः ' ( १० | ३२ | २ ) ' यस्येन्द्रियं विमथितुं करणैर्न विभ्व्यः ' ( ११ । ६ । १८ ) । ' न मय्यावेशितधियां कामः कामाय कल्पते I । भर्जिता कथिता धाना प्रायो वीजाय नेष्यते, ( १०/२२/२६ ) ' सन्त्यज्य सर्वविषयांस्तव पादमूलम् । भक्ता भजख दुरवग्रह! मा त्यजारमान् ' ( १०/२६/३१ ) ' न खलु गोपिकानन्दनो भवान्, अखिलदेहिनामन्तरात्मदृक् ' ( १० | ३१ | ४ ) ' भद्रा वधूर्भवति यत् सुपेशा स्वयं सा मित्रं ( इन्द्रपरमात्मानं ) वनुते जने चित् ' ( ऋ. १० | २७ | १२ ) इसका अर्थ यह है कि- ' सा वधूः - स्त्री गोपीसदृशी भद्रा - श्रेष्ठा भवति, या जने चित् - मनुष्यरूपे वर्तमानं मित्रं - स्व-मित्ररूपमिन्द्रपरमात्मानं वनुते - प्रार्थयते । इन्द्र कहता है- ' स प्रीयमाणो वरजनोऽहमिन्द्र एव ' । जब इस प्रकार वेदमें इन्द्रको सब वधुओंका वर कहा Gujarat. An . eGangotri Initiative

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50 श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) गया है, और गीतामें ' देवानामस्मि वासवः ' ( इन्द्रः ) ( १० | २२ ) इन्द्रका अवतार श्रीकृष्णको माना जाता है; तब वादीका कोई भी शङ्कापङ्क श्रीकृष्णको कलङ्कित नहीं कर सकता । इसका उत्तर श्रीमद्भागवतने स्पष्टतया दे दिया है - ' एतदीशनमीशस्य प्रकृति-स्थोपि तद्गुणैः । न युज्यते सदात्मस्थैर्यथा बुद्धिस्तदाश्रया ' ( १ ९ ११२८ ) तं मेनिरेऽबला मूढाः स्त्रैणं चानुत्रतं रहः । अप्रमाण-विदो भर्तुरीश्वरं मतयो यथा ' ( २६ ) अर्थात् - मूढतया स्त्रियोंकी भांति चित्तबलकी शक्तिसे रहित लोग श्रीकृष्णको स्त्रैण समझ लिया करते हैं; क्योंकि — वे श्रीकृष्णकी ईश्वरता ( सामर्थ्य ) नहीं जानते । भगवान् श्रीकृष्णके शरीरको दिव्य बताया गया है, भौतिक नहीं | देखिये - ‘ अस्यापि देव! वपुषो मदनुग्रहस्य स्वेच्छामयस्य, न तु भूतमयस्य कोपि ' ( १।१४ / २ ) तभी वादीकी मान्य गीता में भी यही कहा है- ' जन्म कर्म च मे दिव्यं ' ( ४६ ) यह बात वादी तत्त्वतः जान रखे । तब वादीकी उसमें सम्भावित आशङ्का निकम्मी है, वह भौतिक शरीरमें तो कथञ्चित् सम्भव हो सकती है, अभौतिक शरीरमें नहीं । भगवानके यह शब्द हैं कि जो मुझमें कामबुद्धि भी करता है, उसके कामके बीजको मैं जला देता हूँ; जैसे भुजे हुए धानसे चावल नहीं पैदा होता, वैसे जलाया हुआ कामबीज भी अंकुर पैदा नहीं कर सकता । इसका मूल - पद्य हम पूर्व लिख चुके हैं । इसी तरहसे श्रीभागवत में अन्यत्र भी कहा है - ‘ ध्यानप्राप्ताऽच्युताश्लेषनिवृत्या क्षीणमङ्गलाः । CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीकृष्णकी निर्लेपता ५८ हुगुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः ' ( १० / ३६ / १०-११ कामना वर्जित कर्म करना कम होता है कामना ) पर. . बाहरसे मालूम हो रहा हुआ अकर्म भी , कर्म रखने पर है श्रीकृष्ण जैसा - पुरुष युवतियोंके पास होता है । स अय ठहरा हुआ भी ' बिशुद्ध प्रेमका प्रतीक होनेसे खतरनाक नहीं होता, और उनसे गया रहते हुए भी, परन्तु मनमें कामानुरक्त लोग खतरनाक पूछ हैं, वे ' बाह्येन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा होते श्रा स्मरन् । यार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ' ( ३६ ) इसके उदाहरा ज बने हुए ' हरामखोरी ' में ( पृ. ३३ ) संलग्न होते हैं । इस विपरे । बहुत विस्तारसे समझाया जा सकता है, परन्तु बुद्धिमान केनि संकेत ही पर्याप्त होता है । ( ७ ) आगे वादी विष्णुके स्थानका पता सोलह करोड़ बोका है, ऊपर आकाशमें विष्णुलोक बताकर उसे हमारे लिए विदेश बताते हैं । यह बात तो उपहाससे अधिक मूल्य वाली नहीं ॥ शन मरने पर पुरुषकी गति पुण्यात्मा होने पर द्युलोक में ' विष्णुलो स गच्छति ' मानी जाती है, वही तो हमारा गन्तव्य, तत्त लग स्थान है, यहाँ हम स्थूल शरीरधारी होकर सीमित शक्तिवाले होते हैं; पर वहाँ सूक्ष्म शरीरवाले होकर बहुत शक्तिवाले हो जाते हैं, वही तो मुक्तिका लोक है । वह हमारा विदेश नहीं । उसीकेलिए ही तो हमारी तपस्याएँ होती हैं । देखिये इस प नही वेदकी साक्षी - ' तद् विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समित्यते । लग विष्णोर्यंत् परमं पदम् ' ( ऋ. ११२२/२१ ) ' तद् विष्णोः परमं पदं छा को Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) राधाका श्रीकृष्णको शाप । दिवीव चक्षुराततम् ' ( २० ) । गोलोकका भी १०-११ ) फ पश्यन्ति सूरयः वर्णन वेदमें आया है - देखिये- ' यत्र गावो भूरिशृङ्गा रखने पर संकेतसे । अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णः ( विष्णोः ) परमं पदमवभाति होता है । श्रयासः भूरि ' ( ऋ. १।१५४ । ६ ) यहाँ सूर्यलोकमें विष्णुका गोलोक बताया भी बिशुद्ध ' गया है । वह द्युलोक में है - ' दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः ' और उनसे पृ ( ऋ. १०।१६० । ३ ) यहाँ द्यु लोकका स्पष्ट वर्णन है । वेदकी परिधिमें ख़तरनाक ' श्राया हुआ लोक हमारा विदेश नहीं होता । आजकल उस मरन् । इति द्यु लोककी निम्नपरिधिमें ठहरे हुए चन्द्रलोकमें जानेकी भी तैयारी इसके उदाहरण इस विषय हो रही है । द्धिमानोंकेलिए ( ८ ) श्रागे वादी ' राधाका कृष्णको शाप ' बताकर ब्रह्मवैवर्त-के कई ' कृष्ण वृजा ( विरजा ) कान्त! ' आदि लोक उधृत करता करोड़ बोल है, और अर्थ करता है - ' हे कृष्ण, अतिलम्पट कामचोर, तू लिए विदेश मेरे घर से चला जा । तू मनुष्योंकी भांति मैथुन करनेमें ( यह न्य वाली नहीं । शब्द वादीके अपने हैं ) लम्पट है ' । इस प्रकार गोलोककी कृष्ण-में ' विष्णु ' की बीवी राधाने कृष्णको व्यभिचार में पकड़कर औरतोंसे धक्के न्तव्य, लख लगवाकर बाहर किया ' । अब वादी इस पर भी सुनें-- उसने मित- शक्तिवाले नमक- मिर्च लगाकर श्रीकृष्णको ' व्यभिचारी ' तथा ' चरित्रहीन ' शक्तिवाले हो तो लिख डाला, पर जिस ब्रह्मवैवर्त पुराणसे उसने यह पद्य विदेश नहीं । उधृत किये, वह पुराण तो श्रीकृष्णको वादीके लगाये दोष देखिये इस पर नहीं लगाता । तब वादी ' निष्कलङ्क कृष्ण ' को बलात् कलङ्क सः समिन्धते ॥ लगाता हुआ शोचनीय है । हमें तो इसमें आक्षेप - योग्य परमं पदं स कोई बात नहीं मालूम होती, और वादीने भी नहीं सिद्ध किया कि इसमें आक्षेपार्ह वा वेदविरोध क्या है? हो सकता है कि- बादी स्वा. दयानन्दजीका अनुसरण करके मानसिक संन्यासी बने हुए हो, अतः उसे स्त्री - सम्बन्धी प्रकृतिका ज्ञान न हो - यह सम्भव है । तब अगत्या हम ही वादीको बताते हैं । एक पुरुष हो, उसकी स्त्रियाँ बहुत हों, वे आपसमें सपत्नियां ( सौत ) हुआ करती हैं - यह तो वादी जानते ही होंगे । यह भी जानते होंगे कि -एक पुरुषकी बहुत स्त्रियां वेदविरुद्ध भी नहीं होतीं, उनसे श्रचतुर और बलहीन पुरुषको कुछ कष्ट हो - यह अन्य बात है । ' एक पुरुषकी बहुत स्त्रियों ' की वेदानुकूलता बतानेकेलिए कुछ वेदमन्त्र भी उपस्थित किये जाते हैं । कृष्णयजुर्वेदमें कहा है— ' एकस्मिन् यूपे द्वे रशने परिव्ययति, तस्माद् एको द्वे जांये विन्देत ' ( तै. सं. ६६४ ( ३ ) ' तस्माट् एकस्य बयो जाया भवन्ति ' ( ऐत. प्रा. ३।२३ ) ' जनीरिव पतिरेकः समानः ' ( ऋ. ७ | २६ | ३ ) ' पतिर्जनीनामुपयाति ' ( ऋ. १८६३२ ), इत्यादि बहुतसे मन्त्र हैं । इसमें इतिहास भी अनुकूल है । राजा हरिश्चन्द्रकी सौ स्त्रियां थीं, देखिये ऐतरेय ब्रा. ( ७/१३ ) । महाराज दशरथकी साढ़े तीनसौ स्त्रियां तथा तीन पटरानियां थीं । देखिये- वाल्मीकि. ( २३६।३६ ) । सौतों में आपस में ईर्ष्या हुआ करती है, यह तो वादी जानते ही होंगे; इसीलिए वेदमें भी ' सपत्नी - प्रणुदन ' ' सपत्नीघ्न ' आदि सूक्त प्रसिद्ध हैं, जो वेदमें भी इस प्रकारके व्यवहारको सूचित कर रहे हैं । यही बात ' ब्रह्मवैवर्त ' के उस स्थलमें भी समझनी CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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१८४ श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) चाहिये । उसमें भगवान् कृष्ण गोलोकमें स्वामी कहे गये हैं, उसमें कई कोटि ( कोटि - शब्द यहां ' बहु ' वाचक है ) गोपियां उनकी पत्नी कही गई हैं । कभी भगवान् एकके पास जाते हैं; कभी दूसरीके । परन्तु प्रायः वे अपनी नित्य - शक्ति राधाके पास रहते हैं । एक दिन भगवान्, राधाकी सपत्नी ' विरजा ' गोपीके पास गये । यह जानकर राधा कोप भवनमें जा घुसी । पहले वह सौत के घर में गई; पर वहां उसे न तो वह, और न श्रीकृष्ण ही मिले । तब वह अपने भवनमें बैठ गई । सखियोंको द्वार पर बैठा दिया । प्ररणय- कलहसे उनसे कहा - ' यदि श्रीकृष्ण यहां आना चाहें; तो उन्हें यहां न आने देना । भगवान् भी उसका . स्वभाव जानते थे; वे उसके भवनमें घुसने लगे । सखियोंने रोका और भीतर सूचना भेज दी । तव प्ररणय- कुपित हुई हुई श्रीराधाने अपनी सपत्नीकी ईर्ष्यासे उक्त वाक्य कहे, जिन्हें वादीने . उद्धृत किया है । परन्तु उसने पूर्वापर - प्रकरणको छिपा दिया • था और हमने उसे प्रकट कर देनेका अपराध कर दिया है । वास्तवमें गोलोक में भगवान् कृष्ण ब्रह्मस्थानीय हैं, और उनकी शक्ति राधा प्रकृति - स्थानीय है । प्रकृति त्रिगुणात्मक हुआ करती है । जहां उसमें सत्त्वगुण होता है, वहां रजोगुण और • तमोगुण भी हुआ करता है । पुराणकारने उस लीलाका लौकिक-दृष्टिकोण से निरूपण किया है । श्रीकृष्ण वहां पर नायक हैं, श्रीराधा वहां नायिका हैं; शेष विरजा आदि वहां उसकी सपत्नियां बताई गई हैं । तव लौकिक - दृष्टिमें जो सपत्नियों में राधाका श्रीकृष्णको शाप ईर्ष्या हुआ करती है, उसका आभास भी पुराणकारने वा किया दिया है । पुराण मित्रोपदेश कहे जाते हैं; पर पुराण पास मित्रोपदेश हैं, वहां स्थान - स्थान पर प्रभु - उपदेश भी वन जाये वहां । हैं, कान्ता - उपदेश भी । प्रभु - उपदेश वेद माने जाते हैं, श्रीर कान्ता - उपदेश काव्य । तब पुराण में यह सब होनेसे स्थान श्रीक - स्थान में काव्यरूपता भी आगई है । उसमें लौकिक दृष्टिकोण जहां - तहां दिखलाया गया है । तो क्या काव्यों में भी लोल नायक | नायिकाओंके प्रणय - कोप नहीं हुआ करते? वादीने कदाचिन ध्वन्यालोक, काव्य - प्रकाश, साहित्य - दर्पणादि साहित्य - प्रन्यन जिस देखे हों; और स्वा.द.जीके निषेधसे कदाचित् उसने काव्य भी न देखे हों; कदाचित् ब्रह्मचारी होनेसे वादीने विवाह भी न श्रीक किया हो; तब उसे स्त्री - प्रकृति - सम्बन्धी ज्ञान कैसे हो सकता है! लम्प ' काव्य - प्रकाश ' में रस- दोषोंमें कहा है कि- कभी नायिका यदि प्रणय - कोपमें आकर नायकको पाद- प्रहार भी कर देती है, बा रूठ बैठती है; तब नायकको कोप नहीं करना पड़ता । नहीं तो शास यदि नायक भी उसे पीटना शुरू करदे, तो रसभङ्ग हो जायगा । यह काव्य- दोष हो जाता है । यही लक्ष्यमें रखकर ध्वनिकार ( ऋ. आनन्दवर्धनाचार्यने भी कहा है- ' अनौचित्याद् ऋते नान्यद् उसक रसभङ्गस्य कारणम् । औचित्यो पनिबन्धस्तु रसस्योपनिषत् परा ' । इस इस अवसर पर नायक नर्म बल्कि उसके आगे नम्र भी हो जाता अ है, प्रत्युत वह कभी नायिका के पैरों पर भी गिर जाता है । परन्तु यह व्यवहार जैसा कि पहले स्पष्ट किया गया है, काव्यके दृष्टिकोणसे आ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २६६ है । तब तदनुसार विरजा नामक राधाकी सपत्नी के कारने व किया पास जाता जाकर श्रीकृष्ण जब “ स्वामी विरजानन्दजी " बन गये, पुराण वहाँ और बहुत दिन बाद राधाके पास गये; तब राधाने उनका वन बाने ' स्वामी विरजानन्द ' वनना सहन न करके, प्रणय- कोपमें आकर हैं, और के लिए सखी के सामने वादीसे उद्धृत यह शब्द कहे-श्रीकृष्ण स्थान स्थान - हे ' कृष्ण! विरजाकान्त! गच्छ मत्पुरतो हरे! कथं दुनोषि मां ष्टिकोण भी लोल! रति - चौरातिलम्पट ' । नावक यहां पर स्त्रीका स्वभाव अङ्कित किया गया है । श्रीकृष्ण ने कदाचित् जिसके पास गये थे, वह भी उन्हींकी अपनी शक्ति थी, राधा इत्यन्यन्यन भी । मानवीय दृष्टिकोणसे यह सूचित किया गया है कि-काव्य भी श्रीकृष्ण यदि सदा राधाके पास रहते; तो वह उनको ' अति-विवाह भी न लम्पट ' न कहती । परन्तु श्रीकृष्णके उसकी सौतके पास जाने से सकता है! स्त्रीस्वभाववश उसने उक्त शब्द कह डाले । स्त्रीके स्वभावका नायिका यदि वादी व्यवहारमें अनुभव न रखते हों; तो उन्हें वेदादि-देती है, बा शास्त्रों द्वारा उसे जान रखना चाहिये । नहीं तो हो जायगा । वेदमें कहा है- ' स्त्रिया अशास्यं मनः, उतो अह ऋतुं रघुम् ' र ध्वनिकार ( ऋ. ८ । ३३ । १७ ) अर्थात् - स्त्रीके मनपर शासना नहीं हो सकती । तेनान्य उसकी बुद्धि लघु हुआ करती है । सुप्रसिद्ध श्रीसायणाचार्यका नषत् परा । इसपर भाष्य देखें- ' स्त्रिया मनः- चित्तम् अशास्यं - पुरुषेण हो जाता अशिष्यं, शासितुमशक्यम्, प्रबलत्वादिति । उतो - अपि स्त्रियाः, परन्तु वह ऋतु -प्रज्ञां, रघु - लघुम्, अह - आह ' । इस मन्त्र अर्थपर श्रार्यसमाजके निष्पक्ष विद्वान् श्रीपाददामोदर - सातवलेकरका राधाका श्रीकृष्णको शाप १८७ भाष्य उनके बनाये ' ऋग्वेद के सुबोध भाष्य में ' मेघातिथि - ऋषिके दर्शन ' ७२ पृष्ठमें देखें । वह यह है- ' स्त्रियोंके मनको संयममें रखना कठिन है, स्त्रियोंके मन पर काबू करना अशक्य है । स्त्रियोंके कर्म छोटे होते हैं, उनका सामर्थ्य कम होता है, उनकी बुद्धि छोटी होती है ' । इसी मन्त्रको लक्ष्य करके प्रसिद्ध बौद्ध - कवि अश्वघोषने भी ' सौन्दरनन्दकाव्य ' में कहा है- ' अकृतज्ञमनार्य-मस्थिरं वनितानामिदमीदृशं मनः ' ( ८४६ ) । इसी प्रकार चाणक्य-सूत्रोंमें भी कहा है- ' स्त्रीणां मनः क्षणिकम् ' ( ४७८ ) ' न समाधिः ( चित्तस्थैर्य ) स्त्रीषु, लोकज्ञता च ' ( ३६० ) । वेद अन्यत्र भी स्त्रीकेलिए कहता है - ' न वे स्त्रैणानि सख्यानि सन्ति, सालावृकाणां हृदयान्येता ' ( ऋ. १०२५१५ ) । इसी प्रकार ' शतपथ ब्राह्मण ' में भी कहा है - ' मा एतद् ( स्त्रैणम् ) श्रदृथाः, न वै स्त्रैण ँ सख्यमस्ति ' ( ११ शशश ) । इसीका अनुवाद श्रीमद्भागवतमें भी आया है- ' क्वापि सख्यं न वै स्त्रीणां वृकाणां हृदयं यथा ' ( ६।१४।३६-३७ ) । ' महाभारत ' में भी कहा है - ' स्त्रियो हि मूलं दोषाणां लघुचित्ता हि ताः स्मृताः ' ( अनु-शासनपर्व ३८।१७ ) । प्रकरण हमने रख दिया है, अब वादीका इसमें आक्षेप क्यों? वह इससे अपना पक्ष कैसे सिद्ध करना चाहता है? क्या वादी भी प्रणय- कुपिता नायिकाके पक्षवाला बनकर, परप्रत्ययनेय - बुद्धि होकर श्रीकृष्णको दोषी सिद्ध करना चाहता है? अपनी अन्य पत्नीसे मिलना जो राधाकी सपत्नी है, उसे CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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१८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ' व्यभिचार ' वा ' कुकर्म ' कैसे कहा जा सकता है? कदाचित् वादीका अभिप्राय भी यही हो कि श्रीकृष्ण दोषी सिद्ध हों? परन्तु यहां स्पष्ट है कि - श्रीकृष्ण निर्दोष हैं । शेष रही राधा, उसके तो सपत्नीकी ईर्ष्यासे उत्पन्न हुए कोप का यह चित्र - चित्रण ही किया गया है । क्रोधमें आया हुआ कोई भी व्यक्ति हो, उचित - अनुचित सब कह बैठता है । इसी क्रोधके वशमें आकर ही वादीके परमगुरु स्वा. द. जीने भी ' सत्यार्थप्रकाश ' में सनातन-धर्मियोंको बहुत गालियां दे डाली हैं । कुछ नमूना देख लीजिये-' तुम कुंआ में पड़ो ' ( पृ. ३ समु. पृ. ४४ ) ' देखो इन गवर्गडों की पोपलीला ' ( स.प्र. पू. १७७ ) ' अपने - अपने शरीरोंको भाड़में झोंकके सब शरीरको जलावें ' ( पृ. १६३ ) ' सुनो अन्धो! ( पृ. १६६ ) ' आप पराधीन भटियारेके टट्टू और कुम्हारके गदहे के समान शत्रुओंके वशमें होकर ' ( पृ. १६६ ) इत्यादि । वादीने भी गुस्से में आकर श्रीमाधवाचार्यजी और सनातनधर्म तथा श्रीकृष्ण - भगवानको इस अपने ट्रैक्ट में बहुत सी गालियां दी हैं । कुछ नमूना देखिये - ' माघवाचार्य अपना सारा पाखण्ड फैलाकर भी..., बकवास भले ही करता रहे ' ( पृ. ४ ) इस १११ नम्बरके तिलकधारी पाखण्डी पंडितने ' ( पृ. १२ ) ' पर जिसके " हियेकी भी फूट चुकी हो, ऐसे १११ नम्बरी पाखण्डीकी समझमें कैसे आवे । ' ढोंगी पण्डित ' ( पृ. १४ ) विचारा वैसे ही १११ नम्बरका तिलक लगाकर ढोंग बनाकर पाखण्डाचार्य बन बैठा CC - 0. Ankur Joshi Collection राधाका श्रीकृष्णको शाप # है ' ( पृ. १६ ) ' पाखण्डी - शिरोमणि ' ( पृ. २३ ) ' वे सनातनी महान् पापी हैं ' ( पृ. २६ ) ' संसारके सारे दुराचारोंकी पंडित सड़ातनधर्म में मिट्टीका तेल डालकर आग लगा देनी जड़ स श ( पृ. ३३ ) ' गोपियोंसे हरामखोरी करनेको पवित्र प्रेमका चाहिये । पृ. प्रतीक मानते हैं ' ( पृ. ३३ ) इत्यादि । पुराणकार राधाको मानमें कुपिता बता रहे हैं । जैसे कि- पुर ‘ राधाकोपापनयने ' ( ३।६५ ) ' मानापनयनावधि ' ( ३।६७ ) । आर. स्वा लोगोंकी पुराणपर तो वक्रदृष्टि है, परन्तु रामायण में श्राप वा लोगोंकी श्रद्धा है । उसमें भी इस प्रकारका वृत्त है । प्रकरणा जि कुछ भेद है । जब श्रीराम मारीच - राक्षसको मारने गये, और लक्ष्मण सीताकी रक्षाकेलिए रह गये; तब शब्दविशेष सुनकर था सीताने श्रीरामको संकटापन्न समझा । उसने लक्ष्मरणको प्रेरणा की कि - जाओ, भ्राताकी सहायता करो । परन्तु वह श्रीरामकी दय पक्ष शक्तिको जानकर वहां नहीं गये । तव श्रीसीताकी कोपाग्नि भड़क सक उठी । उससे उसकी बुद्धि विपरीत हो गई । कहने लगी-तथ ' सुदुष्टस्त्वं वने राममेकमेकोऽनुगच्छसि । मम हेतोः प्रतिच्छन! ' द्वेप ( ३४५ | २४ ) कितने कठोर शब्द हैं यह? तब क्या इस सीताके वचनमात्रसे वाल्मीकि रामायणको ही वादी अप्रामाणिक होग समझने लग जायेंगे? वा लक्ष्मणको ही दुश्चरित्र मानने ढंग जायेंगे? लक्ष्मणने कहा- ' भवती दैवतं मम ' । अन्तमें उन्होंने धान स्त्री - प्रकृतिका खाका खींचा- ' विमुक्तधर्माश्चपलाः तीच्णा भेदकराः किय स्त्रियः ' ( ३ | ४५ | २६-३० ) । Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 307

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ५६० १६ ॥ यहां स्त्रियोंके स्वभावकी तीक्ष्णता बताई गई है । वादी के नातनी पंडि स्वामीजी भी स्त्रियोंकी तीक्ष्णता मान गये हैं । देखिये उनके की जड़ इस ' प्रायः स्त्रियोंका स्वभाव तीक्ष्ण और मृदु होता है ' ( स.प्र. देनी चाहिये । शब्द- ) । यही तीक्ष्णता सपत्नीकी ईर्ष्यावश श्रीराधाकी भी प्रेमका पृ. ४७ प्रतीक यदि पुराणकारने स्वाभाविकतासे दिखाई है; तब यहां न तो दोष सिद्ध हुआ, न श्रीकृष्णका, और न ह पुराणकारका | जैसे कि स्वाभाविकतावश श्रीराधाका दोष हुआ, दोष हुआ केवल ६७ ) । आप- वादीकी अल्पश्रुत तथा अत्यन्त संकुचित बुद्धिके आत्म - विश्वासका, यम थाप जिसने यह मिथ्या विश्वास कर लिया है कि हम द्वारा | प्रकरएा श्रीकृष्ण पर लगाये दोषका कोई प्रत्युत्तर दे ही नहीं सकता; गर चा दोष है उनके खण्डन - व्यसनका । वास्तवमें डा ० श्रीरामजी पूरे वशेष सुनकर ब्रह्मचारी हैं । जिन स्त्रियोंके स्वभावको उनके संन्यासी स्वामी रणको प्रेरण दयानन्दजी परख गये; तथा अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ आर्यसमाज ' के श्रीराम पञ्चमवेद ' में उसका उल्लेख कर गये, पर वादी उसे न जान पाग्नि मड़क सका; परन्तु ' सत्यार्थप्रकाश ' तो उन्हें अक्षरशः याद होगा, कहने लगी- तथापि उक्त - वाक्यपर उनकी दृष्टि न पड़ी; अथवा पुराणोंके : प्रतिच्छन द्वेपसे आँखों पर आवरण आ पड़ा हो । होगया उनके आक्षेपका इसी समाधान, जिसको वादी असम्भव समझता था, वह सम्भव अप्रामाणिक होगया । मानने लग न्तमें उन्होंने ' ब्रह्मवैवर्त’के प्रकरण - निर्देशक पद्य निम्न हैं । वादी साव-भेदकराः धानतापूर्वक देखें । पुराणने राधिकाका उक्त वचन समर्थित नहीं णा किया, किन्तु उसकी तीव्र आलोचना की है । देखिये- ' पुरः- स्थितं CC - 0. Ankur Joshi राधाका श्रीकृष्णको शाप २६१ तं प्राणेशं राधा पुनरुवाच ह । नानुरूपम्, श्रत्यकध्यम्, श्रयोग्यमति-कर्कशम् ' ( ४ | ३ | ५७ ) वादीने ग्रन्थकारका यह वचन छिपा दिया है । ' नानुरूपम् ( राधाका आक्षेप श्रीकृष्णके कार्यके अनुरूप नहीं था ) अतिथ्यम् ( सर्वथा कथन - योग्य नहीं था ) अयोग्यम ( और फिर युक्त भी नहीं था ) अतिकर्कशं ( बहुत कड़ा था ) । यह ग्रन्थकारके शब्द वादीके प्रयास पर पानी फेर रहे हैं । ग्रन्थकार उन आक्षेपोंको श्रीकृष्ण पर लागू होनेके योग्य नहीं समझते । पर उन्हीं याक्षेपोंको अपनेसे निन्द्यमान - राधाके वकील बनकर वादीने विना कान - पूँछ हिलाये मान लिया, और निष्कलङ्क - कृष्णको सकलङ्क करनेकेलिए इन्हें होशियारी गई । राधाने केवल ' लम्पट ' कहा था, डा ० जीने ' व्यभिचारी ' कह दिया!!! इसमें उनका हृदय पहचाना जा रहा है । फलतः उक्त पुराण श्रीकृष्ण में उक्त आक्षेपोंको नहीं लगाता । राधा मानभङ्गसे प्राप्त क्रोधके कारण बिना सोचे - विचारे बोल गई, जिसका पीछे उसे बड़ा पश्चात्ताप हुआ । उसमें भी श्रीदामाने उसके उन वचनोंकेलिए श्रीराधाकी तर्जना की है । वादीने उन पद्योंको छिपा लिया, केवल इसलिए कि - किसी प्रकार कृष्णको कलङ्क लगाया जावे । वे श्रीदामाके पद्य यह हैं— ' कथं वदसि मातस्त्वं कटुवाक्यं महीश्वरम् । विचारणां विना देवि! करोषि भर्त्सनं वृथा ' ( ३।७७ ) ब्रह्मानन्तेशदेवेशं जगत्कारण-कारणम् । वाणी - पद्मालयामाया - प्रकृतीशं च निर्गुणम् । ( ७८ ) । स्वात्मारामं पूर्णकामं करोषि त्वं विडम्बनम् । देवीनां प्रवरा त्वं Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ११२ च निबोध यस्य सेवया ' । [ यहाँ गोलोकके श्रीकृष्णकी बहुत - सी देवियों ( रानियों ) में राधाको प्रवर ( श्रेष्ठ ) बताया गया है । इससे विरजा आदि अन्य भी देवियाँ श्रीकृष्णकी ही हैं । उनके पास गमन कभी व्यभिचार सिद्ध हो ही नहीं सकता । जैसेकि - वादीने इस विषय-में एडीसे चोटी तकका पसीना बहाया है । राधाने भी व्यभि-चारका कहीं दोष लगाया ही नहीं । यह वादीकी अपनी ही ' कारस्तानी ' है । ] ( ७६ ) यस्य पादार्चनेनैव सर्वेषामीश्वरी परा । तन्न जानासि कल्याणि! किमहं वक्तुमीश्वरः ' ( ८० ) भ्रूभङ्गलीलया कृष्णः स्रष्टुं शक्तश्च त्वद्विधाः । कोटिशः कोटिशो देव्यः तं न जानासि निर्गुणम् ( ८१ ) यह सुगम श्लोक हैं । आशा है - वादी इनका अर्थ समझ सकते होंगे, और उन्होंने जान लिया होगा कि - इन श्लोकोंने वादीके पक्षको जीर्ण - शीर्ण कर दिया है । यहाँ पर पुराणने श्रीकृष्ण - भगवान्के विषय में अपने हार्दिक भावमय शब्द श्रीदामा द्वारा कहलवाये हैं । यह पुराणाभिमत - शब्द वादीने लोक- दृष्टिसे छिपा लिये हैं, इसलिए कि - श्रीकृष्ण कलङ्कित सिद्ध हों । तब वादी अपने पर दोष न देकर पुराणकार वा पुराण वा श्रीकृष्ण भगवान् पर ही क्यों दोष दे रहे हैं? यह तो वादीने वैसा किया है जैसाकि - एक मुसलमानने ' मत पढ़ो निमाज ' यह किसी मौलिवीका आधा वचन तो सुना दिया, पर ' जब हो नापाक ' CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीकृष्णका सुदर्शनचक्र यह उसका अग्रिम आधा वचन छिपा लिया । इससे वे मान उस मौलिवी पर बरसने लगे । वादीकी यह पुराणदूषक मुसल सुरा नीति वस्तुतः दूषित है । ' व्यभिचार में पकड़कर ' ' औरतों से शिव धक्के शैल लगवाकर वहांसे बाहर निकलवा दिया, व्यभिचार - कामना पूरी करनेका शाप देकर यह शब्द वादीने झूठे एवं अपने पुरु मन- उन गढन्त लिखे हैं, पुराणके किसी भी पद्य के किसी भी पदका यह अर्थ नहीं हे । ‘ मनुष्याणां व्यवहारस्य ' ' लभतां मानुषीं योनि'का व्यभिन चार अर्थ करना मनुष्य — वादीका अपने आपको भी व्यभिचारी विश बनाना है । ' उनके अवतार लेनेका कारण भी लोककल्याण नहीं क था ' ( पृ. १०-११ ) यह कहना भी द्वेषवश ही है । पूतना, तृणावर्त, वक, प्रलम्ब, केशी, धेनुकासुर, कंस, कालयवन, जरासन्ध, व्र शिशुपाल आदि अनेकों लोकहानि करनेवाले दैत्योंको मारकर भगवान्ने भारतको निष्कण्टक करके लोक - कल्याण किया, पर भी ' वादीको यह कैसे दीखे? कदाचित् ' अतिरमणीये वपुपि व्रणमेव मक्षिकानिकरः ' को चरितार्थ करना ही वैदिकता हो! बादी जनतामें इन अपनी चोरियोंको कब तक छिपावेंगे? ( ६ ) आगे वादी ' लिंग ' शब्दकी व्याख्यामें - महादेव और ५ सतीके रमणका प्रकार बताते हैं, पर यह तो प्रकृति - पुरुषका मैथुन - मिथुनीभाव अलङ्काररूपसे वर्णित किया गया है - जैसे वेदमें ' जार आ भगम् ' केलिए निरुक्तमें ' आदित्योऽत्र जार उच्यते ' रात्रेर्जरयिता, भगम् - स्वं ज्योतिः ' ( ३ । १६ । ५ ) कहा है । ' उमाख्या सा महादेवी, त्रिदेवजननी परा । मूलप्रकृतिराख्याता Gujarat An eGangnitive

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ५६४ गिरिजा मता ' ( शिवपुराण रुद्रसंहिता २६/१६ ) ' शिवलोके वे मुसल सुरामा त्वं च मूल - प्रकृतिरीश्वरी । सा एव दक्षकन्या च सा एव राणदूपक शिवा नोंसे ' ( ब्रह्मवैवर्त पुराण ६७ / ६१-६२ ) तब इस प्रकृति-धक्के शैलकन्यका पुरुषकी आलङ्कारिक - क्रीडासे बादी क्यों हडबडा गये? इसीसे र - कामना अपने उनका ' शिवलिङ्गपूजारहस्य ' भी उत्तरित होगया । ऐसी श्रालङ्का-मन- हम पूर्व बता चुके हैं । रिकता काव्यमि पृ ० १४ में वादी लिखता है- ' पुराणोंके अनुसार कामशास्त्र-व्यभिचारी विशेषज्ञ कृष्ण गोपियोंसे किस प्रकार प्रेम करते थे- इसे खुलासा ज्या नहीं करनेकेलिए भागवतकारने लिखा है- ' रेमे रमेशो व्रजसुन्दरीभिः ’ श्रर्थात् कृष्ण उन प्रेयसी [ यह शब्द वादीने स्वयं बढ़ाया है ] -जरासन्ध, व्रजसुन्दरियोंके साथ विषयभोग ( रमण ) किया करते थे ' । यह मारकर ' विपयभोग ' वादीको बहुत भाता है । इसे उसने अपने विज्ञापन में किया, पर भी लिया है, वहाँ ‘ रमणका ' अर्थ ' व्यभिचार ' कर दिया । इस पि व्रणमेव निबन्धमें पृ ० ५ पर इसे लिया, यहाँ पर भी । इनकी बुद्धिका हो! वादी श्रुति - प्रिय यह पद्य उसको खण्डित करके इन्हें लज्जित करवाता है । हम पूर्व इसका उत्तर दे चुके हैं । यहाँ पर बादी इस तृतीय-हादेव और पादको स्पष्ट करनेवाला जो चतुर्थ पाढ़ था उसे चुराकर ' चोर-ति - पुरुषका शिरोमणि ' वन गया, इससे उसकी बुद्धि भी व्यभिचारिणी है - जैसे बनकर खण्डित होगई । चतुर्थपाद था ' यथार्थकः स्वप्रतिबिम्ब-मोऽत्र जार विभ्रमः ' इससे श्रीकृष्णका बालकपन तथा परमात्मापन तथा २ ) कहा है । गोपियाँ श्रीकृष्णका प्रतिबिम्ब ( परछाई ) सिद्ध हो रही हैं - सो कृतिराख्याता वच्चे श्रीकृष्णका गोपियोंसे खेलना, बच्चेका अपनी परछाईंसे CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीकृष्णका सुदर्शनचक्र १६१ खेलना कहा है - इसमें विषयभोगकी कोई बात भी नहीं । वादी लिखता है - ' गीता के श्रीकृष्णजीने जीवनमें कभी व्यभिचार नहीं किया, पर पाखण्डी - पोप पण्डितोंको इसी में मजा आता है कि योगीराजको व्यभिचारी बताया जावे ' । महाशय! यह बात बिल्कुल आप लोगों में ही लागू हो रही है-हममें नहीं । गीताके श्रीकृष्णका इतिहास गीतानें लिखा है या महाभारतमें? यदि महाभारतमें; तो हम उसीसे सिद्ध कर चुके हैं कि यह वही पुराणोंवाले श्रीकृष्ण हैं । हम भी यही कहते हैं कि ब्रह्मवैवर्त वा श्रीमद्भागवत आदिके श्रीकृष्ण गीता-महाभारतवाले श्रीकृष्णकी ही बाल्यावस्था थी, जिसके संकेत महाभारतमें भी पाये जाते हैं । उन्होंने जीवनमें कोई व्यभिचार नहीं किया । तभी तो उन्होंने परीक्षित्के जीवनकेलिए कहा था-' यथा सत्यं च धर्मश्च मयि नित्यं प्रतिष्ठितौ । तथा मृतः शिशुरयं जीवताद् अभिमन्युजः ' ( महा. श्र. ६६।२२ ) सो उन्होंने वादीके अनुसार कोई व्यभिचार वा कुकर्म किया होता; तो उनके इस भाषणसे मृत शिशु परीक्षित्का जीवन न हुआ होता । इसी प्रकार गर्गसंहितादिके अनुसार ऐसे वचनोंके कहनेसे चढ़ी हुई यमुना नोची न हो जाती । इससे स्पष्ट है कि ब्रह्मवैवर्तादिमें भी ' रमण ' का अर्थ विशुद्ध - प्रेमकी क्रीडा है, विषयभोग नहीं- ' रेमे तया चात्मरत आत्मारामोऽप्यखण्डितः ' ( भाग. १०/३०/३५ ) में इसीलिए श्रीकृष्णको ' आत्माराम ' एवं ' श्रखण्डित ' कहा है । ‘ अखण्डित'का ' रमण ' विशुद्ध - क्रीडा ही होती है । तब वहाँ Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) वादी बलात् विषयभोग वा अपना इष्ट व्यभिचार अर्थ करते हुए स्वयं ही अपने शब्दों में ' पोप- पाखण्डी ' सिद्ध होगये । कुब्जा और श्रीकृष्ण । ( १० ) आगे वादी कुब्जाके साथ श्रीकृष्णका व्यभिचार सिद्ध करता है । ' निशावसान - समये वीर्याधानं चकार सः । सुख भोगेन भोगेन मूर्छामाप च सुन्दरी ' यह उसके दिये पद्योंमें अन्तिम लोक है । इस पर वादी यह जानें - श्रीकृष्णकी अवस्था ब्रह्मवैवर्त-के अनुसार उस समय १०-११ वर्षकी थी । ' एकादशेऽन्दे सबलः ( बलदेव सहितः ) स्थित्वा ते मन्दिरे सुखम् ' ( ४६१।८ ) यह उनका वर्णन यज्ञोपवीतसे पूर्वकालका है । क्षत्रियका यज्ञोपवीत ११ वें वर्ष में होता है, तव श्रीकृष्णने गुरुके पास जाकर विद्या पढ़ी ( देखिये ब्रह्मवैवर्त ४ । ५४ । १२ ) । उसके बाद श्रीकृष्णका विवाह हुआ; क्योंकि - विद्या - समाप्तिके बाद विवाहका क्रम होता है । यज्ञोपवीतसे पूर्व कामचार, कामभक्ष, कामवादके होने पर भी कहीं पाप नहीं माना गया । महाभारतमें कहा है- ' आ चतुर्दश-का वर्षाद् न भविष्यति पातकम् । परतः कुर्वतामेव दोष एष भविष्यति ' ( १ । १०८।१७ ) तब १४ वर्ष से भी छोटे किशोर पर दोषोंका लगाना अपनी शूद्रताकारक है । जैसे कि महाभारतके इस प्रकरण में यमराजको विदुर रूपमें शूद्रयोनि ग्रहण करनी पड़ी । ' कृतोपनयनस्यास्य व्रतादेशनमिष्यते ' ( २।१७३ ) ' उपनीय गुरुः शिष्यं शिक्षयेत् शौचमादितः । ' ( २२६६ ) इन मनुवचनोंसे CC - 0. Ankur Joshi Collection कुब्जा और श्रीकृष्ण ॥ उपनयन बाद ही ब्रह्मचर्यव्रतके आरम्भका अनुशासन जाता है, पूर्व नहीं । तब क्षत्रियका ११ वर्षके बाद ही किया । आरम्भ होता है । उस अवस्थाके बाद व्रतमें व्यतिक्रम ब्रह्मचर्यवत | ' अवकीर्णी ' प्रायश्चित्त करना पड़ता है, पूर्व नहीं । सो होने पर यहां पुरुष परम दृष्टिसे भी कोई शास्त्रीय - दोष सिद्ध नहीं होता । भा ऐतिहासिक पक्षका दृष्टिकोण भी स्पष्ट है । जो योबनसे पू कर बाल्यावस्थामें विषय - क्रीडा वा विषयचिन्तनादि करने रूप मह जाता है, उसे स्वप्नदोष, शीघ्रपतन वा नपुंसकत्वादि दोष उपस्थित हो जाते हैं । तब ऐसा व्यक्ति अपनी एक भी स्त्रीको प्रसन्न नहीं नग्न रख सकता; तब वह १६१०८ स्त्रियोंको प्रसन्न कैसे रख सकता है, क्योंकि — ' भोगे रोगभयम् ' भोगी प्रायः रोगी रहता है । बल्कि वह दूसरी भी स्त्रीसे विवाहका साहस नहीं कर सकता वा और वैसा व्यक्ति दीर्घजीवी न होकर अकालमें कालके गाल में ( द समा जाता है; पर भागवत, ब्रह्मवैवर्त आदि पुराणों तथा महाभारतादिमें यौवनमें श्रीकृष्णका बहुत स्त्रियोंसे विवाह स्था सभी स्त्रियोंको प्रसन्न रखना, नीरोग रहना एवं दीर्घ- जीवन कहा ' म है । तब आता लोग किसी भी दृष्टिकोण से श्रीकृष्ण पर इस ' स प्रकारका कोई भी दोष लगाने में समर्थ नहीं हो सकते । तब वहां १२ वादीका इष्ट वीर्याधान कैसे हो सकता है? क्या डाक्टरी - उस्ल में ८-१-१० वर्षमें ही लड़केके वीर्यका प्राकट्य हो जाता है! अ यदि ऐसा है; तो विवाहकी आयु भी आप लड़केकी १०-११ सालकी क्यों नहीं मान लेते? यदि वैसा नहीं मानते, तब Gujarat. An eGangotri Initiative