सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 311–320
सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 311–320
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श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) कुब्जा और श्रीकृष्ण १६६ नहीं सोचा कि यहां कौनसे वीर्यका आधान है? सन किया! वादीने क्यों के अनुसार परमात्मा थे । उनका शरीर भौतिक ब्रह्मचर्यमत नहीं श्रीकृष्ण था ब्रह्मवत । इसका वादी कभी अपलाप नहीं कर सकते । तब कम होने पर ' वीर्य ' क्या होगा, जिसका उस परमात्माने यहां पुरुष. परमात्माका किया, यह वादीको समझनेका प्रयत्न प्रधान कुब्जा करना चाहिये । क्या परमात्मामें प्राकृत वीर्य होता है? यौवनसे पूर्व महाशय! सँभल जाइये, यह वही दिव्य ' वीर्य ' है; जिसे करने लग आप वा आपकी स्त्रियाँ निशावसान समय ( प्रातः काल ) में दोष उपस्थित नग्न, आवरण - रहित एवं स्नात होकर ' वीर्यमसि वीर्ये मयि धेद्दि ’ - प्रसन्न नही ( यजुः १६।६ ) इस मन्त्रसे अपनेमें आधान कराती हैं । यह वही रख सकता भोग ' ' है, जिसे आप और आपकी स्त्रियाँ ' छेरी आदि पशुसे, रहता है । बाणीकेलिए मेढासे, और परम ऐश्वर्यकेलिए वैलसे भोग ' कर सकता, लके गाव ( दयानन्दयजुर्भाष्य २१।६० ) करती - कराती हैं । यह वही ' मोहन-त भोग ' ( मोहन श्रीकृष्णका भोग ) है; जिसकी स्मृतिकेलिए संस्कार-विवाह तथा विधि पृ ० १७ के अनुसार अपनी स्त्रियोंको आप लोग प्रतिदिन जीवन कहा ' मोहन - भोग ' लेने भेजते हैं । ' मैथुन ' का अर्थ ' मिथुनीभाव ' ' सङ्गति ' कृष्ण पर इस ' सम्बन्ध ' अर्थ भी होता है- ' मैथुनं सङ्गतौ रते ' ( अमर. ३ । ३ । तब यहां १२२ ) ' सम्बन्धे सुरते युग्मे राशौ मिथुनमिष्यते ' ( व्याडिः ) सो क्टरी - उसूल प्रतिदिन अपने स्त्री - पुरुषोंसे ' मोहनभोग'का उपभोग करावें -जाता है! आप, और आक्षिप्त करें पुराणोंको, सो बड़े वा छिपे पौराणिक केकी १०-११ तो आप ही निकले; और समाधान करना पड़ता है हमें । बादी मानते, तथ यह याद रखें कि - कुब्जा दासी थी, किसी की स्त्री नहीं थी । CC - 0. Ankur Joshi ' रामा रमणाय उपेयते न धर्माय कृष्ण ( दास ) जातीया ' ( १२ | १३ | २ ) इस ' निरुक्त ' के वचनानुसार दासी - गमनमें कोई दोष नहीं आता । यहाँ प्रष्टव्य है कि आपका आक्षेप श्रीकृष्ण परब्रह्म दृष्टिसे है, वा पुरुष- दृष्टिसे? यदि ब्रह्म दृष्टिसे; जैसाकि - ' ब्रह्मवैवर्त ' नाम ही बताता है कि इसमें ब्रह्म श्रीकृष्णका विवरण है; तब तो कोई दोष नहीं रह जाता । उस परमात्माके वीर्य वा तेजका प्राधान वही ' वीर्यं मयि घेहि, तेजो मयि घेहि ' यजुर्वेद वाला ही है । शेष कथन तो आलङ्कारिकता है, कविता है । श्रार्यसमाज-शिरोमणि श्रीब्रह्मदत्तजी जिज्ञासुने ' वेदवाणी ' के सम्पादकीयमें लिखा था कि — ' भारतके शत्रु - इंगलैण्ड और अमेरिका नंगे होगये ' ( ६५ पृ. ३१ ) तब क्या आप यहाँ ' नंगे ' का अर्थ श्रालङ्का-रिक न करके ' अपने अधोवस्त्र उतार दिये ' यह अर्थ कर देंगे? ' मौत नंगा नाच नाच रही है ' का भी वही ' वस्त्रहीन ' अर्थ करेंगे? तब ‘ नग्नां चकार'का भी ' आवरण - रहितां चकार ' यह अर्थ है, आवरण ' मल, आवरण, विक्षेप ' में एक दोष होता है, उससे रहित कर दिया । जो भी ' वीर्याघान ' बतलाया जावे; वहाँ आलङ्कारिकता भी क्यों न हो, वहाँ सुरत भी श्रलङ्काररूपसे वर्णित करना ही पड़ता है । एक वाक्य इस पर देखिये— ' करशनलाल तिवारीके वीर्यने दयानन्द बनकर जगतमें हलचल मचा दी । तिवारीका वीर्य एक योनिमें पड़ा, पर वह उस योनिसे निकला हुआ वीर्य दयानन्द तो बड़ा भोगी निकला । Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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६०० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) संन्यासी बने हुए भी उस विलासीके लिङ्गने व्यभिचारी बनकर बहुत - से स्त्री - पुरुषों से जोरदार मैथुन करके मथ- मथकर उनकी योनिमें अपना ऐसा वीर्याधान किया कि उससे डा ० श्रीराम-आर्य, रामसहाय, प्रेमचन्द आर्य आदि बहुतसे ' व्यभिचार-पसन्द ' पुत्र निकल पड़े । उन्होंने सब जगह ' रमण ' का ' व्यभिचार ' अर्थ ही पसन्द कर लिया । उनको पुराणोंमें सर्वत्र विषयभोग ही दीखने लगा । उन्होंने अपनी ग्रन्थमालाओं में अपनी पूरी नग्नता ( नंगापन ) दिखला दी ' । अब क्या इस अलङ्कारको वादी वास्तविक ही मानकर दयानन्दको सचमुच व्यभिचारी ही मानकर कविको गालियाँ देना शुरू कर देंगे? सर्वत्र अभिघावृत्ति तथा वाच्यार्थका ही साम्राज्य नहीं होता, प्रतिभाका परिष्कार करके व्यङ्ग्यार्थको जाननेकेलिए दिमागका पसीना भी बहाना पड़ता है । यदि वादी साहित्यज्ञ होंगे; तो उस अलङ्कारका तात्पर्यमात्र लेंगे । नहीं तो, यदि वे कामशास्त्रके अभ्यासी होंगे; तो विषयानन्द लेने लग जायँगे । नैषधचरितमें नलकी सुन्दरता तथा मोहकताको आलङ्का-रिकतासे बताते हुए कविने सरस्वतीका तथा लक्ष्मी आदिका नलसे आलिङ्गन तथा संभुक्त कराना दिखाया है ( ३।३०-३१ ); अन्यत्र लक्ष्मीका पुराण- पुरुष ( वृद्ध ) विष्णुको छोड़कर नवयुवक सुन्दर राजाके पास अभिसार दिखलाया जाता है; तो क्या वहां बादी नलके सौन्दर्य तथा स्त्री - मोहकतामें तात्पर्य न लेकर लक्ष्मी - सरस्वती आदिका नलसे व्यभिचार मान लेगा? - यदि कुब्जा और श्रीकृष्ण ऐसा है, तो वे सचमुच प्रतिभाशाली धोवर वादी पुराण- वर्णित सुरत में भी समझ लें कि हुए । यदि नहीं; ख पर प वहां भी. है । यदि वादी दयानन्दके लिङ्ग ' सत्यार्थप्रकाशके ' लहर । होनेके कारण ' आत्मा वै जायते पुत्रः ' के वीर्यसे उ महल खण्डनके ही रसिक हैं, और हमारी बात नहीं अनुसार केवल कहते विवशता से कहना पड़ेगा कि - ' ज्ञानलवदुर्विदग्धं मानते; तो हमें व्यभि ब्रह्मापि नरं अपने रब्जयति ' । वस्तुतः एतदादि - रहस्य साहित्य - शास्त्रज्ञ तो बार । उन्हें सकते हैं, काम - शास्त्रज्ञ नहीं । यदि वादी कामशाखमें: पुराण कुशल हैं; और अपने ही शब्दोंमें वे ' कलियुगी पण्डित ' बना पर ह पृ. १२ के अनुसार ‘ भैँसेकी तरह सूँघ सूँघकर ' अपने शब्दों बादी अपनी बुद्धिसे अन्धाधुन्ध अपने मनचाहे ' रमण ' में प्रवृत्त हो तो उ रहे हैं; तो भिन्न बात है । परम् अथवा यदि वे पुराणका व्यङ्ग्यार्थ न समझ सकलेके यहांप कारण उसका वाच्यार्थमात्र ही लेते हैं, और श्रीकृष्णको पुराए- ग प्रोक्त ब्रह्मदृष्टिसे न देखकर पुरुषदृष्टि से देखते हैं, तो वे १०-११ । दूसरे वर्षके लड़केका शुक्रोदय मान लेंगे क्या? यदि नहीं; तत्र सा वीर्याधान उसका कैसे मान लेंगे? अथवा वे अपनी मर्जीसे श्रीकृष्णको पुराण में १०-११ वर्षका बालक न मानकर उसे युवक ( पति ) बन्ते ही मान लें; तब भी उसका कुब्जा से व्यभिचार पुराणसे कैसे सिद्ध करते हैं? वहां तो पुराणका यह श्लोक वादीने भी लिखा इस द है— ' दम्पती रति - पण्डितौ ' ( ४।७२।६१ ) यहां उनको पति - पत्नी तभी ' कान्त बताया है । वादीने अपने अर्थ में दोनोंका जोड़ा तो लिख दिया, CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ६०१ शब्द स्पष्ट नहीं लिखा, जो दम्पतीका वास्तविक यदि नहीं; स पर पति - पत्नी अर्थके लिखनेसे वादीका बना बनाया भी अर्थ था; क्योंकि उस अलझा था । पति - पत्नीके शृङ्गारको वादी व्यभिचार कैसे वीर्यसे उत्तर महल कहते ढहता हैं? वे दुष्यन्तके शकुन्तलासे गान्धर्व - संयोगको क्या नुसार केवल मानते हैं? ऐसा है; तो वादी बड़े प्रेमसे स्वयंवरका निते; तो हमें व्यभिचार अपने शब्दोंमें - व्यभिचारका क्यों प्रचार करते हैं? क्या यह ब्रह्मापि नरं २ उन्हें क्षम्य है? यदि वे कहें कि - ' कृष्णको कुब्जाका पति उस ज्ञ चार पुराणमें कहां कहा है कि हम उसे व्यभिचार न मानें ' तो इस शाखमें बहुत पर हमने वादीके कहे ही पद्यमें वह बात दिखला दी । यदि त ' बना बादी उसमें साक्षी अन्य - प्रमाण उसी पुराण में देखना चाहें; अपने शब्दों तो उन्हें भी देख लें— ' ब्रह्मविष्णुशिवादीनामीश्वरं प्रकृतेः में प्रवृत्त हो परम् । जन्मान्तरे च भर्तारं प्राप्स्यसि त्वं वरानने ' ( ६२।५२ ) यहांपर शूर्पणखाको जिसकी भगवानसे मिलनेकी उत्कण्ठा रह मम सकने गई थी; तपस्या करनेपर ब्रह्माजीने वरदान दिया है कि-को पुरा तो दूसरे जन्ममें कुब्जापनमें श्रीकृष्ण तेरे भर्ता होंगे । ' देहं तत्याज वे १०-११ सा ( शूर्पणखा ) वन्हौ सा च कुन्जा बभूव ह ' ( ६२।५३ ) । ‘ पुरा द नहीं; तब शूर्पणखा त्वं च भगिनी रावणस्य च । तपः- प्रभावान्मां कान्तं अपनी मर्जी से ( पतिं ) भज श्रीकृष्ण - जन्मनि । रामजन्मनि मद्धेतोः त्वया कर उसे युवक कान्ते! तपः कृतम् ' । ( ७२।५६-५७ ) । सो उस उत्कण्ठाको ने ने भी लिखा इस दासी - जन्ममें आकर पूर्ण किया ( ब्रह्म. ४ ६२ / ५३,११५ / ६६ ) । पति - पत्नी तमी यहांपर ‘ कान्त ' तथा ' कान्ता ' शब्द आये हैं । व्यभिचारमें लिख दिया, ' कान्त - कान्वा ' शब्द, दम्पती शब्द, भर्ता आदि शब्द कभी नहीं श्रीकृष्ण और कुब्जा. ६०३ आते । तव जिस ग्रन्थकी कोई बात आक्षिप्त की जावे, तो उसका कहा हुआ पूर्वापर - प्रकरण भी मानना ही पड़ेगा । नहीं तो वादीका यह अभित्तिचित्रका अकाण्ड - ताण्डव होगा; शशशृङ्गका तेज करना होगा, मृगतृष्णाके जलमें स्नान करना होगा, कौए दांतोंकी परीक्षा करना होगा, वन्ध्याके पुत्र को अपना दत्तक - पुत्र बनाने पर विचार करना होगा । ( ख ) पृ. २२ में वादी आक्षेप करते हैं- ' साक्षाज्जारश्च गोपीनां दुष्टः परम - लम्पटः । आगत्य मथुरां कुब्जां जघान मैथुनेन च ' कृष्ण गोपियोंका जार ( व्यभिचारी ). दुष्ट, वड़ा लम्पट था । मथुरामें आकर उसने मैथुन करके कुन्जाको मार डाला ' । परन्तु यहां आक्षेप - योग्य क्या बात है, यह हम नहीं जान सके । यह ब्रह्मवैवर्त पुराणके अपने शब्द तो हैं नहीं; यह वाक्य वहांपर बाणासुर दैत्यके हैं । वह भगवान् कृष्णका विरोधी था । विरोधी क्रोधमें आकर भला कौन - कौनसा कुवाच्य नहीं कहता । वादीके परम - स्वामी श्रीदयानन्दजी पुराणोंके विरोधी थे । उन्होंने पुराणके प्रणेताकेलिए क्रोधमें आकर कैसे कुवाच्य शब्द कहे हैं? देखिये उनका आदर्श - ' इन भागवतादि - पुराणोंके बनानेवाले क्यों नहीं गर्भ ही में नष्ट हो गये! वा जन्मते समय मर क्यों न गये? ' वाह ' रे वाह भागवतके बनानेवाले लाल - बुझक्कड़! क्या कहना तुमको, ऐसी - ऐसी मिथ्या बातें लिखने में तनिक भी लज्जा और शरम न आई, निपट अन्धा ही बन गया!!! ' ( स.प्र. पू. २११ ) । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative.
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६०४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) इस प्रकार पुराणों वा पौराणिकोंके विरोधी आप अपने कुवाच्योंका भी कुछ आदर्श देख लीजिये - ' चाहे शूकर अवतारके यह चेले सनातनी - पंडित कितना ही जोर क्यों न लगावें, पर इस सत्यको काट नहीं सकते हैं कि - पुराणोंने कृष्ण-महाराजको धूर्त, व्यभिचारी - शिरोमणि माना है ' ( पृ. २२ ) । ' कैसी धूर्तताको बातें बदमाशोंने गढ़ - गढ़कर लिखी हैं, पौराणिक पंडित - मण्डल तथा उनका गुरु पाखण्डी - शिरोमणि पं ० माधवाचार्य इन बातोंको सही मानता है ' ( पृ. २३ ) इत्यादि । जैसे वादीने अपने परमगुरु - शिवरात्रिके मूषकके परम - प्रशिष्य ( पक्के - चेले ) बनकर उससे केवल खण्डन ( कुतरने ) की शिक्षा प्राप्त करके पुराणोंके पूर्वापरको कुतर कर उनके अभिप्रायसे विरुद्ध झूठी झूठी बातें गढ़ी हैं, और कुवाच्य कहे हैं; वैसे बाणासुर दैत्यने भी कहे थे । वादीका ऊपर दिया हुआ ' साक्षान्जारश्च गोपीनां, परमलम्पटः, कुजां जघान मैथुनेन च ' यह वाक्य उसी बाणासुर - दैत्यका है, जो कि क्रोधमें भरा हुआ है । उसके वचनके लिए पुराणकारने कहा है- ' घोरसंग्राममध्ये च विषोक्तिं प्रज्व-लन्निव ( क्रुष्यन्निव ) ' ( ११५/५७ ) सो ' विषोक्ति ' शब्द कहने से यह उसकी जहरीली - उक्ति, गलत - उक्ति है - यह उक्ति ठीक नहीं है, यह कहकर पुराणने उसको अमान्य वतला दिया । इस प्रकार ' साक्षाज्जारश्च गोपीनां गोपोच्छिष्टान्न भोजकः । कुब्जा मृता च सम्भोगात् ' ( ब्रह्म. ४ | १०६ / २०-२३ ) यह शब्द दैत्योंके साथी रुक्मीके हैं । उसकेलिए पुराणमें कहा है- ' उवाच निष्ठुरं CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीकृष्ण और कुब्जा ६०५ ६० वाक्यं श्रुतितीच्णं सुदुष्करम् । उपहास्यं ' ( १०६/१७ उस वाक्यकी उपहास्यता तथा निष्ठुरता सिद्ध हो ) इसीसे जानेसे त्यता एवं अमान्यता ही सिद्ध हो गई । तो क्या अस बेद इन वचनोंको उद्धृत करने वाले अन्य आर्यसमाजी वादी, तथा वा दैत्योंके साथी हैं; जो कि उन्होंने वाणासुर भी देव का दैत्यके वचन पर उर विश्वास कर लिया । ' मैथुनसे कुब्जाको श्रीकृष्णने मा मार डाला ' यह किस पुराणमें तथा पुराणके अपने किस वचनमें लिखा है- पत्न यह वादीने सिद्ध नहीं किया । केवल दैत्यके वाक्य पर सहसा धि विश्वास कर लिया । केवल विश्वास ही नहीं कर लिया; वल्कि बाद दैत्यके वचनको अपना वचन वना लिया; क्योंकि -दैत्यका कर नाम वादीने छिपा लिया; अब स्वयं ही दैत्यरूपमें उन्होंने अपनी नग्नता दिखला दी । दे यहां पर ' मैथुनेन जघान ' का अर्थ वादीने ' मैथुन से मार मा डाला ' यह कर दिया; तब तो वादी पुरूरवाके विषयमें उर्वशीके प्रस कहे हुए ' त्रिः स्म माऽन्हः श्नथयो वैतसेन ' ( १०६५।५ ) इस ऋग्वेद- ब्रहा ` सं. के मन्त्रमें - जिसके ऋषि- देवता पुरूरवा उर्वशी हैं; - बधकर्मा प्रस्थ धातुओं में ( निघण्टु २।१६ ) कहे हुए ' श्रथय: ' क्रिया - शब्दका जग जिसका अर्थ ' त्रिः स्म मा अह्नो वैतसेन दण्डेन हतात् ' ( शत ० धृत्व ११ | ५ | १ | १ ) इस ब्राह्मणके वाक्यने ' हतात ' किया है, वादी, मुम सा उर्वशीको पुरूरवाने वैतस - दण्ड ( शिश्न ) से मार डाला ' यह अर्थ ( ४ ) करेंगे? ' वैतसदण्ड'का ' पुंस्प्रजनन ' ( शिश्न ) अर्थ है, देखिये डाल इसपर निरुक्त — ' शेपो वैतस इति पुंस्प्रजननस्य ' ( ३ । २१ । ३ ) । तब Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) ६०५ ६०६ - वचन उक्त वेद - मन्त्रका भाष्य सिद्ध हुआ; तब 1 ) इसीसे तो उक्त पुराण ' उसपर आक्षेप करनेका अधिकारी कैसे है? इस प्रकार जिसे ' वैदिक संघ अस- ' हन्यन्ते गावः ' ( ऋ. १०६५।१३ ) में ' हन्यन्ते गावः ' वादी, तथा वेद का अर्थ अघासु बादी ‘ गौएं मारी जाती हैं ' - यह करेंगे? ' मा त्वं बिकेशी भी दैत्य उर श्रावधिष्ठाः ' ( काठकगृह्यसूत्र २८ ४ ) क्या वादी यहां ' छातीका बचन पर ' अर्थ करेंगे? ' मा त्वं रुदती उर श्रावधिष्ठा जीव-र डाला ' पत्नी मार ' डालना ( विवाह. पृ. १५२ ) इस अपनी संस्कारविधिके शब्द ' आव-लिखा है- धिष्ठाः'का ' छातीको मार डालना ' अर्थ करेंगे? यदि नहीं; तब पर सहसा वादीने ' मैथुनेन जघान ' में उसी धातुका ' मार डालना ' अर्थ कैसे या बल्कि व्यका नाम कर डाला? अपनी श्रव हम दैत्य वचन - विश्वासी वादीको देवपक्षी मानें; वा दैत्यपक्षी? किसी भी पुराण में श्रीकृष्ण द्वारा कुब्जाको मैथुनसे नसे मार मार डालना दिखलाया भी नहीं । हां, भगवान्ने उसकी क्रीडासे उर्वशी के प्रसन्न होकर अन्तमें उसे गोलोक अवश्य दिया है । देखिये सॠग्वेद- ब्रह्मवैवर्त -'कुब्जया सह शृङ्गारं कृत्वा च कौतुकेन च । तां च - वधकर्मा प्रस्थापयामास गोलोके गोपिकापतिः ' ( ४ | ५४ | १० ) ' अथा--शब्दका जगाम गोलोकाद् रथो रत्नविनिर्मितः । जगाम तेन तं लोकं [ ' ( शत ० धृत्वा दिव्य - कलेवरम् ' ( ७२।६६ ) ' तेन पुण्येन तं लकवा गोलोकं दी, मुम सा जगाम ह । गोपी बभूव गोलोके कृष्णस्यालिङ्गनेन च ' । यह ( ४ | ११५/८८ ) तब ‘ गोलोकमें भेजने का आप दैत्यपक्षीय ' मार देखिये डालना ' अर्थ कर डालें; इसमें आप ही उत्तरदायी हैं । फिर ।३ ) । तब आप श्रीमाधवाचार्यजी पर क्यों बिगड़ते हैं कि उन्होंने-CC - 0. Ankur Joshi श्रीकृष्ण और कुब्जा ६०७ Collection Gujarat. ' श्रीकृष्णने कुजासे ऐसी धींगा - मस्तीकी कि वह मर ही गई, ' कुब्जा -कुब्जा ही न रही, संश्लेषसे कुजाके मार डालनेका व्यङ्-या कुबड़ेपन की निवृत्ति है ' यह अर्थ किया है । दम्पतीका मैथुन आप ' व्यभिचार ' तो कभी सिद्ध कर नहीं सकते; कुब्जाका कुब्जापन न रहा; यह ' धृत्वा दिव्यकलेवरम् ' ( ब्रह्म. ७२२६६ ) से व्यक्त हो रहा है 1 । तब वादी क्यों खिसियाते हैं? । हो गया सब दृष्टियोंसे उनके श्राक्षेपोंका समाधान । स्त्रियोंकी संख्या । ( ११ ) अपने विज्ञापनमें वादीने लिखा था- ' भागवत कृष्णके १६१०८ बीवियां [ यह शब्द लिखने पर आपको लज्जा श्रानी चाहिये थी, यह आपने वैसे लिखा है, जैसे कि- एक कांग्रेसी हिन्दी - लेखक ने लिखा था ' शाहजादा रामकी वेगम सीता थी, यह हाल मौलिवी - वाल्मीकिने अपने कुतव रामायण में दर्ज किया है ] लिखता है; तो ब्रह्मवैवर्त ' त्रिंशत्कोटि च गोपीनां गृही-` त्वा भर्तु राज्ञया ' कृष्णकी ३० करोड़ पत्नियां बताता है । कुछ ठीक है इस वदमाशीका? ' इसपर वादी यह याद रखे कि -भागवत में भी गोपियोंकी संख्या तो नहीं बताई । सो गोपियोंकी संख्या उसमें भी ब्रह्मवैवर्त - इतनी मान ली जावे, तो इसमें क्या दोष आता है, यह वादीने नहीं लिखा । वस्तुतः ' कोटि ' शब्द ' अनेक ' वाचक है । जो कि वादीने भागवतमें १६१०८ संख्या लिखी है, यह गोपियोंकी नहीं यह तो रुक्मिणी आदि श्रीकृष्ण-की रानियोंकी है । ब्रह्मवैवर्त रुक्मिणी आदियोंको गोपियोंसे An eGangotri Initiative
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६०८ श्रीसनातनधर्माल्लोक ( ६ ) भिन्न बताता है । इनमें १६१०० तो वे थीं जो नरकासुरके बन्दी-खानेसे मिली थीं; जिनकी प्रार्थनासे श्रीकृष्णने उनसे विवाह ' किया; जिसका सङ्क ेत ' उद्वाहं राजकन्यानां सहस्राणां च षोडश ' ( त्र. ४ | ६ | ४३ ) यहां आया है; यह ' दुर्बलं नरकं इत्वा स्त्री- समूहं मनोहरम् । जग्राह योनिलुब्धश्च स्वपुत्रमतिनिष्ठुरः ' ( ११५/६३ ) बाणासुर - दैत्यके आक्षेपमें भी प्रकट है; जिसका उत्तर अनिरुद्धने यह दिया था - ' नरको हरिवध्यश्च स्वपूर्व - प्राक्तनेन च । पाणि जग्राह कन्यानां साक्षिणौ शशिभास्करौ ( ११५/६७ ) शेष रुक्मिणी ( ६८ ) सत्यभामा ( ६६ ) जाम्बवती ( ६।१६६ ) आदिका वर्णन भी संक्षेपसे बता ही दिया गया है । अब यहां भागवत और ब्रह्मवैवर्तकी ' बदमाशी ' तो न निकली, किन्तु यह वादीकी अपनी ही नासमझीकी ' बदमाशी ' निकल पड़ी । विज्ञापनमें वादीने ' त्रिंशकोटि च गोपीनां ' का ब्रह्मवैवर्तका पता ४/८०/८७ यह दिया है; इसपर श्रीमाधवाचार्यजीने लिखा कि- ८० अध्यायमें केवल ३८ श्लोक हैं, फिर ८७ वां श्लोक कहांसे आया? ' इसपर वादी गर्म होकर पृ. १६ में लिखता है कि-' कृष्णके ३० करोड़ पत्नियां थीं, यह ' त्रिंशकोटिं च गोपीनां ' ब्रह्म-वैवर्त पुराणोंमें साफ लिखा है ' । फिर आगे वादीने गाली तो दे दी पर उक्त - लोकका पता नहीं लिखा । तभी तो पं. माधवा-चार्यजी उनकी पतेकी ' मिथ्या धोखाबाजी और बदमाशी ( ' वदमाशी ' शब्द भी उन्होंने नया नहीं गढ़ा, आपके विज्ञापनका था, जो बिना सूदके वापिस लौटा दिया गया ) बता रहे थे, CC - 0. Ankur Joshi श्रीकृष्णका सुदर्शनचक्र Collection Gujarat. An वादीने उनकी बात सचमुच ही स्वीकार की; अबके इस उस स्थलका पता भी छिपा ही दिया । इससे स्पष्ट है कि ट्रेक्टसे वादीने यह सब प्रमाण पुराणादिमें स्वयं देखकर नहीं लिखे अन्य आर्यसमाजियोंके ट्रैक्टोंकी उन्होंने जूठन बटोरी, किन्तु है । यदि पं ० माध जीने . उक्त पुराण न देखा होता; तो वादीके गलती उन्होंने कैसे बताई? वस्तुतः बादी पं. माधवाचार्यजीके पतेकी फेंके हुए पाशमें अपने - आप फँस गया, और अपने पक्षका उसने स्वयं ही खण्डन कर दिया । वादी के इस पद्यमें ३० कोटि गोपियों लिखी हैं; वादीने उनको ' कृष्णके ३० करोड़ पत्नियाँ थीं ' यह लिखकर स्पष्टरूपसे गोपियों को ब्रह्मवैवर्त के मतमें श्रीकृष्णकी पत्नी माना है । इस वादीकी बातसे तथा उसके इस प्रमाणसे उसकी अव तक की करी - कराई हुई सारी मेहनत पर चौका फिर गया । यह कैसे? यह वे कानोंको निश्चल करके सुनें । ६ वादीने स्थान - स्थान पर गर्जकर श्रीकृष्णका गोपियोंसे स व्यभिचार बताया है, पर जब वही गोपियाँ - जो गोलोकसे राधाके साथ आई थीं; वादीके भी अनुसार श्रीकृष्णभगवान्की अपनी पत्नियाँ थीं; क्योंकि- गोलोक में भगवान् हरि स्वामी थे, गोपियाँ उनकी पत्नियाँ थीं; तब उनसे रमण ( आपके अनुसार मैथुन भी सही ) हुआ; तो वह व्यभिचार कैसे हुआ? क्या अपनी पत्नियोंसे मैथुनको भी वादी व्यभिचार मानते हैं? यदि ऐसा है; तो वादीने जहाँ अपने - आपको, अपने समाजको व्यभिचारी एवं त्र्यभिचारि - समाज बना दिया; वहाँ सारे eGaginative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ६०५ ६१० इस ट्रेक्टर्स संसारको भी । कि - वादीने देखिये - जो बाणासुर दैत्यने - जिन्हें वादीने अपना बुजुर्गं लिखे या साथी बनाया है, जिसकी वातको वादीने वेद - वाक्य माना , किन्तु टोरी है - श्रीकृष्णके सम्बन्धमें ब्रह्मवैवर्तके शब्दोंमें ' विषोक्ति ' ( ११५/७५ ) है । दीके पतेकी कही; जिसे वादी ' अमृतोक्ति ' मान कर कृतकृत्य हो रहे हैं, आचार्यजीके श्रीकृष्ण पर ‘ साताज्जारश्च गोपीनां दुष्टः परमलम्पटः ' ( ११५६१ ) नका उसने यह आप दोनोंने दोप लगाया; तव श्रीकृष्णके पौत्र अनिरुद्धने टि गोपियाँ उसका ' ब्रह्मवैवर्त ' के शब्दों में ' पारमार्थिक " ( वास्तविक ) और थीं ' योग्य ' ( व्र ० ११५/७६ ) प्रत्युत्तर दिया, वादी भी उसे कान यह पत्नी माना निश्चल करके सुने-उसकी ' वृपभानुसुता राधा सुदान्नः शापकारणात् । त्रिंशत्कोटिं च यह गोपीनां गृहीत्वा भर्तुराज्ञया । पुण्यं च भारतं क्षेत्रं गोलोकाद् आजगाम सा ' ( ११५ / ८६-८७ ) ताभिः सार्धं स ( कृष्णः ) रेमे च गोपियोंसे स्त्रपत्नीभिमुदाऽन्वितः । पाणि जग्राह ( यह अन्तर्भावितण्यर्थ हैं ) गोलोक से ( प्राहयामास ) राधायाः स्वयं ब्रह्मा पुरोहितः ' ( प ) यहाँ पर भगवान्की ब्रह्मवैवर्तके शब्दों में बताया गया है कि - ' वे ३० कोटि गोपियाँ स्वामी थे, गोलोकसे भारतमें आई हुई श्रीकृष्णकी पत्नियाँ थीं ' । यदि ऐसा है; के अनुसार तो उनसे रमण, व्यभिचार कैसे हुआ? इस पद्यसे - जिसे वादीने ना? क्या स्वयं उद्धृत करके मान्य किया था - उष्ट्रलगुड - न्यायसे वादीका नते हैं? अपना ही गर्जन - तर्जनपूर्वक फर्माया हुआ पक्ष कट गया । जार समाजको तो श्रीकृष्णको दैत्यने तथा दैत्योंके साथी रुक्मी वा झोलीमुक हाँ आपने बताया; पर पुराणने तो गोपियोंको ' पत्नी ' और श्रीकृष्ण-CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीकृष्णका सुदर्शनचक्र ६१३ को ' पति ' बताया । राधाने ही गोलोकमें स्वयं श्रीकृष्णको कहा था - ' मत्तो बहुतराः कान्ता गोलोके सन्ति ते हरे! याहि तासां ( स्वकान्तानां ) सन्निधानं मया ते किं प्रयोजनम् ' ( ४ ॥ ४१ ) ' हरेरपि । गोपीनां कोटिशो दृष्ट्रा सुरास्ते विस्मयं ययुः ( ५.५० ) यहां गोपियाँ श्रीकृष्णकी स्त्रियां बताई गई हैं । वेद एवं इतिहासादिके अनुसार एककी बहुत पत्नियां भी विद्दित है - यह हम पहले लिख ही चुके हैं । और जो वाणासुरने नरकासुर सम्बन्धी श्रीकृष्णपर दोष लगाया था कि- ' दुर्बलं नरकं हत्वा स्त्रीसमूहं मनोहरम् । जग्राह योनिलुब्धश्च ' ( ११५/६३ ) वादीने भी ' शिव-पुराणके ' तथापि नरकं दैत्यं प्राग्ज्योतिषपतिं बलात् । हृत्वा स्त्रीणां सहस्राणि षोडशैव जहार सः । तासां रतिफलं भुक्त्वा पुत्राणां नवतिं तथा । सहस्राणि ससर्जाशु ' इस पूर्वपक्ष के लोकको उधृत किया, और उस पद्यकी यह टीका की कि - १६००० औरतें बदमाशीकेलिए पकड़ लाना और विषयभोग द्वारा ६० हजार लड़के पैदा कर डालना क्या मानी रखता है ' ( पृ. ६ ) इसका उत्तर अनिरुद्धने ठीक ही दिया कि- ' नरको हरिवध्यश्च स्वपूर्व-प्राक्तनेन च । पाणि जग्राह कन्यानां साक्षिणौ शशिभास्करौ ' ( ११५८ ६७ ) इसमें यह बताया गया है कि - नरकासुर दैत्य १६१०० लड़कियां बदमाशीकेलिए अवश्य ले आया, पर जब उसे उनसे सफलता नहीं मिली, और दैत्यको उन्होंने स्वीकार नहीं किया; और उन स्त्रियोंको उसने जेलखानेकी यातना देनेकेलिए बन्दी कर दिया, देखो श्रीमद्भागवत ( १०/५६ १ ); तत्र श्रीकृष्णने नरक-Gujarat. An eGangotri Initiative
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६१२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) दैत्यको मारकर उन कुमारियोंका उद्धार किया, और उनकी प्रार्थनासे - जैसे कि महाभारतके हरिवंश ( विष्णु ) पर्व में भी कहा है- ' तिष्ठन्तीरपराजिताः । सुखिन्यः कामवर्जिताः ' ( ६४।२६ ) सर्वासामेव संकल्पः पतित्वे चाऽभवत्ततः ' ( ३१ ) इत्यादि ) उनसे विवाह किया - यह यहां और श्रीभागवत में स्पष्ट है, वहां लिखा है- ' सर्वशक्तिमान् अविनाशी भगवानकेलिए इसमें आश्चर्यकी क्या बात है ' ( १० / ५६।४२ ) । एक पुरुष दो स्त्रियोंको भी प्रसन्न नहीं रख सकता; पर कई सहस्र स्त्रियोंको अपनी इच्छासे नहीं, किन्तु उनकी प्रार्थनासे स्वीकार करना और उनको प्रसन्न रखना उनकी भगवत्ताका परिचायक है, पत्नियोंको प्रसन्न रखना व्यभिचार नहीं, सदाचार है । तब क्या अपनी स्त्रियोंसे वेदानुसार दस - दस लड़के पैदा करना भी व्यभिचार है? यदि ऐसा है तो फिर वेद भी व्यभिचार - धर्मके प्रवर्तक हुए । क्या ' वैदिक संघ ' को यह स्वीकार है? वादीने सर्वत्र पूर्वपक्षकी बातें ही केवल श्रीकृष्णको बलात् बदनाम करनेकेलिए दे दी हैं, उनका जो उत्तरपक्ष पुराण में था, उसको छिपा लिया । यह क्यों? पूर्वापरको कुतरकर बा छिपाकर बीचके पद्य दे देना - यह सम्पत्ति आपको गुरुपरम्परासे मिली हैं । आपके स्वामीजी भी ऐसा ही करते थे, तथा उनके बोधोत्सवके गुरु ( उन्दुरु ) भी ऐसा ही करते हैं; आपके साम्प्रदायिक भाई भी ऐसा ही करते हैं; पर अब उनका युग नहीं रहा, जब लोग ग्रन्थोंके पूर्वापर नहीं देखते थे, और उनकी CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीकृष्णका सुदर्शनचक्र बात पर विश्वास करके भौंचक्के हो जाते थे । हमें आर्य-समाजियोंके आक्षेपोंका निरन्तर उत्तर देते हुए ३५ वर्ष होगये हैं । जब हम उनके भीषण आक्षेप देखते हैं; तो हम घबरा नहीं जाते । समझ लेते हैं कि - इन्होंने उस ग्रन्थका पूर्वापर अवश्य छिपाया होगा । अनुसन्धान करने पर वही बात ठीक निकलती है । उत्तर उसीमें होता है; जिसे छिपा दिया जाता है । वादीकी भी यही कुटेव चल रही है; तभी तो उसने आक्षिप्त श्लोकोंकी स्थल- संख्या भी प्रायः नहीं लिखी । जहाँ लिखी भी थी, वहां हमारे पास भेजे अपने विज्ञापन और ट्रक्ट में उसने उसे प्रयत्नसे स्याहीसे मिटा दिया है । इसलिए कि इतने बड़े पुराणमें कौन बिना पतेके उन श्लोकोंको ढूंढ सकेगा? इस प्रकार विजय हमारी हो जावेगी ' । पर अव वे • दिन लद गये । अब तो अनुसन्धानका युग आ गया है । इसी हमसे पूरे दिखलाये हुए वादीके पद्यमें राधाका भी ब्रह्मा या द्वारा श्रीकृष्णसे दिव्य- विवाह दिखलाया गया है । यह ठीक भी है, तब उसके भी व्यभिचारकी जो वादीने आगे चलकर चिल्लपों मचाई है - उसका भी खण्डन हो गया । ' ब्रह्मवैवर्त ' स्पष्ट कह रहा i. है - ' सुदाम्नः शापतो दैवाद् वृषभानु- सुताऽधुना । धर्मपत्नी च I कृष्णस्य पुण्ये वृन्दावने वने ' ( ११ ८ २६ ) यहां राधाको श्रीकृष्णकी धर्मपत्नी कहा गया है; तब क्या अपनी धर्मपत्नी के साथ हुई रति- सम को भी कोई व्यभिचार कह सकता है? । वादी भी तो विवाहित होंगे, तो क्या अपनी धर्मपत्नी से रतिमें वे भी अपने - आपको Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) $ 18 मानते हैं? यदि ऐसा है तो पहले वे अपने व्यभि-हमें आर्य- व्यभिचारी वर्ष चारी होने का ढंढोरा पीटें, फिर संसारका । तब इस व्यभिचार-होगये संन्यासी बन जाएँ । हम घबरा को छोड़कर राधा और कृष्ण । का पूर्वापर बात ठीक ( १२ ) आगे वादी राधासे कृष्णका व्यभिचार बताते हुए जाता ब्रह्मवैवर्तके कुछ श्लोक लिखता है । श्लोकों को लिखने में वादीने है । तो उस चालाकी की है; श्लोक संख्या तो इसीलिए उसने दी नहीं कि— जहाँ इसका कहीं भांडा फोड़ न हो जावे? । श्रापसमें बहुत व्यवधानमें स्थित पन और लोकोंको इकट्ठा रखकर, उनने उनका अर्थ इकट्ठा कर दिया है, । इसलिए जिससे अर्थका अनर्थ हो गया । वादीने श्लोकोंकी २३ पंक्तियां लिखी ड हैं । यह श्रीकृष्ण - जन्मखण्डके १५ वें अध्यायकी हैं । पहली अब वे पंक्ति उसके पहले पद्यका अर्ध है, और दूसरी वें, तीसरी ५५-है । वेंकी । फिर ६१,८२, १३६, १४३, १४४, १४८, १५० -१५६, १५६, १७७ यह पद्य लिखे गये हैं | १२०-१२१-१२२ से लेकर १३३ पद्य तकके का भी ब्रह्मा लोक वादीने छिपा लिये, इन्हीं में श्रीकृष्ण के साथ श्रीराधाका ब्रह्माने कभी है, चिल्लपों विवाह - संस्कार कराया है । | देखिये-कह रहा i. * तदा ब्रह्मा तयोः ( राधा - कृष्णयोः ) मध्ये प्रज्वाल्य च हुता-पत्नीच शनम् । हरिं संस्मृत्य हवनं चकार विधिना विधिः ( ९ १ २० ) श्रीकृष्णकी प्रणमय्य पुनः कृष्णं राधां तां जनकः स्वयम् । कौतुकं कारयामास हुई रति- सप्तधा ं च प्रदक्षिणम् ( १२२ ) पुनः प्रदक्षिणां राधां कारयित्वा विवाहित हुताशनम् ( १२३ ) तस्या इस्तं च श्रीकृष्णं ग्राहयामास तं विधिः आपको ( १२४ ) । वेदोक्त ( सप्त - पद्याः ) सप्त मन्त्राँश्च पाठयामास माधवम् । CC - 0. Ankur Joshi राधा और श्रीकृष्ण ६११ Collection Gujarat. संस्थाप्य राधिका हस्तं हरेर्वक्षसि वेदवित्... ( १२५ ) तद्वामपार्श्वे राधां च सस्मितां कृष्ण - चेतसम् ( १२६ ) प्रणमय्य पुनः कृष्ण समर्प्य राधिकां विधिः ( १३० ) कन्यकां च यथा तातो भक्त्या तस्थौ हरेः पुरः । एतस्मिन्नन्तरे देवाः सानन्द - पुलको द्गमाः । दुन्दुभिं वादयामासुश्चानकं मुरजादिकम् ' ( १३१-३२ ) यहां तक राधा - कृष्णका पूरा दिव्य विवाह - संस्कार जिससे उनका अलौकिक-दम्पतित्व सिद्ध होता है, वादीने छिपा लिया है, उसीके बाद ही वादीसे अपूर्णं उद्धृत यह पद्य चाया है - ' गते ब्रह्मणि सा देवी कामदेव - प्रपीडिता । प्रणम्य श्रीहरिं भक्त्या जगाम शयनं हरेः ' ( १३ ९ ) । अब बोलिये वादि - महाशय! राधा - कृष्ण के विवाहके तथा ब्रह्माके चले जानेके यह पद्य छिपाकर फिर जो आपने उसका हरिके शयनपर जाने पर व्यभिचारका निर्मूल शोर मचाया है; यह आपकी ही प्रवृत्तिका व्यभिचार है या राधाकृष्णका; यह अब आप स्वयं ही सोच सकते हैं । ' भवद्विघं पतिं प्राप्य कामदग्धा च राधिका ' ( ६८ | ३१ ) यहां भी श्रीकृष्णको राधाका पति लिखा है, तब पतिकी पत्नी से रति - क्रीडा किस शास्त्र के वचनसे व्यभिचार है? इतना सुफेद झूठ किस लिए? अव वादी ही बतायें कि यह व्यभिचारियोंका ' कोकशास्त्र ' हुआ, या दिव्य - दम्पतियोंका दिव्य रतिशास्त्र? व्यभिचार - शास्त्र तो यह वादीके अनुसार भी न हुआ । यदि अपनी सौभाग्यवती माताका शृङ्गार देखकर कोई वादी - जैसा पुत्र उत्तेजित हो उठे, वा उसे व्यभिचारिणी कह उठे, तब इसमें किसका दोष माना जावे? याद रखिये कि-An eGangotri Initiative
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६१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) राधा - कृष्ण परस्पर दिव्य - दम्पति हैं, और जगत्के माता - पिता हैं । पुत्रस्थानीय बनकर वादी उनके विषयमें कलुषित भाव न रखें, नहीं तो वादी पिता - माताके घरमें रहने योग्य सिद्ध न हो सकेंगे । मुनि गोपी बने । ( १३ ) अब वादी यह अकाट्य (? ) प्रमाण देकर तो जनता में यश प्राप्त कर ही चुके, अब पद्म पुराणके पाताल - खडसे यह लोक देते हैं- ' पुरा महर्षयः सर्वे दण्डकारण्यवासिनः । दृष्ट्वा रामं हरिं तत्र भोक्तुमिच्छत्सु विग्रहम् । ते सर्वे स्त्रीत्वमापन्नाः समुद्भ तास्तु गोकुले । हरिं संप्राप्य कामेन ततो मुक्ता भवार्णवात् ’ इसका अर्थ आप करते हैं - ' सारे ऋषि - मुनि रामके सुन्दर रूप-को देखकर उनसे भोग करनेकी इच्छा करने लगे ' पर यहां ' सुन्दर - स्वरूपको देखकर ' यह अर्थ वादीने किस शब्दका किया? वहां तो है - ' दृष्ट्रा रामं हरिं तत्र ' इसका अर्थ है - ' हरि - परमात्मा रामको देखकर ' तब वादीने भिन्न अर्थ कैसे कर डाला? ' भगवान् के विग्रहका भोग चाहते थे, ' तो ' भोग ' का अर्थ वादी-का इष्ट भोग हो, यह आवश्यक नहीं । वादी भी ' मोहन - भोग ' का उपयोग करते हैं । ' मोहन ' नाम श्रीकृष्णका है, मोहनका .भोग - मोहनभोग । देखिये अपनी संस्कारविधि ( पृ. १७ ) । वादी तथा वादियोंकी स्त्रियां भी मोहन ( श्रीकृष्ण ) के भोगको जब पा रही हैं, फिर आक्षेप दूसरों पर करते हैं!!! मुनियोंका भी वही भोग समझ लें; और फिर आप ' दुःखविनाशार्थ ' अपने वैदिक-CC - 0. Ankur Joshi Collection मुनियोंका भोग $ 1 $ 10 स्वामी की आज्ञासे ' छेरी आदि पशुसे ' भोग ' किया ही करते आपकी स्त्रियां भी वाणीकेलिए मेढा से ' भोग ' करती ही होंगी होंगे, ऐश्वर्य के लिए ' बैल से भी भोग ' करती ही होंगी । यदि वादीको , परम ' वैदिक - भोग ' पसन्द है; तो मुनियोंको भगवान्का भोग यह भाव पसन्द था । ‘ ठाकुरजीका भोग ’ अब भी लिया जाता है, तब क्या बादी. का मनचाहा बही भोग है? यदि भोगका वही अर्थ है; तब ये मातृव मुनि स्त्री क्यों बने? पुरुष बनते? स्त्री तो भोग नहीं करती, किन्तु यदि भोग पाती है । उपय जब बैल आदि पशुओंसे ' भोग ' का अर्थ वादी उनका ' उपयोग ' कर मानें, तो यहां भी ' उपयोग ' अर्थं ही मानें । उपयोगका भाव है-स्पर्श । शकुन्तला - नाटक में राजा दुष्यन्त कह रहा है- ' इइ प्रियाभुक्ने लतामण्डपे मुहूर्तं तिष्ठामि ' ( तृतीया ) तब आप क्या यहां यह अर्थ करेंगे कि - ' शकुन्तलासे मैथुन किये हुए लता-अपन मण्डपमें बैठूं, तो क्या शकुन्तला लतामण्डपसे मैथुन करती थी? जिसकी जिस पर श्रद्धा होती है, वह चाहता है कि यह व्यभि ' मुझे स्पर्श करे । यदि स्वा. दयानन्द अब होते, तो उनसे अपने ब्रहाव हाथ आदिके स्पर्शसे आप वा आपकी - स्त्री अपनेको धन्य पुरा समझते । यही आपका उनसे वा उनका आपसे भोग होता । अवत यदि वादी ' भोग'का अर्थ अपना मनचाहा ' संभोग ' अर्ध केवल मानते हैं; और कुछ नहीं; तब ' सम्भोगो दृश्यते यत्र न सकती . दृश्येतागमः क्वचित् ' ( मनु. ८ | २०० ) इस वचनमें वादी वद्दी अर्थ ज्योति करेंगे? ' पृथिव्याः पर्जन्येन च वाय्वादित्याभ्यां च सम्भोगः ' Gujarat. An eGangotri Initiative