सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 341–350
सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 341–350
पृष्ठ 341
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्माल्लोक ( ६ ) ६६१ ६६१ देखिये - आर्यसमाजी विद्वान् श्रीचन्द्रमणि - पालीरत्नका यह सब हैं, की भूमिका स्वा. द. जी को अपनी पुस्तकका समर्पण; तथा श्राद्ध है । roa में आर्यप्रतिनिधिसभा पंजाबका ऋषि-ग. जो कि दयानन्द जन्मशताब्दी -रणार्थ ' वेदामृत ' - प्रकाशन आदि; तथा गुरुकुलमें पुत्रका मृतक-सम्बन्ध पिताके नामसे कमरा बनवाना - चाहे वादी लोग कितना मुकरें-हैं, उनकी मृतक श्राद्ध ही है । वादीके ' ऋषि ' ही संस्कारविधिके के समान, वह सब अन्तमें आदेश दे गये हैं कि - ' मरे - पीछे उनके सम्बन्धी जितना - मृतककी - मुर्दापूजक घनदान करें, बहुत अच्छी बात है ' सो वह मृतकके नामसे पुत्रादि-आत्मा से द्वारा दिया जाता हुआ धनदान भी यदि मृतक श्राद्ध नहीं; तो " कमाश्चर्यमतः परम् ' । यह तो ' यावज्जीवमहं मौनी ' न्यायकी तब भी वे चरितार्थता है । इससे जो मृतकके आत्माका तर्पण होता है-आदि हैं यही तो मृतक श्राद्ध है । ते हैं यह मृतककी आत्माकी शान्त्यर्थ सब आर्यसमाजियोंका मिलकर ना विद्या प्रार्थना करना वा प्रस्ताव पास करना - यह सब मृतक - श्राद्ध ही तो ना, मृतक है । जब वादी मृतक दयानन्दमें बड़ी श्रद्धाका व्यवहार करके लाना यह उन्हें अपनी श्रद्धाञ्जलि देते हैं, गांधीजीको उनके भक्त सूताञ्जलि बाले दिन देते हैं - यह सब मृतक श्राद्ध है । मृतक श्राद्धसे अथर्ववेदसं.का विद्वानोंको, सारा १८ वाँ काण्ड, तथा ऋ.सं. तथा यजुर्वेदसं. के भी बहुत सूक्त भरे पड़े हैं, पर अपनी जमातका पक्षपातका आवरण यह सव देखने नहीं देता; अतः मृतक श्राद्ध पर आक्षेप व्यर्थ हैं । किपुस्तक वे बेचारे ब्राह्मण - जिनपर बादी आक्षेप करते हैं - श्राद्धके दिन र्पण करते कितना खा जाते होंगे, पर वादी लोग तो मुर्दा- दयानन्दके नाम CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. मृतक श्राद्ध, मूर्तिपूजा ६६३ पर ( क्योंकि दयानन्द तो अव मर चुके ) एक बड़ी दुकान खोलकर जनताका लाखों रुपया डकार जाते हैं - यह उनका मुर्देका श्राद्ध है । निमित्त होता है वेदप्रचारका; पर केवल ब्राह्मणों-सनातनधर्मियोंको पोप - पाखण्डी आदि सैकड़ों गालियाँ निकाल देना ही वेदप्रचार हो जाता है और वह रुपया बड़े सुन्दररूपसे अपने वा अपनोंकी ' पेटशालाका चन्दा ' बना दिया जाता है । यह बात वादियोंकी बिल्कुल ठीक है कि - ' हिन्दु भोला है ' । तभी तो वह अपनेको गाली देनेवालोंको भी बड़ी - बड़ी बिल्डिंग्ज बनवा देता है । वह नागपञ्चमीमें अपने शत्रु ' नाग ' की भी पूजा करता है । ( ख ) शेष रही मूर्तिपूजा; सो सर्वव्यापक परमात्माकी उपा-सना कर सकना, देवपूजा तथा मूर्तिपूजाके प्रकारके बिना सम्भव ही नहीं । वादी सन्ध्यामें भगवानका ध्यान करते हैं और भगवान्को फिर सर्वव्यापक मानते हैं; तो जब वे ' प्राचीदिगग्निः ’ मन्त्रसे उस सर्वव्यापकको ' पूर्व ' दिशामें पधराते हैं; तो उन्होंने भी उसे मूर्तिकी भांति एक दिशामें बाँध दिया - सो यह स्पष्ट मूर्तिपूजा हुई । इस प्रकार जब ' दक्षिणा दिकू ' मन्त्रसे उनने उस सर्वव्यापकको दक्षिण दिशामें प्रतिष्ठित किया; तो यह भी मूर्ति-पूजा ही होगई; क्योंकि -अपने ध्यानके समय तक उन्होंने उसे दक्षिण दिशामें बाँध दिया । इस प्रकार ' प्रतीची दिग में जब वादियोंने परमात्माका पश्चिममें मनसा परिक्रमा - द्वारा ध्यान किया; तब उस सर्वव्यापकको मूर्तिको भांति एकदेशी बना दिया, An eGangotri Initiative
पृष्ठ 342
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) या नहीं? इसी तरह ' उदीची दिक ' में भी वही बात हुई ।. वादी जब सन्ध्या ( भगवान् का ध्यान ) करने बैठे, तब उन्होंने एक दिशाकी ओर ही मुख क्यों किया? एक साथ ही सब दिशाओं की ओर एकदम ही मुख क्यों नहीं किया? परमात्मा तो सब दिशाओंमें था । वादियोंने परमात्मा के ध्यान-के अवसर पर एक दिशामें मुख क्यों किया? क्या परमात्मा उसी एक दिशा में था; अन्य दिशाओंमें नहीं? यदि वादी चर्खी-की भांति कोई यन्त्र लगाकर ' सर्वतोमुख ' की उपासनार्थं चारों ओर घूमते भी रहें, तब भी उनका मुख एक ओर ही रहा, सर्वव्यापक नहीं रहा । तब वे उस सर्वव्यापककी पूजा, बिना मूर्तिपूजाके प्रकारके कर ही नहीं सकते । यदि वादी कहें कि-हम एकदेशी हैं, सर्वव्यापक नहीं; तब उसकी सर्वव्यापक पूजा कैसे कर सकते हैं? तब होगई यह उनकी भी ' मूर्तिपूजा ' क्योंकि जब हम - आप सर्वव्यापक नहीं; तब उस सर्वव्यापककी सर्वव्यापक उपासना कभी कर ही नहीं सकते । तब अगत्या वादियोंको उपासनार्थ परमात्माको एकदेशमें चाहे थोड़ी देरके-लिए ही सही - रखना ही पड़ेगा । यह एकदेशमें उसे रखकर, एकदेशमें ही स्वयं स्थित होकर उसकी पूजा - ध्यान करना यही तो मूर्तिपूजा है । • यदि वादियोंने उसे अपने मन - मन्दिर में प्रतिष्ठित कर उसका ध्यान किया; तो यह भी स्पष्ट मूर्तिपूजा है; क्योंकि— इनका हृदय सर्वव्यापक नहीं, किन्तु सीमित है, जड़ है । उस CC - 0. Ankur Joshi Collection मूर्ति - पूजा ६६५ ६६६ शरीर के काम - क्रोधादि वा रक्त, मज्जा, हड्डी आदि विकारवाला एवं अपवित्र होनेसे उसकी अपेक्षा एक निर्विकार प्रस्तर केन्द्र प्रतिष्ठित करके उसमें महान देवकी पूजा करनी आदि अधिक उत्तम है । जड़से डरनेकी आवश्यकता भी नहीं; क्योंकि जड़में भी वही चित्शक्ति व्यापक है । हमने उसीका उद्देश्य करना है । परम पूर्वपक्षियोंका मन जिससे वे ध्यान करते हैं, वह बुद्धि जिससे परम उसे विचारते हैं, शेष प्रकाश आदि सभी बाह्य वस्तुएँ जिनका व्याप वे सदा आश्रय लेते हैं, यह भी सभी जड़ हैं । इनकी उपासना से हैं । वादी जड़ नहीं हो जाते; अतः उन्हें मूर्तिपूजासे भी जड़ हो विका जानेकी आशङ्का छोड़ देनी चाहिये । यह प्रकृतिका सारा संसार है, प ही जड़ है । इसमें रहकर कोई भी जड़से छूट नहीं सकता । तब ' जलमें रहकर मगरसे वैर? कैसे किया जा सकता है? यदि वादी अपनी आधारभूत प्रकृतिको सर्वथा छोड़ बैठेंगे; तो वे अन्त स्वयं भी न रह जावेंगे । छोड़ देखें वे प्रकृतिके इस अपने शरीर-को, मन को, जीभ को । यदि नहीं छोड़ सकते, बल्कि उसीके द्वारा उस चित् - शक्तिकी उपासना करनेमें सक्षम हो सकते हैं, नमस वैसे मूर्तिपूजा में भी समझें । वादी परमात्माका ध्यान करते हुए वह प्रकृतिकी किसी भी मूर्ति से छूट नहीं सकते । प्रत्येक दशामें उन्हें टेका, किसी प्रकृतिको मूर्तिको चाहे वह पृथिवी हो वा आकाश, इस चेतन शक्तिका केन्द्र उपासनार्थ बनाना ही पड़ेगा, यही तो होती इ हैं मूर्तिपूजा | आपने उस मूर्ति में सर्वव्यापक, उसके परमाणु- यह परमाणुमें व्यापक परमचेतन - आत्माकी उपासना करनी है । नमस्क Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 343
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ६६६ सो वह मूर्ति चेतन - सी हो जाती है । विकारवाला जैसे हमारे चेतन - आत्माके प्रतिबिम्बसे हमारे आँख, कान, तर आदि- आदि जड़ होते हुए भी चेतनसे हो जाते हैं; वैसे नी अधिक हाथ - पाँव मूर्तिकी प्राणप्रतिष्ठामें भी समझें | ‘ भावे हि विद्यते देवः ’ कि जड़ से परमात्मा भी तो हमारे भावमें है । यदि हममें भाव नहीं; तो करना है । परमात्मा भी नहीं । अतः प्रतिष्ठित - मूर्ति में भी उसके अणु - अणुमें द्धिजिससे व्यापक आत्मशक्तिकी भावना न रखना एक भारी नास्तिकता जिनका हैं । जिसमें इन्द्रियों का विकास जितना कम होता है, जितना उपासना से विकार कम रहता है, उसमें चेतनता भी कम अभिव्यक्त रहती जड़ हो है, पर होती अवश्य है, तभी तो पातञ्जल -महाभाष्य में कहा है-रा संसार ‘ सर्वस्य वा चेतनावत्त्वात् ' ( ३ । १ । ७ ) ऐसा न मानना तो परमात्मा-कता । तत्र है? यदि की सर्वव्यापकता के सिद्धान्तसे मुकरना है । फलतः इस मार्गके गे; तो वे अन्त तक अपनी ज्ञानचक्षु वा दूरदृष्टि पहुँचाने पर वादीको शरीर • मूर्तिपूजा - सिद्धान्तकी सत्यता प्रतीत हो जाएगी । कि उसीके वादियोंने सन्ध्या समाप्त की, और ' नमः शम्भवाय ' यह सकते हैं, नमस्कार - मन्त्र बोलकर परमात्माको अन्तिम नमस्कार की; तो करते हुए वह माथा तो उन्होंने अपने सामनेकी किसी जड़ दीवारके आगे शामें उन्हें टेका, वा जड़ पृथिवीके, वा तेजके, वा सामनेके आकाशके काश, उस श्रागे अपना जड़ माथा टेका; यह सभी वस्तुएँ जड़ हैं । वादियों-तो होती ने इन जड़ मूर्तियोंके द्वारा उस सर्वव्यापकको नमस्कार की; तो परमाणु- यह स्पष्ट मूर्तिपूजा ही सिद्ध हुई । यदि वे कहें कि -हमारे करनी है । नमस्कारका लक्ष्य तो उनमें व्यापक परमात्मा था; जड़ दीवार CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. मूर्ति - पूजा ६६७ आदि लक्ष्य नहीं थी; तो महाशय! हो न गई यह आपकी मूर्तिपूजा! मूर्तिपूजा में भी तो नमस्कार वा पूजाका लक्ष्य पत्थर नहीं होता, किन्तु परमात्मा ही होता है, पत्थर तो केन्द्र होता है । आप लोग जो ला • लाजपतरायकी मूर्ति पर १७ नवम्बरको फूलमाला डालते हैं; वहाँ सम्मान उसी हस्तीका होता है; उस बुत्तका नहीं । इस प्रकार मूर्तिपूजामें भी समझ लें । वादीके सम्मानार्थ उनके गलेमें किसीने फूलोंका हार डाला । प्रश्न है कि उसने यह आपके लहू वा नसोंसे मिले गलेकी पूजा की; वा उसमें व्यापक आत्माकी? यदि गलेकी; तव उसने जड़की पूजा की । यदि आत्माकी पूजा की; तव आत्मापर उसने पुष्पमाला क्यों न डाली, क्यों गलेमें डाली? उत्तर होगा कि- श्रङ्गीकी पूजा, बिना किसी अङ्गके हो ही नहीं सकती, अतः उस अङ्गी आत्माकी पूजा वा प्रसन्नतार्थ उसके एक अङ्ग गलेको पूजाका केन्द्र बनाया गया । साकार अङ्गपर साकार पुष्पमाला चढ़ी, और निराकार अङ्गी पर पूजककी निराकार श्रद्धा चढ़ी । बस, जरा वादी मूर्तिपूजाके सूक्ष्म सिद्धान्त पर गम्भीर तथा . सूक्ष्म अन्तर्दृष्टि डालें; तब उनको इस सिद्धान्त पर श्रद्धा होगी । फिर ' श्रद्धया सत्यमाप्यते ' ( यजुर्वेदसं. १६३० ) श्रद्धासे वादीको सत्यकी प्राप्ति होगी; तब सूर्यपूजारूप मूर्तिपूजा करते हुए ' हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । योऽसौ आदित्ये पुरुषः सोऽसौ अहम् ' ( यजु. ४०।१६ ) ' तत् त्वं पूषन्! अपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ' ( ईशोप. १७ ) उस हिरण्यमूर्ति सूर्य में वादीकी दृष्टिसे An eGangotri Initiative
पृष्ठ 344
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६६५ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) सुबर्णमूर्तिके आवरणको हटाकर वे ' सत्यं शिवं, सुन्दरम् ' भगवान् दर्शन देकर सफल - काम करेंगे । खण्डन - व्यसनिता तथा गालियाँ देना छोड़कर वादी दूसरोंके दृष्टिकोणका गम्भीर मनन करना सीखें, कीर्तनमें जिसका गीता में ' सततं कीर्तयन्तो मां ' ( ६/१४ ) ' स्थाने हृषीकेश! तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यति, अनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति ' ( १ ९ ३६ ) इत्यादि स्थलों में वर्णन आता है, जिस कीर्तनसे निन्दक सब लोग भाग जाते हैं-वे निन्दक उस भक्तकी वेद्यान्तर - स्पर्शशून्य तन्मयता ' तद्बुद्ध-यस्तदात्मानः, तन्निष्ठाः, तत्परायणाः ' ( गीता ५।१७ ‘ तद्भावभावितः ’ ८६ ) का वादी सूक्ष्म अध्ययन करें, तब उन्हें उसका लोकोत्तर-चमत्कारक रस आएगा; पर उसको न समझकर ' अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकुर्वते ' इस न्यायसे ' सवासनानां सभ्यानां रसस्यास्वादनं भवेत् । निर्वासनास्तु रङ्गान्तः काष्ठकुड्याश्मसन्निभाः ' इस कथनसे दीवार, काठ एवं पत्थर बनकर भक्तों पर हंसी उड़ाना तथा उन्हें गालियाँ देना - यह अपनी असहृदयता एवं जड़ताका नग्न प्रदर्शन करना है । ' काव्यालापाश्च ये केचिद् गीतकान्यखिलान्यपि । शब्दमूर्तिधरस्यैते विष्णोरंशा महात्मनः ' इस विष्णुपुराणके वचनानुसार भक्ति - सम्बन्धी सुरीली तानें, तालियाँ बजाना आदि तन्मयताके साधन तथा चिह्न होते हैं । भक्त उस समय अपने आपको भी भूल जाता है, पर जो भक्ति-रससे शून्य एवं शून्य - हृदय तथा ' बिहणो वृषणायते ' का निदर्शन हो; उस आक्षेप मात्र शूरको उसमें क्या आनन्द आ सकता है? CC - 0. Ankur Joshi Collection देवमूर्ति - पूजा ६७० ६६ ॥ उसे उन श्रानन्दसे विभोर भक्तोंके अन्तस्तलका क्या पता लग सकता है? उसने तो अंगूरों तक पहुँच न पानेसे ' अंगूर खट्टे हैं । यह कहना ही होता है; जिससे अपनी ही उपहास्यता सिद्धहो जाती है । तालियाँ बजाना शास्त्रीय भी है- ' अस्त्राय फट ' पदार्थ कहकर ताली बजाई जाती है, इससे पाप दौड़ जाते हैं । वादी परमात्माको तथा उसके ज्ञानको निराकार तथा सब अनन्त मानते हैं; पर उस निराकारके निराकार - ज्ञानकी भी साका अक्षरमूर्ति बना डाली गई और उस अनन्त ज्ञानके चार वेद, चार मन्दिर बनाकर उस अनन्तको उन चार मन्दिरों में सीमित कर नास्त बन्द कर दिया, और उन मन्दिरोंमें प्रवेश करके निराकार व्याप अक्षरोंकी साकारमूर्ति बनाकर उनकी उन्होंने उपासना भी कर कभी नीयक डाली, और उस साकारमूर्ति अक्षरकी उपासनासे वादियोंने निराकारका अनन्त ज्ञान भी प्राप्त कर लिया । सो जब उस सीमि नत निराकारके अनन्त एवं निराकार ज्ञानको जड़ अक्षररूप मूर्तिकी उपासनासे ' वादियोंने प्राप्त किया; क्या उन्होंने यह मूर्तिपूजा नहीं अपनाई, और उसका फल प्राप्त नहीं किया? अनन्त एवं अग्राह्य ज्ञानको सीमामें एवं अक्षरमूर्तिरूपमें लाकर उसको ग्रहण बनाव करना, उसकी उपासना करना, यह मूर्तिपूजा है । वादी कितना अपनी भी जोर क्यों न लगावें, वे मूर्तिपूजा से नहीं छूट सकते । यदि विद्वत्त बादी इससे अपने आपको मूर्तिपूजक नहीं मानते, तो निराकार होगा वेदको वे निराकार ही रहने दें, उसको मूर्तियों वेद पुस्तकोंको उनकी संस्थाको छपवानेका, उनकी पठनरूप उपासनाका उन्हें कोई अधिकार व Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 345
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ६६२ नहीं । पता लग स्वा ० द ० जीने स ० प्र ० के ११ व समुल्लासमें सिक्खोंके ग्रन्थ-खट्टे हैं साहिब के सम्मानके उपलक्ष्य में यह शब्द लिखे हैं - ' किसी जड़ सिद्ध हो पदार्थके सामने सिर झुकाना वा उसकी पूजा ( सम्मान ) करना ट ' कहकर ( जैसे ला ० लाजपतराय आदिकी मूर्ति पर पुष्पमाला चढ़ाना ) सब मूर्तिपूजा है । ( पृ ० २३० ) जब ऐसा है, तब श्राद्ध और मूर्ति-था अनन्त पूजा सभी सम्प्रदायोंमें सिद्ध हुए । तो फिर उसी श्राद्ध एवं मूर्ति-साकार पूजा पर आक्षेप करना ‘ यावज्जीवमहं मौनी ' ' मम मुखे जिह्वा वेद, चार नास्ति ' इन न्यायोंका ही अनुसरण करना है । वस्तुतः उस सर्व-मत कर व्यापककी हम - आप एकदेशी लोग सर्वव्यापी पूजा - उपासना निराकार कभी कर भी नहीं सकते । हमारी परिमित वाणी उस अनिर्वच-ना भी कर नीयको वर्णित वा स्तुत भी कभी कर नहीं सकती । हमारा वादियोंने सीमित - मन भी उस असीमितमें नहीं पहुँच पाता । कहा भी है-जब उस ' न तत्र चक्षुर्गच्छति, न वाग् गच्छति न मनः, नो विद्मो न विजा-प मूर्तिकी नीमः ' ( केनोप ० १।३ ) । तब जो भी और जैसी भी हम - आप एक-मूर्तिपूजा देशी जन, उस सर्वव्यापक की एकदेशी पूजा करेंगे, वह सब नन्त एवं ' मूर्तिपूजा ' ही होगी । वादी निराकार अक्षरकी साकार - मूर्ति ह दी कितना बनाकर उसे एक ' ट्रैक्ट ' बनाकर उस अक्षरकी उपासना - द्वारा ते । यदि अपनी समझमें जनतामें मूर्खताका प्रचार कर रहे हैं, या निराकार विद्वत्ताका? जो वे इसका उत्तर देंगे, वही मूर्ति - पूजामें हमारा होगा । को उनकी अधिकार बादियोंके स्वामीजी ‘ आर्याभिविनय ' में दर्शनीय - परमात्मा को CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. मूर्ति - पूजा, अवतार ६७१ गुर्चके रसका भोग लगाया करते हैं, और वादी लोग हवनमें ' सोमाय स्वाहा, वरुणाय स्वाद्दा, यमाय स्वाहा ' आदि बोलकर अग्निमें आहुति देते हैं, यह सब नाम वादियोंके मतमें परमात्मा के हैं, सो वादी भगवान्को मोहन - भोग आदि वस्तुओंका भोग लगाकर अच्छी - खासी मूर्ति पूजा कर रहे हैं; और आक्षेप करते हैं इससे सनातनधर्मियों पर! यह कैसा न्याय है!!! ( ग ) इस प्रकार उस सर्वव्यापकका विशेष स्थान पर प्रकट हो जाना ही अवतार होता है । भगवान ' अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमनाः । जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शन्ति-वाम् ॥ मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा ' ( अथर्व. ३।३०।२-३ ) इस अपने वेदोपदेशको मूर्तरूप देनेकेलिए - श्रव्य-काव्यको दृश्य बनानेकेलिए स्वयम् आदर्श बनकर जनताको उसपर आचरणार्थं प्रोत्साहित करते हैं; क्योंकि - वेदरूप श्रव्य-काव्यकी अपेक्षा दृश्य - काव्य अवतारका भारी प्रभाव पड़ता है । तभी तो वह परमात्मा ' अग्निमीले पुरोहितं ' ( ऋ. १ | १ | १ ) यहां स्वयं भी उत्तम पुरुष - देकर अपनी अग्निपूजा दिखलाके हमें तदर्थ प्रोत्साहन देता है । मालूम ऐसा होता है कि अवतार अयोध्यासे लंका में जा रहा है, लङ्कासे अयोध्यामें आ रहा है, वस्तुतः यह सिनेमाके चित्रोंकी भान्ति मायामात्र है । चलचित्रके चित्र चलते - भागते हुए मालूम देते हैं, वस्तुतः वैसा नहीं होता । उसी समय हजारों चित्र हमारे सामने आजानेसे हमें उनका चलना, आना, दौड़ना, An eGangotri Initiative
पृष्ठ 346
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६७२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ठहरना मालूम होता है, वैसे यहां भी समझ लें । मालूम होता है कि - अमुक व्यक्ति घड़ेके आकाशको भगाये जा रहा है, वस्तुतः घड़ेका आकाश भाग रहा नहीं होता, वह वैसा का वैसा ही कूटस्थ होता है । घड़ा इधर - उधर ले जाने से हम उसके श्राकाशको भी दौड़ रहा हुआ समझते हैं । फलतः वादी अपने इन आक्षेपों पर यदि गम्भीरतासे हमारे कहे प्रकारसे विचार करेंगे; तब उन्हें अपने किये हुए आक्षेप निःसार प्रतीत होंगे, यह हमारा विश्वास है, पर शर्त यह है कि-वे अपने पक्ष के पक्षपातका आवरण हटाकर निष्पक्ष - दृष्टिकोणको अपनावें— ' तत् त्वं पूषन्! अपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ' ( ईशोप. ) तब वादीको उस ' सत्य'के दर्शन हो जावेंगे । फिर उन्हें गालियां देकर सनातनधर्मियोंके चित्तको दुखानेकी आवश्यकता न रह जावेगी । श्रीराम - महाशयके मुख्य आक्षेपोंका हमने वेदशास्त्रादिके अनुसार परिहार कर दिया है, तब ' सारे दुराचारोंकी जड़ इस सड़ातन (? ) धर्म में मिट्टीका तेल लगाकर आग लगा देनी चाहिये, ऐसे पाखण्डी सनातनी पोप- पण्डितोंकी शक्ल देखना भी पाप समझना चाहिये, जो पुराणों वा कीर्तनका प्रचार करके भोली हिन्दुजातिमें अधर्मका प्रचार करते हैं । जब तक इस धर्मके ठेकेदार – उपदेशकोंकी अक्ल दुरुस्त नहीं की जावेगी; यह जनताको गलत मार्गपर डालनेसे बाज नहीं आवेंगे ' इत्यादि बाढ़ीके जो गालियोंके जंकशन जारी हुए हैं, वे उन्होंने अपने CC - 0. Ankur Joshi Collection नया प ६७३ दादागुरु स्वा. द. जीके अपने पञ्चम वेद - स. प्र. - से सीखे हैं । हम धन्यवाद के साथ ' त्वदीयं वस्तु है धीमन्! तुभ्यमेव समर्पये ' के अनुसार उन्हींको समर्पण करते हैं । ( २२ ) यह हमारा निबन्ध छप ही चुका था कि हमें श्रीरामसहायजी - जो अपने - आपको भूतपूर्व - वल्लभमतानुयायी बताते हैं; और आर्यसमाजी उपदेशक हैं- का ' राधाका रहस्य ' ( द्वि.सं.पू. १८ ) निबन्ध मिला । इसमें प्रायः डा ० श्रीराम-वाली ही बातें हैं, अतः पृथकू उत्तरणीय बात कुछ नहीं । इतना है— जहां डा ० श्रीराम राधाके पक्षके थे, और श्रीकृष्णके विषक्ष रहे, वहां यह रामसहायजी श्रीकृष्णके तो पक्षके रहे, और राधाके विपक्ष में हो गये हैं । सो इसका सर्वोङ्गीण - उत्तर हम पूर्व दे ही चुके हैं । श्रीरामसहायजीने पृ. १६ तक तो प्रायः सभ्यता रखी है, पर १७-१८ पृ. में पं ० माधवाचार्यजीके विषयमें अपनी गम्भीरताको खोकर अपनी असभ्यताका परिचय दिया है । अस्तु — एक - दो बातें इन्होंने नई भी लिखी हैं, उनमें एक है ब्रह्मवैवर्तका गोवधादि, दूसरी बात है— साम्बको देखकर श्रीकृष्णकी १६ सहस्र स्त्रियोंके जघन स्रुत होना, और बेश्याओं-के उद्धारका प्रकार | इन दोनों बातोंको अन्य आर्यसमाजी भी बड़े संरम्भसे दिया करते हैं । इनमें पहली बातका उत्तर तो इस निबन्धमें पृ. ४१७ ४३६ पृ. तक हम दे चुके हैं; शेप दूसरी बातपर हम विचार - उपस्थित करते हैं । इनका भी हम ' बाड़ी ' नामसे उल्लेख करेंगे । Gujarat. An eGangative
पृष्ठ 347
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६७३ हैं । हम मर्पये के कि - इमें तानुयायी ' राधाका श्रीराम-ह्रीं । इतना विपक्ष रहे, और - उत्तर हम ६७४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) वादीने भविष्य पुराणके उत्तरपर्वके १११ अध्यायसे ‘ मम पत्नीसहस्राणि सन्ति पाण्डव! पोडश । तं दृष्ट्वा सुन्दरं साम्बं सर्वाश्च क्षुभिरे स्त्रियः । स्वभावतोऽल्पसत्त्वानां जघनानि विसुस्रुवुः ' यह पद्य आक्षेपार्थ दिया है । इसका अर्थ वादीने नहीं दिया है, पर दूसरे आर्यसमाजी अर्थ देनेमें नहीं चूके । श्रीदेवेन्द्र - सांख्य-तीर्थने लिखा है — ' साम्बकी सुन्दरताको देखकर उन स्त्रियोंकी धोतियें खराब हो गईं ' । ठाकुर अमरसिंहजीने साथ यह श्लोक भी लिखा है — ‘ ब्रह्मचर्येपि वर्तन्त्याः साध्या अपि च श्रूयते । हृद्य ं . हि पुरुषं दृष्ट्वा योनिः संक्लिद्यते स्त्रियाः ' यह दशा देवर्षि श्रीनारद तथा श्रीकृष्णचन्द्र दोनोंने देखी, और दोनोंने शाप दिया कि-तुम सब वेश्या हो जाओ । ' चौरैरपहृताः सर्वा वेश्यात्वं समवा-तो प्रायः.प्स्यथ ' | रविवारके दिन किसी वेदपारगामी ब्राह्मणको बुलाकर के विषय में उसके साथ समागम करनेसे तुम्हारा उद्धार हो जायगा ' ( ' दो चय दिया शास्त्रार्थ ' पृ. ५-६ ) वादीने इससे अमरप्रन्थ- गीताके उपदेष्टा नमें एक है योगेश्वर - कृष्णजीको निन्दाका पात्र सिद्ध किया है । देखकर खेद है — वादी लोग विना स्वयं मूलग्रन्थोंको देखे दूसरोंके - वेश्याओं- • कहने मात्रसेही लिख दिया करते हैं । हमें तो भविष्यपुराण में माजी भी ' जघनानि विस्रुवुः ' आदि पद्य नहीं मिले । हम मान भी लें तर तो इस कि यह किसी अन्य संस्करणमें होंगे; हम इस आक्षेप पर शेष दूसरी विचार करते हैं-हम ' वाड़ी ' इसपर वादियोंको ' जानना चाहिये कि जैसे वेदके ब्राह्मण-भागका - जिसे कहीं - कहीं ‘ पुराण ' शब्दसे भी कहा गया है— एक CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रर्थवादका स्वरूप ६७१ विषय अर्थवाद है, वैसे ही प्रायः ब्राह्मणभागाश्रित पुराण भी वैदिक - सिद्धान्तोंके अर्थवाद हैं । अर्थवाद तीन प्रकारका होता है – १ - गुणबाद, २ अनुवाद, ३ भूतार्थवाद । १ गुणवादमें ' विरोधे गुणवादः स्यात् ' इस भट्टपादोक्त न्यायसे लोक - विरुद्धता दीखने पर किसी वस्तुके गुणकथनमें तात्पर्य हुआ करता है । ' अनुवादोऽवधारिते ' २ अनुवादमें निश्चित वातकी दृढतार्थ पुनः-पुनः उसे अभ्यस्त किया जाता है । ' भूतार्थवादस्तद्धानाद् अर्थ-वादस्त्रिधा स्मृतः ' भूतार्थवादमें पुराकल्पकी परम्परागत वा किसी कल्पित आख्यायिकाको विवक्षित सिद्धान्तकीं सिद्ध्यथ उपस्थित किया जाता है । अर्थवादमें प्रत्येक पदका अर्थ नहीं लिया जाता, किन्तु उसका विवक्षित - तात्पर्यमात्र लिया जाता है । वहां रोचक भयानक वाक्योंसे विधेयमें प्रवृत्ति तथा निषेध्यसे निवृत्ति इष्ट होती है । सो पुराण के एतदादिक स्थलोंमें भी अर्थवाद रखा गया है, जहां सम्पूर्ण आख्यायिकाका सम्पूर्ण अर्थ न लेकर विवक्षित अब आता है गिलोय के यह यहां • जाता है । फिरंगी, तात्पर्यमात्र लिया जाता है । -पाठक अर्थवाद के कुछ उदाहरण देखें । एक वाक्य - ' शिखा ते वर्द्धते वत्स! गुडूचीं श्रद्धया पिब ' इसमें पीनेसे शिखाके बड़े होनेका कोई सम्बन्ध नहीं; अतः केवल गिलोय के पीनेमें प्रोत्साहनार्थ अर्थवाद ही माना २ हाजमेंके चूर्ण केलिए कहते हैं - ' इसको खाते लाट इसे खाकर हनुमान्ने लङ्का जीती ' । तब क्या यह चूरनका इतिहास ठीक है? नहीं, केवल यह अर्थवाद चूरनके Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 348
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६७६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) खानेके प्रोत्साहनार्थ है । — ३ ' अन्यास्ता गुण - रत्नरोहणभुवो धन्या मृदन्यैव सा, सम्भाराः खलु तेऽन्य एव विधिना येरेष सृष्टो युवा । श्रीमत्कान्तिजुषां द्विषां करतलात् स्त्रीणां नितम्ब-स्थलाद्, दृष्टे यन्त्र पतन्ति मूढमनसामस्त्राणि वस्त्राणि च ' । इसमें एक युबकका अर्थवादसे कविने वर्णन किया है कि - इसके गुणरत्नोंको पैदा करने वाली वह कोई और ही भूमि है, वह धन्य मिट्टी भी कोई दूसरी ही है, और वे साधन भी कोई विलक्षण ही हैं, जिनसे विघाताने इस युवकको बनाया है । इसके देखते ही मनके भयसे मोहित हो जानेके कारण शत्रुओंके हाथ-से शस्त्र गिर जाते हैं; और इसे देखते ही कामसे मोहित हो जानेके कारण कामिनियोंके नितम्बस्थलोंसे वस्त्र खिसक जाते हैं । तब क्या वादी इसे उस युवकका युवति- मोहनमें तात्पर्य रूप अर्थवाद न समझकर यही मान लेंगे कि — इस युवकको देखते ही स्त्रियोंके अधोवस्त्र स्वयं खुल जाते हैं!!! इस प्रकार प्रकृत - विषयमें भी समझना चाहिये कि उक्त आक्षिप्त - पद्य साम्बकी अत्यन्त सुन्दरताका अर्थवाद है, जिसे देखकर विमाताएँ भी स्तब्ध रह गई । क्या वादीने वादिप्रति-वादिमान्य मनुस्मृतिका यह वाक्य नहीं सुना -'मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा न विविकासनो भवेत् । बलवान् इन्द्रियग्रामो विद्वांस-मपि कर्षति ' ( २।२१५ ); इसका क्या यह तात्पर्य नहीं कि - पुत्र मातापर भी एकान्तमें विकृत हो सकता है? फिर पुराण में व्युत्क्रमसे विमाताओंका सौतेले पुत्र, जाम्बवतीके लड़के, साम्-CC - 0. Ankur Joshi Collection या क्षेप ६७६ ६७७ को —– जिसे पहले उन्होंने देखा न था, और अब भी जिन्हें उसका पूरा परिचय नहीं था - देखकर उनका जघनस्राव यदि अवितर्कित होगया; तब वादी इसमें दोष देने में कैसे समर्थ सम है? मवि क्या मनुस्मृतिके उक्त पद्यका यह आक्षिप्त - प्रकरण श्रर्थवाद नहीं? इस श्री अमरसिंहजीने उक्त पद्यके साथ यह भी स्त्रियोंका एक स्वभाव दिखलाया है — ‘ ब्रह्मचर्येपि वर्तन्त्याः साध्या ह्यपि च श्रूयते । हृद्य ं हि पुरुषं दृष्ट्वा योनिः संक्लिद्यते स्त्रियाः ' जब यहाँ ब्रह्मचारिणी तथा साध्वी स्त्रीका भी जघन - क्लेदन सूचित किया गया है; तब वादी यहाँ दोष कैसे लगा सकता है? यदि वादी यह इस पद्यको पुराणकी गप्प बतावे; तब हम उसे बादिमान्य महाभारतका इसी प्रकारका पद्य दिखलाते हैं । वे आँखें खोलकर पुर देखें — ' इदमन्यच्च देवर्षे! रहस्यं सर्वयोषिताम् । दृष्ट्व पुरुषं हृद्य ं योनिः प्रक्लिद्यते स्त्रियाः ' ( अनुशासनपर्व ३८/२६ ) तब महा • उप भारतानुकूल पुराणमें भी उक्त प्रकरण इस सिद्धान्तका अर्थबाद मौ सिद्ध हुआ कि - स्त्री एकान्तमें सौतेले पुत्रको भी न देखे । सो स्वा अर्थवादमें सारे शब्दों का अर्थ न देखकर विवक्षित - तात्पर्यमात्र लिया जाता है - यह हमारी बात सिद्ध हुई । त्य तब इस बातसे श्रीकृष्ण पर क्या दोष आ सकता है? और फिर वहाँ ' स्वभावतोऽल्पसत्त्वानां जघनानि विसुखुवुः ' कहा है ।; तो अल्पसत्त्वा ( मानसिक दौर्बल्यवाली ) स्त्रियों में ऐसा हो जाना साम कठिन नहीं । तब इस विषय में श्रीकृष्णपर तो कोई कलङ्क नहीं Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 349
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ६७८ ६७७ सकता । प्रत्युत श्रीकृष्णने तो उन्हें दूसरोंसे हरे जानेपर जिन्हें श्री वेश्या होनेका शाप दिया है | देखिये- ' चौरैरपहृताः सर्वा वेश्यात्वं त्राव यदि ' ( १८ ) । वहाँ यह लिखा है- हरिष्यन्तीह दस्यवः । मर्थ है? समवाप्स्यथ मयि स्वर्गमनुप्राप्ते भवतीः काममोहिताः ' ( १११ | ८ ) अर्थात् - मेरे बाद इस लोकसे चले जाने पर तुम काममोद्दिताओंको दस्यु हर ले जाएँगे । का एक: यह शाप इन्हें इस जन्मके कर्मानुसार नहीं था; बल्कि— पिच पूर्व - जन्मके कर्मानुसार यह होनहार थी । जब वे अप्सरा थीं, यहाँ श्रम ( प ) मान करने पर नारद वा अष्टावक्रने इसी जन्मकेलिए तकिया ग्रह शाप दिया था, ‘ नारद और श्रीकृष्ण दोनोंने इकट्ठा ही दिवादी इसी बात केलिए शाप दिया ' - यह वादीका लिखना भविष्य-दिमान्य खोलकर पुराणके उक्त - प्रकरणको न देखनेके ही कारण है । अस्तु — व पुरुष..केवल पुराण में नहीं; किन्तु महाभारतमें भी अर्जुनकी तब महा- उपस्थितिमें उनका भीलों द्वारा अपहरण लिखा है । देखिये वाद मौसल पर्व ( ७ । ६३ ) । दूसरोंसे अपहृत होनेपर उनका वेश्यात्व खे । सो स्वाभाविक ` है; तब प्रसंगवश वेश्यात्वमें भी उनके उद्धारार्थ कुछ त्र्यमात्र नियम भी बतला दिये गये; क्योंकि - ' सर्वनाशे समुत्पन्ने ह्यर्ध त्यजति पण्डितः । अर्धेन कुरुते कार्यं सर्वनाशः सुदुस्सहः ' । है? और... भविष्यपुराणके वादीसे उद्धृत वचनमें भी सभी स्त्रियोंका कहा है; जैसा होना नहीं दिखलाया गया; किन्तु ' स्वभावतोऽल्पसत्त्वा-हो नाम् । इसका तात्पर्य यह है कि जो स्त्रियाँ, उनसें ख़ुभावतः कलङ्क नहीं दुर्बल - मन वाली थीं; उन्हींका ऐसा पतन हुआ । इससे सभीका CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीकृष्णका सुदर्शनचक्र ६७६ वैसा वर्णन इष्ट नहीं । उसमें भी एक रहस्य है । वह यह कि यह १६ सहस्र स्त्रियाँ नरकासुरके कारागारसे आई थीं । नरका-सुरने उन्हें अपने काबूमें लानेकेलिए क्या - क्या हथकण्डे नहीं किये होंगे? क्या - क्या दुश्चेष्टाएँ करनेकी चेष्टा न की होगी? सो कई स्त्रियाँ जो निर्बल मनवाली थीं; उनका वहाँ पतन हो भी जाता; पर १६ सहस्रके समूहने एक - दूसरेकी रक्षा की । सो जो वहाँ मनसे कुछ दुर्बल थीं, पर शरीरसे शुद्ध रहीं, श्रीकृष्णने उनकी प्रार्थनासे उन्हें भी अपनी शरण दे दी; पर इस अवसरमें जब उनका पतन देखा; जो वस्तुतः भविष्यपुराणानुसार पूर्व-जन्मके नारदके शापके कारण ही ऐसा होना स्वाभाविक था; उनकी होनहारवश श्रीकृष्णसे भी उन स्त्रियोंको श्रीकृष्णके परम-धामगमनके बाद दूसरों द्वारा अपहरण तथा तन्मूलक वेश्या हो जानेका शाप मिल गया । इसमें श्रीकृष्णका कोई लाघव सिद्ध नहीं होता । वस्तुतः उक्त प्रकरणमें अर्थवाद है - यह हम पूर्व बता श्रये हैं । अर्थवादका प्रत्येक - पदके अर्थमें तात्पर्य न होकर विवक्षित-सिद्धान्तके प्रकाशनमें तात्पर्य हुआ करता है । वह तात्पर्य यह है कि- विमाताका सौतेले पुत्रसे दर्शनमात्र तकका सम्बन्ध भी नहीं रखवाना चाहिये; नहीं तो इससे भी भयावह घटनाएँ होनेकी आशङ्का रहा करती है । इस विषय में ' पूरन - भगत तथा उसकी विमाता लूणाका किस्सा ' प्रसिद्ध ही है । इस अर्थवादसे यह भी सूचित होता है कि - पतिके स्वर्ग-Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 350
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६८० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) गमनमें स्त्रियां सती हो जावें, तब तो ' न रहे बांस न बजे बांसुरी ' सब ठीक होता है; नहीं तो पीछे उनकी बड़ी दुर्दशा होती है । दूसरे लोग कई ढंगोंसे सतीत्वहरण कर के प्रकारान्तरसे उनका अपहरण कर लेते हैं, जिससे विवशतासे उन्हें या तो वेश्याओं-जैसा जीवन बिताना पड़ता है, या फिर वेश्या बनना अनिवार्य हो जाता है । यहां भी श्रीकृष्णके इस लोकको छोड़कर पुराणा-नुसार स्वेच्छासे स्वर्गलोकको सनाथित करनेपर रुक्मिणी आदि पटरानियां तो सती हो गई, जैसा कि महाभारत में सूचित है; और कई साधारण - रानियां आततायियों द्वारा अपहृत हो गई, जिससे वेश्यात्व प्राप्त हुआ यह इस अर्थ वादसे सूचित हो रहा है । शेष रहा प्रकरण - प्राप्त वेश्याओंका उद्धार, वहां लिखा है— ' अत्र चाहूय धर्मज्ञं ब्राह्मणं वेदपारगम् । अव्यङ्गावयवं पूज्य गन्धपुष्पादिभिस्तथा ' ( ४२ ) ' ततः प्रभृति योऽन्योपि रत्यर्थं गृहमागतः । स सम्यक् सूर्यवारेण समं पूज्यो यथेच्छया ' ( ५५ ) ' एवमेकं द्विजं शान्तं पुराणज्ञं विचक्षणम् । तमर्चयेत च सदा अपरं वा तदाज्ञया ' ( ४ । १११।५६ ) यहां वेश्याको एक शान्त एवं विद्वान् ब्राह्मणका पूजन आदिष्ट किया है - इससे वह धीरे - धीरे विषयोंसे दूर होकर पूजापाठके प्रेमवाली बन जायगी, जिसके परिणाममें उसे सद्गति होगी । जो कि- ' यथेष्टाहारयुक्त ' च ' तमेव द्विजसत्तमम् । रत्यर्थं कामदेवोऽयमिति चित्तेऽवधार्य च ' ( ४४ ) यद्यदिच्छति विप्रेन्द्रस्तत्तत् कुर्याद् विलासिनी 1 । सर्वभावेन चात्मानमर्पयेत् स्मितभाषिणी ' ( ४५ ) यहां एक ब्राह्मणेन्द्रसे रति CC - 0. Ankur Joshi Collection भगवान्का चक्र तथा उसे आत्म - समर्पण करना कहा है- यह उसके प्रकार है । यह वैसा उपाय है, जैसे कि- एक वैद्यने एक ६५ । ६६ उद्धारका एक दीख मद्यपको मद्य आ छोड़नेकेलिए बताया था, पर वह इस बहमसे कि- इसे छोड़ने से ( 8 वह मर जायगा उसे छोड़ना नहीं चाहता था । तव वैद्यने दो-विख तीन सौ गोलियां उसे दीं कि एक - एक गोली गिलासमें डालकर फिर मद्य पिया करो । पिछली गोलियां उसमें पड़ी रहें । दूसरा गिलास पीनेपर फिर नई गोली डाल लिया करो । इससे बह 1 से भद्यप यह समझता था कि — मैं गिलास भरकर पी रहा हूँ, पर गोलियां भी अपना स्थान लेकर उसका मद्य धीरे - धीरे कम हो करवा रही हैं - यह वह न समझ सका । यही बात यहां पर भी कर समझ लेने पर फिर आक्षेपका अवकाश नहीं रहेगा । परि- भित संख्याविधि से एक शान्त - द्विजसे उसका सम्बन्ध होनेपर वह श्र धीरे - धीरे नारकीय - कुकृत्यसे दूर होती जायँगी; बल्कि - वहां नि वेश्याओं को भी ' व्यभिचारो न कर्तव्यः स्वामिना सह कर्हिचित् ' जा ( २८ ) व्यभिचार से दूर रहनेका आदेश किया गया है, पर वादी उन गुणोंको छोड़कर केवल छिद्र - दर्शनमें ही रुचि रखते हैं । पर इसके अतिरिक्त आक्षेप्तागण अपने घरको तो देखते नहीं, इस जहां वे विधवाको भिन्न - भिन्न ११ पतियोंसे संयुक्त करवाके उसे वेश्याका नवीन- संस्करण बनाया करते हैं; जिसके लिए स्वा.द.के मनमें भी यह प्रश्न उपस्थित हो आया कि - १ ' यह नियोगकी ' बात व्यभिचारके समान दीखती है, २ यह तो वेश्याके सदृश कर्म Gujarat, An eGangotri Initiative