सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 331–340

सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 331–340

पृष्ठ 331

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) श ६४२ है, तो श्रीराधाका स्वकीय - छाया निर्माण ' पागलपन'की बात न शावतारा व्यवहार हुई; किन्तु क्रियात्मक बात हुई । योगविद्या न माननेवाला इसे ' पागलपन'की बात कहे, यह सम्भव है । वववव निटेली- इस प्रकार जब मुक्तात्माओं में आत्माके विभुत्वसिद्धान्तवश, के छेद तथा योगियोंके योग – सामर्थ्य तथा सत्य - संकल्पवश अनेक होता शरीरोंका निर्माण हो जाता है, तो नित्यमुक्त, सत्यसंकल्प, योगे-पने - आप वरेश्वर ( भाग १० २२८ ) परमात्मा ( पृ. ७ ) श्रीकृष्ण तथा उनकी तारके हो नित्यशक्ति राधामें स्वतः योगशक्ति होनेसे उसमें निर्मूल तर्कका फिर अन्य उपस्थापन परमात्मा की सर्वशक्तिमत्ताका अपलाप तथा दर्शनोंसे होता है । अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना है । यदि वादीके अनुसार अपने परमात्मा भी सृष्टिनियमविरुद्ध कार्य नहीं कर सकता; तब तो नहायोगी बहु वादीके अनुसार सृष्टिमें व्यापक भी नहीं हो सकता । कर देता क्योंकि - वादी उसे अभिन्न - निमित्तोपादान कारण तो मानते नहीं, शरीर भी किन्तु केवल निमित्तकारण मानते हैं; तब निमित्तकारण कार्य में करनेकी व्यापक नहीं हुआ करता । भूषणका निमित्तकारण सुनार तथा त नित्य- घड़ेका निमित्तकारण कुम्हार भूषण तथा घड़े में सर्वव्यापक नहीं होते; तब निमित्तकारण- परमात्मा भी सृष्टिरूप- कार्य में कभी सज्जनने सर्वव्यापक नहीं हो सकता । यदि वह सर्वशक्तिमत्तासे निमित्त-- विभूति- कारण होनेपर भी सृष्टि - नियमविरुद्ध सृष्टि- कार्य में व्यापक हो प यों ही सकता है, तब वह अपनेसे निर्मित बहुशरीरोंको भी अपनी क्रियात्मक शक्तिसे सचालित कर सकता है; जब योगी पुरुषमें ऐसी शक्ति जब ऐसा प्रतिहत नहीं; तब योगेश्वरेश्वर ( भागवत १० २६१६ ) श्रीकृष्ण shi बहुशरीर - निर्माण ६४३ Collection Gujarat. एवं राधामें वह शक्ति प्रतिहत कैसे हो सकती है? वादीके श्रद्धेय स्वा.द.जीने भी ' अग्ने! सहस्राक्ष! शतमूर्धन! शतं ते प्राणाः सहस्रं व्यानाः । त्व ँ सहस्रस्य राय ईशिषे ' ( यजुः १७/७१ ) इस मन्त्रके संस्कृत तथा हिन्दीभाष्य एवं भावार्थ में कहा है-' यो योगी तपश्चादि - साधनैर्योगवलं प्राप्य अनेक प्राणिशरीराणि प्रविश्य अनेकनेत्रादिभिरङ्ग दर्शनकार्याणि कर्त्तुं शक्नोति, अनेकेषां पदार्थानां धनानां च स्वामी भवति ' । ' जो योगी पुरुष तपः - स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान आदि योगके साधनोंसे योग-के बलको प्राप्त हो अनेक प्राणियोंके शरीरोंमें प्रवेश करके अनेक कार्योंको कर सकता है । जो योगी होता है, वह योगके साधनोंको प्राप्त करके सहस्रों जीवोंके शरीरमें प्रवेश कर जाता है । सहस्रों नेत्रोंसे देखना आदि चेष्टाको एक ही समय करता है, सहस्रों पदार्थों का स्वामी एक ही समय होता है ' । तब रासक्रीडामें प्रत्येक गोपीके साथ श्रीकृष्णका होना, १६१०८ स्त्रियोंका एक साथ स्वामी होना, उनके घरमें एक साथ रहना - यह श्रीकृष्णकी सत्यसंकल्पता वा आप्तकामता तथा पूर्णकामतावश सिद्ध हो जाता है, इस प्रकार उसकी नित्यशक्ति- राधाका भी अपनी दूसरी छायाका निर्माण तो क्या कठिन है? इसमें किसी दीर्घदर्शीको किसी शङ्कापङ्कमैं निमग्नताका अवकाश प्राप्त नहीं, हाँ अल्पश्रुतता हो, वा अल्पज्ञता, अथवा बुद्धि संकुचित हो; वा उसमें साम्प्र-दायिक - पक्षपातका आवरण हो; वा खण्डनका चसका लगा हो; तब तो क्या कहना? जैसे सृष्टिकी आदिमें अयोनिज उत्पत्ति-An dangotri Initiative '

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६४४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) बालोंकी अपनी अयोनिज - भगिनियोंसे विवाह होनेपर भी उसे दोष नहीं माना जाता; क्योंकि उसमें भला मैथुनोत्पत्तिवाले पुरुषोंकी मर्यादाओंका बन्धन कैसे लागू हो? वैसे दिव्य अयो-निज शरीरवाले श्रीकृष्ण - राधा तथा गोपियोंमें लौकिकमर्यादा-विरुद्ध कोई कृत्य प्रतीत होनेपर भी वहाँ लौकिक - उत्पत्ति न होनेसे मानुष - दृष्टिकोणवाला कोई भी दोष नहीं लगाया जा सकता है, नहीं तो आजकलके मनुष्योंको भी परम्परया आरम्भिक अमैथुन - योनिक स्त्री - पुरुषोंकी सन्तान होनेसे भाई-बहनके मैथुनसे उत्पन्न अतएव व्यभिचारज मानना पड़ेगा । पर जब उस अमैथुनयोनितामें यह दोष नहीं लगाया जा सकता; वैसे दिव्य - जन्मवाले श्रीकृष्ण पर भी कोई दोष नहीं लगाया जा सकता । ( १७ ) आगे वादी यवन आदि शब्दों के प्रयोगसे पुराणोंको मुसलमानी वा अंग्रेजी जमाने में बने हुए मानता है, यह भी उसकी अल्पश्रुतताका फल है । ' यवन ' शब्द ' अष्टाध्यायी ' ( ४/१/४६ ) में भी आता है, तो क्या वह मुसलमानी जमानेमें बनी? स्वा. द. जी ( स.प्र. ११ समुल्लास ) के आरम्भिक — कथन के अनुसार सृष्टिकी आदिमें बनी हुई मनुस्मृतिमें भी ' यवन ' शब्द ( १० | ४४ ) आया है, जो यहांकी धर्मभ्रष्टा क्षत्रिय जातिको बता रहा है, तो क्या मनुस्मृति भी मुसलमानी जमानेमें बनी? भगवान् कृष्णने ' कालयवन ' को मरवाया था, जिसने मथुराको घेर लिया था, आश्रमों और यमुना आदि नदी - तीर्थों पर CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या पुराण अर्वाचीन हैं? ६४६ ६४५ अधिकार कर लिया था ( भाग १०/५२/५ ), तब क्या क्षत्रिय मुसलमान था, वा मुसलमानी जमाना था? ' यवनैः सहितो वह १०/४३ राजा भगदत्तो महारथः ' ( महाभा. सभापर्व ५१३३ ) अर्वाच यहां भगदत्तका यवनोंके साथ राजसूययज्ञमें आना लिखा है महाभ । स्वा.दु.ने स.प्र. ११ समु.के आरम्भ में यवनराजाका महाभ युद्ध तथा राजसूययज्ञमें सेवार्थ आना लिखा है । तव क् किया महाभारतका जमाना मुसलमानी जमाना था? आश्रमोंको तो क अपने ही जाति - भ्रष्ट उन्हीं यवनोंने छीना हो, जिनका वर्णन क्योंक मनुस्मृति तथा महाभारतमें आया है, इनमें क्या असम्भव है? विक्टो जैसे कि आजकल मद्रासमें अब्राह्मण ब्राह्मणोंकी हानि कर रहे पादरी हैं, उनकी जायदादें मठ आदि छीन रहे हैं, या फूंक रहे हैं: बादी क तब क्या वे मुसलमान हैं? मुसलमान तो ' मौहम्मद ' हैं । युधिष्टि ' यवन ' नहीं, यह वादी अवश्य याद रखें । आज अन्त्यज, द्विज़ोंके हैं - इस देव - मन्दिरोंमें प्रवेश करके उनसे उन्हें एक ढंगसे छीन रहे हैं, जमान क्योंकि वे अनधिकारियोंका प्रवेश हो जानेसे हिन्दुओं के लिए के साथ नहीं रह गये । आर्यसमाजी भी वैसा करनेमें सहमत हैं, और वृत्त इस मूर्तिपूजाका प्रचार करते हुए शास्त्रार्थ करनेकेलिए लंगोटी पुराण बांधकर अपने तैयार होनेकी झांकी दिखलाया करते हैं? तब संहिता क्या वे मुसलमान हैं? यद्यपि आजकल इन्हें यवन नहीं कहा श्राजक जाता; क्योंकि यह अपनी ही प्राचीन धर्मभ्रष्ट जाति थी, कई ( ग फरी क्षत्रिय जातियोंको ही धर्मभ्रष्टतावश ' यवन ' कहा गया था, पुरणका जैसे कि – ‘ कम्बोजा यवनाः शकाः । शनकैस्तु क्रियालोपादिमाः Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ६४५ ६४६ क्षत्रियजातयः । वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणानामदर्शनात् ' ( मनु. या बद्द / ४३-४४ ) परन्तु मुसलमान आदि जातियां वैदेशिक तथा सहितो अर्वाचीन १० हैं - यह ' यवन ' नहीं । पुराणका काल तो द्वापर है, जो ३ ) हां पूर्व है । यहां वादीका पक्ष दुर्बल है । खा है । महाभारतसे ( ख ) स्वा. द. जीने ' तरुतारं रथानाम ' में ' तारयन्त्र का ' वर्णन हाभारत किया है - देखिये उनकी ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ( पृ. २१० ) में । क्या तो क्या वेद भी अँग्रेजी जमानेमें बने मान लिये जायेंगे, श्रमको क्योंकि- तार - यन्त्रका निर्माण अंग्रेजोंने इसी शताब्दी में वर्णन विक्टोरियाके समय किया । धूम्रपानके विषयमें अमरीकन भव है! कर रहे पादरीका तमाखू लाना वादी अकबर के राज्यमें कहते हैं, रहे हैं बादीके गुरु सत्यार्थप्रकाशके ११ वें समुल्लासके आरम्भमें द ' हैं । युधिष्ठिरके यज्ञमें अमेरिकाके राजा बभ्रुवाहनका आना कहते द्विजकि है - इसकी माता अर्जुनसे विवाही थी, यह पुराण- महाभारतका रहे हैं, जमाना था । व्यासजी भी अर्जुनके इस विवाह समयमें बारात-त्रोंके लिए के साथ अमेरिका गये हों, वा अर्जुनसे ही वहां तमाखूकी लतका हैं, और वृत्त सुना हो, और पुराणोंमें उसका खण्डन कर दिया हो; तब - लंगोटी पुराण आजकल के कैसे हो जायेंगे? धूम्रवर्तिका पीना चरक-? तब संहिता में भी आया हैं, तब वादी वेदके उपवेद आयुर्वेदको भी नहीं कहा श्राजकलका बना हुआ मान लेंगे? थी, कई ( ग ) जो कि वादीने ' रविवारे च सण्डे च फाल्गुने चैव गया था, फर्वरी ' यह अंग्रेजी शब्द पुराणमें बताये हैं; यह वादीने भविष्य-पादिमाः पुराणका उद्धरण दिया है । वादी जानते हैं कि - ' भविष्य ' किसे CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. श्रीकृष्णका सुदर्शनचक्र ६४७ कहते हैं? सो पुराणने उस भविष्य में आनेवाली अंग्रेजीका पांच हजार वर्ष पहले ही निरूपण कर दिया; इससे पुराणकी महत्ता सिद्ध हो जाती है, वा अंग्रेजी राज्यमें बनना? बादी वेदोंमें ' सूर्याचन्द्रमसौ धाता ' में सूर्य - चन्द्र आदिका वर्णन देखकर वेदको सूर्यचन्द्रके बाद बना हुआ अतएव आदिमान् मान लेंगे? तब तो स्वा. दु. के अनुसार तारयन्त्रका ऋग्वेदसं. में वर्णन आनेसे विक्टोरियाके समयमें वादी ऋग्वेदका निर्माण मान लेंगे! इस तरह तो वेद पुराणसे भी पीछेके सिद्ध हुए, साधु!!! ( १८ ) आगे वादीने कई अप्रकृत बातें लिख डाली हैं कि-' भागवतमें १८००० पद्योंकी जगह १४१८० श्लोक मिलते हैं, ४००० लोक निकाल डाले गये ' इससे तो वादीने अपने पक्षका खण्डन कर दिया; क्योंकि वादी उसमें प्रक्षिप्तताएँ मानते हैं; यहां तो उल्टा न्यूनता हो गई । हां, १८००० के स्थान २०००० हो जाते; तब तो वादीका प्रक्षिप्तताका बहाना बन सकता था; अब कैसे बने? वस्तुतः आपको इस विषयमें शास्त्रीय शैलीका ज्ञान मालूम नहीं होता । श्लोककी अक्षर संख्या ३२ होती है । तो सब अक्षरोंको जोड़कर, जिनमें पुष्पिका भी होती है, ' उवाच ' भी साथ होता है, उन सबको गिनकर ३२ से भाग दें, तो वह संख्या पूरी हो जाती है । ' वृत्तरत्नाकर ' में श्लोकसंख्या १३६ लिखी है, वह इसी शैलीसे पूरी होती है । वादी लिखता है - ' व्यास ऋषिने पुराणोंको बनाया ' एक पागलपनकी बात है; क्योंकि पुराण में स्वयं लिखा है — ' धूर्तेः An eGangotri Initiative

पृष्ठ 334

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६४६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) पुराणचतुरैः हरिशङ्कराणां सेवापराश्च विहिताः तव निर्मितानाम् ' ( देवीभागवत ) यदि वादी यह बात ठीक मानते हैं; तब क्या पुराण बनानेवालोंने ही अपने आपको ' धूर्त ' लिख दिया? यदि वादी पुराणकी बात ठीक मानते हैं; तो उनमें ' अष्टादश-पुराणानां कर्ता ( वक्ता ) सत्यवती- सुतः ' यह स्थान - स्थान पर आता है; तब उसका एकदेशीवचन - जो निन्दार्थवादरूपसे कहा गया है - प्रत्युक्त हो जाता है । वस्तुतः पुराण अनादि हैं, प्रत्येक द्वापर में श्रीव्यास तो उनका सम्पादन करते हैं । अनादि होनेसे ही वेदोंमें भी पुराणका निर्देश आता है । देवीभागवतका उक्त कथन देवीका प्रशंसार्थवाद है; पर वादी इन शास्त्रोंके वचनोंका रहस्य क्या जानें? अथवा जानकर भी उन्होंने उन्हें छिपा लेना ही है । क्योंकि उनने तो केवल खण्डन ही करना है । ( ख ) आगे वादी नामकीर्तन -प्रणालीको गलत कहते हैं; और ' अपहाय निजं कर्म कृष्ण - कृष्णेति वादिनः । ते हरेद्वेषिणः पापाः ' यह पुराणका पद्य देते हैं - यह भी कर्मका प्रशंसार्थवाद है कि - कर्म भी करो और कृष्णनामकीर्तन भी करो; पर आप इन बातोंको क्या जानें? आपके मान्य गीतोपदेष्टा भगवान्-कृष्णने भी स्वयं ' मामनुस्मर युध्य च ' ( गीता ८७ ) में संसारी कारोवार ( युद्ध ) के साथ अपना स्मरण भी आदिष्ट किया है । ‘ सततं कीर्तयन्तो माम् ' ( ६१४ ) कहकर भगवान् कृष्ण, कृष्णका कीर्तन भी आदिष्ट करते हैं; ' स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ' ( १८ । ४६ ) में अपने कर्मका आचरण भी बताते हैं । CC - 0. Ankur Joshi Collection नाम - कीर्तनको वैदिकता ६१६ ६५० नाम - कीर्तन तो वैदिक है । देखिये इसपर वेदकी साक्षी-' आस्य नाम चिद् विवक्तन ' ( ऋ. १११५६।३ ) यहां विष्णुका ' कुर्बन नाम - कीर्तन कहा है । स्वा.द.जीने भी यजुः १०/२० मन्त्र के अर्थप लिखा है कि - ' आपका जो दुःखों से छुड़ानेका हेतु उत्तम नाम है । मन्त्र 1 निषेध कुछ अन्य वेदमन्त्रोंकी साक्षी भी देख लीजिये - ' सदा ते नाम स्वयशो विवक्मि ' ( सामवेदसं ० २० | ३ | ४ | २ ) यहां परमात्माका नामकीर्तन कहा गया है । ' मनामहे चारु देवस्य नाम ' ( ऋ. सं ० निकम १ | २४ | १ ) ' मर्त्या अमर्त्यस्य ते भूरि नाम मनामहे ' ( ऋ. ८ १११५ ) छन्द इसल यहां परमात्माके नामका आम्नान- अभ्यास ' अर्थात् कीर्तन मात्रा सूचित किया गया है | ' विश्वा हि वो नमस्यानि वन्द्या नामानि ' बनें, ( ऋ. १० | ६३ | १ ) यहां पर परमात्मा के सभी नामोंका वन्दन- ' पौरा कीर्तन माना गया है । ' चारु इन्द्रस्य नाम ' ( ऋ. ६।१०६।१४ ) आदि यहां पर इन्द्रके नामकी मनोहरता मानी गई है । ' यत् ते अना-धृष्टं नाम यज्ञियम् ' ( यजु: ५।६ ) यहां नामकी अधृष्यता - दुर्द- मान्य मनीयता तथा यज्ञयोग्यता बताई गई है । ' नामानि ते शतक्रतो! और विश्वाभिर्गीर्भिरीमहे ' ( अथर्व ० २० | १६ | ३ ) यहाँ भी भगवान्‌का दोषो नाम - कीर्तन समर्थित किया गया है । अथर्ववेदसंहितामें भी बातः कहा है- ' नाम नाम्ना जोहवीति पुरा सूर्यात्पुरा उषसः ' ( १० | तब क ७ । ३१ ) यहां ब्राह्ममुहूर्तमें नामसंकीर्तन कहा गया है । ' यत् ते नाम श्राध्य सुहवं ' ( अथर्व. ७/२०/२१ ) ' नाम उपास्स्व ' ( छान्दोग्य ७ | | १ ४ ) तथा यहां पर नामोपासना बताई गई है । जब वेद इस प्रकार नाम- लौकि कीर्तनकी आज्ञा दे रहा है; तब वेदकी व्याख्या- रूप पुराण उससे उनकी Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 335

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ६४६ ६५० कैसे लिख सकता है? ' तब स्पष्ट है कि उक्त पुराण पद्य साक्षी- विरुद्ध वेह कर्माणि जिजीविषेच्छत ं समाः ' ( यजुः ४०/२ ) इस विष्णुका ' मन्त्रमें प्रोक्त स्वकर्मानुष्ठानका प्रशंसार्थबाद है, नाम - कीर्तनका नाम है । निषेधक नहीं । नाम ( ग ) आगे ' अवतारोंकी फेहरिस्त ' के विषयमें वादीकी कई नात्माका निकम्मी बातें हैं, उनका मूल्य उपहाससे अधिक नहीं । श्लोकोंमें ( ऋ. सं ० छन्द आदिके कारण अवतारोंके नाम आगे - पीछे हो सकते हैं, = १११५ ) इसलिए वहाँ कहा जाता है कि - ' प्रथमद्वितीयादि - शब्दा निर्देश-- मात्रापेक्षया, न तु क्रमापेक्षया ' । वादी पुराणोंके निष्पक्ष पाठक नामानि ' बनें, यह सब बातें उनकी समझमें आजाएँगी । और जो वादीने वन्दन- ' पौराणिकानां व्यभिचारदोषो ' पुराणकर्ता व्यभिचारजातः ' - ०६/१४ ) यदि लिखा है; सो उनका नियोग भी व्यभिचार सिद्ध होगया । अना- और यह श्लोक किसी प्राचीन मान्य- पुरुषका तो है नहीं; तब ता - दुर्द- मान्य कैसे हो सकता है? इसी तरहके श्लोक तो और लोग भी तक्रतो! और ढंगसे बना दिया करते है जैसे- ' सामाजिकानां व्यभिचार-वान्का दोषो नाशङ्कनीयः कृतिभिः कदाचित् । दयादिनन्दो व्यभिचार-भी जातः; तस्यानुगाश्च व्यभिचारजाताः ' ( देखिये शाखार्थ - पञ्चक ) : ' ( १० | तब क्या आप इस लोकको प्रमाण मान लेंगे? शेष हैं पुराणोंके म आध्यात्मिक अर्थ, सो जैसे वेदमें आध्यात्मिक, आधिभौतिक ७ | १ | ४ ) तथा आधिदैविक अर्थ तथा समाधि - भाषा, परकीया तथा - नाम- लौकिकभाषा यह तीन भाषाएँ होती हैं, वैसे पुराणोंमें भी । तब IIII उनकी आध्यात्मिक व्याख्या भी हो सकती है । उसका उत्तर न CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. देवपूजा श्रङ्गपूजा ६५१ बन सकनेपर वैसे अर्थ करनेवालेको गाली देने लग जाना ' अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकुर्वते ' इस लोकोक्तिका अनु-सरण करना है, और प्रत्युत्तर दे सकने में अपनी अशक्ति प्रकाशित करना है । ( १६ ) वादी यह भी लिखते हैं- ' पुराणांने एक ईश्वरके स्थानपर हजारों देवी - देवताओंकी पूजा कौममें जारी की ' यह कहना अपना वेदका अनध्ययन सूचित करना है । देवता परमात्माके अङ्ग होते हैं । देखिये आपकी मान्य भगवद्गीता क्या कहती है — ' इहैकस्थं जगत् कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् । मम देहे गुडाकेश! ' ( ११।७ ) यहाँ भगवानके देहमें सब जगत्की स्थिति बताई गई है । उसमें ' पश्यादित्यान् वसून् रुद्रान् अश्विनौ मरुतस्तथा ' ( ११ | ६ ) यहाँ उसी परमात्माके शरीर में विविध देवताओं की स्थिति बतलाई गई है । ' पश्यामि देवस्तव देव! देहे ' ( ११।१५ ) यहाँ भी भगवानके शरीरमें अङ्गभूत देवताओंकी स्थिति मानी गई है । ' यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा यंगे गात्रा विभेजिरे । तान् वै त्रयस्त्रिंशद् - देवान् एके ब्रह्मविदो विदुः ' ( १०/७/२७ ) इस अथर्ववेदसं ० के मन्त्रमें भी देवता अङ्गी - परमात्माके अङ्ग बताये गये हैं । सो श्रङ्गीको पूजा, बिना अङ्गोंके नहीं हो सकती । आपकी ही किसीने पूजा करनी हो; तो आपका शरीर तो आप नहीं है, आत्मा ही आप हैं । सो आत्माकी पूजा होनी तो सम्भव नहीं, तब आत्माके शरीरके किसी अङ्गके द्वारा ही उसकी पूजा होगी । इसी प्रकार देवता भी अङ्गी परमात्माके An eGangotri Initiative

पृष्ठ 336

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६५२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) अङ्ग हैं; उन्हीं अङ्गी - देवताओंके द्वारा भगवान् की पूजा होती है - इस बहुदेवतावादका प्रवर्तक वेद ही है । यहाँ अवकाश नहीं कि- इस विषयको हम वेदसे प्रतिपादित करें, इस विषय में हम वेदसे ही न्यूनसे न्यून २५ पृष्ठका मैटर दे सकते हैं; पर स्थानाभाव होनेसे हम उसे नहीं लिख रहे । वेद स्वयं कहता है- ' न मडिता विद्यते अन्य एभ्यो देवेषु मे अधिकामा अयंसत ' ( ऋ ० १०६४/२ ) अर्थात् – देवताओं-जैसा सुखदायक कोई अन्य नहीं, इसलिए मेरी कामनाएँ देवताओंमें हैं । ' सर्वोन स देवान् तपसा पिपर्ति ' ( अथर्व ० ११ | ५ | २ ) यहाँपर देवताओंकी तपस्या करनी सूचित की गई है । ' यजाम देवान् यदि शक्नवाम ' ( ऋ ० ११२७/१३ ) यहाँ शक्ति होनेपर देवताओंकी पूजा करना बताया गया है । मनुस्मृति भी देवपूजा पर बल देती है - ' नित्यं स्नात्वा शुचिः कुर्याद् देवर्षिपितृतर्पणम् । देवताभ्यर्चनं चैव ' ( २।१७६ ) ' तेन मां दे॒वाः! तंपसा अवत इह् ' ( अथर्व. १६७२ ( १ ) यहाँपर देवताओं-से रक्षा माँगी गई है । ' प्रगायत अभ्यर्चाम देवान् ' ( ऋ. ६।६७ / ४ ) यहाँपर भी देवपूजा देवताओंका संगीतसे कीर्तन एवं पूजन माना गया है । ' एष ह वा अनद्धापुरुषो यो न देवान् अर्चति ' ( शतपथ. ६ | ३ | १ | २४, ऐतरेयत्रा. ७/२/८ ) यहाँपर देवपूजन न करनेवाले पुरुषकी निन्दा की गई है । ' देवान् वसिष्ठो अमृतान् ववन्दे ' ( ऋ. १० । ६५।१५ ) यहाँपर वेदने देवपूजनमें वसिष्ठका उदाहरण भी दिखला दिया । वादिप्रतिवादि मान्य भगवद्-" CC - 0. Ankur Joshi Collection देवपूजा, लिङ्गपूजा ( १४ गीता में तो इस विषय में बहुत स्पष्टता है । ' देव - द्विज पूजनं शारीरं तप उच्यते ' ( १७/१४ ) यहां विद्वानोंसे - गुरुयाइ शिव देवता की पूजा करना शारीरिक तप माना भिन्न अनु करना भी देवपूजा होती है, उसमें भिन्न - भिन्न देवताओंके गया है । यज्ञ जावे हुति देनी पड़ती है । उसी वेदादिशाखप्रोक्त देवताओंकी नामसे परम पुराणों बतलाई है । वादी भी तो ३३ देवता मानते पूजा जनव पूजते हैं, उनके नाम हवि तथा ग्रास तथा उन्हें । बादी देते हैं, इवनमें तथा पचा नामकरणादिमें वादी भिन्न - भिन्न वहुत देवताओंका बोलकर उन्हें हवि देकर उनकी पूजा करके वैदिक - वहुदेवतावाद नाम अङ्ग को अपनाते हैं, अपना उपालम्भ भी हमें देते हैं, खूब!!! वस्तु सो इसको केवल पौराणिक कहना अपना अल्प श्रुतत्व प्रकट दो करना है । ( ख ) जोकि वादी लिखते हैं- ' परमात्मा के स्थानपर श्रङ्ग . महादेवका लिङ्ग ( मूत्रेन्द्रिय ) जनतासे पुजवा डाला ' तो क्या पूजा वादी महादेवके सिरकी पूजा करेंगे - यदि हम इसकी आज्ञा दे दें? क्या वादी ' लिङ्ग का अर्थं केवल ' शिश्न ' ही जानते हैं? महादेव नहीं महान् देव परमात्मा ही तो हैं, उनका लिङ्ग ब्रह्माण्डका प्रतीक है । स्वा. दु.जीने लिखा है - ' परमात्माकी रचनाविशेष लिङ्ग जगत दैखकर परमात्माका प्रत्यक्ष होता है । ( स.प्र. १२ पृ. २६८ ) सो शिवलिङ्ग शिवपरमात्माकी रचना ब्रह्माण्ड है, उसकी पूजा न तो महादेवकी पूजा होती है । उस लिङ्गमें वादी भी तो शामिल हैं । तब महादेवके लिङ्गसे वे क्यों डरते हैं? अथवा शिवलिङ्गको है, Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 337

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ( १४ लिङ्ग तथा जलहरीको पार्वतीका ' भग ' भी आप लोगोंके ज गुरु - - याइ शिवका लिया जावे, और उनके पूजनीय होनेमें शङ्का की नसे अनुसार मान वादी यह जानें कि - ' जगतः पितरौ वन्दे पार्वती-ना है । यज्ञ जावे, तो उसपर होनेसे जगत्के जननी ( माता ) के नामसे परमेश्वरौ ' गौरी - शङ्कर परमात्मा ओकी जनक ( पिता ) हैं । जननी - जनकको पूजनीय कौन नहीं मानता? तथा पूजा बादी भी तो माता - पिताको पूजनीय मानते हैं । ( देखिये स.प्र.का इनमें उन्हें पचायतन - देवपूजाप्रकरण ) यदि ऐसा है तो उनकी पूजा किसी तथा त्रका नाम श्रृङ्गके द्वारा ही तो होगी । बतलाइये कि - पिताका जनकत्व देवताबाद बस्तुतः किस अङ्गमें होता है? और माताका जननीत्व वस्तुतः हैं, खूब!!! किस अङ्गमें होता है? आपका उत्तर भी यही होगा कि यही तत्व प्रकट दो अङ्ग भग - लिङ्ग ही वस्तुतः जननी जनक हैं । तब माता - पिता को यदि पूजनीय माना जाता है, और उनकी पूजा उनके किसी अङ्गकी पूजासे होती है तो उनकी वास्तविक पूजा इन्हीं अङ्गोंकी स्थानपर ' तो क्या पूजासे सम्पन्न होगी । पर प्राकृत शरीर होनेसे अपवित्रतावश ज्ञा दे दें? लोकमें इन अङ्गोंकी पूजा व्यवहारमें नहीं होती, अतः लोकमें ? महादेव नहीं की जाती, ( छुआछूत न माननेवाले होनेसे आप लोगोंको डका प्रतीक तो इन अपवित्र - अङ्गोंकी पूजासे कोई घृणा होगी नहीं ) पर विशेष लिङ्ग जगत्के जननी - जनक पार्वती - परमेश्वर पवित्र देवता होनेसे २६८ ) सो उनके यह दोनों अङ्ग भी पवित्र हैं, अतः उनकी पूजामें भी कोई की पूजा न तो दोष है, और न उपहसनीयता । यह लिङ्ग - योनि अङ्ग कहां मिल हैं । नहीं हैं? सर्वत्र हैं; पर मनुष्योंके इन अङ्गों में लज्जा मानी जाती वलिङ्गको है, अन्यत्र नहीं । इस प्रकार देवताओंके में भी कुछ CC - 0. Ankur Joshi श्रीकृष्णका सुदर्शनचक्र ६११ Collection Gujarat. उपहसनीयता वा लज्जाकी बात नहीं; क्योंकि वे मनुष्य नहीं । इससे वादीका ' शिवलिङ्ग - पूजारहस्य ' भी प्रत्युक्त होगया । ( ग ) यागे वादी लिखते हैं कि- ' विदेशी - देवता विष्णु - शिव वा गणेश जो कि सर्वथा कल्पित हैं; हिन्दुओंको उनका गुलाम बना डाला ' यह कहना भी गलत है । ऊपरके लोक द्युलोक हैं, वे उच्च हैं; उनमें इन देवताओंका निवास है । हम उन्हीं में गमनार्थं जप - पाठ - तपस्या करते हैं; अतः वे हमारे लिए विदेश नहीं । विष्णु, शिव, गणेश कल्पित विदेशी - देव नहीं, किन्तु वैदिक तथा आर्य देव हैं, इस विषयमें पञ्चम - पुष्प देखिये । नाम - कीर्तन बहुत लाभ देता है, ' यथा नाम तथा गुणः ' भगवान्‌के गुणानुसार ही भगवान्के नाम होते हैं । नामकीर्तन करनेसे नामके उन गुणोंका हम पर भी प्रभाव पड़ता है । नामके बिना तो संसार में व्यवहार ही नहीं चल सकता । बादीने भी अपनी पुस्तकमें अपना नाम अपनी पूजार्थ ही लिखा है । नामी के साथ नामका अनिवार्य सम्बन्ध हुआ करता है । सनातनधर्म मनुष्यके नामका जप नहीं बताता; किन्तु परमात्मा के नामका जप वताता है; ॐका जप भी परमात्माके नाम होनेसे ही होता है । यह जो वादी कहते हैं कि - ' महापुरुषोंका आदर्श अपने जीवनमें उतारना ही उनका भक्त होना है ' यह बात वादीकी प्रायः ठीक नहीं, महापुरुषोंके भी सारे आचरण गृहीत नहीं होते । उनके महापुरुष स्वा. दु.जी हैं; वे हुक्का पीते थे, भांग पीते थे, An eGangotri Initiative

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६१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) आप क्या पी सकते हैं? वे बाल्यावस्था में मूर्तिपूजक रहे; तो आप अपने लड़केसे भी शिवलिङ्गकी पूजा करावेंगे न? स्वामीजी पूर्व आयुमें संन्यासी बन गये थे; आप क्यों नहीं उनका यह आदर्श लेते? एतदादिक वादीकी बातें केवल समयके नाशार्थ तथा साधारण - जनताको भ्रान्तिमें डालनेकेलिए हैं- इनका अन्य कुछ भी लाभ नहीं । किसी भी महापुरुषके लोकोत्तर एवं लोक-विरुद्ध चरित्र अनुकरणीय नहीं होते । चरित्रोंका सभी अनुकरण करते ही हैं । कोई बात नहीं । परन्तु भक्ति महापुरुषकी परमात्मा वा उनके अवतार वा अङ्ग हुआ करती है । सनातनधर्म मनुष्यकी बताता । श्रीमाधवाचार्यजीने ' राम ' का अर्थ ' नहीं किया । वे तो कहते हैं कि - रमणका शेष लोकोचित उनके इसमें कहने - सुननेकी भी नहीं होती, किन्तु किसी देवताकी भक्ति भक्ति - उपासना नहीं विषयानन्दी ' कहीं भी अर्थ क्रीडा होता है, मैथुन नहीं । अतएव सनातनधर्मी ' हरे राम हरे राम ' का कीर्तन करते हैं; क्योंकि - भक्त उसमें रमण क्रीडा करते हैं । अतएव यहां ‘ राम ' परमात्मा हैं । पर आप कहते हैं कि नहीं, ' रमण ' का अर्थ ' मैथुन ' है । तव आक्षेपकर्ता आपको उन्होंने कहा कि-आपका नाम ' श्रीराम ' है, तब ' रमन्तेऽस्मिन् ' इसकी व्युत्पत्ति होनेसे ' लोग आपमें मैथुन करते हैं ' यह अर्थ होगा क्या? इस प्रकार वादीके सहवर्गी ' रामसहाय ' जीका क्या ' मैथुन - सहायक ' अर्थ होगा? यदि नहीं; तब वादी ' हरे राम हरे राम ' का गन्दा अर्थ कैसे कर सकता है? सनातनधर्मी तो श्रीकृष्ण वा CC - 0. Ankur Joshi Collection गोपियों का वखापहार ६२० ६ श्रीराम ' रमण ' का वादी के अनुसार गन्दा अर्थ नहीं करते लोग ही वैसा अर्थ करते हैं? अतः सनातनधर्मियों; श्रप पर बो इस विषय में कोई दोष नहीं आता । पर वादीके नाम पर तो वही न दोष सवार हो जाता है । इस प्रश्न का उत्तर बादी न दे सका जी अन्तमें गाली देने पर उतर आया । यदि ऐसा अर्थ ' रमण ' का उप नहीं; तब वादी भी श्रीकृष्ण तथा श्रीरामके विषय में पुराणमिं ' रमण ' का अर्थ मैथुन नहीं कर सकता । है-( २० ) गोपियोंके वस्त्र उठानेका उत्तर पूर्व दिया जा चुका है । जो कि वादी कहता है कि - ' जमुना में स्नान करती हुई गोपियोंके ज वस्त्र चुराने वा उनके गुप्ताङ्गोंके नग्न दर्शन करने, उनसे मजाक रा करनेको यह उनका पवित्र उपदेश देना मानते हैं ' ( पृ. ३३ ) । ७ जबकि श्रीमद्भागवत श्रीकृष्णको परमात्मा कहता है, तब क्या परमात्मा नग्नता नहीं वह तो पशु -देखा करता व्यभिचारी भी वादीका थीकृष्णकी ‘ पश्यत्यचक्षुः ' ( श्वेताश्व ० ३ १६ ) सब स्त्री - पुरुषोंकी व देख रहा? तो क्या इससे परमात्मा पापी होता है! पक्षियों, मनुष्यों आदि सब स्त्री - पुरुषोंकी जननेन्द्रियां है, और उनमें रहता भी है; तब क्या वह पापी वा है? यदि है, वा नहीं है; तब परमात्मा - श्रीकृष्णपर कह दिया दोष व्यर्थ है । मानुषी दृष्टिसे भी उस समय अर आयु ६-७ वर्षकी थी, व्रजबालाओंकी भी यही वा आयु थी - यह हम पूर्व बता चुके हैं; तव इसमें वादीके सब वस आक्षेप कट जाते हैं । इस बाल्यावस्था की नग्नता कोई मायने नहीं रखती । बल्कि वहां तो लिखा है- [ १ Gujarat. An Galative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ६५७ ६१८ करते ‘ वदुध्वांऽजलिं मूर्ध्नि अघनुत्तर्येऽह्सः, कृत्वा नमोऽधो, बसनं यों; आप प्रगृह्यताम् ' ( १०/२२/१६ ) इसका अर्थ है - ' अधः अधस्ताद भूमौ पर तो तो नमः कृत्वा - नीचे भूमिपर झुककर जलदेव वरुणको माथेमें अञ्जलि वहीं न दे जोड़कर नमस्कार करो, जिससे तुम लोगोंका जलमें वरुणदेवकी सका रम उपस्थिति में उनकी अवहेलना - स्वरूप नग्न स्नान करनेका पाप ' का पुराणोंमें मिट जावे; और अपने वस्त्र ले लो ' । इस पद्यका अन्वय यह है — अंहसः अघनुत्तये, अधः [ भूत्वा ] मूर्ध्नि अञ्जलिं बद्ध्वा, नमः कृत्वा, [ स्वकीयं ] वसनं प्रगृह्यताम् ' । तब भूमिपर झुककर T चुका है । गोपियोंके जलदेव वरुण के आगे - जिसे वेद भी मानता है - ' यासां [ अर्पा ] नसे मजाक राजा वरुणो याति मध्ये सत्यानृते अवपश्यन् जनानाम् ' ( ऋ.सं. ( पृ. ३३ ) । ७ । ४६।३ ) [ इस मन्त्रका देवता ' आप ' है ] नमस्कार करो, तब क्या क्योंकि तुमने नग्न स्नान करके उस वैदिक देवता जलदेव -पुरुषोंकी वरुणकी अवहेलना की है, जैसे कि - श्रीमद्भागवत में कहा है-होता है? ' यूयं विवस्त्रा यद्पो धृतव्रता व्यगाहतैतत् तदु देव - [ वरुण ] हेलनम् ' ननेन्द्रियां ( १० | २२ | १६ ) सो नमस्कार करनेसे वह जलदेव वरुण तुम्हारा पापी वा अपराध क्षमा कर देगा । यही बात वेदमें भी स्पष्ट शब्दों में श्रीकृष्णपर कही है — ' यो मृलयाति चक्रुषे चिद् आगो वयं स्याम बरुणे उस समय अनागाः ' ( ऋ.सं. ७ | ८७ | ७ ) अर्थात् जो वरुणदेव अपराध करने भी वाले पर भी नमन करनेसे मृलयाति - दया करता है; हम उस बरुणदेवमें निरपराध हों, यह उस वरुणदेवसे प्रार्थना करें ' । कई मायने सो उस प्रकरणमें ' कुमारिकाः [ भाग. १० | २२ | १ ) दारिकाः [ १० | २२ | १७ ] ‘ कुमार्यः ' ( १०।२२।५ ) यह शब्द वहां ' छोटी CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीकृष्णका सुदर्शनचक्र ६१६ लड़कियां ' बतला रहे हैं कि वह युवतियां नहीं थी, तब इसपर वादीकी की हुई आलोचना उसीके अपने दुर्भावको सूचित कर रही है, प्रकरण में कोई ऐसी बात नहीं । कोई इसमें छल वा अनुचित व्यवहार भी नहीं है । इधर वहीं श्रीकृष्णको ' योगेश्वरेश्वर ' ( १० | २२ | ८ ) कहकर परमात्मा कहा है; तब इसमें अनौचित्य क्या है? आशा है, यहां वादी अपनी भूल समम गया होगा । अव वादी बतावे कि यह पवित्र प्रेमका प्रतीक है? या वादीके शब्दोंमें ' हरामखोरी '? जैसी वादीकी बुद्धि होगी. वह वैसा ही उत्तर बताएगी । थोड़ी देरकेलिए मान भी लिया जाय कि - गोपियोंका श्रीकृष्णमें ' काम ' था; और श्रीकृष्ण उस कामका ' वर्धन ' करते थे, इसपर उत्तर पूर्व दिया जा चुका है । श्रीकृष्ण ' हृषीकेश ' ( गीता २ ( १० ) थे— ' इन्द्रियोंके स्वामी ' इन्द्रियां उनके वशमें थी । वे संयमी थे, उनका ' काम ' तो गोपियोंमें नहीं था । वे गोपियोंके ' अनङ्गका वर्धन ' वस्तुतः ' छेदन ' करते थे, जैसे कि - ' नाभिवर्धन ' ( मनु. २२६ ) का अर्थ ' नाभिछेदन ' होता है, ' दिया बढ़ा दो ' का अर्थ ' दीया बुझा दो ' है, वैसे यहां भी ' कामका छेदन ' अर्थ है । ' वर्ध छेदनपूरणयोः ' इस ' वर्ध ' धातुका ' छेदन ' अर्थ भी प्रसिद्ध है । इस विषयमें स्पष्टता पूर्व की जा चुकी है । ( २१ ) डा. श्रीरामजीके निबन्धका सर्वाङ्गीण, प्रत्यक्षर, प्रत्युत्तर समाप्त हो चुका; अव उनके प्रारम्भिक ' चैलेज ' में स्थित आलोचनासे बची हुई दो - तीन बातों पर कुछ लिखकर इस Gujarat. An eGangotri Initiative

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६६० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) निबन्धको समाप्त किया जाता है । वे यह हैं- ' सनातनी विद्वान् हमको गालियां देना, मुर्दोंके नामपर जनताको ठगकर मृतक-श्राद्ध खाना, ईश्वरावतार के नामपर भोले हिन्दुको सर्व व्यापक परमात्मासे विमुख बनाना, अथवा जड़ मूतियां पुजवाकरं मनुष्योंमें मूर्खताका प्रचार करना और ईश्वरपूजाके नामपर योनि - लिङ्गकी पूजा करना ही सीखे हैं, उन्होंने धार्मिक साहित्य-का विधिवत् स्वाध्याय नहीं किया है? । ( क ) इस पर निवेदन यह है कि यह जितने भी आक्षेप किये गये हैं; वे सनातनी - विद्वानों पर नहीं किये गये हैं, किन्तु वेदादि धार्मिक - साहित्यपर किये गये हैं; क्योंकि वादीने वेदादि-शास्त्रोंका विधिवत् पर्यालोचन किया हुआ मालूम नहीं होता । हमने इसपर विवेचन अपने इस ' श्रीसनातनधर्मालोक ' महा-ग्रन्थ में यत्र - तत्र किया है । यदि वादी इस ग्रन्थमालाको मँगाकर देखे, तो उसके ‘ यह सभी भ्रम दूर हो सकते हैं । योनि - लिङ्ग-पूजाका संक्षिप्त उत्तर इस निबन्धमें पूर्व दिया जा चुका है । मृतक श्राद्ध तथा मूर्तिपूजा यह दोनों सिद्धान्त वेदादिशास्त्रों से अनुगृहीत तथा तर्क सिद्ध हैं । कोई भी सम्प्रदाय इनसे छूट नहीं सका है । वादीका सम्प्रदाय भी इनसे नहीं छूटा । मृतकके नामसे जो कुछ अन्नदान - विद्यादान आदि किया जाता है, वह सब ' मृतक - श्राद्ध ' होता है । वादी लोग मृतक दयानन्द के नामसे जो विद्यालय, गुरुकुल आदि खोलते हैं; उनके नामसे जो एक बड़ी दुकान ( आ.स. ) खोल रखी गई है, उसमें मृतक - स्वामी के CC - 0. Ankur Joshi Collection मृतक श्राद्ध II ६६४ इष्ट वेदप्रचारके नामसे जो धन खींचा जाता है,: I दयानन्दकी आत्माकी तृप्तिकेलिए होनेसे यह सब मृतक श्राद्ध है । दयानन्द एक शरीर था; वह मर चुका । वादी लोग जो कि अपनी संस्थाओं का उस मुर्दा - दयानन्द से अभी भी वर्ष सम्बन्ध जोड़े हुए हैं; उसका जो स्थान - स्थान गुणकीर्तन करते हैं, उनकी पिता पुस्तक स ० प्र ० के कई प्रकारके संस्करण निकालकर वेदके समान बह बल्कि उससे भी बढ़कर उसे मान दे रहे हैं, यह सब मृतककी अन्त उपासना होनेसे वादी लोग अपने आपको, प्रेतपूजक — मुर्दापूजक घनदा सिद्ध कर रहे हैं; अथवा यदि मृतक दयानन्द के आत्मा से द्वारा सम्बन्ध रखकर वे यह सब कृत्य श्रद्धासे कर रहे हैं; तब भी वे मृतक श्राद्धके सिद्धान्त वाले स्वतः ही वन गये । चरित जितनी डी. ए. वी. संस्थाएँ हैं; तथा दयानन्द - मठ आदि हैं, यही जो दीपमालाके दिन दयानन्द निर्वाणोत्सव आदि करते हैं; यह सब मृतकश्राद्ध हैं । मृतकके नामसे दूसरेको अन्न देना, बिद्या प्रार्थन देना, मृतकको स्मरण करना, मृतकको श्रद्धाजलि देना, मृतकके है । उपलच्यमें हवन करना, उस दिन उपदेशकोंको खिलाना - पिलाना यह सब मृतक - श्राद्ध ही है । अपने ग्रामोंमें वार्षिकोत्सव वाले दिन वादी जो ' ऋषि - लंगर ' खोलकर बाहर से आये हुए विद्वानोंको, सारा उपदेशकोंको तथा जनताको भोजन खिलाते हैं, यहाँ वादी ' ऋषि ' सूक मृतक दयानन्दको ही कहते हैं; सो उस मृतक ऋषिके नामसे सव ‘ लंगर ' खोलकर जो दूसरोंको अन्न जिमाते हैं । जो कि पुस्तक बेच बनाकर मृतक - दयानन्दको अपनी श्रद्धाका प्रतीक अर्पण करते कितना Gujarat. An eGangotri Initiative