सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 361–370
सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 361–370
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७०२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ऋषि - द्वारा नगरको दण्डकारण्यरूपमें परिणत करने के इतिहास-वैसे को, तथा अगस्त्यके समुद्र - पानके इतिहासको सत्य मानते हैं । सूर्य भी ' आलोक ' - पाठकोंको यह भी जानना चाहिये कि - श्रविश्वस्तोंके । वादी शिरोमणि स्वा.द. भी श्रीपतञ्जलिकृत - योगसूत्रों पर व्यासमुनि-कृतभाष्यको अपने स.प्र. के ३ य समु. ( पृ ० ४२ ) तथा ' संस्कार-उसपर विधि'के ११२ पृष्ठ, तथा ऋ.भा.भू. के २६३ पृष्ठमें ग्राह्य तथा कोई अप प्रामाणिक मान गये हैं । तब फिर उसी व्यासभाष्यमें लिखे जो कि तथा समर्थित किये हुए ' अगस्त्य ऋषिके समुद्रपान ' में कौन नते हैं । दयानन्दानुयायी नकार कर सकता है? । चाहिये । स्वामीके अनुयायिओंको स.प्र. ( ११ समु. पू. २०६ ) के यह है; वही शब्द याद रख लेने चाहियें - ' शारीरक सूत्र, योगशानके भाष्य नए तीन आदि व्यासोक्त ग्रन्थोंके देखनेसे विदित होता है कि - व्यास जी बड़े चवलका- विद्वान्, सत्यवादी, धार्मिक, योगी थे ' । जब खा.द. योगदर्शन उत्पादके व्यासभाष्यकी इस प्रकार स्तुति करते हैं; तब फिर उसी व्यास-चित्तवल- भाष्यमें लिखा ' अगस्त्य ऋषिका समुद्रपान ' ' गप्प ' सिद्ध न हुआ । , समुद्रम किन्तु ' यथार्थ ' ही सिद्ध हुआ । तब किसी भी दयानन्दानुयायीका ॥ पिवेत् १ ' नतु, नच, किन्तु, परन्तु ' करनेमें अवकाश न रहा । शारीरिकऔर ( १२ ) इससे ' अगस्त्य ' का आलङ्कारिकतासे सूर्य अर्थ र सकता, हुए बादी खण्डित हो गये । उनके मत में सूर्य में अचेतनतावश चित्तवल असम्भव होनेसे सूर्य - द्वारा चित्तवलसे समुद्रपान घटित -कि - श्री- नहीं होता । व्यासजी ने अपने योगभाष्य में चित्तबल द्वारा ही से एक अगस्त्यका समुद्रपान बताया है, तापसे नहीं । किसी इतिहास में CC - 0. Ankur Joshi अगस्त्य ऋषिका समुद्रपान ७०३ Collection Gujarat भी सूर्य - द्वारा समुद्र- शोषण नहीं बताया गया । अगस्त्य सूर्य ही है - इसमें भी कोई प्रमाण नहीं । अतः वादियोंकी यह कल्पना व्यर्थ है । जगत्प्रसिद्ध - श्रीआद्यशङ्कराचार्यजीने भी ' अगस्त्यका समुद्रपान ' अपने गीताभाष्य में माना है । देखिये- ' यथा श्रगस्येन ब्राह्मणेन समुद्रः पीत इति इदानीन्तना अपि ब्राह्मणा ब्राह्मणत्व-सामान्यात् स्तूयन्ते ' ( १२।१२ ) । सूर्यके लिए ब्राह्मण - शब्दका कोई सम्बन्ध नहीं । तपस्याके विषय में पाठक कुछ और भी याद रखें । वेदमें लिखा है- ' तपसा ये अनाधृष्याः ' ( ऋ. १०/१५४२, अथर्व. १८ २।१६ ) अर्थात् – तपस्यासे तपस्वीको कोई दवा नहीं सकता । तब तपस्वी - अगस्त्यको समुद्रकी विशालता कैसे दवा सकती? महा-भारतके अनुशासन पर्व में कहा है- ' न तपसा न साध्यं नाम किञ्चन ' ( ४१।२६ ) ' तपस्यासे कुछ भी असाध्य नहीं ' । यदि ऐसा है; तो तपस्वी - अगस्त्य से समुद्रका पान भला असाध्य कैसे हो? । तपस्वी महिमा - नामक सिद्धिसे समुद्र- इतना रूप बनाकर उसको कैसे नहीं पी सकता? । ( १३ ) प्रतिपक्षियोंकी पुराणोंमें जैसी अश्रद्धा है, वैसे मद्दा-भारतमें नहीं । महाभारतकी वे कथाएँ करते हैं; उसपर व्याख्यान करते हैं; उसी महाभारतमें अगस्त्यकेलिए क्या लिखा है - यह भी देखिये - ' पीतः समुद्रोऽगस्त्येन अगाधो ब्रह्मतेजसा ' ( आदि-पर्व १६०।१५ ) ' अगस्त्यने ब्रह्म - तेजके बलसे समुद्रपान कर डाला ' । महाभारतने केवल उसका यहाँ संकेतमात्र नहीं लिखा; प्रत्युत . An eGangotri Initiative
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७०४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) दूसरे स्थान उसका पूरा इतिहास भी दिया है । उससे हम कुछ पंक्तियाँ उद्धृत करते हैं-' अगस्त्येन विना को हि शक्तोऽन्योऽर्णवशोषणे ' ( वनपर्व १०३।११ ) एतावदुक्त्वा वचनं मैत्रावरुणिरच्युतः । समुद्रमपिबत् क्रुद्धः सर्वलोकस्य पश्यतः ' ( १०५/३ ) वहां ' मैत्रावरुणि ' अगस्त्यकेलिए आया है । इसीलिए अजमेरके आर्यसमाजी- वैदिकयन्त्रालय में प्रकाशित मूल- ऋग्वेद १।१६६ सूक्तका ऋषि मैत्रावरुण - अगस्त्य कहा गया है । इतिहास और वेदमें भी यह स्पष्ट है - यह अन्य निबन्ध में बताया जायगा । ' स पूज्यमानस्त्रिदशैर्महात्मा ( अगस्त्यः ) महार्णवं निःसलिलं चकार ' ( २०५६ ) गच्छध्वं विबुधाः सर्वे यथाकामं यथेप्सितम् । महता कालयोगेन प्रकृतिं यास्यतेऽर्णवः ' ( १०६/२ ) यह इतिहासका निष्कर्ष है । ( १४ ) यही आक्षेप्ता प्रतिपक्षी लोग श्रीयास्कके निरुपर बड़ी श्रद्धा रखते हैं । उसमें विश्वामित्रके विषयमें लिखा है कि जव ऋषि सुदास - राजाका यज्ञ कराकर बहुत सा धन प्राप्त करके व्यास और सतलुज नामक नदियोंके सङ्गमपर पहुँचे; उस समय चोर लोग उनसे धन खींचनेकेलिए पीछे लग गये । विश्वामित्रने नदियोंमें बड़ा प्रवाह देखकर पार जानेकी इच्छासे उन नदियोंको प्रेरित किया कि -'गाधा भवत ' ( नि. २२२४६ ) ' अगाध तुम नदियां गाघ ( थोड़े - जल वाली ) हो जाओ । यही इस वेदमन्त्रमें कहा है— ' रमध्वं मे वचसे ऋतावरीः! उप ' ( ऋ. ३ | ३३ | ५ ) इस मन्त्र-का ऋषि ( वक्ता ) विश्वामित्र है, और देवता ( प्रोच्यमान नदियां CC - 0. Ankur Joshi Collection अगस्त्य ऋषिका समुद्रपान हैं - यह आर्यसमाजी - वैदिकप्रेसकी ॠ.सं. में भी देखा जा सकता है । इसी मन्त्रका अर्थ निरुक्तकारने कहा है- ' उपरमध्वं मे वचसे ' ( २।२५।१ ) ( हे नदियो! मेरे वचनकी पूर्तिकेलिए तुम रुक जाओ ) । पहले तो नदियोंने न माना; अन्तमें मान लिया, अर्थात् वै विश्वामित्रके वचनसे थोड़े - जलवाली हो गई, यही बात निरुक्तमें कही है — ' प्रत्याख्याय अन्तत आशुश्रुवुः ' ( २१२७७१ ), और यही निम्न वेदमन्त्रमें भी कहा है- ' आ ते कारो! शृणवामा वचांसि... नि ते नंसै ' ( ऋ. ३ | ३३ | १० ) इसीका निरुक्तकारने यह अर्थ किया है — ‘ आ शृणवाम ते कारो! वचनानि... निनमाम ते ' ( २।२७१ ) ( हे वेदसूक्तोंके द्रष्टा; हम तेरा वचन मानकर झुकती हैं, अर्था गाधोदक – थोड़े जलवाली होती हैं । यह तपस्वीके वचनकी महिमा है । इस प्रकार जब तपस्वी विश्वामित्रने वाणीमात्रसे अगाध - जलवाली नदियोंको गाध ( थोड़े ) जल वाली कर दिया; वैसे अगस्त्यके विषय में भी जाना जा सकता है । दोनों ही तपस्वी थे, यह नहीं भूलना चाहिये । ( १५ ) वेदमें कहा है – ' यानि अन्नानि ये रसाः ' | ' गृह्ण ेऽहं तु एषां भूमानं बिभ्रद् औदुम्बरं मणिम् ' ( अथर्व. १६ | ३१ | ४ ) ' औदुम्बर - मणि धारण करनेवाला संसारका अन्न खा सकता है, और संसारका रस पी सकता है । ' रसो वै आपः ' ( शत. ४ । ४ । ११ ) इस प्रमाणसे रसका अर्थ ' जल ' है । तब वह वैदिक - मणि उस वैदिक - ऋषि अगस्त्यके पास हो, और उसकी शक्ति से उसने समुद्रका सारा जल पी लिया हो, तो इसमें वेदविरुद्धता क्या हो Gujarat. An egeatrinitiative
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७०६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) अगस्त्य ऋषिका समुद्रपान ७०७ सकती है? कताचसे ' ( १६ ) योगदर्शनके साधनपाद ( प्रथमसूत्र ) व्यासभाष्य में श्रो ) । कहा है — ' नाऽतपस्विनो योगः सिध्यति ' ' तपस्याके विना योग त्वे सिद्ध नहीं होता ' । इससे स्पष्ट है कि तपस्वी योगी हुआ करता है । योगकी विभूतियाँ यदि देखनी हों, तो योगदर्शनका यही विभूतिपाद देखना चाहिये । उसमें एक सूत्र है – ' स्थूलस्वरूप-सि... सूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद् भूतजय: ' ( ३।४४ ) अर्थात् — पृथिवी, किया जल, तेज, वायु नामक भूतोंके स्थूलस्वरूपमें तथा सूक्ष्मान्वयार्थमें २१ ) संयम करने पर योगी पृथिवी, जल आदि पांच भूतोंको जीत अर्थात् सकता है । यदि ऐसा है; तो योग - शक्तिसे युक्त तपस्वी - अगस्त्यने चनकी यदि पांच भूतोंके अन्तर्गत जलमें विजय प्राप्त करके समुद्रके मात्रसे सारे जलका पान कर लिया हो; तो इसमें आश्चर्य क्या? दिया; इसी सूत्रके व्यासभाष्यमें लिखा है - ' तत्र पञ्चभूतस्वरूपाणि जित्वा भूतजयी भवति । तज्जयाद् चत्सानुसारिण्य इव गावोऽस्य संकल्पानुविधायिन्यो भूतप्रकृतयो भवन्ति ' ' योगी पञ्चभूतोंके स्वरूपको जीतकर उन पर विजय प्राप्त कर लेता है । विजय प्राप्त 7३१ | ४ ) • करने पर पांचों भूत पृथिवी, जल आदि उसकी सब प्रकारकी कता है, 1. इच्छाएँ पूर्ण कर दिया करते हैं । इस प्रकार जल नामक भूत ४१ ) ( तत्त्व ) ने भी अगस्त्य - योगी की इच्छा समुद्रजलके शोषण की ए उस - पूर्ण कर दी हो; तो इसमें क्या आश्चर्य! चन्द्र आदि कई ग्रहों स ' वा मरूप्रदेशों में पाश्चात्य - विद्वान कई सूखे समुद्र मानते हैं । इससे हो स्पष्ट है कि - शक्तिविशेषके कारण समुद्रका कालविशेषमें सूख जाना CC - 0. Ankur Joshi Collection असम्भव नहीं । इस बातको सन्देहकी दृष्टिसे देखनेवालोंके नेता स्वा.द.जीने योगदर्शनको प्रामाणिक माना है, उसमें व्यासभाध्यको भी प्रामाणिक माना है - यह पहले हम बता आये हैं । शायद योगदर्शनका विभूतिपाद किन्हींके मतानुसार स्वा. द. जीसे प्रति-कूल हो - यह भी नहीं है । स्वामीने विभूतिपादको सत्य माना है | स्वा. सत्यानन्दसे बनाये हुए स्वा. दु. के जीवन - चरित्र ' श्रीमद्-दयानन्दप्रकाश ' में राजस्थान - काण्डके द्वितीयसर्ग ४६५ पृष्ठमें लिखा है- ' एक सज्जनने स्वामीजीसे निवेदन किया - भगवन्! पातञ्जल - शास्त्रका विभूतिपाद क्या सच्चा है? उन्हों ( स्वामीजी ) ने कृपा की आप यों ही सन्देह करते हैं । योगशास्त्र तो अक्षरशः सत्य है । वह कोई पुराणोंकी - सी कल्पना नहीं है, किन्तु क्रियात्मक और अनुभवसिद्ध शास्त्र है ' । यदि ऐसा है; तो अगस्त्यका समुद्र-पान भी क्रियात्मक तथा अनुभवसिद्ध सिद्ध हुआ, क्योंकि यह योगशास्त्रमें जलभूतके वशीकरण द्वारा सिद्ध बताया गया है । कैवल्यपादके १० वें सूत्रके वादिप्रतिवादिमान्य व्यासभाष्यमें तो ' समुद्रम् अगस्त्यवद् वा पिवेत् ' में तो स्पष्टतया नाम लेकर भी बताया गया है । यदि ऐसा है; तो दयानन्दानुयायी व्यक्ति तो इसमें ' ननु - नच ' करनेके अधिकारी नहीं; क्योंकि उनके स्वामीने योग-शास्त्रको अक्षर - अक्षर सत्य माना है । योगदर्शन में कहा है- ' तत्र तीव्रसंवेगेन मन्त्रतपः - समाधि-भिर्निर्वर्तित ईश्वरदेवतामहर्षिमहानुभावानामाराधनाद् यः परि-Gujarat. An eGangotri Initiative
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७०८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) निष्पन्नः पुण्यकर्माशयः स सद्यः परिपच्यते । यथा - नन्दीश्वर-कुमारो मनुष्य परिणामं हित्वा देवत्वेन परिणतः ' ( साधनपाद १२ सूत्र ) यहाँ तपोबलसे मनुष्यका अपने मनुष्य - शरीरको भी बदलकर उसी जन्ममें देवता बन जाना लिखा है; तव तपस्वी के अन्यान्य अलौकिक - कर्मों में असम्भव कैसा? उसी दर्शनमें यह भी कहा है- ' कायेन्द्रियशुद्धिरशुद्धिक्षयात् तपसः ' ( २।४३ ) यहाँ व्यासभाष्य में लिखा है- " निर्वर्त्यमानमेव तपो हिनस्ति शुद्धधावरणमलम् । तदा आवरणमलापगमात् कायसिद्धिः प्रणिमाया, तथा इन्द्रियसिद्धिदू रात् श्रवणदर्शनाद्या ” । यहाँपर तपस्या आवरणमलके हट जानेपर अणिमा आदि सिद्धियों की प्राप्ति कही गई है । तब उनकी प्राप्ति होनेपर योगीके-लिए जगत् में कुछ भी असम्भव नहीं रहता; उसमें समुद्रपान तो साधारण घटना हो जाती है । ( १७ ) आठ सिद्धियाँ हम पहले दिखला चुके हैं । सांख्य-तत्त्वकौमुदीमें सर्वतन्त्र स्वतन्त्र - श्रीवाचस्पतिमिश्रने २३ कारिकाकी व्याख्यामें इनका विवरण दिया है । १ ' अणिमा – अणुभावः; यतः शिलामपि प्रविशति ( इतना सूक्ष्म हो जाना कि – पत्थरमें भी घुस जावे, जैसेकि - हनुमान्ने लंकाप्रवेशके समय अपना सूक्ष्मरूप कर लिया था । ) २ लघिमा - लघुभावः, यतः सूर्यमरी -चीन् अवलम्ब्य सूर्यलोकं याति ( इतना हल्का हो जाना कि सूर्य किरणोंके सहारे सूर्य - लोकमें पहुँच जाना । जैसे मत्स्यावतारमें विशाल भी मत्स्यने अपनेको इतना हल्का बना लिया कि- मनुजी CC - 0. Ankur Joshi Collection अगस्त्य ऋषिका समुद्रपनि $ 90 भी उसे उठा सके ) । ३ महिमा - महतो भावः यतो महान् भवति चन्द्र ( बड़ा होजाना, जैसे वामनावतारने अपने शरीरको बड़ा विशाल मैं क बना लिया ) । ४ प्राप्तिः — अङ्गुल्यग्रेण स्पृशति चन्द्रम् ( सभी कुछ सिद्धि पा लेना, अपनी अंगुलिके अग्रभागसे चन्द्रमाको छू लेना । जैसे सिद्ध कि - भरद्वाजमुनिने सेना - सहित भरतका आतिथ्य कर लिया ) । ५ प्राकाम्यम् — इच्छाऽनभिघातः, यत्तो भूमौ उन्मज्जति, निमज्जति ( ३२ ) च; यथा उदके ( जो इच्छा हो, उसकी पूर्ति हो जावे । भूमिमें इन्द्रि इस प्रकार घुस - निकल आवे, जैसेकि पानीमें । इस इच्छाऽनमि- जाती घातमें अगस्त्यका समुद्रपान घटाया जा सकता है ) । ६ वशित्वम् ~ अगर भूत - भौतिकं वशीभवति अस्य अवश्यम् ( पञ्चभूत तथा भौतिक वस्तुएँ वश हो जाएँ । यहाँ भी अगस्त्यका जल - भूतको अपने यदि काबूमें करना घटा लेना चाहिये ) । ७ ईशित्वम् — भूतभौतिकान प्रभवस्थितिमीष्टे ( पञ्चभूतोंका ईश बन जाना; जैसे चाहे उनको " आज नाच नचाना । यहाँ भी अगस्त्यका जल - भूत पर ईश बन जाना प्रतीत समझा जा सकता है ) । = कामावसायित्वम् — सत्यसङ्कल्पता । सुखा यथाऽस्य सङ्कल्पो भवति भूतेषु [ पृथ्वी - जलादिषु ]; तथैव भूतानि [ पृथिवी - जलादीनि ] भवन्ति ' ( संकल्पका उसी क्षण पूर्ण हो जाना, • जल आदि भूतोंसे जैसा चाहे वैसा काम निकालना । यहाँ भी अगस्त्यका उदाहरण ठीक समन्वित होता है । ) लोग पाठकोंने देखा कि - सिद्धियोंमें कितनी सिद्धि है । जब कामा- कि-वसायित्व सिद्धिके कारण जल आदि भूत योगीके संकल्पानुसार • इसके चलते हैं; तव हमारा पक्ष सिद्ध होगया । जब भूमिमें बैठा हु जानत Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) अगस्त्य ऋषिका समुद्रपान ७११ $ 90 चन्द्रमाको छू सकता है; तब समुद्र में व्याप्त होकर उसके जलपान भवति में क्या आश्चर्य रह जाता है? न्यायदर्शनमें भी योगीकी इन्हीं विशाल सिद्धियोंको उद्दिष्ट करके लिखा है- ' योगी खलु ऋद्धी ( अणिमादि-नभी कुछ सिद्धौ ) प्रादुर्भूतायां विकरणधर्मा ( अद्भुतेन्द्रिय - सामर्थ्यवान् ) जैसे निर्माय सेन्द्रियाणि शरीरान्तराणि तेषु युगपज्ज्ञेयान् उपलभते ' लिया ) । नमज्जति ( ३ | २ | ११ ) ' योगीकी अणिमादि सिद्धि प्रकट होने पर उसकी इन्द्रियाँ हम - साधारणोंसे विलक्षण तथा विचित्र - शक्तिशाली हो भूमि में शऽनभि जाती हैं ' यदि ऐसा है, तो हमसे विलक्षण इन्द्रिय - धर्म वाले अगस्त्यकी इस विषय में विलक्षणता तो माननी ही पड़ेगी । उसने भौतिक भी तब इन्द्रियों सहित बहुत शरीर बनाकर उनके द्वारा एकदम को अपने यदि समुद्र - पान कर लिया; तब इसमें क्या आश्चर्य रहा? ‘ श्रद्याहं नैतिकानां शोषयिष्यामि सपातालं महार्णवम् ' ( वाल्मीकि ० युद्ध ० २२।१ ) हे उनको ' आज मैं महासमुद्रको सुखा दूंगा, इस भगवान् श्रीरामकी उक्तिसे न जाना प्रतीत होता है कि- विशेष - शक्तिशाली हमारे पूर्वजोंमें समुद्र ङ्कल्पता । ' सुखानेकी शक्ति थी ही । भूत जैसे अगस्त्यकी अत्यन्त भूख वा प्यासमें सामर्थ्य दिखलाई हो जाना, गई है, वैसे ही पुराणोंमें ऐसे मुनियों का भी वर्णन प्राप्त होता यहाँ भी है, जो न खाते थे, और न लम्बे समय तक पीते थे । शङ्काकर्ता लोग इसमें भी आश्चर्य करते हैं; पर उन्हें याद रखना चाहिये च कामा- कि - तपस्याकी महिमाका वाणी वा मन वर्णन नहीं कर सकते । पानुसार इसके अतिरिक्त हमारे पूर्वज इस प्रकारकी ओषधियोंको भी बैठा हुआ जानते थे, जिनके उपयोगसे भूख - प्यास बढ़ जावे, वा हट CC - 0. Ankur Joshi जावे । जयपुरके स्वर्गीय भट्ट श्रीकृष्णराम - वैद्यकेलिए प्रसिद्ध है ' कि - उन्होंने अपने शरीरकी पुष्टिकेलिए प्रतिदिन आग्रह करते हुए एक अन्तरङ्ग - मित्रको कहा कि यदि सवा मन घी खानेकेलिए । तुम्हारे पास धन है; तो इसी शीतकाल में तुम्हें सब विषयोंमें मल्ल बना दूं । तव रोगीने याशङ्का प्रकट की कि धन भी हो; तथापि उतने घीको पचानेकी शक्ति कहांसे लाऊँगा? भट्टजीने कहा— उसके पचानेकी सामर्थ्य तो चावल - इतनी मेरी गोली ही कर देगी; पर यदि तुमने उतने घीके सेवनमें थोड़ी भी त्रुटि कर दी; तत्र तुम्हारा शरीर उपलेकी भांति जल जावेगा; फिर मैं भी उसका इलाज न कर सकूँगा । ' इस प्रकार जहाँ उदराग्निको बढ़ानेकी ओषधियाँ हैं; जिनसे भूख वा प्यास अतिशयित - मात्रामें बढ़ जावे, वैसे ही भूख-प्यासको मिटानेवाली ओषधियाँ भी हुआ करती हैं । जैसेकि वेदमें कहा है - ' क्षुधामारं तृपामारम्. अपामार्ग ' ( अथर्व ० ४ | १७ | ६ ) । योगदर्शनमें भी कहा है- ' कण्ठकृपे [ संयमात् ] चुत्-पिपासानिवृत्तिः ' ( ३।३० ) ' कण्ठके कूपके संयमसे भूख और प्यास हट जाती है ' । अभी - अभी बीते महायुद्धमें हिटलरने ऐसी गोलियाँ तैयार कराई थीं; जिनके खानेसे न भूख तंग करे, न प्यास, और शक्ति भी स्थिर रहे । यह गोलियाँ सैनिकोंके जेबोंमें रहा करती थीं । बीच - बीच में उनके सेवनसे उन्हें भोजन करना न पड़ता था । जब सेना किसी किलेमें घिर जाती; और खाद्य-सामग्री न प्राप्त हो सकती; तब यह गोलियाँ बहुत लाभप्रद Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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७१२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) प्रमाणित होती थीं 1 । मत्स्यपुराण में भी एक ' क्षुद्योग ' दिखलाया गया है, जिससे क्षुधा शान्त हो जाती है ( २१६।२७५-२७६ ) । इस प्रकार ' कौटलीय अर्थशास्त्र ' के ' औपनिषदाधिकरण ' में भी इस तरहकी अद्भुतताएँ दिखलाई गई हैं । अस्तु । ' यैः कृतः सर्वभक्षोऽग्निरपेयश्च महोदधिः ' ( ६।३१४ ) इस मनुके पद्यसे भी समुद्र- पानकी घटनाका आभास दीखता है कि- जिन ब्राह्मणोंने समुद्रको अपेय ( खारा ) वना दिया - इस कथनसे अगस्त्य - द्वारा समुद्रपानका इतिहास संकेतित हो रहा है । वेद भी संकेत देता है — ' अपानेन समुद्रस्य जठरं यः पिपति ' ( अ ० १३।३।४ ) जब अपानसे समुद्रकी पूर्ति कही गई है; तब अगस्त्यकी लघुशङ्कासे - जिसका मूल हमें अभी तक नहीं मिला, केवल प्रसिद्धि है - पुन समुद्रपूर्ति में क्या आश्चर्य? समुद्रके खारेपनमें गोपथब्रा ० में कहा है - ' ता अपः सृष्ट्वा [ ब्रह्म ] अन्वैक्षत् । तासु स्वां छायामपश्यत् । ताम् अस्य ईक्षमाणस्य स्वयं रेतोऽस्कन्दत् । तद् अप्सु प्रत्यतिष्ठत् । ` ` ताः श्रान्ताः, तप्ताः सन्तप्ताः, सार्द्धमेव रेतसा द्वैधमभवन् । तासामन्या अन्यतरा अतिलवणा अपेया अस्वाद्वथः, ' वा अशान्ता रेतः समुद्र ं वृत्वाऽतिष्ठन् ' ( १ । १ । ३ ) । महाभारत वा पद्मपुराणमें तो समुद्रकी पुनः- पूर्ति गङ्गासे स्वतः हो जानी मानी है । इस प्रकार सिद्ध हुआ कि - तपः शक्तिसे समुद्रपान असम्भव नहीं । हाँ, यह कर्म सामान्यशास्त्र वा सर्वसाधारण नहीं, किन्तु अपवाद ही है । अपवाद कादाचित्क तथा काचित्क हुआ करता हैं, सार्वदिक तथा सार्वत्रिक नहीं । इस विषय में अन्य भी प्रमाण CC - 0. Ankur Joshi Collection स्त्रीसे पुरुष और पुरुषसे स्त्रो ७१३ 098 दिये जा सकते हैं; पर विस्तार - भयसे हम यहीं रुकते हैं । इसमें I ( १४ ) स्त्रीसे पुरुष और पुरुषसे स्त्री होना | I पुराण-स्त्री से पुरुष हो जाना, वा पुरुषसे स्त्री हो जाना पुराए- इस प्र इतिहासमें यत्र - तत्र वर्णित मिलता है, यद्यपि उनके सुनने से यह कइयोंको अविश्वासका रोग उठता है; तथापि वे अपनी वैज्ञानिक- भाषित चिकित्सा यदि करायेंगे; तो यह रोग हट जाएगा । उन्हें यह लिङ्गको जानना चाहिये कि — इस प्रकारकी घटनायें भूतकालमें हो चुकी है, जि हैं, और वर्तमानमें हो भी रही हैं, और भविष्य में होंगी मी; स्त्री पुर क्योंकि यह भीतरी - कारणसे होता है - इसे हम आगे बताएँगे । पुंवद्भाव अंग्रेजी डाक्टर तो इसे एक भीतरी - बीमारी मानते हैं । कभी पड़ता गर्भकी विचित्रताके कारण वास्तव में पुरुष होते हुए भी उसके चिन्हक शिश्नके चिन्हपर स्त्रीकी योनिका चिन्ह भी बन जाता है । लोग सर्वसा समझते हैं कि यह स्त्री है, परन्तु वह वास्तवमें होता पुरुष है । अ योग्य - डाक्टर द्वारा उस चिन्हके ऑपरेशन करनेपर वही ( ६ | १३-आपाततः दीख रही हुई स्त्री पुरुष बन जाता है, जैसे कि- चिह्नवा व्याकरणमें स्त्री - लिङ्गी शब्दके पुंवत् कर देनेपर उसके स्त्रीत्व- होता; चिन्ह ङीप् टापू आदिकी निवृत्ति करनी पड़ती है, जैसे - कृष्ण- समाज चतुर्दशी, कुमार - श्रमणा । इस प्रकार पुरुष - स्त्री वन जाता है । इस स इस प्रकारकी घटना एक बार ' औंध ( सातारा ) के ' वैदिकधर्म ' के माना सम्पादक ‘ श्रीपाददामोदर - सातवलेकरने भी ' नारदीसे नारद, कीव, नारदसे नारदी ' इस शीर्षक से लिखी थी । उसमें विवेचना भी इस दी थी । तब पुराणोंके समयमें भी ऐसी घटनाएँ घटी हों; गे वहां पर Gujarat. An eGangotri Initiative.
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ७१३ 5 ७१४ / असम्भवको प्रश्रय नहीं दिया जाना चाहिये । तभी तो इसमें - प्रणेताओंने - उसका उल्लेख पुराण प्रकारके स्वप्न आया करते थे । पुराण- इस भी जानना चाहिये कि यह भापितपुंस्क ( जिसमें पुंस्त्व हो ) को ज्ञानिक-किया; अन्यथा क्या उनको जैसे व्याकरण में पुवद्भाव हुआ करता है, नित्य स्त्री-लिङ्गको पुंवत् नहीं हुआ करता, वैसे ही वही स्त्री पुरुष हो जाती उन्हें वह है, जिसमें पुरुषका चिह्न पहलेसे तिरोहित हो, सर्वसाधारण-हो चुकी स्त्री पुरुष नहीं बन जाती । जैसे व्याकरणमें भाषितपुंस्क - स्त्रीके गी भी; ताएँगे । पुंवद्भावार्थं स्त्रीलिङ्ग - मूलक टापू आदि प्रत्ययोंका लोप करना पड़ता है, वैसे ही वैसी स्त्रीके पुरुपत्वके लाभकेलिए उसके स्त्री-। कभी उसके चिन्हका ऑपरेशन करना पड़ता है; तभी वह पुरुष वनती है; । लोग सर्वसाधारण - स्त्री नहीं, क्योंकि यह अपवाद - विषय होता है । नुरुप है । अथर्ववेदसं. में ' इमं मे अद्य पुरुषं क्लीवमोपशिनं कृधि ' वही ( ६ | १३८ | १ ) इस मन्त्रमें शत्रु- पुरुषका नपुंसक होना, तथा स्त्रीके जैसे कि चिह्नवाला होना प्रार्थित किया गया है । यदि यह असम्भव स्त्रीत्व- होता; तो यह वैदिक - प्रार्थना उन्मत्ततापूर्ण मानी जाती । आर्य--कृष्ण- समाजी श्रीराजारामजी शास्त्रीने अपने अथर्ववेदके भाष्यमें नाता है । इस सूक्तका विनियोग ‘ पुरुष - विशेषको नपुंसक बना देनेकेलिए ' कर्म माना है; उन्होंने यह अर्थ किया है — ' आज मेरे इस पुरुषको नारद, क्लीव, स्त्रीचिह्नवाला बना दे ' । चना भी इस प्रकार ‘ जायमानं मा पुंमांसं स्त्रियं क्रन् ' ( अथर्व ८।६।२५ ) वहां पर ' पैदा हो रहा हुआ पुरुष स्त्री न हो जाए ' – यह प्रार्थना CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. स्त्रीसे पुरुष, पुरुषसे स्त्री ७१२ की गई है । तभी तो ' स्त्रिया अशास्वं मनः ' ( ८ । ३३ । १७ ) इस ऋग्वेदसं. के मन्त्रकी व्याख्या में श्रीसायणाचार्यने यह वचन उद्धृत किया है— ' प्लायोगिश्च श्रासङ्गो यः स्त्री भूत्वा पुमान् श्रभृत् ' ' प्लायोगि स्त्री था, फिर पुरुष बन गया ' । उसीको बतलानेवाला यह मन्त्र हैं — ' स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ ' ( ऋ.सं. ८ | ३३ | १६ ) ' हि— यस्माद् ब्रह्मा सन् त्वं स्त्री वभूविथ ' । ऋग्वेदके सुबोधभाष्यमें ' मेधातिथि ऋपिके दर्शन ' ( ७२ पृष्ठ ) में आर्यसमाज के माने हुए विद्वान् श्रीपाददामोदर सातवलेकरने लिखा है - ' इस अन्तिम मन्त्र ' ब्रह्मा स्त्री वभूविय ' में ब्रह्माका कार्य करनेवाला पुरुष स्त्री बनी थी, ऐसा कहा है । इस औंध नगरीमें ' कुमारी गोदावरी ' नामकी एक कुमारी थी, उसकी एक तरुणके साथ शादी हो चुकी । स्त्री - पुरुषोंका मेल होनेसे पता लगा कि श्रीमती गोदावरीके अवयव ठीक स्त्रीके समान नहीं हैं । अन्तमें डाक्टरोंने शस्त्रप्रयोग से ऊपरका भाग काटकर फेंक दिया; तब पता लगा कि वह अन्दरसे उत्तम पुरुष है । तब उस पुरुषकी शादी किसी दूसरी कुमारीसे हुई; प्रथम विवाह रद्द हुआ । वह परिवार अब तक जीवित है और बाल - बच्चोंके साथ आनन्दमें है । जन्मके १८ वर्ष स्त्री रही हुई मानवी इस तरह पुरुष हुआ । उक्त मन्त्रमें पहले पुरुष था; उसकी स्त्री वनी, और पश्चात् वह पुरुष बना होगा । यह कैसे हुआ, इसका पता लगाना चाहिये । ऋ. ८ | १ | ३४ मन्त्र देखो, वहां पुनः पुरुषत्वकी प्राप्ति होनेका विधान है ' । श्रीसातवलेकरजीकी यह प्रत्यक्ष घटना कभी काटी An eGangotri Initiative
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७१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) नहीं जा सकती - ' प्रत्यक्षे किं प्रमाणान्तरेण ' । यह भी विचारना चाहिये कि - उत्पत्ति के समय में केवल शिश्न और योनिका अन्तर हुआ करता है । एक ही वीर्यसे कभी शिश्न और कभी योनि बनती है, यह क्यों? उसमें मानना पड़ेगा कि - पुरुषके शुक्रकी प्रबलतामें सन्ततिके शरीरके अन्दर इस प्रकारकी वस्तुओंकी चिह्न बाहर प्रकट हो जाता प्रकारकी वलियां भीतर हो बन जाता है । वास्तवमें यदि विचारा पुरुषत्व तथा स्त्रीत्व दोनों है और स्त्रीत्व गौण - रूपसे, उत्पत्ति हो जाती है, जिससे पुरुषका है, और स्त्रीके रजकी प्रबलतासे इस जाती हैं, जिनके द्वारा स्त्रीका उपस्थ जाए; तो पता लगेगा कि- पुरुषमें होते हैं; पुरुषत्व प्रधान रूपसे रहता इसीलिए ' द्विधा कृत्वात्मनो देहमर्चेन पुरुषोऽभवत् । अर्धेन नारी, तस्यां स विराजमसृजत् प्रभुः ' ( १।३२ ) इस मनुवचन तथा शतपथ ( १४ | ४ | २ | ४-५ ) के अनुसार ब्रह्माने अपने एक शरीरके दो भाग किये । उसके आधे से पुरुष और आधे अंशसे स्त्री हुआ । आगे भी यही क्रम रहा । उन दो अंशोंके संयोगसे सृष्टि - वृद्धि शुरू हुई । यदि एक शरीरमें स्त्रीत्व और पुंस्त्व दोनों न होते; तो ब्रह्माके एक शरीरके दो भाग कैसे होते? यदि यह न होता, तो स्त्री पुरुषका ' अर्ध भार्या मनुष्यस्य ' ( महाभारत १७४ | ४१ ) अर्धाङ्ग कैसे कही जाती? • इससे स्पष्ट है कि एक ही पुरुषमें स्त्रीत्व और पुंस्त्व दोनों ही हुआ CC - 0. Ankur Joshi Collection स्त्रीसे पुरुष, पुरुषसे स्त्री ७५७ $ 15 करते हैं । इसी प्रकार स्त्री में स्त्रीत्व तथा पुरुषत्व दोनों ही होते इसीलिए स्त्री स्त्रीत्व प्रधानतासे होता है और पुरुषत्व गौण रूपसे हैं; माताका प्रत्यक्ष उदाहरण यह है कि कई पुरुषोंके दाढी- । इसका रहता है । मूछ नहीं होते; वा थोड़े होते हैं; उसमें कारण यह है कि उनमें स्त्रीत्व अधिकता- है कि उस से और पुंस्त्व थोड़ा रहता है । इस प्रकार कई स्त्रियोंको दाढ़ी- गौरण । त मूछ भी स्फुट दीखते हैं; इसमें कारण यह है कि उनमें पुंस्व गौर अधिक और स्त्रीत्व थोड़ा होता है । इस प्रकार सिद्ध हुआ कि नहीं । स्त्री एवं पुरुषमें पुरुषत्व एवं स्त्रीत्व दोनों ही यथायोग्य रहते यह हैं; इसलिए पुरुषमें जहां स्त्री वाला चिह्न होना चाहिये; वहां पर करके पुर • प्रकृतिके नियमसे सिलाईका चिन्ह स्पष्ट दीखता है, इसका यह हो जात भाव हुआ कि प्रकृतिने वहां पर होने वाले स्त्रीत्वके चिन्हको पिताका सी कर बन्द कर दिया है । बच्चोंको उठाकर देखिये । भगन्दर बाद उस एक फोड़ा जहां स्त्रीको होता है, वहां पुरुषको भी होता है । वा नष्ट ' भगं दारयति ' यह इसकी व्युत्पत्ति है । पुरुषका भग नहीं होता; बालक तब उसे भगन्दर क्यों हो? उसमें यह जानना चाहिये कि - स्त्रीके प्रबलता जिस स्थान में भग होता है, पुरुषका वहां सिलाईका चिन्ह होता हो जाने है - यह हम पूर्व कह चुके हैं, और वहीं वह फोड़ा प्रायः कभी वा निकलता है । अथवा उससे कुछ दूर भी होता है; तो वहां भी भीतरी - प प्रभाव उसी भग वाले स्थानका ही होता है । इससे स्पष्ट है कि- जाता पुरुषमें भी स्त्रीचिन्ह गुप्त हुआ करता है, उसका यही कारण है शुक्र - शो वाले भी कि - सन्तति शुक्र और शोणितके मिश्रणसे ही हुआ करती है । लानेवाल तब उसमें पुंस्त्व एवं स्त्रीत्वका भी मिश्रण होता है | पुरुष Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ७१७ $ 15 बनता है कि उसमें पिताका शुक्र प्रबल होता है; और होते है ।! इसीलिए गौण, इसलिए ही उसमें भी स्वयं पुरुषत्व प्रधान इसका | माताका रज और स्त्रीत्व गौण । इस प्रकार स्त्री इसीलिए ही होती होते; रहता है, माताका रज प्रवल रहता है, और पिताका शुक्र धकता- है कि उसमें मी । तभी तो उसमें भी स्त्रीत्व प्रधान रहता है और पुरुपत्व दाढ़ी- वौा । 1 यह सर्वविदित होनेसे इसमें प्रमाणकी आबश्यकता पुस्व नहीं । कि यह है सामान्य - शास्त्र, पर अपवाद - शास्त्रका अवलम्वन रहते करके पुरुपके शुक्र और स्त्रीके रजका इस प्रकारका तारतम्य प हो जाता है, जिससे उत्पन्न तो होता है लड़का; परन्तु भीतरी यह पिठाका वीर्य काल - क्रमवश निर्बल हो जाता है, कुछ समयके चिन्हको बाद उस वीर्यसे उत्पादित पुंस्त्व वाली नसें निर्बल हो जाती हैं, गन्दर वा नष्ट हो जाती हैं । जब निर्वल हो जाती हैं; तब तो वह है । बालक नपुंसक हो जाता है, और नष्ट हो जानेपर स्त्री - रजकी हो प्रवलतासे उत्पादित स्त्रीत्व करने वाली नसोंकी भीतर प्रबलता - स्त्री के हो जाने से वा विकास हो जानेसे उसके फलस्वरूप - वही बालक होता कमी बालिका वा वंही पुरुष कभी स्त्री हो जाता है । इस प्रकार प्रायः मीतरी - परिवर्तन होने पर बाहरी - चिन्हका परिवर्तन स्वयमेव हो भी जाता है; क्योंकि - बाहरी - चिन्हकी निर्मितिका कारण भीतरी : कि-शुक्र शोणितसे उत्पन्न नसें ही होती हैं । इसलिए कई थांखों है बाले भी जब अन्धे हो जाते हैं; उनके भीतरसे नेत्रकी ज्योति - है । तानेवाली भीतरी शक्ति क्षीण हो जाती है; तब भीतरी - मूलकी पुरुष CC - 0. Ankur स्त्रीसे पुरुष, पुरुषसे स्त्री ७१६ शिथिलतावश उनकी आंख होती हुई भी स्वयं बन्द हो जाती है, या भीतर धंस जाती है । जैसे कि - भीतरी वात दोष के कारण कई पुरुषोंके सिर वा हाथ बाहर स्वयं हिलते रहते हैं । इस प्रकार भीतरी कारणसे कठोर - गर्मी में भी मलेरिया रोगमें पुरुष-को इतनी शीत लगने लगती है कि उसे पांच रजाइयाँ भी नहीं हटा सकतीं । इस प्रकार शरीरकी बाहरी घटनाका मूल भीतरसे ही उत्पन्न होता है । इस प्रकार भीतरी नसोंकी शिथिलता होनेपर शिश्न और अण्डकोष शिथिल होकर भीतर धंस जाते हैं । ' निमित्तापाये नैमित्तिकस्याऽप्यपायः ' इस न्यायसे शुक्र अस्त होने पर तन्मूलक दाढी - मूछें भी हट जाती हैं, और भीतरसे स्त्रीत्व प्राप्त होने पर रतन आदि भी बढ़ जाते हैं - यह स्पष्ट है । इसमें असम्भव भी नहीं मानना चाहिये । दीर्घ भी शिश्न शीतकाल में वा अकामा-वस्थामें कैसा सिकुड़ जाता है; वा भीतर घुस जाता है, यह तो बाहरी कारण है । शुक्रपात, वा शुक्रक्षय वा काम राहित्यरूप भीतरी कारण तो बिना सन्देह ही शिश्नका भीतरमें प्रवेश हो जाता है । १६३६-३७ सन् के लगभग अमृतसरके खालसा कालेज में इस प्रकारकी घटना घटी थी । उसमें एक छात्र स्त्री बन गया; उसके अण्डकोष आदि क्रमशः सब भीतर धंस गये । यह वृत्त उस समय ‘ हिंन्दी मिलाप ' ( लाहौर ) पत्रमें छपा था । इससे उल्टा वृत्त अयोध्या के साप्ताहिक ' संस्कृतम् ' पत्रमें ( १८६५४३ ता ० ) प्रकाशित हुआ था - ' नागपुरमें इन्दिराका जन्म १६।१।२६ सन्में Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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७२० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) हुआ । इसकी योनिके ऊपरी भागमें मांसपिण्ड था पेशाब वाले स्थान पर । वह सदा योनिसे ही पेशाब करती थी । समय पर स्तन आगये । उसका शब्द भी स्त्रीकी भान्ति था । डाक्टरों ने विचार किया कि - योनिका मांसपिण्ड लिङ्ग हो सकता है । डा ० राजा भोज ने उसका १६ / ७ / ४१ से होमियोपैथी इलाज शुरू किया । २८-६-४१से लिङ्गका चिह्न आगया । अब अण्डकोष भी आगये । यह पूरा पुरुष बन गई, नाम इन्द्रजीत रखा गया । यह १८ वर्षका युवक है । ” बम्बई में एक १८ वर्षकी कुमारी कुमार होगया- यह लाहौरके ' विश्वबन्धु ' ( ३ । ७ । ४३ ई ० ) में छपा था । आधुनिक शारीरशास्त्रकी महत्त्वपूर्ण गवेषणा ' ग्लैण्ड्स ' है । हमारे शरीरमें विविध ग्रन्थियाँ हैं, उनके कई प्रकारके रस निकलते हैं । वे रस हमारी रक्तवाहिनी नसों में जाते हैं, जिनका प्रभाव हमारे अङ्गों पर होता है । ' एगरीनल ' नामक एक ' ग्लेण्ड ' है । यदि किसी स्त्रीका यह ग्लैण्ड विकृत हो जाए; तव उसका सारा शरीर केशोंसे भर जायगा । यदि उसे शरीरसे सर्वथा निकाल दिया जावे; तब शरीरके केश उड जाएँगे, और मानसिक दशा भी बिगड़ जायगी । इसका प्रभाव प्रजननेन्द्रियं एवं अण्डकोषकी वृद्धि पर भी पड़ता है । इस रसके प्रभावसे स्त्रीके पुरुषोचित, और पुरुषमें स्त्री- उचित गुण पैदा किये जा सकते हैं । पुरुषके स्तन बढ़ आते हैं, और उनमें दूध भी आ जाता है । इस समय ग्लैण्डरसके डालने से इतना हो जाता है । प्राचीन समय में विशेष - शक्ति CC - 0. Ankur Joshi Collection स्त्रीसे पुरुष और पुरुषसे स्त्री ७२१ ७२ होनेसे वर शाप दिये जाते थे, जिसके कारण भीतरसे स्वयं ही ऐसे परिवर्तन हो जाते थे, जिनके कारण स्त्री और पुरुपका उप परिवर्तन हो जाता था । गर्भ इस प्रकार कभी दोनों शुक्र - शोणित अलग - अलग भी प्रवल पह हो जाते हैं, जिनके फलस्वरूप बालक में दोनों चिह्न बन जाते हैं । लाहौरके साप्ताहिक ‘ विश्व बन्धु ' में यह वृत्त प्रकाशित हुआ लड़ था कि - ' सिलहट ' नगरकी प्रदर्शिनी में एक बालकके चार हाथ, चार पांव, चार कान, दो पीठ, एक स्त्री - चिन्ह और एक पुरुष- ऐस चिन्ह, दो मलद्वार, लेकिन पेट और सिर एक था ' । ' वीर अर्जुन ' यही ( देहलीके दैनिक ) २०-६-५८ के अमें अकोला १६-६-५८ का समाचार ' स्त्री भी और पुरुष भी ' शीर्षकसे निकला था - ' एक हु स्त्री युवकमें जिसकी आयु २० वर्ष है, जो पेट दर्दकेलिए अपना ' संस आपरेशन कराने आया था, स्त्री और पुरुष दोनोंके लिङ्ग हैं । एक शिश्न के नीचे ही योनि है, अण्डकोप नहीं हैं ' । इस पुरादृष्ट वृत्त विषयको असम्भव माननेवाले वादी शारीर - विज्ञानका अध्ययन एवं मनन करें । वह दक्षिणके ' पुट्टर ' नगरमें वहांके टी. जी. मुडालियर नामके ' तहसीलदार ' ने एक २५ वर्षके युवकके स्त्री हो जानेकी घटना चौथ इस प्रकार लिखी है कि — गांव का दौरा करते हुए मैंने ऐसे व्यक्ति गया को देखा, जो बहुत वर्ष पुरुष रहा । तीन सालसे यह स्त्रीरूपमें उग बदल रहा है । उसकी जननेन्द्रिय क्रमसे भीतर धँस गई । जरा अण्डकोषके नीचेका छिद्र जो कि पहले से ही था - बढ़कर स्त्रीका पदा Gujarat. An epitiative