सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 371–380

सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 371–380

पृष्ठ 371

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७२१ ७२२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) यंही उपस्थ हो गया । उसको आर्तव ( ऋतुकाल ) भी होने लगा । नुरुपका गर्भ भी हो गया, स्तनोंमें दूध भी आ गया । उसके दाढ़ी - मूछें पहलेसे नहीं थीं । अब उसमें स्त्री - जैसी लज्जा वा संकोच भी प्रवल हो गया है । उसकी जाति मुथासी है ( धर्मविज्ञान ) । जाते ‘११ फर्वरी १६४६ कलकत्ता मेडिकल हस्पताल में १६ वर्षके हुआ लड़केके लड़की हो जानेकी सूचना मिली है । यह लड़का नादिया हाथ, जिलेका रहनेवाला है । गत इस १०० वर्ष में इस इस्पताल में पुरुष- ऐसे ५ केस हो चुके हैं ( दैनिक ' विश्व - बन्धु ' लाहौर १२-२-४६ ) अर्जुन ' यही वृत्त साप्ताहिक - संस्कृत में ( १६ - २ - ४६ तिथिमें ) प्रकाशित - ५८ का हुआ था । उसमें लिखा था कि ' उसका गुह्याङ्ग संकुचित होकर - ' एक स्त्रीकी योनिके आकार में परिणत हो रहा है ' । इस प्रकार ' संस्कृतम् ' के २-४ - ४६ के अमें जमालपुरके कुमारिया गांवका नङ्ग हैं । एक १८ वर्षके युवकका - जो सन्निपातसे छूटा था - स्त्री बनने का राणदृष्ट वृत्त प्रकाशित हुआ था । अध्ययन पटनाके राजकीय औषधालय में भी ऐसी घटना घटी थी । बाँके प्रधान - डाक्टर हिर्सफोल्डने एक ऐसी घटनाका अनुसन्धान नामके किया था कि - एक स्त्री चार सन्तान पैदा करके पुरुष बन गई । घटना • व्यक्ति चौथी सन्तानके बाद ही उसका स्वर पुरुषकी भांति भारी हो चीरूप में गया | बाहु - जांघ आदिमें बहुत बाल हो गये, दाढ़ी - मूंछें भी गई । उग आईं । परीक्षण करनेपर डाक्टरको पता लगा कि इसकी स्त्रीका जरायु समाप्त हो गई है । स्त्री - योनिके भीतरका पुरुषलिङ्ग जैसा पदार्थ बढ़कर पुरुषका लिङ्ग हो गया । डा ० हिर्सफोल्डका कहना CC - 0. Ankur Joshi स्त्रीसे पुरुष, पुरुषसे स्त्री ०२३ . था कि- प्रत्येक शरीरमें स्त्री और पुरुष दोनोंके लिङ्गका प्रकट वा गुप्त चिन्ह तथा उसकी शक्ति होती है । वैसी पेशियां भी दोनोंमें हुआ करती हैं । कारणविशेषसे कोई शक्ति प्रच्छन्न और कोई व्यक्त होकर स्त्रीको पुरुष वा पुरुषको स्त्री बना दिया करती है । ( धर्मविज्ञान ) महाभारतमें शिखण्डी सुप्रसिद्ध है । ' स हि स्त्रीपूर्वको राजन्! शिखण्डी यदि ते श्रुतः । कन्या भूत्वा पुमान् जातो न योत्स्ये तेन भारत ' ( उद्योगपर्व १७२ २० ) यह भीष्म कह रहे हैं कि- शिखण्डी उत्पन्न होते समय कन्या थी, पीछे पुरुष बन गया, मैं उससे युद्ध नहीं करूँगा । यह घटना वहां प्रक्षिप्त भी नहीं हो सकती । यह महाभारतकी मुख्य घटना है । शिखण्डीके कारण ही भीष्म बाणोंको नहीं चलाते थे; उसीके आवरण में स्थित होकर अर्जुनने वाणपरम्परासे भीष्मको वींध दिया और उसे शरशय्यामें सुला दिया । नहीं तो वह भीष्म अपने बाणोंसे अर्जुनके बाणोंको काट देता, उसमें यह शक्ति थी । यदि यह घटना न हुई होती, तो उद्योगपर्वका कुछ भाग, भीष्म पर्व, शान्तिपर्व तथा अनुशासनपर्व महाभारतमें न होते । मुख्य घटना कभी भी प्रक्षिप्त नहीं हो सकती । तब अपवादस्थल मानकर स्त्रीका पुरुष हो जाना वा पुरुषका स्त्री हो जाना सिद्ध हो जाता है । पाश्चात्य वैज्ञानिक - डाक्टरोंका यह कहना है कि गर्भाधान हो जानेपर तीन मास तक जो पिण्ड गर्भाशयके भीतर होता Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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७२४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) है, उसमें शिश्न और योनि समान रूपसे बढ़ते हैं । तीन मासके बाद एककी वृद्धि रुक जाती है, दूसरे चिह्नकी वृद्धि प्रारम्भ हो जाती है । अतः उनका मत यह है कि- ' हम उस समय विशेष ओषधि द्वारा उसके प्रभावसे उस पिण्डको पुत्र बना सकते हैं ' । इसी कारण हमारे प्राच्य - सूत्रकारोंने भी गर्भके दूसरे - तीसरे महीने पुंसवन संस्कारका विधान माना है । उस समय वे भी पुंसवनकी विशेष - ओषधि दाहिनी नाकके छिद्र द्वारा अन्दर भेजते हैं, जिससे अवश्य ही पुरुष सन्तान हुआ करती थी । ‘ पुंसवन ' का अर्थ यह है कि - पुमान् ( मर्द ) को पैदा करना । इस प्रकार डाक्टर कहते हैं कि हम इन्जेक्शनके द्वारा. विद्युत् - प्रयोगसे पुरुषको स्त्री और स्त्रीको पुरुष बना सकते हैं । स्त्री और पुरुषके जननेन्द्रियोंमें थोड़ा अन्तर है । यदि स्त्रीकी प्रजनन करनेवाली भीतरी वलियोंको वैज्ञानिक रीति से बाहर कर दें; तब उसमें पुरुषका चिह्न हो जावेगा । इस प्रकार पुरुष-लिङ्गकी भीतरी वलियोंको निकाल देनेसे वह अन्दर धँस • जाएगा; और उसमें स्त्रीचिह्न वन जावेगा । इससे सिद्ध हुआ कि - पुरुषमें स्त्रीत्व - शक्ति, और स्त्रीमें पुंस्त्व-शक्ति यह दोनों ही शक्तियां रहती हैं । अपवादरूपसे कभी एक शक्तिके ह्रास होजानेपर स्वयं ही दूसरी शक्ति वल पकड़ जाती है; तव स्त्री - पुरुषोंका पुरुष - स्त्रीरूपमें परिवर्तन हो जाता है । इस प्रकार सिद्ध हुआ कि जिन लोगोंकों पौराणिक इस प्रकारकी घटनाको सुनते ही मनमें अविश्वास हो उठता है; और वह CC - 0. Ankur Joshi Collection स्त्रीसे पुरुष, पुरुषसे स्त्री ७२५ = उनका नहीं हटता; वहां यही कारण है कि उन्होंने अविश्वास- का रोगको दूर करनेवाली शारीरिक - विज्ञानरूप वैज्ञानिक ओषधियों भा का प्रयोग कभी नहीं किया । यदि वे उनका प्रयोग यथासमय कर दें; तब इस प्रकारके मानसिक रोगोंका समूलोन्मूलन हो वा जावे । ‘ वैदिकधर्म ' पत्र ( मार्च १ ९ ५७ ) में ' वेदोक्त लिङ्गपरिवर्तन- हो मीमांसा ' एक लेख श्रीनाथूलाल - वानप्रस्थीका निकला था; उसका भी कुछ अंश हम उद्धृत करते हैं- अ लिङ्ग परिवर्तनका कारण — मनुष्यकी उत्पत्ति पुरुष और स्त्री- श जीवाणुओंके सम्मिलनसे संयुक्त शरीरों द्वारा होती है । सि वैज्ञानिकोंका कथन है कि इन जीवाणुओंका आकार एक इंचके पा पांच - सौवें भागके लगभग होता है । इसमें भी यह जीवाणु कर परस्पर आयु तथा माता - पिताके शरीरोंकी अपेक्षासे छोटे - बड़े दा होते हैं । इनका छोटा तथा बड़ापन अधिकतर माता - पिता के बच शरीरोंकी स्थूलता तथा कृशता के अनुपातानुसार होता है । माता- भा पिताके शरीरोंके अनुपातानुसार जीवाणुओंके सम्मेलनसे उत्पन्न का पुत्र - पुत्री के शरीर में लिङ्ग परिवर्तन नहीं होता, किन्तु इसके अपवादरूपमें कुछ जीवाणु अपनी स्वयंकी आयुकी अपेक्षासे भी छोटे - बड़े होते हैं । ऐसी दशामें माता - पिताके शरीरोंके अनुपातके विरुद्ध आयुकी अपेक्षासे बड़े - छोटे जीवाणुओंका सम्मिलन होनेपर माता - पिताके शारीरिक अनुपातानुसार युवावस्थामें शरीरोंकी पूर्णरूपसे वृद्धि होनेपर प्रकृतिके, दबाबके का Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ७२५ ७२६ भीतरी - शरीर ऊपरी भागमें तथा ऊपरी शरीर भीतरी वश्वास. कारण भागमें हो जानेसे लिङ्ग - परिवर्तन स्वयमेव हो जाता पधियों कृश - शरीरधारी पुरुषके वीर्यसे उत्पन्न जीवाणु, समय बाली स्त्रीके रजसे उत्पन्न जीवाणुसे बड़ा होनेके हो स्थूल स्त्री - जीवाणुको निगल लेगा, जिससे पुत्रका है । स्थूल शरीर कारण वह भ्रूण उत्पन्न होगा; परन्तु जब वह युवा होगा, तब उसके अन्तःस्थित वर्तन-स्त्री - जीवाणुका कारण शरीर अपनी माताके शरीरकी स्थूलताके उसका अनुपातसे वृद्धिको प्राप्त होता और कृश पुरुष जीवाणुका वाह्य-शरीर पिताकी शारीरिक- कृशता के अनुपातसे कृश होकर अर्थात् स्त्री-सिकुड़कर अन्तःस्थित भागकी और प्रवेश करेगा । इसके परि-है । णामस्वरूप उस पुरुषकी जननेन्द्रिय भी भीतरकी ओर सिकुड़ च जीवाणु कर ऊपरी खाल योनिका रूप धारण करेगी । तब लिंग बच्चे-दानीकी गर्दनके रूपमें परिवर्तित हो जायगा, और अण्ड - कोप पिता के बच्चेदानीका रूप धारण करेंगे । मूछोंकी जड़ें अन्तःस्थित भागमें दब जानेके कारण झड़ जाएँगी, तथा स्त्रीजीवाणुके माता-उत्पन्न कारण- शरीरके वृद्धिके कारण छातीके भागमें स्तन उभर • इसके आएँगे - इस प्रकार पुरुष स्त्री हो जाएगा । पेक्षा इसी प्रकार कृश - स्त्रीके रजसे उत्पन्न स्त्री - जीवाणु स्थूल के पुरुषके वीर्यसे उत्पन्न पुरुष - जीवाणुसे बड़ा होनेसे पुरुष जीवाणु-ओंका को निगल लेगा, जिससे पुत्रीका भ्रूण उत्पन्न होगा, परन्तु अनुसार युवावस्था में उस स्त्रीके अन्तः- स्थित भागके पुरुष - जीवाणुका बाव के कारण - शरीर पिताके शरीरकी स्थूलता अनुपातसे बढ़ CC - 0. Ankur Joshi Collection स्त्रीसे पुरुष, पुरुषसे स्त्री ७२७ जाएगा, और कृश स्त्री - जीवाणुका बाह्य कारण शरीर सिकुड़ कर अन्दरकी ओर प्रवेश करेगा । इसके परिणामस्वरूप उस स्त्रीके जननेन्द्रियका योनिमुख भीतरकी ओर सिकुड़कर पुरुष -जीवाणुकी वृद्धिवश भीतरी बच्चेदानीका मुख जो पुरुष लिङ्ग-जैसा होता है, बाहर निकलकर पुरुषकी जननेन्द्रिय तथा बच्चे-दानी अण्डकोषका रूप धारण करेगी । इस प्रकार स्त्री - जीवाणु-का कारण शरीर भीतर प्रवेश करके उसकी छातीके स्तन दब जाएंगे, तथा पुरुष - जीवाणुका कारण शरीर बाहरी भाग में आ जानेके कारण उसकी मूछोंकी जड़ें बाहर आजानेसे दाढ़ी-मूछें बनने लगेंगी, और स्त्री पुरुष हो जावेगी । लिङ्ग परिवर्तनका ऐतिहासिक प्रमाण - अध्यात्मरामायणके किष्किन्धा काण्डमें लिखा है - ऋक्षराज जब युवा हुआ; तब एक कुंडमें स्नानसे उसका लिङ्ग परिवर्तन होकर स्त्रीका रूप हो गया । उससे सूर्य - द्वारा बाली, और इन्द्र - द्वारा सुग्रीव उत्पन्न हुआ । ' ' विश्वबन्धु ' ( लाहौर ) में २०. ३. ४७ ता ० में यह रोमकी घटना प्रकाशित हुई थी कि - ' टूरनमें दो बहिनें साधारण सर्जिकल आपरेशनोंके बाद भाई बन गईं; इनकी श्रायु ३८ और ३० वर्षकी है । ज्यों - ज्यों उनकी आयु बढ़ती गई, उनकी आवाज भारी होती गई; और स्त्रीत्वके बाह्य - चिन्ह समाप्त हो गये । अब इन दोनों भाइयोंका लड़कियोंसे विवाह होने वाला है ' । स्त्रीसे पुरुष और पुरुषसे स्त्री हो जाना हम भी सामान्यतया Gujarat. An eGangotri Initiative

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७२5 श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) नहीं कहते, किन्तु अपवादरूपसे । अपवाद - शास्त्र कादाचित्क तथा काचित्क हुआ करता है, सार्वेदिक तथा सार्वत्रिक नहीं । अवशिष्ट विचारणीय अंश यह है कि - पुराणादिमें जहां वर-शाप आदिके कारण स्त्री, पुरुष और पुरुष स्त्री बन गया, जैसे इला - सुद्युम्न, अर्जुन आदि; उसमें कारण है मन्त्र - शक्ति, देवबल तथा तपस्याका महत्त्व । वर वा शाप तपस्या आदि शक्तिसम्पन्न ही दे सकते हैं, दूसरे साधारण नहीं । तपस्याका महत्त्व मनुजी -के शब्दोंसे सुनिये - ' औषधान्यगदो विद्या देवी च विविधा स्थितिः । तपसैव प्रसिध्यन्ति तपस्तेषां हि साधनम् ' ( ११।२३७ ) ' यद् दुस्तरं यद् दुरापं यद् दुर्गं यच्च दुष्करम् । सर्वत् साध्यं, तपो हि दुरतिक्रमम् ' ( मनुस्मृति ११।२३८ ) ' ओषधि, विद्या, देवी स्थिति, आदि तपस्यासे सिद्ध होते हैं । तपस्या उनकी सिद्धिमें साधन है । इस प्रकार इस सम्पूर्ण जगत्में जो दुस्तर, दुर्लभ, दुर्गे वा दुष्कर है, तपस्या उन सबको सिद्ध कर दिया करती है । इस प्रकार तपस्या- शक्तिके द्वारा ही वर- शाप दे सकनेसे, और महादेव आदिमें स्वाभाविक शक्ति होनेसे उनके कथनमात्रसे ही स्त्री - पुरुषोंमें लिङ्ग परिवर्तनादि क्रियासे व्यत्यय हो जाया करता है । तब इससे श्रीमद्भागवत ( ६।१।१३ - ४२ ) में आई हुई कथा समूल सिद्ध हुई । उसमें कहा है- वसिष्ठने मनुकी प्रजाकेलिए मैत्रावरुणी सृष्टि की थीं । उसमें मनुकी पत्नीने होताको लड़की-केलिए प्रार्थना की । तब होता के मन्त्रभेदसे इला नाम वाली CC - 0. Ankur Joshi Collection स्त्रीले पुरुष, पुरुषले स्त्री ७३६ लड़की हुई । तब प्रसन्न हुए मनुने उसके पुंस्त्वकेलिए वसिष्ठीसे प्रार्थना की । वसिष्ठकी भगवत्प्रार्थनासे वह सुद्युन नाम वाला पुरुष हो गया । तब वह महादेवसे शप्त हुए वनमें शिकारकेलिए स्त्री - प गया और स्त्री हो गया | तब वसिष्ठकी तपस्यासे प्रसन्न हो अवक महादेवने वर दिया कि — यह एक मास स्त्री रहे, और एक मास पुरुष । महादेव कर्तुम्, अकर्तुम्, अन्यथा कर्तुं समर्थ हैं । तब जान होताकी मन्त्र - शक्तिसे, वसिष्ठके तपोबलसे, तथा महादेवकी उस-सामर्थ्य से वैसा हो गया । रही बेदमें भी तपका माहात्म्य कहा गया है - ' इन्द्रावरुणौ! वर यद् ऋषिभ्यो मनीषां वाचो मतिं श्रुतम् अदत्तमये । यानि गया के स्थानानि सृजन्त धीरा यज्ञं तन्वानाः, तपसाऽभ्यपश्यम् ' ( ऋ.८ । ५६।६ ) ‘ इन्द्र - वरुण ऋषियोंको जो वाग्बल, वा बुद्धिबलवा याद माणो शास्त्र- चल देते हैं, जिससे धीर लोग उन - उन वस्तुओं को यज्ञ ब्राहार द्वारा बनाते हैं; वे सब वस्तुएँ तपस्यासे सिद्ध हो जाती हैं । तस्मा तपस्या - शक्ति योगका ही एक भेद होता है । योगकी महिमा • आदि वेदमें देखिये –'यस्माद् ऋते न सिध्यति यज्ञो विपश्चितश्चन । खण्ड सा धीनां योगमिच्छति ' ( ऋ. १/१८/७ ) अर्थात् - योगसे ही यज्ञा- अपनी त्मक सांसारिक - कार्य सिद्ध होते हैं । इस प्रकारके योग एवं अपेक्ष तपस्याके चमत्कार योगियों तथा तपस्वियोंके चरित्रोंमें सुलभ पौरा होते हैं । ८ । ३ । ४२ ई ० में मुलतानमें एक मदारी आया । उसने पुरुषोंके और देखते - देखते १४ वर्षके लड़केको लड़की बना दिया । वैसे ही Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ७२८ उसके कर दिये । जब एक ऐन्द्रजालिक कृत्रिम रूप कुच सकता है; तब तपस्वी लोगोंने अपनी तपः - शक्ति द्वारा यदि कर वाला श्री- पुरुषका व्यत्यय कर दिया; तो इसमें असम्भवको क्या फैलिए? ऐसा होनेपर भी जो लोग तपः - शक्तिके सुनने मात्र-अवकाश से ही उसमें अविश्वासी होकर यह न मानें; तब उन्हें यह मास जानना चाहिये कि इस प्रकारकी घटना उस उस पुरुषमें वा । तब उस - उस स्त्रीमें प्रकृति - द्वारा उक्त प्रकारसे भीतरसे ही प्रारम्भ हो देवकी रही थी, वा होनेको तैयार थी; तब किसी देव वा ऋषि - मुनिका वर वा शाप आदि, या वचनमात्र उसमें निमित्तकारण बन रुणौ! गया । तथापि इस प्रकारके अविश्वासियोंको श्री स्वा. शङ्कराचार्य-यानि के वेदान्तदर्शन ( १ | ३ | ३३ ) के भाष्यमें स्थित यह वचन सदा याद रख लेना चाहिये कि - ' योगोपि श्रणिमाद्य श्वर्य प्राप्ति - फलकः स्मर्य-लवा माणो न शक्यते साहस मात्रेण प्रत्याख्यातुम् । ऋषीणामपि मन्त्र-को यज्ञ ब्राह्मणदर्शिनां सामर्थ्य नास्मदीयेन सामर्थ्येन उपमातु ं युक्तम् । हैं । तस्मात् समूलमितिहास - पुराणम् ' । अर्थात् योगका फल है णिमा महिमा · आदि ऐश्वर्यकी प्राप्ति । इसके बहुतसे चमत्कार प्रत्यक्ष हैं । उसका तश्वन । खण्डन वाणीमात्रसे नहीं हो सकता । ऋषियोंकी सामर्थ्य - यज्ञा- अपनी सामर्थ्य के समान नहीं समझ लेनी चाहिये । वे हमारी गं एवं अपेक्षा अधिक - शक्तिशाली थे; अतः उनसे प्रोक्त तथा आचरित सुलभ पौराणिक इतिहास सत्य ही हैं । . कई व्यक्तियों का यह प्रश्न होता है कि स्त्री पुरुष हो गई, जैसे ही और पुरुष स्त्री हो गया - यह तो सिद्ध हो गया, पुरुष भी स्त्री स्त्रीसे पुरुष, पुरुषसे स्त्री ७३१ हुई गर्भ प्राप्त कर सकती है; पर पुराणों में तो युवनाश्व - पुरुषकी कोखसे मान्धाताका होना बताया गया है, यह कैसे हो सकता है? पुरुषमें गर्भाशय न होनेसे उससे वालक कैसे उत्पन्न हो सकता है '? इस पर यह जानना चाहिये कि यह कथा श्रीमद्भा-गवतके 8 म स्कन्धमें छठे अध्यायमें थाती है । उसमें कारण भी स्पष्ट लिखा है । उसमें कहा है कि युवनाश्व के सौ स्त्रियाँ होने पर भी पुत्र न होनेसे उसे वैराग्य हो गया । तब कृपालु - ऋषियोंने उसके पुत्रार्थ इन्द्र - यज्ञ किया । वहां उन्होंने अभिमन्त्रित जल बाला घड़ा रखा, जिसका जल उन्होंने यज्ञान्तमें युवनाश्वकी स्त्रियोंको देना था; परन्तु रातको नींदसे उठा हुआ राजा प्यासा होनेसे उस जलको पी गया । वह जल पुंसवनमन्त्रसे अभि-मन्त्रित होनेसे पुत्रोत्पादनकी अमोघ शक्तिसे पूर्ण था । इ लिए अतिशयित - शक्ति शाली होनेसे उसके पीनेसे युवनाश्वकी ही दाहिनी कोख से मान्धाता पैदा हुआ । जब वह स्तनके दूध-के लिए रोने लगा, तव व्याकुलताका अनुभव हुआ । सब कहने लगे कि यह किसका स्तन्य पीएगा? तब इन्द्रने कहा- मांधाता ( यह मुझे पीवेगा ) यह कह कर उसने उसके मुखमें अपनी लिपिलाई । यहां यह जानना चाहिये कि उक्त यज्ञसे जो सन्तान होनी थी, वह न तो शुक्र- शोणितसे होनी थी और न वहां गर्भाशयकी अनिवार्यता थी, क्योंकि गर्भाशय शुक्र- शोणितके परिपाकार्थ ही होता है; तथा प्राकृतिक गर्भार्थ होता है । यहां तो राजा तथा CC - 0. Ankur Joshi Collection, Gujarat. An eGangotri Initiative

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७३२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) रानियोंके शुक्र - शोरिणत बेकाम हो चुके थे । अतः इस समय तो प्रकृतिशक्त्यतिशायी मन्त्रशक्तिका ही कार्य अवशिष्ट था । मन्त्र-शक्ति अमोघ हुआ करती है; इसीलिए ही ऋचीकमुनिसे दिये हुए चरुसे गाधि की स्त्रीके गर्भ से विश्वामित्रकी उत्पत्ति हुई, ऋष्य-शृङ्गसे दी हुई अभिमन्त्रित हविसे कौशल्या आदिको गर्भ हुआ; जिनके रामादि पुत्र हुए । मन्त्रशक्तिसे वृष्टि भी हो जाती है, मन्त्रकी शक्तिसे ही एक नगरका भी नाश हो जाता है । मन्त्र - शक्ति ही सांप - बिच्छू आदि प्रभावहीन हो जाते हैं । मन्त्रशक्तिसे ही भगिनीके समान दूसरेकी कन्या पुरुषकी पत्नी हो जाती है, मन्त्रशक्तिके विषयमें ' आलोक'का पञ्चम - पुष्प देखिये । तब अभिमन्त्रित - जल पीनेसे उस मन्त्रशक्तिने भी अपनी शक्तिको प्रकाशित करना ही था । इसीका समर्थन ब्राह्मणभागात्मक - वेद भी करता है । ' विश्वरूपं वै त्वाष्ट्रमिन्द्रोऽहन् । तं त्वष्टा हतपुत्रोऽभ्यचरत् । सोभिचरणीयमपेन्द्र ँ 1 सोममाहरत् । तस्य इन्द्रो यज्ञवेशसं कृत्वा प्रासहा सोममपिबत् । स विष्वङ् व्यार्च्छत् । तस्य इन्द्रियं वीर्यमङ्गाद् - अङ्गाद् अस्रवत् ' ( १२ | ७ | १ | १ ) उरस एव अस्य हृदयात् त्विषिः वीर्यमस्रवत् । स श्येनोऽभवद् वयसां राजा ' ( शतपथ, १२ | ७ | १ | ६ ) ‘ इन्द्रने जब त्वष्टाके पुत्र विश्वरूपको मारा; तब पुनः पुत्रकी प्राप्त्यर्थं त्वष्टाने सोमको अभिमन्त्रित करके रखा । इन्द्रने ' इसका पुत्र न हो ' इस विचारसे यज्ञकी समाप्तिसे पूर्व ही उस अभिमन्त्रित सोमका पान कर लिया । मन्त्रशक्ति नष्ट कैसे हो? CC - 0. Ankur Joshi Collection स्त्रीसे पुरुष, पुरुषसे स्त्री ०३४ ७३३ तब इन्द्रके इन्द्रिय - इन्द्रियमें सोम व्याप्त हो गया; तब स्थान सिद्ध स्थानसे उसका वीर्य निकला; उस वीर्यसे कहीं अज हो श्रात्मा कभी कोई धान्य हुआ, कहींसे कोई अन्य पशु - पक्षी हुआ । गया, फल फलतः जब दिव्य शक्तिवाला इन्द्र भी उसके पानसे उसे मन्त्रशक्तिको अन्यथा न कर सका; बल्कि पुरुषरूप उस इन्द्रसे उस गायसे मछली विविध - उत्पत्तियां हुईं; तब अभिमन्त्रित - जलके पीनेसे उसकी अमोघशक्तिवश युवनाश्वसे भी पुत्रोत्पत्ति हुई; तब अपवादवश करनेपर लेनी च यह बात उपपन्न हो ही सकती है; क्योंकि मन्त्रकी शक्ति प्रकृति- हरसे ऋ की शक्तिसे अतिशायिनी है । इस विषय में प्रत्यक्षका अनुग्रह भी शक्तिसे है । ‘ हिन्दु सर्वस्व ' ( हरद्वार ) के २६-६-२५ ई ० के अङ्क में ' पुरुषके पेटसे दो बच्चे ' शीर्षकसे निम्न घटना प्रकाशित हुई थी - ' वलगेढ वैज्ञानिक इस ( सरविया ) के अस्पतालमें एक किसान गया, जब डा ० से भेंट रोग दूर हुई, तो उसने कहा कि इस किसानके पेटमें बहुत बड़ा फोड़ा पाठकगर है, जिसके कारण इसे महान् कष्ट है । ऑपरेशन किया गया, तो पेटके ऊपरी भागसे दो बच्चे निकले । एक लम्बाई में ६ इंच, आधा पौढका था । इसके सिरपर लम्बे बाल, और मुंह में कई अवि दांत थे । शरीरकी समस्त रचना पूर्ण थी । दूसरा बच्चा अपूर्ण । कामदेव क था, उसका सिर और पेट बन चुका था ' । इसी प्रकारका अन्य बलनेपर वृत्त ' नवभारत - टाइम्स ' देहली ( ६-३-५४ ) तथा ' वीर - अर्जुन ' ज्ञानार्थ स देहली ८-६-५६ में छपा था । तब यह शङ्का भी प्रत्युत्तरित हो गई । कोटा चुभ इभी प्रकार श्रीमद्भागवत - माहात्म्य ( ४ र्थ अध्याय ) में गायके दाइमें गर्भसे मनुष्याकृति, और गाय - जैसे कानवाले गोकर्णकी उत्पत्ति Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ०३४ ७३३ सिद्ध हो गई । एक योग - विद्या चमत्कारसे पूर्ण महात्माने स्थान- | आत्माराम नामके सन्ततिहीन - त्राह्मणकेलिए एक अभिमन्त्रित हो गया, फल दिया था । ब्राह्मणने उसे अपनी पत्नीको दिया; पर उसने ना । उसे न खाकर गायको वह खिला दिया । तब अमोघशक्तिवश नसे उस गायसे उक्त बालक उत्पन्न हुआ । इस प्रकार अमोघ - वीर्य वालोंकी इन्द्रसे मछली आदिसे मत्स्य एवं मत्स्यगन्धादि - मनुष्योत्पत्ति भी समझ उसकी लेनी चाहिये । राजा द्रुपदके पुत्रेष्टि यज्ञमें गर्भाधायक इवि तैयार वादवश करनेपर द्रुपदकी रानी तो ऋतुमती हो बैठी, मुहूर्त निकल जानेके प्रकृति- इरसे ऋत्विजोंने वह हवि अग्निमें डाल दी । उसकी अमोघ -तुग्रह भी शक्तिसे द्रौपदी तथा धृष्टद्युम्नकी उत्पत्ति हुई । ' पुरुष के इस प्रकार जब मानसिक अविश्वास रोगके रोगी लोग - ' वलगेढ वैज्ञानिक - उपचार स्वयं करेंगे; तब धीरे - धीरे उनका मानसिक - से भेंट रोग दूर होकर उनका मन शुद्ध एवं स्वस्थ हो जायगा । अव डा फोड़ा पाठकगण पुराण में वर्णित नेत्रादि द्वारा जलानेमें उपपत्ति देखें । ' -इंच, ( १५ ) नेत्र आदि द्वारा जलाने में उपपत्ति । हमें कई अविश्वासके दास इस युगमें कई पुरुष शिवके तीसरे नेत्रसे पूर्णमदेव के जलनेपर और कपिलमुनिकी दृष्टिसे सगरके पुत्रोंके अन्य | बलनेपर सन्देह प्रकट करते हैं; हम उन संशयात्माओंके अर्जुन ' ज्ञानार्थ सरल - सरणि दिखलाते हैं, जिससे उनको आशङ्कारूप हो गई । । घंटा चुभनेकी आशङ्कान रहे । - गाय के दाइमें शक्ति सूर्यकी प्रसिद्ध है, या अग्निकी वा बिजुलीकी उत्पत्ति । CC - 0. Ankur Joshi नेत्रादि द्वारा जलाने में उपपत्ति ७३१ - उसमें कारण है कि यह पदार्थ कि जलाता है, उसमें कारण लक्षण है ' उष्णस्पर्शवत् तेजः ' है ' । जलानेका कारण होती है है । तेज सूर्य में भी है, चन्द्रमें आँखमें भी होता है । जैसे अग्नि जलाती है, वैसे तेजस्त्री हैं । तेजस्वी - पदार्थ जो उसका तेज होता है । तेजका ' गर्म स्पर्शवाला तेज हुआ करता उष्णता । वह अग्निमें तो स्पष्ट भी, और बिजुलीमें भी, और सूर्य नहीं; उसमें कारण है कि-वह तेज कुछ उद्भूत ( प्रकट ) -रूप एवं स्पर्शवाला है । पूर्णरूपसे उद्भूत होनेपर ही दाह होता है । सूर्य की थोड़ी उद्भूतरूप - स्पर्श-वत्तामें कारण उसकी बहुत दूरी है । गर्मीका जल, और भाड़का तेज कुछ अनुभूतरूप और उद्भूत स्पर्श हुआ करता है । चन्द्रमें यद्यपि तेज होता है; तथापि वह सूर्यकी भांति तपाना तो दूर, प्रत्युत प्रतीत ही नहीं होता । उसमें कारण यह है कि-चन्द्रमामें जल होता है; उसपर सूर्य की सुपुम्णा - किरण पड़ती है; उसका शीतल हुआ प्रतिविम्व चान्दनीके रूपमें हमारे पास पहुँचता है, और ठंडा प्रतीत होता है । इस प्रकार आँखमें भी यद्यपि नेत्ररश्मि - नामक तेज होता है, जिससे हम देख सकते हैं; तथापि वह किञ्चिद् - अनुद्भूतरूप - स्पर्श होता है, इसलिए उसमें दाह अनुभूत नहीं होता । इसलिए न्यायदर्शनमें कहा है- ' दृच तेजसो धर्मभेदः । उद्भूतरूपस्पर्शं प्रत्यक्षं तेजः, यथा श्रादित्य - रश्मयः । उद्भूतरूपम् अनुद्भूतस्पर्शं च प्रत्यक्षं तेजः, यथा - प्रदीपरश्मयः । उद्भूतस्पर्शम्, Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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७३६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) अप्रत्यक्षम्, यथा- प्रबादि संयुक्तं तेजः । अनुद्-अनुभूतरूपम् चानुषो रश्मिः ' ( ३ | ११३६ ) । इससे नेत्रकी रश्मिका भूतरूपस्पर्शोऽप्रत्यक्षः रूप तथा स्पर्श दोनों अनुभूत हैं- यह सिद्ध हो जाता है । उसका अनुभव न होनेसे ' वह नहीं है ' - यह नहीं कहना चाहिये; इसलिए न्यायदर्शन में कहा है- ' नानुमीयमानस्य प्रत्यक्ष-तोऽनुपलब्धिरभावहेतुः ' ( ३ | १ | ३४ ) ' ' जसका अनुमान तो होता है, पर यदि वह प्रत्यक्ष नहीं दीखता, इससे उसका प्रभाव नहीं समझ लेना चाहिये ' जैसे चन्द्रमाका परला भाग, पृथिवीका निचला भाग प्रत्यक्ष न होनेपर भी होता ही है । इसलिए न्यायमें गया है - ' द्रव्य - गुणधर्मभेदाच्च उपलब्धिनियमः ' ( ३ | १ | ३८ ) कहा द्रव्यका धम महत्त्व आदि होता है, गुणका धर्म उद्भूतत्व आदि हुआ करता है । जहाँ पर महत्त्व - धर्म तथा उद्भूत - रूप हुआ करता है, उसीका प्रत्यक्ष होता है । जहाँ गुणमें उद्भूतत्व होता है, उसका गुण भी प्रत्यक्ष होता है, अन्यथा नहीं । जल-द्रव्य जंब महत्ता से मिलता है; तभी उसका प्रत्यक्ष होता है । जब शीतकाल में उसीके अवयव विभक्त हो जाते हैं; तब उसका प्रत्यक्ष नहीं होता; परन्तु उसका शीत - स्पर्श गृहीत होता है । इससे उसका अनुमान होता है । इस प्रकार महान, अनेक द्रव्यों वाला तेज - द्रव्य प्रत्यक्ष - योग्य भी ग्रीष्ममें अनुद्भूतरूप होने से उसका रूप नहीं दीखता । उसके तापरूपका अनुमापक उसका गर्म - स्पर्श होता है । इस प्रकार आँखकी रश्मि प्रत्यक्ष से अनुप-लब्ध भी अपनी सत्ताको नहीं छोड़ती । उसमें प्रत्यक्ष के प्रभावका CC - 0. Ankur Joshi Collection नेत्रादि - द्वारा जलाने में उपपत्ति ७ ७३७ कारण प्रत्यक्षके प्रयोजक महत्ता तथा उद्भूतता आदिका अभाव ज ही है - यह जान लेना चाहिये । अस्तु — तप परन्तु तपानेवाला भी सूर्य जला भी सकता है, यदि सूर्य - प कान्तमणिके द्वारा उसकी किरणें छोटी - बिन्दुमें कर दी जावें । स पाश्चात्योंके विचार में सूर्यका ताप क्रमशः बढ़ रहा है; क्योंकि उन्हें परीक्षण करने पर पता लगा है कि- सूर्य क्रमसे छोटा हो रहा है । जितना - जितना वह छोटा होता जावेगा उतनी - उतनी हैं उसकी दाहक - शक्ति बढ़ जावेगी । प्रलयके समय सूर्य अत्यन्त ज छोटा होकर पुरुषोंको जला देगा, तब स्वयं भी बुझ जाएगा । कि इस प्रकार नेत्रमें यद्यपि तेज अनुद्भूतरूपस्पर्श होता है; पुर तथापि कारणविशेषसे उसे उद्भूतरूपस्पर्श भी किया जा सकता है । जैसे केवल तपाने वाला भी सूर्य सूर्यकान्तमणिके आश्रयसे यन जला भी सकता है; वैसे आँखका तेज जला भी सकता है । केव नेत्रवाले तेज में सूर्यकान्तमणिकी भांति साधन किसीमें तो स्वतः मह शक्ति होती है, और किसी में तपः- शक्ति होती है । उससे नेत्रके तेजको उद्भूत भी किया जा सकता है । यही कवि - कालिदासने हैं, अभिज्ञान - शाकुन्तल नाटक के द्वितीयाङ्क में दुष्यन्त - राजाके मुखसे खी संकेतित किया है — ‘ शमप्रधानेषु तपोधनेषु गूढं हि दाहात्मक मस्ति चम तेजः । स्पर्शानुकूलां: अपि सूर्यकान्तास्तदन्यतेजोऽभिभवाद् मृत्य ' वमन्ति ' । मृत्य उसमें महादेवके तीसरे नेत्रमें स्वतः - शक्ति के कारण तेज़ सव उद्भूतरूप - स्पर्शवाला हो गया । उसीसे उत्पन्न अग्नि से कामदेव Gujarat. An eGagnative

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७३८ ७३७ जल गया । पहले प्रभाव तपानेवाला है | वही परन्तु वह धीरे - धीरे सूर्य-सूर्यकी किरणें जला कि श्रावश्यकता पड़ेगी आविष्कृत किया है; हो श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) सूचित किया जा चुका है कि - सूर्य केवल सूर्यकान्तमणिके द्वारा दाइक हो जाता है । जलाता है, एक - साथ नहीं । यदि एक - साथ दें - यह विचार हो; तो वहां अन्य साधनकी । पाश्चात्योंने मृत्युकिरण नामक यन्त्र उसमें सूर्यकी मारक - किरणें संगृहीत होती - उतनी हैं । जिस वस्तु पर मृत्युकिरण डाली जाती है; वह उसे तत्क्षणमें II जलाकर भस्म करती है । मृत्युकिरण द्वारा अनेक वायुयान नष्ट नत्यन्त । किये जा सकते हैं, सैंकड़ों ग्राम जलाये जा सकते हैं, हजारों I पुरुष मारे जा सकते हैं । मृत्युकिरण में सर्व संहारक शक्ति है । है; सकता आगे के महायुद्धोंमें मृत्यु किरणसे युद्ध होगा । यदि कोई ऐसा I यन्त्र वनाया जावे, जो सूर्यकी मारकशक्तिके एक करोड़ भाग में है । केवल वीसवां भाग भी खींच ले, तो एक दिनमें सारे संसार में II महाप्रलय किया जा सकता है । स्वतः नेत्र के ' आजकल के मारक - यन्त्र सूर्य से बहुत थोड़ा मृत्युतत्त्व खींचते दास हैं, परन्तु आशा है - आगेके मृत्युकिरणयन्त्र अधिक मृत्युतत्त्वको मुखसे खींच सकेंगे । तब तलवार, बन्दूक, तोप, बारूद, गैस, परमाणु-कमस्ति वम आदि सभी मारक पदार्थोंकी आवश्यकता नहीं रहेगी । भवाद् मृत्युकिरणयन्त्र बिजुलीको वैट्रीके समान होगा । बटन दवानेसे मृत्युंकिरण पैदा होगी, जिस सीधमें वह किरण पड़ेगी; उसका तेन सर्वनाश कर देगी । | मदेव इस प्रकार स्पष्ट हो गया कि जैसे तपानेवाला भी सूर्य CC - 0. Ankur Joshi Collection नेत्रादि द्वारा जलाना ७३६ साधन - विशेष द्वारा जला भी सकता है, वैसे अांखका श्रदाहक तेज भी तपस्या आदि सावनसे जला भी सकता है । उसमें महादेवमें स्वतः - शक्ति होनेसे उनके तीसरे नेत्रमें अग्नि रहा ही करती है; उसीसे कामदेव जला था । वह अग्नि नेत्रको नहीं जलाती; किन्तु दूसरेको जलाती है । यही उसकी लोक - विलक्षणता है । अथवा लौकिकता में भी ऐसे हुआ करता है । शेर अपनी माताको नहीं मारता । इससे ' जो कोई कहे कि -मन्त्र से अग्नि उत्पन्न होता है; तो वह मन्त्रके जप करनेवालेके हृदय और जिह्वाको भस्म कर देवे ' ( स. प्र. ११ पृ. १७३ ) यह स्वा.द.का वचन प्रत्युत्तरित हो गया । योगी एवं तपस्वी त्राह्मणोंमें वह अग्नि गुप्त रहा करती है, परन्तु क्रोध द्वारा उद्भूत वह कभी उद्भूतरूप होकर वा कभी अनुभूतरूप परन्तु उद्भूतस्पर्श वनकर प्रतिपक्षीको जला दिया करती है । उद्भूतस्पर्श होकर तो वह साक्षात् जलाती है; पर अनुद्भूतरूप एवं अनुभूत स्पर्श होकर बिजली के करएटंकी तरह उसके प्राणवायुको शरीरसे निकाल देती है, जिससे पुरुष मर जाता है । परन्तु प्रकृतिने सर्व-साधारणमें यह उद्भूतता नहीं की; अन्यथा सामर्थ्य विशेष न होनेसे वा उसके प्रयोगके अज्ञानसे उनकी आंख स्वयं जल जाय, जिससे वे अन्धे हो जाएँ । उद्भूतरूप होनेपर खके गोलेके सदा जलते रहने से नींद भी न आवे; परन्तु विशेष- शक्तिवाले अपवादस्वरूप ऋषि - मुनि योगियोंमें वैसी हानि नहीं हो सकती । जैसे बिजली की तार में बिजली होनेपर भी मुख्य बटन ( स्विच ) Gujarat. An eGangotri Initiative

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७४० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) के बन्द होनेपर बिजली दबी रहती है, और उस तारमें रहनेपर भी तारको नहीं जलाती; वैसे ऋषि - मुनियोंमें भी समझना चाहिये । वे उस अग्निसे प्रतिपक्षीको तो हानि पहुँचा सकते हैं; अनिच्छा होनेपर उनको स्वयं उससे हानि नहीं होती । महाभारतमें कहा है — ' ब्राह्मणा अग्नि- सदृशा दहेयुः पृथिवी-मपि ' ( वनपर्व २०६।२२ ) ' ब्राह्मण अग्नि के समान होते हैं; वे पृथिवीको भी जला सकते हैं ' । ' कथं हि शापेन न मां दहेयु-ब्रह्मणा इति ' ( अनुशासन. ११।१७ ) । गोपथ ब्राह्मणने भी कहा " है - ' एप ह वै सान्तपनोऽग्निर्यद् ब्राह्मण इति ' ( ११२२२ ) ' ब्राह्मणो ह वा इममग्निं वैश्वानरं बभार ' ( गो ० १ २ २० ) इसलिए अथर्व-वेदमें भी कहा है- ' न ब्राह्मणो हिंसितव्योऽग्निः प्रियतनोरिव ' । ५ १८ । ६ ) यहां ब्राह्मणको अग्निके साथ उपमित किया गया है । ' य एनं ( ब्राह्मणं ) हन्ति मृदु ं मन्यमानो देवपीयुर्धनकामो न चित्तात् । स तस्य इन्द्रो हृदये अग्निम् इन्धे ' ( अथर्व ० ५१८५ ) यहां पर ब्राह्मणके हननसे हृदय में अग्नि द्वारा दाह बतलाया गया है । इसीलिए महाभारत आदि पर्व में निषादाचार - ब्राह्मणको निगलने पर गरुड़ के कण्ठमें अग्निद्वारा दाह हुआ - यह बतलाया गया है । इसीलिए अथर्ववेदसं. में ' निर्वै क्षत्रं नयति, हन्ति वर्चोऽग्निरिव ' ( ५२८ | ४ ) यहां ब्राह्मणको अग्निके समान कहा गया हैं । योगी - मुनि - तपस्वी प्रायः ब्राह्मण होते थे; उनमें अग्नि सम्भृत होनेसे उनकी आंख वा जिह्वा यदि द्वारा अग्निका प्राकट्य भी संगत ही है । CC - 0. Ankur Joshi Collection नेत्रादि- द्वारा जलाने में उपपत्ति ७४ ७४1 बिजली निराकाररूपसे सर्वत्र व्यापक है, परन्तु उसकी दाहमें शक्ति नहीं होती । जब उसे साधन - विशेषके द्वारा प्रकट किया जाता है; और तारमें रखा जाता है; तब उसके दर्शन से दूस तो मृत्यु नहीं होती, किन्तु स्पशेंसे । परन्तु किसी विद्युत् में ऐसा अप तेज हुआ करता है कि उसके दर्शनसे पुरुषकी आंख जल जाने- अप से वह अन्धा हो जाता है, क्योंकि उसकी अग्नि दूसरेकी आंख- क्य में ही फैलकर उसे अपने प्रभावसे जलाती है । कई सांपोंकी कइ विषाग्नि नाकके द्वारा पुरुषोंके भीतर घुसकर उन्हें जला कर ची भस्म कर दिया करती है । इस प्रकार कई पतिव्रता - स्त्रियों में कर ऐसी विद्युत् होती है कि उनके स्पर्शमात्रसे दूसरा पापी जल्ल जाता है, और किन्हींके दर्शनमात्रसे । और किन्हीं में अनुद्भूत- नह रूप और उद्भू तस्पर्शं अग्नि इस तरहकी प्रकट होती है कि वह पद अपराधीको मारकर ही शान्त होती है । यह है क्रोधमय प्रचण्ड हुए अग्नियोंका स्वरूप । प्रेममय अग्नियां अन्य कार्य भी कर सकती हैं । पतिव्रता - गान्धारी के आंखसे निकले हुए तेजने दुर्योधनके अङ्गको ऐसा दृढ कर दिया, जैसे कि अग्नि मट्टीकी ईंटको पक्का कर दिया करती है । ' वैट्री ' की बिजली प्रकाश देती है, दाह नहीं । सूर्यकी किरणें विशेष - समय में अमृतमय भी होती हैं । इस प्रकार जैसे अग्नि तथा विद्युत्के बहुत प्रकारके आधार होते हैं, वैसे योगी, मुनि एवं तपस्वियोंमें स्थित अग्निके भी कि प्रकट होने के आधार बहुत प्रकारके होते हैं । कभी वह अग्नि को शरीर द्वारा ही प्रकट होती है, कभी आंख द्वारा, और कभी दूस Gujarat. An eGangotri Initiative